एवियन (फ्रांस): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को फ्रांस के एवियन शहर में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की। करीब 16 महीने बाद दोनों नेताओं की आमने-सामने की यह पहली मुलाकात रही। इस दौरान दोनों नेताओं ने सौहार्दपूर्ण अंदाज में हाथ मिलाया और कुछ देर बातचीत भी की। सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच बुधवार (17 जून) को सम्मेलन से इतर एक द्विपक्षीय बैठक भी प्रस्तावित है, जिसमें व्यापार, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। लगातार आठवीं बार जी7 में भारत की भागीदारी भारत को लगातार आठवीं बार जी7 शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया गया है। इस मंच पर दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के नेता जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक चुनौतियों जैसे अहम मुद्दों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। फ्रांस पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "जी7 शिखर सम्मेलन के लिए एवियन पहुंचा हूं। विश्व नेताओं के साथ महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर चर्चा और विचारों के आदान-प्रदान को लेकर उत्साहित हूं। भारत एक टिकाऊ, समृद्ध और बेहतर भविष्य के लिए सामूहिक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।" कई नेताओं से करेंगे द्विपक्षीय बैठक जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी कई देशों के नेताओं के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें भी करेंगे। इन बैठकों में व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, रक्षा सहयोग और वैश्विक साझेदारी को मजबूत करने पर चर्चा होने की संभावना है। जिनेवा और स्लोवाकिया दौरे के बाद फ्रांस पहुंचे पीएम मोदी फ्रांस पहुंचने से पहले प्रधानमंत्री मोदी जिनेवा में थे, जहां उन्होंने स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति Guy Parmelin से मुलाकात की और द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत बनाने पर चर्चा की। इससे पहले उन्होंने Slovakia का दौरा किया था, जिसे उन्होंने ऐतिहासिक और सार्थक बताते हुए कहा कि इससे दोनों देशों के संबंधों को नई गति मिलेगी। जी7 शिखर सम्मेलन में मोदी-ट्रंप मुलाकात को भारत-अमेरिका संबंधों के लिहाज से अहम माना जा रहा है, क्योंकि दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रयास जारी हैं।
रांची। रांची से बेंगलुरु और हैदराबाद के लिए दो नई ट्रेनें चलेंगी। इसका प्रस्ताव रेलवे बोर्ड को भेज दिया गया है। रेलवे अधिकारियों ने बताया कि बेंगलुरु सेक्शन में चल रहे नॉन-इंटरलॉकिंग कार्य के पूरा होते ही नई ट्रेन के लिए स्लॉट उपलब्ध हो सकता है। यह विकास कार्य लगभग एक माह में पूरा होने की संभावना है। रांची से बेंगलुरु के लिए चलने वाली ट्रेन बरकाकाना-गया-जबलपुर-नागपुर-काजीपेट-धर्मावरम मार्ग से होते हुए बेंगलुरु पहुंचेगी। इस ट्रेन का संचालन सप्ताह में चार दिन (सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार) करने की योजना है। रांची से हैदराबाद के लिए प्रस्तावित ट्रेन का संचालन सप्ताह में चार दिन (सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शनिवार) किया जाएगा। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि अभी दोनों ट्रेनों को स्पेशल ट्रेन के रूप में प्रस्तावित किया गया है और इनके संचालन के अनुभव के आधार पर आगे इन्हें नियमित ट्रेनों में बदला जा सकता है। दक्षिण की ओर जानेवाली ट्रेनों की स्थिति 13351 धनबाद-एलेप्पी- इस माह सभी श्रेणियों में लंबी वेटिंग 12835 हटिया-बेंगलुरु- 21 जुलाई तक सभी श्रेणियों में लंबी वेटिंग 18637 हटिया-बेंगलुरु वीकली सभी श्रेणियों में 25 जुलाई तक वेटिंग 16620 धनबाद-पोदानूर वीकली 22 व 29 जून को रिग्रेट, 27 जुलाई तक वेटिंग 22837 धरती आबा हटिया से एर्नाकुलम वीकली- 27 जुलाई तक वेटिंग बेहतर कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना लक्ष्य इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य झारखंड को दक्षिण भारत के प्रमुख औद्योगिक और शैक्षणिक केंद्रों से बेहतर रेल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना है। रेलवे लगातार प्रयास कर रहा है कि जल्द ही ये ट्रेन सेवा शुरू हो सके, ताकि यात्रियों को लंबी वेटिंग और वैकल्पिक मार्गों की परेशानी से राहत मिल सके।
फिनलैंड की विदेश मंत्री ने भारत का किया बचाव रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। हालांकि इस बार भारत को यूरोप से ही अप्रत्याशित समर्थन मिला है। फिनलैंड की विदेश मंत्री Elina Valtonen ने स्पष्ट कहा कि भारत ने रूस से तेल खरीदते समय पश्चिमी देशों द्वारा तय किए गए प्राइस कैप नियमों का पालन किया है और यही उस व्यवस्था का मूल उद्देश्य भी था। फिनलैंड में आयोजित चर्चित ‘कुल्तारांता टॉक्स’ कार्यक्रम में भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar, फिनलैंड की विदेश मंत्री और यूएई की सहायक विदेश मंत्री Lana Nusseibeh एक पैनल चर्चा में शामिल हुए थे। इसी दौरान वाल्टोनेन ने भारत के पक्ष में अपनी बात रखी। "रूसी तेल खरीदने पर रोक नहीं थी" वाल्टोनेन ने कहा कि जब पश्चिमी देशों ने रूस के तेल पर प्राइस कैप लागू किया था, तब इसका उद्देश्य दुनिया को रूसी तेल खरीदने से रोकना नहीं था। उन्होंने कहा कि वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित न हो और रूस को अत्यधिक मुनाफा न मिले, इसी संतुलन को ध्यान में रखकर यह व्यवस्था बनाई गई थी। उन्होंने कहा कि भारत ने निर्धारित मूल्य सीमा के भीतर तेल खरीदा, इसलिए उसने नियमों का उल्लंघन नहीं किया। जयशंकर बोले- लागत और उपलब्धता के आधार पर खरीदते हैं तेल रूस से तेल आयात को लेकर पूछे गए सवालों पर विदेश मंत्री जयशंकर ने भारत की ऊर्जा नीति का जोरदार बचाव किया। उन्होंने कहा कि भारत किसी राजनीतिक दबाव के आधार पर नहीं, बल्कि लागत और उपलब्धता को ध्यान में रखकर ऊर्जा खरीदता है। जयशंकर ने याद दिलाया कि 2022 में रूस पर प्रतिबंध लगने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव आया था। उस समय यूरोपीय देशों ने मध्य-पूर्व के तेल की बड़ी मात्रा खरीदनी शुरू कर दी थी, जो पहले भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल था। ऐसे में भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए नए विकल्प तलाशने पड़े। "अमेरिका ने भी रूसी तेल खरीदने को कहा था" विदेश मंत्री ने चर्चा के दौरान एक महत्वपूर्ण दावा भी किया। उन्होंने कहा कि उस समय अमेरिका ने स्वयं भारत से रूसी तेल खरीद जारी रखने का आग्रह किया था ताकि वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता बनी रहे। जयशंकर ने कहा कि इस मुद्दे को किसी बड़े नैतिक सिद्धांत की तरह पेश करना उचित नहीं है, क्योंकि उस दौर में कई देशों ने व्यावहारिक जरूरतों के आधार पर फैसले लिए थे। यूरोप की आलोचना पर तीखी प्रतिक्रिया रूस-यूक्रेन संघर्ष और भारत की विदेश नीति पर चर्चा के दौरान जयशंकर ने यूरोपीय देशों की आलोचना पर भी कड़ा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कई यूरोपीय देश वर्षों से ऐसे देशों को हथियार बेचते रहे हैं जिनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ हुआ है। भारत ने कभी भी यूरोप की सुरक्षा को खतरे में डालने वाला कोई कदम नहीं उठाया, इसलिए आलोचना करते समय इस तथ्य को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। बदल रहा है भारत का ऊर्जा नक्शा जयशंकर ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत केवल एक ही क्षेत्र पर निर्भर नहीं है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है, जबकि प्राकृतिक गैस के मामले में अमेरिका शीर्ष स्थान पर पहुंच चुका है। इससे पहले यह स्थान Qatar के पास था। उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंध केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यापार, निवेश और रणनीतिक साझेदारी जैसे कई क्षेत्रों तक फैले हुए हैं। भारत के पक्ष को मिली नई मजबूती फिनलैंड की विदेश मंत्री का सार्वजनिक समर्थन भारत के उस तर्क को मजबूती देता है कि उसने रूस से तेल खरीदते समय पश्चिमी देशों द्वारा निर्धारित नियमों का ही पालन किया। ऐसे समय में जब रूस की ऊर्जा निर्यात नीति और यूक्रेन युद्ध को लेकर वैश्विक बहस जारी है, यह बयान भारत की ऊर्जा रणनीति के समर्थन में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संदेश माना जा रहा है।
