नई दिल्ली: अगर आप 12वीं के बाद कॉरपोरेट सेक्टर में एक प्रोफेशनल करियर बनाना चाहते हैं, तो Company Secretary यानी CS एक अच्छा विकल्प हो सकता है। यह सिर्फ कॉमर्स स्टूडेंट्स तक सीमित करियर नहीं है। मान्यता प्राप्त बोर्ड से 12वीं पास करने वाले विद्यार्थी इस प्रोफेशनल कोर्स की ओर आगे बढ़ सकते हैं। कंपनी सेक्रेटरी की भूमिका किसी कंपनी में कॉरपोरेट लॉ, कानूनी अनुपालन, कॉरपोरेट गवर्नेंस, बोर्ड मीटिंग और रेगुलेटरी मामलों से जुड़ी होती है। यह कोर्स Institute of Company Secretaries of India (ICSI) द्वारा संचालित किया जाता है। अगर आप भी CS बनने की तैयारी कर रहे हैं, तो पहले इसके पूरे रास्ते, योग्यता, परीक्षा और ट्रेनिंग को समझना जरूरी है। CS बनने के लिए कौन-कौन से चरण पूरे करने होते हैं? 12वीं के बाद CS की पढ़ाई शुरू करने वाले विद्यार्थियों को सामान्य तौर पर इन चरणों से गुजरना होता है: CSEET (Company Secretary Executive Entrance Test) CS Executive Programme प्रैक्टिकल ट्रेनिंग CS Professional Programme इन सभी चरणों को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद विद्यार्थी कंपनी सेक्रेटरी के रूप में करियर की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। CSEET क्या है? पहले CS कोर्स के शुरुआती स्तर को Foundation Programme के नाम से जाना जाता था, लेकिन ICSI ने अब इसकी जगह CSEET लागू किया है। 12वीं के बाद CS की पढ़ाई शुरू करने वाले विद्यार्थियों को निर्धारित पात्रता पूरी करने के बाद CSEET के रास्ते आगे बढ़ना होता है। वहीं, ग्रेजुएशन के बाद CS की पढ़ाई शुरू करने वाले विद्यार्थियों के लिए प्रवेश का रास्ता अलग हो सकता है और उन्हें शुरुआती स्तर की परीक्षा से छूट मिलने के प्रावधान लागू हो सकते हैं। CS Executive में क्या पढ़ना होता है? CSEET के बाद अगला चरण CS Executive Programme है। यह CS की पढ़ाई का महत्वपूर्ण स्तर है, जिसमें विद्यार्थियों को कंपनी कानून, कॉरपोरेट से जुड़े नियमों और अन्य प्रोफेशनल विषयों की जानकारी दी जाती है। इस स्तर पर विद्यार्थियों को निर्धारित मॉड्यूल और विषयों की परीक्षा पास करनी होती है। परीक्षा की तैयारी में कॉन्सेप्ट समझने के साथ-साथ कानून और नियमों को नियमित रूप से पढ़ना महत्वपूर्ण होता है। CS Professional है अंतिम स्तर CS Professional Programme CS कोर्स का अंतिम शैक्षणिक चरण है। इस स्तर पर विद्यार्थियों को कॉरपोरेट और प्रोफेशनल क्षेत्र से जुड़े उन्नत विषयों की पढ़ाई करनी होती है। Professional Programme के निर्धारित मॉड्यूल और पेपर सफलतापूर्वक पास करने के बाद विद्यार्थी ट्रेनिंग और अन्य जरूरी प्रोफेशनल औपचारिकताओं को पूरा करके CS के रूप में करियर आगे बढ़ा सकते हैं। करीब 21 महीने की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग CS कोर्स में सिर्फ किताबों और परीक्षाओं की पढ़ाई ही नहीं होती। विद्यार्थियों को प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी करनी होती है, जिसमें उन्हें वास्तविक कॉरपोरेट वातावरण में काम से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी और कौशल सीखने का मौका मिलता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ट्रेनिंग