Spain Migrant Crisis: स्पेन के उत्तरी अफ्रीकी क्षेत्र स्यूटा (Ceuta) में अवैध प्रवासियों की रिकॉर्ड संख्या में घुसपैठ ने यूरोप की सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। मोरक्को से बड़ी संख्या में लोगों के सीमा पार करने के बाद हालात गंभीर हो गए हैं। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक, पिछले 24 घंटों में करीब 60 हजार प्रवासी स्यूटा में दाखिल हुए हैं। वहीं, इस दौरान सीमा पार करने की कोशिश में 34 लोगों की मौत हो गई है। 60 हजार प्रवासियों के पहुंचने से बिगड़े हालात स्यूटा सरकार के प्रमुख जुआन जीसस विवास ने बताया कि एक दिन के भीतर लगभग 60 हजार लोग इस क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं। गौरतलब है कि स्यूटा की कुल आबादी करीब 83 हजार है, ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में प्रवासियों के पहुंचने से प्रशासनिक व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ गया है। हालांकि, स्पेन के गृह मंत्रालय ने कहा कि लगभग 50 हजार प्रवासी स्यूटा पहुंचे थे, जिनमें से 25 हजार से अधिक लोग बाद में वापस मोरक्को लौट गए। हालात का जायजा लेने पहुंचे प्रधानमंत्री बढ़ते संकट के बीच स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज स्यूटा पहुंचे और स्थानीय अधिकारियों के साथ स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि मानव तस्करी करने वाले गिरोह युवाओं को बेहतर जीवन का झूठा सपना दिखाकर जोखिम भरे रास्तों पर भेज रहे हैं, जिससे कई लोगों की जान चली जाती है। प्रधानमंत्री ने सीमा सुरक्षा मजबूत करने के लिए 400 अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की तैनाती का भी ऐलान किया। समुद्र और बाड़ पार कर पहुंचे प्रवासी स्थानीय प्रशासन के अनुसार, बड़ी संख्या में प्रवासियों ने सीमा की बाड़ पार कर स्पेन में प्रवेश किया, जबकि कई लोग भूमध्य सागर के रास्ते घंटों तैरकर स्यूटा पहुंचे। प्रशासन का कहना है कि सीमा पार करने की कोशिश के दौरान कम से कम 34 लोगों की मौत हुई है। प्रवासियों ने बताई मजबूरी मोरक्को से आए कई युवाओं ने स्थानीय मीडिया से कहा कि बेरोजगारी और आर्थिक संकट के कारण उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि मोरक्को के अधिकारियों ने राजनीतिक दबाव बनाने के लिए सीमा खोल दी, जिससे हजारों लोग स्यूटा की ओर बढ़ गए। यूरोप में बढ़ी राजनीतिक हलचल स्यूटा में हुई इस घटना के बाद यूरोप के कई दक्षिणपंथी और प्रवासन-विरोधी दलों ने खुली सीमा (फ्री मूवमेंट) की नीति पर सवाल उठाए हैं। वहीं, स्पेन में विपक्षी दल भी प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज की प्रवासी नीति की आलोचना कर रहे हैं। पहले भी हो चुकी है ऐसी घटना यह पहली बार नहीं है जब स्यूटा में इस तरह की घुसपैठ हुई हो। साल 2021 में भी केवल दो दिनों के भीतर 10 हजार से अधिक प्रवासी मोरक्को से सीमा पार कर स्यूटा पहुंच गए थे। तब भी स्पेन और मोरक्को के बीच सीमा सुरक्षा और प्रवासन नीति को लेकर तनाव बढ़ गया था। क्यों अहम है स्यूटा? स्यूटा उत्तरी अफ्रीका में स्थित स्पेन का एक स्वायत्त क्षेत्र है, जिसकी सीमा सीधे मोरक्को से लगती है। यूरोप पहुंचने की कोशिश करने वाले अफ्रीकी और अन्य देशों के प्रवासियों के लिए यह सबसे प्रमुख प्रवेश द्वार माना जाता है। ऐसे में यहां होने वाली हर बड़ी घुसपैठ पूरे यूरोप की सुरक्षा और प्रवासन नीति पर असर डालती है।
