ढाका: भारत और बांग्लादेश के बीच बढ़ती राजनीतिक और कूटनीतिक हलचल के बीच चार भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल ढाका पहुंचा है। यह दौरा बांग्लादेश की सेना की खुफिया एजेंसी डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फोर्स इंटेलिजेंस (डीजीएफआई) के बुलावे पर हुआ है। रिपोर्टों के मुताबिक, चार सदस्यीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल रविवार दोपहर नई दिल्ली से विमान के जरिए ढाका पहुंचा। दोनों देशों के बीच संबंधों में हाल के दिनों में तनाव और संवेदनशील मुद्दों को देखते हुए इस सुरक्षा प्रतिनिधिमंडल की यात्रा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, प्रतिनिधिमंडल में शामिल अधिकारियों के नाम, पद और दौरे के विस्तृत एजेंडे की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। डीजीएफआई के निमंत्रण पर पहुंचा भारतीय दल उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का चार सदस्यीय दल बांग्लादेश की सैन्य खुफिया एजेंसी डीजीएफआई के निमंत्रण पर ढाका पहुंचा है। सुरक्षा कारणों से अधिकारियों की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है। ढाका पहुंचने के बाद प्रतिनिधिमंडल के ठहरने और अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी डीजीएफआई की ओर से संभाले जाने की बात कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों के लिए एक प्रमुख होटल में ठहरने की व्यवस्था की गई है। इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग और आपसी हित से जुड़े मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि बैठक का मुख्य एजेंडा क्या होगा। भारत-बांग्लादेश संबंधों में बढ़ी संवेदनशीलता भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब भारत और बांग्लादेश के संबंध कई संवेदनशील मुद्दों के कारण चर्चा में हैं। दोनों देशों के बीच सीमा सुरक्षा, अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण, क्षेत्रीय सुरक्षा और आपसी सहयोग जैसे मुद्दे लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में सुरक्षा अधिकारियों के बीच संपर्क बनाए रखना दोनों देशों के लिए अहम माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, राजनीतिक स्तर पर मतभेद होने के बावजूद सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के बीच संवाद के चैनल खुले रहना जरूरी होता है। इससे सीमा और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर समय रहते जानकारी साझा करने और संभावित तनाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। भारतीय उच्चायुक्त की भी अहम मुलाकात इस घटनाक्रम के बीच ढाका में भारतीय उच्चायुक्त की बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के साथ प्रस्तावित मुलाकात भी चर्चा में है। इस बैठक की समय-सीमा को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के हालिया सार्वजनिक बयान के कुछ ही समय बाद हो रही है। ऐसे में भारतीय उच्चायुक्त और बांग्लादेशी प्रधानमंत्री के बीच बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों, सुरक्षा सहयोग और दोनों देशों से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की संभावना है। सितंबर में नई दिल्ली आ सकते हैं तारिक रहमान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सितंबर में नई दिल्ली में प्रस्तावित बहुपक्षीय बैठक में शामिल होने की संभावना को लेकर भी चर्चा है। यदि यह दौरा होता है, तो प्रधानमंत्री के रूप में यह उनका पहला भारत दौरा होगा। ऐसे में भारत और बांग्लादेश के बीच उच्चस्तरीय राजनीतिक संपर्क की दिशा में इसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा सकता है। हालांकि, इस संभावित यात्रा और इसके कार्यक्रम को लेकर अंतिम आधिकारिक पुष्टि का इंतजार रहेगा। सुरक्षा सहयोग पर बनी रहेगी नजर भारत और बांग्लादेश के बीच सुरक्षा सहयोग का एक लंबा इतिहास रहा है। दोनों देश सीमा प्रबंधन, आतंकवाद और उग्रवाद से निपटने, संगठित अपराध तथा क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विभिन्न स्तरों पर संपर्क में रहे हैं। मौजूदा परिस्थितियों में भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का ढाका दौरा इस बात का संकेत माना जा सकता है कि दोनों पक्ष संवेदनशील मुद्दों पर संवाद का रास्ता खुला रखना चाहते हैं। हालांकि, प्रतिनिधिमंडल के दौरे के वास्तविक उद्देश्य और बातचीत के परिणाम के बारे में आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी। फिलहाल सभी की नजर भारतीय सुरक्षा अधिकारियों की बैठकों और भारतीय उच्चायुक्त की बांग्लादेशी प्रधानमंत्री के साथ होने वाली बातचीत पर है। आने वाले दिनों में इन संपर्कों से भारत-बांग्लादेश संबंधों की दिशा को लेकर तस्वीर और साफ हो सकती है।
नई दिल्ली: अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत और चीन के बीच लंबे समय से जारी कूटनीतिक और रणनीतिक खींचतान के बीच भारत ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। केंद्र सरकार के अनुसार, सर्वे ऑफ इंडिया के अपडेटेड मैप में अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों को आधिकारिक तौर पर मानकीकृत नाम और पहचान दी गई है। इनमें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीमावर्ती गांव, पहाड़ी दर्रे, एक ग्लेशियल झील और युद्ध से जुड़े स्मारक शामिल हैं। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब चीन लगातार अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों के नाम बदलकर उन्हें अपने नक्शे और आधिकारिक दस्तावेजों में शामिल करने की कोशिश करता रहा है। भारत ने चीन की इस नीति का लगातार विरोध किया है और अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न हिस्सा बताया है। 27 जगहों की आधिकारिक पहचान क्यों महत्वपूर्ण? गृह मंत्रालय के मुताबिक, इन जगहों के नाम अरुणाचल प्रदेश सरकार के साथ विचार-विमर्श के बाद तय किए गए हैं। सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक मानचित्र में इनकी पहचान दर्ज करने का उद्देश्य स्थानों की सही पहचान सुनिश्चित करना और आधिकारिक रिकॉर्ड में स्पष्टता बनाए रखना है। सरकार के इस कदम को केवल नामकरण की प्रक्रिया के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। सीमा से जुड़े संवेदनशील इलाकों में किसी क्षेत्र की आधिकारिक पहचान और उसका मानचित्रण रणनीतिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इन 27 स्थानों में कई ऐसे इलाके हैं, जिनका भारत-चीन सीमा विवाद और 1962 के युद्ध के इतिहास से सीधा संबंध रहा है। लोंगजू, माजा और बिसा जैसे सीमावर्ती गांव भी शामिल अपर सुबनसिरी जिले के तीन सीमावर्ती गांवों लोंगजू, माजा और बिसा को भी आधिकारिक पहचान दी गई है। ये क्षेत्र भारत-चीन सीमा के लिहाज से संवेदनशील माने जाते हैं। इसी क्षेत्र में जो ला, रिजा ला और पुकुर ला जैसे पहाड़ी दर्रे भी शामिल हैं। तवांग जिले में स्थित थाग ला दर्रा भी इस सूची का हिस्सा है। थाग ला का संबंध 1962 के भारत-चीन युद्ध से रहा है। लोंगजू भी सीमा विवाद के शुरुआती संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल रहा है। इसलिए इन स्थानों को आधिकारिक भारतीय मानचित्र में स्पष्ट पहचान मिलना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 1962 के युद्ध की याद दिलाते हैं ये स्थान अरुणाचल प्रदेश के कई स्थान भारत-चीन युद्ध के इतिहास से जुड़े हुए हैं। तवांग का जसवंत गढ़ राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की स्मृति से जुड़ा है, जिन्हें 1962 के युद्ध के दौरान उनके साहस के लिए याद किया जाता है। अपर सुबनसिरी में शेर-ए-थापा मेमोरियल भी इसी संघर्ष की स्मृति से जुड़ा है। हवलदार शेर थापा ने रियो ब्रिज क्षेत्र में चीनी सेना का मुकाबला किया था। थाग ला दर्रा भी ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसी क्षेत्र से नमका चू घाटी का इलाका जुड़ा है, जहां 1962 के संघर्ष के दौरान भारत और चीन की सेनाओं के बीच गंभीर सैन्य टकराव हुआ था। कौन-कौन से इलाके सूची में हैं? 