Human Rights

NHRC seeks report from Patna SSP over Roshan Anand arrest and warns of further action by September 3
रोशन आनंद की गिरफ्तारी पर NHRC सख्त, पटना SSP को चेतावनी; 3 सितंबर तक मांगी रिपोर्ट

Bihar News: पटना में कोचिंग संस्थान से जुड़े गोलीबारी और मारपीट के मामले में गिरफ्तार किए गए कोचिंग संचालक रोशन आनंद की गिरफ्तारी को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने पटना के SSP कार्तिकेय शर्मा से पूरे मामले की रिपोर्ट मांगी है और 3 सितंबर 2026 तक जवाब उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। तय समयसीमा में रिपोर्ट नहीं देने पर आगे की कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। मामला पटना स्थित खान ग्लोबल स्टडीज परिसर में हुई मारपीट और गोलीबारी की घटना से जुड़ा है। पुलिस ने रोशन आनंद को इस मामले में कथित तौर पर मुख्य भूमिका निभाने वाला बताते हुए गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद उनकी गिरफ्तारी की प्रक्रिया और पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए गए। क्या है पूरा मामला? खान ग्लोबल स्टडीज परिसर में मारपीट और गोलीबारी की घटना के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की थी। इसी जांच के दौरान कोचिंग संचालक रोशन आनंद को गिरफ्तार किया गया। उनकी गिरफ्तारी के बाद आरोप लगाए गए कि पुलिस ने पर्याप्त जांच और साक्ष्यों के बिना उन्हें आपराधिक मामले में फंसाया और जेल भेज दिया। हालांकि, ये आरोप शिकायत में किए गए हैं और इन पर पुलिस का विस्तृत पक्ष तथा जांच की अंतिम स्थिति सामने आना अभी बाकी है। मामले में मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स अम्ब्रेला फाउंडेशन के चेयरमैन विशाल रंजन दफ्तुआर ने 10 जून को NHRC में शिकायत दर्ज कराई थी। NHRC के सामने क्या शिकायत की गई? शिकायत में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की गई थी। शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि रोशन आनंद को कथित तौर पर गलत तरीके से आपराधिक मामले में फंसाया गया और उनके खिलाफ कार्रवाई एकतरफा तरीके से की गई। शिकायत में उनकी गिरफ्तारी की परिस्थितियों और पुलिस की जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए। इन आरोपों की वास्तविकता क्या है, यह NHRC के समक्ष पुलिस की रिपोर्ट और उपलब्ध दस्तावेजों से स्पष्ट होगा। पहले भी मांगी गई थी रिपोर्ट बताया गया है कि NHRC ने इस मामले में पहले भी पटना पुलिस से रिपोर्ट मांगी थी। निर्धारित समय में रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने के बाद आयोग ने अब दोबारा जवाब तलब किया है। आयोग ने पटना SSP को 3 सितंबर तक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। साथ ही समयसीमा के भीतर जवाब नहीं देने की स्थिति में आगे की कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। यही वजह है कि अब इस मामले में पटना पुलिस की रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो गई है। गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर उठे सवाल NHRC के सामने की गई शिकायत में यह सवाल भी उठाया गया है कि रोशन आनंद को किन परिस्थितियों में गिरफ्तार किया गया और पुलिस के पास उनके खिलाफ क्या साक्ष्य मौजूद थे। अब पुलिस को अपनी रिपोर्ट में गिरफ्तारी की परिस्थितियों, जांच के दौरान सामने आए तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया के पालन से जुड़ी जानकारी देनी होगी। आयोग की ओर से मांगी गई रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट हो सकता है कि पुलिस ने गिरफ्तारी से पहले और उसके बाद निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया था या नहीं। स्वास्थ्य को लेकर भी शिकायत में उल्लेख मामले में रोशन आनंद के स्वास्थ्य का मुद्दा भी उठाया गया है। शिकायत के अनुसार, वह किडनी संबंधी बीमारी से पीड़ित हैं। इसी आधार पर गिरफ्तारी और जेल भेजे जाने की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, उनके स्वास्थ्य की वास्तविक स्थिति और इलाज से संबंधित विस्तृत जानकारी के साथ-साथ इस संबंध में पुलिस और जेल प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है। अब 3 सितंबर पर टिकी निगाहें NHRC की ओर से तय की गई समयसीमा के कारण 3 सितंबर 2026 इस मामले में महत्वपूर्ण तारीख बन गई है। अब देखना होगा कि पटना पुलिस आयोग के समक्ष क्या रिपोर्ट पेश करती है और रोशन आनंद की गिरफ्तारी से जुड़े सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देती है। मामले में आगे की दिशा पुलिस की रिपोर्ट और NHRC द्वारा उसके परीक्षण के बाद ही अधिक स्पष्ट होगी। यह भी महत्वपूर्ण है कि NHRC में शिकायत, आयोग द्वारा रिपोर्ट मांगना या किसी मामले में जवाब तलब करना अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष साबित नहीं करता। अंतिम निष्कर्ष जांच, साक्ष्यों और संबंधित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही तय होगा।  

surbhi अगस्त 13, 2026 0
लेबनान की संसद ने मृत्युदंड खत्म करने का कानून पारित किया
लेबनान ने खत्म की मृत्युदंड की सजा, सभी डेथ सेंटेंस उम्रकैद में बदले; अरब दुनिया में बना पहला देश

बेरूत, एजेंसियां। लेबनान की संसद ने मंगलवार, 11 अगस्त 2026 को ऐतिहासिक फैसला लेते हुए मृत्युदंड को समाप्त करने का कानून पारित कर दिया। नए कानून के तहत देश में मौजूद सभी मृत्युदंड की सजाओं को उम्रकैद में बदल दिया जाएगा। इस फैसले के साथ लेबनान मृत्युदंड खत्म करने वाला पहला अरब देश बन गया है।   22 साल से नहीं हुई थी कोई फांसी     लेबनान में मृत्युदंड कानूनी रूप से मौजूद था, लेकिन 2004 के बाद से किसी व्यक्ति को फांसी नहीं दी गई थी। यानी देश में करीब 22 वर्षों से मृत्युदंड पर व्यवहारिक रोक थी। हालांकि अदालतें गंभीर अपराधों में मौत की सजा सुनाती रही थीं।   अब संसद के नए कानून ने इस व्यवस्था को स्थायी रूप से बदल दिया है। मौत की सजा पाए लोगों को उम्रकैद और कठोर श्रम की सजा में बदले जाने का प्रावधान किया गया है।   मानवाधिकार संगठनों ने फैसले का स्वागत किया     लेबनान के इस फैसले की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे मानवाधिकारों के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया है। यूरोपीय संघ ने भी कानून को क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बताया।   मृत्युदंड के विरोध में लंबे समय से काम करने वाले संगठनों का कहना है कि इस फैसले से गलत तरीके से दोषी ठहराए गए लोगों के जीवन को बचाने का अवसर रहेगा।   अरब दुनिया में ऐतिहासिक फैसला     लेबनान का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अरब दुनिया के किसी देश ने इससे पहले मृत्युदंड को पूरी तरह समाप्त नहीं किया था। हालांकि मध्य-पूर्व में तुर्की पहले ही मृत्युदंड समाप्त कर चुका है, लेकिन वह अरब देश नहीं है।   लेबनान की संसद का यह फैसला देश की न्याय व्यवस्था में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही, सरकार के सामने अब जेलों में बढ़ने वाले कैदियों के दबाव और उम्रकैद की सजा को लागू करने की व्यवस्था मजबूत करने की चुनौती भी होगी।

ranjan kumar tiwari अगस्त 12, 2026 0
Taiwan human rights activist Lee Ming-che raises concerns over China's summer camp for Taiwanese students
ताइवान के छात्रों के लिए चीन का समर कैंप सवालों के घेरे में, मानवाधिकार कार्यकर्ता ने जताई AI डीपफेक और ब्लैकमेल की आशंका

