रांची। झारखंड के विश्वविद्यालयों में इन दिनों क्लस्टर सिस्टम सबसे बड़ा विवाद बन गया है। नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत लागू इस व्यवस्था को लेकर सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन इसे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में अहम कदम बता रहे हैं, जबकि छात्र संगठन इसे छात्रों के भविष्य और शिक्षा तक आसान पहुंच के लिए बड़ा खतरा मान रहे हैं। राज्य के कई विश्वविद्यालयों में इस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन, धरना और तालाबंदी जारी है। क्या है क्लस्टर सिस्टम? क्लस्टर सिस्टम के तहत एक ही विश्वविद्यालय से संबद्ध कई कॉलेजों को एक समूह (क्लस्टर) में बांटा गया है। अब हर कॉलेज में सभी विषयों की पढ़ाई नहीं होगी। किसी कॉलेज को विज्ञान, किसी को कला और किसी को वाणिज्य का केंद्र बनाया गया है। यदि किसी छात्र का पसंदीदा विषय उसके कॉलेज में उपलब्ध नहीं है तो उसे उसी क्लस्टर के दूसरे कॉलेज में जाकर पढ़ाई करनी होगी। सरकार क्यों कर रही है लागू? उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग का कहना है कि कई कॉलेज वर्षों से शिक्षकों की कमी, प्रयोगशालाओं के सीमित उपयोग और संसाधनों के असमान वितरण जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। क्लस्टर सिस्टम के जरिए विषय विशेषज्ञ शिक्षकों, प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों का बेहतर उपयोग होगा तथा कॉलेजों को विषयवार उत्कृष्ट केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकेगा। सरकार के दावे सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था से शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर होगी, शिक्षकों की कमी दूर होगी, संसाधनों का प्रभावी उपयोग होगा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों को लागू करने में मदद मिलेगी। इससे छात्रों को बेहतर शैक्षणिक माहौल मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। छात्र क्यों कर रहे हैं विरोध? छात्र संगठनों का कहना है कि झारखंड की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों में यह व्यवस्था व्यावहारिक नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को अपने विषय की पढ़ाई के लिए दूसरे कॉलेज तक रोजाना लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी, जिससे समय और आर्थिक बोझ दोनों बढ़ेंगे। छात्राओं ने सुरक्षा और परिवहन सुविधाओं की कमी को भी बड़ी चिंता बताया है। सीटों में कटौती से बढ़ी मुश्किल क्लस्टर सिस्टम लागू होने के साथ कई विश्वविद्यालयों में विषयवार सीटों का पुनर्निर्धारण किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में 10 से 40 प्रतिशत तक सीटें घटने का दावा किया जा रहा है, जिससे छात्रों के लिए मनचाहे विषय और कॉलेज में प्रवेश पाना और कठिन हो गया है। डीएसपीएमयू में सबसे ज्यादा विरोध डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (DSPMU) में इस व्यवस्था का सबसे अधिक विरोध देखने को मिल रहा है। यहां कॉमर्स की सीटें 540 से घटाकर 240 और बीबीए की सीटें 700 से घटाकर 180 कर दी गई हैं। वहीं जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के कई विषयों में भी सीटों में उल्लेखनीय कमी की बात सामने आई है, जिसके विरोध में छात्र लगातार आंदोलन कर रहे हैं। दूसरे विश्वविद्यालयों में भी असर रांची विश्वविद्यालय के अलावा बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय, सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, कोल्हान विश्वविद्यालय, विनोबा भावे विश्वविद्यालय और नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय में भी क्लस्टर मॉडल लागू किया जा रहा है। कई कॉलेजों में विषयों का पुनर्गठन होने से छात्रों को दूसरे कॉलेजों में जाकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। विशेषज्ञों ने सुझाया समाधान पूर्व कुलपति प्रो. एस.एन. मुंडा का मानना है कि सरकार और छात्रों के बीच संवाद जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि दूसरे कॉलेज जाने वाले छात्रों के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से पढ़ाई की सुविधा दी जाए, विषय विशेषज्ञों को रोटेशन के आधार पर विभिन्न कॉलेजों में भेजा जाए तथा अधिक मांग वाले विषयों में अतिरिक्त बैच और सीटें बढ़ाई जाएं। विवाद के समाधान पर टिकी नजर शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि क्लस्टर सिस्टम का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाना है, लेकिन इसके सफल क्रियान्वयन के लिए परिवहन, छात्रावास, छात्रवृत्ति और पर्याप्त सीटों जैसी मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। फिलहाल सरकार और छात्र संगठनों के बीच सहमति नहीं बनने से विरोध जारी है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए बड़ा विषय बना रह सकता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने नीट पेपर लीक विवाद और छात्र आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। डिंपल यादव ने छात्रों के समर्थन में आवाज उठाते हुए कहा कि परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। वह हाल ही में CJP के 'संसद चलो' मार्च में शामिल हुई थीं, जहां उन्होंने पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया। संसद से जंतर-मंतर तक मार्च में हुईं शामिल डिंपल यादव ने समाजवादी पार्टी के अन्य सांसदों के साथ संसद परिसर से जंतर-मंतर तक पैदल मार्च किया था। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने नीट पेपर लीक और परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाई। डिंपल यादव ने छात्रों की मांगों को गंभीरता से लेने और सरकार से संवाद के जरिए समाधान निकालने की अपील की। सोनम वांगचुक मामले पर भी उठाए सवाल इससे पहले डिंपल यादव ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाने की दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए थे। उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन करते हुए कहा था कि लोकतंत्र में लोगों की आवाज सुनना जरूरी है। सपा में बढ़ रही है डिंपल यादव की सक्रिय भूमिका राजनीतिक रूप से डिंपल यादव की सक्रियता पिछले कुछ समय में बढ़ी है। वह समाजवादी पार्टी की प्रमुख महिला चेहरों में शामिल हैं और वर्तमान में मैनपुरी लोकसभा सीट से सांसद हैं। संसद में भी वह शिक्षा, महिला मुद्दों और सामाजिक विषयों पर अपनी बात रखती रही हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। नीट समेत प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मुद्दे को लेकर देशभर में छात्रों का विरोध प्रदर्शन जारी है। छात्र संगठन परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कदम और दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। दिल्ली समेत कई राज्यों में छात्रों ने प्रदर्शन कर सरकार से शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार की मांग उठाई है। छात्रों की प्रमुख मांगें- पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था और सख्त कानून प्रदर्शन कर रहे छात्रों का कहना है कि पेपर लीक जैसी घटनाओं से लाखों मेहनती अभ्यर्थियों का भविष्य प्रभावित होता है। छात्र संगठनों ने मांग की है कि परीक्षा कराने वाली एजेंसियों की जवाबदेही तय की जाए, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। इसके अलावा परीक्षा प्रक्रिया में तकनीकी और प्रशासनिक सुधार लागू करने की मांग भी की जा रही है। सरकार ने संवाद और सुधारों का दिया भरोसा छात्र आंदोलन के बीच केंद्र सरकार ने कहा है कि युवाओं के हितों और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कदम उठाने और नए कानून की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही है। सरकार ने फास्ट-ट्रैक अदालतों के जरिए ऐसे मामलों में तेजी से कार्रवाई की बात भी कही है। केंद्र और छात्र प्रतिनिधियों के बीच बातचीत पर नजर प्रदर्शन के बीच केंद्र सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच बातचीत की कोशिश भी जारी है। दोनों पक्षों के बीच होने वाली वार्ता से उम्मीद है कि परीक्षा सुधार, छात्रों की शिकायतों और आंदोलन को लेकर कोई समाधान निकल सकता है। हालांकि छात्र संगठन अपनी मांगों पर कायम हैं और ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर जारी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन के बीच केंद्र सरकार ने बातचीत के लिए आगे आने की अपील की है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने दावा किया कि सरकार प्रदर्शनकारी संगठन के प्रतिनिधियों को चार बार औपचारिक बातचीत का प्रस्ताव भेज चुकी है और किसी भी समय, किसी भी स्थान पर चर्चा के लिए तैयार है। हालांकि, सरकार के अनुसार CJP नेतृत्व ने अब तक इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार इस मुद्दे को प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बना रही है। उन्होंने बताया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और वह स्वयं प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि बैठक जेपी नड्डा के कार्यालय, उनके आवास या प्रदर्शनकारियों की सुविधा के अनुसार किसी भी स्थान पर आयोजित की जा सकती है। उनका कहना है कि सरकार छात्रों के हित में सभी मुद्दों पर संवाद के जरिए समाधान निकालना चाहती है। वर्तमान विवाद पेपर लीक के मामलों, परीक्षा प्रणाली में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर है। आंदोलन में शामिल युवा शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव की मांग कर रहे हैं। इस बीच, 25 दिनों से अनशन पर बैठे शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने संकेत दिया है कि यदि आंदोलन में शामिल युवाओं पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाते हैं, तो वह प्रदर्शनकारियों से आंदोलन स्थगित कर सरकार से बातचीत शुरू करने की अपील करेंगे। उधर, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि सरकार ने पेपर लीक के मामलों में समय पर कार्रवाई की है। उनके अनुसार आरोपियों की गिरफ्तारी, दोबारा परीक्षा का आयोजन और समय पर परिणाम घोषित कर छात्रों के शैक्षणिक हितों की रक्षा की गई। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार इस मुद्दे पर सक्रिय है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। फिलहाल, सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच गतिरोध बरकरार है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या बातचीत की पहल से इस विवाद का कोई समाधान निकल पाएगा।
देशभर में NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था को लेकर जारी छात्र आंदोलनों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि पेपर लीक के मामलों की त्वरित सुनवाई और दोषियों को जल्द सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए जाएंगे। प्रमुख बातें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक मामलों पर पहली बड़ी प्रतिक्रिया दी। दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का ऐलान। कहा- "युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।" संबंधित विभागों और अधिकारियों को जरूरी कार्रवाई के निर्देश। देशभर में NEET पेपर लीक को लेकर छात्र आंदोलन जारी। प्रदर्शनकारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। पीएम मोदी ने क्या कहा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा, "हमारे युवाओं के कल्याण और भविष्य से बढ़कर कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।" उन्होंने