की अवधि करीब 21 महीने हो सकती है। हालांकि ट्रेनिंग और अन्य प्रोफेशनल आवश्यकताओं के मौजूदा नियम ICSI के अनुसार जांचना जरूरी है। CS Course के लिए क्या है योग्यता? CS की पढ़ाई के लिए विद्यार्थी का किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से 12वीं पास होना जरूरी है। केवल कॉमर्स स्ट्रीम के विद्यार्थियों तक यह कोर्स सीमित नहीं है। हालांकि कॉमर्स बैकग्राउंड वाले विद्यार्थियों को अकाउंटिंग, बिजनेस और कॉमर्स से जुड़े कुछ कॉन्सेप्ट पहले से परिचित हो सकते हैं, लेकिन साइंस और आर्ट्स स्ट्रीम के विद्यार्थी भी पात्रता पूरी करने पर CS की पढ़ाई कर सकते हैं। इस करियर में सफलता के लिए नियमित अध्ययन, कानून और नियमों को समझने की क्षमता, धैर्य और निरंतर तैयारी महत्वपूर्ण है। CS के बाद कहां मिल सकता है करियर का मौका? कंपनी सेक्रेटरी बनने के बाद कॉरपोरेट सेक्टर में कई तरह की भूमिकाओं के अवसर मिल सकते हैं। CS प्रोफेशनल्स कंपनी के कॉरपोरेट लॉ, कानूनी अनुपालन, कॉरपोरेट गवर्नेंस, बोर्ड मीटिंग, रेगुलेटरी अफेयर्स और कंपनी से जुड़े वैधानिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बड़ी कंपनियों और प्रोफेशनल सर्विस फर्मों में भी CS से जुड़े अवसर मिल सकते हैं। कॉरपोरेट सेक्टर की प्रमुख कंपनियों में Deloitte, PwC, EY और KPMG जैसी बड़ी प्रोफेशनल सर्विस फर्मों में संबंधित भूमिकाओं के अवसर तलाशे जा सकते हैं। CS कोर्स पूरा करने में कितना समय लगता है? 12वीं के बाद CS की पढ़ाई शुरू करने पर इसे पूरा करने में लगभग चार साल या उससे अधिक समय लग सकता है। वास्तविक अवधि विद्यार्थी की परीक्षा पास करने की गति, ट्रेनिंग और लागू प्रोफेशनल आवश्यकताओं पर निर्भर करती है। CS की परीक्षाएं आम तौर पर जून और दिसंबर के सत्रों में आयोजित की जाती हैं। किसी स्तर पर परीक्षा पास नहीं होने की स्थिति में कोर्स पूरा करने में अतिरिक्त समय लग सकता है। CS किस तरह के विद्यार्थियों के लिए बेहतर विकल्प है? अगर आपको कंपनी कानून, कॉरपोरेट गवर्नेंस, नियम-कायदे, कानूनी अनुपालन और बिजनेस से जुड़े मामलों में रुचि है, तो CS आपके लिए एक उपयोगी करियर विकल्प हो सकता है। हालांकि सिर्फ डिग्री हासिल करने के उद्देश्य से इस कोर्स में प्रवेश लेने के बजाय इसकी पढ़ाई और प्रोफेशनल जिम्मेदारियों को समझना जरूरी है। लगातार पढ़ाई और अपडेटेड कानूनों व नियमों की जानकारी इस क्षेत्र में लंबे समय तक आगे बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण है।
कभी कॉर्पोरेट दुनिया में करियर ग्रोथ का सबसे बड़ा लक्ष्य मैनेजर बनना माना जाता था। लेकिन अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। Microsoft की हालिया छंटनी के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मैनेजरों की जगह लेने जा रहा है? विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा नहीं है। कंपनियां मैनेजरों को खत्म नहीं कर रहीं, बल्कि अनावश्यक मैनेजमेंट लेयर कम करके नेतृत्व की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित कर रही हैं। Microsoft की छंटनी ने बढ़ाई चर्चा Microsoft ने हालिया जॉब कट्स के दौरान अपनी