यूक्रेन के राष्ट्रपति Volodymyr Zelenskyy ने रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin को खुला पत्र लिखकर आमने-सामने बातचीत का प्रस्ताव दिया है। तीन साल से अधिक समय से जारी युद्ध के बीच इसे शांति प्रयासों की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। जेलेंस्की ने कहा कि युद्ध समाप्त करने का सबसे प्रभावी तरीका दोनों नेताओं के बीच सीधी वार्ता है। उन्होंने बैठक के लिए निश्चित तारीख तय करने और बातचीत के दौरान पूर्ण युद्धविराम लागू करने का सुझाव भी दिया। युद्धबंदियों की अदला-बदली से शुरू हो सकती है शांति प्रक्रिया अपने पत्र में जेलेंस्की ने कहा कि सभी युद्धबंदियों की "ऑल-फॉर-ऑल" यानी सभी के बदले सभी की रिहाई शांति प्रक्रिया की शुरुआत का आधार बन सकती है। उन्होंने दोहराया कि क्षेत्रीय विवादों और कब्जे वाले इलाकों से जुड़े जटिल मुद्दों का समाधान केवल शीर्ष नेतृत्व के बीच प्रत्यक्ष बातचीत से ही संभव है। मॉस्को का जवाब- बातचीत करनी है तो रूस आइए जेलेंस्की के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए क्रेमलिन के प्रवक्ता Dmitry Peskov ने कहा कि यदि यूक्रेनी राष्ट्रपति चाहें तो किसी भी समय मॉस्को आ सकते हैं। जेलेंस्की पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि वह मॉस्को या कीव में वार्ता के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने स्विट्जरलैंड, तुर्किये और कुछ अरब देशों को संभावित मेजबान के रूप में सुझाया है। रूस की शर्त- पहले समझौते की रूपरेखा बने रूस लगातार यह रुख अपनाता रहा है कि पुतिन और जेलेंस्की की मुलाकात तभी होनी चाहिए जब किसी संभावित समझौते की मुख्य रूपरेखा पहले से तैयार हो। पुतिन पहले भी कह चुके हैं कि वह केवल ऐसे समझौते को अंतिम रूप देने के लिए यूक्रेनी राष्ट्रपति से मिलेंगे, जिस पर दोनों पक्षों के बीच पहले से सहमति बन चुकी हो। ट्रंप ने किया वार्ता प्रस्ताव का स्वागत अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दोनों नेताओं की संभावित मुलाकात का स्वागत किया है। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि यदि दोनों नेता आमने-सामने बैठते हैं तो यह सकारात्मक कदम होगा। उन्होंने यह भी कहा कि रूस और यूक्रेन दोनों को समाधान के लिए कुछ समझौते करने होंगे। कई दौर की बातचीत के बावजूद नहीं निकला समाधान हाल के महीनों में इस्तांबुल, अबू धाबी और जेनेवा में विभिन्न स्तरों पर वार्ताएं हुईं, लेकिन क्षेत्रीय नियंत्रण, सुरक्षा गारंटी और युद्धोत्तर व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी। इसी बीच दोनों देशों के बीच मिसाइल, ड्रोन और लंबी दूरी के हमलों का सिलसिला भी जारी है। पुतिन ने फिर उठाए जेलेंस्की की वैधता पर सवाल सेंट पीटर्सबर्ग में विदेशी पत्रकारों से बातचीत के दौरान पुतिन ने एक बार फिर जेलेंस्की की राजनीतिक वैधता पर सवाल उठाए। रूसी राष्ट्रपति ने कहा कि यह विश्लेषण का विषय है कि जेलेंस्की अभी भी यूक्रेन के वैध राष्ट्रपति हैं या नहीं। यूक्रेनी राष्ट्रपति का कार्यकाल 2024 में समाप्त हो चुका है, लेकिन देश में लागू मार्शल लॉ के कारण चुनाव नहीं कराए गए हैं। युद्ध के मैदान में बढ़ रहा दबाव रूस फरवरी 2022 से यूक्रेन में सैन्य अभियान चला रहा है। मॉस्को अब भी मांग कर रहा है कि यूक्रेन पूर्वी डोनबास क्षेत्र से अपनी सेना हटाए। रूस का दावा है कि उसकी सेना कई मोर्चों पर आगे बढ़ रही है, जबकि यूक्रेन लगातार रूसी सैन्य और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर ड्रोन हमले कर रहा है। हाल ही में यूक्रेन ने Saint Petersburg के पास स्थित तेल टर्मिनल और नौसैनिक सुविधाओं को निशाना बनाया था। कीव की चिंता- दुनिया का ध्यान यूक्रेन से हट रहा है नए शांति प्रस्ताव के बीच जेलेंस्की ने चिंता जताई है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अब पहले की तुलना में यूक्रेन युद्ध पर कम हो गया है। Mark Rutte के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि वर्तमान में अमेरिका और पश्चिमी देशों का प्रमुख फोकस मध्य पूर्व और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों पर है, जबकि यूक्रेन का मुद्दा प्राथमिकता सूची में नीचे चला गया है। शांति की कोशिशों को मिला नया अवसर जेलेंस्की के खुले पत्र और रूस की प्रतिक्रिया ने लंबे समय बाद प्रत्यक्ष वार्ता की संभावना को फिर चर्चा में ला दिया है। हालांकि दोनों पक्षों के बीच कई बड़े मतभेद अब भी कायम हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शीर्ष स्तर की बैठक होती है तो यह युद्ध समाप्ति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के 2026 चुनाव परिणामों ने वैश्विक कूटनीति में बदलते समीकरणों की झलक दिखाई है। जहां मध्य एशिया के देश किर्गिस्तान ने पहली बार सुरक्षा परिषद में जगह बनाकर इतिहास रचा, वहीं यूरोप की प्रमुख शक्तियों में शामिल जर्मनी को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा। इन नतीजों ने संयुक्त राष्ट्र के भीतर बदलते राजनीतिक रुझानों और वैश्विक समर्थन के नए पैटर्न पर चर्चा तेज कर दी है। पांच नए देशों को मिली सुरक्षा परिषद में जगह 3 जून 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए मतदान के बाद 2027-28 कार्यकाल के लिए पांच नए अस्थायी सदस्य चुने गए। इनमें शामिल हैं: किर्गिस्तान पुर्तगाल ऑस्ट्रिया जिम्बाब्वे त्रिनिदाद और टोबैगो ये देश 1 जनवरी 2027 से अपना दो वर्षीय कार्यकाल शुरू करेंगे और वर्तमान सदस्यों की जगह लेंगे जिनका कार्यकाल दिसंबर 2026 में समाप्त हो रहा है। किर्गिस्तान ने रचा नया इतिहास इस चुनाव का सबसे उल्लेखनीय परिणाम किर्गिस्तान की जीत रही। स्वतंत्रता प्राप्ति और संयुक्त राष्ट्र सदस्यता के तीन दशक से अधिक समय बाद पहली बार देश को सुरक्षा परिषद में प्रतिनिधित्व मिला है। एशिया-प्रशांत समूह की सीट के लिए हुए मुकाबले में किर्गिस्तान को कई दौर की मतदान प्रक्रिया के बाद सफलता मिली। इसे देश की सक्रिय कूटनीति और वैश्विक स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता का संकेत माना जा रहा है। किर्गिस्तान लंबे समय से यह मुद्दा उठाता रहा है कि छोटे, पर्वतीय और भू-आवेष्ठित देशों को भी वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। जर्मनी की हार बनी सबसे बड़ी चर्चा चुनाव में सबसे बड़ा राजनीतिक झटका जर्मनी को लगा। पश्चिमी यूरोपीय और अन्य देशों के समूह की दो सीटों के लिए हुए मुकाबले में पुर्तगाल और ऑस्ट्रिया सफल रहे, जबकि जर्मनी आवश्यक समर्थन जुटाने में पीछे रह गया। यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि जर्मनी संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख वित्तीय योगदानकर्ताओं में शामिल है और अतीत में कई बार सुरक्षा परिषद का सदस्य रह चुका है। अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर रुख बना चर्चा का विषय विश्लेषकों का मानना है कि हाल के वर्षों में यूक्रेन युद्ध, गाजा संकट और अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर जर्मनी की स्पष्ट विदेश नीति का असर मतदान पर पड़ा हो सकता है। आधिकारिक तौर पर किसी एक कारण की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन चुनाव परिणामों ने यह संकेत दिया है कि संयुक्त राष्ट्र में समर्थन हासिल करना केवल आर्थिक शक्ति या राजनीतिक प्रभाव से संभव नहीं है। भारत के लिए