Berlin Pride Attack: जर्मनी की राजधानी बर्लिन में आयोजित LGBTQ+ प्राइड कार्यक्रम के दौरान शनिवार को एक दर्दनाक हमला हुआ। टियरगार्टन पार्क के पास प्राइड सेलिब्रेशन में शामिल लोगों की भीड़ में एक वैन घुस गई। इस घटना में एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि 16 लोग घायल हुए हैं। कई घायलों की हालत गंभीर बताई जा रही है। घटना के बाद पुलिस ने पूरे कार्यक्रम को बीच में ही रोक दिया और इलाके को खाली करा लिया। भीड़ में घुसी वैन, मची अफरा-तफरी पुलिस के अनुसार, वैन उस स्थान पर घुसी जहां कुछ ही देर पहले प्राइड मार्च गुजरा था। कई लोगों को टक्कर मारने के बाद वाहन एक पेड़ से जा टकराया। हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई और बड़ी संख्या में पुलिस, फायर ब्रिगेड तथा एम्बुलेंस की टीमें पहुंचीं। घायलों को अस्पताल पहुंचाने के लिए राइशस्टैग के पास अस्थायी हेलीकॉप्टर लैंडिंग ज़ोन भी बनाया गया। संदिग्ध की पहचान, गिरफ्तारी की कोशिश जारी बर्लिन पुलिस के प्रवक्ता फ्लोरियन नाथ ने बताया कि संभावित संदिग्धों की तलाश जारी है। बाद में पुलिस ने कहा कि संदिग्ध की पहचान कर ली गई है और उसे पकड़ने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। रॉयटर्स के अनुसार, पुलिस का कहना है कि संदिग्ध का संबंध एक इस्लामिस्ट समूह से होने की आशंका है। हालांकि, जांच अभी जारी है और घटना के मकसद को लेकर आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। जर्मन चांसलर ने क्या कहा? जर्मनी के चांसलर फ़्रेडरिक मर्ज़ ने घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि सरकार हमले की पूरी जांच कराएगी और दोषियों को कानून के अनुसार सख्त सजा दिलाई जाएगी। वहीं, बर्लिन के मेयर काई वेग्नर ने इसे शहर के खुले, लोकतांत्रिक और समावेशी समाज पर हमला बताया। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्राइड समारोह को निशाना बनाना बेहद गंभीर घटना है। यूरोप के सबसे बड़े LGBTQ+ आयोजनों में से एक बर्लिन का यह आयोजन "क्रिस्टोफर स्ट्रीट डे (Christopher Street Day)" के नाम से जाना जाता है और यह यूरोप के सबसे बड़े LGBTQ+ प्राइड आयोजनों में शामिल है। इस वर्ष की थीम थी: "Taking a Stand is Hot" (अपनी बात पर डटे रहना शानदार है) आयोजकों के मुताबिक, यह थीम जर्मनी में LGBTQ+ समुदाय के प्रति बढ़ती नफरत और भेदभाव के खिलाफ एक संदेश देने के लिए चुनी गई थी। पहले भी हुआ था विरोध प्रदर्शन कार्यक्रम से पहले दक्षिणपंथी समूहों ने प्राइड मार्च के विरोध में प्रदर्शन किया था। इस दौरान पुलिस ने विरोध प्रदर्शन में शामिल एक व्यक्ति को हिरासत में भी लिया था। हालांकि, पुलिस ने फिलहाल इस विरोध प्रदर्शन और वैन हमले के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध की पुष्टि नहीं की है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने सेना में बड़ा नेतृत्व परिवर्तन किया है। मौजूदा कमांडर-इन-चीफ जनरल ऑलेक्जेंडर सिर्सकी को हटाकर 46 वर्षीय मेजर जनरल मखाइलो द्रपतई को नया सेना प्रमुख नियुक्त किया गया है। यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब रूस पूर्वी मोर्चे पर लगातार बढ़त बना रहा है और देश के भीतर सरकार को विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है। कौन हैं मखाइलो द्रपतई? मखाइलो द्रपतई यूक्रेन की सेना के अनुभवी अधिकारी माने जाते हैं। वह इससे पहले ज्वाइंट फोर्सेज के कमांडर और डिप्टी चीफ ऑफ जनरल स्टाफ की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उनकी पहचान एक फ्रंटलाइन कमांडर के रूप में रही है। हालांकि, रूस