मैनेजमेंट लेयर को भी कम किया है। कंपनी AI पर बड़े स्तर पर निवेश कर रही है और संगठन को अधिक तेज, चुस्त (Agile) और प्रभावी बनाने की दिशा में काम कर रही है। यही रणनीति Amazon, Meta और Shopify जैसी कई बड़ी टेक कंपनियां भी अपना रही हैं। इस ट्रेंड को अब कॉर्पोरेट जगत में "Management Diet" कहा जा रहा है, जिसमें संगठन के भीतर गैर-जरूरी मैनेजमेंट स्तरों को हटाकर निर्णय प्रक्रिया को सरल बनाया जा रहा है। AI नहीं, संगठनात्मक बदलाव है बड़ी वजह विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव केवल AI की वजह से नहीं हो रहा है। True Balance के चीफ ह्यूमन रिसोर्स ऑफिसर (CHRO) गौरव शर्मा का कहना है कि कंपनियां अब यह मूल्यांकन कर रही हैं कि कौन-सी मैनेजमेंट लेयर वास्तव में व्यवसाय को मूल्य दे रही है। यदि किसी स्तर की भूमिका केवल रिपोर्टिंग, समन्वय और प्रशासनिक कार्यों तक सीमित है, तो उसे अधिक प्रभावी तरीके से AI के जरिए संभाला जा सकता है। वहीं HireYou के CHRO अभिजीत घोष के मुताबिक कंपनियां अपने संगठन को अधिक तेज और लचीला बनाने के लिए संरचनात्मक बदलाव कर रही हैं। AI इस बदलाव को आसान बना रहा है क्योंकि अब कई प्रशासनिक जिम्मेदारियां तकनीक संभाल सकती है। AI किन मैनेजमेंट कार्यों को संभाल रहा है? आज AI कई ऐसे कार्य तेजी से कर रहा है जो पहले मिडिल मैनेजर की जिम्मेदारी माने जाते थे। इनमें शामिल हैं: प्रदर्शन (Performance) की निगरानी प्रोजेक्ट की प्रगति पर नजर रखना मीटिंग का सारांश तैयार करना कर्मचारियों की शेड्यूलिंग संसाधनों का आवंटन ऑनबोर्डिंग और रिपोर्टिंग अनुपालन (Compliance) की निगरानी इन कार्यों के ऑटोमेट होने से मैनेजरों का समय बच रहा है और संगठन कम मैनेजमेंट लेयर के साथ भी प्रभावी ढंग से काम कर पा रहे हैं। AI नहीं कर सकता नेतृत्व की जगह विशेषज्ञ मानते हैं कि AI डेटा और प्रशासनिक कार्यों में मदद कर सकता है, लेकिन इंसानी नेतृत्व की जगह नहीं ले सकता। कर्मचारियों को प्रेरित करना, विवाद सुलझाना, कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेना, टीम का विश्वास जीतना और सकारात्मक कार्य संस्कृति बनाना ऐसे काम हैं जिनमें मानवीय समझ और अनुभव की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि भविष्य में प्रभावी नेतृत्व की अहमियत और बढ़ने वाली है। मैनेजर की भूमिका कैसे बदल रही है? अब भविष्य का मैनेजर केवल टीम की निगरानी करने वाला व्यक्ति नहीं होगा। नई भूमिका में मैनेजर को इन जिम्मेदारियों पर अधिक ध्यान देना होगा: कर्मचारियों का विकास और कोचिंग रणनीतिक निर्णय लेना नवाचार को बढ़ावा देना अलग-अलग टीमों के बीच बेहतर सहयोग स्थापित करना व्यवसायिक समस्याओं का समाधान करना जो मैनेजर केवल अनुमोदन, रिपोर्टिंग और रोजमर्रा की निगरानी तक सीमित रहेंगे, उनके लिए भविष्य अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। करियर ग्रोथ का नया मतलब विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में करियर की सफलता केवल मैनेजर बनने से तय नहीं होगी। युवा पेशेवरों को अब इन कौशलों पर ध्यान देना होगा: AI टूल्स की समझ किसी क्षेत्र में गहरी विशेषज्ञता समस्या समाधान क्षमता विभिन्न टीमों के साथ सहयोग लगातार नई तकनीकों को सीखने की आदत व्यवसायिक परिणामों की जिम्मेदारी लेना यानी भविष्य में पदनाम (Designation) से अधिक महत्व कौशल और प्रभाव (Impact) का होगा। क्या भारत में भी दिखेगा यही ट्रेंड? विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की कंपनियां भी धीरे-धीरे इसी दिशा में आगे बढ़ेंगी। डिजिटल-फर्स्ट कंपनियां अपेक्षाकृत तेजी से फ्लैट संगठनात्मक ढांचे को अपनाएंगी, जबकि बड़े पारंपरिक संगठनों में यह बदलाव धीरे-धीरे देखने को मिलेगा। हालांकि अंतिम लक्ष्य सभी का लगभग एक जैसा होगा—कम मैनेजमेंट लेयर, तेज निर्णय प्रक्रिया और अधिक प्रभावी नेतृत्व। बदलते दौर में नेतृत्व ही बनेगा सबसे बड़ी ताकत AI के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद कंपनियों को अच्छे नेताओं की आवश्यकता बनी रहेगी। फर्क सिर्फ इतना होगा कि भविष्य में वही मैनेजर सबसे अधिक सफल होंगे जो लोगों को प्रेरित कर सकें, भरोसा कायम रखें, कठिन फैसले लें और लगातार बदलते कारोबारी माहौल में अपनी टीम का सही मार्गदर्शन कर सकें।
पटना, एजेंसियां। बिहार के चर्चित यूट्यूबर और जन सुराज नेता मनीष कश्यप एक नए विवाद को लेकर सुर्खियों में हैं। उन्होंने दावा किया था कि उनकी नई टोयोटा इनोवा हाइक्रॉस में E20 पेट्रोल भरवाने के बाद इंजन में गंभीर खराबी आ गई। इस दावे का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद E20 ईंधन को लेकर देशभर में बहस छिड़ गई। टोयोटा ने दावों को किया खारिज टोयोटा किर्लोस्कर मोटर ने वाहन की तकनीकी जांच के बाद कहा कि कार में आई खराबी E20 पेट्रोल की वजह से नहीं, बल्कि ईंधन में पानी/दूषित ईंधन होने के कारण हुई। कंपनी ने स्पष्ट किया कि इनोवा हाइक्रॉस E20 ईंधन के अनुरूप है। मनीष कश्यप के खिलाफ FIR दर्ज मामले के बाद टोयोटा ने मनीष कश्यप के खिलाफ FIR दर्ज कराई है। कंपनी का आरोप है कि बिना तकनीकी पुष्टि के किए गए दावों से उसकी छवि को नुकसान पहुंचा है। रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। सरकार ने भी दी सफाई विवाद बढ़ने पर पेट्रोलियम मंत्रालय ने भी बयान जारी कर कहा कि E20 पेट्रोल पूरी तरह परीक्षण के बाद लागू किया गया है और इससे संबंधित वायरल दावों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिला है। सरकार और ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों ने लोगों से अफवाहों पर विश्वास न करने की अपील की। सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस इस पूरे विवाद के बाद सोशल मीडिया पर E20 पेट्रोल, वाहन सुरक्षा और उपभोक्ता अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है। वहीं, मनीष कश्यप अपने दावों पर कायम हैं, जबकि टोयोटा और सरकार दोनों ने उनके आरोपों को तकनीकी जांच के आधार पर खारिज किया है।