27 आधिकारिक रूप से पहचाने गए स्थानों में विभिन्न जिलों के इलाके शामिल हैं। इनमें प्रमुख रूप से: अपर सुबनसिरी: लोंगजू, माजा, बिसा, छोटा रोपुक, बड़ा रोपुक, जो ला, रिजा ला और पुकुर ला तवांग: थाग ला और जसवंत गढ़ अंजाव: बारा कुंडन, छोटा कुंडन और धन बारी चांगलांग: प्रीतनगर, बुद्धमंदिर, जयरामपुर, टेरिटनगर और रामनगर वेस्ट कामेंग: सागर, पद्मा, ज्योतिनगर और बैसाखी लोहित: शिवाजी नगर, सुनपुरा और कामलांग नगर इनके अलावा सूची में सम्भो सरोवर नाम की एक ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियल झील और युद्ध से जुड़े स्मारक भी शामिल हैं। चीन ने अप्रैल में बदले थे 23 जगहों के नाम भारत का यह कदम चीन की उस नीति की पृष्ठभूमि में आया है, जिसके तहत बीजिंग समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश के अलग-अलग स्थानों के नाम बदलकर उन्हें अपने आधिकारिक दस्तावेजों में इस्तेमाल करता रहा है। अप्रैल में चीन ने अरुणाचल प्रदेश की 23 जगहों के लिए नए चीनी नाम घोषित किए थे। चीन अरुणाचल प्रदेश को 'दक्षिण तिब्बत' के रूप में दावा करता रहा है, जबकि भारत उसके इस दावे को स्पष्ट रूप से खारिज करता है। भारत का कहना है कि किसी स्थान का काल्पनिक नाम बदल देने से जमीन पर उसकी वास्तविक स्थिति नहीं बदलती। नई दिल्ली लगातार यह दोहराती रही है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। भारत का संदेश: नाम बदलने से जमीन की हकीकत नहीं बदलती अरुणाचल प्रदेश के स्थानों को भारतीय आधिकारिक मानचित्र में मानकीकृत नाम देना इसी व्यापक नीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसका संदेश यह है कि चीन द्वारा किसी भारतीय क्षेत्र या स्थान का नाम बदलने से उस क्षेत्र की संप्रभुता या प्रशासनिक स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। सीमा विवाद के बीच नक्शों और आधिकारिक दस्तावेजों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि दोनों देश अपने-अपने दावों को ऐतिहासिक रिकॉर्ड, मानचित्र और प्रशासनिक नियंत्रण के आधार पर पेश करते रहे हैं। भारत के लिए यह कदम विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अरुणाचल प्रदेश के कई सीमावर्ती इलाकों में सड़क, संचार और सैन्य बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ स्थानीय क्षेत्रों की स्पष्ट प्रशासनिक पहचान भी रणनीतिक प्राथमिकता बन चुकी है। आगे क्या? भारत-चीन सीमा विवाद का अंतिम समाधान केवल स्थानों के नाम बदलने या नए नक्शे जारी करने से नहीं होगा। वास्तविक चुनौती सीमा पर स्थिरता बनाए रखने, दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक संवाद जारी रखने तथा वास्तविक नियंत्रण रेखा से जुड़े मतभेदों का समाधान तलाशने की है। फिलहाल 27 स्थानों को भारतीय आधिकारिक मानचित्र में पहचान देने का कदम यह जरूर दिखाता है कि अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत अपने प्रशासनिक और कूटनीतिक दावे को लेकर कोई अस्पष्टता नहीं छोड़ना चाहता। चीन की ओर से नाम बदलने की कोशिशों के जवाब में भारत का रुख साफ है—किसी स्थान का नाम बदलने से उसकी भौगोलिक स्थिति, प्रशासनिक नियंत्रण या वास्तविकता नहीं बदलती।
पुंछ, एजेंसियां। जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में नियंत्रण रेखा (LoC) के नजदीक स्थित कुछ सीमावर्ती गांवों में मोर्टार के पुराने गोले मिलने के बाद सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। ग्रामीण इलाकों में इन संदिग्ध वस्तुओं के मिलने के बाद सुरक्षा बलों ने क्षेत्र को सुरक्षित कर जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों ने लोगों से ऐसी किसी भी वस्तु को छूने से बचने और तुरंत सुरक्षाबलों को सूचना देने की अपील की है। सीमावर्ती इलाकों में मिले मोर्टार के गोले प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, पुंछ के LoC से सटे कुछ गांवों में ग्रामीणों को मोर्टार के गोले दिखाई दिए। सूचना मिलने के बाद सुरक्षाबलों और पुलिस की टीमों ने मौके पर पहुंचकर इलाके की घेराबंदी की और संदिग्ध वस्तुओं की जांच शुरू की। अधिकारियों को आशंका है कि ये गोले पुराने हो सकते हैं और पहले हुई गोलीबारी या सैन्य गतिविधियों के दौरान यहां रह गए होंगे। हालांकि, इनके वहां पहुंचने की वास्तविक वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। सुरक्षा एजेंसियों ने बढ़ाई निगरानी घटना के बाद सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया गया है। सुरक्षाबलों ने आसपास के इलाकों में तलाशी अभियान चलाकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि वहां कोई अन्य संदिग्ध वस्तु मौजूद न हो। मोर्टार के गोले मिलने के बाद सुरक्षा एजेंसियां इस पहलू की भी जांच कर रही हैं कि क्या ये वस्तुएं हाल की किसी गतिविधि से जुड़ी हैं या लंबे समय से जमीन में पड़ी हुई थीं। ग्रामीणों से सतर्क रहने की अपील सुरक्षा अधिकारियों ने सीमावर्ती गांवों के लोगों से अपील की है कि यदि उन्हें कोई मोर्टार का गोला, विस्फोटक या संदिग्ध वस्तु दिखाई दे तो उसे छूने या हटाने की कोशिश न करें। ऐसी वस्तु मिलने पर तुरंत पुलिस या सुरक्षा बलों को सूचना देने को कहा गया है। सीमावर्ती इलाकों में पहले भी पुराने और बिना फटे गोला-बारूद मिलने के मामले सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में विशेषज्ञ टीम ही वस्तु को सुरक्षित तरीके से हटाने या निष्क्रिय करने की कार्रवाई करती है। जांच के बाद स्पष्ट होगी स्थिति फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां बरामद मोर्टार गोलों की जांच कर रही हैं। अधिकारियों के अनुसार, जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि ये गोले कितने पुराने हैं और उनके पुंछ के सीमावर्ती गांवों तक पहुंचने की वजह क्या है। घटना के बाद क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी गई है और सुरक्षा एजेंसियां किसी भी संभावित खतरे को देखते हुए स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
Security in Jammu Kashmir: 15 अगस्त से पहले किसी भी संभावित घुसपैठ या आतंकी साजिश को नाकाम करने के लिए सुरक्षा एजेंसियों ने चौकसी बढ़ा दी है। इसी क्रम में जम्मू पुलिस और सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर संयुक्त एंटी-टनल सर्च ऑपरेशन चलाया। इस अभियान के दौरान किसी भी संदिग्ध गतिविधि या सुरंग का पता नहीं चला। स्वतंत्रता दिवस से पहले बढ़ाई गई निगरानी भारत अगले सप्ताह 15 अगस्त 2026 को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। इसे देखते हुए देशभर में सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं। खासकर पाकिस्तान से सटी सीमाओं पर घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों की आशंका को देखते हुए निगरानी और तलाशी अभियान तेज कर दिए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमा पर चला एंटी-टनल सर्च ऑपरेशन जम्मू पुलिस और BSF ने संयुक्त रूप से बॉर्डर पुलिस पोस्ट अल्लाह के अधिकार क्षेत्र में आने वाले बॉर्डर आउट पोस्ट (BOP) पीतल इलाके में एंटी-टनल सर्च ऑपरेशन चलाया। अभियान का उद्देश्य सीमा के आसपास जमीन के नीचे बनी संभावित सुरंगों और किसी भी संदिग्ध गतिविधि का पता लगाना था, जिनका इस्तेमाल घुसपैठ के लिए किया जा सकता है। नहीं मिला कोई संदिग्ध सुराग सुरक्षा बलों ने पूरे क्षेत्र की गहन तलाशी ली। अभियान के दौरान कोई सुरंग, संदिग्ध गतिविधि या अवैध घुसपैठ का संकेत नहीं मिला। अधिकारियों के अनुसार, ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरा हुआ और सीमा क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था सामान्य बनी हुई है। नियमित रूप से चलाए जाते हैं ऐसे अभियान जम्मू पुलिस, BSF और अन्य सुरक्षा एजेंसियां सीमा क्षेत्रों में लगातार संयुक्त अभियान चलाती रहती हैं। इन अभियानों का उद्देश्य सीमा पार से होने वाली घुसपैठ, हथियारों की तस्करी और अन्य सुरक्षा खतरों को समय रहते रोकना है। दिल्ली समेत प्रमुख शहरों में भी सुरक्षा कड़ी स्वतंत्रता दिवस समारोह को देखते हुए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित देश के कई महत्वपूर्ण शहरों में भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। दिल्ली पुलिस, केंद्रीय सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों को किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं। सार्वजनिक स्थानों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा जांच और निगरानी बढ़ा दी गई है।
Spain Migrant Crisis: स्पेन के उत्तरी अफ्रीकी क्षेत्र स्यूटा (Ceuta) में अवैध प्रवासियों की रिकॉर्ड संख्या में घुसपैठ ने यूरोप की सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। मोरक्को से बड़ी संख्या में लोगों के सीमा पार करने के बाद हालात गंभीर हो गए हैं। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक, पिछले 24 घंटों में करीब 60 हजार प्रवासी स्यूटा में दाखिल हुए हैं। वहीं, इस दौरान सीमा पार करने की कोशिश में 34 लोगों की मौत हो गई है। 