Ujjain Mahakal Bhasma Aarti: सावन माह के पहले सोमवार पर मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। तड़के सुबह होने वाली विश्व प्रसिद्ध भस्म आरती में शामिल होने के लिए देशभर से हजारों श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया गया और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूरे विधि-विधान से भस्म आरती संपन्न हुई। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर 'हर-हर महादेव' और 'जय श्री महाकाल' के जयघोष से गूंज उठा। तड़के सुबह शुरू हुई भस्म आरती सावन के पहले सोमवार को महाकाल मंदिर में सुबह ब्रह्म मुहूर्त में भस्म आरती का आयोजन किया गया। भगवान महाकाल का आकर्षक श्रृंगार किया गया और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ आरती संपन्न हुई। इस अलौकिक दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु रात से ही मंदिर परिसर में पहुंच गए थे। देशभर से पहुंचे श्रद्धालु सावन के पहले सोमवार के अवसर पर महाकाल के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ा। मंदिर के बाहर लंबी-लंबी कतारें देखने को मिलीं। श्रद्धालुओं में भगवान महाकाल के दर्शन और भस्म आरती में शामिल होने को लेकर विशेष उत्साह दिखाई दिया। सुरक्षा और व्यवस्थाएं रहीं चाक-चौबंद श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन और मंदिर समिति ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए। मंदिर परिसर और आसपास अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया। दर्शन व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए बैरिकेडिंग, ट्रैफिक नियंत्रण और मेडिकल सुविधाओं की भी व्यवस्था की गई। महाकाल मंदिर का विशेष महत्व उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां भगवान शिव महाकाल स्वरूप में विराजमान हैं, जिन्हें काल और मृत्यु का भी स्वामी माना जाता है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु हर वर्ष महाकाल के दर्शन के लिए उज्जैन पहुंचते हैं। क्यों खास है भस्म आरती? महाकाल मंदिर की भस्म आरती दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यह आरती प्रतिदिन तड़के ब्रह्म मुहूर्त में होती है, जिसमें भगवान महाकाल का विशेष अभिषेक और श्रृंगार किया जाता है। सावन महीने में इस आरती का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है, इसलिए इस दौरान श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक रहती है।
नई दिल्ली: भगवान शिव को समर्पित सावन का महीना हिंदू धर्म में सबसे पवित्र और शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस महीने श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई शिव आराधना से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। वर्ष 2026 में सावन मास के दौरान चार सोमवार व्रत पड़ रहे हैं, जिनका धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन के प्रत्येक सोमवार पर विशेष पूजा और कुछ खास सामग्री अर्पित करने से विभिन्न ग्रहों की शुभता बढ़ती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आने की मान्यता है। सावन सोमवार का धार्मिक महत्व सावन का प्रत्येक सोमवार भगवान शिव की विशेष आराधना के लिए समर्पित होता है। इस दिन व्रत रखने, शिवलिंग का जलाभिषेक करने और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। कहा जाता है कि— अविवाहित युवाओं को योग्य जीवनसाथी मिलने का आशीर्वाद मिलता है। विवाहित दंपतियों के वैवाहिक जीवन में प्रेम और विश्वास बढ़ता है। परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है। नकारात्मक ऊर्जा और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। सावन 2026 के चार सोमवार की तिथियां पहला सावन सोमवार: 3 अगस्त 2026 दूसरा सावन सोमवार: 10 अगस्त 2026 तीसरा सावन सोमवार: 17 अगस्त 2026 चौथा सावन सोमवार: 24 अगस्त 2026 चारों सोमवार पर ग्रहों को मजबूत करने के उपाय पहला सोमवार – 3 अगस्त 2026 शिवलिंग पर दूध और चावल अर्पित करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इससे शुक्र और चंद्र ग्रह की शुभता बढ़ती है तथा मानसिक शांति और पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है। दूसरा सोमवार – 10 अगस्त 2026 भगवान शिव को लाल मसूर की दाल और गुड़ अर्पित करें। मान्यता है कि इससे आर्थिक परेशानियां कम होती हैं और कर्ज से राहत मिलने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। तीसरा सोमवार – 17 अगस्त 2026 इस दिन हरी मूंग और गेहूं अर्पित करें। माना जाता है कि इससे बुध और सूर्य ग्रह मजबूत होते हैं तथा बुद्धि, आत्मविश्वास और कार्यक्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। चौथा सोमवार – 24 अगस्त 2026 शिवलिंग पर अरहर या चने की दाल अर्पित करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे गुरु ग्रह की शुभता बढ़ती है और भाग्योदय के योग मजबूत होते हैं। सावन में शिवलिंग जलाभिषेक की सही विधि सावन सोमवार के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान शिव का विधिपूर्वक अभिषेक करें। पूजा के दौरान— शुद्ध जल और गंगाजल अर्पित करें। दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से पंचामृत अभिषेक करें। अंत में पुनः शुद्ध जल चढ़ाएं। बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र, सफेद पुष्प और भस्म अर्पित करें। "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करें। शिव चालीसा का पाठ करें। कपूर से आरती कर फल या मिठाई का भोग लगाएं। धार्मिक मान्यता धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन के चारों सोमवार श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत एवं पूजा करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। इससे आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होने की मान्यता है। हालांकि, ग्रहों पर प्रभाव और अन्य धार्मिक मान्यताएं आस्था पर आधारित हैं।
नई दिल्ली: सनातन धर्म में गुरु को ज्ञान, संस्कार और जीवन का मार्गदर्शक माना गया है। इसलिए गुरु पूर्णिमा केवल गुरु के सम्मान का पर्व नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति, श्रद्धा और ज्ञान का भी प्रतीक है। इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। इस दिन महर्षि वेदव्यास की जयंती भी मनाई जाती है, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर पीले रंग का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा-पाठ से लेकर वस्त्र, प्रसाद और दान तक में पीले रंग का व्यापक उपयोग किया जाता है। आइए जानते हैं कि इस दिन पीला रंग इतना शुभ क्यों माना जाता है। ज्योतिष में पीले रंग का महत्व ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पीला रंग देवगुरु बृहस्पति का प्रतीक है। बृहस्पति को ज्ञान, धर्म, विवेक, शिक्षा, समृद्धि और शुभ भाग्य का कारक ग्रह माना जाता है। मान्यता है कि गुरु पूर्णिमा के दिन पीले वस्त्र पहनने और हल्दी, चने की दाल, पीले फूल या पीले फलों का दान एवं पूजन करने से बृहस्पति ग्रह की कृपा प्राप्त होती है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जिन लोगों की कुंडली में बृहस्पति कमजोर होता है, उनके लिए इस दिन पीले रंग से जुड़े धार्मिक कार्य करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। भगवान विष्णु से जुड़ा है पीले रंग का