उन्हें अक्सर "फेल्ड कमांडर" कहकर निशाना बनाता रहा है। आलोचकों का कहना है कि उनके नेतृत्व में यूक्रेन को कोई बड़ी रणनीतिक सैन्य सफलता नहीं मिली। रूस के दबाव के बीच बदली रणनीति यूक्रेन इस समय युद्ध के कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। रूस लगातार बढ़त बना रहा है डोनबास क्षेत्र में रूसी सेना आगे बढ़ रही है। सुमी और खारकीव क्षेत्रों में भी रूसी हमले तेज हुए हैं। कई इलाकों में यूक्रेन को रक्षात्मक रणनीति अपनानी पड़ रही है। विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे हालात में जेलेंस्की ने सेना की रणनीति और नेतृत्व दोनों में बदलाव का फैसला लिया है। रक्षा मंत्री हटाने के बाद बढ़ा था विरोध सेना प्रमुख बदलने से पहले जेलेंस्की सरकार ने कैबिनेट में बड़ा फेरबदल किया था। इस दौरान— रक्षा मंत्री मखाइलो फेडोरोव को पद से हटाया गया। प्रधानमंत्री यूलिया स्विरिडेंको समेत कई मंत्रियों को बदला गया। इसके बाद कीव सहित कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए। पूर्व सैनिकों और नागरिक संगठनों ने सरकार के फैसलों पर सवाल उठाए और पारदर्शिता की मांग की। पूर्व रक्षा मंत्री ने उठाए थे गंभीर सवाल पद से हटाए जाने के बाद पूर्व रक्षा मंत्री मखाइलो फेडोरोव ने सेना की स्थिति को लेकर कई गंभीर दावे किए। उन्होंने कहा कि— कई सैन्य ब्रिगेड संरचनात्मक कमजोरियों से जूझ रही हैं। ड्रोन युद्ध को छोड़ अधिकांश मोर्चों पर यूक्रेन को नुकसान उठाना पड़ रहा है। सैनिकों की कमी पूरी करने के लिए जबरन भर्ती की जा रही है। सेना के शीर्ष नेतृत्व के बीच लंबे समय से मतभेद बने हुए थे। युद्ध के दौरान दूसरी बार बदला सेना प्रमुख फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यह दूसरी बार है जब यूक्रेन ने सेना प्रमुख बदला है। 2024: वालैरी ज़ालुझनी की जगह ऑलेक्जेंडर सिर्सकी को नियुक्त किया गया। 2026: सिर्सकी की जगह अब मखाइलो द्रपतई को कमान सौंपी गई। फिलहाल ज़ालुझनी लंदन में यूक्रेन के राजदूत हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर द्रपतई को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि उनके सामने बेहद कठिन चुनौतियां होंगी। 2014 की कार्रवाई को लेकर भी रहे विवादों में मखाइलो द्रपतई पहली बार 2014 में सुर्खियों में आए थे, जब डोनबास के मारियूपोल में विरोध प्रदर्शनों के दौरान उनकी यूनिट तैनात थी। आरोप लगे थे कि प्रदर्शनकारियों के बैरिकेड हटाने के दौरान उनकी अगुवाई में बीएमपी (इन्फेंट्री कॉम्बैट व्हीकल) भीड़ और अवरोधों के ऊपर चढ़ा दिया गया था। इस घटना का वीडियो वर्षों से सोशल मीडिया पर वायरल होता रहा है। हालांकि, इस मामले को लेकर अलग-अलग पक्षों के अलग-अलग दावे रहे हैं। क्या संकेत देता है यह फैसला? यूक्रेन के सैन्य नेतृत्व में यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब देश को युद्ध के मैदान और घरेलू राजनीति—दोनों मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। माना जा रहा है कि जेलेंस्की युवा नेतृत्व के जरिए सेना की रणनीति में बदलाव लाकर रूस के खिलाफ सैन्य अभियान को नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं।
