पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी रणनीति पूरी तरह से बदल दी है। पिछली गलतियों से सबक लेते हुए पार्टी अब “अपनों” पर भरोसा जताने की नीति पर आगे बढ़ रही है। ‘बाहरी चेहरों’ से दूरी, पुराने कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता पिछले चुनाव में पार्टी ने बड़ी संख्या में अन्य दलों से आए नेताओं को टिकट दिया था, जिससे संगठन के भीतर असंतोष पैदा हुआ था। इस बार भाजपा ने साफ कर दिया है कि वह “किराए के नेताओं” पर निर्भर नहीं रहेगी। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के अनुसार, पार्टी इस बार केवल उन्हीं कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ा रही है, जो लंबे समय से संगठन से जुड़े रहे हैं। इससे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। गुटबाजी खत्म कर एकजुटता पर जोर भाजपा नेतृत्व ने इस बार आंतरिक गुटबाजी को खत्म करने पर भी विशेष ध्यान दिया है। पिछली बार अलग-अलग नेताओं के अलग सुर पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हुए थे। अब पार्टी का दावा है कि सभी गुट एकजुट होकर चुनाव लड़ रहे हैं। केंद्रीय नेतृत्व, जिसमें अमित शाह और राज्य के प्रमुख नेता शुभेंदु अधिकारी शामिल हैं, संगठन को एक दिशा में ले जाने पर फोकस कर रहे हैं। एंटी-इनकंबेंसी पर भाजपा का दांव भाजपा इस बार तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी को बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पार्टी स्थानीय स्तर पर मुद्दों को उठाने और हर विधानसभा क्षेत्र में टीएमसी नेताओं के खिलाफ “चार्जशीट” पेश करने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी नेताओं का मानना है कि जनता के बीच स्थानीय समस्याओं को प्रमुखता से उठाकर चुनावी माहौल अपने पक्ष में किया जा सकता है। ‘लोकल मुद्दे, लोकल चेहरे’ पर फोकस भाजपा इस बार “लोकल मुद्दे और लोकल चेहरे” की रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है। संगठन का मानना है कि इससे जमीनी कनेक्ट मजबूत होगा और पिछले चुनाव की तुलना में बेहतर प्रदर्शन की संभावना बढ़ेगी।
बिहार की राजनीति में इन दिनों मुख्यमंत्री पद को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा लगातार सम्राट चौधरी को लेकर दिए जा रहे संकेतों ने सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह महज राजनीतिक संदेश है या इसके पीछे कोई बड़ी रणनीति छिपी है? क्या बीजेपी पर दबाव बनाने की कोशिश? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार के बयान बीजेपी के अंदरूनी समीकरणों को प्रभावित करने की कोशिश हो सकते हैं। अगर बीजेपी सम्राट चौधरी को आगे नहीं बढ़ाती है, तो इससे कुशवाहा वोट बैंक में नाराजगी की आशंका बन सकती है। वहीं अगर उन्हें आगे किया जाता है, तो इसका श्रेय भी नीतीश कुमार ले सकते हैं। ऐसे में दोनों ही परिस्थितियों में जदयू को राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। बीजेपी के लिए ‘धर्मसंकट’ की स्थिति यह मामला बीजेपी के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। पार्टी खुलकर यह भी नहीं कह पा रही कि उसका मुख्यमंत्री चेहरा कौन होगा। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी फिलहाल चुप्पी साधे हुए है और सही समय का इंतजार कर रही है, ताकि राजनीतिक समीकरणों के अनुसार फैसला लिया जा सके। ‘लव-कुश’ समीकरण साधने की कोशिश? राजनीति के जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कुशवाहा) सामाजिक समीकरण को मजबूत करने का संदेश देना चाहते हैं। सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाकर वे यह दिखाना चाहते हैं कि इस सामाजिक एकता में उनकी अहम भूमिका है, जो आने वाले चुनावों में निर्णायक साबित हो सकती है। क्या दोहराई जाएगी सुशील कुमार मोदी जैसी कहानी? राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि कहीं सम्राट चौधरी की स्थिति भी दिवंगत सुशील कुमार मोदी जैसी न हो जाए। 