संबंध धार्मिक ग्रंथों में भगवान विष्णु को पीताम्बरधारी कहा गया है। उनके पीले वस्त्र पवित्रता, संरक्षण, समृद्धि और दिव्यता के प्रतीक माने जाते हैं। इसलिए गुरु पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और गुरु की पूजा में पीले पुष्प, हल्दी, बेसन के लड्डू, केले और अन्य पीले रंग के भोग अर्पित करने की परंपरा है। मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान विष्णु और गुरु दोनों की कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। ज्ञान और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है पीला रंग आध्यात्मिक दृष्टि से पीला रंग प्रकाश, बुद्धिमत्ता, आशावाद और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। गुरु का कार्य शिष्य के जीवन से अज्ञान का अंधकार दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाना होता है। इसी कारण गुरु पूर्णिमा पर पीले रंग का महत्व केवल धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, आत्मिक विकास और सकारात्मक सोच का भी प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन पीले रंग का प्रयोग व्यक्ति के मन में सकारात्मक विचार, मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है। गुरु पूर्णिमा पर क्या करें? पीले या हल्के पीले रंग के वस्त्र धारण करें। गुरु, माता-पिता और शिक्षकों का सम्मान कर उनका आशीर्वाद लें। भगवान विष्णु और महर्षि वेदव्यास की पूजा करें। हल्दी, चने की दाल, पीले फल और पीले फूल अर्पित करें। जरूरतमंदों को पीले रंग की वस्तुओं का दान करें। गुरु पूर्णिमा का संदेश केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन में गुरु के महत्व को स्वीकार करने, ज्ञान का सम्मान करने और सकारात्मक सोच अपनाने का भी है। पीला रंग इसी ज्ञान, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
Devshayani Ekadashi 2026 Mantra: आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली देवशयनी एकादशी सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु चार माह के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और यहीं से चातुर्मास का शुभारंभ होता है। इन चार महीनों में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के साथ ही चातुर्मास समाप्त होता है और शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी का व्रत, पूजा और भगवान विष्णु का विधिपूर्वक शयन कराने से अक्षय पुण्य, सुख-समृद्धि और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। देवशयनी एकादशी पूजा विधि देवशयनी एकादशी के दिन पूजा पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक करनी चाहिए। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। हाथ में अक्षत और जल लेकर व्रत का संकल्प लें। चौकी पर लाल या पीले रंग का स्वच्छ वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान को चंदन, अक्षत, पुष्प, तुलसी दल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। देवशयनी एकादशी व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें। पीपल के वृक्ष की पूजा कर अपनी श्रद्धानुसार दान-पुण्य करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक व्रत का पारण करें। भगवान विष्णु को शयन कराने का मंत्र देवशयनी एकादशी की संध्या के समय भगवान विष्णु को शयन कराया जाता है। इस दौरान निम्न मंत्रों का जाप किया जाता है। मंत्र 1 सुप्ते त्वयि जगन्नाथे जगत् सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे च विबुध्येत प्रसन्नो मे भवाव्यय॥ मंत्र 2 निशि स्वापो दिवोत्थानं संध्यायां परिवर्तनम्॥ (ब्रह्मपुराण) मंत्र 3 मैत्राद्यपादे स्वपितीह विष्णुः। श्रुतेश्च मध्ये परिवर्तमेति। जागर्ति पौष्णस्य तथावसाने नो पारणं तत्र बुधः प्रकुर्यात्॥ (नारदपुराण) भगवान विष्णु को शयन कराने की विधि देवशयनी एकादशी की शाम भगवान विष्णु को योगनिद्रा के लिए शयन कराया जाता है। इसकी पारंपरिक विधि इस प्रकार है— संध्या के समय भगवान विष्णु की प्रतिमा का विशेष श्रृंगार करें। सोना, चांदी, तांबा अथवा कागज की भगवान विष्णु की प्रतिमा का भी पूजन किया जा सकता है। भगवान के लिए स्वच्छ और सुंदर शैय्या तैयार करें। शयन मंत्रों का उच्चारण करते हुए भगवान विष्णु को शैय्या पर विराजमान करें। भगवान के समक्ष फल, मिष्ठान और नैवेद्य अर्पित करें। रात्रि में भजन-कीर्तन और जागरण करना अत्यंत शुभ माना गया है। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पूजा के बाद व्रत का पारण करें। देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और अगले चार महीनों तक चातुर्मास चलता है। यह समय साधना, भक्ति, जप, तप और दान-पुण्य के लिए विशेष फलदायी माना गया है। इस अवधि में विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों से परहेज किया जाता है। जो श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं, उन्हें सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।
Devshayani Ekadashi 2026 Mantra: आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली देवशयनी एकादशी सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु चार माह के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और यहीं से चातुर्मास का शुभारंभ होता है। इन चार महीनों में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के साथ ही चातुर्मास समाप्त होता है और शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी का व्रत, पूजा और भगवान विष्णु का विधिपूर्वक शयन कराने से अक्षय पुण्य, सुख-समृद्धि और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। देवशयनी एकादशी पूजा विधि देवशयनी एकादशी के दिन पूजा पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक करनी चाहिए। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। हाथ में अक्षत और जल लेकर व्रत का संकल्प लें। चौकी पर लाल या पीले रंग का स्वच्छ वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान को चंदन, अक्षत, पुष्प, तुलसी दल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। देवशयनी एकादशी व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें। पीपल के वृक्ष की पूजा कर अपनी श्रद्धानुसार दान-पुण्य करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक व्रत का पारण करें। भगवान विष्णु को शयन कराने का मंत्र देवशयनी एकादशी की संध्या के समय भगवान विष्णु को शयन कराया जाता है। इस दौरान निम्न मंत्रों का जाप किया जाता है। मंत्र 1 सुप्ते त्वयि जगन्नाथे जगत् सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे च विबुध्येत प्रसन्नो मे भवाव्यय॥ मंत्र 2 निशि स्वापो दिवोत्थानं संध्यायां परिवर्तनम्॥ (ब्रह्मपुराण) मंत्र 3 मैत्राद्यपादे स्वपितीह विष्णुः। श्रुतेश्च मध्ये परिवर्तमेति। जागर्ति पौष्णस्य तथावसाने नो पारणं तत्र बुधः प्रकुर्यात्॥ (नारदपुराण) भगवान विष्णु को शयन कराने की विधि देवशयनी एकादशी की शाम भगवान विष्णु को योगनिद्रा के लिए शयन कराया जाता है। इसकी पारंपरिक विधि इस प्रकार है— संध्या के समय भगवान विष्णु की प्रतिमा का विशेष श्रृंगार करें। सोना, चांदी, तांबा अथवा कागज की भगवान विष्णु की प्रतिमा का भी पूजन किया जा सकता है। भगवान के लिए स्वच्छ और सुंदर शैय्या तैयार करें। शयन मंत्रों का उच्चारण करते हुए भगवान विष्णु को शैय्या पर विराजमान करें। भगवान के समक्ष फल, मिष्ठान और नैवेद्य अर्पित करें। रात्रि में भजन-कीर्तन और जागरण करना अत्यंत शुभ माना गया है। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पूजा के बाद व्रत का पारण करें। देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और अगले चार महीनों तक चातुर्मास चलता है। यह समय साधना, भक्ति, जप, तप और दान-पुण्य के लिए विशेष फलदायी माना गया है। इस अवधि में विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों से परहेज किया जाता है। जो श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं, उन्हें सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।
खरसावां। जगन्नाथ रथयात्रा के पांचवें दिन मनाई जाने वाली हेरा पंचमी जगन्नाथ संस्कृति का एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है। यह केवल एक पारंपरिक उत्सव नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ और देवी महालक्ष्मी के बीच प्रेम, विरह और मान-मनौव्वल का प्रतीक माना जाता है। ओडिशा के श्रीजगन्नाथ पुरी की तर्ज पर झारखंड के सरायकेला, खरसावां और हरिभंजा में भी सोमवार को श्रद्धा और परंपरा के साथ रथ भंगिनी की रस्म निभाई जाएगी। हेरा पंचमी के अवसर पर क्या होता है? हेरा पंचमी के अवसर पर शाम को मां महालक्ष्मी की कांस्य प्रतिमा को श्रीमंदिर स्थित लक्ष्मी मंदिर से विशेष पालकी में विराजमान कर भव्य शोभायात्रा के साथ गुंडिचा मंदिर ले जाया जाएगा। मंदिर के मुख्य द्वार पर विधि-विधान से पूजा और पारंपरिक संवाद के बाद देवी महालक्ष्मी भगवान जगन्नाथ के नंदीघोष रथ तक पहुंचेंगी। यहां वह अपनी नाराजगी के प्रतीक स्वरूप रथ के अगले हिस्से की लकड़ी और पहिए को प्रतीकात्मक रूप से क्षतिग्रस्त करेंगी। इसी रस्म को रथ भंगिनी कहा जाता है। इसके बाद पुजारी और सेवायत देवी का मान-मनौव्वल कर उन्हें सम्मानपूर्वक श्रीमंदिर वापस ले जाएंगे। इस अनुष्ठान में भगवान जगन्नाथ के सेवकों की अपेक्षा मां लक्ष्मी के भक्तों, विशेषकर महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु पालकी यात्रा में शामिल होकर इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ गुंडिचा मंदिर चले जाते हैं और कई दिनों तक वापस नहीं लौटते। इससे नाराज होकर देवी महालक्ष्मी स्वयं उनसे मिलने पहुंचती हैं और क्रोध में उनके रथ का एक हिस्सा प्रतीकात्मक रूप से तोड़ देती हैं। पुजारियों के माध्यम से ओड़िया भाषा में मान-मनौव्वल के बाद देवी लौट जाती हैं। हेरा पंचमी के साथ ही भगवान जगन्नाथ की श्रीमंदिर वापसी यानी बाहुड़ा रथयात्रा की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं। इस परंपरा को जगन्नाथ संस्कृति में विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व प्राप्त है।
ओडिशा के पुरी में गुरुवार को विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा श्रद्धा, उत्साह और धार्मिक आस्था के बीच शुरू हो गई। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के अवसर पर आयोजित इस ऐतिहासिक यात्रा में देश-विदेश से पहुंचे लाखों श्रद्धालुओं ने "जय जगन्नाथ" के जयघोष के बीच भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के दर्शन किए। पारंपरिक अनुष्ठानों के बाद तीनों देव विग्रह अपने-अपने भव्य रथों पर विराजमान होकर गुंडिचा मंदिर, जिसे भगवान की मौसी का घर माना जाता है, के लिए रवाना हुए। सुबह से पूरे हुए सभी धार्मिक अनुष्ठान मंदिर प्रशासन के अनुसार, सुबह मंगला आरती, स्नान पूजा और विशेष श्रृंगार के बाद भगवान को गोपाल वल्लभ भोग और राजभोग अर्पित किया गया। इसके बाद पारंपरिक 'पाहांडी बिजे' अनुष्ठान के तहत देव विग्रहों को गर्भगृह से बाहर लाया गया। सबसे पहले सुदर्शन चक्र, फिर भगवान बलभद्र, माता सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ को उनके निर्धारित रथों पर विराजमान कराया गया। हल्की बारिश को माना गया शुभ संकेत रथ यात्रा की शुरुआत के दौरान पुरी में हल्की बारिश भी हुई। श्रद्धालु इसे भगवान जगन्नाथ की कृपा और शुभ संकेत के रूप में देख रहे हैं। धार्मिक मान्यता है कि रथ यात्रा के दिन वर्षा होना समृद्धि और भगवान की प्रसन्नता का प्रतीक माना जाता है। गजपति महाराज ने निभाई 'चेरा पहरा' की परंपरा रथों पर भगवान के विराजमान होने के बाद रथ यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक 'चेरा पहरा' का आयोजन किया गया। इस रस्म के तहत पुरी के गजपति महाराज ने स्वयं सेवक का रूप धारण कर सोने की झाड़ू से तीनों रथों की प्रतीकात्मक सफाई की। यह परंपरा समाज में समानता और सेवा भाव का संदेश देती है। श्रद्धालुओं ने खींचे तीनों रथ सभी धार्मिक अनुष्ठानों के पूरा होने के बाद भगवान जगन्नाथ के नंदीघोष, भगवान बलभद्र के तालध्वज और देवी सुभद्रा के दर्पदलन रथ को खींचने की प्रक्रिया शुरू हुई। हजारों श्रद्धालुओं ने मोटी रस्सियों को थामकर पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ रथों को आगे बढ़ाया। महाप्रभु का यह दिव्य कारवां धीरे-धीरे गुंडिचा मंदिर की ओर बढ़ रहा है, जहां पहुंचने के बाद विशेष पूजा और संध्या आरती का आयोजन किया जाएगा। सुरक्षा के बीच भक्ति का महासंगम रथ यात्रा को लेकर पुरी में व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई है। प्रशासन की निगरानी में लाखों श्रद्धालु शांतिपूर्ण ढंग से यात्रा में शामिल हो रहे हैं। हर ओर भक्ति, उल्लास और आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिल रहा है, जिससे पुरी पूरी तरह जगन्नाथमय हो गया है।
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा का शुभारंभ होता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ भव्य रथ पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से गुंडीचा मंदिर की यात्रा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि रथ यात्रा में शामिल होकर भगवान के रथ को खींचने से सौ यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। यदि आप किसी कारणवश रथ यात्रा में शामिल नहीं हो पा रहे हैं, तो श्रद्धा और भक्ति के साथ घर पर भगवान जगन्नाथ की पूजा, मंत्र जाप और स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई आराधना भगवान की कृपा प्राप्त करने का माध्यम बनती है। घर पर भगवान जगन्नाथ की पूजा कैसे करें? घर पर भगवान जगन्नाथ की पूजा करने के लिए इन सरल चरणों का पालन करें— सबसे पहले पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें और गंगाजल छिड़ककर उसे शुद्ध करें। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। घी का दीपक और धूप जलाकर पूजा का प्रारंभ करें। भगवान को चंदन, रोली, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें। इसके बाद भगवान जगन्नाथ के मंत्रों और स्तोत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करें। मालपुआ, मौसमी फल तथा सात्विक (बिना प्याज-लहसुन) भोजन का भोग अर्पित करें। अंत में भगवान जगन्नाथ की आरती करें और परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें। भगवान जगन्नाथ गायत्री मंत्र ॐ जगन्नाथाय विद्महे। महाबलाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ भगवान जगन्नाथ का मूल मंत्र ॐ श्री जगन्नाथाय नमः॥ श्री जगन्नाथ अष्टकम का महत्व धार्मिक मान्यता के अनुसार श्री जगन्नाथ अष्टकम का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र भगवान के दिव्य स्वरूप, करुणा और भक्तों के प्रति उनके स्नेह का वर्णन करता है। परंपरागत विश्वास है कि नियमित रूप से इसका पाठ करने से मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। जगन्नाथ स्तोत्र का महत्व जगन्नाथ स्तोत्र में भगवान श्रीकृष्ण के जगन्नाथ स्वरूप की स्तुति की गई है। इसमें भक्त भगवान से जीवन के कष्टों, भय, दुख और बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, श्रद्धा और विश्वास के साथ इसका पाठ करने से मन में भक्ति, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक संतुलन बढ़ता है। रथ यात्रा का धार्मिक महत्व मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के मिलन का प्रतीक है। इस दौरान भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं और सभी को अपने दर्शन का अवसर प्रदान करते हैं। जो श्रद्धालु रथ यात्रा में शामिल नहीं हो पाते, वे घर पर भगवान का स्मरण, मंत्र जाप, स्तोत्र पाठ और आरती करके भी अपनी भक्ति व्यक्त कर सकते हैं।