मैड्रिड: स्पेन के दक्षिणी प्रांत अल्मेरिया में लगी भीषण जंगल की आग ने भारी तबाही मचाई है। अब तक 12 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोग झुलस गए हैं और 23 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। राहत एजेंसियों के मुताबिक, आग से बचने के लिए भागने की कोशिश कई लोगों के लिए जानलेवा साबित हुई। घटना का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें आग की भयावहता साफ दिखाई दे रही है। 12 लोगों की मौत, कई अब भी लापता स्पेन के अंदालूसिया क्षेत्र के अधिकारियों के अनुसार, 10 जुलाई तक इस भीषण आग में 12 लोगों की मौत हो चुकी है। आठ लोग गंभीर रूप से झुलस गए हैं, जबकि 23 लोगों की तलाश जारी है। क्षेत्रीय प्रशासन ने बताया कि मृतकों में ब्रिटेन के चार नागरिक भी शामिल हैं। गाड़ियों के अंदर मिले कई शव राहत दलों को कई शव जली हुई कारों के अंदर मिले हैं। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, लोग आग से बचने के लिए इलाके से निकलने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन तेज़ी से फैलती आग ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। 3,200 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र जलकर खाक आग बुझाने के लिए करीब 150 दमकलकर्मी और स्पेन की मिलिट्री डिजास्टर यूनिट के 220 जवान लगातार अभियान चला रहे हैं। अब तक 3,200 हेक्टेयर से अधिक जंगल और कृषि भूमि आग की चपेट में आ चुकी है। कैसे लगी आग? अधिकारियों ने अभी तक आग लगने के कारण की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। हालांकि प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि बिजली के तार से निकली चिंगारी के कारण आग लगी, जिसने तेज हवाओं और भीषण गर्मी के चलते कुछ ही समय में जंगल का बड़ा हिस्सा अपनी चपेट में ले लिया। भागने की कोशिश बनी मौत की वजह अंदालूसिया की आपातकालीन सेवा के प्रमुख एंटोनियो सान्ज़ ने बताया कि अधिकांश लोगों की मौत इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने प्रशासन की सलाह का पालन करने के बजाय खुद सुरक्षित स्थान तक पहुंचने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि कुछ लोग सूखी नदी के रास्ते निकलने लगे, जबकि सात लोगों ने अपनी कार छोड़कर पैदल भागने का प्रयास किया। रास्ता भटकने और तेजी से फैलती आग के कारण वे सुरक्षित स्थान तक नहीं पहुंच सके। भीषण गर्मी से बिगड़े हालात स्पेन इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में है। अत्यधिक तापमान, सूखी वनस्पति और तेज हवाओं के कारण आग तेजी से फैल रही है, जिससे राहत और बचाव कार्य भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। प्रशासन ने आसपास के इलाकों के लोगों से सतर्क रहने, अनावश्यक यात्रा से बचने और आपातकालीन सेवाओं के निर्देशों का पालन करने की अपील की है।
कीव: तुर्की में मंगलवार से शुरू होने वाले NATO शिखर सम्मेलन से ठीक पहले रूस ने यूक्रेन की राजधानी कीव पर बड़ा मिसाइल और ड्रोन हमला किया। सोमवार तड़के हुए इस हमले में बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक कम से कम तीन लोगों की मौत हुई है, जबकि कई इलाकों में आग लगने और भारी नुकसान की खबर है। यह एक सप्ताह से भी कम समय में कीव पर दूसरा बड़ा हमला है। ऐसे समय में यह हमला हुआ है जब NATO समिट में रूस-यूक्रेन युद्ध सबसे प्रमुख मुद्दा रहने की उम्मीद है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इसमें शामिल होने वाले हैं। बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन से किया गया हमला यूक्रेन की वायु सेना के अनुसार, रूस ने राजधानी कीव पर एक साथ बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और ड्रोन दागे। तड़के सुबह शहर में कई तेज धमाकों की आवाजें सुनाई दीं, जबकि हमले से कुछ देर पहले पूरे शहर में एयर रेड