60 हजार प्रवासियों के पहुंचने से बिगड़े हालात स्यूटा सरकार के प्रमुख जुआन जीसस विवास ने बताया कि एक दिन के भीतर लगभग 60 हजार लोग इस क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं। गौरतलब है कि स्यूटा की कुल आबादी करीब 83 हजार है, ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में प्रवासियों के पहुंचने से प्रशासनिक व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ गया है। हालांकि, स्पेन के गृह मंत्रालय ने कहा कि लगभग 50 हजार प्रवासी स्यूटा पहुंचे थे, जिनमें से 25 हजार से अधिक लोग बाद में वापस मोरक्को लौट गए। हालात का जायजा लेने पहुंचे प्रधानमंत्री बढ़ते संकट के बीच स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज स्यूटा पहुंचे और स्थानीय अधिकारियों के साथ स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि मानव तस्करी करने वाले गिरोह युवाओं को बेहतर जीवन का झूठा सपना दिखाकर जोखिम भरे रास्तों पर भेज रहे हैं, जिससे कई लोगों की जान चली जाती है। प्रधानमंत्री ने सीमा सुरक्षा मजबूत करने के लिए 400 अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की तैनाती का भी ऐलान किया। समुद्र और बाड़ पार कर पहुंचे प्रवासी स्थानीय प्रशासन के अनुसार, बड़ी संख्या में प्रवासियों ने सीमा की बाड़ पार कर स्पेन में प्रवेश किया, जबकि कई लोग भूमध्य सागर के रास्ते घंटों तैरकर स्यूटा पहुंचे। प्रशासन का कहना है कि सीमा पार करने की कोशिश के दौरान कम से कम 34 लोगों की मौत हुई है। प्रवासियों ने बताई मजबूरी मोरक्को से आए कई युवाओं ने स्थानीय मीडिया से कहा कि बेरोजगारी और आर्थिक संकट के कारण उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि मोरक्को के अधिकारियों ने राजनीतिक दबाव बनाने के लिए सीमा खोल दी, जिससे हजारों लोग स्यूटा की ओर बढ़ गए। यूरोप में बढ़ी राजनीतिक हलचल स्यूटा में हुई इस घटना के बाद यूरोप के कई दक्षिणपंथी और प्रवासन-विरोधी दलों ने खुली सीमा (फ्री मूवमेंट) की नीति पर सवाल उठाए हैं। वहीं, स्पेन में विपक्षी दल भी प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज की प्रवासी नीति की आलोचना कर रहे हैं। पहले भी हो चुकी है ऐसी घटना यह पहली बार नहीं है जब स्यूटा में इस तरह की घुसपैठ हुई हो। साल 2021 में भी केवल दो दिनों के भीतर 10 हजार से अधिक प्रवासी मोरक्को से सीमा पार कर स्यूटा पहुंच गए थे। तब भी स्पेन और मोरक्को के बीच सीमा सुरक्षा और प्रवासन नीति को लेकर तनाव बढ़ गया था। क्यों अहम है स्यूटा? स्यूटा उत्तरी अफ्रीका में स्थित स्पेन का एक स्वायत्त क्षेत्र है, जिसकी सीमा सीधे मोरक्को से लगती है। यूरोप पहुंचने की कोशिश करने वाले अफ्रीकी और अन्य देशों के प्रवासियों के लिए यह सबसे प्रमुख प्रवेश द्वार माना जाता है। ऐसे में यहां होने वाली हर बड़ी घुसपैठ पूरे यूरोप की सुरक्षा और प्रवासन नीति पर असर डालती है।
Spain Migrant Crisis: स्पेन के स्वायत्त शहर सियूटा (Ceuta) में प्रवासियों की रिकॉर्ड संख्या पहुंचने से बड़ा मानवीय और सुरक्षा संकट पैदा हो गया है। मोरक्को से बड़ी संख्या में प्रवासियों ने सीमा पार करने की कोशिश की, जिसमें कम से कम 34 लोगों की मौत हो गई। हालात को देखते हुए स्पेन सरकार ने सीमा सुरक्षा और कड़ी करने के संकेत दिए हैं। हजारों प्रवासियों ने की सीमा पार करने की कोशिश स्पेन के अधिकारियों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में दसियों हजार प्रवासी मोरक्को से सियूटा पहुंचने या वहां प्रवेश करने की कोशिश कर चुके हैं। बड़ी संख्या में लोग समुद्र के रास्ते तैरकर स्पेन की सीमा तक पहुंचे, जबकि कई ने सीमा पर लगे अवरोधों को पार करने का प्रयास किया। इस अभूतपूर्व प्रवासी संकट ने स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। 34 प्रवासियों की मौत सियूटा के प्रशासनिक प्रमुख जुआन जीसस विवास ने बताया कि सीमा पार करने की कोशिश के दौरान कम से कम 34 प्रवासियों की मौत हो गई। उन्होंने कहा, "सियूटा जिस स्थिति से गुजर रहा है, वह बेहद भयावह है।" प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने जताया दुख स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने घटना पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार सीमा सुरक्षा को और मजबूत करेगी। उन्होंने बताया कि समुद्री सीमा पर अवैध प्रवेश रोकने के लिए तैरने वाले बॉय (Buoys) लगाए जाएंगे, ताकि लोगों को वापस भेजने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो सके। सांचेज ने इस घटना को स्पेन की संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए कहा कि सीमा पर इस तरह की घुसपैठ स्वीकार नहीं की जा सकती। मानव तस्करों को ठहराया जिम्मेदार प्रधानमंत्री ने मानव तस्करी करने वाले गिरोहों को इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि मानव तस्कर बड़ी संख्या में युवाओं को झूठे सपने दिखाकर जोखिम भरे रास्तों पर भेजते हैं, जिसके कारण कई लोग अपनी जान गंवा देते हैं। सीमा पर जारी है तनाव गुरुवार से शुरू हुआ सीमा संकट शुक्रवार को भी जारी रहा। मोरक्को की ओर सीमा क्षेत्र में सुरक्षाबलों और प्रवासियों के बीच झड़पें हुईं। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में सियूटा के पास पहाड़ी इलाके में बड़ी संख्या में प्रवासी एकत्र दिखाई दिए। प्रवासियों को रोकने के लिए मोरक्को की सुरक्षा एजेंसियों ने आंसू गैस के गोले भी दागे, लेकिन इसके बावजूद कई लोग सीमा पार करने की कोशिश करते रहे। फिलहाल स्पेन और मोरक्को दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और सीमा क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।
India-Nepal Border Violence: भारत-नेपाल सीमा से सटे नेपाल के सुनसरी जिले में हुई हिंसा के बाद हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। हिंसक झड़प में एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि पुलिसकर्मियों समेत कई लोग घायल हुए हैं। स्थिति को देखते हुए नेपाल प्रशासन ने धनुषा जिले के जनकपुर में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लागू कर दिया है, जबकि पर्सा जिले के वीरगंज में निषेधाज्ञा (प्रोहिबिटरी ऑर्डर) लागू कर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। सीमा से जुड़े इलाकों में भी हाई अलर्ट जारी कर निगरानी बढ़ा दी गई है। धार्मिक जुलूस के दौरान शुरू हुआ विवाद एएनआई के मुताबिक, सुनसरी जिले के कप्तानगंज इलाके में दो धार्मिक समुदायों के त्योहार के दौरान विवाद अचानक हिंसक झड़प में बदल गया। देखते ही देखते दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए और इलाके में तनाव फैल गया। हालात बेकाबू होने पर पुलिस को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा। पुलिस की कार्रवाई के दौरान गोली लगने से एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि सुरक्षाकर्मियों समेत 12 से अधिक लोग घायल हुए हैं। घायलों का विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा है। जनकपुर में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू हिंसा के बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए धनुषा जिले के जनकपुर में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लागू कर दिया गया है। वहीं, पर्सा जिले के वीरगंज में भी निषेधाज्ञा लागू कर लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाया गया है। जनकपुर के सहायक मुख्य जिला अधिकारी चेतराज बराल ने बताया कि अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती कर दी गई है और लोगों से घरों में रहने तथा अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की गई है। भारत-नेपाल सीमा पर बढ़ाई गई चौकसी सुनसरी में हिंसा के बाद भारत-नेपाल सीमा से जुड़े संवेदनशील इलाकों में भी सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह सतर्क हो गई हैं। सीमा पर निगरानी बढ़ा दी गई है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना या सीमा पार गतिविधि को रोका जा सके। भारत और नेपाल की सुरक्षा एजेंसियां हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। प्रशासन का कहना है कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन एहतियात के तौर पर सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत की गई है। पहले भी बढ़ चुका है सीमा पर तनाव यह पहली बार नहीं है जब भारत-नेपाल सीमा से जुड़े इलाकों में तनाव की स्थिति बनी हो। इससे पहले भी सीमा विवाद, स्थानीय झड़पों और राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों के कारण कई बार दोनों देशों की सीमा पर सुरक्षा बढ़ानी पड़ी थी। वर्ष 2020 में सीमा विवाद के दौरान भी कई संवेदनशील क्षेत्रों में तनाव देखा गया था, हालांकि बाद में दोनों देशों ने बातचीत के जरिए हालात सामान्य करने की कोशिश की थी। संसद से लेकर सुरक्षा परिषद तक हलचल हिंसा की घटना के बाद नेपाल की संसद में कई सांसदों ने सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग की है। वहीं, प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाकर सुनसरी सहित सीमा से जुड़े जिलों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की। सुनसरी जिला भारत के बिहार से सटा हुआ है और व्यापार तथा आवागमन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में इस क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर दोनों देशों की एजेंसियां लगातार समन्वय बनाए हुए हैं। शांति बहाली के प्रयास जारी नेपाल प्रशासन ने कहा है कि हिंसा फैलाने वाले लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा बल पूरी तरह तैनात हैं और शांति बहाल करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। अधिकारियों ने लोगों से कानून-व्यवस्था बनाए रखने, अफवाहों से बचने और प्रशासन के निर्देशों का पालन करने की अपील की है।