How To Get Job In Amazon: आज के दौर में Amazon, Google और Microsoft जैसी बड़ी कंपनियों में नौकरी पाना लाखों युवाओं का सपना होता है। हालांकि, आम धारणा यह है कि ऐसी कंपनियों में जगह बनाने के लिए टेक्निकल बैकग्राउंड या इंजीनियरिंग डिग्री होना जरूरी है। लेकिन एक सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर की कहानी इस सोच को चुनौती देती है। इंस्टाग्राम कंटेंट क्रिएटर तनिष्का ने बताया कि उन्होंने केवल BA English की डिग्री के साथ Amazon में नौकरी हासिल की। उनका कहना है कि सही रणनीति, लगातार मेहनत और जरूरी स्किल्स पर फोकस करके नॉन-टेक बैकग्राउंड वाले उम्मीदवार भी बड़ी कंपनियों में अपनी जगह बना सकते हैं। मेहनत और सही स्किल्स से हासिल की सफलता तनिष्का ने बताया कि उनके पास कोई टेक्निकल डिग्री नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने खुद को लगातार बेहतर बनाया और Amazon जैसी प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी पाने का लक्ष्य हासिल किया। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर युवाओं के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी साझा किए हैं। Amazon में नौकरी पाने के लिए तनिष्का के 7 महत्वपूर्ण टिप्स 1. कम्युनिकेशन स्किल्स को बनाएं मजबूत सिर्फ अच्छे अंक ही सफलता की गारंटी नहीं होते। बोलने और लिखने की क्षमता को बेहतर बनाना भी बेहद जरूरी है। इंटरव्यू और प्रोफेशनल माहौल में स्पष्ट तरीके से अपनी बात रखना महत्वपूर्ण होता है। 2. इंटर्नशिप और प्रोजेक्ट्स से लें अनुभव पढ़ाई के साथ-साथ इंटर्नशिप और विभिन्न प्रोजेक्ट्स में हिस्सा लेने से प्रैक्टिकल अनुभव मिलता है। इससे रिज्यूमे मजबूत होता है और कंपनियों के सामने आपकी प्रोफाइल अधिक प्रभावशाली बनती है। 3. हर नौकरी के लिए अलग रिज्यूमे तैयार करें एक ही रिज्यूमे सभी कंपनियों में भेजने के बजाय, जॉब प्रोफाइल के अनुसार उसमें बदलाव करें। संबंधित स्किल्स और अनुभव को प्रमुखता देना चयन की संभावना बढ़ा सकता है। 4. खुद को कम योग्य समझकर आवेदन करना न छोड़ें अगर आप किसी नौकरी की सभी योग्यताओं को पूरा नहीं करते हैं, तब भी आवेदन करने से पीछे न हटें। आत्मविश्वास बनाए रखें और अवसरों का लाभ उठाने की कोशिश करें। 5. इंटरव्यू की तैयारी पर विशेष ध्यान दें बिहेवियरल सवालों का अभ्यास करें, मॉक इंटरव्यू दें और कंपनी के बारे में अच्छी तरह रिसर्च करें। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और इंटरव्यू में बेहतर प्रदर्शन करने में मदद मिलती है। 6. नॉन-टेक स्किल्स को अपनी ताकत बनाएं कम्युनिकेशन, टीमवर्क और समस्या समाधान जैसी स्किल्स हर कॉर्पोरेट भूमिका में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इन क्षमताओं को सही तरीके से प्रस्तुत करना जरूरी है। 7. रिजेक्शन को सीखने का अवसर समझें हर असफलता आपको कुछ नया सिखाती है। कमजोरियों को पहचानकर उनमें सुधार करें और लगातार प्रयास जारी रखें। सोशल मीडिया पर भी काफी लोकप्रिय हैं तनिष्का तनिष्का इंस्टाग्राम पर "thatchicgirll" नाम से कंटेंट शेयर करती हैं। उनके अकाउंट पर लाइफस्टाइल, फैशन, ऑफिस लाइफ और करियर से जुड़े वीडियो देखने को मिलते हैं। उनके कई वीडियो लाखों व्यूज हासिल कर चुके हैं। इंस्टाग्राम पर उनके लगभग 1.04 लाख फॉलोअर्स हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि केवल डिग्री नहीं, बल्कि सही स्किल्स, निरंतर सीखने की इच्छा और मेहनत भी करियर में बड़ी सफलता दिला सकती है।
