धनबाद। धनबाद के सरायढेला थाना क्षेत्र स्थित जगजीवन नगर में शनिवार सुबह एक 24 वर्षीय युवक की हत्या से इलाके में सनसनी फैल गई। मृतक की पहचान करण कुमार राम के रूप में हुई है, जो टोटो (ई-रिक्शा) चलाकर परिवार का भरण-पोषण करता था। घटना के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए तीन लोगों को हिरासत में लिया है और मामले की जांच शुरू कर दी है। मॉर्निंग वॉक के दौरान हुआ हमला परिजनों के अनुसार, करण कुमार राम पिछले कुछ दिनों से पैर में चोट के कारण घर पर ही थे। शनिवार सुबह वह रोजाना की तरह मॉर्निंग वॉक के लिए निकले थे। आरोप है कि इसी दौरान कुछ लोगों ने उन्हें अपने घर के अंदर बुलाया, जहां पुरानी रंजिश के चलते धारदार हथियारों से हमला किया गया। परिजनों का दावा है कि हमलावरों ने चाकू और तलवार से वार करने के साथ उनकी बेरहमी से पिटाई भी की। अस्पताल में डॉक्टरों ने किया मृत घोषित घटना के बाद परिजन गंभीर रूप से घायल करण को शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल लेकर पहुंचे। हालांकि जांच के बाद डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। युवक की मौत की खबर मिलते ही इलाके में शोक और तनाव का माहौल बन गया। तीन लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ सूचना मिलने पर सरायढेला थाना पुलिस मौके पर पहुंची और घटनास्थल का निरीक्षण कर साक्ष्य जुटाए। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। पुलिस ने मामले में तीन लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है और हत्या के कारणों की जांच की जा रही है। पुरानी रंजिश समेत सभी पहलुओं की जांच पुलिस का कहना है कि हत्या के पीछे की असली वजह का पता लगाया जा रहा है। परिजनों द्वारा लगाए गए पुरानी रंजिश के आरोप की भी जांच की जा रही है। थाना प्रभारी मंजीत सिंह ने बताया कि घटनास्थल से मिले साक्ष्यों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और हिरासत में लिए गए लोगों से पूछताछ के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। एहतियात के तौर पर इलाके में पुलिस निगरानी भी बढ़ा दी गई है।
धनबाद। धनबाद की धरती के भीतर दबा 'काला सोना' यानी कोयला, जितना कीमती है, उसके ऊपर का इतिहास उतना ही रक्तरंजित रहा है। कोयले ने यहां की मिट्टी को सिर्फ काला ही नहीं, बल्कि रक्तरंजित भी किया है। 'नोटों की चाहत' और वर्चस्व की ऐसी जंग, जिसने कभी लाठियों के दम पर मजदूरों को हांका, तो कभी अत्याधुनिक बंदूकों से समानांतर सरकार चलाई। आज के संगठित अपराध की जड़ें असल में दशकों पुराने उस 'माफिया कल्चर' में छिपी हैं, जहां कोयला मालिकों के मुखौटे ही यहां के असली कानून बन गए थे। वर्चस्व की जंग और माफिया राज का उदय धनबाद में 1960 के समय लठैतों के दौर से संगठित अपराध तक आज भी कायम है। आज कोयला माफिया सरकार और हुक्मरानों के करीबी बनकर उसी तरह कोयले को लूट कर रहे हैं, जैसे कोल इंडिया के अधीन से पहले कंपनी राज में लूट की जाती थी। तरीका एक ही जैसा है, बस आधुनिक युग में कोयले के लुटेरे अपग्रेड हो गए हैं। मौजूदा समय में धनबाद जिले के बाघमारा, निरसा, झरिया, समेत कई इलाकों के अवैध कोयला उत्खनन के लिए हिट लिस्ट में शामिल हैं। यहां कोयला माफियाओं के खिलाफ खड़े होने वाले