पुरी: विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा का शुभारंभ 16 जुलाई 2026 (गुरुवार) से होने जा रहा है। यह भव्य धार्मिक उत्सव 24 जुलाई 2026 (शुक्रवार) तक चलेगा। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई भगवान बलभद्र (बलराम) और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की यात्रा करेंगे। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं और रथ की रस्सियां खींचकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम भी है। आइए जानते हैं जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी 10 महत्वपूर्ण और रोचक बातें। जगन्नाथ रथ यात्रा की 10 खास बातें 1. आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से होती है शुरुआत जगन्नाथ रथ यात्रा हर वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से प्रारंभ होती है। इसकी शुरुआत ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से होती है। 2. तीन देवता, तीन अलग-अलग रथ भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा तीन अलग-अलग रथों में विराजमान होकर गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। यह यात्रा भगवान के अपनी बुआ के घर जाने का प्रतीक मानी जाती है। 3. विशेष लकड़ी से बनते हैं रथ रथ निर्माण के लिए विशेष प्रकार की पवित्र नीम की लकड़ी का उपयोग किया जाता है, जिसे 'दारु' कहा जाता है। शुभ वृक्षों का चयन परंपरागत विधि से किया जाता है। 4. हर रथ का अलग नाम और पहचान भगवान जगन्नाथ का रथ – नंदीघोष (गरुड़ध्वज) भगवान बलभद्र का रथ – तालध्वज देवी सुभद्रा का रथ – दर्पदलन (पद्म रथ) 5. बिना लोहे की कीलों के बनता है रथ मान्यता है कि रथ निर्माण में लोहे की कीलों का उपयोग नहीं किया जाता। रथ निर्माण की प्रक्रिया वसंत पंचमी से शुरू होती है और अक्षय तृतीया से निर्माण कार्य औपचारिक रूप से आरंभ होता है। 6. हेरा पंचमी की अनोखी परंपरा रथ यात्रा के पांचवें दिन 'हेरा पंचमी' मनाई जाती है। मान्यता के अनुसार माता लक्ष्मी नाराज होकर गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं और भगवान जगन्नाथ के रथ के पहिये को सांकेतिक रूप से क्षति पहुंचाती हैं। यह भगवान के बिना उन्हें साथ लिए चले जाने का प्रतीक है। 7. बहुड़ा यात्रा से होती है वापसी भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा लगभग एक सप्ताह गुंडिचा मंदिर में प्रवास करते हैं। इसके बाद आषाढ़ शुक्ल दशमी को उनकी वापसी यात्रा होती है, जिसे बहुड़ा यात्रा कहा जाता है। 8. नीलाद्रि विजय की परंपरा वापसी के बाद भी भगवान जगन्नाथ को माता लक्ष्मी की नाराजगी दूर करनी पड़ती है। जब देवी प्रसन्न होती हैं, तभी भगवान को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश मिलता है। इस रस्म को नीलाद्रि विजय कहा जाता है। 9. सालबेग की मजार पर रुकता है रथ लोकमान्यता के अनुसार रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ मुस्लिम भक्त सालबेग की मजार के पास कुछ समय के लिए रुकता है। यह भगवान की समभाव और सर्वधर्म सम्मान की परंपरा का प्रतीक माना जाता है। 10. रथ की रस्सी खींचना माना जाता है पुण्य धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु भगवान के रथ की रस्सी खींचते हैं, उन्हें पापों से मुक्ति और भगवान विष्णु के धाम में स्थान प्राप्त होता है। यही वजह है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस सेवा का हिस्सा बनने के लिए पुरी पहुंचते हैं। लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का महापर्व पुरी की यह विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा लगभग तीन किलोमीटर लंबी होती है। भीड़ और श्रद्धालुओं की भारी संख्या के कारण कई बार रथों को गुंडिचा मंदिर तक पहुंचने में पूरा दिन या उससे अधिक समय भी लग जाता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति, भक्ति और सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक माना जाता है।
हिंदू धर्म में भड़ली नवमी को वर्ष की सबसे शुभ तिथियों में से एक माना जाता है। इस दिन को 'अबूझ मुहूर्त' की श्रेणी में रखा जाता है, यानी ऐसा शुभ दिन जब कई मांगलिक कार्यों के लिए अलग से पंचांग या शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। वर्ष 2026 में भड़ली नवमी 22 जुलाई को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किए गए शुभ कार्यों से सुख, समृद्धि और सफलता की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यवसाय की शुरुआत और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए यह तिथि विशेष मानी जाती है। क्या होता है 'अबूझ मुहूर्त'? 'अबूझ मुहूर्त' का अर्थ है ऐसा शुभ समय जिसमें पूरे दिन किसी भी समय मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं। मान्यता है कि भड़ली नवमी पर ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति शुभ कार्यों के लिए अनुकूल रहती है, इसलिए अलग से मुहूर्त निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसी वजह से देश के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग इस दिन अपने महत्वपूर्ण कार्यों की शुरुआत करना शुभ मानते हैं। भड़ली नवमी पर कौन-कौन से कार्य किए जाते हैं? धार्मिक परंपराओं के अनुसार भड़ली नवमी पर कई शुभ कार्य किए जा सकते हैं, जैसे— विवाह गृह प्रवेश नए व्यापार की शुरुआत भूमि पूजन संपत्ति खरीदना वाहन खरीदना आभूषण खरीदना नामकरण संस्कार यज्ञ एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान मान्यता है कि इस दिन शुरू किए गए कार्यों में बाधाएं कम आती हैं और सफलता की संभावना बढ़ जाती है। क्यों मानी जाती है इतनी शुभ? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भड़ली नवमी सकारात्मक ऊर्जा, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक है। इसलिए इस दिन किए गए मांगलिक कार्य विशेष फलदायी माने जाते हैं। इसी कारण इसे हिंदू पंचांग की सबसे शुभ तिथियों में शामिल किया जाता है और कई परिवार वर्षों से इस दिन महत्वपूर्ण धार्मिक एवं पारिवारिक आयोजन करते आ रहे हैं। इस दिन किन बातों का रखें ध्यान? भड़ली नवमी के दिन कुछ धार्मिक परंपराओं का पालन करने की भी सलाह दी जाती है। भगवान विष्णु और मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा करें। यदि परिवार या निकट संबंधियों में शोक की स्थिति हो, तो मांगलिक कार्य टालने की परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है। किसी बड़े धार्मिक या पारिवारिक आयोजन से पहले अपने परिवार की परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं का भी ध्यान रखें। धार्मिक महत्व भड़ली नवमी केवल एक शुभ तिथि ही नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का भी महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है। इस दिन शुभ कार्य करने से जीवन में सुख, समृद्धि और शुभ फल की प्राप्ति होने का विश्वास है। यही वजह है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इस तिथि का इंतजार करते हैं और अपने महत्वपूर्ण कार्य इसी दिन संपन्न करते हैं। नोट: भड़ली नवमी को 'अबूझ मुहूर्त' मानने की परंपरा विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकती है। किसी भी बड़े धार्मिक या पारिवारिक निर्णय से पहले स्थानीय परंपराओं या योग्य पुरोहित की सलाह लेना उचित माना जाता है।