China Summer Camp: चीन द्वारा ताइवान के छात्रों के लिए आयोजित किए जा रहे कम लागत वाले समर कैंप को लेकर नए विवाद खड़े हो गए हैं। ताइवान के मानवाधिकार कार्यकर्ता ली मिंग-चे ने आरोप लगाया है कि यह कैंप सांस्कृतिक आदान-प्रदान के बजाय चीन के राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने का माध्यम है। उन्होंने आशंका जताई कि छात्रों की निजी जानकारी का इस्तेमाल AI डीपफेक तकनीक के जरिए ब्लैकमेल करने के लिए किया जा सकता है। कम लागत वाले समर कैंप पर उठे सवाल समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, चीन ताइवान के छात्रों के लिए एक विशेष समर कैंप आयोजित कर रहा है, जिसमें यात्रा, होटल और भोजन की लागत बेहद कम रखी गई है ताकि अधिक से अधिक छात्र इसमें हिस्सा लें। हालांकि, ली मिंग-चे का आरोप है कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान नहीं, बल्कि ताइवान के युवाओं को चीन के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करने और उन पर राजनीतिक प्रभाव डालने का प्रयास है। छात्रों से ली जा रही निजी जानकारी ली मिंग-चे ने दावा किया कि कैंप के दौरान छात्रों से मोबाइल नंबर और अन्य व्यक्तिगत जानकारियां एकत्र की जा रही हैं। उनके अनुसार, इन जानकारियों का इस्तेमाल बाद में छात्रों को चीन समर्थक प्रचार सामग्री, वीडियो और संदेश भेजने के लिए किया जा सकता है। AI डीपफेक से ब्लैकमेल की आशंका मानवाधिकार कार्यकर्ता ने सबसे बड़ी चिंता AI डीपफेक तकनीक को लेकर जताई। उनका कहना है कि छात्रों की तस्वीरों और व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग कर फर्जी या आपत्तिजनक वीडियो तैयार किए जा सकते हैं। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि ताइवान लौटने के बाद ऐसे वीडियो दिखाकर छात्रों पर दबाव बनाया जा सकता है और उन्हें चीन के पक्ष में काम करने के लिए ब्लैकमेल किया जा सकता है। पांच साल चीन की जेल में रह चुके हैं ली मिंग-चे रिपोर्ट के अनुसार, ली मिंग-चे स्वयं पांच वर्ष तक चीन की जेल में रह चुके हैं और वर्ष 2022 में रिहा होकर ताइवान लौटे थे। उनका कहना है कि इस तरह के समर कैंप चीन की राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा हैं और इन्हें केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। चीन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं फिलहाल चीन की ओर से ली मिंग-चे के आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, ताइवान में इस मुद्दे को लेकर सुरक्षा और गोपनीयता से जुड़ी चिंताएं बढ़ गई हैं, खासकर AI और डिजिटल तकनीक के संभावित दुरुपयोग को लेकर।  

kalpana अगस्त 4, 2026 0
Protests in Pakistan-occupied Kashmir over inflation, power shortages and essential services
PoK में पाकिस्तान के खिलाफ बढ़ा जनाक्रोश, प्रदर्शनों में 100 से अधिक मौतों का दावा; हालात तनावपूर्ण

PoK Protest News: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में महंगाई, बिजली संकट, आटे की कमी और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर जारी विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई हिंसक झड़पों में 100 से अधिक लोगों की मौत होने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। महंगाई और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर प्रदर्शन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में लोग महंगाई, बिजली संकट, आटे की कमी और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि शांतिपूर्ण आंदोलन पर सुरक्षा बलों ने बल प्रयोग किया और गोलियां चलाईं। दूसरी ओर, स्थानीय प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई की गई और कुछ प्रदर्शनकारी हिंसक गतिविधियों में शामिल थे। मस्जिदों से विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील मुजफ्फराबाद समेत कई इलाकों में मस्जिदों के लाउडस्पीकरों के जरिए लोगों से प्रदर्शन में शामिल होने और एकजुट रहने की अपील की जा रही है। इस बीच, जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एस.पी. वैद ने कहा कि अतीत में जिस तरीके का इस्तेमाल पाकिस्तान भारत के खिलाफ करता था, अब उसी तरह के तरीकों का उपयोग पाकिस्तान के खिलाफ होता दिखाई दे रहा है। युवाओं पर सबसे ज्यादा असर रावलाकोट में राहत कार्य से जुड़े एक डॉक्टर के अनुसार, गोली लगने वाले अधिकांश लोग 15 से 35 वर्ष आयु वर्ग के हैं। उन्होंने बताया कि प्राथमिक उपचार की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन सिर, सीने और पेट में गंभीर गोली लगने वाले घायलों को बड़े अस्पतालों में भेजना पड़ रहा है। बड़ी संख्या में घायल आने से स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दबाव बढ़ गया है। परिजनों का आरोप- अधिकार मांगने पर मिली गोलियां मृतकों और घायलों के परिजनों का कहना है कि वे केवल सस्ती बिजली, आटा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे थे। कई परिवारों ने आरोप लगाया कि उनके परिजन किसी हिंसक गतिविधि में शामिल नहीं थे, बल्कि अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रहे थे। सरकार और JAAC के दावे आमने-सामने JAAC का आरोप है कि पाकिस्तान और PoK प्रशासन ने अक्टूबर 2025 में हुए समझौते को लागू नहीं किया, जिससे लोगों का आक्रोश बढ़ा। वहीं, स्थानीय प्रशासन का कहना है कि संगठन पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है और उसके कुछ सदस्यों के हथियारबंद होने की जानकारी मिली है। पाकिस्तानी प्रशासन का आरोप है कि आंदोलन का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करना है, जबकि प्रदर्शनकारी इसे अपने अधिकारों की लोकतांत्रिक लड़ाई बता रहे हैं। पाकिस्तान के लिए बढ़ी चुनौती लगातार जारी विरोध प्रदर्शन और बढ़ता जनाक्रोश पाकिस्तान के लिए बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बनता जा रहा है। मौजूदा हालात ने क्षेत्र में सुरक्षा और शासन व्यवस्था को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।  

kalpana अगस्त 4, 2026 0
Security personnel deployed in Pakistan-occupied Kashmir amid election-related protests and clashes
PoK Violence: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चुनाव के बीच हिंसा, प्रदर्शनकारियों ने 37 मौतों का दावा; हालात तनावपूर्ण

PoK Election Violence: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में क्षेत्रीय चुनावों के बीच हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। रावलकोट, मीरपुर और आसपास के इलाकों में सुरक्षा बलों और जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के कार्यकर्ताओं के बीच कई दिनों से हिंसक झड़पें जारी हैं। प्रदर्शनकारी संगठन का दावा है कि गोलीबारी और कार्रवाई में 37 लोगों की मौत हुई है, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इस दावे को खारिज किया है और आधिकारिक तौर पर इतनी मौतों की पुष्टि नहीं की है। 12 विधानसभा सीटों को लेकर जारी है आंदोलन पीटीआई न्यूज एजेंसी के अनुसार, JAAC पिछले करीब दो महीनों से PoK विधानसभा की 12 विवादित सीटों को लेकर आंदोलन चला रहा है। संगठन का आरोप है कि पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान इन सीटों का इस्तेमाल अपनी पसंद की सरकार बनाने के लिए करता है। प्रदर्शनकारी मुजफ्फराबाद तक मार्च निकालने की मांग पर अड़े हुए हैं और चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने की मांग कर रहे हैं। लगातार विरोध प्रदर्शनों के कारण क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। मौतों के आंकड़ों पर विवाद JAAC का आरोप है कि निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की, जिसमें अब तक कम से कम 37 लोगों की मौत हो चुकी है और कई लोग घायल हुए हैं। वहीं पाकिस्तान सरकार ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि प्रदर्शनकारियों के बीच प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से जुड़े तत्व मौजूद हैं और सुरक्षा बल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई कर रहे हैं। सरकार ने अब तक 37 मौतों की पुष्टि नहीं की है। भारत ने चुनावों को बताया अवैध भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कराए जा रहे चुनावों को एक बार फिर अवैध करार दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, जिसमें PoK भी शामिल है, भारत का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने कहा कि वहां हो रहे विरोध प्रदर्शन क्षेत्र में आर्थिक शोषण, प्रशासनिक दमन और लोगों के अधिकारों के हनन का परिणाम हैं। भारत का कहना है कि पाकिस्तान इन चुनावों के जरिए अपने अवैध कब्जे को वैध ठहराने की कोशिश कर रहा है। मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता PoK में हिंसा की खबरों के बाद एमनेस्टी इंटरनेशनल और पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (HRCP) ने भी चिंता जताई है। दोनों संगठनों ने पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराने की मांग की है। हालांकि पाकिस्तान सरकार का कहना है कि कानून-व्यवस्था से समझौता नहीं किया जाएगा और हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी। बढ़ सकता है तनाव चुनावों के बीच जारी विरोध, हिंसक झड़पों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के कारण पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थिति लगातार संवेदनशील बनी हुई है। प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच गतिरोध खत्म होने के फिलहाल कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।  

kalpana जुलाई 31, 2026 0
Security personnel deployed in Pakistan-occupied Kashmir after clashes during regional elections as Amnesty International seeks an independent investigation
PoK में चुनावी हिंसा: प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों की झड़प में 19 लोगों की मौत का दावा, एमनेस्टी ने मांगी स्वतंत्र जांच