लोगों का हश्र बहुत बुरा होता है। फिर चाहे कोई जिला प्रशासन या पुलिस के अधिकारी हो या फिर बीसीसीएल के या सीआईएसफ के जवान या अधिकारी। कोयला माफिया इनपर टूट कर पड़ जाते है। जानलेवा हमला किया जाता है। लेकिन, कोयला माफियाओं का कुछ नहीं होता। हां दिखावे के लिए केस दर्ज किया जाता है, लेकिन किसी की कोई गिरफ्तारी नहीं होती। पुलिस-प्रशासन पर कोयला माफियाओं का हमला 2025 में जून-जुलाई के समय बाघमारा में पुलिस के एक डीएसपी पर कोयला माफियाओं ने हमला कर गंभीर रूप से घायल कर दिया था। इससे पहले सीआईएसफ की एक महिला अधिकारी समेत 8 जवानों को कोयला माफियाओं ने जानलेवा हमला कर घायल कर दिया था। अभी हाल ही में झरिया के बोर्रागढ़ में कोयला माफियाओं ने एक एसआई और उनकी पत्नी के साथ बीच सड़क पर मारपीट की। इतना ही नहीं पुलिस अधिकारी की पत्नी के साथ बदसलूकी की गई। पीड़ित महिला इंसाफ के लिए अपने ही डिपार्टमेंट के लोगों पास हाथ जोड़ती रही, लेकिन हुआ बस वही जो वर्षों से होता रहा है बस खानापूर्ति। यह एक उदाहरण है। ऐसी कई घटनाएं है जो धनबाद में लगभग हर दिन घटती है। 1960 के दशक की तरह ही दबदबा बनाए रखने की कोशिश अब सवाल उठता है कि धनबाद में कोयला माफिया इतने बेखौफ क्यों है? कहां से इन्हें इतनी शक्ति मिलती है, जो किसी को भी अपना निशाना बना देते है। इन्हें कानून का डर क्यों नहीं है। बीते मंगलवार को देर रात भी गिरिडीह जिले में बेखौफ कोयला चोरों ने सीसीएल के सुरक्षा गार्ड पर हमला किया। हमले में एक व्यक्ति की मौत की सूचना है, जबकि कई लोग घायल हैं। कोयला माफियाओं का यह तरीका भी ठीक उसी तरह का है, जैसे धनबाद के कोयला माफियाओं का अब तक रहा है। कोयला माफियाओं के इस दबंग प्रवृति और हिंसक मानसिकता को समझने के लिए धनबाद के पिछले 60 सालों के इतिहास को खंगाला होगा। इसमें जो सच्चाई निकल कर आती है, वह बिल्कुल हैरान करने वाली है। कोयले में वर्चस्व और अवैध कारोबार की कहानी आज से 60 साल पहले ही लिखी गई है। आज का आपराधिक इतिहास भी ठीक उसी तरह चल रहा है जैसे 1960 के दशक में था। रातोरात नहीं खड़ा हुआ माफिया साम्रज्य 1960 के समय यूपी और बिहार में एक कहावत खूब मशहूर थी कि यहां नोट हवा में उड़ते हैं, बस पकड़ने की अक्ल होनी चाहिए। लेकिन, इतिहास गवाह है कि इन उड़ते नोटों को पकड़ने की चाहत ने इस पूरे क्षेत्र को अपराध और आतंक की ऐसी भट्ठी में झोंक दिया, जिसकी आंच आज भी महसूस की जाती है। कोयले की कालिख से उपजा यह माफिया राज कोई रातों-रात खड़ा हुआ तंत्र नहीं है, बल्कि यह दशकों के शोषण, राजनीतिक शह और वर्चस्व की लड़ाई का परिणाम है। निजी स्वामित्व और 'लठैत संस्कृति' की शुरुआत 1960 के दशक से पहले, जब कोयला खदानें निजी हाथों में थीं, तब अपराध का स्वरूप आज जैसा जटिल नहीं था। उस दौर में खदान मालिक मजदूरों से जबरन काम लेने और उन्हें डराने-धमकाने के लिए 'लठैत' पालते थे। ये लठैत खदान मालिकों के मुख्य हथियार होते थे, जिनका काम उत्पादन बढ़ाना और विरोध के स्वर को दबाना था। इसी दौर ने धनबाद में उस 'बाहुबल' की नींव रखी, जो आगे चलकर संगठित माफिया के रूप में विकसित हुआ। बीपी सिन्हा का दौर और बाहरी अपराधियों का आगमन वह समय बीपी सिन्हा के वर्चस्व का था। प्रशासन से लेकर सरकार तक उनकी तूती बोलती थी। जैसे-जैसे रेल संपर्क बढ़ा और बोकारो-सिंदरी जैसे औद्योगिक केंद्रों की चर्चा फैली, धनबाद अपराधियों के लिए 'एल डोराडो' यानी सोने की लंका बन गया। बिहार और उत्तर प्रदेश के शातिर अपराधी नाम बदलकर यहां की कोलियरियों में मजदूर बनकर रहने लगे। धनबाद के पुराने लोगों के अनुसार उस समय कोयला माफियाओं के पाले अपराधी स्थानीय गुंडों के साथ मिलकर वारदात को अंजाम देते और फिर वापस अपने राज्यों में सुरक्षित छिप जाते थे। 