रांची। रिम्स से जुड़े कथित जमीन और भ्रष्टाचार मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने गुरुवार को गिरफ्तार डेवलपर शुभम साबू को जमानत दे दी। सुनवाई के दौरान अदालत ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की जांच पर कई सवाल उठाए और पूछा कि मामले में निजी लोगों की गिरफ्तारी हुई, लेकिन कथित रूप से भूमिका निभाने वाले सरकारी अधिकारियों के खिलाफ अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि मामले को करीब आठ महीने बीत चुके हैं, लेकिन कथित भ्रष्टाचार में शामिल किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि जिन अधिकारियों की भूमिका उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान सामने आ रही है, वे अब भी सेवा में कैसे बने हुए हैं, जबकि निजी लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
अदालत ने ACB से सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई में देरी का कारण स्पष्ट करने को कहा। कोर्ट की टिप्पणियों से जांच के दायरे और उसकी निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।
शुभम साबू की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि संबंधित जमीन को लेकर रजिस्टर्ड सेल डीड के आधार पर डेवलपमेंट एग्रीमेंट किया गया था। बचाव पक्ष के अनुसार, सेल डीड पर सरकारी प्रमाणीकरण मौजूद था और दस्तावेज में जमीन को अधिग्रहित या वन भूमि नहीं बताया गया था।
वकील ने यह भी दलील दी कि संबंधित प्लॉट के लिए 30 वर्षों का नॉन-एनकम्ब्रेंस सर्टिफिकेट (NEC) भी लिया गया था। ऐसे में डेवलपर ने सरकारी रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेजों पर भरोसा करते हुए ही आगे की प्रक्रिया की।
बचाव पक्ष ने कोर्ट में तर्क दिया कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में बाद में कोई गड़बड़ी सामने आती है, तो उन अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए जिन्होंने दस्तावेज तैयार, प्रमाणित या जारी किए थे। अधिवक्ता ने कहा कि केवल निजी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है, जबकि सरकारी तंत्र की भूमिका की समान रूप से जांच नहीं की गई।
शुभम साबू को जमानत मिलने के बाद अब मामले की जांच में सरकारी अधिकारियों की कथित भूमिका पर नजर रहेगी। हाईकोर्ट की टिप्पणियों के बाद ACB की जांच के दायरे को लेकर भी सवाल उठे हैं। हालांकि, सरकारी अधिकारियों की भूमिका और मामले में उनकी जिम्मेदारी को लेकर अभी कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं आया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
चांडिल। चांडिल के लोगों को लंबे समय से चली आ रही जाम की समस्या से अब राहत मिलने वाली है। पितकी रेलवे ओवरब्रिज बनकर तैयार हो गया है और इसका 22 अगस्त को उद्घाटन किया जाएगा। ओवरब्रिज शुरू होने के बाद पितकी रेलवे फाटक पर ट्रेनों के गुजरने के दौरान लगने वाले लंबे जाम से लोगों को निजात मिलने की उम्मीद है। ओवरब्रिज के चालू होने से टाटा-पुरुलिया-धनबाद-बोकारो मार्ग पर आवागमन आसान होगा। रोजाना इस मार्ग से गुजरने वाले हजारों वाहन चालकों, स्कूली बच्चों, कर्मचारियों और कारोबारियों को इसका सीधा फायदा मिलेगा। रेलवे फाटक पर खत्म होगी जाम की समस्या पितकी रेलवे फाटक पर ट्रेन आने के समय फाटक बंद होने से सड़क पर वाहनों की लंबी कतार लग जाती थी। कई बार जाम चांडिल से चौका-कांड्रा मार्ग तक पहुंच जाता था। ओवरब्रिज शुरू होने के बाद सड़क और रेल यातायात अलग-अलग हो जाएगा, जिससे वाहनों को फाटक खुलने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। टाटा-पुरुलिया मार्ग पर सफर होगा आसान पितकी ओवरब्रिज के चालू होने से टाटा, पुरुलिया, धनबाद और बोकारो की ओर आने-जाने वाले लोगों को बड़ी सुविधा मिलेगी। इससे समय और ईंधन की बचत के साथ आपातकालीन सेवाओं के वाहनों की आवाजाही भी सुगम होने की उम्मीद है। 22 अगस्त से पितकी रेलवे ओवरब्रिज के शुरू होने के बाद चांडिल क्षेत्र की यातायात व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