बताया कि सरकार ने संबंधित विभागों और अधिकारियों को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं, ताकि पेपर लीक जैसे मामलों में दोषियों को जल्द सजा मिल सके। फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का फैसला प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार पेपर लीक मामलों की तेजी से सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करेगी। उनका कहना है कि इससे दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई में तेजी आएगी और छात्रों का शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होगा। छात्र आंदोलन के बीच आया बयान प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब NEET पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं को लेकर देश के कई हिस्सों में छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर सहित विभिन्न शहरों में प्रदर्शन जारी हैं। प्रदर्शनकारी परीक्षा प्रणाली में सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। सरकार की प्राथमिकता युवाओं का भविष्य प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार लगातार विद्यार्थियों के हितों की रक्षा के लिए फैसले ले रही है। उन्होंने दोहराया कि शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना सरकार की प्राथमिकता है और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाएगी। विपक्ष और आंदोलनकारी क्या मांग रहे हैं? NEET पेपर लीक विवाद के बाद विपक्ष और छात्र संगठनों ने सरकार से दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार और जवाबदेही तय करने की मांग की है। इसी बीच प्रधानमंत्री का यह बयान पूरे विवाद पर सरकार की पहली बड़ी सार्वजनिक प्रतिक्रिया माना जा रहा है।
NEET पेपर लीक मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने सरकार के प्रस्ताव को अपर्याप्त बताते हुए अपनी मांगों पर कायम रहने का ऐलान किया है। CJP ने कहा कि उनकी प्राथमिक मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है। साथ ही प्रधानमंत्री से छात्रों से सार्वजनिक माफी मांगने और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार करने की भी मांग की गई है। प्रमुख बातें PM मोदी ने पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने का ऐलान किया। CJP ने कहा- "फास्ट-ट्रैक कोर्ट नहीं, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा चाहिए।" संगठन ने प्रधानमंत्री से छात्रों से सार्वजनिक माफी मांगने की मांग की। जंतर-मंतर पर CJP का आंदोलन लगातार जारी। सरकार और CJP दोनों ने बातचीत की इच्छा जताई। PM के ऐलान पर CJP की प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया पोस्ट के तुरंत बाद CJP ने अपने आधिकारिक X हैंडल पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि केवल फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने से छात्रों की मांगें पूरी नहीं होंगी। संगठन ने कहा कि सरकार को सबसे पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना चाहिए। CJP ने अपने पोस्ट में लिखा कि सरकार को भ्रष्ट परीक्षा व्यवस्था में सुधार करना चाहिए और छात्रों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। "युवाओं की आवाज सुनी जाए" CJP ने अपने पोस्ट में कहा, "सबसे पहले युवाओं की मांग स्वीकार कीजिए। हमें धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा चाहिए। भ्रष्ट सिस्टम को सुधारा जाए और सभी छात्रों से माफी मांगी जाए। ये आपके देश के युवा हैं, जो अपने भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं।" संगठन ने प्रधानमंत्री के पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराई। जंतर-मंतर पर जारी है प्रदर्शन NEET पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं के विरोध में CJP का धरना जंतर-मंतर पर लगातार जारी है। प्रदर्शनकारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार, जवाबदेही तय करने और परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाने की मांग कर रहे हैं। बातचीत के लिए तैयार दोनों पक्ष छात्र आंदोलन के बीच केंद्र सरकार ने बातचीत की इच्छा जताई है। वहीं CJP नेताओं अभिजीत दीपके और सौरभ दास ने भी कहा है कि वे वार्ता के लिए तैयार हैं। हालांकि, उनका कहना है कि सरकार का प्रतिनिधि जंतर-मंतर या किसी तटस्थ स्थान पर आकर बातचीत करे। सरकार की ओर से क्या कहा गया? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को कहा कि पेपर लीक के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और उन्हें जल्द सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित किए जाएंगे। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी सोशल मीडिया पर छात्रों के हितों की रक्षा और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात दोहराई।
दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अस्पताल से जारी एक नए संदेश में कहा है कि वे अपना लंबा भूख हड़ताल समाप्त करने के लिए तैयार हैं, लेकिन इसके लिए केंद्र सरकार को उनकी तीन शर्तों पर सकारात्मक कदम उठाने होंगे। वांगचुक का कहना है कि उनकी मांगें शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और लोकतांत्रिक संवाद से जुड़ी हैं। पहली शर्त: शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही सोनम वांगचुक ने कहा कि यदि केंद्र सरकार शिक्षा व्यवस्था में सामने आई गड़बड़ियों, विशेष रूप से कथित परीक्षा पेपर लीक मामलों की जिम्मेदारी स्वीकार करे और दोषियों की जवाबदेही तय करे, तो वह अपना अनशन समाप्त करने पर विचार करेंगे। दूसरी शर्त: संसद तक जाने की अनुमति उन्होंने कहा कि यदि पहली मांग नहीं मानी जाती है, तो उन्हें और उनके साथियों को संसद तक जाने की अनुमति दी जाए, ताकि वे