higher education news

Education System
अब एक बैंक खाते से होगा राज्य के सभी विश्वविद्यालयों का वित्तीय लेनदेन

रांची। झारखंड सरकार राज्य के सभी विश्वविद्यालयों की वित्तीय व्यवस्था में व्यापक सुधार करने जा रही है। इसके तहत वर्षों से अलग-अलग विभागों, अंगीभूत कॉलेजों, परीक्षा शाखाओं और विभिन्न योजनाओं के नाम पर संचालित बैंक खातों की व्यवस्था समाप्त कर दी जाएगी। अब प्रत्येक विश्वविद्यालय का केवल एक सिंगल नोडल अकाउंट (एसएनए) होगा, जिसके माध्यम से सभी वित्तीय लेनदेन किए जाएंगे। इस नई व्यवस्था के लिए "स्टैच्यूट्स फॉर फाइनेंस एंड अकाउंट मैनेजमेंट (Statutes for Finance and Account Management) इन स्टेट यूनिवर्सिटीज ऑफ झारखंड" का मसौदा (Draft ) तैयार कर लिया गया है।   ई-समर्थ पोर्टल से होगा पूरा वित्तीय प्रबंधन नई व्यवस्था लागू होने के बाद बजट तैयार करने, भुगतान, लेखांकन, बैंक मिलान, ऑडिट और वित्तीय रिपोर्टिंग तक की पूरी प्रक्रिया ई-समर्थ पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन संचालित होगी। नकद भुगतान और मैनुअल वाउचर की व्यवस्था पूरी तरह समाप्त कर दी जाएगी। प्रत्येक भुगतान का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहेगा, जिससे किसी भी समय उसकी जांच और ऑडिट करना आसान होगा। सरकार का उद्देश्य वित्तीय पारदर्शिता बढ़ाना और अनियमितताओं पर पूरी तरह रोक लगाना है।   तीन स्तर की मंजूरी के बाद होगा भुगतान वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए मेकर, चेकर और अप्रूविंग अथॉरिटी की तीन-स्तरीय प्रणाली लागू की जाएगी। किसी भी भुगतान को जारी करने से पहले इन तीनों स्तरों से स्वीकृति आवश्यक होगी। यदि स्वीकृत बजट से अधिक राशि खर्च करनी होगी तो उसके लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। साथ ही आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए कंटिंजेंसी फंड बनाने का भी प्रावधान किया गया है।   90 से 365 दिनों में लागू होगी नई व्यवस्था अध्यादेश लागू होने के बाद सभी विश्वविद्यालयों को 90 से 365 दिनों के भीतर अपने पुराने बैंक खातों और उनमें उपलब्ध राशि को सिंगल नोडल अकाउंट में स्थानांतरित करना होगा। इसके बाद सभी अनुदान, योजनागत राशि और विशेष उद्देश्य के लिए मिलने वाले फंड का उपयोग केवल निर्धारित कार्यों के लिए ही किया जा सकेगा। किसी अन्य मद में राशि खर्च करने की अनुमति नहीं होगी।   समय पर वेतन और वित्तीय पारदर्शिता पर जोर नई व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ शिक्षकों और कर्मचारियों को मिलेगा। सरकार का लक्ष्य है कि सभी विश्वविद्यालयों में प्रत्येक माह की तीन तारीख तक वेतन का भुगतान सुनिश्चित किया जाए। इसके अलावा वर्षों से लंबित वित्तीय गड़बड़ियों और ऑडिट आपत्तियों को भी दूर किया जा सकेगा। वर्तमान में कई विश्वविद्यालयों में दर्जनों बैंक खाते संचालित हैं, जिनमें से कई वर्षों से निष्क्रिय पड़े हैं। कुछ मामलों में बड़ी राशि का समायोजन भी लंबित है, जिससे नियमित रूप से ऑडिट में आपत्तियां उठती रही हैं।   सरकार का मानना है कि सिंगल नोडल अकाउंट और डिजिटल वित्तीय प्रणाली लागू होने से राज्य के विश्वविद्यालयों में पारदर्शिता, जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन मजबूत होगा। साथ ही सरकारी अनुदानों के उपयोग की निगरानी भी पहले से अधिक प्रभावी और आसान हो जाएगी।

anjali kumari जुलाई 2, 2026 0
college employees Jharkhand
झारखंड में यूनिवर्सिटी और कॉलेज कर्मियों के लिए बनेगा ट्रिब्यूनल

