मनामा: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार को बहरीन की राजधानी मनामा में बहरीन के शाह हमद बिन ईसा अल खलीफा से मुलाकात कर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शुभकामनाएं एवं संदेश सौंपा। इस दौरान दोनों पक्षों ने भारत-बहरीन संबंधों को और मजबूत बनाने, क्षेत्रीय सुरक्षा और पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा की। जयशंकर की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब हाल के सप्ताहों में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव के दौरान बहरीन भी मिसाइल और ड्रोन हमलों की चपेट में आया था। शाह हमद से मुलाकात, भारतीय समुदाय का जताया आभार विदेश मंत्री जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी देते हुए कहा कि उन्हें बहरीन के शाह हमद बिन ईसा अल खलीफा और युवराज एवं प्रधानमंत्री सलमान बिन हमद अल खलीफा से मुलाकात कर खुशी हुई। उन्होंने बताया कि उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शुभकामनाएं पहुंचाईं और बहरीन में रह रहे भारतीय समुदाय की सुरक्षा एवं कल्याण सुनिश्चित करने के लिए शाह का आभार व्यक्त किया। जयशंकर ने कहा कि भारत, बहरीन के नेतृत्व द्वारा दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को दिए जा रहे निरंतर सहयोग और मार्गदर्शन को अत्यंत महत्व देता है। बहरीन के विदेश मंत्री से भी हुई अहम बैठक जयशंकर ने बहरीन के विदेश मंत्री डॉ. अब्दुल्लतीफ बिन राशिद अल जयानी से भी मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा, रक्षा सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। विदेश मंत्री ने बताया कि दोनों देशों ने द्विपक्षीय सहयोग को नई गति देने के साथ-साथ पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते हालात पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया। खाड़ी देशों के दौरे पर हैं जयशंकर विदेश मंत्री एस. जयशंकर 5 से 10 जुलाई तक खाड़ी क्षेत्र के चार देशों के दौरे पर हैं। इस यात्रा में कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान शामिल हैं। इस दौरे का उद्देश्य भारत और खाड़ी देशों के बीच आर्थिक, ऊर्जा, निवेश, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग को और मजबूत करना है। कतर में भी हुई थी अहम बैठक बहरीन पहुंचने से पहले जयशंकर ने कतर का दौरा किया था, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल-थानी से मुलाकात की। दोनों नेताओं ने ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। क्यों अहम है यह दौरा? जयशंकर की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव के बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। हालिया संघर्ष के दौरान बहरीन पर ईरान की ओर से मिसाइल और ड्रोन हमले भी हुए थे। इसके अलावा कतर और ओमान अमेरिका-ईरान के बीच संभावित अप्रत्यक्ष वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे समय में भारत का खाड़ी देशों के साथ लगातार उच्चस्तरीय संवाद क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और भारतीय नागरिकों के हितों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आगे का कार्यक्रम खाड़ी देशों का दौरा पूरा करने के बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर 13 जुलाई को न्यूयॉर्क पहुंचेंगे, जहां वह 2028-29 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए भारत के अभियान की शुरुआत करेंगे। इसके बाद 14-15 जुलाई को वह ब्रसेल्स में आयोजित भारत-यूरोपीय संघ व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद की बैठक में भाग लेंगे।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान रोहित शर्मा को देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित दूसरे नागरिक अलंकरण समारोह में उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया। यह सम्मान भारतीय क्रिकेट में उनके असाधारण योगदान और शानदार उपलब्धियों के लिए दिया गया। राष्ट्रपति भवन में हुआ सम्मान समारोह नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विभिन्न क्षेत्रों की कई हस्तियों को पद्म पुरस्कार प्रदान किए। खेल जगत से रोहित शर्मा को भारतीय क्रिकेट में उनके उत्कृष्ट योगदान और देश का नाम विश्व स्तर पर रोशन करने के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। भारतीय क्रिकेट में रोहित शर्मा का योगदान रोहित शर्मा ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाए हैं। वह एकदिवसीय क्रिकेट में 264 रन की विश्व रिकॉर्ड व्यक्तिगत पारी खेलने वाले दुनिया के एकमात्र बल्लेबाज हैं। उनकी कप्तानी में भारत ने टी-20 विश्व कप 2024 और चैंपियंस ट्रॉफी 2025 का खिताब भी अपने नाम किया, जिससे भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। बीसीसीआई ने दी बधाई भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने सोशल मीडिया पर रोहित शर्मा को पद्मश्री मिलने पर बधाई दी। बोर्ड ने इसे भारतीय क्रिकेट के लिए गर्व का क्षण बताया। समारोह की तस्वीरें और वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। क्रिकेट जगत ने जताई खुशी रोहित शर्मा को पद्मश्री मिलने के बाद कई पूर्व और वर्तमान क्रिकेटरों ने उन्हें शुभकामनाएं दीं। प्रशंसकों ने भी सोशल मीडिया पर उन्हें बधाई देते हुए इसे भारतीय क्रिकेट के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। करियर में जुड़ा एक और बड़ा सम्मान पद्मश्री सम्मान मिलने के साथ ही रोहित शर्मा के शानदार क्रिकेट करियर में एक और बड़ी उपलब्धि जुड़ गई है। मैदान पर अपने रिकॉर्ड, शानदार बल्लेबाजी और सफल कप्तानी से करोड़ों प्रशंसकों का दिल जीतने वाले रोहित शर्मा अब देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक के प्राप्तकर्ता भी बन गए हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की। यह बैठक ऐसे समय हुई है जब राष्ट्रीय राजधानी में केंद्रीय मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल और विस्तार को लेकर चर्चाएं तेज हैं। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की मुलाकात को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राष्ट्रपति भवन ने साझा की मुलाकात की तस्वीरें राष्ट्रपति कार्यालय ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मुर्मू की मुलाकात की तस्वीरें साझा कीं। राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी पोस्ट में कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से शिष्टाचार मुलाकात की। बैठक के एजेंडे को लेकर आधिकारिक तौर पर कोई जानकारी साझा नहीं की गई है, लेकिन इसके समय को देखते हुए राजनीतिक हलकों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चाओं को मिली हवा यह मुलाकात पद्म पुरस्कार समारोह के तुरंत बाद हुई, जिससे इसकी राजनीतिक अहमियत और बढ़ गई है। पिछले कुछ दिनों से केंद्र सरकार में संभावित मंत्रिमंडल फेरबदल, विभागों के पुनर्वितरण और नए चेहरों को मौका दिए जाने को लेकर चर्चाएं जारी हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की बैठक ने इन अटकलों को और बल दिया है। जॉर्ज कुरियन ने दिया मंत्रिपद से इस्तीफा इस बीच, केरल के वरिष्ठ भाजपा नेता जॉर्ज कुरियन ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है। उनका राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र सौंपा था। कुरियन अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के साथ-साथ मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में कार्यरत थे। राष्ट्रपति ने स्वीकार किया इस्तीफा राष्ट्रपति भवन द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। उनके इस्तीफे के बाद मंत्रिमंडल में रिक्त हुए पद और संभावित फेरबदल को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं। जल्द हो सकता है बड़ा फैसला राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार आगामी राजनीतिक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए मंत्रिमंडल में बदलाव कर सकती है। सरकार की ओर से अभी तक किसी फेरबदल या विस्तार को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन घटनाक्रम पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
मुंबई, एजेंसियां। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के प्रेरणादायी जीवन पर जल्द ही एक डॉक्यूमेंट्री बनाई जाएगी। इस परियोजना का निर्माण आमिर खान प्रोडक्शंस कर रहा है। डॉक्यूमेंट्री में राष्ट्रपति मुर्मू के ओडिशा के एक छोटे से गांव से देश की पहली आदिवासी और दूसरी महिला राष्ट्रपति बनने तक के संघर्ष, चुनौतियों और उपलब्धियों को विस्तार से प्रस्तुत किया जाएगा। स्वाति चक्रवर्ती भटकल करेंगी निर्देशन इस डॉक्यूमेंट्री का निर्देशन फिल्म निर्माता और लेखिका स्वाति चक्रवर्ती भटकल करेंगी। इससे पहले वह आमिर खान और किरण राव द्वारा निर्मित चर्चित डॉक्यूमेंट्री एंथोलॉजी 'रूबरू रोशनी' का निर्देशन कर चुकी हैं। माना जा रहा है कि नई डॉक्यूमेंट्री राष्ट्रपति मुर्मू के सार्वजनिक जीवन के साथ-साथ उनके निजी संघर्षों और प्रेरणादायी सफर को भी करीब से दिखाएगी। गांव में हुई शूटिंग, आदिवासी जीवन की मिलेगी झलक रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्यूमेंट्री की शूटिंग राष्ट्रपति मुर्मू के पैतृक गांव में भी की गई है। इससे दर्शकों को उनके शुरुआती जीवन, आदिवासी संस्कृति और सामाजिक परिवेश को समझने का अवसर मिलेगा। फिल्म में उनके जीवन के उन पहलुओं को भी शामिल किया जाएगा, जिन्होंने उन्हें विपरीत परिस्थितियों से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचाया। आमिर खान के आगामी प्रोजेक्ट्स भी चर्चा में आमिर खान इन दिनों अभिनय के साथ-साथ अपने प्रोडक्शन हाउस के जरिए कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। उनकी पिछली प्रोडक्शन फिल्म 'एक दिन' बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी। वहीं अब वह सनी देओल और प्रीति जिंटा अभिनीत फिल्म 'बंटवारा 1947' को रिलीज करने की तैयारी में हैं। हाल ही में इस फिल्म का पोस्टर और टीजर जारी किया गया, जिसे दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। इसके अलावा आमिर खान ने हाल में अपनी चर्चित फिल्म 'लगान' के 25 वर्ष पूरे होने पर पूरी स्टारकास्ट के साथ इसका जश्न भी मनाया।
Droupadi Murmu अगले महीने तीन दिवसीय दौरे पर Uttarakhand जाएंगी। इस दौरान वह देहरादून स्थित Indian Military Academy की पासिंग आउट परेड में शामिल होंगी और Kedarnath Temple में पूजा-अर्चना भी करेंगी। 12 जून को देहरादून पहुंचेंगी राष्ट्रपति राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 12 जून को देहरादून पहुंचेंगी। यहां वह राजपुर रोड स्थित राष्ट्रपति आशियाना में ठहरेंगी और विभिन्न गणमान्य लोगों से मुलाकात करेंगी। IMA परेड की लेंगी सलामी 13 जून को राष्ट्रपति भारतीय सैन्य अकादमी में आयोजित पासिंग आउट परेड में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी। इस दौरान वह परेड की सलामी लेंगी। यह पहला मौका होगा जब राष्ट्रपति मुर्मू IMA की पासिंग आउट परेड की सलामी लेंगी। यह समारोह सैन्य अधिकारियों के लिए बेहद खास और गौरवपूर्ण माना जाता है। 14 जून को केदारनाथ धाम जाएंगी राष्ट्रपति 14 जून को केदारनाथ धाम पहुंचकर बाबा केदार के दर्शन करेंगी और पूजा-अर्चना करेंगी। दर्शन के बाद वह दोपहर में हवाई मार्ग से नई दिल्ली रवाना हो जाएंगी। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी राष्ट्रपति के दौरे को लेकर प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं। मुख्य सचिव Anand Bardhan की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक कर सुरक्षा और प्रोटोकॉल की समीक्षा की गई है। देहरादून से लेकर केदारनाथ तक पूरे दौरे के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाएंगे। प्रशासन राष्ट्रपति के दौरे को पूरी तरह सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने में जुटा हुआ है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। जेडीयू नेता Harivansh Narayan Singh को उनके कार्यकाल के अंतिम दिन बड़ा राजनीतिक तोहफा मिला है। राज्यसभा सदस्य के रूप में उनकी विदाई तय मानी जा रही थी, लेकिन Droupadi Murmu ने उन्हें राष्ट्रपति कोटे से मनोनीत कर दिया। इस फैसले के साथ ही हरिवंश का तीसरा कार्यकाल सुनिश्चित हो गया है। रंजन गोगोई की सीट पर मनोनयन राष्ट्रपति द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, हरिवंश को राज्यसभा में उस सीट पर नामित किया गया है जो पूर्व मुख्य न्यायाधीश Ranjan Gogoi के सेवानिवृत्त होने के बाद खाली हुई थी। इस मनोनयन के साथ अब हरिवंश अगले छह वर्षों तक उच्च सदन के सदस्य बने रहेंगे। आखिरी दिन बदली सियासी तस्वीर दरअसल, जेडीयू की ओर से इस बार हरिवंश को राज्यसभा के लिए नामित नहीं किया गया था, जिससे उनकी विदाई लगभग तय मानी जा रही थी। लेकिन कार्यकाल समाप्त होने के दिन ही राष्ट्रपति के इस फैसले ने सियासी समीकरण बदल दिए। यह कदम उनके अनुभव और संसदीय योगदान को देखते हुए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संविधान के तहत मिला अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति को राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार है। ये सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाले होते हैं। मनोनीत सदस्यों का कार्यकाल छह वर्षों का होता है। पत्रकार से संसद तक का सफर 69 वर्षीय हरिवंश एक वरिष्ठ पत्रकार भी रह चुके हैं और उन्होंने अपने करियर में राजनीति और पत्रकारिता दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वे पहली बार 2014 में राज्यसभा पहुंचे थे और बाद में उपसभापति के पद पर भी रहे। अब तीसरे कार्यकाल के साथ उनका संसदीय सफर और लंबा हो गया है।