2005 के बाद जदयू-भाजपा गठबंधन में सुशील मोदी और नीतीश कुमार की जोड़ी काफी मजबूत मानी जाती थी। लेकिन बाद में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के साथ समीकरण बदलने पर सुशील मोदी को राज्य की राजनीति से हटाकर दिल्ली भेज दिया गया था। गृह मंत्री के तौर पर प्रदर्शन पर भी सवाल सम्राट चौधरी को गृह मंत्री बनाए जाने के बाद कानून-व्यवस्था को लेकर कई बार विपक्ष ने सरकार को घेरा है। हालांकि इन मुद्दों पर मुख्यमंत्री की ओर से ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं आई, जिससे यह संकेत भी मिलता है कि राजनीतिक समीकरणों के चलते उन्हें फिलहाल खुला समर्थन दिया जा रहा है। आगे क्या? बिहार की राजनीति में यह पूरा घटनाक्रम आने वाले समय में और दिलचस्प हो सकता है। क्या यह रणनीति बीजेपी को दबाव में लाने के लिए है, या फिर गठबंधन की मजबूती दिखाने का प्रयास-इसका जवाब आने वाले दिनों में ही साफ होगा। फिलहाल इतना तय है कि मुख्यमंत्री पद को लेकर सियासी हलचल तेज हो चुकी है और सभी की नजरें अगले बड़े फैसले पर टिकी हैं।
आगामी विधानसभा चुनावों से पहले Bharatiya Janata Party ने असम, केरल और पश्चिम बंगाल को लेकर अपनी व्यापक रणनीति तैयार कर ली है। राजधानी दिल्ली में हुई केंद्रीय चुनाव समिति की अहम बैठक में प्रधानमंत्री Narendra Modi, गृह मंत्री Amit Shah और रक्षा मंत्री Rajnath Singh समेत शीर्ष नेतृत्व ने इन राज्यों में चुनावी गणित और संभावनाओं पर विस्तार से मंथन किया। असम: गठबंधन के साथ चुनावी मैदान Assam में पार्टी ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। Asom Gana Parishad Bodoland People's Front इन दलों के साथ सीट शेयरिंग के जरिए चुनावी मजबूती बढ़ाने की रणनीति बनाई गई है। बताया जा रहा है कि 89 सीटों पर गहन चर्चा हुई है और जल्द ही उम्मीदवारों की सूची जारी की जा सकती है। इस रणनीति में मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma की अहम भूमिका रही है। केरल: 100 सीटों पर बड़ा दांव Kerala में पार्टी ने इस बार आक्रामक रणनीति अपनाई है। 140 सदस्यीय विधानसभा में से 100 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का लक्ष्य रखा गया है। पहली सूची में ही कई बड़े नामों को टिकट दिया गया है: Rajeev Chandrasekhar – नेमोम सीट George Kurian – कांजिराप्पिली सीट गौरतलब है कि 2021 के चुनाव में पार्टी को यहां एक भी सीट नहीं मिली थी। ऐसे में यह रणनीति राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने और तीसरे विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश मानी जा रही है। बंगाल: पहली बार सत्ता में आने का लक्ष्य West Bengal में पार्टी ने इस बार ‘क्लीन स्वीप’ का लक्ष्य रखा है। बीजेपी 150 से अधिक सीटों पर मजबूत लड़ाई की तैयारी में है। पहले ही 144 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की जा चुकी है, जिसमें प्रमुख चेहरे शामिल हैं: Suvendu Adhikari Dilip Ghosh राज्य की कुल 294 सीटों में मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है, क्योंकि सत्तारूढ़ दल All India Trinamool Congress भी 291 सीटों पर उम्मीदवार उतार चुका है। चुनावी टाइमलाइन और सियासी समीकरण Kerala में 9 अप्रैल को एक चरण में मतदान होना है। वहीं कांग्रेस और वाम दल भी अपनी-अपनी रणनीतियों के साथ मैदान में उतर चुके हैं। बीजेपी का यह पूरा प्लान दर्शाता है कि पार्टी उन राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है, जहां अब तक उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि यह रणनीति जमीन पर कितनी कारगर साबित होती है।