सायरन बजने लगे थे। कीव के मेयर विटाली क्लिट्स्को ने बताया कि शहर के कम से कम दो जिलों में मिसाइलों के मलबे गिरने और आग लगने की घटनाएं सामने आई हैं। राहत एवं बचाव दल प्रभावित इलाकों में अभियान चला रहे हैं। जेलेंस्की ने पहले ही दी थी चेतावनी यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने एक दिन पहले ही बड़े रूसी हमले की आशंका जताई थी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा था कि यूक्रेनी खुफिया एजेंसियों को संकेत मिले हैं कि रूस एक और बड़े हमले की तैयारी कर रहा है। जेलेंस्की ने आरोप लगाया कि रूस NATO शिखर सम्मेलन से पहले अधिक से अधिक तबाही मचाकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। उनके मुताबिक यह राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की रणनीति का हिस्सा है। पिछले सप्ताह भी हुआ था घातक हमला यह हमला पिछले गुरुवार को कीव पर हुए बड़े रूसी हमले के कुछ ही दिनों बाद हुआ है। उस हमले में कम से कम 30 लोगों की मौत हुई थी और इसे युद्ध शुरू होने के बाद राजधानी पर सबसे घातक हमलों में से एक माना गया था। लगातार हो रहे हमलों ने राजधानी की सुरक्षा और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। NATO समिट में युद्ध रहेगा मुख्य मुद्दा तुर्की में मंगलवार से शुरू हो रहे NATO शिखर सम्मेलन में रूस-यूक्रेन युद्ध प्रमुख एजेंडा रहेगा। सम्मेलन में सदस्य देशों के नेता यूक्रेन को सैन्य सहायता, यूरोप की सुरक्षा और रूस पर आगे की रणनीति पर चर्चा करेंगे। इस बीच रूस पूर्वी यूक्रेन के डोनेट्स्क क्षेत्र में अपनी सैन्य कार्रवाई तेज कर रहा है। वहीं यूक्रेन भी रूस के भीतर तेल रिफाइनरियों, बंदरगाहों और सैन्य प्रतिष्ठानों पर ड्रोन और मिसाइल हमले बढ़ा रहा है। ट्रंप-पुतिन की हालिया बातचीत भी चर्चा में NATO समिट से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच 4 जुलाई को लगभग 90 मिनट तक फोन पर बातचीत हुई थी। रूसी विदेश मंत्रालय के अनुसार, बातचीत के दौरान ट्रंप ने एक बार फिर यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने के लिए मध्यस्थता की पेशकश की थी। हालांकि, ताजा रूसी हमले के बाद युद्ध को लेकर तनाव और बढ़ गया है तथा NATO देशों की आगे की रणनीति पर दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
पेरिस: दक्षिणी फ्रांस में भीषण गर्मी और लंबे समय से पड़े सूखे के बीच जंगलों में लगी आग ने व्यापक तबाही मचाई है। औडे (Aude) और हेराल्ट (Hérault) क्षेत्रों में भड़की आग अब तक करीब 900 हेक्टेयर वन क्षेत्र को अपनी चपेट में ले चुकी है। आग पर काबू पाने के लिए प्रशासन ने बड़े स्तर पर राहत और बचाव अभियान शुरू किया है। स्थानीय प्रशासन के अनुसार, आग बुझाने के लिए 800 से अधिक दमकलकर्मी, 150 दमकल वाहन और चार वाटर बॉम्बर विमान तैनात किए गए हैं। हवाई और जमीनी स्तर पर लगातार अभियान चलाया जा रहा है ताकि आग को आबादी वाले इलाकों तक पहुंचने से रोका जा सके। 7,000 से अधिक जंगलों में आग की घटनाएं दर्ज फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने बताया कि इस वर्ष गर्मियों की शुरुआत के बाद से देशभर में 7,000 से अधिक जंगलों में आग लगने की घटनाएं दर्ज की गई हैं। इन घटनाओं में अब तक 8,700 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र जलकर खाक हो चुका है। उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ता तापमान, सूखा और तेज हवाएं आग के खतरे को और गंभीर बना रही हैं। आग फैलने से रोकने की कोशिश जारी औडे