अपनी मांगें सीधे सांसदों और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के सामने रख सकें। वांगचुक ने कहा कि यदि संसद में विभिन्न दलों के सांसद उन्हें भरोसा दिलाते हैं कि उनके मुद्दों को सदन में उठाया जाएगा, तो वे अपना निर्णय बदलने पर विचार कर सकते हैं। तीसरी शर्त: सांसद अस्पताल आकर दें आश्वासन सोनम वांगचुक ने कहा कि यदि स्वास्थ्य कारणों या किसी अन्य वजह से वे संसद नहीं जा पाते हैं, तो विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसद और नेता अस्पताल आकर उन्हें यह भरोसा दें कि उनकी मांगों को संसद में उठाया जाएगा। ऐसी स्थिति में भी वे अपना अनशन समाप्त करने पर विचार करेंगे। अस्पताल में रखने पर भी जताई आपत्ति अपने संदेश में वांगचुक ने यह भी दावा किया कि उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में रखा गया है। उन्होंने इसे "गैरकानूनी हिरासत" बताया और कहा कि वे अब भी अपनी मांगों पर कायम हैं तथा सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं। मानसून सत्र के बीच बढ़ा मुद्दा गौरतलब है कि संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हो रहा है। ऐसे में वांगचुक का यह बयान राजनीतिक और संसदीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। फिलहाल, उनकी मांगों पर केंद्र सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन में पहुंचे आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत बताई। साथ ही, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की सराहना करते हुए उन्हें देश का शिक्षा मंत्री बनाए जाने की वकालत की। "सोनम वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में बदलाव ला सकते हैं" प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए केजरीवाल ने कहा कि सोनम वांगचुक अपने व्यक्तिगत हित के लिए नहीं, बल्कि देश के करोड़ों छात्रों और युवाओं के भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "मैं प्रधानमंत्री और देश के 140 करोड़ नागरिकों से अपील करता हूं कि सोनम वांगचुक को देश का शिक्षा मंत्री बनाया जाना चाहिए।" हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नहीं लगता कि सरकार ऐसा करेगी, क्योंकि उन्हें डर है कि वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव ला सकते हैं। पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली पर उठाए सवाल अरविंद केजरीवाल ने देश में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक के मामलों पर चिंता जताते हुए कहा कि परीक्षा प्रणाली में गंभीर खामियां हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नीट समेत कई परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं सामने आईं, लेकिन सरकार युवाओं का भरोसा बहाल करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठा सकी। उन्होंने यह भी कहा कि परीक्षा मूल्यांकन प्रणाली में भी गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आई हैं, लेकिन जिम्मेदार लोगों के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं की गई। 2011 के आंदोलन की दिलाई याद अपने संबोधन में केजरीवाल ने वर्ष 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को भी याद किया। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर आकर उन्हें वह समय याद आ गया, जब वे अन्ना हजारे के साथ इसी स्थान पर आंदोलन कर रहे थे। केजरीवाल ने कहा कि उस समय की सरकार ने जनता की आवाज को नजरअंदाज किया था, जिसका राजनीतिक परिणाम उसे कुछ वर्षों बाद भुगतना पड़ा। उन्होंने दावा किया कि यदि मौजूदा सरकार भी छात्रों और युवाओं की मांगों को अनसुना करती रही, तो वर्ष 2029 के आम चुनाव में उसे इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। सरकार से संवाद की अपील अपने भाषण के अंत में केजरीवाल ने केंद्र सरकार से छात्रों और युवाओं की चिंताओं को गंभीरता से सुनने और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर सकारात्मक संवाद करने की अपील की। उन्होंने कहा कि शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाना देश के भविष्य के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
Sonam Wangchuk Story: बॉलीवुड फिल्म 3 Idiots में आमिर खान द्वारा निभाया गया 'रैंचो' का किरदार आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस किरदार की प्रेरणा लद्दाख के प्रसिद्ध इंजीनियर, इनोवेटर और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक से जुड़ी मानी जाती है। शिक्षा व्यवस्था में बदलाव और बच्चों को बेहतर सीखने का अवसर देने के लिए वर्षों से काम कर रहे सोनम वांगचुक इन दिनों एक बार फिर चर्चा में हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रही उनकी भूख हड़ताल ने देशभर का ध्यान शिक्षा प्रणाली, परीक्षा व्यवस्था और जवाबदेही जैसे मुद्दों की ओर आकर्षित किया है। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल परीक्षा पास कराना नहीं, बल्कि बच्चों की प्रतिभा और सोचने की क्षमता को विकसित करना होना चाहिए। 