Harivansh Nomination: राज्यसभा के निवर्तमान उपसभापति हरिवंश को एक बार फिर उच्च सदन का सदस्य बनाया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें मनोनीत किया है। क्यों हुआ मनोनयन? हरिवंश का कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो गया था उन्हें उस सीट पर नामित किया गया है, जो पूर्व CJI रंजन गोगोई के रिटायर होने के बाद खाली हुई थी संवैधानिक प्रावधान यह मनोनयन संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत किया गया राष्ट्रपति को राज्यसभा में नॉमिनेटेड सदस्य नियुक्त करने का अधिकार होता है हरिवंश का प्रोफाइल बिहार से दो बार राज्यसभा सांसद रह चुके राज्यसभा के उपसभापति के रूप में भी कार्य कर चुके संसदीय कार्यों में लंबा अनुभव
पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए प्रोटोकॉल विवाद के बीच एक नया घटनाक्रम सामने आया है। राष्ट्रपति कार्यालय ने Droupadi Murmu से मुलाकात के लिए All India Trinamool Congress (TMC) के प्रतिनिधिमंडल के अनुरोध को फिलहाल अस्वीकार कर दिया है। सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति सचिवालय ने इसके पीछे समय की कमी का कारण बताया है। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अगले सप्ताह के लिए नया समय मांगा है। 12 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल से मिलने का किया गया था अनुरोध सूत्रों के मुताबिक, TMC के एक वरिष्ठ नेता ने सोमवार को राष्ट्रपति को पत्र लिखकर 12 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ मुलाकात का समय मांगा था। इस बैठक का उद्देश्य राज्य सरकार द्वारा आदिवासी समुदायों के लिए चल रही कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी राष्ट्रपति को देना था। पार्टी के भीतर इसे राष्ट्रपति और राज्य सरकार के बीच बढ़ते तनाव को कम करने की पहल के रूप में भी देखा जा रहा था। कैसे शुरू हुआ था प्रोटोकॉल विवाद दरअसल, यह विवाद पिछले सप्ताह सिलीगुड़ी में आयोजित एक आदिवासी सम्मेलन के दौरान सामने आया था। राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने Bagdogra Airport पर अपने स्वागत के समय मुख्यमंत्री या किसी मंत्री की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए थे। इसके अलावा कार्यक्रम स्थल में बदलाव को लेकर भी उन्होंने नाराजगी जताई थी। अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा था कि आदिवासी समुदायों तक केंद्र सरकार की कई योजनाएं शायद पूरी तरह नहीं पहुंच रही हैं। ममता बनर्जी की तीखी प्रतिक्रिया राष्ट्रपति की टिप्पणियों पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इन बयानों को “राजनीतिक” बताते हुए कहा कि ऐसे बयान राष्ट्रपति पद की गरिमा के अनुरूप नहीं हैं, खासकर तब जब राज्य में अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ममता बनर्जी ने यह भी सवाल उठाया कि मतदाता सूची में संशोधन के दौरान कई आदिवासियों के नाम हटाए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। PM मोदी ने बताया ‘शर्मनाक’ इस पूरे विवाद पर प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कथित प्रोटोकॉल उल्लंघन को “शर्मनाक” बताते हुए कहा कि लोकतंत्र और आदिवासी समुदाय के सम्मान में विश्वास रखने वाले लोगों को इससे निराशा हुई है। प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति, जो स्वयं आदिवासी समुदाय से आती हैं, उनकी पीड़ा और निराशा बेहद दुखद है। बंगाल सरकार ने आरोपों को किया खारिज वहीं, पश्चिम बंगाल सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जिस कार्यक्रम में राष्ट्रपति शामिल हुईं, वह निजी तौर पर आयोजित था और उसमें मुख्यमंत्री की उपस्थिति अनिवार्य नहीं थी। राज्य सरकार का कहना है कि जिला प्रशासन की ओर से किसी भी तरह का प्रोटोकॉल उल्लंघन नहीं हुआ है और इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।
पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति के हालिया दौरे को लेकर उठे ‘प्रोटोकॉल उल्लंघन’ के विवाद ने केंद्र और राज्य सरकार के बीच एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक बहस को जन्म दे दिया है। राष्ट्रपति Droupadi Murmu के सिलीगुड़ी दौरे के दौरान मुख्यमंत्री और राज्य के शीर्ष अधिकारियों की अनुपस्थिति को लेकर उठे सवालों के बीच अब बंगाल सरकार ने अपनी ओर से विस्तृत स्पष्टीकरण केंद्र सरकार को भेज दिया है। सूत्रों के अनुसार, राज्य की मुख्य सचिव Nandini Chakravorty ने सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्रालय को एक विस्तृत और गोपनीय रिपोर्ट भेजी है। इस रिपोर्ट में उन परिस्थितियों और प्रशासनिक कारणों का विस्तार से उल्लेख किया गया है, जिनकी वजह से राष्ट्रपति के स्वागत के समय मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और कुछ वरिष्ठ अधिकारी कार्यक्रम स्थल पर मौजूद नहीं थे। क्या है पूरा विवाद दरअसल, 7 मार्च को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल सरकार से इस मामले में जवाब तलब किया था। आरोप लगाया गया था कि राष्ट्रपति Droupadi Murmu के राज्य दौरे के दौरान मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) जैसे शीर्ष अधिकारी कार्यक्रम में उपस्थित नहीं थे। केंद्र ने इसे राष्ट्रपति से जुड़े प्रोटोकॉल के महत्वपूर्ण नियमों का उल्लंघन माना है। इन नियमों को ‘ब्लू बुक’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पदों के दौरे के दौरान सुरक्षा और औपचारिक व्यवस्थाओं के लिए सख्त दिशानिर्देश तय किए गए हैं। रिपोर्ट में क्या कहा गया राज्य सरकार की ओर से भेजी गई रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सफाई दी गई है। सबसे पहले मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की अनुपस्थिति के कारणों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ प्रशासनिक और कार्यक्रम संबंधी परिस्थितियों के चलते मुख्यमंत्री उस समय कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बन सकीं। इसके अलावा राष्ट्रपति के दौरे के दौरान आयोजित ‘अंतरराष्ट्रीय आदिवासी और संथाल सम्मेलन’ के कार्यक्रम स्थल में अचानक किए गए बदलाव के पीछे के प्रशासनिक और सुरक्षा कारणों का भी विस्तृत विवरण रिपोर्ट में दिया गया है। राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, दौरे से जुड़े हर प्रशासनिक फैसले का रिकॉर्ड रखा गया था और संबंधित दस्तावेज भी केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी गई रिपोर्ट के साथ संलग्न किए गए हैं। ‘ब्लू बुक’ के नियम और संवैधानिक गरिमा भारत में राष्ट्रपति से जुड़े कार्यक्रमों के लिए ‘ब्लू बुक’ एक अत्यंत गोपनीय दस्तावेज माना जाता है। इसमें यह स्पष्ट रूप से तय किया गया है कि जब भी राष्ट्रपति किसी राज्य के दौरे पर पहुंचते हैं, तो राज्य के मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति स्वागत के दौरान अनिवार्य होती है। सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और इसे संभावित ‘प्रोटोकॉल उल्लंघन’ के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि पश्चिम बंगाल सरकार का कहना है कि उस समय लिए गए सभी फैसले प्रशासनिक बाध्यताओं और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किए गए थे। पहले भी हो चुके हैं ऐसे विवाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में केंद्र और राज्य सरकार के बीच प्रोटोकॉल को लेकर टकराव का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई घटनाओं ने दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ाया है। मई 2021 में चक्रवात ‘यास’ के बाद Narendra Modi की अध्यक्षता में आयोजित समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के देरी से पहुंचने और रिपोर्ट सौंपकर लौट जाने को लेकर भी बड़ा विवाद हुआ था। इसके बाद तत्कालीन मुख्य सचिव Alapan Bandyopadhyay को केंद्र सरकार ने दिल्ली तलब किया था, जिससे केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक टकराव की स्थिति बन गई थी। इसी तरह, पूर्व राज्यपाल Jagdeep Dhankhar के कार्यकाल के दौरान भी राजभवन और राज्य सरकार के बीच कई बार विश्वविद्यालयों और सरकारी कार्यक्रमों में प्रोटोकॉल को लेकर विवाद सामने आए थे। फिलहाल राष्ट्रपति के दौरे से जुड़ा यह मामला भी राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब सबकी नजर केंद्र सरकार की अगली प्रतिक्रिया और संभावित कार्रवाई पर टिकी हुई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।