क्षेत्र के प्रीफेक्ट एलेन बुकेट ने बताया कि दमकल विभाग आग पर जल्द से जल्द नियंत्रण पाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। हालांकि, भूमध्यसागरीय क्षेत्र में चलने वाली तेज हवाओं के कारण आग तेजी से फैलने का खतरा बना हुआ है। पड़ोसी क्षेत्रों में दो अन्य स्थानों पर लगी आग पर नियंत्रण पा लिया गया है, लेकिन प्रभावित इलाकों में कई जगह अब भी धधकती आग चिंता का कारण बनी हुई है। रिजॉर्ट और शिविरों से लोगों को सुरक्षित निकाला गया दक्षिणी फ्रांस में टेट नदी के आसपास जंगल में आग फैलने के बाद एक रिजॉर्ट के निकट स्थित शिविरों को एहतियातन खाली कराया गया। प्रशासन ने क्षेत्र के सभी लाइफगार्ड स्टेशनों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है और लोगों से नदी में तैराकी से बचने की अपील की है। वन्यजीवों पर भी बढ़ा संकट विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों में लगी आग केवल पेड़-पौधों को ही नहीं, बल्कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रही है। आग के कारण बड़ी संख्या में पशु-पक्षियों के जीवन पर खतरा मंडरा रहा है और जैव विविधता प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है। मौसम विभाग ने जारी की चेतावनी फ्रांस के मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में भी बारिश की संभावना बेहद कम है, जबकि तापमान ऊंचा बना रहेगा। ऐसे में भूमध्यसागरीय क्षेत्र की तेज हवाएं जंगल की आग को और अधिक भड़का सकती हैं, जिससे हालात और चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
पेरिस/लंदन: यूरोप इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है। कई देशों में तापमान ने जून महीने के पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। असामान्य हीटवेव के चलते स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ गया है, जबकि कई स्थानों पर स्कूल बंद करने और लोगों को घरों के भीतर रहने की सलाह दी गई है। सोशल मीडिया पर इस बीच ऐसे कई वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें लोग धूप में रखे तवे और पैन पर खाना पकाते दिखाई दे रहे हैं। इन वीडियो की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इनके दावों की सत्यता की पुष्टि नहीं की जा सकती। जून में ही टूटे गर्मी के रिकॉर्ड आमतौर पर यूरोप में सबसे अधिक गर्मी जुलाई के मध्य या महीने के अंत में पड़ती है, लेकिन इस बार जून के अंत में ही कई देशों में तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया। रिपोर्टों के अनुसार: फ्रांस के पश्चिमी हिस्सों में तापमान 39 से 43 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया। ब्रिटेन में जून का सबसे गर्म दिन रिकॉर्ड हुआ, जहां तापमान 36.1 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा। स्पेन, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड के कई हिस्सों में भी जून के पुराने तापमान रिकॉर्ड टूट गए। स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ा दबाव भीषण गर्मी के कारण कई देशों में हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने से स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव देखा जा रहा है। विशेषज्ञों ने बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। WHO ने जताई चिंता World Health Organization के महानिदेशक Tedros Adhanom Ghebreyesus ने कहा कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। उनके अनुसार: यूरोप में