आज के समय में कॉरपोरेट दुनिया तेजी से बदल रही है और इसके साथ ही प्रोफेशनल एजुकेशन का ट्रेंड भी बदलता जा रहा है। लंबे समय तक Master of Business Administration और Doctor of Philosophy को मैनेजमेंट की सबसे बड़ी डिग्री माना जाता था, लेकिन अब एक नई डिग्री तेजी से लोकप्रिय हो रही है – DBA यानी Doctor of Business Administration। DBA को बिजनेस और मैनेजमेंट सेक्टर की हाई-लेवल डॉक्टरेट डिग्री माना जाता है। खास बात यह है कि इस डिग्री को पूरा करने के बाद उम्मीदवार अपने नाम के आगे “Dr.” भी लगा सकते हैं। क्या है DBA? Doctor of Business Administration यानी DBA एक प्रोफेशनल डॉक्टरेट डिग्री है, जिसे खासतौर पर अनुभवी कॉरपोरेट प्रोफेशनल्स और सीनियर मैनेजर्स के लिए डिजाइन किया गया है। यह डिग्री उन लोगों के लिए होती है जो बिजनेस की वास्तविक समस्याओं पर रिसर्च करना चाहते हैं और अपने प्रैक्टिकल अनुभव को अकादमिक पहचान देना चाहते हैं। इसमें पढ़ाई का फोकस सिर्फ थ्योरी पर नहीं, बल्कि रियल बिजनेस चैलेंज को सॉल्व करने पर होता है। MBA और DBA में क्या अंतर है? MBA क्या है? Master of Business Administration एक पोस्टग्रेजुएट डिग्री है, जिसे ज्यादातर छात्र ग्रेजुएशन के बाद या शुरुआती वर्क एक्सपीरियंस के साथ करते हैं। इस कोर्स में: मैनेजमेंट के बेसिक्स बिजनेस स्ट्रेटेजी मार्केटिंग फाइनेंस लीडरशिप जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। DBA कैसे अलग है? Doctor of Business Administration MBA से कहीं अधिक एडवांस और हाई-लेवल डिग्री मानी जाती है। DBA में एडमिशन के लिए आमतौर पर: MBA डिग्री 3 से 5 साल का कॉरपोरेट अनुभव जरूरी माना जाता है। यह कोर्स उन लोगों के लिए होता है जो: CXO लेवल तक पहुंचना चाहते हैं इंटरनेशनल बिजनेस लीडरशिप में जाना चाहते हैं रिसर्च और कॉरपोरेट स्ट्रेटेजी में विशेषज्ञ बनना चाहते हैं क्या DBA के बाद ‘Doctor’ लगा सकते हैं? हां, DBA एक मान्यता प्राप्त डॉक्टरेट लेवल की डिग्री है। इस कोर्स को पूरा करने के बाद उम्मीदवार अपने नाम के आगे “Dr.” लगा सकते हैं। कॉरपोरेट और इंटरनेशनल बिजनेस कम्युनिटी में DBA होल्डर्स को काफी सम्मान दिया जाता है और इन्हें कई मामलों में PhD होल्डर्स के बराबर माना जाता है। भारत में कहां से कर सकते हैं DBA? भारत में कई बड़े संस्थान DBA या इसके समकक्ष प्रोग्राम ऑफर करते हैं। प्रमुख संस्थान Indian Institute of Management Ahmedabad Indian Institute of Management Bangalore Indian Institute of Management Calcutta यहां Executive FPM प्रोग्राम ऑफर किए जाते हैं, जिन्हें DBA के बराबर माना जाता है। Indian School of Business यहां Executive DBA (EDBA) प्रोग्राम उपलब्ध है। SP Jain Institute of Management and Research BITS Pilani upGrad Symbiosis International University ये प्लेटफॉर्म विदेशी यूनिवर्सिटीज के साथ मिलकर ऑनलाइन DBA प्रोग्राम भी ऑफर करते हैं। DBA करने के क्या फायदे हैं? कॉरपोरेट दुनिया में हाई-लेवल पहचान CXO और टॉप लीडरशिप रोल्स के अवसर रिसर्च और कंसल्टिंग करियर में फायदा इंटरनेशनल नेटवर्किंग “Doctor” टाइटल का सम्मान