कॉक्स बाजार: बांग्लादेश के कॉक्स बाजार जिले में स्थित रोहिंग्या शरणार्थी शिविर में लगातार हो रही भारी बारिश के बीच बड़ा हादसा हो गया। उखिया उपजिले के शरणार्थी कैंप में पहाड़ी ढलान खिसकने से हुए भूस्खलन (लैंडस्लाइड) में आठ बच्चों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका जताई जा रही है। राहत एवं बचाव कार्य युद्धस्तर पर जारी है। भारी बारिश बनी हादसे की वजह लगातार हो रही बारिश के कारण पहाड़ी इलाकों की मिट्टी कमजोर हो गई, जिसके चलते रोहिंग्या कैंप के पास पहाड़ी ढह गई। भूस्खलन की चपेट में कई अस्थायी झोपड़ियां आ गईं, जिससे कैंप में अफरा-तफरी मच गई। लोग अपने परिजनों की तलाश में घटनास्थल पर जुट गए। मलबे से लोगों को निकालने के लिए रेस्क्यू अभियान रिफ्यूजी रिलीफ एंड रिपैट्रिएशन कमिश्नर (RRRC) मिजाननुर रहमान ने बताया कि हादसे के तुरंत बाद स्थानीय लोगों और राहत टीमों की मदद से बचाव अभियान शुरू किया गया। मलबे में फंसे लोगों को बाहर निकालने का प्रयास जारी है। हादसे में घायल हुए पांच बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है। अधिकारियों का कहना है कि मृतकों की संख्या बढ़ सकती है क्योंकि अभी भी कई लोगों के लापता होने की सूचना है। प्रशासन ने जारी की चेतावनी पुलिस और प्रशासन ने बताया कि लगातार बारिश के कारण रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है। बड़ी संख्या में शरणार्थी पहाड़ी ढलानों पर बनी अस्थायी झोपड़ियों में रह रहे हैं, जिससे उनकी सुरक्षा को गंभीर खतरा बना हुआ है। प्रशासन ने संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की है और निगरानी बढ़ा दी गई है। राहत एजेंसियां सक्रिय हादसे के बाद सरकारी एजेंसियों, संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी संस्थाओं और अन्य राहत संगठनों ने प्रभावित इलाके में राहत कार्य तेज कर दिया है। प्रभावित परिवारों को भोजन, दवाइयां, तिरपाल और अन्य जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक, मौसम सामान्य होने तक राहत एवं बचाव अभियान जारी रहेगा और जोखिम वाले इलाकों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का काम तेज किया जाएगा.
आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी इस वर्ष 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और योगिनी एकादशी व्रत कथा का श्रद्धा के साथ पाठ करने से पापों का क्षय होता है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। मान्यता है कि इस एकादशी की महिमा का वर्णन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को किया था। योगिनी एकादशी का धार्मिक महत्व सनातन परंपरा में योगिनी एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना गया है। श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, उपवास, भजन-कीर्तन और व्रत कथा का पाठ करते हैं। मान्यता है कि यह व्रत अनजाने में हुए पापों के प्रायश्चित का अवसर प्रदान करता है और व्यक्ति को मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति तथा सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। योगिनी एकादशी व्रत कथा हेम माली की भूल बनी संकट का कारण पौराणिक कथा के अनुसार, अलकापुरी के राजा कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे। उनकी दैनिक पूजा के लिए हेम माली नामक सेवक मानसरोवर से ताजे फूल लाया करता था। हेम अपनी पत्नी विशालाक्षी से अत्यधिक प्रेम करता था। एक दिन वह फूल लेकर लौट तो आया, लेकिन पूजा स्थल पहुंचने के बजाय अपनी पत्नी के साथ समय बिताने में इतना मग्न हो गया कि भगवान शिव की पूजा के लिए समय पर फूल नहीं पहुंचा सका। कुबेर के श्राप से बदल गई किस्मत जब पूजा का समय बीतने लगा और फूल नहीं पहुंचे, तो कुबेर ने कारण का पता लगाया। उन्हें जब हेम माली की लापरवाही का पता चला तो वे क्रोधित हो गए और उसे श्राप दे दिया कि वह स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर जाएगा, कुष्ठ रोग से पीड़ित होगा और पत्नी के वियोग का दुख सहेगा। श्राप के प्रभाव से हेम माली तत्काल स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरा। उसका शरीर रोगग्रस्त हो गया और वह अपनी पत्नी से भी अलग हो गया। वह लंबे समय तक जंगलों में दुख और कष्ट भरा जीवन बिताने लगा। महर्षि मार्कण्डेय ने बताया मुक्ति का मार्ग भटकते-भटकते एक दिन हेम माली महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुंचा और अपनी पूरी व्यथा सुनाई। महर्षि ने उसे सलाह दी कि वह आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करे और भगवान विष्णु की आराधना करे। उन्होंने बताया कि इस व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और उसे श्राप से मुक्ति मिल जाएगी। व्रत के प्रभाव से मिला नया जीवन हेम माली ने महर्षि के निर्देशानुसार पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया। उसने भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की और रात्रि जागरण भी किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत के पुण्य प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग समाप्त हो गया। उसे अपना दिव्य स्वरूप वापस प्राप्त हुआ और वह पुनः स्वर्ग लौटकर अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ सुखपूर्वक जीवन बिताने लगा। क्या संदेश देती है यह कथा? योगिनी एकादशी की कथा यह संदेश देती है कि जीवन में कर्तव्य, अनुशासन और ईश्वर भक्ति का विशेष महत्व है। यदि व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार कर सच्चे मन से भगवान विष्णु की आराधना करे, तो उसे अपने कर्मों का प्रायशित करने और जीवन में नई शुरुआत करने का अवसर मिल सकता है। धार्मिक सूचना: यह लेख पौराणिक मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथाओं पर आधारित है। आस्था और विश्वास व्यक्तिगत विषय हैं।
आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी इस वर्ष 10 जुलाई 2026 (शुक्रवार) को मनाई जाएगी। यह एकादशी भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत और पूजा करने से पापों का नाश होता है तथा सुख-समृद्धि और शुभ फल की प्राप्ति होती है। वास्तु शास्त्र में भी योगिनी एकादशी से पहले घर में कुछ विशेष बदलाव करने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इन उपायों से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। हालांकि, ये मान्यताएं धार्मिक और पारंपरिक विश्वासों पर आधारित हैं। 1. मुख्य द्वार की अच्छी तरह करें सफाई वास्तु के अनुसार, मुख्य द्वार को सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश द्वार माना जाता है। योगिनी एकादशी से पहले इसकी अच्छी तरह सफाई करें। व्रत वाले दिन सुबह मुख्य द्वार पर हल्दी या कुमकुम से स्वास्तिक का चिन्ह बनाना शुभ माना जाता है। 2. ईशान कोण को रखें साफ और व्यवस्थित घर का उत्तर-पूर्व भाग यानी ईशान कोण पूजा और देव स्थान के लिए शुभ माना जाता है। इस स्थान से कबाड़, टूटी-फूटी वस्तुएं और डस्टबिन हटा दें। यदि संभव हो तो यहां गंगाजल का छिड़काव करें और भगवान विष्णु तथा मां लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पूजा करें। 3. सेंधा नमक वाले पानी से करें सफाई एकादशी से एक दिन पहले पूरे घर में सेंधा नमक मिले पानी से पोंछा लगाने की परंपरा कई लोग अपनाते हैं। इसके बाद भीमसेनी कपूर और लौंग का धुआं पूरे घर में करने की भी मान्यता है, जिसे नकारात्मकता दूर करने और वातावरण को शुद्ध रखने से जोड़ा जाता है। 4. तिजोरी या धन रखने का स्थान रखें व्यवस्थित एकादशी से पहले तिजोरी या जहां धन रखा जाता है, उस स्थान की अच्छी तरह सफाई करें। अनावश्यक कागजात हटा दें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, व्रत वाले दिन लाल या पीले कपड़े में हल्दी की गांठ और गोमती चक्र रखकर तिजोरी में रखने से आर्थिक उन्नति के योग बनते हैं। 5. पूजा स्थान को करें शुद्ध और सजाएं योगिनी एकादशी से पहले घर के पूजा स्थान की साफ-सफाई करें। भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा के लिए दीपक, फूल और प्रसाद की उचित व्यवस्था करें। साफ और व्यवस्थित पूजा स्थल को शुभ माना जाता है और इससे पूजा का वातावरण भी सकारात्मक बनता है। धार्मिक मान्यता धार्मिक ग्रंथों और लोक मान्यताओं के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। हालांकि, वास्तु उपायों के प्रभाव को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं और इन्हें आस्था एवं परंपरा के आधार पर ही देखा जाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान (भाग-2) की संशोधित पाठ्यपुस्तक जारी कर दी है। नई पुस्तक में न्यायपालिका से जुड़े विवादित अध्याय में व्यापक बदलाव किए गए हैं और पहले शामिल विवादास्पद संदर्भों को हटाकर पाठ को अधिक संतुलित और पारंपरिक नागरिक शास्त्र के स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है। न्यायपालिका अध्याय में किए गए बड़े बदलाव संशोधित अध्याय में अब न्याय, संवैधानिक उपचार, अदालतों की संरचना, न्यायाधिकरण , जनहित याचिका और वैकल्पिक विवाद समाधान जैसे विषयों पर अधिक जोर दिया गया है। पहले शामिल न्यायपालिका पर आलोचनात्मक टिप्पणियों और भ्रष्टाचार संबंधी संदर्भों को हटा दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति के बाद हुआ संशोधन इस वर्ष की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने पुस्तक में न्यायपालिका से जुड़े कुछ अंशों पर स्वतः संज्ञान लिया था। इसके बाद NCERT ने पुस्तक का वितरण रोक दिया था और संशोधन की प्रक्रिया शुरू की थी। संशोधित संस्करण अब औपचारिक रूप से छात्रों के लिए जारी कर दिया गया है। नई किताबें स्कूलों तक पहुंचाने की तैयारी NCERT ने राज्यों और संबद्ध विद्यालयों को संशोधित पाठ्यपुस्तक उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। परिषद का कहना है कि नए संस्करण का उद्देश्य छात्रों को न्यायपालिका की भूमिका और भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की बेहतर एवं संतुलित समझ प्रदान करना है।
Rath Yatra 2026: भगवान जगन्नाथ की पवित्र रथ यात्रा हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और भव्य धार्मिक उत्सवों में से एक है। वर्ष 2026 में यह यात्रा 16 जुलाई, गुरुवार से शुरू होगी। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भव्य रथों पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इस अवसर पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु ओडिशा के पुरी पहुंचकर इस ऐतिहासिक यात्रा में शामिल होते हैं। कैसे शुरू हुई जगन्नाथ रथ यात्रा? सुभद्रा की इच्छा से जुड़ी है परंपरा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा ने अपने दोनों भाइयों भगवान कृष्ण और बलभद्र (बलराम) से नगर भ्रमण कराने की इच्छा जताई। अपनी बहन की इच्छा पूरी करने के लिए दोनों भाइयों ने उन्हें रथ पर बैठाकर पूरे नगर का भ्रमण कराया। माना जाता है कि इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है। मौसी के घर जाने की परंपरा रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपने मुख्य मंदिर से निकलकर गुंडीचा मंदिर पहुंचते हैं, जिसे धार्मिक मान्यताओं में भगवान की मौसी का घर माना जाता है। तीनों देवता यहां कुछ दिनों तक विराजमान रहते हैं। इस दौरान उनका विशेष स्वागत किया जाता है और पारंपरिक ओड़िया व्यंजन 'पोड़ा पीठा' का भोग अर्पित किया जाता है। निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद भगवान पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। रथ यात्रा का धार्मिक महत्व भगवान जगन्नाथ को 'जगत के नाथ', अर्थात संपूर्ण संसार के स्वामी कहा जाता है। सामान्य दिनों में श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन के लिए मंदिर जाना पड़ता है, लेकिन रथ यात्रा के दौरान भगवान स्वयं अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर सभी भक्तों को दर्शन देते हैं। धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान के रथ को खींचता है या रथ यात्रा के दर्शन करता है, उसे भगवान जगन्नाथ का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। ऐसी भी मान्यता है कि इस पुण्य कार्य से व्यक्ति के पापों का क्षय होता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। आस्था और संस्कृति का महापर्व जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक भी है। यह उत्सव भाई-बहन के प्रेम, सेवा, समर्पण और भगवान के प्रति अटूट भक्ति का संदेश देता है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस पावन अवसर पर शामिल होकर भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
मुंबई, एजेंसियां। मुंबई में 6 जुलाई को निर्माता बोनी कपूर की बेटी और अर्जुन कपूर की बहन अंशुला कपूर ने अपने लॉन्ग-टाइम बॉयफ्रेंड रोहन ठक्कर के साथ शादी के बंधन में बंधकर नई जिंदगी की शुरुआत की। दोनों की शादी मुंबई के ताज होटल में परिवार और करीबी रिश्तेदारों की मौजूदगी में संपन्न हुई। शादी के कई भावुक और खूबसूरत वीडियो तथा तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। सास ने गले लगाकर दिया आशीर्वाद, भावुक हुए बोनी कपूर शादी के दौरान सामने आए एक वीडियो में अंशुला और रोहन विवाह संबंधी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते नजर आए। इस दौरान रोहन की मां ने दोनों को गले लगाकर आशीर्वाद दिया और बहू अंशुला पर स्नेह लुटाया। वहीं बेटी की शादी के मौके पर बोनी कपूर भी भावुक दिखाई दिए। उन्होंने सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करते हुए दोनों को नई जिंदगी की शुभकामनाएं दीं और उनके सुखद वैवाहिक जीवन की कामना की। भाई अर्जुन संग भावुक पल भी बना चर्चा का विषय शादी से पहले आयोजित प्री-वेडिंग समारोह की तस्वीरों में अंशुला कपूर अपने भाई अर्जुन कपूर को गले लगाकर भावुक होती नजर आई थीं। यह तस्वीर सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुई और फैंस ने भाई-बहन के रिश्ते की जमकर सराहना की। डेटिंग ऐप से शुरू हुई थी प्रेम कहानी अंशुला और रोहन की पहली मुलाकात वर्ष 2022 में एक डेटिंग ऐप के जरिए हुई थी। दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदली और जुलाई 2025 में रोहन ने न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क में घुटनों पर बैठकर अंशुला को प्रपोज किया। इसके बाद अक्टूबर 2025 में दोनों ने सगाई की थी। 21 जून से शादी की रस्में शुरू हुई थीं, जबकि मेहंदी, चूड़ा और कलीरे की रस्में 5 जुलाई को संपन्न हुईं। अब शादी के साथ दोनों ने अपने रिश्ते को नया मुकाम दे दिया है।