1960 से 1972 के बीच अपराध का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ा, उसने धनबाद की सामाजिक संरचना को बदलकर रख दिया। कोयला माफियाओं के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले दर्जनों लोगों की हत्याएं हुई। कई लोगों के शव जलते कोयले के बॉयलर में झोंक दिये गये, तो कई लोगों को खदान के अंदर ही दफन कर दिया गया। जिस फिर कोई नहीं ढूंढ पाया। राष्ट्रीयकरण: जब मजदूर संघ बने अपराध के 'अड्डे'.... कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण (1971-73) के बाद उम्मीद थी कि स्थितियां बदलेंगी, लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। राष्ट्रीयकरण के बाद मजदूर संगठनों की बाढ़ आ गई। जल्द ही इन संगठनों का अपराधीकरण शुरू हो गया और यहीं से 'समानांतर सरकार' चलने की परंपरा शुरू हुई। रात के सन्नाटे में पत्थर मारकर दरवाजे तोड़ने वाले डकैत अब सूट-बूट पहनकर ठेकेदारी और रंगदारी के बड़े खेल में शामिल हो गए। सिन्हा बनाम सिंह: वर्चस्व का वह रक्तरंजित अध्याय धनबाद का इतिहास बीपी सिन्हा और सूर्यदेव सिंह के बीच की तनातनी के बिना अधूरा है। कभी सिन्हा के समर्थक रहे सूर्यदेव सिंह ने जब अपनी अलग राह चुनी, तो कोयलांचल ने वह दौर देखा जहां गोलियां बात करती थीं। फौज की नौकरी छोड़कर आए लोग माफिया समूहों में भर्ती होने लगे और अत्याधुनिक हथियारों ने लाठियों की जगह ले ली। बीपी सिन्हा की हत्या ने इस वर्चस्व की जंग में अंतिम मुहर लगा दी। उनकी मौत के बाद सूर्यदेव सिंह का उदय हुआ और धनबाद में 'किंगमेकर' की भूमिका में एक नया नेतृत्व उभरा, जिसने राजनीति और अपराध के गठजोड़ को नई ऊंचाइयां दीं। जो आज भी कायम है। विरासत के इस बोझ से छुटकारा मुश्कल आज भी धनबाद का कोयलांचल उसी रक्तरंजित विरासत का बोझ ढो रहा है। अपहरण, रंगदारी और वर्चस्व की यह लड़ाई पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही है। कोयलांचल में अपराध की जड़ें इतनी गहरी हैं, क्योंकि इनके पीछे 'नोटों की वह चाहत' है जो कभी खत्म नहीं होती। जब तक कोयले के वैध-अवैध कारोबार में पारदर्शिता नहीं आएगी और राजनीतिक संरक्षण का खात्मा नहीं होगा, तब तक धनबाद की हवाओं में बारूद की गंध और कोयले की कालिख बरकरार रहेगी।
धनबाद। कोयलांचल के कुख्यात और लंबे समय से फरार चल रहे अपराधी प्रिंस खान और उसके गुर्गों के खिलाफ धनबाद पुलिस ने अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। शनिवार, 11 अप्रैल 2026 को पुलिस की टीम ने वासेपुर क्षेत्र में बड़ी दबिश दी। अदालत से प्राप्त आदेश के आलोक में पुलिस ने प्रिंस खान और उसके करीबी सहयोगी गोपी खान के घर पर सार्वजनिक उद्घोषणा (इश्तेहार) चस्पा की है। यह कदम अपराधियों को आत्मसमर्पण करने का अंतिम अवसर देने और उसके बाद उनकी संपत्तियों की कुर्की-जब्ती