PoK Protest Violence: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के रावलाकोट में क्षेत्रीय चुनाव के पहले चरण के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प हुई। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, इस घटना में कम से कम 19 प्रदर्शनकारियों की मौत होने का दावा किया गया है, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। हालांकि, मौतों और वायरल वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। रावलाकोट में हिंसा, कई घायल रिपोर्ट के अनुसार, 27 जुलाई को चुनाव के दौरान विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया। सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में कई लोग खून से लथपथ जमीन पर पड़े दिखाई दे रहे हैं। बताया गया है कि 19 मृतकों की पहचान हो चुकी है, जबकि एक अन्य शव की पहचान अभी बाकी है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उठाए सवाल मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने घटना पर गंभीर चिंता जताते हुए पाकिस्तान सरकार से सुरक्षा बलों की कार्रवाई की स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराने की मांग की है। संगठन की दक्षिण एशिया की कार्यवाहक क्षेत्रीय निदेशक इसाबेल लासी ने कहा कि रावलाकोट से सामने आ रही खबरें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित अत्यधिक बल प्रयोग की ओर इशारा करती हैं। उन्होंने कहा कि मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं बंद होने के कारण घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि करना मुश्किल हो गया है। एमनेस्टी ने मांग की कि सरकार संचार सेवाएं जल्द बहाल करे और मीडिया व स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को प्रभावित क्षेत्रों में जाने की अनुमति दे। JAAC पर प्रतिबंध को लेकर भी चिंता एमनेस्टी इंटरनेशनल ने जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) पर लगाए गए प्रतिबंध की भी आलोचना की। संगठन का कहना है कि इस कदम ने चुनाव के दौरान तनाव और बढ़ा दिया है। एमनेस्टी ने पाकिस्तान सरकार से आतंकवाद विरोधी कानूनों का इस्तेमाल कर आंदोलनकारियों को निशाना बनाना बंद करने और JAAC पर लगाए गए प्रतिबंध की समीक्षा करने की अपील की। दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग JAAC का दावा है कि सुरक्षा बलों की गोलीबारी में 19 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई और कई अन्य घायल हुए। वहीं, पुलिस का कहना है कि झड़प के दौरान उसके दो जवान भी घायल हुए हैं। दोनों पक्षों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हो सकी है। चुनाव से पहले बढ़ा तनाव एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, 5 जून से पूरे क्षेत्र में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद हैं। इसी दिन JAAC को आतंकवाद निरोधक कानून, 2014 के तहत प्रतिबंधित संगठन घोषित किया गया था। मानवाधिकार संगठन ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव से पहले हुई हिंसा में अब तक कम से कम 40 लोगों की मौत होने की खबर है। इनमें 34 प्रदर्शनकारी और छह पुलिस एवं अर्द्धसैनिक बल के जवान शामिल बताए गए हैं। मानवाधिकारों पर बढ़ी चिंता चुनावी हिंसा और इंटरनेट प्रतिबंध के बीच PoK में सुरक्षा और मानवाधिकारों को लेकर चिंता बढ़ गई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि पारदर्शी जांच और स्वतंत्र मीडिया की पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि घटना की वास्तविक परिस्थितियां सामने आ सकें और जवाबदेही तय हो सके।  

kalpana जुलाई 29, 2026 0
Security personnel deployed amid clashes during protests ahead of elections in Pakistan-occupied Kashmir
PoK में चुनाव से पहले हिंसा, 14 प्रदर्शनकारियों की मौत का दावा; सुरक्षा बलों से झड़प के बाद बढ़ा तन

PoK Violence: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में तथाकथित विधानसभा चुनाव के पहले चरण से पहले हिंसा भड़क गई है। रावलाकोट से मुजफ्फराबाद तक निकाले गए विरोध मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों के बाद हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने दावा किया है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई में उसके 14 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई है, जबकि दो दर्जन से अधिक लोग घायल हुए हैं। हालांकि, इन दावों की अब तक स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। मौतों के दावों पर पुलिस ने उठाए सवाल पीटीआई के मुताबिक, PoK के पुलिस प्रमुख लियाकत अली मलिक ने 14 लोगों की मौत के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक शव बरामद नहीं होते और पोस्टमार्टम नहीं कराया जाता, तब तक किसी भी मौत की आधिकारिक पुष्टि नहीं की जा सकती। उन्होंने बताया कि झड़प के दौरान एक रेंजर्स जवान की मौत हुई है, जबकि दो रेंजर्स और दो पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। JAAC और पुलिस के दावे आमने-सामने JAAC का आरोप है कि उसका 'लॉन्ग मार्च' पूरी तरह शांतिपूर्ण था और प्रदर्शनकारी निहत्थे थे। संगठन का कहना है कि सुरक्षा बलों ने बिना किसी उकसावे के गोलीबारी की। वहीं, पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों के पास आधुनिक हथियार थे और उन्होंने पहले सुरक्षाबलों पर फायरिंग की, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई की गई। 12 आरक्षित सीटों को लेकर कई हफ्तों से विरोध JAAC पिछले कई सप्ताह से विधानसभा की 12 शरणार्थी आरक्षित सीटों को समाप्त करने की मांग कर रहा है। संगठन का आरोप है कि पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान इन सीटों के जरिए अपनी पसंद की सरकार बनवाने की कोशिश करता है। इसी मांग को लेकर रावलाकोट से मुजफ्फराबाद तक 'लॉन्ग मार्च' निकाला गया था, जो अब हिंसक झड़प में बदल गया। इंटरनेट बंद, मीडिया पर भी पाबंदियां हिंसा के बाद PoK के कई इलाकों में इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गई हैं और मीडिया कवरेज पर भी प्रतिबंध लगाए जाने की खबर है। पाक प्रशासन और JAAC के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकल सका है। भारत पहले भी उठा चुका है मुद्दा भारत पहले भी PoK में जारी विरोध प्रदर्शनों को वहां के लोगों के कथित शोषण और प्रशासनिक दमन का परिणाम बता चुका है। चुनावी प्रक्रिया के बीच बढ़ते तनाव और हिंसा ने पूरे क्षेत्र की स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। फिलहाल, मौतों और घायल होने के दावों की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार है, जबकि इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।  

kalpana जुलाई 29, 2026 0
Kashmiri activists protesting outside the Pakistani Consulate in Bradford over alleged violence in Pakistan-occupied Kashmir
PoK में हिंसा पर बढ़ा विवाद, मौतों के दावों के बीच ब्रिटेन तक गूंजी विरोध की आवाज

PoK Violence: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में विधानसभा चुनाव के पहले चरण के दौरान हुई हिंसक झड़पों का मामला अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है। गोलीबारी और मौतों के दावों के बीच ब्रिटेन के ब्रैडफोर्ड शहर में कश्मीरी कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान वाणिज्य दूतावास के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने PoK में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई की निंदा की। ब्रिटेन में पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, ब्रैडफोर्ड में प्रदर्शन कर रहे कश्मीरी कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि रावलाकोट और मीरपुर में अपने अधिकारों की मांग कर रहे लोगों पर सुरक्षा बलों ने बल प्रयोग किया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाने के लिए गोलीबारी की गई, जिसमें कई लोगों के मारे जाने और घायल होने की खबरें हैं। चुनाव के बीच हिंसा, 14 मौतों का दावा PoK में विधानसभा चुनाव के पहले चरण के दौरान हालात अचानक तनावपूर्ण हो गए। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने दावा किया कि सुरक्षा बलों के साथ हुई झड़पों में उसके 14 कार्यकर्ताओं की मौत हो गई, जबकि दो दर्जन से अधिक लोग घायल हुए हैं। हालांकि, इन मौतों के दावों की अब तक स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है। JAAC और प्रशासन के दावे आमने-सामने JAAC का कहना है कि उसका 'लॉन्ग मार्च' पूरी तरह शांतिपूर्ण था और प्रदर्शनकारी निहत्थे थे। संगठन का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने बिना किसी उकसावे के गोलीबारी की। वहीं, दूसरी ओर PoK पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों के पास आधुनिक हथियार थे और उन्होंने पहले सुरक्षाबलों पर फायरिंग की, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई की गई। दोनों पक्षों के दावे एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं और घटनाक्रम को लेकर स्थिति अभी भी स्पष्ट नहीं हो सकी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी नजर PoK में हुई हिंसा और उसके बाद ब्रिटेन में हुए विरोध प्रदर्शन ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया है। मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब इस पूरे घटनाक्रम पर बनी हुई है। फिलहाल, मौतों और हिंसा से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है, जबकि क्षेत्र में तनाव बरकरार है।  

kalpana जुलाई 29, 2026 0
Young protesters gather in Kathmandu demanding accountability, employment opportunities and an independent investigation after the death of a ride-share driver.
नेपाल में फिर भड़का Gen Z आंदोलन, बेरोजगारी और पुलिस कार्रवाई के विरोध में सड़कों पर उतरे युवा