'रैंचो' की प्रेरणा बने सोनम वांगचुक साल 2009 में रिलीज हुई फिल्म 3 Idiots में 'रैंचो' का किरदार पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था को चुनौती देता है और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देता है। माना जाता है कि इस किरदार की प्रेरणा सोनम वांगचुक के जीवन और उनके शिक्षा सुधार के कार्यों से ली गई थी। बताया जाता है कि फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले 2008 में आमिर खान की मुलाकात सोनम वांगचुक से एक सम्मान समारोह में हुई थी, जहां उनके जीवन और शिक्षा सुधार के प्रयासों पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई गई थी। शिक्षा के लिए समर्पित पूरा जीवन लद्दाख के रहने वाले सोनम वांगचुक ने अपना जीवन ऐसे बच्चों के लिए समर्पित किया है जिन्हें पारंपरिक शिक्षा प्रणाली अक्सर पीछे छोड़ देती है। साल 1988 में उन्होंने अपने साथियों के साथ Students' Educational and Cultural Movement of Ladakh (SECMOL) की स्थापना की। इस पहल का उद्देश्य उन छात्रों को नई दिशा देना था जिन्हें पारंपरिक परीक्षा प्रणाली 'असफल' मानती थी। SECMOL ने हजारों छात्रों को आत्मविश्वास, व्यावहारिक शिक्षा और कौशल आधारित सीखने का अवसर दिया। यहां से पढ़े कई छात्र आगे चलकर वैज्ञानिक, इंजीनियर और विभिन्न क्षेत्रों में सफल पेशेवर बने। इंजीनियरिंग से शिक्षा सुधार तक का सफर सोनम वांगचुक ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। छात्र जीवन में उन्होंने लेह का पहला कोचिंग सेंटर शुरू किया, जहां पढ़ाते समय उन्हें महसूस हुआ कि कई प्रतिभाशाली छात्र केवल शिक्षा प्रणाली की कमियों के कारण पीछे रह जाते हैं। यही अनुभव उनके शिक्षा सुधार मिशन की नींव बना। उन्होंने ऐसी शिक्षा प्रणाली की वकालत की जिसमें रटने के बजाय समझ, नवाचार और वास्तविक जीवन से जुड़ी सीख को प्राथमिकता मिले। पर्यावरण संरक्षण में भी निभाई अहम भूमिका शिक्षा के अलावा सोनम वांगचुक पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी अपने नवाचारों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने 'आइस स्तूप' (Ice Stupa) तकनीक विकसित की, जिसके जरिए सर्दियों के पानी को कृत्रिम ग्लेशियर के रूप में संरक्षित कर गर्मियों में सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है। इस मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली है। शिक्षा सुधार की मांग को लेकर भूख हड़ताल इन दिनों सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने कथित परीक्षा गड़बड़ियों और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करते हुए शिक्षा मंत्रालय से ठोस कार्रवाई की अपील की है। उनका कहना है कि देश के छात्रों का भविष्य किसी भी व्यवस्था से बड़ा है और शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। क्यों चर्चा में हैं सोनम वांगचुक? सोनम वांगचुक केवल एक इंजीनियर या इनोवेटर नहीं, बल्कि ऐसे शिक्षा सुधारक हैं जिन्होंने वर्षों से बच्चों की रचनात्मकता, कौशल और व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ावा देने का काम किया है। उनकी पहल ने यह संदेश दिया कि सफलता केवल परीक्षा के अंकों से नहीं, बल्कि सीखने की क्षमता और नवाचार से तय होती है। आज उनका आंदोलन एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, व्यावहारिक और छात्र-केंद्रित बनाने की आवश्यकता है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधारों की घोषणा की है। सरकार ने फैसला किया है कि अब सरकारी स्कूलों की परिचालन (मैनेजिंग) समितियों में राजनीतिक नेताओं को जगह नहीं दी जाएगी। उनकी जगह छात्रों के अभिभावकों को शामिल किया जाएगा। इसके साथ ही राज्य के 81 हजार स्कूलों के बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने और निजी स्कूलों की फीस वृद्धि पर सख्त निगरानी रखने की भी योजना बनाई गई है। शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी राज्य सरकार ने सोमवार को विकास भवन में प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था को लेकर उच्चस्तरीय बैठक की। बैठक में केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार और केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए केंद्र और राज्य सरकार दोनों की इसमें समान जिम्मेदारी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि राज्य को लंबित केंद्रीय अनुदान की राशि अगले सप्ताह तक मिल जाएगी। 81 हजार स्कूलों का होगा कायाकल्प मुख्यमंत्री ने बताया कि 1 अगस्त से राज्य के 81 हजार सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं के विकास का अभियान शुरू किया जाएगा। इसके तहत स्कूलों में- स्वच्छ शौचालय बनाए जाएंगे। आर्सेनिक मुक्त पेयजल की व्यवस्था होगी। छात्राओं के लिए सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनें लगाई जाएंगी। मिड-डे मील की गुणवत्ता और पोषण स्तर में सुधार किया जाएगा। निजी स्कूलों की फीस पर रहेगी नजर सरकार ने निजी स्कूलों और विश्वविद्यालयों द्वारा फीस में लगातार बढ़ोतरी पर भी सख्त रुख अपनाने का संकेत दिया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि जिन निजी शिक्षण संस्थानों को एनओसी (अनापत्ति प्रमाणपत्र) दिया गया है, उनके कामकाज की नियमित समीक्षा होगी। यदि कोई संस्थान निर्धारित नियमों का पालन नहीं करता है तो उसकी मान्यता या एनओसी के नवीनीकरण पर पुनर्विचार किया जाएगा। स्कूल समितियों में अब नहीं होंगे नेता सरकार ने स्कूलों की परिचालन समितियों की संरचना में भी बड़ा बदलाव करने का फैसला लिया है। नई व्यवस्था के तहत- परिचालन समितियों में किसी भी राजनीतिक नेता को शामिल नहीं किया जाएगा। छात्रों के अभिभावकों को समिति में प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। स्कूल के प्रशासक को ही समिति का मुख्य अधिकारी बनाया जाएगा। सरकार का कहना है कि इससे स्कूलों के संचालन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी। नियुक्तियों को लेकर भी सरकार का दावा मुख्यमंत्री ने शिक्षकों की नियुक्ति में हो रही देरी पर कहा कि ओबीसी आरक्षण से जुड़े विवाद को दूर करने के लिए सरकार जल्द ही विधानसभा में नया कानून लाएगी। उन्होंने बताया कि नियुक्ति बोर्ड के नए अध्यक्ष दुष्मंत नरियाल ने सोमवार को पदभार संभाल लिया है और आगे की भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी तरीके से संचालित की जाएगी। सरकार का दावा है कि लंबित नियुक्तियों की प्रक्रिया जल्द तेज होगी।