क्या संकेत? इन नतीजों को भारत के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार और स्थायी सदस्यता के विस्तार की मांग करता रहा है। भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील का जी-4 समूह सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए अभियान चलाता रहा है। ऐसे में जर्मनी का अस्थायी सीट हासिल न कर पाना यह दर्शाता है कि संयुक्त राष्ट्र में समर्थन जुटाने की चुनौती लगातार बढ़ रही है। भारत ने सभी विजेता देशों को बधाई देते हुए उनके साथ सहयोग जारी रखने की बात कही है। सुरक्षा परिषद की संरचना को समझिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य शामिल हैं: United States Russia China United Kingdom France इन पांच देशों के पास वीटो शक्ति होती है। शेष 10 सदस्य दो वर्ष के लिए चुने जाते हैं और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के आधार पर उनका चुनाव संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा किया जाता है। बदलती वैश्विक राजनीति का संकेत 2026 के चुनाव परिणाम यह दर्शाते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में शक्ति संतुलन और समर्थन के पारंपरिक समीकरण बदल रहे हैं। छोटे और उभरते देशों की भूमिका बढ़ रही है, जबकि बड़े देशों को भी व्यापक कूटनीतिक समर्थन सुनिश्चित करने के लिए अधिक प्रयास करने पड़ रहे हैं। सुरक्षा परिषद के ये नतीजे आने वाले वर्षों में वैश्विक कूटनीति और संयुक्त राष्ट्र सुधार की बहस को नई दिशा दे सकते हैं।
Vladimir Putin ने बुधवार को China की राजधानी बीजिंग में राष्ट्रपति Xi Jinping से मुलाकात की। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब कुछ ही दिन पहले Donald Trump चीन दौरे पर गए थे। ऐसे में पुतिन की यह यात्रा वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कई वैश्विक मुद्दों पर हुई चर्चा बीजिंग में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में दोनों नेताओं ने कई अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की। इनमें प्रमुख रूप से: ईरान संकट यूक्रेन युद्ध वैश्विक व्यापार पश्चिम एशिया की स्थिति ऊर्जा सुरक्षा रणनीतिक सहयोग जैसे विषय शामिल रहे। दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने तथा बदलते वैश्विक हालात में आपसी सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया। ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल में हुआ स्वागत बीजिंग स्थित Great Hall of the People में शी जिनपिंग ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन का औपचारिक स्वागत किया। इसके बाद दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच विस्तृत वार्ता हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुतिन मंगलवार रात बीजिंग पहुंचे थे, जहां उनका स्वागत चीन के विदेश मंत्री Wang Yi ने किया। पुतिन बोले- रिश्ते अभूतपूर्व स्तर पर चीन यात्रा से पहले जारी अपने वीडियो संदेश में पुतिन ने कहा कि रूस और चीन के संबंध “अभूतपूर्व स्तर” तक पहुंच चुके हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच लगातार हो रहे उच्चस्तरीय संपर्क रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बना रहे हैं और सहयोग की नई संभावनाएं खोल रहे हैं। चीन ने क्या कहा? चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Guo Jiakun ने कहा कि शी जिनपिंग और पुतिन के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को लेकर गहन चर्चा हुई। उन्होंने यह भी बताया कि यह पुतिन की 25वीं चीन यात्रा है, जो दोनों देशों के मजबूत संबंधों को दर्शाती है। ट्रंप की यात्रा के बाद बढ़ी कूटनीतिक हलचल इस बैठक को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया बीजिंग यात्रा के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। 14 और 15 मई को ट्रंप ने चीन का दौरा किया था, जहां उनकी और शी जिनपिंग की बातचीत में भी ईरान, यूक्रेन युद्ध, व्यापारिक तनाव और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल थे। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यात्रा के तुरंत बाद पुतिन का बीजिंग पहुंचना चीन-रूस संबंधों की रणनीतिक गहराई को दिखाता है। ईरान और होर्मुज संकट पर भी फोकस पुतिन की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ रहा है। खास तौर पर Iran द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े कदमों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजारों में चिंता बढ़ गई है। रूस, चीन और ईरान के बीच पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक सहयोग मजबूत हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा ईरान से आयात करता रहा है। वैश्विक राजनीति में बढ़ती रूस-चीन साझेदारी विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के बीच रूस और चीन लगातार एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। दोनों देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, डॉलर पर निर्भरता कम करने और पश्चिमी प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में सहयोग बढ़ा रहे हैं।
Narendra Modi ने Norway में आयोजित तीसरे India-Nordic Summit के बाद आतंकवाद के खिलाफ सख्त संदेश देते हुए कहा कि इस मुद्दे पर किसी भी तरह का समझौता या दोहरा रवैया स्वीकार नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “आतंकवाद पर हमारा स्पष्ट और एकजुट रुख है — नो कॉम्प्रोमाइज, नो डबल स्टैंडर्ड्स।” भारत और नॉर्डिक देश ‘नेचुरल पार्टनर्स’ पीएम मोदी ने कहा कि भारत और नॉर्डिक देश स्वाभाविक साझेदार हैं और टेक्नोलॉजी दोनों की साझा प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में दोनों पक्षों के संबंधों में तेजी से प्रगति हुई है। उन्होंने बताया कि भारत और नॉर्डिक देशों के बीच व्यापार में चार गुना वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि पिछले एक दशक में भारत में नॉर्डिक निवेश 200 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है। वैश्विक शांति और नियम-आधारित व्यवस्था पर जोर प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक संघर्षों का जिक्र करते हुए कहा कि चाहे Ukraine का युद्ध हो या पश्चिम एशिया की स्थिति, भारत हमेशा शांति और जल्द समाधान के प्रयासों का समर्थन करता रहेगा। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक तनाव के दौर में भारत और नॉर्डिक देश मिलकर नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में काम करेंगे। रिसर्च, स्टार्टअप और इनोवेशन में बढ़ेगा सहयोग पीएम मोदी ने कहा कि अनुसंधान और इनोवेशन भारत-नॉर्डिक साझेदारी का अहम आधार बन चुके हैं। दोनों पक्ष विश्वविद्यालयों, रिसर्च लैब्स और स्टार्टअप इकोसिस्टम के बीच सहयोग को और मजबूत करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि आर्कटिक और ध्रुवीय अनुसंधान के क्षेत्र में साझेदारी को गहरा करने पर सहमति बनी है। स्वच्छ ऊर्जा और ब्लू इकोनॉमी पर खास फोकस शिखर सम्मेलन में स्थिरता, स्वच्छ ऊर्जा, उभरती तकनीक, ब्लू इकोनॉमी और हरित विकास जैसे मुद्दों पर विशेष चर्चा हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और नॉर्डिक देशों की साझेदारी लगातार अधिक मजबूत और गतिशील होती जा रही है, जो भविष्य में वैश्विक विकास और स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। स्वीडन, फिनलैंड और डेनमार्क के साथ तकनीकी साझेदारी पीएम मोदी ने कहा कि भारत नॉर्डिक देशों की विशेषज्ञता को अपनी प्रतिभा और नवाचार क्षमता के साथ जोड़कर वैश्विक समाधान विकसित करेगा। उन्होंने कहा कि: Sweden की उन्नत विनिर्माण और रक्षा तकनीक Finland की दूरसंचार और डिजिटल विशेषज्ञता Denmark की साइबर सुरक्षा और स्वास्थ्य तकनीक को भारत की तकनीकी क्षमता के साथ जोड़कर दुनिया के लिए भरोसेमंद समाधान तैयार किए जाएंगे। कौशल विकास और प्रतिभा आवागमन पर भी सहमति प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और नॉर्डिक देशों के बीच कौशल विकास और प्रतिभा आदान-प्रदान के नए अवसर भी विकसित किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि यह साझेदारी केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए साझा दृष्टिकोण पर आधारित है।