काठमांडू: नेपाल में एक बार फिर जेन-जी (Gen Z) युवाओं के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। राजधानी काठमांडू समेत कई इलाकों में युवा बेरोजगारी, पुलिस कार्रवाई, कथित प्रशासनिक ज्यादती और सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों ने काठमांडू के मेयर बालेन शाह के इस्तीफे की मांग भी तेज कर दी है। यह आंदोलन एक राइड-शेयर चालक की मौत के बाद और उग्र हो गया है। युवाओं का कहना है कि सरकार रोजगार, सुशासन और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर विफल रही है। राइड-शेयर चालक की मौत के बाद भड़का आंदोलन जानकारी के अनुसार, 25 वर्षीय राइड-शेयर चालक गणेश नेपाली ने नगर निगम पुलिस के साथ कथित विवाद के बाद खुद पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा ली थी। गंभीर रूप से झुलसे गणेश की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस कार्रवाई और लगातार प्रशासनिक दबाव के कारण उन्होंने यह कदम उठाया। घटना के बाद युवाओं में भारी नाराजगी फैल गई और निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू हो गए। झुग्गी हटाने की कार्रवाई पर भी नाराजगी विरोध प्रदर्शन का एक बड़ा कारण काठमांडू में चलाया जा रहा अतिक्रमण हटाओ अभियान भी है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रशासन ने बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के नदी किनारे बनी झुग्गी बस्तियों को हटाया, जिससे हजारों परिवार बेघर हो गए। युवाओं का कहना है कि गरीबों के पुनर्वास के बिना की गई कार्रवाई मानवीय दृष्टि से गलत है और सरकार को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। पुलिस पर बल प्रयोग के आरोप प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर लाठीचार्ज, बल प्रयोग और हिरासत में दुर्व्यवहार के आरोप लगाए हैं। विभिन्न छात्र और युवा संगठनों ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तथा पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की मांग की है। राजधानी के कई हिस्सों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और पुलिस लगातार प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने में जुटी हुई है। बालेन शाह पर बढ़ा दबाव काठमांडू के मेयर बालेन शाह को पिछले वर्षों में युवाओं का व्यापक समर्थन मिला था, लेकिन अब वही युवा उनके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रशासन जनता की समस्याओं का समाधान करने में असफल रहा है और युवाओं की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। युवाओं ने मेयर बालेन शाह से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने की मांग की है। रोजगार और पारदर्शिता की मांग राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल के युवा रोजगार, पारदर्शी शासन और भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई की उम्मीद कर रहे थे। हालांकि, इन मुद्दों पर अपेक्षित प्रगति नहीं होने से असंतोष लगातार बढ़ता गया। सरकार ने आत्मदाह की घटना की जांच के आदेश दिए हैं, लेकिन प्रदर्शनकारी इसे पर्याप्त नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि केवल जांच नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।  

Deepshikha जुलाई 15, 2026 0
Calcutta High Court building in Kolkata as a petition challenges West Bengal's newly implemented Public Safety and Anti-Social Activities Control Act, 2026.
पश्चिम बंगाल के ‘गुंडा रोधी कानून’ को हाईकोर्ट में चुनौती, तत्काल सुनवाई से कलकत्ता हाईकोर्ट का इनकार

West Bengal Gunda Act News: पश्चिम बंगाल सरकार के नए ‘पश्चिम बंगाल जन सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण अधिनियम, 2026’ (गुंडा रोधी कानून) के लागू होते ही इसे कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मामले में तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि याचिका पर नियमित प्रक्रिया के तहत सुनवाई होगी। कानून लागू होते ही दायर हुई जनहित याचिका सोमवार से लागू हुए इस कानून के खिलाफ मानवाधिकार कार्यकर्ता मिलन मालाकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है। याचिका में कानून को असंवैधानिक बताते हुए इसके क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि कानून के कई प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और इसका दुरुपयोग होने की आशंका है। हाईकोर्ट ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थसारथी चटर्जी की खंडपीठ के समक्ष याचिकाकर्ता के वकील सब्यसाची चटर्जी ने मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की। हालांकि, अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और कहा कि मामले की सुनवाई सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार तय की जाएगी। कानून के किन प्रावधानों पर उठ रहे हैं सवाल? याचिका में कानून की कई धाराओं को संविधान के विरुद्ध बताया गया है। प्रमुख आपत्तियां इस प्रकार हैं: बिना मुकदमे के 12 महीने तक हिरासत कानून के तहत जिलाधिकारी और पुलिस आयुक्त को यह अधिकार दिया गया है कि वे किसी व्यक्ति को भविष्य में असामाजिक गतिविधियों की आशंका के आधार पर बिना मुकदमा चलाए अधिकतम एक वर्ष तक निवारक हिरासत में रख सकते हैं। वकील की सहायता पर प्रतिबंध कानून की धारा 10(4) के अनुसार, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को सलाहकार बोर्ड के समक्ष सामान्य रूप से अपने वकील के माध्यम से पक्ष रखने की अनुमति नहीं होगी, जब तक कि बोर्ड विशेष अनुमति न दे। ‘गुंडा’ की परिभाषा पर विवाद याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कानून में ‘गुंडा’ और ‘असामाजिक गतिविधियों’ की परिभाषा अत्यधिक व्यापक और अस्पष्ट है। इससे राजनीतिक विरोध, शांतिपूर्ण प्रदर्शन या असहमति व्यक्त करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की आशंका है। राज्य सरकार का क्या कहना है? राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून राजनीतिक हिंसा, रंगदारी, संगठित अपराध और असामाजिक गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण के उद्देश्य से लाया गया है। सरकार के अनुसार, राज्य में कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और अपराध पर सख्ती से रोक लगाने के लिए इस तरह के कानून की आवश्यकता थी। विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों का विरोध विपक्षी दलों और कई मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून का विरोध किया है। उनका आरोप है कि इससे प्रशासन और पुलिस को अत्यधिक अधिकार मिल जाएंगे, जिनका दुरुपयोग हो सकता है। कानूनी विशेषज्ञों की राय कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि नए कानून के कई प्रावधान राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) जैसी निवारक हिरासत की व्यवस्था से मिलते-जुलते हैं। उनका मानना है कि यदि इन शक्तियों के उपयोग पर पर्याप्त निगरानी नहीं रही, तो नागरिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों पर प्रभाव पड़ सकता है। अब इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट नियमित सुनवाई के दौरान कानून की संवैधानिक वैधता और याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर विचार करेगा।  

Deepshikha जुलाई 14, 2026 0
Women candidates applying online for UP Anganwadi Bharti 2026 recruitment in Agra, Mathura and other Uttar Pradesh districts.
UP Anganwadi Bharti 2026: आगरा-मथुरा समेत 6 जिलों में 1110 पदों पर भर्ती, 12वीं पास महिलाओं के लिए सुनहरा मौका

उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही महिलाओं के लिए अच्छी खबर है। UP Anganwadi Bharti 2026 के तहत राज्य के छह नए जिलों में 1110 आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पदों पर भर्ती के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू हो गई है। इच्छुक और पात्र महिला अभ्यर्थी अपने जिले के अनुसार निर्धारित अंतिम तिथि तक ऑनलाइन आवेदन कर सकती हैं। यह भर्ती आगरा, मथुरा, संभल, औरैया, श्रावस्ती और चंदौली जिलों में की जाएगी। आवेदन केवल ऑनलाइन माध्यम से स्वीकार किए जाएंगे। किन जिलों में कितने पद? यूपी सरकार द्वारा जारी भर्ती अधिसूचना के अनुसार विभिन्न जिलों में रिक्त पद इस प्रकार हैं- जिला रिक्त पद आवेदन की अंतिम तिथि आगरा 322 25 जुलाई 2026 मथुरा 236 24 जुलाई 2026 औरैया 181 28 जुलाई 2026 संभल 177 28 जुलाई 2026 चंदौली 126 25 जुलाई 2026 श्रावस्ती 68 27 जुलाई 2026 कुल 1110 - कौन कर सकता है आवेदन? भर्ती में आवेदन करने के लिए उम्मीदवार को निम्नलिखित पात्रता पूरी करनी होगी- केवल महिला अभ्यर्थी आवेदन कर सकती हैं। किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से 12वीं पास होना आवश्यक है। ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट उम्मीदवार भी आवेदन के पात्र हैं। अभ्यर्थी की आयु 18 से 35 वर्ष के बीच होनी चाहिए। आयु की गणना 1 जुलाई 2026 के आधार पर की जाएगी। ग्रामीण क्षेत्र की उम्मीदवार संबंधित ग्राम सभा और शहरी क्षेत्र की उम्मीदवार संबंधित वार्ड की निवासी होनी चाहिए। कैसे होगा चयन? इस भर्ती में किसी प्रकार की लिखित परीक्षा नहीं होगी। उम्मीदवारों का चयन शैक्षणिक योग्यता के आधार पर तैयार की जाने वाली मेरिट लिस्ट से किया जाएगा। मेरिट 12वीं, समकक्ष योग्यता, स्नातक या स्नातकोत्तर में प्राप्त अंकों के आधार पर बनेगी। 10वीं के अंक मेरिट में शामिल नहीं किए जाएंगे। CGPA या ग्रेडिंग सिस्टम से प्राप्त अंकों को निर्धारित नियमों के अनुसार प्रतिशत में बदला जाएगा। आवेदन कैसे करें? उम्मीदवार नीचे दिए गए आसान चरणों का पालन करके आवेदन कर सकते हैं- आधिकारिक वेबसाइट upanganwadibharti.in पर जाएं। अपने जिले की भर्ती अधिसूचना चुनें। Apply Online/New Registration पर क्लिक करें। आधार नंबर और मोबाइल नंबर से पंजीकरण करें। आवेदन फॉर्म में सभी आवश्यक जानकारी भरें। फोटो, हस्ताक्षर और जरूरी दस्तावेज अपलोड करें। सभी विवरण जांचकर फॉर्म सबमिट करें। भविष्य के लिए आवेदन पत्र का प्रिंट या PDF सुरक्षित रखें। समय रहते करें आवेदन हर जिले के लिए आवेदन की अंतिम तिथि अलग-अलग तय की गई है। ऐसे में उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि अंतिम तिथि का इंतजार न करें और सभी आवश्यक दस्तावेज तैयार रखकर समय पर आवेदन प्रक्रिया पूरी करें।  

surbhi जुलाई 14, 2026 0
Monsoon 2026
देशभर में मॉनसून ने पकड़ी रफ्तार, कई राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट

नई दिल्ली, एजेंसियां। जून महीने में कमजोर रहने के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, आने वाले दिनों में देश के कई हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश होने की संभावना है। मौसम विभाग ने 11 जुलाई तक दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में भारी बारिश का पूर्वानुमान जारी किया है। इसके साथ ही तेज हवाएं, गरज-चमक और बिजली गिरने की भी आशंका जताई गई है।   उत्तर भारत से लेकर पश्चिमी तट तक बारिश का असर आईएमडी के मुताबिक, अगले तीन दिनों में दक्षिण-पश्चिम मानसून उत्तर अरब सागर, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब के अन्य हिस्सों में आगे बढ़ेगा। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, जून में मॉनसून ट्रफ के हिमालय की तलहटी की ओर खिसकने से बारिश में कमी आई थी, लेकिन अब इसके दोबारा सक्रिय होने से बारिश का दौर तेज होगा। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में भारी बारिश के कारण अलकनंदा नदी चेतावनी स्तर के करीब पहुंच गई है।   मध्य, पूर्वी और दक्षिण भारत में भी भारी बारिश की संभावना मौसम विभाग ने छत्तीसगढ़, पश्चिम और पूर्वी मध्य प्रदेश, विदर्भ, झारखंड, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में भी अगले कुछ दिनों तक अच्छी बारिश की संभावना जताई है। वहीं, कोंकण-गोवा, गुजरात, मध्य महाराष्ट्र और सौराष्ट्र-कच्छ में 6 और 7 जुलाई को बहुत भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। केरल, तटीय कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में भी भारी बारिश और तेज हवाएं चलने का अनुमान है।   मौसम विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का मिजाज अधिक अनिश्चित होता जा रहा है। कम समय में अत्यधिक बारिश से बाढ़ और लंबे समय तक बारिश की कमी से सूखे जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। ऐसे में लोगों को मौसम विभाग की चेतावनियों का पालन करने और खराब मौसम के दौरान सतर्क रहने की सलाह दी गई है।

anjali kumari जुलाई 6, 2026 0
Protesters gather at Parliament Square in London during the Kashmir Million March, demanding human rights and the release of political activists in Pakistan-occupied Kashmir.
पाकिस्तान के खिलाफ लंदन में एकजुट हुए कश्मीरी, बलोच और पश्तून, PoK में मानवाधिकार उल्लंघन का लगाया आरोप

लंदन: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK), बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के विरोध में यूनाइटेड किंगडम की राजधानी लंदन में रविवार को हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के लोगों के साथ-साथ बलोच और पश्तून समुदाय के लोगों ने भी हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान की सेना पर आम नागरिकों के अधिकारों के दमन और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई के आरोप लगाए। लंदन कश्मीर मिलियन मार्च में उमड़ी भीड़ जानकारी के अनुसार, लंदन में आयोजित "कश्मीर मिलियन मार्च" संसद परिसर (Parliament Square) से शुरू होकर पाकिस्तान हाई कमीशन तक निकाला गया। आयोजकों का दावा है कि मार्च में करीब 50 हजार लोगों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शन के दौरान लोगों ने पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ आवाज उठाई और गिरफ्तार राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने आजादी के समर्थन में नारे लगाए और जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के प्रमुख शौकत नवाज मीर समेत अन्य नेताओं की गिरफ्तारी का विरोध किया। बलोच और पश्तून समुदाय ने भी जताई एकजुटता इस मार्च में बलोच और पश्तून समुदाय के लोगों ने भी भाग लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की सेना उनके क्षेत्रों में भी नागरिकों के अधिकारों का हनन कर रही है। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा—तीनों क्षेत्रों में आम लोगों को दमन और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। पाकिस्तान सेना पर गंभीर आरोप प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के एक राजनीतिक कार्यकर्ता महमूद कश्मीरी ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की सेना ने टट्टापानी, सेंहसा और कोटली जैसे इलाकों में आम लोगों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई की है। उन्होंने कहा कि दुनियाभर में रहने वाले कश्मीरी अब इन घटनाओं के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठा रहे हैं। उनका कहना था कि पाकिस्तान को अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन करना चाहिए और क्षेत्र के लोगों को उनके अधिकार देने चाहिए। गिरफ्तार नेताओं की रिहाई की मांग प्रदर्शनकारियों ने कहा कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक नेताओं की गिरफ्तारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने मांग की कि सभी गिरफ्तार नेताओं और कार्यकर्ताओं को तत्काल रिहा किया जाए। इसके साथ ही प्रदर्शन में शामिल लोगों ने हिरासत में लिए गए युवाओं के शव उनके परिजनों को सौंपने और गिरफ्तार नागरिकों की रिहाई की भी मांग की। PoK में जारी है विरोध प्रदर्शन लंदन में हुआ यह प्रदर्शन ऐसे समय में सामने आया है, जब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पिछले कई सप्ताह से विरोध प्रदर्शन जारी हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कई लोगों की मौत हुई है और इसके बाद अनेक राजनीतिक नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। उनका कहना है कि क्षेत्र में राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए लगातार कार्रवाई की जा रही है, जिसके विरोध में विदेशों में रहने वाले कश्मीरी, बलोच और पश्तून समुदाय भी अब खुलकर आवाज उठा रहे हैं.  

Deepshikha जुलाई 6, 2026 0
Emergency responders assist after a man set himself on fire outside the United Nations headquarters in New York during an apparent protest linked to Tibet.
UN मुख्यालय के बाहर आत्मदाह: तिब्बती झंडा लेकर पहुंचे व्यक्ति ने लगाई आग, इलाज के दौरान मौत

न्यूयॉर्क: अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र (UN) मुख्यालय के बाहर गुरुवार को एक व्यक्ति ने कथित तौर पर खुद को आग लगा ली। गंभीर रूप से झुलसे 52 वर्षीय व्यक्ति को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। घटना के बाद इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई और पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। बौद्ध भिक्षु जैसे वस्त्र पहनकर पहुंचा था व्यक्ति प्रत्यक्षदर्शियों और सामने आए वीडियो के अनुसार, व्यक्ति पारंपरिक बौद्ध भिक्षु जैसे वस्त्र पहने हुए था। उसने पहले फुटपाथ पर तिब्बती झंडा रखा और फिर खुद को आग के हवाले कर दिया। कुछ ही सेकंड में वह सड़क पर गिर पड़ा। मौके पर मौजूद लोगों ने तुरंत पुलिस और आपातकालीन सेवाओं को सूचना दी। 'चीन तिब्बत छोड़ो' लिखे पर्चे बरामद न्यूयॉर्क पुलिस विभाग (NYPD) के अनुसार, घटनास्थल से "China Out of Tibet" (चीन तिब्बत छोड़ो) लिखे कई पर्चे बरामद किए गए हैं। शुरुआती जांच में घटना को तिब्बत से जुड़े विरोध प्रदर्शन से जोड़कर देखा जा रहा है, पुलिस ने अभी तक किसी आधिकारिक निष्कर्ष की पुष्टि नहीं की है। मृतक की पहचान फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है, क्योंकि पहले उसके परिजनों को सूचना देना जरूरी है। 20 वर्षों से अमेरिका में रहने का दावा कुछ मीडिया रिपोर्टों में मृतक की पहचान लोबगा रांगजेन के रूप में की गई है। बताया गया है कि वह लगभग 20 वर्षों से अमेरिका में रह रहा था। अधिकारियों ने अभी तक इस पहचान की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। UN ने क्या कहा? संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता ने बताया कि घटना उस समय हुई जब दिनभर की आधिकारिक बैठकें समाप्त हो चुकी थीं। इसलिए इस घटना का संयुक्त राष्ट्र के नियमित कामकाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तिब्बत मुद्दे पर पहले भी हो चुके हैं आत्मदाह तिब्बत से जुड़े संगठनों के अनुसार, वर्ष 2009 से अब तक 150 से अधिक तिब्बती चीन के शासन के विरोध में आत्मदाह कर चुके हैं। इनमें बौद्ध भिक्षु, साध्वियां, छात्र, किसान और आम नागरिक शामिल रहे हैं। तिब्बती संगठनों का कहना है कि ऐसे विरोध प्रदर्शन धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक पहचान की रक्षा, तिब्बती भाषा के संरक्षण और दलाई लामा की तिब्बत वापसी जैसी मांगों से जुड़े रहे हैं। वहीं, चीन का आरोप है कि इन घटनाओं के पीछे निर्वासित तिब्बती नेतृत्व लोगों को उकसाता है। दूसरी ओर, निर्वासित तिब्बती प्रशासन इन आरोपों को खारिज करते हुए कहता है कि लोग चीन की नीतियों और बढ़ते सरकारी दबाव के विरोध में ऐसा कदम उठाते हैं। जांच जारी न्यूयॉर्क पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। अधिकारी आत्मदाह के पीछे की परिस्थितियों, घटनास्थल से मिले दस्तावेजों और उपलब्ध वीडियो फुटेज की जांच कर रहे हैं। फिलहाल घटना के कारणों को लेकर कोई आधिकारिक निष्कर्ष जारी नहीं किया गया है।  