आगामी West Bengal Legislative Assembly Election को लेकर Bharatiya Janata Party ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में राज्य की आधे से अधिक सीटों पर उम्मीदवारों के नाम लगभग तय कर लिए गए हैं और पहली सूची जल्द जारी की जा सकती है। बताया जा रहा है कि करीब 160 सीटों के उम्मीदवारों के नाम तय किए जा चुके हैं। संभावना है कि कोलकाता में प्रधानमंत्री Narendra Modi की बड़ी रैली के बाद पार्टी आधिकारिक तौर पर अपनी पहली उम्मीदवार सूची जारी कर दे। कई बड़े नेताओं को मिल सकता है टिकट सूत्रों के अनुसार पहली सूची में राज्य बीजेपी के कई प्रमुख नेताओं के नाम शामिल होंगे। इनमें विधानसभा में विपक्ष के नेता Suvendu Adhikari और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष Dilip Ghosh जैसे बड़े चेहरे शामिल हो सकते हैं। पार्टी कुछ पूर्व सांसदों को भी विधानसभा चुनाव में उतारने की योजना बना रही है। हालांकि इस बार रणनीति के तहत मौजूदा सांसदों को विधानसभा चुनाव लड़ाने से परहेज किया गया है। उम्मीदवार चयन में लिया गया जमीनी फीडबैक पार्टी नेताओं के मुताबिक इस बार उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया पिछले चुनाव की तुलना में ज्यादा सावधानी से की गई है। करीब एक महीने से चल रही इस प्रक्रिया के दौरान जमीनी स्तर से फीडबैक लिया गया और विभिन्न सर्वेक्षणों के जरिए संभावित उम्मीदवारों की लोकप्रियता का आकलन किया गया। उम्मीदवार तय करते समय संगठन के प्रति निष्ठा, अनुशासन और जीतने की क्षमता को प्रमुख मानदंड बनाया गया है। जमीनी नेताओं पर दांव सूत्रों का कहना है कि इस बार टिकट वितरण में स्थानीय और क्षेत्रीय समीकरणों के साथ-साथ सामाजिक समीकरणों को भी ध्यान में रखा गया है। पार्टी ने यह भी तय किया है कि इस बार दलबदल कर आए नेताओं को टिकट नहीं दिया जाएगा। पिछले चुनाव की तुलना में इस रणनीति में बदलाव किया गया है। इसके अलावा बीजेपी ने इस बार फिल्म या टीवी इंडस्ट्री के चर्चित चेहरों को टिकट देने से भी परहेज किया है और उनकी जगह जमीनी कार्यकर्ताओं और संगठन से जुड़े नेताओं पर भरोसा जताया है। बाकी सीटों पर जल्द होगा फैसला पार्टी सूत्रों के अनुसार शेष सीटों के उम्मीदवारों के चयन के लिए केंद्रीय चुनाव समिति की एक और बैठक जल्द बुलाई जा सकती है। इसके बाद बाकी सीटों की सूची भी जारी की जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार बीजेपी पश्चिम बंगाल में संगठन आधारित चुनावी रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है, जिसमें स्थानीय नेतृत्व और जमीनी नेटवर्क को प्राथमिकता दी जा रही है।
डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष की कुर्सी पर भाजपा की नजर, जानिए नगर निकायों में कैसे होता है चुनाव झारखंड में नगर निकाय चुनाव में महापौर और पार्षद के परिणाम आने के बाद अब डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष के पदों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी इन पदों पर अपने समर्थित उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए संगठन स्तर पर रणनीति तैयार कर रही है। पार्टी का लक्ष्य है कि राज्य के सभी 48 नगर निकायों में डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष की कुर्सी पर भाजपा समर्थित प्रत्याशी काबिज हों। इसके लिए महापौर, अध्यक्ष और पार्षद के रूप में निर्वाचित भाजपा समर्थित उम्मीदवारों के साथ-साथ पार्टी कार्यकर्ताओं की पहचान की जा रही है, ताकि चुनाव के दौरान उन्हें समर्थन मिल सके। भाजपा को जीत की उम्मीद प्रदेश भाजपा के मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक का कहना है कि महापौर और पार्षद चुनाव में भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को अन्य दलों की तुलना में बेहतर सफलता मिली है। उनका दावा है कि राज्य के नौ नगर निगमों में से पांच में भाजपा समर्थित उम्मीदवार महापौर बने हैं। ऐसे में पार्टी को भरोसा है कि जहां महापौर उनके समर्थन से चुने गए हैं, वहां डिप्टी मेयर भी भाजपा समर्थित ही होगा। वहीं जिन निकायों में महापौर या अध्यक्ष भाजपा के नहीं हैं, वहां भी पार्टी अपने समर्थकों को डिप्टी मेयर या उपाध्यक्ष बनाने का प्रयास करेगी। नगर निकाय चुनाव में उम्मीद से कम सफलता हालांकि भाजपा को इस बार शहरी क्षेत्रों में उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। राज्य के 48 नगर निकायों में महापौर और अध्यक्ष पदों पर भाजपा समर्थित करीब 16 उम्मीदवार ही जीत दर्ज कर सके। नौ नगर निगमों में से रांची, आदित्यपुर और मेदिनीनगर में भाजपा समर्थित प्रत्याशी जीतने में सफल रहे। नगर परिषद की 20 सीटों में भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को तीन सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस समर्थित दो, झामुमो समर्थित चार और 11 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। नगर पंचायतों में भाजपा का पलड़ा भारी नगर पंचायतों में भाजपा समर्थित उम्मीदवार अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखे। यहां छह सीटों पर भाजपा समर्थित उम्मीदवार जीते, जबकि झामुमो समर्थित चार और आठ निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए। एक सीट पर भाकपा माले समर्थित उम्मीदवार धनवार से अध्यक्ष पद पर चुने गए। रांची में महापौर पद पर भाजपा समर्थित प्रत्याशी रोशनी खलखो ने जीत दर्ज की, हालांकि गिरिडीह और देवघर जैसे महत्वपूर्ण नगर निगम भाजपा के हाथ से निकल गए। गिरिडीह नगर निगम में पहली बार झारखंड मुक्ति मोर्चा ने जीत हासिल की, जबकि देवघर में भी झामुमो समर्थित उम्मीदवार को सफलता मिली। पार्षद निभाते हैं अहम भूमिका डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष के चुनाव में निर्वाचित पार्षदों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। उदाहरण के तौर पर रांची नगर निगम में 53 वार्ड हैं और सभी वार्डों से चुने गए पार्षद ही डिप्टी मेयर के चुनाव में मतदान करेंगे। जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक वोट मिलेंगे, वही डिप्टी मेयर चुना जाएगा। 10 से 20 मार्च तक पूरी होगी प्रक्रिया राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार सभी 48 नगर निकायों में डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया 10 मार्च से शुरू होकर 20 मार्च तक पूरी कर ली जाएगी। आयोग के सचिव राधेश्याम प्रसाद के मुताबिक सभी नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों के लिए तिथिवार कार्यक्रम तय कर दिया गया है। ऐसे होता है डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष का चुनाव नगर निगमों में डिप्टी मेयर और नगर परिषद व नगर पंचायतों में उपाध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष तरीके से होता है। इसमें आम मतदाता हिस्सा नहीं लेते, बल्कि केवल निर्वाचित वार्ड पार्षद ही मतदान करते हैं। मेयर या अध्यक्ष इस चुनाव में हिस्सा नहीं लेते। पार्षदों में से कोई भी उम्मीदवार डिप्टी मेयर या उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ सकता है और इस पद के लिए किसी प्रकार का आरक्षण भी नहीं होता। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार पहले सभी वार्ड पार्षदों का शपथ ग्रहण कराया जाता है। इसके बाद डिप्टी मेयर या उपाध्यक्ष पद के लिए नामांकन और मतदान की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।