महाराजगंज: भारत-नेपाल सीमा पर एक अमेरिकी नागरिक की गिरफ्तारी के बाद सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। गिरफ्तार व्यक्ति के पास से चीनी पासपोर्ट, कई दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद हुए हैं। फिलहाल जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि वह भारत में किस उद्देश्य से रह रहा था और सीमा पार करने की कोशिश क्यों कर रहा था। अमेरिकी नागरिक की हुई पहचान गिरफ्तार व्यक्ति की पहचान अमेरिका के कैलिफोर्निया निवासी 36 वर्षीय जॉर्डन ब्राउन के रूप में हुई है। उसे उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में भारत-नेपाल सीमा पार करने की कथित कोशिश के दौरान पकड़ा गया। उसके पास से मिले चीनी पासपोर्ट और अन्य दस्तावेजों को देखते हुए कई केंद्रीय सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां मामले की जांच कर रही हैं। हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती जांच में अब तक उसके किसी आतंकी या राष्ट्र विरोधी गतिविधि से जुड़े होने के प्रमाण नहीं मिले हैं। भारत आने और यात्रा रिकॉर्ड की हो रही जांच जांच एजेंसियों के अनुसार, जॉर्डन ब्राउन पिछले वर्ष नवंबर में समुद्री मार्ग से भारत आया था। अब उसकी भारत में आवाजाही, विभिन्न राज्यों की यात्राओं और विदेश यात्रा के रिकॉर्ड की जांच की जा रही है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार, आरोपी द्वारा दी गई हर जानकारी का अलग-अलग एजेंसियां सत्यापन कर रही हैं। उसके इमिग्रेशन रिकॉर्ड, पहचान, यात्रा इतिहास और भारत आने के उद्देश्य की भी पड़ताल की जा रही है। बरामद सामान की होगी फोरेंसिक जांच पुलिस ने जॉर्डन ब्राउन के पास से कई सामान बरामद किए हैं, जिनमें शामिल हैं— चीनी पासपोर्ट मोबाइल फोन नेपाली मुद्रा धार्मिक पुस्तकें एआई ट्रांसलेटर डिवाइस डायरी कलाई घड़ी अन्य निजी सामान इन सभी वस्तुओं की फोरेंसिक जांच कराई जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा था। कई एजेंसियां कर रही हैं पूछताछ मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय और राज्य स्तर की कई सुरक्षा एजेंसियां जॉर्डन ब्राउन से पूछताछ कर रही हैं। जांच का मुख्य फोकस यह जानना है कि एक अमेरिकी नागरिक के पास चीनी पासपोर्ट कैसे पहुंचा, वह लंबे समय तक भारत में किन गतिविधियों में शामिल रहा और नेपाल सीमा तक पहुंचने का उसका उद्देश्य क्या था। फिलहाल जांच जारी है और एजेंसियां सभी तथ्यों की पुष्टि के बाद आगे की कार्रवाई करेंगी।
स्पेन के युवा फुटबॉल स्टार लामिन यामाल ने अपने 19वें जन्मदिन पर सिर्फ हीरों से जड़ा नेकलेस पहनकर ही सुर्खियां नहीं बटोरीं, बल्कि नस्लवाद और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ एक मजबूत संदेश देकर भी सबका ध्यान खींचा। फ्रांस के खिलाफ फीफा वर्ल्ड कप 2026 के सेमीफाइनल से पहले आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में यामाल ने कहा कि फुटबॉल का असली उद्देश्य लोगों को जोड़ना है, न कि उन्हें बांटना। जन्मदिन पर खुद को दिया खास तोहफा सेमीफाइनल मुकाबले से एक दिन पहले टेक्सास में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में यामाल व्हाइट गोल्ड और डायमंड से बने शानदार नेकलेस के साथ पहुंचे। जब उनसे पूछा गया कि यह जन्मदिन का उपहार किसने दिया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि यह किसी और का नहीं, बल्कि खुद का दिया हुआ गिफ्ट है। यामाल ने कहा, "यह मुझे किसी ने गिफ्ट नहीं किया। मैंने इसे खुद खरीदा है। यह मेरी तरफ से मेरे लिए तोहफा है।" उनका यह जवाब सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो गया। नस्लवाद पर दिया एकता का संदेश प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान यामाल से हाल ही में फ्रांस की बहुसांस्कृतिक टीम को लेकर उठे राजनीतिक विवाद पर सवाल पूछा गया। हाल ही में स्पेन के पूर्व प्रधानमंत्री मारियानो राजोय की एक टिप्पणी को लेकर विवाद खड़ा हो गया था, जिसमें फ्रांस की टीम की विविधता पर सवाल उठाए गए थे। इस पर यामाल ने बिना किसी विवाद को बढ़ाए बेहद संतुलित जवाब दिया। उन्होंने कहा कि फुटबॉल का मकसद लोगों को एकजुट करना है। फ्रांस और स्पेन दोनों अलग-अलग संस्कृतियों और समुदायों के एकीकरण की मिसाल हैं। ऐसे में किसी की टिप्पणी पर चर्चा करने से ज्यादा जरूरी यह है कि खेल लोगों को जोड़ने का काम करे। विविधता की मिसाल हैं यामाल लामिन यामाल खुद भी विविध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आते हैं। उनके पिता मोरक्को से हैं, जबकि उनकी मां इक्वेटोरियल गिनी मूल की हैं। ऐसे में उनका बयान आधुनिक और समावेशी समाज की सोच को दर्शाता है। छोटे भाई की वायरल लोकप्रियता पर भी बोले यामाल ने अपने छोटे भाई केयने का भी जिक्र किया, जो स्पेन के मैचों के दौरान स्टेडियम में अपनी मस्तीभरी हरकतों की वजह से सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हो चुके हैं। उन्होंने हंसते हुए कहा कि उनके भाई को खुद भी नहीं पता कि वह इंटरनेट पर वायरल हो चुके हैं। कैमरा देखते ही वह वही शरारतें करते हैं जो घर पर करते हैं और उन्हें टीवी पर देखकर उन्हें भी खुशी होती है। गोल नहीं, टीम की जीत ज्यादा अहम पूरे टूर्नामेंट में अब तक सिर्फ एक गोल करने को लेकर पूछे गए सवाल पर भी यामाल बिल्कुल शांत नजर आए। उन्होंने कहा कि हर टूर्नामेंट अलग होता है और उनके लिए व्यक्तिगत आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण टीम की सफलता है। यामाल का कहना था कि जब तक स्पेन जीत रहा है, उन्हें अपने गोलों की संख्या की चिंता नहीं है। उन्होंने उम्मीद जताई कि टीम आगे बढ़ेगी और उन्हें गोल करने के और अवसर मिलेंगे। फ्रांस के खिलाफ रोमांचक मुकाबले की उम्मीद स्पेन और फ्रांस के बीच होने वाले सेमीफाइनल को लेकर यामाल ने कहा कि दोनों टीमें आक्रमण और बचाव में मजबूत हैं, इसलिए मुकाबला बेहद संतुलित और रोमांचक रहने वाला है। उनके अनुसार यह वही मैच है जिसका दुनिया भर के फुटबॉल प्रशंसक लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। मैदान के बाहर भी दिखी परिपक्व सोच महज 19 साल की उम्र में यामाल ने जिस आत्मविश्वास और परिपक्वता के साथ नस्लवाद, राजनीति और खेल की भूमिका पर अपनी बात रखी, उसने यह साफ कर दिया कि वह केवल मैदान पर ही नहीं, बल्कि मैदान के बाहर भी नई पीढ़ी के प्रभावशाली खिलाड़ियों में शामिल हो चुके हैं।
महराजगंज: उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में भारत-नेपाल सीमा पर सशस्त्र सीमा बल (SSB) ने एक अमेरिकी नागरिक को बिना वैध पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेजों के नेपाल में प्रवेश करने की कोशिश करते हुए गिरफ्तार किया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि वह पिछले करीब सात महीने से बिना पासपोर्ट के भारत में रह रहा था। सुरक्षा एजेंसियां अब उसके भारत आने के पूरे घटनाक्रम और गतिविधियों की जांच कर रही हैं। नेपाल सीमा पार करने की कोशिश में पकड़ा गया एसएसबी की 22वीं बटालियन रविवार को नियमित गश्त कर रही थी। इसी दौरान सोनौली थाना क्षेत्र के मैनिहवा इलाके में सीमा स्तंभ संख्या 516 के पास एक विदेशी नागरिक नेपाल की ओर बढ़ता दिखाई दिया। जवानों ने उसे रोककर दस्तावेज मांगे, लेकिन उसके पास कोई वैध पासपोर्ट या यात्रा संबंधी दस्तावेज नहीं मिला। पूछताछ में उसने अपना नाम जॉर्डन ब्राउन (36) बताया और खुद को अमेरिका के कैलिफोर्निया का निवासी बताया। जवानों को देखकर भागने लगा महराजगंज के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ के अनुसार, जब एसएसबी जवानों ने उससे पूछताछ शुरू की तो वह मौके से भागने का प्रयास करने लगा। हालांकि, जवानों ने तुरंत उसे पकड़ लिया और हिरासत में ले लिया। थाईलैंड में पासपोर्ट खोने का दावा पुलिस पूछताछ में जॉर्डन ब्राउन ने बताया कि वह टूरिस्ट वीजा पर थाईलैंड गया था, जहां उसका पासपोर्ट खो गया। उसने यह भी दावा किया कि वह पहले अमेरिकी नौसेना (US Navy) में अधिकारी के रूप में कार्य कर चुका है। हालांकि, पुलिस उसके सभी दावों का सत्यापन कर रही है। समुद्र के रास्ते भारत पहुंचने का दावा पूछताछ में ब्राउन ने बताया कि वह थाईलैंड से समुद्री मार्ग के जरिए श्रीलंका पहुंचा और वहां से 2 नवंबर 2025 को समुद्र के रास्ते भारत आया। इसके बाद वह लंबे समय तक गोवा में रहा। बाद में वह गोवा से बेंगलुरु और फिर उत्तर प्रदेश के सोनौली बॉर्डर पहुंचा, जहां से वह नेपाल में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा था। सात महीने तक बिना पासपोर्ट कैसे रहा? जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जॉर्डन ब्राउन करीब सात महीने तक बिना वैध पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेजों के भारत में कैसे रहा और विभिन्न राज्यों में आवाजाही कैसे करता रहा। पुलिस अब उसके संपर्कों, यात्रा मार्ग और भारत में रहने की पूरी अवधि की जांच कर रही है। सुरक्षा एजेंसियां कर रही हैं पूछताछ फिलहाल अमेरिकी नागरिक को हिरासत में रखकर पूछताछ की जा रही है। पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि उसके दावे कितने सही हैं और भारत में उसके रहने का वास्तविक उद्देश्य क्या था। जांच पूरी होने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