तापमान वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ रहा है। करीब 15 करोड़ लोग इस समय भीषण गर्मी से प्रभावित हैं। गर्मी के कारण सैकड़ों लोगों की मौत की खबरें सामने आई हैं। कई स्कूल बंद किए गए हैं और बिजली आपूर्ति पर भी भारी दबाव है। वायरल वीडियो पर क्या है सच्चाई? सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में दावा किया जा रहा है कि तेज धूप में तवे और पैन पर बिना गैस या चूल्हे के खाना पक रहा है। इन वीडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और यह स्पष्ट नहीं है कि इन्हें किन परिस्थितियों में रिकॉर्ड किया गया। इसलिए ऐसे दावों को सत्यापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन पर फिर बढ़ी चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोप में लगातार बढ़ती हीटवेव जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों की ओर संकेत करती है। असामान्य तापमान, लंबे समय तक चलने वाली गर्मी और चरम मौसम की घटनाएं आने वाले वर्षों में और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं।
Denmark Azaan Ban: डेनमार्क सरकार देशभर में मस्जिदों से लाउडस्पीकर के जरिए अजान के प्रसारण पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रही है। सरकार का कहना है कि यह कदम सामाजिक एकीकरण को मजबूत करने और सार्वजनिक जीवन में बढ़ते 'इस्लामीकरण' को लेकर उठाई जा रही चिंताओं के मद्देनजर प्रस्तावित किया जा रहा है। इमिग्रेशन एवं इंटीग्रेशन मंत्री मोर्टेन बॉडस्कोव ने कहा कि डेनमार्क की पहचान स्पष्ट रहनी चाहिए और लोगों को ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए कि वे किसी दूसरे देश के माहौल में रह रहे हैं। देशभर में लागू हो सकता है नया कानून डेनमार्क सरकार मस्जिदों से लाउडस्पीकर के जरिए होने वाली अजान पर रोक लगाने के लिए कानूनी ढांचे की समीक्षा फिर से शुरू करने जा रही है। फिलहाल इस तरह के प्रसारण स्थानीय शोर नियंत्रण नियमों के दायरे में आते हैं, लेकिन सरकार अब पूरे देश के लिए एक समान कानून लाने की तैयारी कर रही है। सरकार का कहना है कि प्रस्ताव का उद्देश्य सार्वजनिक जीवन में समान नियम लागू करना और सामाजिक एकीकरण को मजबूत करना है। मंत्री बोले- डेनमार्क की पहचान बनी रहनी चाहिए इमिग्रेशन एवं इंटीग्रेशन मंत्री मोर्टेन बॉडस्कोव ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर लाउडस्पीकर के जरिए होने वाली धार्मिक घोषणाएं डेनमार्क के सामाजिक वातावरण के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने कहा कि देश के कुछ इलाकों को लेकर लोगों में ऐसी भावना नहीं बननी चाहिए कि वे डेनमार्क में नहीं, बल्कि किसी दूसरे देश के माहौल में रह रहे हैं। मंत्री ने यह भी कहा कि डेनमार्क की छतों पर नमाज की आवाज सुनाई नहीं देनी चाहिए। संसद में पेश होगा प्रस्ताव सरकार संसद में ऐसा प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर लाउडस्पीकर के जरिए अजान या अन्य धार्मिक घोषणाओं के प्रसारण पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान होगा। सरकार के मुताबिक यह धार्मिक अभिव्यक्ति पर रोक लगाने का प्रयास नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक एकीकरण से जुड़ी व्यापक नीति का हिस्सा है। पहले भी उठ चुके हैं ऐसे प्रस्ताव करीब 60 लाख आबादी वाले डेनमार्क में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 5 प्रतिशत है। देश में लगभग 100 मस्जिदें हैं। इससे पहले वर्ष 2020 और 2025 में भी इसी