12 जुलाई को रखा जाएगा रवि प्रदोष व्रत, प्रदोष काल में करें भगवान शिव की पूजा Pradosh Vrat 2026: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। जुलाई 2026 का पहला प्रदोष व्रत 12 जुलाई, रविवार को पड़ रहा है। रविवार के दिन होने के कारण इसे रवि प्रदोष व्रत या भानु प्रदोष व्रत कहा जाएगा। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने और व्रत रखने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। प्रदोष व्रत 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रदोष व्रत की पूजा सूर्यास्त के समय यानी प्रदोष काल में करना सबसे शुभ माना जाता है। त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 12 जुलाई 2026, सुबह 02:04 बजे त्रयोदशी तिथि समाप्त: 12 जुलाई 2026, रात 10:29 बजे प्रदोष काल पूजा मुहूर्त: शाम 07:22 बजे से रात 09:24 बजे तक प्रदोष व्रत की पूजा विधि प्रदोष व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें तथा भगवान शिव के समक्ष दीपक प्रज्वलित करें। दिनभर श्रद्धा के साथ व्रत रखें। अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार निराहार या फलाहार रह सकते हैं। इस दौरान "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करना शुभ माना जाता है। शाम को प्रदोष काल से पहले स्नान कर पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। इसके बाद उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान शिव की पूजा आरंभ करें। शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक करें और फिर चंदन, बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद पुष्प तथा अक्षत अर्पित करें। इसके बाद भगवान शिव को फल और मिठाई का भोग लगाएं। अंत में शिव चालीसा और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें तथा कपूर या दीपक से भगवान शिव की आरती करें। पूजा पूर्ण होने के बाद प्रसाद वितरित करें और विधि अनुसार व्रत का पारण करें। रवि प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रवि प्रदोष व्रत रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से कुंडली में सूर्य ग्रह की स्थिति मजबूत होती है और व्यक्ति के जीवन से अनेक बाधाएं दूर होती हैं। मान्यता यह भी है कि इस व्रत के पुण्य प्रभाव से पितृ दोष का प्रभाव कम होता है तथा यश, सम्मान, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। नोट: व्रत, पूजा और शुभ मुहूर्त से जुड़ी मान्यताएं धार्मिक विश्वासों और पंचांग पर आधारित हैं। श्रद्धालु स्थानीय परंपरा या अपने पुरोहित की सलाह के अनुसार भी पूजा कर सकते हैं।
नई दिल्ली: आज, 29 जून 2026 (सोमवार) को वट पूर्णिमा व्रत रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना के साथ यह व्रत करती हैं। इस दिन वट (बरगद) वृक्ष, माता सावित्री और सत्यवान की विधि-विधान से पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा और नियमपूर्वक वट पूर्णिमा व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वट पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि वट पूर्णिमा के दिन महिलाओं को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ या लाल एवं पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा के दौरान इन बातों का विशेष ध्यान रखें— सोलह श्रृंगार करके व्रत और पूजा का संकल्प लें। एक बांस की टोकरी में सात प्रकार के अनाज रखें और उसे स्वच्छ कपड़े से ढक दें। पूजा की सामग्री लेकर वट (बरगद) वृक्ष के पास जाएं। वट वृक्ष, माता सावित्री और सत्यवान की विधिवत पूजा करें। वट वृक्ष पर जल अर्पित करें तथा कुमकुम, अक्षत, फूल, फल, रोली और दीप अर्पित करें। कच्चा सूत लपेटते हुए वट वृक्ष की परिक्रमा करें। वट सावित्री व्रत कथा श्रद्धापूर्वक सुनें। पूजा के बाद दान-दक्षिणा करें। चना और गुड़ का प्रसाद अर्पित करें। सुहाग की सामग्री वट वृक्ष पर चढ़ाएं। घर लौटकर पति का आशीर्वाद लें और उन्हें प्रसाद अर्पित करें। वट पूर्णिमा व्रत में क्या करें? सोलह श्रृंगार अवश्य करें। पूजा में सुहाग की सामग्री अर्पित करें। व्रत का पारण परंपरा के अनुसार भीगे हुए चने खाकर करें। पूजा में चढ़ाई गई सुहाग सामग्री किसी सुहागिन महिला, सास या ननद को भेंट करें। वट वृक्ष की 5, 7, 11, 21 या 51 परिक्रमा करें। यदि संभव हो तो 108 परिक्रमा भी की जा सकती है। वट पूर्णिमा व्रत में क्या नहीं करना चाहिए? मन में नकारात्मक विचार न रखें। किसी से विवाद या बहस करने से बचें। जीवनसाथी से क्रोध या कटु व्यवहार न करें। काले, नीले और सफेद रंग के वस्त्र पहनने से बचें। व्रत कथा के दौरान बीच में उठकर न जाएं। पूरी कथा समाप्त होने के बाद ही अपने स्थान से उठें। धार्मिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प, तप और पतिव्रत धर्म के बल पर अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे। तभी से वट पूर्णिमा और वट सावित्री व्रत को अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है।
नई दिल्ली: सनातन धर्म में निर्जला एकादशी का व्रत सबसे महत्वपूर्ण और पुण्यदायी एकादशी व्रतों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने से वर्षभर की सभी एकादशियों के व्रत के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि इसे अत्यंत विशेष स्थान दिया गया है। पद्म पुराण और धर्मशास्त्रों में भी इस व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि महाभारत काल में भीमसेन ने इसी व्रत का पालन किया था। व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक पारण करना आवश्यक माना गया है। निर्जला एकादशी व्रत पारण का शुभ समय धार्मिक पंचांग के अनुसार, निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। वहीं व्रत का पारण 26 जून 2026, शुक्रवार को द्वादशी तिथि में किया जाएगा। व्रत पारण का शुभ समय: सुबह 5:41 बजे से 8:25 बजे तक धर्मशास्त्रों के अनुसार द्वादशी तिथि में निर्धारित समय पर व्रत खोलना शुभ माना जाता है। समय पर पारण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। क्यों खास है निर्जला एकादशी? मान्यता है कि जो व्यक्ति सभी एकादशी व्रत नहीं कर पाता, वह श्रद्धा और नियमपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत रखकर वर्षभर की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त कर सकता है। इस दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की उपासना की जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यह व्रत पापों का नाश करने वाला, सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला और मोक्षदायक माना गया है। पद्म पुराण के अनुसार व्रत पारण की संपूर्ण विधि 1. प्रातःकाल स्नान और शुद्धि द्वादशी तिथि के दिन ब्रह्म मुहूर्त या सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 2. भगवान विष्णु की पूजा स्नान के बाद भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करें। पूजा में गंध, धूप, दीप, पुष्प और सुंदर वस्त्र अर्पित करें। 