कोलकाता: भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले में बड़ा कदम उठाया गया है। जिला प्रशासन ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) को अब तक करीब 185 एकड़ जमीन सौंप दी है, ताकि खुले सीमा क्षेत्रों में कंटीले तार (फेंसिंग) लगाने का काम तेज किया जा सके। प्रशासन ने बताया कि अगले एक महीने के भीतर 108 एकड़ अतिरिक्त जमीन भी बीएसएफ को हस्तांतरित कर दी जाएगी, जिससे सीमा पर सुरक्षा ढांचे को और मजबूत किया जा सकेगा। पहले चरण में 240 एकड़ जमीन की थी मांग प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, बीएसएफ ने पहले चरण में कूचबिहार जिले में 240 एकड़ जमीन की मांग की थी। इनमें से लगभग 185 एकड़ भूमि पहले ही बीएसएफ को उपलब्ध कराई जा चुकी है। इसके अलावा बीएसएफ ने हाल ही में 53 एकड़ अतिरिक्त भूमि की भी मांग की है। इस जमीन का सर्वेक्षण शुरू हो चुका है और अधिग्रहण की प्रक्रिया जारी है। मेखलीगंज और दिनहाटा में होगा सबसे ज्यादा काम बीएसएफ की योजना के अनुसार सबसे अधिक फेंसिंग कार्य मेखलीगंज ब्लॉक में किया जाएगा, जहां लगभग 148 एकड़ भूमि पर कंटीले तार लगाए जाएंगे। इसके अलावा— दिनहाटा-2 ब्लॉक में लगभग 50 एकड़ भूमि पर फेंसिंग प्रस्तावित है। माथाभांगा और तूफानगंज महकमों में भी भूमि चिन्हित करने का काम जारी है। इन क्षेत्रों में अधिकांश आवश्यक भूमि प्रशासन पहले ही बीएसएफ को उपलब्ध करा चुका है। अब भी 50 किलोमीटर सीमा बिना फेंसिंग सूत्रों के मुताबिक कूचबिहार जिले में अभी भी करीब 50 किलोमीटर भारत-बांग्लादेश सीमा ऐसी है, जहां कंटीले तार नहीं लगे हैं। इनमें से एक बड़ा हिस्सा नदी क्षेत्र में पड़ता है, जहां पारंपरिक फेंसिंग संभव नहीं है। ऐसे इलाकों में बीएसएफ वैकल्पिक सुरक्षा व्यवस्था अपनाती है। वहीं, जमीन वाले खुले सीमा क्षेत्रों में जल्द से जल्द फेंसिंग पूरी करने की योजना बनाई गई है। 40 एकड़ सरकारी जमीन का होगा हस्तांतरण बीएसएफ द्वारा मांगी गई भूमि में लगभग 40 एकड़ सरकारी जमीन भी शामिल है। प्रशासन का कहना है कि इस जमीन के हस्तांतरण में किसी प्रकार की बड़ी बाधा नहीं है। हालांकि पहले चरण की मांग के अनुसार अभी भी करीब 55 एकड़ भूमि का अधिग्रहण बाकी है। इसे जल्द पूरा करने के प्रयास किए जा रहे हैं। घुसपैठ और तस्करी पर लगेगी रोक जिला प्रशासन और बीएसएफ का मानना है कि फेंसिंग पूरी होने के बाद— अवैध घुसपैठ पर नियंत्रण मिलेगा, सीमा पार तस्करी पर रोक लगेगी, और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों को प्रभावी ढंग से रोका जा सकेगा। प्रशासन का लक्ष्य है कि कूचबिहार जिले के सभी खुले सीमा क्षेत्रों को जल्द से जल्द कंटीले तारों से सुरक्षित कर भारत-बांग्लादेश सीमा पर निगरानी व्यवस्था को और मजबूत बनाया जाए।
इस्लामाबाद: पाकिस्तान सरकार ने बिना वैध वीजा या कानूनी दस्तावेजों के रह रहे विदेशी नागरिकों के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू कर दिया है। सरकार ने 10 जुलाई तक स्वेच्छा से देश छोड़ने की समय सीमा दी थी। अब 11 जुलाई से ऐसे लोगों की गिरफ्तारी और निर्वासन (डिपोर्टेशन) की कार्रवाई शुरू करने के निर्देश जारी किए गए हैं। इस अभियान का सबसे अधिक असर पाकिस्तान में रह रहे अफगान नागरिकों पर पड़ने की संभावना है। 11 जुलाई से शुरू होगी देशव्यापी कार्रवाई पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने अवैध विदेशी स्वदेश वापसी योजना (Illegal Foreigners Repatriation Plan - IFRP) के तहत सभी प्रांतों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन को कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। अब बिना वैध वीजा या समाप्त हो चुके दस्तावेजों के साथ रह रहे विदेशी नागरिकों को हिरासत में लेकर कानूनी प्रक्रिया के बाद अफगानिस्तान भेजा जाएगा। रोज लौट रहे हैं करीब 5,000 अफगान नागरिक संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के अनुसार, पिछले चार महीनों में 4 लाख से अधिक अफगान नागरिक पाकिस्तान छोड़कर वापस लौट चुके हैं। एजेंसी के मुताबिक: प्रतिदिन लगभग 5,000 लोग अफगानिस्तान लौट रहे हैं। पाकिस्तान में अभी भी करीब 8 लाख अफगान नागरिक 'प्रूफ ऑफ रजिस्ट्रेशन (PoR)' कार्ड के साथ रह रहे हैं। लगभग 6 लाख लोगों के पास 'अफगान सिटिजन कार्ड (ACC)' है। 2021 के बाद आए 1 लाख से अधिक अफगान नागरिक भी पाकिस्तान में मौजूद हैं। सभी प्रांतों को रोजाना रिपोर्ट भेजने के निर्देश गृह मंत्रालय ने सभी प्रांतीय सरकारों, इस्लामाबाद प्रशासन, गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे: पकड़े गए अवैध प्रवासियों की संख्या, उनके खिलाफ की गई कार्रवाई, और डिपोर्टेशन की प्रगति की दैनिक रिपोर्ट संघीय सरकार को भेजें। इसके लिए बनाए गए डिटेंशन और होल्डिंग सेंटर भी अलर्ट पर रखे गए हैं। पहले ही दी जा चुकी थी समय सीमा सरकार ने पहले विभिन्न श्रेणियों के अफगान नागरिकों के लिए अलग-अलग समय सीमाएं तय की थीं। मार्च और अप्रैल 2025 में अफगान सिटिजन कार्ड (ACC) धारकों के लिए समय सीमा तय की गई। अगस्त 2025 में प्रूफ ऑफ रजिस्ट्रेशन (PoR) कार्ड धारकों की मोहलत समाप्त हुई। 2026 में अंतिम चरण के तहत बिना किसी वैध दस्तावेज या एक्सपायर्ड वीजा वाले लोगों को 10 जुलाई 2026 तक देश छोड़ने का अंतिम अवसर दिया गया। सरकार का दावा- सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी कदम पाकिस्तान सरकार का कहना है कि यह अभियान देश की आंतरिक सुरक्षा मजबूत करने, तस्करी रोकने और आर्थिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को कम करने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि वैध वीजा और कानूनी दस्तावेजों के साथ रह रहे विदेशी नागरिकों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। कार्रवाई केवल उन लोगों के खिलाफ होगी जो निर्धारित नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने जताई चिंता संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने पाकिस्तान से अपील की है कि सभी अफगान प्रवासियों को सुरक्षा जोखिम मानकर कार्रवाई न की जाए और प्रत्येक मामले का मानवीय दृष्टिकोण से आकलन किया जाए। हालांकि, पाकिस्तान सरकार ने संकेत दिए हैं कि निर्धारित योजना के अनुसार डिपोर्टेशन अभियान जारी रहेगा। दशकों पुरानी शरणार्थी आबादी पर भी असर सोवियत-अफगान युद्ध और बाद के संघर्षों के दौरान 1978-79 से लाखों अफगान नागरिक पाकिस्तान पहुंचे थे। इनमें से बड़ी संख्या पिछले कई दशकों से वहीं रह रही है। अब पाकिस्तान का यह अभियान उन लंबे समय से रह रहे अफगान नागरिकों को भी प्रभावित कर रहा है, जिनके दस्तावेज समाप्त हो चुके हैं या जिनके पास वैध कानूनी स्थिति नहीं है।
काबुल/इस्लामाबाद: अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने दावा किया है कि उसने पाकिस्तान के भीतर मौजूद Islamic State – Khorasan Province के ठिकानों पर ड्रोन और हवाई हमले किए हैं। तालिबान के अनुसार, इन ठिकानों का इस्तेमाल अफगानिस्तान के खिलाफ आतंकी गतिविधियों और साजिशों के लिए किया जा रहा था। रिपोर्टों के मुताबिक, हमले पाकिस्तान के बलूचिस्तान और Khyber Pakhtunkhwa के कुछ सीमावर्ती इलाकों में किए गए। तालिबान का दावा- आतंकियों को बनाया निशाना तालिबान सरकार का कहना है कि कार्रवाई केवल ISIS-K के ठिकानों के खिलाफ की गई और इसमें कई आतंकवादी मारे गए। सरकार ने यह भी दावा किया कि ऑपरेशन के दौरान किसी भी नागरिक को नुकसान नहीं पहुंचा। अफगान मीडिया TOLOnews ने भी तालिबान के हवाले से बताया कि निशाना बनाए गए ठिकानों का उपयोग अफगानिस्तान के भीतर हमलों की योजना बनाने के लिए किया जा रहा था। स्कूल को भी बनाया गया निशाना तालिबान के अनुसार, पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के सरान क्षेत्र में एक स्कूल भी हमले की चपेट में आया। उसका दावा है कि इस इमारत का इस्तेमाल ISIS-K के लड़ाके अपने ठिकाने के रूप में कर रहे थे, इसलिए उसे निशाना बनाया गया। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। तनाव पहले से था बढ़ा यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब कुछ दिन पहले पाकिस्तान ने अफगानिस्तान सीमा से लगे इलाकों में हवाई हमले किए थे। United Nations Assistance Mission in Afghanistan के अनुसार, उन हमलों में कम से कम 28 नागरिकों की मौत और 49 लोग घायल हुए थे। वहीं, तालिबान सरकार के प्रवक्ता Hamdullah Fitrat ने इससे अधिक नुकसान का दावा करते हुए कहा कि पाकिस्तानी हमलों में 38 नागरिकों की मौत हुई और 163 लोग घायल हुए। उनके अनुसार, मृतकों और घायलों में बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल थे। क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका अफगानिस्तान द्वारा पाकिस्तान के भीतर की गई इस कथित सैन्य कार्रवाई के बाद दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव और बढ़ने की आशंका है। फिलहाल पाकिस्तान की ओर से इन हमलों और तालिबान के दावों पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