Deepshikha जुलाई 3, 2026 0
Thousands of protesters gather at Eidgah Ground in Rawalakot, Pakistan-administered Kashmir, demanding rights and protesting against the Pakistan government amid a growing political movement.
PoK में पाकिस्तान के खिलाफ उबाल, हजारों लोगों का प्रदर्शन; JAAC प्रमुख शौकत नवाज गिरफ्तार

  इस्लामाबाद/रावलकोट: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। मंगलवार को रावलकोट के ईदगाह ग्राउंड में हजारों लोग एकत्र हुए और पाकिस्तान सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि PoK पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है और स्थानीय लोगों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है। यह आंदोलन जम्मू-कश्मीर अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, JAAC के प्रमुख शौकत नवाज मीर को उनके दो सहयोगियों के साथ धीरकोट के सांगर फत्तारे इलाके से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके अलावा JAAC के 600 से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में लिया गया है। शौकत नवाज पर था एक करोड़ रुपये का इनाम रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार ने शौकत नवाज मीर और अन्य JAAC नेताओं की सूचना देने वालों के लिए एक करोड़ रुपये के इनाम की घोषणा की थी। गिरफ्तारी के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है। 'हमें नहीं, पाकिस्तान को हमारी जरूरत' प्रदर्शन को संबोधित करते हुए JAAC नेता सरदार अमन खान ने पाकिस्तान सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सरकार आंदोलन को दबाने के लिए जानबूझकर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति रोक रही है। उन्होंने कहा, "हमें आपके राशन की जरूरत नहीं है, बल्कि आपको हमारी जरूरत है। यदि जरूरी सामान की सप्लाई नहीं हुई तो लोग जिंदा रहने के लिए दूसरा रास्ता चुनने को मजबूर होंगे।" महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन, अब बना राजनीतिक विरोध बताया जा रहा है कि यह आंदोलन शुरुआत में महंगाई, खाद्य संकट, बढ़ती कीमतों और स्थानीय प्रशासन की नीतियों के खिलाफ शुरू हुआ था। अब यह पाकिस्तान सरकार के खिलाफ व्यापक राजनीतिक विरोध में बदल गया है। हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ द्वारा रावलकोट और मीरपुर के लोगों को "असल कश्मीरी नहीं" बताए जाने के बाद लोगों में नाराजगी और बढ़ गई। JAAC पर प्रतिबंध, आतंकवाद विरोधी कानून के तहत कार्रवाई रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान सरकार ने 5 जून को JAAC पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद संगठन के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ आतंकवाद निरोधक कानून के तहत मुकदमे दर्ज किए गए हैं। इंटरनेट सेवाएं प्रभावित, 22 लोगों की मौत का दावा स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जून की शुरुआत से PoK के कई हिस्सों में इंटरनेट सेवाएं सीमित कर दी गई हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि आंदोलन की तस्वीरें और वीडियो बाहर जाने से रोकने के लिए ऐसा किया गया। दावा किया जा रहा है कि पिछले दो सप्ताह के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों में 22 लोगों की मौत हुई है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। 27 जुलाई को होंगे विधानसभा चुनाव पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में 27 जुलाई को विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं, जिनमें 45 सीटों पर प्रत्यक्ष चुनावहोंगे, जबकि 8 सीटें महिलाओं, तकनीकी विशेषज्ञों और धार्मिक विद्वानों के लिए आरक्षित हैं। चुनाव से पहले बढ़ते विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक तनाव ने क्षेत्र की सुरक्षा और राजनीतिक स्थिति को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।  

Deepshikha जुलाई 1, 2026 0
French woman and her five children rescued in Pakistan after allegedly living in isolation for nearly a decade.
पाकिस्तान में 10 साल तक कथित कैद में रही फ्रांसीसी महिला और पांच बच्चों को मिली आजादी, बेटे की बहादुरी से खुला राज

  इस्लामाबाद: पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक फ्रांसीसी महिला और उसके पांच बच्चे कथित तौर पर लगभग एक दशक तक अलग-थलग और कैद जैसी परिस्थितियों में रहने को मजबूर रहे। परिवार को तब राहत मिली, जब महिला के एक बेटे ने किसी तरह घर से बाहर निकलकर पुलिस को सूचना दी। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए पूरे परिवार को सुरक्षित बाहर निकाला। पुलिस और स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह मामला खैबर पख्तूनख्वा के पहाड़ी क्षेत्र बारा का है। अधिकारियों का कहना है कि परिवार को लंबे समय तक बाहरी दुनिया से काटकर रखा गया था और महिला के पति पर शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगे हैं। बेटे ने पुलिस तक पहुंचाई जानकारी अधिकारियों के मुताबिक, परिवार के एक बच्चे ने साहस दिखाते हुए घर से बाहर निकलकर पुलिस को अपनी स्थिति के बारे में बताया। सूचना मिलने के बाद 18 जून को पुलिस ने संबंधित घर पर छापा मारा। जब पुलिस मौके पर पहुंची तो 54 वर्षीय फ्रांसीसी नागरिक सिल्वी यास्मीना और उनके पांच बच्चे एक छोटे और जर्जर कमरे में रह रहे थे। पुलिस ने बताया कि परिवार की हालत बेहद खराब थी और कुछ सदस्यों के शरीर पर चोट के निशान भी पाए गए। रेस्क्यू के बाद सभी को तत्काल पेशावर स्थित महिला आश्रय गृह में भेजा गया, जहां उन्हें चिकित्सा और अन्य आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। महिला ने लगाए गंभीर आरोप जांच के दौरान सिल्वी यास्मीना ने अपने पति पर कई गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि उन्हें और उनके बच्चों को वर्षों तक स्वतंत्र रूप से जीवन जीने का अधिकार नहीं मिला। महिला के अनुसार, परिवार को लगातार भय और दबाव में रखा गया तथा पति द्वारा नियमित रूप से शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी जाती थी। उन्होंने जांचकर्ताओं को बताया कि उन्हें लगने लगा था कि उनका और उनके बच्चों का भविष्य पूरी तरह अंधकारमय हो चुका है। महिला ने कहा कि परिवार को बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह अलग कर दिया गया था। बच्चों की पढ़ाई भी हुई प्रभावित पुलिस अधिकारियों के अनुसार, परिवार के सदस्यों को अन्य लोगों से मिलने-जुलने की अनुमति नहीं थी। महिला ने बताया कि 2014 में ऑस्ट्रेलिया से पाकिस्तान आने के बाद परिवार पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए थे। जानकारी के मुताबिक, परिवार के दो बड़े बच्चों की शिक्षा बीच में ही छूट गई, जबकि पाकिस्तान में जन्मे तीन छोटे बच्चों का कभी किसी स्कूल में दाखिला नहीं कराया गया। अधिकारियों का कहना है कि बच्चों के सामाजिक और शैक्षणिक विकास पर इसका गंभीर असर पड़ा है। ऑस्ट्रेलिया में हुई थी शादी पाकिस्तानी अधिकारियों के अनुसार, सिल्वी यास्मीना और उनके पति की मुलाकात ऑस्ट्रेलिया में हुई थी। दोनों ने वर्ष 2003 में विवाह किया था और कुछ वर्षों तक वहीं रहे। बाद में 2014 में परिवार अपने दो बड़े बच्चों के साथ पाकिस्तान आ गया। पुलिस अब यह जांच कर रही है कि पाकिस्तान आने के बाद परिवार किन परिस्थितियों में रह रहा था और कथित उत्पीड़न कब से शुरू हुआ। पति हिरासत में, जांच जारी पुलिस ने महिला के पति को हिरासत में ले लिया है और मामले की विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि विभिन्न सबूत जुटाए जा रहे हैं तथा मामले से जुड़े अन्य लोगों से भी पूछताछ की जा रही है। इस बीच, फ्रांसीसी दूतावास को भी मामले की जानकारी दे दी गई है। महिला और उनके बच्चों ने फ्रांस लौटने की इच्छा जताई है। संबंधित अधिकारियों के बीच उनकी वापसी को लेकर प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। मानवाधिकारों को लेकर उठे सवाल इस घटना ने पाकिस्तान में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा तथा मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह लंबे समय तक घरेलू हिंसा और सामाजिक अलगाव का एक गंभीर मामला माना जाएगा। पुलिस का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद आरोपों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।  

