रांची। राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में करीब 40 वर्षों से लगने वाले साप्ताहिक सब्जी बाजार को बंद किए जाने के फैसले का विरोध तेज हो गया है। सोमवार को भारी बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में सब्जी और फल विक्रेता रांची नगर निगम कार्यालय पहुंचे और धरना देकर अपना विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के बाजार बंद करने से हजारों परिवारों की आजीविका पर संकट खड़ा हो गया है।
मोरहाबादी मैदान में प्रत्येक बुधवार और शनिवार को लगने वाले इस बाजार में रांची समेत आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से करीब 1600 से अधिक विक्रेता अपनी उपज बेचने पहुंचते थे। शनिवार को नगर निगम और पुलिस प्रशासन ने बाजार नहीं लगने दिया, जिसके बाद विक्रेताओं में नाराजगी बढ़ गई।
प्रदर्शन के दौरान विक्रेताओं ने मांग की कि या तो बाजार को पहले की तरह संचालित किया जाए या फिर जल्द से जल्द उनके लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया जाए। उनका कहना है कि वर्षों से यही बाजार उनकी आय का प्रमुख स्रोत रहा है और अचानक बंद होने से परिवार चलाना मुश्किल हो गया है।
वहीं, नगर आयुक्त सुशांत गौरव ने निगम के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि बाजार का दायरा लगातार बढ़ने से आसपास की सड़कें अतिक्रमित हो रही थीं और पूरे क्षेत्र में गंभीर ट्रैफिक जाम की स्थिति बन रही थी। इसका असर स्थानीय लोगों, स्कूली बच्चों और आम राहगीरों पर पड़ रहा था।
नगर आयुक्त ने कहा कि निगम विक्रेताओं की आजीविका और शहर की यातायात व्यवस्था, दोनों को ध्यान में रखते हुए समाधान तलाश रहा है। प्रशासन इस दिशा में मंथन कर रहा है ताकि विक्रेताओं को वैकल्पिक व्यवस्था मिल सके और शहरवासियों को भी जाम की समस्या से राहत मिले।
फिलहाल नगर निगम और सब्जी विक्रेताओं के बीच किसी सहमति पर बात नहीं बन सकी है। अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि प्रशासन इस विवाद का स्थायी और संतुलित समाधान कब तक निकालता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
रांची में बिजली के खंभों पर बेतरतीब और कथित तौर पर अवैध रूप से लगाए गए केबलों के खिलाफ बिजली विभाग की कार्रवाई ने राजधानी के कई इलाकों में इंटरनेट और फोन सेवाओं को प्रभावित कर दिया है। पिछले दो दिनों से चल रहे अभियान के दौरान बड़ी संख्या में केबल हटाए गए, जिसके बाद कई क्षेत्रों में फाइबर और मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बाधित रहीं। सबसे ज्यादा असर कोकर इंडस्ट्रियल एरिया में देखने को मिला, जहां 70 से अधिक औद्योगिक इकाइयों की इंटरनेट सेवा बुधवार दोपहर से प्रभावित रही। इंटरनेट बंद रहने के कारण कई कंपनियों को ऑनलाइन कामकाज और ऑर्डर में परेशानी हुई। उद्योग संघ के अनुसार, कुछ ऑर्डर तक रद्द करने पड़े। मीडिया संस्थानों का काम भी प्रभावित कोकर के अलावा हरमू, कांके रोड, मेन रोड, खेलगांव, कुसई चौक और करमटोली समेत कई इलाकों में इंटरनेट सेवाएं प्रभावित हुईं। इसका असर मीडिया संस्थानों और ऑनलाइन आधारित कारोबार पर भी पड़ा। बीएसएनएल, एयरटेल और अन्य निजी ऑपरेटरों के ग्राहकों को परेशानी हुई, जबकि कुछ इलाकों में जियो की सेवाएं भी प्रभावित होने की बात सामने आई। जेबीवीएनएल का हेल्पलाइन नंबर भी हुआ प्रभावित दिलचस्प स्थिति यह रही कि जिस बिजली वितरण कंपनी की ओर से केबल हटाने का अभियान चलाया जा रहा है, उसका टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर 1912 भी इंटरनेट आधारित होने के कारण प्रभावित हो गया। जेबीवीएनएल ने उपभोक्ताओं से असुविधा के लिए खेद जताते हुए वैकल्पिक नंबर जारी किए हैं। हाईकोर्ट के आदेश का दिया गया हवाला जेबीवीएनएल के जीएम मनमोहन कुमार के मुताबिक, यह कार्रवाई हाईकोर्ट के सुओमोटो आदेश के बाद की जा रही है। विभाग का कहना है कि बिजली के खंभों पर बिना अनुमति लगाए गए और निर्धारित सुरक्षा ऊंचाई से नीचे झूल रहे केबल दुर्घटना का खतरा पैदा कर रहे थे। विभाग के अनुसार, कंपनियों को जून से ही नोटिस देकर केबलों को सुरक्षा मानकों के अनुरूप व्यवस्थित करने का निर्देश दिया गया था। 16 अगस्त से बेतरतीब और अवैध केबल हटाने की सूचना भी पहले दी गई थी। जेबीवीएनएल का दावा है कि जिन कंपनियों के पास वैध अनुमति है और जिन्होंने निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन किया है, उनके केबल नहीं हटाए गए हैं। विभाग ने इंटरनेट सेवा बाधित होने के लिए टेलीकॉम कंपनियों की ओर से नोटिस का पालन नहीं किए जाने को जिम्मेदार बताया है। कई इलाकों में चला अभियान अभियान के दौरान कुसई चौक, हिनू रोड, हरमू रोड, कांके रोड, तुपुदाना, बूटी मोड़, मेन रोड, खेलगांव, कोकर, करमटोली और जगन्नाथपुर समेत कई इलाकों में कार्रवाई की गई। गुरुवार को अशोकनगर, हरमू, अरगोड़ा, लालपुर, पुरुलिया रोड, सुजाता चौक, मोरहाबादी, कांटाटोली, नामकुम और बूटी मोड़ सहित अन्य क्षेत्रों में भी केबल हटाए गए। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करने के साथ इंटरनेट जैसी जरूरी सेवाओं को बाधित होने से कैसे बचाया जाए। एक तरफ बिजली के खंभों पर अवैध और असुरक्षित केबलों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ उद्योग, मीडिया और आम उपभोक्ताओं के कामकाज को लंबे समय तक प्रभावित होने से रोकने के लिए विभाग और टेलीकॉम कंपनियों के बीच बेहतर समन्वय भी जरूरी है।