Poonch Infiltration Attempt: जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा (LoC) पर एक घुसपैठ की कोशिश को नाकाम करते हुए एक पाकिस्तानी नागरिक को गिरफ्तार किया है। सेना ने उसे भारतीय सीमा में प्रवेश करते ही हिरासत में ले लिया। फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां उससे पूछताछ कर रही हैं और उसके भारत में प्रवेश के उद्देश्य का पता लगाने में जुटी हैं। बालाकोट सेक्टर में हुई गिरफ्तारी सैन्य अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई पुंछ जिले के मेंढर सब-डिवीजन के बालाकोट सेक्टर में की गई। सेना के जवान सीमा पर नियमित निगरानी के दौरान सतर्क थे। इसी दौरान एक व्यक्ति को नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करते देखा गया, जिसके बाद जवानों ने तत्काल कार्रवाई करते हुए उसे पकड़ लिया। पाकिस्तानी नागरिक की हुई पहचान अधिकारियों ने बताया कि गिरफ्तार व्यक्ति की पहचान रईस खान (31) के रूप में हुई है। वह पाकिस्तान के राजल पख्तून क्षेत्र का रहने वाला बताया जा रहा है और बाजिया जादा खान का बेटा है। प्रारंभिक पूछताछ में उसकी पहचान की पुष्टि की गई है, जबकि उसके भारत में आने के मकसद की जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां कर रहीं गहन पूछताछ गिरफ्तारी के बाद आरोपी को सुरक्षा एजेंसियों के हवाले कर दिया गया है। खुफिया और सुरक्षा अधिकारी उससे विस्तृत पूछताछ कर रहे हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि वह गलती से सीमा पार कर आया था या किसी सुनियोजित घुसपैठ या अन्य गतिविधि के तहत भारतीय क्षेत्र में प्रवेश किया था। सुरक्षा एजेंसियां उसके संपर्कों, यात्रा मार्ग और संभावित नेटवर्क की भी जांच कर रही हैं। LoC पर हाई अलर्ट हाल के महीनों में नियंत्रण रेखा पर सुरक्षा बलों ने निगरानी और गश्त को और मजबूत किया है। सेना आधुनिक निगरानी उपकरणों और नियमित गश्त के जरिए किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर लगातार नजर रख रही है। फिलहाल मामले की जांच जारी है और सुरक्षा एजेंसियां पूछताछ के आधार पर आगे की कार्रवाई कर रही हैं।
यरुशलम/बेरूत: मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी संघर्ष को खत्म करने की दिशा में अमेरिका की मध्यस्थता से इजरायल और लेबनान के बीच एक महत्वपूर्ण फ्रेमवर्क समझौता तैयार किया गया है। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच स्थायी शांति और सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था बहाल करना है। समझौते की घोषणा के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसका कड़ा विरोध करते हुए चेतावनी दी है कि यदि इसे लागू करने की कोशिश की गई तो लेबनान गृहयुद्ध जैसी स्थिति की ओर बढ़ सकता है। अमेरिका ने किया समझौते का ऐलान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शुक्रवार को इस फ्रेमवर्क समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि यह इजरायल और लेबनान के बीच स्थायी शांति की दिशा में पहला बड़ा कदम है। उन्होंने बताया कि अमेरिका ने पूरे समझौते में मध्यस्थ और सहयोगी की भूमिका निभाई है। इस समझौते पर लेबनान की राजदूत नादा हमादेह, इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर और अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए। क्या हैं समझौते की प्रमुख शर्तें? समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में तत्काल युद्धविराम लागू करने और हिज्बुल्लाह द्वारा सभी तरह की सैन्य गतिविधियां एवं रॉकेट हमले रोकने की शर्त रखी गई है। इसके साथ ही संगठन को दक्षिणी लेबनान से पीछे हटना होगा। जिन इलाकों से इजरायली सेना और हिज्बुल्लाह पीछे हटेंगे, वहां लेबनानी सेना की तैनाती की जाएगी ताकि सीमा क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था स्थापित की जा सके। अमेरिका करेगा निगरानी, लेबनान को मिलेगी आर्थिक सहायता मार्को रुबियो ने बताया कि समझौते के क्रियान्वयन की निगरानी अमेरिका की अगुवाई में बनाए गए त्रिपक्षीय सैन्य समन्वय समूह द्वारा की जाएगी। इसके अलावा अमेरिका ने लेबनान के लिए तत्काल 10 करोड़ डॉलर की मानवीय सहायता देने की घोषणा की है। साथ ही लेबनानी सशस्त्र बलों को मजबूत करने और सरकारी नियंत्रण बढ़ाने के लिए 3 करोड़ डॉलर से अधिक की अतिरिक्त सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। दक्षिणी लेबनान में बनाए जाएंगे दो पायलट जोन समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में दो पायलट सुरक्षा क्षेत्र विकसित किए जाएंगे। इन क्षेत्रों से इजरायली सेना चरणबद्ध तरीके से पीछे हटेगी और उनकी जगह लेबनानी सेना तैनात होगी। इजरायल ने स्पष्ट किया है कि सेना की पूरी वापसी तभी होगी जब हिज्बुल्लाह अपने हथियार छोड़ेगा और उसका सैन्य ढांचा पूरी तरह समाप्त होगा। लेबनान ने बताया संप्रभुता बहाल करने की दिशा में बड़ा कदम अमेरिका में लेबनान की राजदूत नादा हमादेह ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि इससे लेबनान की संप्रभुता मजबूत होगी, सीमा पर संघर्ष समाप्त होगा और विस्थापित नागरिक अपने घर लौट सकेंगे। उन्होंने इस पहल का श्रेय लेबनान के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सशस्त्र बलों के सहयोग को दिया। नेतन्याहू बोले- हिज्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण पर निर्भर करेगी आगे की कार्रवाई इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि लेबनानी सेना जल्द ही सीमावर्ती इलाकों का नियंत्रण संभालेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इजरायली सेना की आगे की वापसी पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि लेबनानी सेना हिज्बुल्लाह को हथियार छोड़ने और उसके सैन्य ढांचे को खत्म करने में कितनी सफल रहती है। इजरायल के राजदूत येचिएल लेइटर ने भी इस समझौते को "परफॉर्मेंस आधारित" बताते हुए कहा कि इसकी सफलता पूरी तरह जमीनी स्तर पर लागू होने वाले कदमों पर निर्भर करेगी। हिज्बुल्लाह ने किया समझौते का विरोध समझौते की घोषणा के तुरंत बाद हिज्बुल्लाह ने इसका कड़ा विरोध किया। संगठन के वरिष्ठ सांसद हसन फदलल्लाह ने कहा कि यदि लेबनानी सरकार अमेरिकी समर्थन के साथ इस समझौते को लागू करने की कोशिश करती है तो देश गृहयुद्ध जैसी स्थिति में पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि हिज्बुल्लाह किसी भी कीमत पर अपने हथियार नहीं छोड़ेगा और इस दिशा में किए जाने वाले हर प्रयास का विरोध करेगा। हजारों लोगों की जान ले चुका है संघर्ष इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच मौजूदा संघर्ष में अब तक भारी जनहानि हो चुकी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायली सैन्य कार्रवाई में 4,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 10 लाख से ज्यादा लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। वहीं संघर्ष के दौरान 37 इजरायली सैनिकों के भी मारे जाने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है, हालांकि हिज्बुल्लाह के विरोध के चलते इसके सफल क्रियान्वयन को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
गुवाहाटी: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सीमावर्ती राज्यों में रहने वाले प्रत्येक परिवार की नागरिकता की जांच की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि असम सरकार केंद्र सरकार को यह सुझाव देगी कि सीमा से सटे क्षेत्रों में रहने वाले सभी परिवारों की नागरिकता का सत्यापन किया जाए, ताकि अवैध घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलावों का सही आकलन किया जा सके। असम समझौते में हुई ऐतिहासिक भूल: सरमा पत्रकारों से बातचीत में हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि 1985 के असम समझौते के दौरान केवल असम-बांग्लादेश सीमा पर फेंसिंग की मांग को प्राथमिकता दी गई, जबकि मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम और पश्चिम बंगाल जैसे अन्य सीमावर्ती राज्यों की सीमाओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने कहा, "यह एक ऐतिहासिक भूल थी। अगर एक जगह सीमा बंद कर दी जाए और दूसरे हिस्से खुले रहें, तो सुरक्षा उपायों का पूरा लाभ नहीं मिलता।" पश्चिम बंगाल का किया जिक्र मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से पश्चिम बंगाल का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबे समय तक राज्य की सीमा का बड़ा हिस्सा खुला रहा, जिसके कारण अवैध आवागमन जारी रहा। उन्होंने कहा कि वर्षों तक सीमा प्रबंधन में कमियों के कारण घुसपैठ को पूरी तरह नहीं रोका जा सका। सीमावर्ती राज्यों में तेजी से हो रहा फेंसिंग का काम सरमा ने कहा कि अब स्थिति बदल रही है और भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि: मेघालय में सीमा फेंसिंग का लगभग 90 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। त्रिपुरा में करीब 60 प्रतिशत काम पूरा हो गया है। मिजोरम में फेंसिंग का कार्य जारी है। पश्चिम बंगाल में भी अब सीमा पर बाड़ लगाने का काम शुरू हो गया है। डेमोग्राफी बदलाव की होगी जांच मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Change) का अध्ययन करने के लिए एक समिति गठित की है। असम सरकार इस समिति को