नई दिल्ली/कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में कथित अंदरूनी असंतोष और नेताओं के रुख को लेकर राजनीतिक चर्चाएं लगातार तेज होती जा रही हैं। इसी बीच जादवपुर से सांसद सायोनी घोष का नाम भी उन नेताओं में शामिल किया जा रहा है, जिनके बारे में विभिन्न राजनीतिक दावे किए जा रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई एक बैठक के बाद राजनीतिक अटकलों को और बल मिला है। बैठक में क्या चर्चा हुई और उसमें शामिल नेताओं ने किस तरह का फैसला लिया, इसे लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। दिल्ली बैठक पर बढ़ी चर्चा राजनीतिक सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि बैठक में पश्चिम बंगाल की मौजूदा राजनीतिक स्थिति और कुछ सांसदों की भावी रणनीति पर चर्चा हुई। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित नेताओं की ओर से भी कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। सायोनी घोष का नाम सामने आने के बाद बंगाल की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। वह लंबे समय से टीएमसी की प्रमुख युवा चेहरों में गिनी जाती रही हैं और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुकी हैं। सांसदों को लेकर अलग-अलग दावे राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कुछ सांसदों के एक अलग समूह के रूप में सामने आने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। इस संबंध में न तो किसी संसदीय प्राधिकरण की ओर से कोई पुष्टि हुई है और न ही संबंधित सांसदों ने सार्वजनिक रूप से कोई औपचारिक घोषणा की है। टीएमसी की ओर से नहीं आया आधिकारिक बयान इन सभी दावों और अटकलों के बीच तृणमूल कांग्रेस की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया और सांसदों के रुख से स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल दिल्ली में हुई कथित बैठक और उससे जुड़ी चर्चाओं ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है।
नई दिल्ली: INDIA गठबंधन की समन्वय समिति की बैठक के दौरान सोमवार को एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी देखने को मिली। इस दौरान ममता बनर्जी भावुक भी नजर आईं। दिल्ली में विपक्षी नेताओं की मुलाकात बनी चर्चा का विषय INDIA गठबंधन की बैठक में शामिल होने पहुंचीं ममता बनर्जी का सोनिया गांधी ने स्वागत किया। दोनों नेताओं के बीच कुछ समय तक बातचीत हुई और मुलाकात की तस्वीरें तेजी से चर्चा में आ गईं। राजनीतिक जानकार इसे विपक्षी दलों के बीच बढ़ते संवाद का संकेत मान रहे हैं। तीन दशक पुराने रिश्तों की फिर हुई चर्चा कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते भारतीय राजनीति के सबसे दिलचस्प अध्यायों में से एक रहे हैं। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। इसके बाद दोनों दलों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा का दौर लगातार चलता रहा। बंगाल की राजनीति में कई बार आमने-सामने आए दोनों दल पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी कई चुनावों में प्रतिद्वंद्वी रही हैं। राज्य की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के उभार के साथ कांग्रेस का प्रभाव सीमित होता गया। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर दोनों दल कई मौकों पर एक साथ भी नजर आए हैं। 2024 के चुनाव के बाद बढ़ी थी राजनीतिक दूरी लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच मतभेद खुलकर सामने आए थे। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था, जिसके बाद कांग्रेस और टीएमसी के रिश्तों में तनाव की चर्चा तेज हो गई थी। INDIA गठबंधन को मजबूत करने पर हुई बातचीत सूत्रों के अनुसार बैठक के दौरान विपक्षी एकजुटता और भविष्य की राजनीतिक रणनीति पर भी चर्चा हुई। विपक्षी दल आगामी चुनावों को देखते हुए साझा मुद्दों पर साथ आने की कोशिश कर रहे हैं। 10 जनपथ पर फिर हुई अहम मुलाकात बैठक के अगले दिन ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से उनके आवास 10 जनपथ पर भी मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच हुई इस बातचीत को विपक्षी राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। टीएमसी की चुनौतियों के बीच बढ़ी राजनीतिक सक्रियता हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस को संगठनात्मक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में ममता बनर्जी की विपक्षी नेताओं के साथ लगातार बैठकें राजनीतिक रूप से अहम मानी जा रही हैं। विपक्षी राजनीति में नए संकेत दे रही है यह मुलाकात विश्लेषकों का मानना है कि सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की यह मुलाकात केवल शिष्टाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय और संवाद की संभावनाओं को भी दर्शाती है। आने वाले समय में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति में देखने को मिल सकता है।
तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष K. Annamalai के राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलों का दौर तेज हो गया है। राज्य की राजनीति में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या अन्नामलाई भाजपा में बने रहेंगे या कोई नया राजनीतिक रास्ता चुनेंगे। इन अटकलों के बीच वह सोमवार को दिल्ली पहुंचे, जहां उनकी मंगलवार को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष Nitin Nabin से मुलाकात होनी है। सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में पार्टी में उनकी भविष्य की भूमिका और तमिलनाडु की राजनीतिक रणनीति पर चर्चा हो सकती है। भाजपा की ओर से अब तक किसी बड़े बदलाव की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। कोयंबटूर में लगे पोस्टरों ने बढ़ाई सियासी हलचल अन्नामलाई के जन्मदिन से पहले कोयंबटूर में उनके समर्थकों द्वारा लगाए गए पोस्टरों ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी है। पोस्टरों पर "हमारे नेता, आइए और हमारा नेतृत्व कीजिए" जैसे संदेश लिखे गए हैं, जिसके बाद उनके नए राजनीतिक मंच बनाने की संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई। इन पोस्टरों को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, अन्नामलाई ने अभी तक इस पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की है। 