रांची। देश के टॉप-10 सदर अस्पतालों में शामिल रांची सदर अस्पताल की कार्यप्रणाली और स्वास्थ्य सेवाओं को समझने के लिए बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति की टीम ने गुरुवार को अस्पताल का भ्रमण किया। टीम ने यहां संचालित स्वास्थ्य योजनाओं, आयुष्मान भारत योजना और मरीजों को मिल रही सुपर स्पेशलिटी सेवाओं की जानकारी ली। बिहार से आई टीम में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, बिहार के अपर कार्यपालक निदेशक स्पर्श गुप्ता, बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति की विशेषज्ञ चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. कंचन कुमारी और क्षेत्रीय लेखा प्रबंधक प्रदीप कुमार शामिल थे। अधिकारियों और चिकित्सकों से की बातचीत भ्रमण के दौरान बिहार की टीम ने रांची के सिविल सर्जन डॉ. अमरेंद्र प्रसाद, सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. बिमलेश कुमार सिंह, आयुष्मान योजना के नोडल अधिकारी डॉ. अखिलेश झा, डॉ. रचित भूषण और आयुष्मान समन्वयक आशीष रंजन समेत अन्य चिकित्सकों और अधिकारियों से बातचीत की। टीम ने अस्पताल में चल रही विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं और मरीजों को उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं के बारे में विस्तार से जानकारी हासिल की। इसके बाद टीम ने अस्पताल के अलग-अलग विभागों और सेवाओं का निरीक्षण किया। आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन की ली जानकारी बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति की टीम ने रांची सदर अस्पताल में आयुष्मान योजना के तहत संचालित स्वास्थ्य सेवाओं का विशेष रूप से अवलोकन किया। टीम ने यहां की व्यवस्थाओं और कार्यप्रणाली की सराहना की तथा इन बेहतर व्यवस्थाओं को बिहार में लागू करने की संभावनाओं को लेकर जानकारी जुटाई। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत संचालित कार्यक्रमों, मानव संसाधन, दवाओं की उपलब्धता, जरूरी सुविधाओं और मरीजों को सेवा देने की व्यवस्था का भी जायजा लिया गया। बेहतर स्वास्थ्य मॉडल को समझना रहा उद्देश्य टीम ने संबंधित अधिकारियों और स्वास्थ्यकर्मियों से योजनाओं के जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन और निगरानी से जुड़ी जानकारी ली। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य दोनों राज्यों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े बेहतर अनुभवों और कार्यप्रणालियों को साझा करना रहा। रांची सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. बिमलेश कुमार सिंह ने कहा कि अस्पताल लगातार बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने की दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि रांची सदर अस्पताल की व्यवस्थाओं को देखने के लिए बिहार की टीम का आना झारखंड की बेहतर होती स्वास्थ्य व्यवस्था की उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि आयुष्मान योजना के बेहतर क्रियान्वयन से अस्पताल में कई सुपर स्पेशलिटी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना संभव हुआ है।
रांची। झारखंड भाजपा के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने 19 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। करीब 20 मिनट चली इस बैठक में MMDR संशोधन विधेयक, परिसीमन, राज्य में चल रहे छात्र आंदोलन और झारखंड की मौजूदा राजनीतिक स्थिति समेत कई मुद्दों पर चर्चा हुई। MMDR संशोधन विधेयक पर बनी रणनीति बैठक में केंद्र सरकार के MMDR संशोधन विधेयक को लेकर झारखंड भाजपा की रणनीति पर चर्चा हुई। यह मुद्दा राज्य में राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण हो गया है और भाजपा इसे लेकर अपना पक्ष जनता तक पहुंचाने की तैयारी में है। छात्र आंदोलन भी बैठक का अहम मुद्दा झारखंड में JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन पर भी अमित शाह के साथ चर्चा हुई। राज्य सरकार ने हाल ही में 22 भर्ती परीक्षाएं रद्द करने और 17 अन्य भर्ती प्रक्रियाओं की जांच का फैसला लिया है। भाजपा ने सरकार को घेरने की बनाई रणनीति बैठक में झारखंड की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और राज्य सरकार के खिलाफ उठाए जाने वाले मुद्दों पर भी मंथन हुआ। भाजपा नेताओं ने भर्ती परीक्षाओं और अन्य राज्य स्तरीय मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बनाए रखने की रणनीति पर चर्चा की। छात्र आंदोलन में आया नया मोड़ इस बीच छात्र आंदोलन में भी बड़ा बदलाव आया है। 26 दिनों तक चले आंदोलन को छात्रों ने सरकार के कुछ फैसलों के बाद दो महीने के लिए स्थगित कर दिया है। हालांकि, छात्रों ने सरकार को मांगों पर कार्रवाई के लिए समयसीमा दी है और आगे मांगें पूरी नहीं होने पर आंदोलन फिर तेज करने की चेतावनी दी है।