सुझाव देगी कि सीमा से सटे क्षेत्रों में रहने वाले हर परिवार की नागरिकता की जांच की जाए। उन्होंने कहा कि नागरिकता सत्यापन और जनसंख्या संरचना में बदलाव का अध्ययन भविष्य में सीमा सुरक्षा को मजबूत करने और अवैध घुसपैठ पर नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। सीमा सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता हिमंत बिस्वा सरमा का यह बयान ऐसे समय आया है, जब पूर्वोत्तर राज्यों में अवैध घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। असम सरकार का मानना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में व्यापक नागरिकता सत्यापन से सुरक्षा चुनौतियों की बेहतर पहचान की जा सकेगी और भविष्य की नीतियों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल सरकार ने अवैध बांग्लादेशी नागरिकों और फर्जी दस्तावेजों के नेटवर्क के खिलाफ राज्यव्यापी अभियान शुरू किया है। गृह विभाग के निर्देश पर पुलिस, खुफिया एजेंसियां और केंद्रीय सुरक्षा बल संयुक्त रूप से संवेदनशील इलाकों में जांच अभियान चला रहे हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार, खुफिया इनपुट के आधार पर उन क्षेत्रों की पहचान की जा रही है जहां फर्जी आधार कार्ड, वोटर आईडी और अन्य दस्तावेजों के जरिए संदिग्ध लोगों के रहने की आशंका है। अभियान केवल सीमावर्ती जिलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कोलकाता समेत प्रमुख शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में भी एक साथ चलाया जाएगा। सीमावर्ती जिलों में विशेष निगरानी मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने वरिष्ठ पुलिस और खुफिया अधिकारियों के साथ बैठक कर अभियान की रूपरेखा तैयार की है। उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे सीमावर्ती जिलों में विशेष जांच दल (SIT) गठित किए गए हैं, जो स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं। भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा बढ़ाई गई सीमा सुरक्षा बल (BSF) और राज्य पुलिस ने संयुक्त गश्त बढ़ा दी है। संवेदनशील सीमा क्षेत्रों में ड्रोन, थर्मल इमेजिंग कैमरों और अन्य आधुनिक तकनीकों की मदद से चौबीसों घंटे निगरानी की जा रही है, ताकि अवैध आवाजाही पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके। शहरी क्षेत्रों में भी पहचान सत्यापन अभियान कोलकाता, हावड़ा और हुगली के औद्योगिक क्षेत्रों, जूट मिलों और बड़े निर्माण स्थलों पर काम करने वाले श्रमिकों के पहचान पत्रों की भी जांच की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि कुछ संदिग्ध व्यक्ति फर्जी पहचान के जरिए इन इलाकों में रह सकते हैं। फर्जी दस्तावेज नेटवर्क पर कार्रवाई पुलिस ने उत्तर 24 परगना के सीमावर्ती क्षेत्र से दो आरोपियों को गिरफ्तार करने का दावा किया है। जांच एजेंसियों के अनुसार, दोनों पर अवैध रूप से सीमा पार कराने और फर्जी भारतीय दस्तावेज उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क से जुड़े होने का आरोप है। उनके कब्जे से कथित तौर पर कई फर्जी मुहरें और दस्तावेज बरामद किए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि अभियान आगे भी जारी रहेगा और अवैध दस्तावेज तैयार करने वाले नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
भारतीय सेना अपनी लंबी दूरी की मारक क्षमता को और मजबूत करने के लिए 300 अतिरिक्त K-9 वज्र-टी स्वचालित हॉवित्जर तोपों की खरीद की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित सौदे की अनुमानित लागत लगभग 23,000 करोड़ रुपये बताई जा रही है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव को जल्द ही रक्षा खरीद बोर्ड (DPB) के समक्ष मंजूरी के लिए रखा जा सकता है। यदि इस परियोजना को स्वीकृति मिलती है, तो यह भारतीय सेना के हालिया वर्षों के सबसे बड़े तोपखाना आधुनिकीकरण कार्यक्रमों में शामिल होगी। नई तोपों की तैनाती पाकिस्तान और चीन से लगने वाली सीमाओं पर की जाएगी, जिससे दोनों मोर्चों पर सेना की फायरपावर में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। एलएंडटी को मिल सकता है निर्माण का जिम्मा रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्ताव को मंजूरी मिलने पर इसका निर्माण कार्य लार्सन एंड टुब्रो (L&T) को मिल सकता है। कंपनी दक्षिण कोरिया की रक्षा निर्माता कंपनी हनव्हा एयरोस्पेस के सहयोग से भारत में K-9 वज्र-टी का निर्माण करती है। नई खरीद के बाद भारतीय सेना के लिए ऑर्डर की गई K-9 वज्र तोपों की कुल संख्या 500 से अधिक हो जाएगी। रक्षा अधिकारियों का मानना है कि इससे पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर सेना की परिचालन क्षमता और युद्धक तैयारी को मजबूती मिलेगी। बदलती सुरक्षा चुनौतियों पर सेना का फोकस हाल के वर्षों में भारतीय सेना ने लंबी दूरी तक सटीक प्रहार करने वाली प्रणालियों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्धक्षेत्र में मोबाइल और तेज प्रतिक्रिया देने वाली तोप प्रणालियां निर्णायक भूमिका निभाती हैं। इसी रणनीति के तहत सेना ऐसी प्रणालियों को प्राथमिकता दे रही है, जो विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में प्रभावी फायर सपोर्ट उपलब्ध करा सकें। क्या है K-9 वज्र की खासियत? K-9 वज्र-टी एक 155 मिमी/52 कैलिबर ट्रैक्ड स्वचालित हॉवित्जर तोप प्रणाली है। यह 40 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य पर सटीक प्रहार करने में सक्षम है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी "शूट एंड स्कूट" क्षमता है। यानी यह लक्ष्य पर गोले दागने के तुरंत बाद अपनी स्थिति बदल सकती है, जिससे दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से बचाव आसान हो जाता है। इसके अलावा यह बख्तरबंद सुरक्षा से लैस है और रेगिस्तानी इलाकों से लेकर ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों तक प्रभावी ढंग से संचालन कर सकती है। यही कारण है कि इसे आधुनिक युद्ध प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। 2017 में हुआ था पहला सौदा भारत ने K-9 वज्र तोपों के लिए पहला बड़ा अनुबंध वर्ष 2017 में किया था। उस समय 100 तोपों की खरीद के लिए लगभग 4,500 करोड़ रुपये का समझौता हुआ था। इनकी आपूर्ति निर्धारित समय से पहले वर्ष 2021 में पूरी कर ली गई थी। बाद में इन तोपों को मुख्य रूप से पाकिस्तान सीमा से लगे रेगिस्तानी क्षेत्रों में तैनात किया गया, जहां इनके प्रदर्शन को सकारात्मक माना गया। 2023 में मिला दूसरा ऑर्डर K-9 वज्र की परिचालन सफलता को देखते हुए दिसंबर 2023 में भारतीय सेना ने 100 अतिरिक्त तोपों की खरीद को मंजूरी दी थी। इस सौदे की अनुमानित लागत करीब 7,600 करोड़ रुपये थी। इस निर्णय ने स्पष्ट संकेत दिया कि सेना भविष्य की युद्ध रणनीति में इस प्रणाली को महत्वपूर्ण भूमिका देती है। लद्दाख में भी सफल रहे परीक्षण हाल ही में K-9 वज्र के संशोधित शीतकालीन संस्करण का परीक्षण लद्दाख के अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में किया गया। रक्षा अधिकारियों के अनुसार, बेहद कम तापमान और कठिन परिस्थितियों में भी इस प्रणाली का प्रदर्शन संतोषजनक रहा। परीक्षण के सफल परिणामों के बाद उत्तरी सीमाओं पर अतिरिक्त K-9 वज्र इकाइयों की तैनाती की योजना को और बल मिला है। तोपखाना आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा प्रस्तावित खरीद भारतीय सेना के व्यापक तोपखाना आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा है। सेना समानांतर रूप से एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS), धनुष तोप और उन्नत पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट सिस्टम जैसी परियोजनाओं पर भी काम कर रही है। रक्षा अधिकारियों का मानना है कि इन आधुनिक प्रणालियों के शामिल होने से भारतीय सेना भविष्य के किसी भी संघर्ष में तेजी से, सटीक और लगातार फायरपावर उपलब्ध कराने में पहले से अधिक सक्षम होगी।