BRICS Summit 2026 को लेकर बड़ी कूटनीतिक हलचल शुरू हो गई है। सितंबर 2026 में नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में Vladimir Putin के साथ-साथ Xi Jinping के भी शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार, Russia और China दोनों ने भारत को संकेत दिए हैं कि उनके शीर्ष नेता 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में भाग ले सकते हैं। इस बार India BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। 2019 के बाद पहली भारत यात्रा हो सकती है यदि शी जिनपिंग का दौरा तय होता है, तो यह अक्टूबर 2019 के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी। आखिरी बार वह तमिलनाडु के मामल्लापुरम में भारत-चीन अनौपचारिक शिखर वार्ता में शामिल होने आए थे। 2020 के बाद बिगड़े थे रिश्ते भारत और चीन के संबंध अप्रैल-मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर हुए गलवान सैन्य गतिरोध के बाद काफी तनावपूर्ण हो गए थे। हालांकि अक्टूबर 2024 में Kazan में आयोजित BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री Narendra Modi और शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद रिश्तों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। उसी दौरान दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख में सैनिकों की वापसी को लेकर सहमति जताई थी। पिछले डेढ़ साल में रिश्तों में आई नरमी पिछले कुछ समय में भारत और चीन के संबंधों में कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें दोबारा शुरू हुईं वीजा सेवाएं बहाल की गईं कुछ चीनी कंपनियों पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी गई कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर शुरू हुई हालांकि सीमा पर अब भी बड़ी संख्या में सैनिक तैनात हैं और तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। विदेश मंत्रियों की बैठक में तय हुआ एजेंडा हाल ही में नई दिल्ली में BRICS देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी, जिसमें शिखर सम्मेलन के एजेंडे पर चर्चा की गई। Sergey Lavrov इस बैठक में शामिल हुए थे, जबकि Wang Yi बीजिंग में व्यस्तता के कारण नहीं आ सके। उनकी जगह भारत में चीन के राजदूत Xu Feihong ने भाग लिया। सूत्रों के मुताबिक, अगर कोई अप्रत्याशित परिस्थिति नहीं बनी तो BRICS देशों की ओर से शीर्ष स्तर पर भागीदारी की जानकारी जल्द आधिकारिक रूप से दी जा सकती है। पुतिन की यात्रा लगभग तय रूसी समाचार एजेंसी TASS के अनुसार, रूस ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के BRICS सम्मेलन में शामिल होने की पुष्टि कर दी है। यह एक साल के भीतर उनकी दूसरी भारत यात्रा होगी। इससे पहले दिसंबर 2025 में वह भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होने भारत आए थे। पश्चिम एशिया युद्ध पर साझा रुख बनाने की कोशिश BRICS संगठन की स्थापना 2006 में हुई थी। शुरुआत में इसमें Brazil, Russia, India, China और South Africa शामिल थे। बाद में Egypt, Ethiopia, Iran, United Arab Emirates और Indonesia भी इस समूह में शामिल हुए। BRICS अब दुनिया की लगभग 49 प्रतिशत आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। ईरान संकट और पश्चिम एशिया युद्ध पर नजर भारत चाहता है कि BRICS देश पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और Iran संकट पर साझा कूटनीतिक रुख अपनाएं। हालांकि इस मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। विशेष रूप से ईरान और United Arab Emirates के अलग-अलग रुख के कारण साझा बयान तैयार करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। पिछले सप्ताह हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में भी इस मुद्दे पर पूरी सहमति नहीं बन सकी थी।
Narendra Modi की नॉर्वे यात्रा के दौरान भारत और नॉर्वे के बीच द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा मिली है। ओस्लो में प्रधानमंत्री मोदी और Jonas Gahr Store के बीच हुई बैठक में हरित ऊर्जा, अंतरिक्ष, आर्कटिक अनुसंधान, डिजिटल तकनीक और समुद्री सहयोग जैसे अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में जारी तनाव को बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाने पर जोर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और नॉर्वे दोनों नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था और शांतिपूर्ण समाधान में विश्वास रखते हैं। “हरित रणनीतिक साझेदारी” की ओर बढ़े दोनों देश बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और नॉर्वे अपने संबंधों को “ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” यानी हरित रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक ले जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत की क्षमता और प्रतिभा को नॉर्वे की तकनीक और निवेश के साथ जोड़कर स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु अनुकूलन, ब्लू इकॉनमी और ग्रीन शिपिंग जैसे क्षेत्रों में वैश्विक समाधान तैयार किए जाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह साझेदारी सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी सकारात्मक प्रभाव डालेगी। भारत-यूरोप संबंधों को बताया नया “स्वर्ण युग” प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दुनिया इस समय अस्थिरता और अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है, लेकिन भारत और यूरोप के संबंध नए “स्वर्णिम युग” में प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में सुधार की आवश्यकता पर भी बल दिया। पहलगाम आतंकी हमले पर नॉर्वे के समर्थन का जताया आभार प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले वर्ष पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत के समर्थन में खड़े होने के लिए नॉर्वे का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि उस कठिन समय में नॉर्वे ने आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ मजबूती से एकजुटता दिखाई। भारत और नॉर्वे के संयुक्त बयान में आतंकवाद और हिंसक उग्रवाद के सभी रूपों की कड़ी निंदा की गई। दोनों देशों ने सीमा पार आतंकवाद समेत वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ समन्वित अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की आवश्यकता पर भी जोर दिया। व्यापार, निवेश और रोजगार पर बड़ा फोकस प्रधानमंत्री मोदी ने भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के बीच हुए आर्थिक साझेदारी समझौते का उल्लेख करते हुए कहा कि अगले 15 वर्षों में भारत में करीब 100 अरब डॉलर का निवेश और लगभग 10 लाख रोजगार सृजित होने की संभावना है। दोनों देशों ने: सतत विकास समुद्री ऊर्जा स्वास्थ्य इंजीनियरिंग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस साइबर सुरक्षा डिजिटल तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। अंतरिक्ष और आर्कटिक रिसर्च में नई साझेदारी प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के आर्कटिक अनुसंधान केंद्र “हिमाद्री” के संचालन में सहयोग के लिए नॉर्वे का आभार व्यक्त किया। साथ ही Indian Space Research Organisation (ISRO) और नॉर्वे की अंतरिक्ष एजेंसी के बीच हुए समझौता ज्ञापन का स्वागत किया गया। इससे अंतरिक्ष अनुसंधान और वैज्ञानिक सहयोग को नई गति मिलेगी। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग होगा मजबूत प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की हिंद-प्रशांत महासागर पहल में नॉर्वे के शामिल होने का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि दोनों समुद्री राष्ट्र समुद्री सुरक्षा, समुद्री अर्थव्यवस्था और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में मिलकर काम करेंगे। इसके अलावा भारत और नॉर्वे ने वैश्विक दक्षिण के देशों में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाओं पर मिलकर काम करने के लिए त्रिपक्षीय विकास सहयोग समझौते पर भी हस्ताक्षर किए।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के साथ हुए संघर्षविराम को लेकर पाकिस्तान की भूमिका पर बड़ा बयान दिया है। चीन यात्रा से लौटते समय एयरफोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि उन्होंने युद्धविराम कराकर “पाकिस्तान पर एहसान किया” है। ट्रंप के इस बयान के बाद पाकिस्तान की मध्यस्थता भूमिका को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। सीजफायर में पाकिस्तान की अहम भूमिका का दावा रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और Iran के बीच तनाव कम कराने में पाकिस्तान ने बैकचैनल संपर्कों के जरिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बताया जा रहा है कि इस्लामाबाद ने ईरान के पांच सूत्रीय प्रस्ताव को वॉशिंगटन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी, जिसके बाद युद्धविराम की दिशा में प्रगति हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पाकिस्तान ने खुद को क्षेत्रीय मध्यस्थ और संवाद मंच के रूप में पेश करने की कोशिश की है। शहबाज शरीफ और इशाक डार की तारीफ ट्रंप ने बातचीत के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif और उप प्रधानमंत्री Ishaq Dar की भी तारीफ की। हालांकि, उन्होंने साथ ही यह संकेत भी दिया कि अमेरिका क्षेत्रीय सुरक्षा मामलों में पाकिस्तान से लगातार सहयोग की उम्मीद करता है। होर्मुज और ऊर्जा सुरक्षा बना बड़ा मुद्दा विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान के लिए यह संघर्षविराम सिर्फ कूटनीतिक सफलता नहीं बल्कि आर्थिक जरूरत भी था। Strait of Hormuz में बढ़ते तनाव से तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार प्रभावित होने का खतरा था, जिसका असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता था। युद्धविराम के बाद पाकिस्तान को अपने ऊर्जा मार्ग सुरक्षित रखने में राहत मिली है। ट्रंप के बयान के क्या मायने? ट्रंप का “पाकिस्तान पर एहसान” वाला बयान पाकिस्तान के लिए मिश्रित संकेत माना जा रहा है। एक ओर इससे इस्लामाबाद की कूटनीतिक भूमिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत भी दिया है कि पाकिस्तान को क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों, खासकर सीमा पार आतंकवाद, पर ज्यादा सक्रिय भूमिका निभानी होगी। अफगान सीमा और आतंकवाद पर भी इशारा रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने हालिया सुरक्षा घटनाओं का जिक्र करते हुए पाकिस्तान को अपनी सीमाओं पर सुरक्षा मजबूत करने का संदेश दिया। हाल ही में Bannu में पुलिस चौकी पर हुए हमले के बाद पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठे हैं। क्षेत्रीय राजनीति में बढ़ी हलचल मध्य पूर्व में जारी तनाव, होर्मुज संकट और अमेरिका-ईरान संबंधों के बीच पाकिस्तान की भूमिका ने दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति को नई दिशा दे दी है। फिलहाल अमेरिकी और पाकिस्तानी सरकारों की ओर से बैकचैनल कूटनीति के कई पहलुओं पर आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन ट्रंप के बयान ने इस मुद्दे को वैश्विक चर्चा का विषय बना दिया है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध जैसे हालात के बीच ईरान के विदेश मंत्री Seyed Abbas Araghchi ने कहा है कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने में भारत बड़ी और सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। उन्होंने अमेरिका पर निशाना साधते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में शांति की राह में सबसे बड़ी बाधा अमेरिका है। नई दिल्ली में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में अराघची ने कहा कि ईरान से जुड़े मुद्दों का कोई सैन्य समाधान नहीं है और कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है। ‘अमेरिका पर भरोसा नहीं’ अराघची ने कहा, “40 दिनों की लड़ाई के बाद जब अमेरिका को यह समझ आ गया कि वह ईरान के खिलाफ अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता, तब उसने बातचीत का प्रस्ताव रखा। हमें अमेरिकियों पर बिल्कुल भरोसा नहीं है।” उन्होंने आगे कहा कि ईरान के पास अमेरिका पर भरोसा न करने के कई कारण हैं, जबकि अमेरिका के पास ईरान पर अविश्वास करने का कोई ठोस कारण नहीं है। भारत को बताया भरोसेमंद साझेदार ईरानी विदेश मंत्री ने भारत की विदेश नीति और क्षेत्रीय संबंधों की सराहना करते हुए कहा कि भारत फारसी खाड़ी के सभी देशों का मित्र है और उसकी अच्छी साख है। उन्होंने कहा, “भारत इस क्षेत्र में कूटनीति को बढ़ावा देने, शांति और सुरक्षा स्थापित करने में अहम भूमिका निभा सकता है। हम भारत की किसी भी सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका का स्वागत करेंगे।” होर्मुज स्ट्रेट को लेकर दिया बड़ा बयान अराघची ने कहा कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट से अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही जारी रखने के पक्ष में है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा हालात बेहद जटिल हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के जहाजों के लिए खुला रहेगा, सिवाय उन देशों के जहाजों के जो ईरान के साथ युद्ध की स्थिति में हैं। होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और हालिया तनाव के कारण इस क्षेत्र पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। चाबहार पोर्ट पर भारत की तारीफ ईरानी विदेश मंत्री ने Chabahar Port परियोजना को भारत-ईरान सहयोग का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा, “हमें खुशी है कि भारत ने चाबहार बंदरगाह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण काम कुछ धीमा हुआ है, लेकिन यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंच का सुनहरा दरवाजा साबित होगा।” भारत से सहयोग जारी रखने की उम्मीद अराघची ने उम्मीद जताई कि भारत चाबहार पोर्ट परियोजना पर काम जारी रखेगा ताकि इसका पूर्ण विकास हो सके और इससे भारत सहित पूरे क्षेत्र को आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिल सके। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत संतुलित कूटनीति के जरिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की स्थिति में है।