Deepshikha जून 25, 2026 0
Baloch human rights activist Mahrang Baloch appears at a court hearing after being sentenced to life imprisonment in Pakistan.
पाकिस्तान में बलोच मानवाधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच को उम्रकैद, फैसले पर उठा विवाद

  पाकिस्तान की एक विशेष अदालत ने चर्चित बलोच मानवाधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच और उनके दो सहयोगियों को हत्या तथा आतंकवाद से जुड़े मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। क्वेटा स्थित एंटी-टेररिज्म कोर्ट ने यह फैसला सुनाते हुए महरंग बलोच, सिबगतुल्लाह और बलाच कादिर को दोषी माना। अदालत के फैसले के बाद पाकिस्तान में मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। भीड़ को उकसाने का आरोप जांच एजेंसियों के अनुसार, तीनों आरोपियों ने कथित रूप से एक भीड़ को उकसाया था, जिसने अर्धसैनिक बल के जवान शब्बीर अहमद पर हमला कर उनकी हत्या कर दी थी। अभियोजन पक्ष ने अदालत में दावा किया कि घटना के दौरान हिंसा फैलाने और सुरक्षा बलों के खिलाफ माहौल बनाने में आरोपियों की भूमिका थी। इन्हीं आरोपों के आधार पर अदालत ने उन्हें हत्या और आतंकवाद से संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराया। कौन हैं महरंग बलोच? 33 वर्षीय महरंग बलोच बलूचिस्तान की प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में गिनी जाती हैं। वह बलोच यकजेहती कमेटी (BYC) की प्रमुख हैं और लंबे समय से बलूचिस्तान में कथित जबरन गुमशुदगी, मानवाधिकार उल्लंघन और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठाती रही हैं। महरंग बलोच को पिछले वर्ष मार्च में कई अन्य कार्यकर्ताओं के साथ गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी के बाद देश और विदेश में कई मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई थी। मानवाधिकार आयोग ने उठाए सवाल फैसले के बाद पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने मामले की स्वतंत्र समीक्षा की मांग की है। आयोग का कहना है कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ अपनाया जा रहा रवैया चिंता का विषय है और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी हो। आयोग ने कहा कि मानवाधिकारों की वकालत करने वाले लोगों के साथ चरमपंथियों जैसा व्यवहार किए जाने की धारणा लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए नुकसानदायक हो सकती है। BYC ने फैसले को बताया राजनीतिक बलोच यकजेहती कमेटी (BYC) ने अदालत के फैसले की कड़ी आलोचना की है। संगठन का आरोप है कि यह फैसला बलोच समुदाय की आवाज दबाने और मानवाधिकार आंदोलनों को कमजोर करने की कोशिश है। संगठन ने कहा कि महरंग बलोच लंबे समय से शांतिपूर्ण तरीके से अपने समुदाय के अधिकारों के लिए आवाज उठाती रही हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई को राजनीतिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रिया स्वीडन की पर्यावरण कार्यकर्ता Greta Thunberg ने भी इस फैसले की आलोचना की है। उन्होंने मुकदमे को न्याय का मजाक बताते हुए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई पर सवाल उठाए। इसके अलावा कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी मामले पर चिंता व्यक्त की है और पाकिस्तान सरकार से निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित करने की अपील की है। मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ी बहस महरंग बलोच को सजा सुनाए जाने के बाद पाकिस्तान में मानवाधिकारों, नागरिक स्वतंत्रताओं और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बहस तेज हो गई है। एक ओर सरकार और जांच एजेंसियां इसे कानून के अनुसार हुई कार्रवाई बता रही हैं, वहीं मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि असहमति की आवाजों को दबाने की धारणा लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चुनौती बन सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि इस मामले का प्रभाव केवल बलूचिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पाकिस्तान में मानवाधिकार और राजनीतिक स्वतंत्रता को लेकर चल रही व्यापक बहस को भी प्रभावित करेगा।  

Deepshikha जून 24, 2026 0
Women protest in Herat as rights concerns grow amid disputed crackdown allegations.
अफगानिस्तान में महिलाओं के प्रदर्शन पर बल प्रयोग के आरोप, UN ने तालिबान की कार्रवाई पर जताई चिंता

  काबुल/हेरात: अफगानिस्तान के पश्चिमी शहर हेरात में महिलाओं के विरोध प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग और गोलीबारी के आरोपों को लेकर विवाद गहरा गया है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इस घटना पर चिंता व्यक्त करते हुए तालिबान प्रशासन की आलोचना की है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान कम से कम दो लोगों की मौत हुई और 20 से अधिक लोग घायल हुए। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है। रिपोर्टों के मुताबिक, हेरात में तालिबान की नैतिकता पुलिस (Morality Police) द्वारा कथित तौर पर उन महिलाओं के खिलाफ कार्रवाई की गई, जिन पर निर्धारित ड्रेस कोड का पालन नहीं करने का आरोप था। इसके बाद महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन किया, जिसके दौरान सुरक्षा बलों द्वारा बल प्रयोग किए जाने के आरोप सामने आए। UN विशेषज्ञों ने जताई चिंता संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) द्वारा नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञों के एक समूह ने जारी बयान में कहा कि महिलाओं को ड्रेस कोड के कथित उल्लंघन के आधार पर हिरासत में लिए जाने की खबरें गंभीर चिंता का विषय हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि महिलाओं को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या भेदभाव से मुक्त रहने के अधिकार का उपयोग करने के कारण दंडित किया गया है, तो यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। गोलीबारी को लेकर अलग-अलग दावे प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय स्रोतों ने दावा किया है कि प्रदर्शन को तितर-बितर करने के दौरान सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की। कुछ रिपोर्टों में एक बच्चे की मौत का भी दावा किया गया है। तालिबान प्रशासन और स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि प्रदर्शन के दौरान किसी प्रकार के हथियार का इस्तेमाल नहीं किया गया। इस कारण घटना को लेकर दोनों पक्षों के दावों में स्पष्ट अंतर बना हुआ है। ड्रेस कोड को लेकर जारी है विवाद अफगानिस्तान में महिलाओं के पहनावे से जुड़े नियम सदाचार के प्रसार और बुराई की रोकथाम मंत्रालय (PVPV) के तहत लागू किए जाते हैं। वर्तमान नियमों के अनुसार महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर शरीर को पूरी तरह ढकने वाले वस्त्र पहनने की सलाह दी जाती है। कई महिलाएं पारंपरिक बुर्के की बजाय अबाया, हिजाब या अन्य ढीले-ढाले परिधानों का उपयोग करती हैं। हाल के महीनों में ड्रेस कोड के पालन को लेकर निगरानी और कार्रवाई बढ़ने की खबरों के बाद महिलाओं के अधिकारों को लेकर बहस तेज हुई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर हेरात की घटना ने एक बार फिर अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ा दी है। मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े विशेषज्ञों ने घटना की निष्पक्ष जांच और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। फिलहाल घटना से जुड़े मौतों और घायलों के आंकड़ों तथा सुरक्षा बलों की भूमिका को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। स्वतंत्र जांच या आधिकारिक सत्यापन के बाद ही स्थिति की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।  

Deepshikha जून 12, 2026 0
Protesters gather in Rawalakot as demonstrations over economic demands escalate in PoK.
POK के रावलकोट में प्रदर्शन के दौरान गोलीबारी, 16 लोगों की मौत का दावा; कई घायल