नई दिल्ली: एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल करने के बाद ज्यादातर उम्मीदवार निजी क्षेत्र की नौकरियों की ओर रुख करते हैं, लेकिन सरकारी क्षेत्र में भी MBA प्रोफेशनल्स के लिए कई शानदार अवसर मौजूद हैं। बैंकिंग, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां (PSUs), प्रशासनिक सेवाएं और बीमा क्षेत्र ऐसे विकल्प हैं, जहां न सिर्फ आकर्षक वेतन मिलता है बल्कि नौकरी की स्थिरता और कई अतिरिक्त सुविधाएं भी प्राप्त होती हैं। आइए जानते हैं MBA के बाद सरकारी क्षेत्र में उपलब्ध चार प्रमुख करियर विकल्पों के बारे में। 1. बैंकिंग और फाइनेंस सेक्टर MBA ग्रेजुएट्स के लिए बैंकिंग क्षेत्र सबसे लोकप्रिय विकल्पों में गिना जाता है। RBI Grade B Officer रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) में ग्रेड बी अधिकारी का पद बेहद प्रतिष्ठित माना जाता है। यहां वित्तीय प्रबंधन और नीतिगत कार्यों से जुड़ी जिम्मेदारियां मिलती हैं। अनुमानित शुरुआती वेतन (भत्तों सहित): लगभग ₹1.5 लाख प्रतिमाह अधिक जानकारी: RBI की आधिकारिक वेबसाइट सरकारी बैंकों में PO और SO पद सरकारी बैंकों में प्रोबेशनरी ऑफिसर (PO) और स्पेशलिस्ट ऑफिसर (SO) के पदों पर MBA उम्मीदवारों को अवसर मिलते हैं। SEBI और IRDAI जैसे संस्थान वित्तीय रणनीति, निवेश और नियामकीय कार्यों से जुड़े पदों पर भी MBA प्रोफेशनल्स की मांग रहती है। 2. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां (PSUs) देश की प्रमुख सरकारी कंपनियां MBA उम्मीदवारों की भर्ती करती हैं। प्रमुख कंपनियां: ONGC NTPC BHEL GAIL इन संस्थानों में मैनेजमेंट ट्रेनी, HR, मार्केटिंग और ऑपरेशंस जैसे पदों पर नियुक्तियां होती हैं। अनुमानित वार्षिक पैकेज: ₹12 लाख से ₹25 लाख तक 3. UPSC और प्रशासनिक सेवाएं MBA ग्रेजुएट्स संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षाओं में भी हिस्सा ले सकते हैं। सिविल सेवा (IAS, IPS, IRS) MBA डिग्री धारक IAS, IPS और IRS जैसे प्रतिष्ठित पदों के लिए आवेदन कर सकते हैं। अनुमानित वेतन (भत्तों सहित): ₹80,000 से ₹1 लाख प्रतिमाह Indian Economic Service (IES) आर्थिक नीति और वित्तीय मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण पदों के लिए भी MBA उम्मीदवार अवसर प्राप्त कर सकते हैं। 4. बीमा क्षेत्र में सरकारी नौकरियां LIC और अन्य सरकारी बीमा कंपनियों में MBA प्रोफेशनल्स की अच्छी मांग रहती है। इन संस्थानों में: रिस्क मैनेजमेंट प्रशासन मैनेजमेंट ऑपरेशनल रोल्स जैसे पदों पर भर्ती की जाती है। अनुमानित शुरुआती वेतन: ₹1 लाख से ₹1.25 लाख प्रतिमाह MBA के बाद सरकारी नौकरी क्यों है अच्छा विकल्प? आकर्षक वेतन नौकरी की सुरक्षा पेंशन और अन्य भत्ते करियर में स्थिरता बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस MBA के बाद सरकारी क्षेत्र में करियर बनाने वाले उम्मीदवारों के लिए अवसर लगातार बढ़ रहे हैं। सही तैयारी और उचित परीक्षा चयन के माध्यम से एक सफल और स्थायी करियर बनाया जा सकता है।
भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा सुरक्षा और समन्वय से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोमवार से नई दिल्ली में उच्चस्तरीय वार्ता शुरू हो रही है। Border Security Force (बीएसएफ) और Border Guard Bangladesh (बीजीबी) के महानिदेशकों की 57वीं द्विवार्षिक बैठक 8 से 11 जून तक आयोजित की जाएगी। इस बैठक में सीमा प्रबंधन, सुरक्षा सहयोग और अवैध घुसपैठियों की वापसी जैसे संवेदनशील विषयों पर चर्चा होने की संभावना है। नई दिल्ली में जुटेंगे दोनों देशों के सीमा सुरक्षा प्रमुख चार दिवसीय सम्मेलन में बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व बीजीबी प्रमुख Mohammad Ashrafuzzaman Siddiqui करेंगे, जबकि भारतीय पक्ष की अगुवाई बीएसएफ महानिदेशक Praveen Kumar करेंगे। दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी सीमा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगे। अवैध प्रवासियों की वापसी रहेगा प्रमुख एजेंडा बैठक का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भारत में रह रहे अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया को लेकर माना जा रहा है। बांग्लादेश ने इस विषय पर अपनी आपत्तियां जताई हैं और इसे वार्ता में प्रमुखता से उठाने की बात कही है। बांग्लादेश के गृह मामलों के सलाहकार Salahuddin Ahmed ने कहा है कि सीमा की मौजूदा स्थिति, द्विपक्षीय सहयोग और अवैध प्रवासियों की वापसी का मुद्दा बैठक में प्रमुख रूप से उठाया जाएगा। वहीं भारत का कहना है कि केवल सत्यापित अवैध घुसपैठियों को स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए बांग्लादेश भेजा जाता है। सीमा अपराध और तस्करी पर भी होगी बातचीत सम्मेलन में सीमा पार अपराध, मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, अवैध घुसपैठ और सीमा पर होने वाली अन्य आपराधिक गतिविधियों को रोकने के उपायों पर भी चर्चा की जाएगी। दोनों पक्ष सीमा क्षेत्रों में बेहतर समन्वय और विश्वास बढ़ाने के उपायों पर भी विचार कर सकते हैं। 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा बनी चुनौती भारत और Bangladesh के बीच लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इसमें से करीब 860 किलोमीटर हिस्से में अभी भी बाड़ नहीं लगी है, जिसके कारण सुरक्षा एजेंसियों के सामने निगरानी और अवैध आवाजाही रोकने की चुनौती बनी रहती है। पांच दशक पुराना संवाद तंत्र भारत और बांग्लादेश के बीच महानिदेशक स्तर की सीमा वार्ताओं की शुरुआत 1975 में हुई थी। वर्ष 1975 से 1992 तक यह बैठक हर साल आयोजित की जाती थी, जबकि 1993 से इसे द्विवार्षिक स्वरूप दिया गया। सीमा से जुड़े मुद्दों के समाधान और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने में यह तंत्र दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत और नेपाल के बीच रिश्तों को मजबूत बनाने की कोशिशों के बीच नेपाल द्वारा भारत-नेपाल सीमा पर चीनी तकनीक आधारित थर्मल निगरानी कैमरे लगाने की खबरों ने नई चर्चा छेड़ दी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल उत्तराखंड से सटी सीमा पर आधुनिक थर्मल सर्विलांस सिस्टम स्थापित कर रहा है, जिनका उपयोग दिन और रात दोनों समय गतिविधियों की निगरानी के लिए किया जाएगा। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इन कैमरों के संचालन के लिए चीनी संचार और इंटरनेट ढांचे का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन दावों की अभी तक भारत या नेपाल की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। 2016 से शुरू हुई थी तकनीकी साझेदारी नेपाल और चीन के बीच सीमा निगरानी से जुड़ा तकनीकी सहयोग कोई नया नहीं है। दोनों देशों के बीच वर्ष 2016 में सुरक्षा और तकनीकी सहयोग को लेकर समझौते हुए थे। इसके बाद 2019 में सीमा क्षेत्रों के सर्वेक्षण और तकनीकी अध्ययन के लिए वित्तीय मंजूरी दी गई। झूलाघाट समेत कई सीमावर्ती क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया था, जहां बाद में निगरानी प्रणाली स्थापित करने की योजना बनाई गई। इसी प्रक्रिया के तहत अब थर्मल कैमरों की तैनाती को आगे बढ़ाया जा रहा है। उत्तराखंड सीमा के किन क्षेत्रों पर रहेगी नजर? भारत और नेपाल के बीच उत्तराखंड में करीब 275 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। भारतीय सीमा की सुरक्षा Sashastra Seema Bal (SSB) और नेपाल की ओर से Armed Police Force Nepal संभालती है। भारतीय क्षेत्र में पिथौरागढ़, झूलाघाट, धारचूला, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जैसे इलाके इस सीमा का हिस्सा हैं। वहीं नेपाल की ओर दार्चुला, बैतड़ी, डडेलधुरा और कंचनपुर जिले सीमा से जुड़े हुए हैं। कालापानी विवाद के बाद बढ़ा फोकस विश्लेषकों का मानना है कि 2020 में कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर भारत-नेपाल के बीच पैदा हुए विवाद के बाद नेपाल ने सीमा क्षेत्रों में अपनी सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया। इसी दौरान नेपाल ने कई नए बॉर्डर आउट पोस्ट (BOP) स्थापित किए और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रणालियों के विस्तार की योजना शुरू की। थर्मल कैमरों की तैनाती को उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भारत ने भी मजबूत की निगरानी व्यवस्था सीमा पार गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भारत ने भी हाल के वर्षों में निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया है। प्रमुख सीमा बिंदुओं पर डिजिटल रिकॉर्डिंग सिस्टम, आधुनिक स्क्रीनिंग उपकरण और चौबीसों घंटे गश्त की व्यवस्था की गई है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, सीमा पार करने वाले लोगों की डिजिटल रिकॉर्डिंग और पहचान सत्यापन की प्रक्रिया को और सख्त बनाया गया है। संवेदनशील इलाकों में SSB और स्थानीय पुलिस संयुक्त रूप से निगरानी कर रही है। राजनीतिक बयानबाजी भी बनी चिंता नेपाल की राजनीति में समय-समय पर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे सीमा विवादों को लेकर बयान सामने आते रहे हैं। हाल के महीनों में नेपाल के प्रधानमंत्री Balen Shah के कुछ बयानों ने भी चर्चा पैदा की थी, बाद में नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी किया था। रिश्ते सुधारने की कोशिश जारी सीमा पर तकनीकी गतिविधियों के बीच दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संपर्क भी जारी हैं। नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व और भारतीय अधिकारियों के बीच हाल के महीनों में कई उच्चस्तरीय मुलाकातें हुई हैं। डिजिटल भुगतान, स्वास्थ्य, कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी है। सीमा पर चीन निर्मित निगरानी उपकरणों की तैनाती और संभावित चीनी संचार नेटवर्क के इस्तेमाल की खबरों ने सुरक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों का ध्यान जरूर आकर्षित किया है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर दोनों देशों की आधिकारिक प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण मानी जाएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।