वैश्विक तनाव के बीच भारत में अहम कूटनीतिक बैठक नई दिल्ली में गुरुवार को होने वाली BRICS देशों की विदेश मंत्रियों की बैठक से पहले दुनिया के कई अहम देशों के नेता राजधानी पहुंच चुके हैं। इस बैठक में खास तौर पर ईरान और तेल संकट से जुड़ी वैश्विक परिस्थितियां चर्चा के केंद्र में रहने की संभावना है। भारत इस साल BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और दो दिवसीय इस बैठक में विस्तार किए गए सदस्य देशों के प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। ईरान और रूस के विदेश मंत्री पहुंचे दिल्ली ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची बुधवार देर रात New Delhi पहुंचे। वहीं Russia के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भी बैठक में शामिल हो रहे हैं। लावरोव ने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात कर व्यापार, ऊर्जा और कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर चर्चा की। ईरान युद्ध और तेल संकट पर फोकस मध्य पूर्व में चल रहे तनाव और हालिया संघर्ष, जिसमें Iran और United States तथा Israel की भूमिका बताई जा रही है, ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होने वाले तेल और गैस आपूर्ति मार्गों में बाधा ने कीमतों में अस्थिरता बढ़ा दी है। इस स्थिति का सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ रहा है, जो ऊर्जा और उर्वरक के लिए मध्य पूर्व पर काफी निर्भर हैं। भारत की भूमिका और कूटनीतिक संतुलन विदेश मंत्रालय के अनुसार बैठक में वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। भारत का मानना है कि मौजूदा अस्थिर वैश्विक वातावरण में कूटनीतिक सहयोग और भी महत्वपूर्ण हो गया है। भारत के विदेश मंत्री ने कहा कि आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा जैसे विषयों पर सहयोग बढ़ाने की जरूरत है। ब्रिक्स का विस्तार और बढ़ती चुनौतियां BRICS की शुरुआत 2009 में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ हुई थी। बाद में इसका विस्तार किया गया और इसमें United Arab Emirates, ईरान, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हुए। हालांकि इस बार बैठक में यह भी स्पष्ट नहीं है कि सभी सदस्य देश संयुक्त बयान जारी करेंगे या नहीं, क्योंकि कई मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं। नई दिल्ली में हो रही यह बैठक वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ईरान युद्ध और तेल संकट ने BRICS देशों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं, जिन पर सामूहिक रणनीति बनाने की कोशिश की जाएगी।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच Narendra Modi 15 मई से छह दिनों के विदेश दौरे पर निकलेंगे। इस दौरान प्रधानमंत्री United Arab Emirates, Netherlands, Sweden, Norway और Italy का दौरा करेंगे। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत के रणनीतिक, व्यापारिक और तकनीकी संबंधों को मजबूत करना माना जा रहा है। UAE से होगी यात्रा की शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी अपने दौरे की शुरुआत यूएई से करेंगे, जहां उनकी मुलाकात Mohamed bin Zayed Al Nahyan से होगी। दोनों नेताओं के बीच: ऊर्जा सहयोग व्यापार और निवेश पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति भारतीय समुदाय के हित जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। साथ ही वहां 45 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं, इसलिए प्रवासी भारतीयों से जुड़े मुद्दे भी एजेंडे में रहेंगे। विशेषज्ञ मानते हैं कि मिडिल ईस्ट संकट के बीच यूएई को यात्रा का पहला पड़ाव बनाना भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है। नीदरलैंड में टेक्नोलॉजी और ग्रीन हाइड्रोजन पर फोकस यूएई के बाद प्रधानमंत्री मोदी 15 से 17 मई तक नीदरलैंड के दौरे पर रहेंगे। यह 2017 के बाद उनकी दूसरी यात्रा होगी। इस दौरान उनकी मुलाकात: Willem-Alexander Máxima Zorreguieta Rob Jetten से होगी। इस यात्रा में रक्षा, सुरक्षा, नवाचार, हरित हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर रहेगा। भारत और यूरोप के बीच सप्लाई चेन और हाई-टेक सहयोग को मजबूत करना भी इस दौरे का अहम हिस्सा माना जा रहा है। स्वीडन में AI और ग्रीन ट्रांजिशन पर चर्चा 17 से 18 मई तक पीएम मोदी स्वीडन के दौरे पर रहेंगे। यह यात्रा Ulf Kristersson के निमंत्रण पर हो रही है। दोनों देशों के बीच जिन क्षेत्रों पर चर्चा होगी, उनमें: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ग्रीन ट्रांजिशन स्टार्टअप रक्षा और अंतरिक्ष क्लाइमेट चेंज उभरती तकनीक शामिल हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी और क्रिस्टर्सन, Ursula von der Leyen के साथ “European Round Table for Industry” को भी संबोधित करेंगे। नॉर्वे में नॉर्डिक समिट 18 से 19 मई तक प्रधानमंत्री मोदी नॉर्वे में तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। यह दौरा इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि 1983 के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली नॉर्वे यात्रा होगी। इस दौरान मोदी मुलाकात करेंगे: Harald V Sonja of Norway Jonas Gahr Støre से। इस यात्रा में व्यापार, निवेश, स्वच्छ ऊर्जा, हरित तकनीक और ब्लू इकॉनमी जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होगी। प्रधानमंत्री मोदी भारत-नॉर्वे व्यापार और अनुसंधान शिखर सम्मेलन को भी संबोधित करेंगे। इटली दौरे के साथ होगा समापन अपने दौरे के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री मोदी 19 से 20 मई तक इटली जाएंगे। यह यात्रा Giorgia Meloni के निमंत्रण पर हो रही है। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी: Sergio Mattarella से मुलाकात करेंगे प्रधानमंत्री मेलोनी के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे भारत और इटली के बीच रक्षा, व्यापार, निवेश और इंडो-पैसिफिक सहयोग पर बातचीत होने की संभावना है। प्रधानमंत्री मोदी इससे पहले जून 2024 में जी7 शिखर सम्मेलन के लिए इटली गए थे। क्यों अहम माना जा रहा है यह दौरा? विदेश मंत्रालय के मुताबिक, यह दौरा भारत और यूरोप के बीच साझेदारी को नई मजबूती देगा। ऐसे समय में जब: मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ा हुआ है वैश्विक सप्लाई चेन दबाव में है ऊर्जा सुरक्षा बड़ा मुद्दा बनी हुई है यूरोप नई आर्थिक साझेदारियां तलाश रहा है भारत अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच ईरान के उप विदेश मंत्री Kazem Gharibabadi के भारत दौरे की संभावना जताई जा रही है. माना जा रहा है कि वह मई में नई दिल्ली में होने वाली ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा ले सकते हैं. यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब पश्चिम एशिया में लगातार अस्थिरता बनी हुई है और ईरान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक समर्थन मजबूत करने में जुटा है. भारत फिलहाल BRICS का चेयरमैन है और 14-15 मई को विदेश मंत्रियों की अहम बैठक की मेजबानी करेगा. यह बैठक सितंबर 2026 में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है. जयशंकर-अराघची बातचीत के बाद बढ़ी हलचल यह संभावित दौरा भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar और ईरान के विदेश मंत्री Seyed Abbas Araghchi के बीच हुई हाई-लेवल फोन बातचीत के बाद चर्चा में आया है. माना जा रहा है कि दोनों देशों ने पश्चिम एशिया की स्थिति और बहुपक्षीय सहयोग पर विचार-विमर्श किया है. रूस के विदेश मंत्री भी आएंगे भारत रूस ने भी पुष्टि की है कि उसके विदेश मंत्री Sergey Lavrov 14-15 मई को भारत में होने वाली बैठक में शामिल होंगे. रूस के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, यह बैठक वैश्विक मुद्दों और ग्लोबल गवर्नेंस पर गंभीर चर्चा का बड़ा मंच बनेगी. क्या है इस बार BRICS की थीम? भारत की अध्यक्षता में इस बार ब्रिक्स की थीम रखी गई है: “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” इस थीम का उद्देश्य विकासशील देशों के बीच सहयोग बढ़ाना, वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करना और टिकाऊ विकास पर जोर देना है. क्यों अहम मानी जा रही है यह बैठक? विशेषज्ञों के मुताबिक, यह बैठक कई वजहों से महत्वपूर्ण है: अमेरिका-ईरान तनाव के बीच बड़े देशों की कूटनीतिक रणनीति पश्चिम एशिया की अस्थिर स्थिति पर चर्चा वैश्विक आर्थिक और सुरक्षा मुद्दों पर समन्वय सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले 18वें BRICS समिट की तैयारी रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता Maria Zakharova ने कहा है कि इस बैठक में रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने और वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने पर विशेष फोकस रहेगा. नई दिल्ली में होने वाली यह बैठक अब सिर्फ कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच एक बड़े भू-राजनीतिक मंच के रूप में देखी जा रही है.