बदल रही है नौकरी और सफलता की परिभाषा एक समय था जब प्रमोशन को करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता था। ऊंचा पद, ज्यादा वेतन और जिम्मेदारी सफलता की पहचान समझे जाते थे। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। बढ़ते तनाव, डिजिटल दबाव और बिगड़ते वर्क-लाइफ बैलेंस के बीच कई कर्मचारी प्रमोशन लेने से भी बचने लगे हैं। आज बड़ी संख्या में प्रोफेशनल्स यह सोचने लगे हैं कि क्या ज्यादा पद और सैलरी वास्तव में मानसिक शांति और निजी जिंदगी की कीमत पर सही है। कर्मचारियों की संतुष्टि में आई बड़ी गिरावट Gallup की State of the Global Workplace 2026 रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में वैश्विक कर्मचारी जुड़ाव (Employee Engagement) घटकर सिर्फ 20 प्रतिशत रह गया। यह 2020 के बाद सबसे निचला स्तर बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार कर्मचारियों में बढ़ती थकान और असंतोष के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 10 ट्रिलियन डॉलर की उत्पादकता का नुकसान हुआ। प्रमोशन अब इनाम नहीं, बोझ जैसा क्यों लग रहा? विशेषज्ञों का मानना है कि महामारी के बाद कर्मचारियों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। अब लोग केवल पद और वेतन नहीं, बल्कि मानसिक शांति, लचीलापन और निजी समय को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। Instahyre के को-फाउंडर सरबोजित मलिक के मुताबिक आज के कर्मचारी काम में अर्थ, स्वतंत्रता और संतुलन चाहते हैं। उनका कहना है कि प्रमोशन की खुशी कुछ समय के लिए रहती है, लेकिन उसके साथ आने वाला तनाव लंबे समय तक बना रहता है। डिजिटल वर्क कल्चर ने बढ़ाया दबाव वर्क फ्रॉम होम और डिजिटल कार्य संस्कृति के बाद कर्मचारियों पर “हमेशा उपलब्ध रहने” का दबाव काफी बढ़ गया है। सीनियर पदों पर देर रात कॉल, लगातार ईमेल और निजी जीवन में काम का दखल आम हो गया है। Biz Staffing Comrade Pvt Ltd के मैनेजिंग पार्टनर पुनीत अरोड़ा के अनुसार आज प्रमोशन का मतलब कई लोगों के लिए ज्यादा काम और कम निजी समय बन गया है। उन्होंने बताया कि कई कर्मचारी अब मानसिक स्वास्थ्य और परिवार के समय को प्राथमिकता देते हुए नेतृत्व वाली भूमिकाएं तक ठुकरा रहे हैं। कंपनियों को बदलनी होगी सोच? विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियों को करियर ग्रोथ की पारंपरिक सोच बदलनी होगी। केवल लंबे घंटे काम करने और लगातार उपलब्ध रहने को सफलता मानना अब कर्मचारियों को स्वीकार नहीं है। अब कर्मचारी ऐसे प्रमोशन चाहते हैं जिनमें– बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान लचीलापन सपोर्टिव कार्य संस्कृति वास्तविक नेतृत्व स्वतंत्रता जैसी सुविधाएं भी शामिल हों। भविष्य में कैसी होगी करियर ग्रोथ? कॉर्पोरेट दुनिया में अब सफलता की परिभाषा बदल रही है। कर्मचारी अब सिर्फ बड़ी सैलरी नहीं, बल्कि बेहतर जीवन गुणवत्ता भी चाहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में वही कंपनियां सफल होंगी जो कर्मचारियों को केवल पद नहीं, बल्कि संतुलित और स्वस्थ कार्य वातावरण भी देंगी। अब सवाल यह नहीं रह गया कि लोग आगे बढ़ना चाहते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या करियर ग्रोथ बिना थकान और मानसिक दबाव के संभव है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।