रांची। झारखंड में 30 जून से शुरू होने जा रहे विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर शिक्षक संगठनों और सरकार के बीच विवाद गहरा गया है। अभियान के तहत बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करेंगे। इस कार्य में बड़ी संख्या में शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति किए जाने पर झारखंड माध्यमिक शिक्षक संघ ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। संघ का कहना है कि पहले से ही शिक्षकों की कमी से जूझ रहे सरकारी विद्यालयों में इस फैसले से छात्रों की पढ़ाई पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। शिक्षक संघ ने सरकार से की पुनर्विचार की मांग संघ के प्रदेश महासचिव गंगा प्रसाद यादव ने कहा कि शिक्षकों का मूल दायित्व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, लेकिन उन्हें लगातार चुनाव, जनगणना और मतदाता पुनरीक्षण जैसे गैर शैक्षणिक कार्यों में लगाया जा रहा है। इससे विशेष रूप से 10वीं और 12वीं के विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि SIR अभियान में शिक्षकों की ड्यूटी लगाने के निर्णय पर पुनर्विचार किया जाए। जिला सचिव संजय यादव ने भी कहा कि जनगणना के बाद अब मतदाता पुनरीक्षण की जिम्मेदारी मिलने से विद्यालयों में नियमित कक्षाएं प्रभावित होंगी और इसका सीधा नुकसान विद्यार्थियों को उठाना पड़ेगा। अधिकारियों ने बताया जरूरी अभियान चुनाव से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। राज्य के करीब 24,520 मतदान केंद्रों पर अभियान सफल बनाने के लिए पर्याप्त मानव संसाधन की आवश्यकता है। जानकारी के अनुसार, लगभग 50 हजार बीएलओ में 7,500 शिक्षक पहले से कार्यरत हैं और आवश्यकता पड़ने पर 25 हजार से अधिक शिक्षकों की सेवाएं ली जा सकती हैं। अधिकारियों का दावा है कि जिन स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, वहां पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए आवश्यक व्यवस्था की जाएगी। 7 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने तक चलने वाले इस अभियान के बीच शिक्षा और चुनावी जिम्मेदारियों के संतुलन को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार शिक्षक संगठनों की मांगों पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था करती है या अपने मौजूदा फैसले पर कायम रहती है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने पहली बार कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में 1975-77 के आपातकाल (Emergency) को शामिल किया है। नई पुस्तक ‘Understanding Society: India and Beyond’ में इसे भारतीय लोकतंत्र के सामने आई सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस बदलाव को स्कूली शिक्षा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। पुस्तक में बताया गया है कि 1970 के दशक की शुरुआत में बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और कुशासन के आरोपों के कारण तत्कालीन सरकार के खिलाफ जन असंतोष बढ़ा था। इसके बाद जून 1975 में देश में आंतरिक अशांति का हवाला देते हुए आपातकाल लागू किया गया। इस दौरान अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई और कई राजनीतिक नेताओं व कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन को प्रमुखता एनसीईआरटी ने आपातकाल विरोधी आंदोलन में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की भूमिका को भी विस्तार से शामिल किया है। पुस्तक के अनुसार, उनके नेतृत्व में बिहार और गुजरात समेत कई राज्यों में छात्रों और नागरिकों ने बड़े पैमाने पर आंदोलन किया। वर्ष 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद हुए आम चुनाव में सत्ता परिवर्तन हुआ, जिसे भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का उदाहरण बताया गया है। लोकतंत्र की चुनौतियों पर भी चर्चा नई पाठ्यपुस्तक में आपातकाल के अलावा फेक न्यूज, गलत सूचना, गरीबी, क्षेत्रवाद, सामाजिक भेदभाव, लैंगिक असमानता और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी चुनौतियों पर भी चर्चा की गई है। साथ ही ‘डेमोक्रेसी एंड यू’ नामक नया खंड जोड़ा गया है, जिससे छात्र लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में अपनी भूमिका को बेहतर ढंग से समझ सकें। लोकतांत्रिक संस्थाओं और मीडिया की भूमिका पर जोर पुस्तक में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताते हुए उसकी जवाबदेही और भूमिका को रेखांकित किया गया है। इसके अलावा 2024 के आम चुनाव, मतदाताओं की भागीदारी, पंचायतों में महिलाओं के आरक्षण और स्थानीय लोकतंत्र के सफल उदाहरणों को भी शामिल किया गया है, ताकि छात्रों को भारतीय लोकतंत्र की व्यापक और व्यावहारिक समझ मिल सके।
नई दिल्ली: परीक्षा में कथित गड़बड़ियों, नीट पेपर लीक और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर जारी आंदोलन दूसरे दिन भी जारी रहा। युवाओं के नेतृत्व में चल रहे इस प्रदर्शन में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने किसानों से भी समर्थन की अपील की और कहा कि छात्रों की लड़ाई अब देशव्यापी जनआंदोलन का रूप ले रही है। अभिजीत दीपके ने कहा कि छात्र हमेशा किसानों के अधिकारों की लड़ाई में उनके साथ खड़े रहे हैं और अब उन्हें भी किसानों की एकजुटता और समर्थन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यह केवल परीक्षा में गड़बड़ी का मुद्दा नहीं, बल्कि देश के युवाओं के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल है। जंतर-मंतर पर रातभर डटे रहे प्रदर्शनकारी शनिवार को सैकड़ों युवा जंतर-मंतर पर एकत्र हुए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। शाम पांच बजे प्रदर्शन की अनुमति समाप्त होने के बाद दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से स्थल खाली करने को कहा, लेकिन अभिजीत दीपके और कई समर्थक रातभर