Middle East Conflict: ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव और युद्ध जैसे हालात के बीच चीन और ईरान के विदेश मंत्रियों की पहली अहम मुलाकात हुई है. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बीजिंग पहुंचकर चीन के विदेश मंत्री वांग यी से बातचीत की. दोनों नेताओं के बीच मिडिल ईस्ट की मौजूदा स्थिति, युद्धविराम और शांति प्रक्रिया को लेकर विस्तृत चर्चा हुई. वांग यी ने कहा- व्यापक युद्धविराम जरूरी बीजिंग में हुई बैठक के दौरान चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि दो महीने से ज्यादा समय से जारी संघर्ष को अब रोका जाना चाहिए. उन्होंने जोर देकर कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए व्यापक युद्धविराम बेहद जरूरी है. वांग यी ने कहा कि दुश्मनी का दोबारा शुरू होना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए और सभी पक्षों को बातचीत और कूटनीतिक समाधान के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए. युद्ध शुरू होने के बाद पहली उच्चस्तरीय मुलाकात 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद यह पहली बार है जब ईरान और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच आमने-सामने बातचीत हुई है. चीन लंबे समय से ईरान का महत्वपूर्ण आर्थिक और राजनीतिक साझेदार रहा है. ऐसे में इस मुलाकात को मिडिल ईस्ट संकट के बीच बेहद अहम माना जा रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन ने क्षेत्रीय स्थिरता बनाये रखने और तनाव कम करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने के संकेत दिये हैं. चीन ने शांति वार्ता पर दिया जोर न्यूज एजेंसी AP के अनुसार, बैठक के दौरान चीनी पक्ष ने स्पष्ट कहा कि बातचीत और समझौते के जरिए ही इस संकट का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है. चीन ने कहा कि युद्धविराम को मजबूत करना और सभी पक्षों को संवाद की प्रक्रिया में शामिल रखना बेहद जरूरी है, ताकि मिडिल ईस्ट में बड़ा युद्ध टाला जा सके. अमेरिका और ईरान के बीच 14 सूत्रीय समझौते की चर्चा इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गयी हैं. सूत्रों के मुताबिक, दोनों देश 14 सूत्रीय समझौते की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. बताया जा रहा है कि अमेरिका ने ईरान से अपने परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को लंबे समय तक रोकने की मांग की है. अमेरिकी पक्ष चाहता है कि ईरान कम से कम 20 वर्षों तक परमाणु संवर्धन गतिविधियों को बंद रखे. वहीं ईरान कथित तौर पर पांच वर्षों तक कार्यक्रम सीमित रखने के प्रस्ताव पर सहमत होने की बात कर रहा है. हालांकि अब तक किसी औपचारिक समझौते की पुष्टि नहीं हुई है. मिडिल ईस्ट में बढ़ी वैश्विक चिंता ईरान-अमेरिका तनाव और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े संकट ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. वैश्विक शक्तियां लगातार युद्धविराम और कूटनीतिक समाधान की अपील कर रही हैं, क्योंकि इस संघर्ष का असर तेल आपूर्ति, वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है.
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति Lee Jae-myung तीन दिवसीय भारत दौरे पर नई दिल्ली पहुंच चुके हैं। प्रधानमंत्री Narendra Modi के निमंत्रण पर हो रही यह यात्रा दोनों देशों के बीच विशेष रणनीतिक साझेदारी (Special Strategic Partnership) को नई मजबूती देने वाली मानी जा रही है। राष्ट्रपति के साथ एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी भारत आया है, जिसमें मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और उद्योग जगत के प्रमुख शामिल हैं। यह दौरा भारत और दक्षिण कोरिया के बीच आर्थिक, तकनीकी और सामरिक सहयोग को आगे बढ़ाने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। आज होगी मोदी-म्युंग की अहम बैठक सोमवार को प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ली जे म्युंग के बीच विस्तृत बातचीत होगी। इस बैठक में कई अहम क्षेत्रों पर चर्चा होने की संभावना है, जैसे: पोत निर्माण (Shipbuilding) व्यापार और निवेश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री रक्षा और तकनीकी सहयोग सांस्कृतिक आदान-प्रदान इसके अलावा दोनों नेता क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों, खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिति और सप्लाई चेन से जुड़े विषयों पर भी चर्चा कर सकते हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से भी मुलाकात दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति का कार्यक्रम केवल प्रधानमंत्री से मुलाकात तक सीमित नहीं है। वे भारत की राष्ट्रपति Droupadi Murmu से भी मुलाकात करेंगे और द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने पर चर्चा करेंगे। विदेश मंत्रालय ने बताया ‘मील का पत्थर’ विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Randhir Jaiswal ने इस यात्रा को भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों के लिए “महत्वपूर्ण मील का पत्थर” बताया है। उनके अनुसार, यह दौरा दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देगा। जयशंकर ने जताई उम्मीद भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar ने राष्ट्रपति म्युंग से मुलाकात के बाद कहा कि: प्रधानमंत्री मोदी के साथ होने वाली वार्ता से द्विपक्षीय संबंध और मजबूत होंगे दोनों देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी सहयोग को नई गति मिलेगी भव्य स्वागत, उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति ली जे म्युंग और उनकी पत्नी किम हीया क्यूंग का नई दिल्ली एयरपोर्ट पर केंद्रीय मंत्री Harsh Malhotra ने स्वागत किया। यह दौरा इसलिए भी खास है क्योंकि: यह भारत में राष्ट्रपति म्युंग की पहली आधिकारिक यात्रा है दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश के नए अवसर तलाशे जाएंगे क्यों अहम है यह दौरा? भारत और दक्षिण कोरिया के बीच पहले से ही मजबूत आर्थिक और तकनीकी संबंध हैं। यह यात्रा इन क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा कर सकती है: इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन रक्षा उत्पादन हरित ऊर्जा और नई तकनीक
वॉशिंगटन/इस्लामाबाद: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत फिर शुरू होने की उम्मीद जगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने संकेत दिया है कि अगले दो दिनों में वार्ता का नया दौर शुरू हो सकता है। हालांकि, इस बार अमेरिका ने बातचीत से पहले दो अहम शर्तें रख दी हैं। बताया जा रहा है कि वार्ता का अगला दौर एक बार फिर Islamabad में हो सकता है, जहां पहले भी दोनों देशों के बीच बातचीत हुई थी। क्या हैं अमेरिका की शर्तें? पहली शर्त: होर्मुज स्ट्रेट को खोलना होगा अमेरिका चाहता है कि Strait of Hormuz को पूरी तरह और बिना किसी रुकावट के खोला जाए। यह समुद्री मार्ग दुनिया की तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम है। अमेरिका ने साफ किया है कि अगर ईरान जहाजों की आवाजाही रोकेगा, तो उसके जहाजों को भी गुजरने नहीं दिया जाएगा। दूसरी शर्त: ईरानी टीम को मिले पूरा अधिकार अमेरिका की दूसरी शर्त है कि बातचीत करने वाली ईरानी टीम के पास अंतिम फैसला लेने का अधिकार हो। वॉशिंगटन चाहता है कि इस्लामाबाद में जो भी समझौता हो, उसे Iran के सभी बड़े संस्थान मंजूरी दें। ईरान के अंदर बढ़ रहे मतभेद रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद सामने आ रहे हैं। एक तरफ राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian और विदेश मंत्री Abbas Araghchi जैसे राजनीतिक नेता हैं दूसरी तरफ शक्तिशाली Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) है बताया जा रहा है कि पहले दौर की वार्ता में IRGC के कुछ अधिकारियों ने राजनीतिक टीम को जवाब देने से रोक दिया था। ट्रंप का दावा Donald Trump ने कहा है कि उन्हें “सही लोगों” की तरफ से संपर्क मिला है और ईरान समझौते के लिए तैयार हो सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत फिर शुरू होने की संभावना तो बनी है, लेकिन ट्रंप की सख्त शर्तें और ईरान के अंदरूनी मतभेद इस प्रक्रिया को मुश्किल बना सकते हैं। अब देखना होगा कि कूटनीति तनाव कम कर पाती है या हालात और बिगड़ते हैं।