रांची। झारखंड सरकार ने सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कार्यरत शिक्षकों एवं कर्मचारियों के लिए बड़ी पहल की है। अब सेवा संबंधी विवादों के समाधान के लिए राज्य स्तर पर एक विशेष ट्रिब्यूनल का गठन किया जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य कर्मचारियों को छोटी-बड़ी शिकायतों के लिए सीधे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाने से राहत देना और मामलों का त्वरित निपटारा सुनिश्चित करना है।   पहले शिकायत समिति, फिर ट्रिब्यूनल में अपील नई व्यवस्था के तहत सबसे पहले कर्मचारियों की शिकायतों की सुनवाई शिकायत निवारण समिति करेगी। यदि कर्मचारी समिति के फैसले से संतुष्ट नहीं होते हैं, तो वे ट्रिब्यूनल में अपील कर सकेंगे। हालांकि, जो मामले पहले से हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट या किसी अन्य न्यायाधिकरण में लंबित हैं, उनकी सुनवाई इस ट्रिब्यूनल में नहीं होगी।   कौन करेगा ट्रिब्यूनल की अगुवाई? प्रस्तावित ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या ऐसे व्यक्ति करेंगे जो हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनने की योग्यता रखते हों। इसके अलावा इसमें अनुभवी अधिवक्ता, झारखंड वित्तीय सेवा के संयुक्त सचिव स्तर के सेवानिवृत्त अधिकारी और प्रशासनिक विशेषज्ञ सदस्य होंगे। किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर को सदस्य सचिव बनाया जाएगा। सभी सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष का होगा।   इन मामलों में कर सकेंगे अपील यदि किसी शिक्षक या कर्मचारी को नौकरी से हटाया जाता है, सेवा समाप्त की जाती है, जबरन सेवानिवृत्त किया जाता है या पदावनत किया जाता है, तो वह ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटा सकेगा। सरकार का मानना है कि इससे वेतन, नियुक्ति, प्रोन्नति और सेवा शर्तों से जुड़े विवादों का जल्द समाधान होगा।   आदेश नहीं मानने पर लगेगा जुर्माना फिलहाल झारखंड के सरकारी विश्वविद्यालयों से जुड़े करीब 650 मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। इन्हें कम करने के उद्देश्य से ट्रिब्यूनल की व्यवस्था लागू की जा रही है। यदि कोई विश्वविद्यालय ट्रिब्यूनल के आदेशों का पालन नहीं करता है, तो पहली बार एक लाख रुपये तक और दोबारा उल्लंघन करने पर पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। सरकार को उम्मीद है कि इस नई व्यवस्था से विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में सेवा संबंधी विवादों का निपटारा तेज, पारदर्शी और प्रभावी ढंग से हो सकेगा।

anjali kumari जुलाई 1, 2026 0
ranchi university admission
रांची विश्वविद्यालय में एडमिशन प्रक्रिया अटकी, लाखों छात्र कर रहे इंतजार

रांची। रांची यूनिवर्सिटी में स्नातक और इंटरमीडिएट नामांकन प्रक्रिया अब तक शुरू नहीं होने से लाखों छात्र-छात्राओं की चिंता बढ़ गई है। झारखंड एकेडमिक काउंसिल (JAC) तथा CBSE और ICSE बोर्ड के परीक्षा परिणाम जारी होने के बाद विद्यार्थी उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिले का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अब तक कोई आधिकारिक तिथि घोषित नहीं की गई है।   रांची विश्वविद्यालय राज्य का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय माना जाता है, जहां संबद्ध कॉलेजों में स्नातक स्तर पर करीब 45 हजार सीटें उपलब्ध हैं। हर वर्ष राज्यभर से हजारों छात्र यहां दाखिला लेते हैं। इस बार स्थिति अधिक गंभीर इसलिए मानी जा रही है क्योंकि JAC के अनुसार मैट्रिक में 4 लाख से अधिक और इंटरमीडिएट में लगभग 3 लाख छात्र सफल हुए हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में विद्यार्थी अब एडमिशन प्रक्रिया शुरू होने का इंतजार कर रहे हैं।   नई शिक्षा नीति और क्लस्टर सिस्टम बना वजह विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि नई शिक्षा नीति (NEP) और क्लस्टर सिस्टम को लेकर राज्य सरकार और उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग से अंतिम दिशा-निर्देश का इंतजार किया जा रहा है। इसी कारण चांसलर पोर्टल अब तक सक्रिय नहीं किया जा सका है। नई शिक्षा नीति बहुविषयक और लचीली शिक्षा प्रणाली पर जोर देती है, जबकि क्लस्टर सिस्टम के तहत कॉलेजों को सीमित विषय आधारित ढांचे में व्यवस्थित करने की तैयारी चल रही है। इन दोनों व्यवस्थाओं के बीच तालमेल बैठाना प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है।   देरी से छात्रों की बढ़ी परेशानी नामांकन में देरी के कारण छात्र लगातार विश्वविद्यालय और कॉलेजों के चक्कर लगा रहे हैं। ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थियों को आवास, दस्तावेज सत्यापन और कोर्स चयन को लेकर दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। शिक्षाविदों का कहना है कि पहले से ही विश्वविद्यालय का सत्र लेट चल रहा है, ऐसे में एडमिशन में और देरी छात्रों के करियर और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को प्रभावित कर सकती है।   विश्वविद्यालय प्रशासन ने दावा किया है कि प्रक्रिया को पारदर्शी और सरल बनाया जाएगा तथा इस वर्ष भी ऑनलाइन आवेदन चांसलर पोर्टल के माध्यम से लिए जाने की संभावना है।

Unknown मई 14, 2026 0
Popular post
शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Top week

Italian Prime Minister Giorgia Meloni addresses reporters amid controversy over Italy's role during the Iran conflict.
दुनिया

NATO चीफ के बयान से इटली में सियासी बवाल, PM जॉर्जिया मेलोनी ने दी सफाई; ईरान को भी कराया फोन

Deepshikha जून 26, 2026 0