तरह के प्रस्ताव सामने आए थे, लेकिन वे संसद से पारित नहीं हो सके। अब सरकार तीसरी बार इस दिशा में पहल कर रही है। कोपेनहेगन में पहले से लागू हैं नियम राजधानी कोपेनहेगन में शोर नियंत्रण संबंधी नियमों के कारण मस्जिदों को खुले लाउडस्पीकर से अजान प्रसारित करने की अनुमति नहीं है। इसी वजह से शहर की प्रमुख मस्जिदों में बाहरी लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं किया जाता। आव्रजन और धार्मिक नियमों पर पहले भी रही सख्ती प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन के नेतृत्व वाली सरकार यूरोप की सबसे सख्त आव्रजन नीतियों में गिनी जाती है। डेनमार्क ने वर्ष 2018 में सार्वजनिक स्थानों पर पूरे चेहरे को ढकने वाले कपड़ों, जैसे बुर्का और नकाब, पर प्रतिबंध लगाया था। अब सरकार इस प्रतिबंध को स्कूलों और विश्वविद्यालयों तक बढ़ाने पर भी विचार कर रही है। कुरान जलाने की घटनाओं के बाद बदला था कानून वर्ष 2023 में सार्वजनिक रूप से कुरान की प्रतियां जलाने की घटनाओं के बाद कई मुस्लिम देशों ने डेनमार्क की आलोचना की थी। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच सरकार ने धार्मिक ग्रंथों का अपमान करने और उन्हें जलाने पर रोक लगाने वाला कानून लागू किया था। अभी प्रस्ताव पर अंतिम फैसला नहीं फिलहाल लाउडस्पीकर से अजान पर प्रतिबंध का प्रस्ताव विचाराधीन है। सरकार कानूनी समीक्षा कर रही है और किसी भी नए कानून को लागू करने से पहले उसे संसद की मंजूरी लेनी होगी।
सोशल सिक्योरिटी ऑफिस और कोर्ट परिसर में की गोलीबारी ग्रीस की राजधानी एथेंस में मंगलवार को एक 89 वर्षीय बुजुर्ग ने दो अलग-अलग स्थानों पर अंधाधुंध फायरिंग कर सनसनी फैला दी। इस हमले में कम से कम चार लोग घायल हो गए। पुलिस ने आरोपी को बाद में पाट्रा शहर के पास गिरफ्तार कर लिया। सोशल सिक्योरिटी ऑफिस में पहले किया हमला पुलिस के अनुसार, आरोपी सबसे पहले मध्य एथेंस के केरामेकोस इलाके में स्थित राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा कार्यालय पहुंचा। वहां वह चौथी मंजिल पर गया और अचानक शॉटगन निकालकर फायरिंग शुरू कर दी। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, गोली चलाने से पहले उसने एक कर्मचारी से झुकने को कहा। हालांकि गोली दूसरे कर्मचारी के पैर में लगी, जिससे वह घायल हो गया। कोर्ट परिसर में दोबारा बरसाईं गोलियां पहले हमले के बाद आरोपी मौके से फरार हो गया। इसके कुछ समय बाद उसने शहर के एक अन्य हिस्से में स्थित अदालत भवन के बाहर फिर फायरिंग की। इस दौरान कोर्ट की तीन महिला कर्मचारी छर्रे लगने से हल्की घायल हो गईं। एक अन्य महिला कर्मचारी को एहतियातन अस्पताल ले जाया गया, हालांकि उसे कोई शारीरिक चोट नहीं आई। ट्रेंच कोट में छिपाकर लाया था शॉटगन राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा कोष के प्रमुख अलेक्जेंड्रोस वार्वेरिस ने बताया कि आरोपी ने ट्रेंच कोट पहन रखा था, जिसके अंदर उसने शॉटगन छिपाई हुई थी। उन्होंने कहा कि हमलावर किसी विशेष कर्मचारी को निशाना बनाता नहीं दिखा। दस्तावेज फेंककर बताई हमले की वजह ग्रीक सरकारी प्रसारक ERT के अनुसार, आरोपी ने कोर्ट परिसर में कुछ दस्तावेजों से भरे लिफाफे फेंके और दावा किया कि यही उसके हमले की वजह हैं। हालांकि, पुलिस अभी तक हमले के सटीक मकसद की जांच कर रही है। ग्रीस में बंदूक से हिंसा की घटनाएं बेहद कम होती हैं, क्योंकि वहां हथियार रखने के लिए कड़े नियम लागू हैं। ऐसे में इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।