करने की कानूनी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अदालती आदेश के बाद वासेपुर में पुलिस की बड़ी कार्रवाई धनबाद के वासेपुर स्थित कमरमखदूमी रोड पर शनिवार को पुलिस की हलचल काफी तेज रही। बैंक मोड़ थाना की पुलिस टीम ने भारी सुरक्षा के बीच प्रिंस खान और गोपी खान के आवासों को चिन्हित कर वहां नोटिस चिपकाया। बैंक मोड़ थाना के एएसआई सुनील कुमार रवि ने इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए बताया कि ये दोनों आरोपी कई गंभीर आपराधिक मामलों में वांछित हैं और लगातार पुलिस की पकड़ से बाहर चल रहे हैं। इश्तेहार चस्पा होने के बाद अब पुलिस जल्द ही अदालत से कुर्की-जब्ती का वारंट प्राप्त कर इनकी संपत्तियों को कुर्क करने की दिशा में आगे बढ़ेगी। रंगदारी और आर्म्स एक्ट के दर्जनों मामलों में है तलाश प्रिंस खान पर धनबाद के विभिन्न थानों में रंगदारी, हत्या का प्रयास और आर्म्स एक्ट जैसे संगीन अपराधों के दर्जनों मुकदमे दर्ज हैं। एएसआई सुनील कुमार रवि के अनुसार, विशेष रूप से बैंक मोड़ थाना कांड संख्या 175/2023 और 277/2023 के तहत दोनों आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस लंबे समय से छापेमारी कर रही है। पुलिस का मानना है कि इस कानूनी प्रक्रिया से फरार चल रहे अपराधियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनेगा। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित अवधि के भीतर आरोपी न्यायालय या पुलिस के समक्ष उपस्थित नहीं होते हैं, तो उनके घरों की ईंट से ईंट बजा दी जाएगी। एसएसपी की दोटूक: अपराधियों की धमकियों से न डरें व्यवसायी इस बड़ी कार्रवाई से एक दिन पहले, शुक्रवार को एसएसपी प्रभात कुमार ने जिले की कानून-व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण मासिक अपराध समीक्षा बैठक की थी। इस बैठक में पुलिस कप्तान ने अधिकारियों को लंबित मामलों के त्वरित निष्पादन और संगठित अपराध के खात्मे के सख्त निर्देश दिए। मीडिया से बातचीत में एसएसपी ने जिले के व्यवसायियों और आम नागरिकों को आश्वस्त किया कि किसी भी अपराधी द्वारा मोबाइल या इंटरनेट के माध्यम से दी जाने वाली धमकियों से घबराने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि पुलिस हर धमकी को गंभीरता से ले रही है और अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुँचाने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है। केंद्रीय एजेंसियों के साथ समन्वय और भविष्य की रणनीति प्रिंस खान के विदेश में छिपे होने की आशंकाओं के बीच, धनबाद पुलिस अब केंद्रीय जांच एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रही है। एसएसपी प्रभात कुमार ने बताया कि प्रिंस खान से जुड़े नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए उच्चस्तरीय रणनीति तैयार की गई है। पुलिस न केवल जमीनी स्तर पर कार्रवाई कर रही है, बल्कि तकनीकी सर्विलांस और अंतरराज्यीय समन्वय के माध्यम से भी अपराधियों पर शिकंजा कस रही है। जिले में भय का माहौल पैदा करने वाले संगठित सिंडिकेट के खिलाफ पुलिस पहले से अधिक आक्रामक और त्वरित कार्रवाई करने की योजना पर काम कर रही है, ताकि कोयलांचल में शांति व्यवस्था बनी रहे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।