3. जल कलश का संकल्प पद्म पुराण में जल से भरे घड़े के दान का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा के समय जल से भरे कलश का संकल्प करें। 4. मंत्र का उच्चारण जल के घड़े का संकल्प करते समय यह मंत्र बोलें— "देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक। उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥" अर्थ: हे संसार सागर से पार लगाने वाले भगवान हृषीकेश! इस जलघट के दान से मुझे परम गति प्रदान करें। 5. दान और ब्राह्मण भोजन पूजन के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा यथाशक्ति दान-दक्षिणा दें। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे व्रत का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। 6. व्रत पारण ब्राह्मण भोजन और पूजा के पश्चात स्वयं व्रत का पारण करें। परंपरा के अनुसार व्रत सबसे पहले जल और तुलसी दल ग्रहण करके खोला जाता है। इसके बाद सात्विक भोजन करना शुभ माना जाता है। व्रत करने से क्या मिलता है फल? पद्म पुराण के अनुसार विधिपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत और द्वादशी पर पारण करने वाला व्यक्ति पापों से मुक्ति प्राप्त करता है। साथ ही उसे भगवान विष्णु का आशीर्वाद, सुख-समृद्धि, पारिवारिक खुशहाली और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
Nirjala Ekadashi 2026 Date: हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे पूरे वर्ष की 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है और व्रती पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखते हैं। इसलिए इसे सबसे कठिन और सबसे फलदायी एकादशी भी कहा जाता है। कब है निर्जला एकादशी 2026? पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 24 जून 2026, बुधवार को शाम 6:13 बजे से होगा और इसका समापन 25 जून 2026, गुरुवार को शाम 8:10 बजे पर होगा। उदया तिथि के आधार पर निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। तिथि समय एकादशी तिथि प्रारंभ 24 जून 2026, शाम 6:13 बजे एकादशी तिथि समाप्त 25 जून 2026, शाम 8:10 बजे निर्जला एकादशी व्रत 25 जून 2026, गुरुवार क्यों माना जाता है निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ? शास्त्रों के अनुसार, निर्जला एकादशी का महत्व अत्यंत विशेष है। पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि इस दिन बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु का स्मरण और उपवास करने से मनुष्य को बड़े से बड़े पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस दिन किए गए स्नान, दान, जप और पूजा का फल अक्षय माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत से मेरु पर्वत के समान बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। भीमसेनी एकादशी क्यों कहलाती है? निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों में से भीमसेन अपनी प्रबल भूख के कारण नियमित व्रत नहीं रख पाते थे। तब उन्होंने महर्षि वेदव्यास से ऐसा उपाय पूछा, जिससे उन्हें सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो सके। महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी पर निर्जल रहकर व्रत करने का उपदेश दिया। भीमसेन ने इस कठिन व्रत का पालन किया और उन्हें वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त हुआ। तभी से इसे भीमसेनी एकादशी कहा जाने लगा। क्यों मिलता है 24 एकादशियों के बराबर फल? धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो लोग पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का व्रत करने में सक्षम नहीं होते, उनके लिए निर्जला एकादशी विशेष महत्व रखती है। कहा जाता है कि केवल इस एक व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से वर्षभर में आने वाली सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है। निर्जला एकादशी व्रत की विधि प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन करें। पीले वस्त्र, तुलसी दल, फल और पंचामृत अर्पित करें। दिनभर अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखें। विष्णु मंत्र और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। जरूरतमंदों को दान करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक व्रत का पारण करें।
हिंदू धर्म में स्कंद षष्ठी का विशेष महत्व माना जाता है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिकेय को समर्पित होता है, जिन्हें स्कंद, मुरुगन और कुमारस्वामी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत और पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि, साहस और सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। स्कंद षष्ठी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, स्कंद षष्ठी तिथि 19 जून 2026 को शाम 5:00 बजे से शुरू होकर 20 जून 2026 को दोपहर 3:47 बजे तक रहेगी। इस दिन कई शुभ योग और विशेष मुहूर्त बन रहे हैं, जिनका धार्मिक दृष्टि से खास महत्व माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:03 बजे से 4:43 बजे तक अमृत काल: सुबह 8:36 बजे से 10:06 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:54 बजे से दोपहर 12:50 बजे तक विजय मुहूर्त: दोपहर 2:42 बजे से 3:38 बजे तक इस वर्ष स्कंद षष्ठी पर रवि योग और निशिता मुहूर्त जैसे शुभ संयोग भी बन रहे हैं, जिससे इस पर्व का आध्यात्मिक महत्व और बढ़ गया है। स्कंद षष्ठी पर करें यह आसान उपाय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय को लाल या पीले रंग के फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान "ॐ स्कन्दाय नमः" मंत्र का 108 बार जाप करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मन को शांति मिलती है। इसके अलावा पूजा स्थल पर घी का दीपक जलाकर कुछ समय भगवान कार्तिकेय का ध्यान करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि इससे मानसिक तनाव कम होता है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। भगवान कार्तिकेय और तारकासुर की कथा का संदेश पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कार्तिकेय ने अपनी दिव्य शक्ति और पराक्रम से अत्याचारी दैत्य तारकासुर का वध किया था। यह कथा केवल देव और दानव के युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक भी मानी जाती है। भगवान कार्तिकेय का जीवन यह संदेश देता है कि साहस, संयम और सही दिशा में किए गए प्रयास किसी भी कठिनाई पर विजय दिला सकते हैं। स्कंद षष्ठी का आध्यात्मिक महत्व स्कंद षष्ठी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मबल, सकारात्मक सोच और नई शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है। मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति से किए गए छोटे-छोटे उपाय भी जीवन में बड़े सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।