वॉशिंगटन/इस्लामाबाद: ईरान संकट के बीच कूटनीतिक हल की कोशिशें तेज होती दिख रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने संकेत दिया है कि ईरान के साथ रुकी हुई बातचीत इस हफ्ते फिर से शुरू हो सकती है, और इसके लिए अमेरिका दोबारा Islamabad जाने पर विचार कर रहा है। इस्लामाबाद वार्ता फिर शुरू होने की उम्मीद न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा, “आपको वहीं (इस्लामाबाद) रुकना चाहिए, क्योंकि अगले दो दिनों में कुछ हो सकता है… हमारा झुकाव भी वहीं जाने का है।” गौरतलब है कि पिछले शनिवार को Islamabad में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई थी, जिसके बाद तनाव और बढ़ गया। होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी से बढ़ा दबाव वार्ता विफल होने के बाद अमेरिका ने Strait of Hormuz पर नाकाबंदी लागू कर दी। अमेरिकी सेना के मुताबिक, नाकाबंदी के पहले 24 घंटों में इस अहम समुद्री मार्ग से कोई जहाज़ नहीं गुजरा, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई। युद्धविराम पर संकट मौजूदा गतिरोध ने अगले सप्ताह समाप्त होने जा रहे दो हफ्ते के युद्धविराम पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, अब बातचीत दोबारा शुरू होने की संभावना ने हालात में कुछ उम्मीद जगाई है। संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया संयुक्त राष्ट्र महासचिव António Guterres ने कहा कि बातचीत फिर से शुरू होने की “काफी ज्यादा संभावना” है। खाड़ी देशों, Pakistan और Iran के अधिकारियों ने भी संकेत दिए हैं कि दोनों पक्षों की टीमें इस हफ्ते के अंत तक फिर से पाकिस्तान लौट सकती हैं, हालांकि अभी तारीख तय नहीं हुई है। तेल बाजार को राहत वार्ता दोबारा शुरू होने की उम्मीद से वैश्विक तेल बाजार में कुछ राहत देखने को मिली। मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गईं, जिससे निवेशकों को थोड़ी राहत मिली।
अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति वार्ता से ठीक पहले एक भावनात्मक और तनावपूर्ण दृश्य सामने आया, जिसने पूरे कूटनीतिक माहौल को और अधिक संवेदनशील बना दिया। ईरान के संसद अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf जब इस्लामाबाद पहुंचे, तो वे केवल वार्ता के एजेंडे के साथ नहीं, बल्कि मीनाब हमले में मारे गए मासूम बच्चों की यादों को भी अपने साथ लेकर आए। मीनाब हमले का दर्द फिर आया सामने फरवरी में ईरान के मीनाब शहर के एक गर्ल्स स्कूल पर हुए भीषण हमले में 165 से अधिक बच्चियों की मौत हो गई थी। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। अब, जब शांति वार्ता की कोशिशें तेज हुई हैं, ईरान ने इस दर्दनाक घटना को फिर से दुनिया के सामने रखा है। इस्लामाबाद की यात्रा के दौरान गालिबाफ अपने साथ उन बच्चों की तस्वीरें, खून से सने स्कूल बैग और जूते लेकर पहुंचे। विमान में इन सामानों को सीटों पर रखकर वे उन्हें लगातार निहारते रहे। यह दृश्य न केवल व्यक्तिगत शोक का प्रतीक था, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी था कि ईरान इस त्रासदी को भूला नहीं है। वार्ता से पहले भावनात्मक संदेश या रणनीतिक संकेत? विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम केवल संवेदनाओं का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत भी हो सकता है। ईरान यह दिखाना चाहता है कि शांति वार्ता सिर्फ राजनीतिक समझौता नहीं, बल्कि उन जख्मों को भी संबोधित करने की प्रक्रिया है, जो युद्ध ने छोड़े हैं। ईरान ने इस हमले के लिए अमेरिका और इजरायल को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि अमेरिका की ओर से इस दावे को खारिज करते हुए कहा गया कि निशाना सैन्य ठिकाने थे, न कि स्कूल। क्या आसान होगी शांति की राह? इस बीच, Donald Trump प्रशासन की ओर से लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि ईरान जल्द से जल्द समझौते की दिशा में आगे बढ़े। लेकिन गालिबाफ की यह पहल साफ संकेत देती है कि तेहरान बिना ठोस आश्वासन और न्याय के किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं होगा। क्षेत्रीय तनाव और वैश्विक असर ईरान-अमेरिका के बीच जारी यह टकराव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है। इसका असर वैश्विक राजनीति, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता पर भी पड़ रहा है। ऐसे में इस्लामाबाद में हो रही वार्ता बेहद अहम मानी जा रही है। हालांकि, मीनाब हमले की यादें और उससे जुड़ा दर्द यह साफ कर रहा है कि शांति की राह आसान नहीं होगी। यह वार्ता केवल कूटनीति नहीं, बल्कि भावनाओं, विश्वास और न्याय के बीच संतुलन की परीक्षा भी है।
तिरुवंतपुरम, एजेंसियां। सबरीमाला मंदिर में सामने आए कथित घी घोटाले की जांच को पूरा करने के लिए Kerala High Court ने विजिलेंस ब्यूरो को 30 दिन का अतिरिक्त समय दे दिया है। अदालत ने कहा कि जांच में कई नए पहलू सामने आने के कारण समय बढ़ाना जरूरी था। विजिलेंस की दलील के बाद मिला विस्तार Vigilance and Anti-Corruption Bureau Kerala ने अदालत में बताया कि मामले में त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) के कई और कर्मचारी संदिग्ध पाए गए हैं, जिनकी भूमिका की जांच अभी बाकी है। इसी आधार पर जांच एजेंसी ने अतिरिक्त समय की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। 33 लोगों के खिलाफ दर्ज है FIR जांच एजेंसी ने शुरुआत में 33 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। आरोप है कि मंदिर में बेचे गए घी पैकेट की बिक्री से प्राप्त राशि को देवस्वोम खाते में जमा नहीं किया गया, जिससे वित्तीय गड़बड़ी सामने आई। अभिलेखों की गड़बड़ी बनी बड़ी चुनौती जांच में यह भी पाया गया कि टीडीबी द्वारा रिकॉर्ड का अनुचित और लापरवाह रखरखाव किया गया, जिससे जांच प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। अदालत ने इसे गंभीर बाधा बताया और विस्तृत जांच के निर्देश दिए। लाखों का राजस्व नुकसान सामने आया रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 16,628 घी पैकेट की बिक्री राशि जमा नहीं की गई, जबकि बाद की अवधि में 22,565 पैकेट की कमी भी पाई गई। इससे लाखों रुपये के राजस्व नुकसान की आशंका जताई गई है। कोर्ट का सख्त निर्देश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जांच एजेंसी को सभी संदिग्धों की भूमिका स्पष्ट करने और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। साथ ही अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने से पहले अदालत की अनुमति लेना अनिवार्य किया गया है।
US Iran Talks Islamabad: अमेरिका और ईरान के बीच 11 अप्रैल को होने वाली अहम वार्ता से पहले पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को पूरी तरह हाई-सिक्योरिटी ज़ोन में बदल दिया गया है। सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम ‘रेड ज़ोन’ पूरी तरह सील संसद, दूतावास और होटल इलाके में सीमित एंट्री शहरभर में चेकपॉइंट्स और सशस्त्र पुलिस तैनात कई सड़कों पर आवागमन बंद, रूट डायवर्ट दो दिन का पब्लिक हॉलिडे गुरुवार और शुक्रवार को इस्लामाबाद में छुट्टी स्कूल, दुकानें बंद सड़कों पर कम भीड़ रखने की रणनीति आसमान में भी सुरक्षा कवच PAF ने C-130 विमान और IL-78 टैंकर तैनात किए फाइटर जेट्स ईरानी प्रतिनिधिमंडल को एस्कॉर्ट करते दिखे AWACS सिस्टम से हवाई निगरानी उद्देश्य: किसी भी संभावित हमले, खासकर इजरायली खतरे को रोकना अमेरिकी टीम पहले से मौजूद 30 सदस्यीय अमेरिकी एडवांस टीम पहुंच चुकी पाकिस्तान ने दिया फुलप्रूफ सिक्योरिटी का भरोसा हालांकि, कुछ अमेरिकी नेताओं ने सुरक्षा पर चिंता जताई वीजा-ऑन-अराइवल की सुविधा प्रतिनिधियों और पत्रकारों के लिए आगमन पर वीजा एयरपोर्ट पर स्पेशल हेल्प डेस्क एंट्री प्रोसेस को बनाया गया आसान क्यों अहम है ये वार्ता? 14 दिन के सीजफायर के बाद पहली बड़ी बातचीत पूरी दुनिया की नजरें इस मीटिंग पर पाकिस्तान के लिए डिप्लोमैटिक टेस्ट
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।