रांची। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने केंद्र सरकार द्वारा पारित खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक-2026 यानी एमएमडीआर संशोधन के खिलाफ व्यापक आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी है। इसे लेकर गुरुवार को रांची के सोहराय भवन में जेएमएम की विस्तारित केंद्रीय समिति की बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता मुख्यमंत्री और पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने की। बैठक में पार्टी के विधायक, सांसद, मंत्री, केंद्रीय समिति के पदाधिकारी और विभिन्न जिलों के जिलाध्यक्ष व जिला सचिव शामिल हुए। इस दौरान एमएमडीआर संशोधन कानून से झारखंड को होने वाले संभावित नुकसान पर विस्तार से चर्चा की गई। पार्टी नेताओं ने इसे झारखंड के हितों के खिलाफ बताते हुए लोकतांत्रिक, संवैधानिक और कानूनी तरीके से संघर्ष करने पर सहमति जताई। हेमंत सोरेन बोले- झारखंड के विकास पर पड़ेगा असर बैठक के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि एमएमडीआर कानून में संशोधन का झारखंड पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि संशोधन से पहले राज्यों से पर्याप्त चर्चा नहीं की गई। मुख्यमंत्री के मुताबिक, इसका असर राज्य की आर्थिक स्थिति और विकास योजनाओं पर पड़ सकता है। हेमंत सोरेन ने कहा कि झारखंड शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और ग्रामीण एवं महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, लेकिन इस कानून के कारण राज्य को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि केंद्र पर झारखंड का करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये बकाया है और संशोधन के बाद राज्य के हित प्रभावित हो सकते हैं। लोकतांत्रिक और कानूनी लड़ाई लड़ने का ऐलान मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड अपने हक और अधिकार के लिए लोकतांत्रिक, संवैधानिक और कानूनी लड़ाई लड़ेगा। उन्होंने केंद्र सरकार पर राज्यों के अधिकारों को कमजोर करने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि खनिज संपदा के मामले में झारखंड देश के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और राज्य के हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करेगा जेएमएम जेएमएम के केंद्रीय महासचिव विनोद पांडेय ने कहा कि पार्टी राज्य में संशोधित एमएमडीआर कानून लागू नहीं होने देने के लिए संवैधानिक, कानूनी और जमीनी स्तर पर संघर्ष करेगी। उन्होंने कहा कि एक-दो दिनों में आंदोलन की विस्तृत रूपरेखा तय की जाएगी। उन्होंने बताया कि पार्टी कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर लोगों को संशोधन कानून के संभावित प्रभावों के बारे में जागरूक करेंगे। बैठक में एसआईआर और परिसीमन जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई। महुआ माजी ने भी आंदोलन की बात कही राज्यसभा सांसद महुआ माजी ने कहा कि बैठक में सभी सदस्यों ने एमएमडीआर संशोधन कानून के खिलाफ व्यापक जनांदोलन की इच्छा जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने जल्दबाजी में संशोधन विधेयक पारित कराया और इस पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई। बैठक में जेएमएम सांसद जोबा मांझी, विजय हांसदा, नलिन सोरेन, महुआ माजी समेत कई नेता मौजूद रहे। मंत्रियों और विधायकों में सुदिव्य कुमार सोनू, हफीजुल हसन अंसारी, कल्पना सोरेन, बसंत सोरेन समेत पार्टी के कई वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हुए।
रांची। नामकुम थाना क्षेत्र में 15 वर्षीय नाबालिग के साथ दुष्कर्म का मामला सामने आया है। पुलिस ने मामले में 35 वर्षीय आरोपी गुरुदयाल मुंडा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। आरोपी पीड़िता के परिवार का परिचित था और इसी वजह से उसका घर पर आना-जाना था। घर में ही वारदात का आरोप परिजनों के मुताबिक, 16 अगस्त की रात आरोपी घर में रुका था। देर रात करीब 12 बजे उसने कथित तौर पर नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया। घटना के बाद नाबालिग की तबीयत बिगड़ गई। उसने अपनी मां को घटना की जानकारी दी, जिसके बाद परिजन उसे इलाज के लिए निजी अस्पताल ले गए। रिम्स में कराया गया भर्ती नाबालिग की स्थिति गंभीर होने पर निजी अस्पताल से उसे रिम्स रेफर किया गया। रिम्स में इलाज के दौरान उसका बयान दर्ज किया गया। इसी बयान के आधार पर नामकुम पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर आरोपी की तलाश शुरू की। POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज नामकुम थाना प्रभारी राम नारायण सिंह के अनुसार, आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म और POCSO एक्ट की धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के अनुसार, आरोपी पहले भी दुष्कर्म के एक मामले में जेल जा चुका है।