धरने पर डटे रहे। दीपके ने कहा कि जब तक उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने लोगों से जंतर-मंतर पहुंचने की अपील की और नीट पुनर्परीक्षा देने वाले छात्रों से परीक्षा समाप्त होने के बाद आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया। थाली-चम्मच बजाकर किया विरोध प्रदर्शन अभिजीत दीपके के ‘थाली और चम्मच’ लेकर आने के आह्वान पर बड़ी संख्या में युवा प्रदर्शन में शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने चम्मचों से थालियां बजाकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि परीक्षा में कथित अनियमितताओं ने लाखों छात्रों के भविष्य को प्रभावित किया है और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों के लिए मुआवजे की मांग दीपके ने पेपर लीक और प्रवेश परीक्षा रद्द होने के बाद कथित तौर पर आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवजा देने की मांग की। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं ने कई परिवारों को गहरे संकट में डाल दिया है और सरकार को उनकी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। पुलिस से अलग प्रदर्शन स्थल की मांग दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन के लिए दी गई अनुमति शनिवार शाम पांच बजे तक ही थी और प्रदर्शनकारियों को स्थल खाली करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद प्रदर्शन जारी रहा। अभिजीत दीपके ने पुलिस से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने की मांग की। उन्होंने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर पोस्ट कर लोगों को जंतर-मंतर आने से न रोकने की अपील करते हुए कहा कि प्रदर्शनकारी केवल न्याय की मांग कर रहे हैं और किसी तरह की अव्यवस्था नहीं फैला रहे हैं। 'शिक्षा मंत्री इस्तीफा दें, बातचीत के लिए तैयार हैं' रातभर चले धरने के दौरान अभिजीत दीपके लगातार समर्थकों को संबोधित करते रहे और अधिक से अधिक लोगों से आंदोलन में शामिल होने की अपील करते रहे। उन्होंने कहा, "हमारा विरोध पूरी तरह शांतिपूर्ण है। यदि जवाबदेही तय की जाती है और केंद्रीय शिक्षा मंत्री इस्तीफा देते हैं, तो सरकार के साथ बातचीत के रास्ते खुले हैं।" उन्होंने दोहराया कि यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक छात्रों को न्याय नहीं मिल जाता और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की जाती।
बेतिया/पटना, एजेंसियां। बिहार की स्कूली शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी और आधुनिक बनाने की दिशा में शिक्षा विभाग ने एक नई पहल शुरू की है। अब सरकारी स्कूलों के शिक्षक केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि व्हाट्सएप चैनलों के माध्यम से विद्यार्थियों के मार्गदर्शक और मेंटर की भूमिका भी निभाएंगे। विभाग का उद्देश्य बच्चों के सीखने के स्तर में सुधार लाना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना है। सभी शिक्षकों को व्हाट्सएप चैनलों से जुड़ने का निर्देश प्राथमिक शिक्षा निदेशक विक्रम विरकर द्वारा जारी निर्देश के अनुसार प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों के सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं को विभाग द्वारा बनाए गए व्हाट्सएप चैनलों से अनिवार्य रूप से जुड़ना होगा। इन चैनलों के माध्यम से शिक्षक विद्यार्थियों को शैक्षणिक सहायता, मार्गदर्शन और प्रेरणा प्रदान करेंगे। कक्षावार बनाए गए चार अलग-अलग चैनल शिक्षा विभाग ने कक्षा 1 से 8 तक के विद्यार्थियों के लिए चार अलग-अलग व्हाट्सएप चैनल तैयार किए हैं। इनमें फाउंडेशनल स्टेज (कक्षा 1-2), प्रिपरेटरी स्टेज (कक्षा 3-5), मिडिल स्टेज (कक्षा 6-8) तथा कॉम्प्लेक्स रिसोर्स सेंटर के लिए अलग-अलग प्लेटफॉर्म शामिल हैं। जिला और प्रखंड स्तर के शिक्षा पदाधिकारियों, प्रधानाध्यापकों, शिक्षकों और नोडल अधिकारियों को इन चैनलों से जोड़ने की जिम्मेदारी दी गई है। प्रशिक्षण सामग्री और शैक्षणिक संसाधन होंगे उपलब्ध इन डिजिटल चैनलों के माध्यम से शिक्षकों को प्रशिक्षण सामग्री, शैक्षणिक गतिविधियों की जानकारी, विभागीय दिशा-निर्देश और मेंटरिंग से जुड़ी आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी। इससे शिक्षकों को समय पर संसाधन मिलेंगे और वे विद्यार्थियों को बेहतर तरीके से सहयोग कर सकेंगे। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में कदम शिक्षा विभाग का मानना है कि तकनीक के बेहतर उपयोग से विद्यार्थियों के लर्निंग आउटकम में गुणात्मक सुधार लाया जा सकता है। सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को कार्यक्रम की नियमित समीक्षा और शत-प्रतिशत सहभागिता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है। विभाग को उम्मीद है कि यह पहल बच्चों की सीखने की क्षमता बढ़ाने और शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
नई दिल्ली: सोशल मीडिया से शुरू हुई पहल अब सड़क पर उतर चुकी है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन शुरू किया, जिसमें परीक्षा प्रणाली में कथित गड़बड़ियों और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की जा रही है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके सुबह दिल्ली पहुंचे और प्रदर्शन में शामिल हुए। जंतर-मंतर पहुंचने के दौरान उनके हाथ में डॉ. भीमराव अंबेडकर की जीवनी भी देखी गई। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि हाल के वर्षों में विभिन्न परीक्षाओं और मूल्यांकन प्रक्रियाओं में सामने आए विवादों ने छात्रों का भरोसा कमजोर किया है। NEET और CBSE मूल्यांकन विवाद बना प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा प्रदर्शनकारियों ने NEET-UG पेपर लीक मामले और CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम से जुड़े विवादों को प्रमुख मुद्दा बताया है। उनका आरोप है कि इन घटनाओं ने लाखों छात्रों और अभ्यर्थियों को प्रभावित किया है। इसी को लेकर शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही तय करने और शिक्षा मंत्री से इस्तीफा देने की मांग की जा रही है। सोनम वांगचुक भी होंगे आंदोलन में शामिल लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता Sonam Wangchuk ने भी इस प्रदर्शन को समर्थन दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर पहले ही घोषणा की थी कि वह दिल्ली पहुंचकर आंदोलन में शामिल होंगे। वांगचुक का कहना है कि यदि शिक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियां सामने आती हैं, तो जिम्मेदार पदाधिकारियों को जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए। क्या है कॉकरोच जनता पार्टी? कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत सोशल मीडिया पर हुई थी। यह नाम उस टिप्पणी के बाद चर्चा में आया था, जिसमें अदालत की एक सुनवाई के दौरान कुछ लोगों की तुलना "कॉकरोच" से की गई थी। इसके बाद अभिजीत दिपके ने इस नाम से एक सोशल मीडिया अभियान शुरू किया, जो धीरे-धीरे युवाओं और प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थियों के बीच लोकप्रिय हो गया। अब यह अभियान ऑनलाइन दायरे से निकलकर जमीनी विरोध प्रदर्शन का रूप ले चुका है। कौन हैं अभिजीत दिपके? Abhijeet Dipke महाराष्ट्र के रहने वाले हैं और पत्रकारिता की पढ़ाई कर चुके हैं। उन्होंने आगे की शिक्षा के लिए अमेरिका का रुख किया और Boston University से पब्लिक रिलेशन्स में मास्टर डिग्री प्राप्त की। दिपके इससे पहले चुनावी और सोशल मीडिया अभियानों से भी जुड़े रहे हैं। अब वह शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। जंतर-मंतर पर जारी रहेगा विरोध आयोजकों के अनुसार, प्रदर्शन का उद्देश्य केवल एक मंत्री के इस्तीफे की मांग करना नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुधार की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना है। आंदोलन में देश के विभिन्न राज्यों से छात्र, अभ्यर्थी और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं।
कर्नाटक सरकार ने छात्रों में बढ़ती डिजिटल लत और उसके दुष्प्रभावों को देखते हुए 9वीं से 12वीं कक्षा के लिए एक विस्तृत ड्राफ्ट डिजिटल उपयोग नीति जारी की है। इस पॉलिसी में पढ़ाई के अलावा मनोरंजन के लिए रोजाना अधिकतम 1 घंटे का स्क्रीन टाइम तय करने और शाम 7 बजे के बाद इंटरनेट बंद करने जैसी सख्त सिफारिशें की गई हैं। यह पॉलिसी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, कर्नाटक स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी, NIMHANS और शिक्षा विभाग के सहयोग से तैयार की गई है। क्यों लाई गई यह पॉलिसी? सरकार के अनुसार, राज्य में करीब 25% किशोर इंटरनेट की लत का शिकार हो चुका हैं। इसके कारण: नींद में कमी मानसिक तनाव और चिंता पढ़ाई में ध्यान की कमी व्यवहार में बदलाव जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए यह नीति तैयार की गई है, ताकि बच्चों के डिजिटल उपयोग को संतुलित किया जा सके। पॉलिसी के प्रमुख प्रस्ताव ड्राफ्ट में छात्रों के डिजिटल इस्तेमाल को लेकर कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं: पढ़ाई के अलावा मनोरंजन के लिए सिर्फ 1 घंटे का स्क्रीन टाइम शाम 7 बजे के बाद इंटरनेट बंद करने की सिफारिश छात्रों को सोने से कम से कम एक घंटे पहले स्क्रीन से दूर रखना मोबाइल में ‘चाइल्ड प्लान’ लागू करना, जिसमें: सीमित इंटरनेट एक्सेस ऑडियो-ओनली विकल्प तय समय के बाद ऑटोमेटिक इंटरनेट बंद बच्चों की उम्र के अनुसार डिवाइस और ऑपरेटिंग सिस्टम विकसित करने का सुझाव स्कूलों में क्या बदलाव होंगे? नई पॉलिसी के तहत स्कूलों में डिजिटल उपयोग को लेकर बड़े बदलाव प्रस्तावित हैं: डिजिटल वेल-बीइंग और ऑनलाइन सुरक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा छात्रों को साइबर बुलिंग, डेटा प्राइवेसी और जिम्मेदार इंटरनेट उपयोग के बारे में पढ़ाया जाएगा हर स्कूल अपनी डिजिटल उपयोग नीति लागू करेगा डिजिटल डिटॉक्स डे और टेक-फ्री पीरियड शुरू किए जाएंगे छात्रों से संपर्क के लिए WhatsApp की जगह डायरी सिस्टम अपनाने का सुझाव मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष जोर स्कूलों में काउंसलिंग सेवाओं को मजबूत किया जाएगा शिक्षकों को ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि वे डिजिटल लत के संकेत पहचान सकें जरूरत पड़ने पर छात्रों को विशेषज्ञों तक पहुंचाया जाएगा अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका पॉलिसी में अभिभावकों और शिक्षकों की जिम्मेदारी भी तय की गई है: अभिभावकों के लिए: घर में स्क्रीन टाइम सीमित करें नो-फोन जोन (जैसे डाइनिंग टेबल, बेडरूम) बनाएं बच्चों के सामने खुद भी संतुलित डिजिटल उपयोग का उदाहरण पेश करें शिक्षकों के लिए: छात्रों के डिजिटल व्यवहार पर नजर रखें सही मार्गदर्शन और सलाह दें AI के उपयोग पर भी नियंत्रण स्कूलों में AI के इस्तेमाल के लिए गाइडलाइन बनाई जाएगी होमवर्क में AI के उपयोग को नियंत्रित किया जाएगा नकल रोकने के लिए तकनीकी सिस्टम विकसित किए जाएंगे सोशल मीडिया पर पहले ही सख्ती कर्नाटक सरकार इससे पहले 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर रोक लगाने का ऐलान कर चुकी है। इसमें: अकाउंट बनाने से पहले माता-पिता की अनुमति जरूरी उम्र का सत्यापन अनिवार्य डेटा सुरक्षा कानून (DPDP Act 2023) के तहत प्रावधान क्या है व्यापक असर? यह पॉलिसी लागू होने पर: छात्रों के स्क्रीन टाइम में कमी आएगी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होगा पढ़ाई और फोकस बेहतर होगा डिजिटल दुनिया में जिम्मेदार व्यवहार विकसित होगा
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।