'दो दिन इंतजार कीजिए', अन्नामलाई का संकेत दिल्ली रवाना होने से पहले अन्नामलाई ने मीडिया के सवालों पर कहा कि लोग दो दिन इंतजार करें। उन्होंने कहा कि जल्द ही वह अपनी स्थिति और आगे की योजना पर खुलकर बात करेंगे। उनके इस बयान ने राजनीतिक अटकलों को और तेज कर दिया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में तमिलनाडु की राजनीति में कोई बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल सकता है। आईपीएस अधिकारी से भाजपा के प्रमुख चेहरे तक का सफर पूर्व आईपीएस अधिकारी अन्नामलाई वर्ष 2020 में भाजपा में शामिल हुए थे। इसके बाद उन्होंने तेजी से पार्टी में अपनी पहचान बनाई और 2021 से 2025 तक तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई राज्यव्यापी अभियानों का नेतृत्व किया और युवाओं के बीच मजबूत समर्थन आधार तैयार किया। सोशल मीडिया पर भी उनकी बड़ी लोकप्रियता रही है। त्रिभाषा नीति पर रुख से बढ़ीं चर्चाएं हाल के दिनों में अन्नामलाई ने कक्षा 9 के छात्रों के लिए लागू की जा रही त्रिभाषा नीति को लेकर अपनी असहमति जताई थी और अधिसूचना वापस लेने की मांग की थी। उनके इस रुख के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या वह पार्टी नेतृत्व से कुछ मुद्दों पर अलग राय रखते हैं। भाजपा नेताओं ने किसी भी तरह के मतभेद की अटकलों को खारिज किया है। नई पार्टी या भाजपा में बड़ी जिम्मेदारी? राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस बात को लेकर अलग-अलग राय है। कुछ का मानना है कि अन्नामलाई भाजपा में ही अधिक महत्वपूर्ण भूमिका की तलाश कर रहे हैं, जबकि कुछ पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि वह भविष्य में अलग राजनीतिक मंच तैयार कर सकते हैं। भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अन्नामलाई पार्टी के महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल हैं और उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। पार्टी नेतृत्व भी किसी संभावित अलगाव की संभावना से इनकार कर रहा है। बैठक पर टिकीं राजनीतिक निगाहें फिलहाल तमिलनाडु की राजनीति की नजरें अन्नामलाई और नितिन नवीन की बैठक पर टिकी हुई हैं। इस मुलाकात के बाद ही साफ हो सकेगा कि अन्नामलाई भाजपा के साथ अपनी राजनीतिक यात्रा जारी रखेंगे या कोई नया राजनीतिक कदम उठाएंगे।
कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस नेतृत्व ने मुख्यमंत्री Siddaramaiah और डिप्टी सीएम D. K. Shivakumar को दिल्ली बुलाया है, जिसके बाद राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं जोर पकड़ने लगी हैं। हालांकि कांग्रेस ने इसे सामान्य राजनीतिक बैठक बताया है, लेकिन पार्टी सूत्रों का दावा है कि अंदरखाने सत्ता परिवर्तन को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है। कांग्रेस ने क्या कहा? कांग्रेस की ओर से कहा गया है कि यह बैठक आगामी राज्यसभा चुनाव और विधान परिषद चुनाव को लेकर रणनीति बनाने के लिए बुलाई गई है। लेकिन दोनों बड़े नेताओं के अचानक दिल्ली पहुंचने से राजनीतिक अटकलों का बाजार गर्म हो गया है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी हाईकमान अब मुख्यमंत्री पद को लेकर लंबे समय से जारी खींचतान को खत्म करना चाहता है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के सामने एक नया फॉर्मूला रख सकता है। सिद्धारमैया को राज्यसभा भेजने की चर्चा पार्टी के अंदर चल रही चर्चाओं के अनुसार, कांग्रेस सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने का प्रस्ताव दे सकती है। इसके बदले उनके बेटे यतींद्र सिद्धारमैया को राज्य कैबिनेट में जगह देने पर भी विचार हो सकता है। इस पूरे मुद्दे पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। खरगे, वेणुगोपाल और सुरजेवाला की क्या भूमिका? सूत्रों के अनुसार कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge, संगठन महासचिव K. C. Venugopal और कर्नाटक प्रभारी Randeep Singh Surjewala नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में बताए जा रहे हैं। पार्टी का मानना है कि अगले विधानसभा चुनाव से पहले संगठन और सरकार दोनों को संतुलित करना जरूरी है। क्या डीके शिवकुमार बनेंगे अगले सीएम? 2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बड़ी जीत के बाद से ही मुख्यमंत्री पद को लेकर अंदरूनी खींचतान की खबरें सामने आती रही हैं। माना जाता है कि सत्ता गठन के समय ढाई-ढाई साल के फार्मूले पर सहमति बनी थी, जिसके तहत बाद में डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता था। शिवकुमार को कांग्रेस का मजबूत संगठनकर्ता और संकटमोचक माना जाता है। चुनावी रणनीति से लेकर पार्टी फंडिंग और विधायकों को एकजुट रखने तक उनकी भूमिका अहम रही है। ऐसे में अब यह चर्चा तेज है कि पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंप सकती है। राज्यसभा चुनाव से जुड़ा है पूरा गणित जून में कर्नाटक की चार राज्यसभा सीटों पर चुनाव होने हैं। इनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सीट भी शामिल है। कांग्रेस को इनमें से तीन सीटें जीतने की उम्मीद है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व सत्ता और संगठन दोनों में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। अब सभी की नजर दिल्ली में होने वाली बैठकों और कांग्रेस हाईकमान के अगले फैसले पर टिकी हुई है। अगर नेतृत्व परिवर्तन होता है तो यह कर्नाटक की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।