  रावलकोट: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के रावलकोट में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच तनाव हिंसक रूप लेता नजर आया। स्थानीय सूत्रों और प्रदर्शनकारी संगठनों के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स की कथित गोलीबारी में कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई, जबकि 37 से अधिक लोग घायल हुए हैं। इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। रिपोर्टों के मुताबिक, रावलकोट के ईदगाह मैदान में हजारों लोग महंगाई, बिजली दरों में वृद्धि और बुनियादी राजनीतिक एवं आर्थिक अधिकारों की मांग को लेकर एकत्र हुए थे। प्रदर्शन के दौरान हालात तनावपूर्ण हो गए और सुरक्षा बलों द्वारा बल प्रयोग किए जाने के आरोप लगाए गए। घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई तथा घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया। कई दिनों से जारी है आंदोलन POK में पिछले कई दिनों से सस्ती बिजली, सब्सिडी वाले खाद्यान्न और अधिक प्रशासनिक अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन जारी है। प्रदर्शनकारी संगठनों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और आर्थिक चुनौतियों के कारण आम लोगों का असंतोष लगातार बढ़ रहा है। हाल के दिनों में जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) पर लगाए गए प्रतिबंधों और आंदोलन से जुड़े कई कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, प्रशासन ने कुछ इलाकों में इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी हैं। रावलकोट घटना के बाद विरोध प्रदर्शन तेज रावलकोट की घटना के बाद खाई गाला समेत कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। कई बाजार बंद रहे और लोगों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई के खिलाफ मार्च निकाले। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की भी इन प्रदर्शनों में भागीदारी देखी गई। प्रदर्शनकारी नेताओं का दावा है कि 5 जून से जारी आंदोलन के दौरान अब तक 53 नागरिकों की मौत हो चुकी है। इस संख्या की भी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। नेताओं ने कहा है कि वे आर्थिक राहत और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को लेकर अपना आंदोलन जारी रखेंगे। भारत की प्रतिक्रिया भारत ने घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए इसकी कड़ी निंदा की है। भारत ने इसे गंभीर मानवाधिकार मुद्दा बताते हुए कहा कि यह पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में नागरिक अधिकारों की स्थिति पर सवाल खड़े करता है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मामले का संज्ञान लेने और प्रभावित लोगों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की गई है। फिलहाल क्षेत्र में तनाव बना हुआ है और स्थिति पर सभी पक्षों की नजर है। घटना से जुड़े दावों और हताहतों के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है।  

Deepshikha जून 12, 2026 0
Andrew Malkinson after exoneration following 17 years in prison for a wrongful conviction in the UK.
17 साल जेल में रहा बेगुनाह, 23 साल बाद पकड़ा गया असली दोषी; ब्रिटेन की न्याय व्यवस्था पर उठे सवाल

  लंदन: ब्रिटेन में न्यायिक व्यवस्था की सबसे बड़ी भूलों में गिने जा रहे एक मामले ने एक बार फिर सुर्खियां बटोर ली हैं। एंड्रयू माल्किंसन नामक व्यक्ति ने जिस अपराध को कभी स्वीकार नहीं किया, उसी के लिए 17 साल जेल में बिताए। अब 23 साल बाद उस अपराध के वास्तविक दोषी को सजा मिलने के बाद यह मामला फिर चर्चा में है। 2003 की घटना से शुरू हुई पूरी कहानी मामला वर्ष 2003 का है, जब ग्रेटर मैनचेस्टर में एक महिला के साथ दुष्कर्म की घटना हुई थी। जांच के दौरान पीड़िता ने पहचान परेड में एंड्रयू माल्किंसन की पहचान की, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 2004 में अदालत ने माल्किंसन को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। उन्होंने शुरुआत से ही खुद को निर्दोष बताया और अपराध स्वीकार करने से इनकार कर दिया। बेगुनाही की जिद ने बढ़ाई जेल की अवधि माल्किंसन ने कभी अपराध स्वीकार नहीं किया। यही वजह रही कि उन्हें सजा में राहत नहीं मिली और वे 17 साल तक जेल में रहे। वर्ष 2020 में रिहा होने के बाद भी उनका नाम यौन अपराधियों के रजिस्टर में दर्ज रहा। रिहाई के बाद उन्होंने अपनी बेगुनाही साबित करने की कानूनी लड़ाई जारी रखी। डीएनए जांच ने पलट दिया पूरा मामला मामले में बड़ा मोड़ तब आया जब आधुनिक डीएनए तकनीक की मदद से पुराने सबूतों की दोबारा जांच कराई गई। जांच में मिले नए वैज्ञानिक साक्ष्य सीधे पॉल क्विन नामक व्यक्ति की ओर इशारा कर रहे थे। इसके बाद जुलाई 2023 में कोर्ट ऑफ अपील ने एंड्रयू माल्किंसन की सजा रद्द कर दी और उन्हें आधिकारिक रूप से निर्दोष घोषित कर दिया। 23 साल तक आजाद रहा असली अपराधी डीएनए सबूतों के आधार पर पॉल क्विन के खिलाफ मुकदमा चलाया गया। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने उसे दोषी करार देते हुए 21 साल की जेल की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि क्विन ने अपनी स्वतंत्रता का लाभ उठाया, जबकि एक निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक जेल में रहा। पीड़िता को दो बार देना पड़ा बयान मामले की पीड़िता को अलग-अलग समय पर दो मुकदमों में गवाही देनी पड़ी। अदालत ने उनके साहस की सराहना करते हुए उन्हें "असाधारण रूप से बहादुर" बताया। इस मामले ने न केवल न्यायिक भूल को उजागर किया, बल्कि पीड़िता के लंबे संघर्ष को भी सामने रखा। अब मुआवजे की लड़ाई लड़ रहे हैं माल्किंसन निर्दोष साबित होने के बाद माल्किंसन अब ब्रिटिश सरकार से मुआवजे की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके जीवन के 17 महत्वपूर्ण वर्ष गलत सजा की वजह से बर्बाद हो गए। उनकी कानूनी टीम न्यायिक भूल के शिकार लोगों के लिए बेहतर मुआवजा व्यवस्था की भी मांग कर रही है। जांच के घेरे में पुलिस और न्यायिक संस्थाएं मामले के बाद पुलिस और न्यायिक संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। समीक्षा रिपोर्ट में कई ऐसी कमियां सामने आईं, जिनकी वजह से माल्किंसन को वर्षों पहले ही निर्दोष साबित किया जा सकता था। ग्रेटर मैनचेस्टर पुलिस के कई अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा रही है, जबकि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने पदों से इस्तीफा भी दिया है। ब्रिटेन के लिए बड़ा सबक एंड्रयू माल्किंसन का मामला केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की जवाबदेही का भी सवाल बन गया है। असली अपराधी को सजा मिल चुकी है, लेकिन माल्किंसन के जीवन के वे 17 साल वापस नहीं लौट सकते, जो उन्होंने एक ऐसे अपराध की सजा काटते हुए गंवा दिए, जिसे उन्होंने कभी किया ही नहीं था।  

Deepshikha जून 6, 2026 0
Lahore High Court upholds death sentences in Pakistan’s 2020 motorway gang rape case
मोटरवे गैंगरेप केस में दोषियों को राहत नहीं, हाई कोर्ट ने बरकरार रखी फांसी की सजा

  पाकिस्तान के चर्चित मोटरवे गैंगरेप मामले में दोषी ठहराए गए दो आरोपियों को बड़ा झटका लगा है। लाहौर हाई कोर्ट ने उनकी अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को बरकरार रखा है। वर्ष 2020 में हुई इस घटना ने पूरे पाकिस्तान को झकझोर दिया था और देशभर में व्यापक आक्रोश देखने को मिला था। रात के सफर के दौरान बच्चों के सामने हुई थी दरिंदगी 9 सितंबर 2020 को फ्रांसीसी-पाकिस्तानी मूल की एक महिला अपने तीन बच्चों के साथ सियालकोट-लाहौर मोटरवे से गुजर रही थी। देर रात कार का ईंधन खत्म होने के कारण परिवार सड़क किनारे फंस गया। इसी दौरान दो हमलावर वहां पहुंचे, कार का शीशा तोड़ा और महिला को जबरन बाहर खींच लिया। आरोपियों ने बच्चों के सामने हथियार के बल पर महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। वारदात के बाद उन्होंने नकदी, गहने और बैंक कार्ड लूटकर मौके से फरार हो गए। डीएनए और मोबाइल डेटा बने गिरफ्तारी की सबसे बड़ी कड़ी घटना के बाद पुलिस ने व्यापक जांच शुरू की। मोबाइल फोन लोकेशन, कॉल रिकॉर्ड और घटनास्थल से मिले डीएनए नमूनों के आधार पर आरोपियों की पहचान की गई। जांच के दौरान पीड़िता ने भी दोनों आरोपियों की पहचान की थी। पुलिस के अनुसार, एक आरोपी शफकत अली ने मजिस्ट्रेट के समक्ष अपना अपराध स्वीकार करने वाला बयान भी दिया था। 2021 में सुनाई गई थी मौत की सजा मामले की सुनवाई के बाद मार्च 2021 में आतंकवाद निरोधक अदालत ने आबिद अली और शफकत अली को दोषी करार दिया था। अदालत ने दोनों को सामूहिक दुष्कर्म, अपहरण, डकैती और आतंकवाद से जुड़े अपराधों में फांसी की सजा सुनाई थी। इसके अलावा उन्हें अन्य मामलों में भी लंबी जेल की सजा दी गई थी। पुलिस अधिकारी के बयान ने भी खड़ा किया था विवाद घटना के बाद उस समय के लाहौर पुलिस प्रमुख उमर शेख का बयान भी विवादों में आ गया था। उन्होंने महिला के रात में यात्रा करने और दूसरा रास्ता न चुनने को लेकर टिप्पणी की थी। इस बयान की देशभर में आलोचना हुई और इसे पीड़िता को दोषी ठहराने की कोशिश बताया गया। बचाव पक्ष की दलीलें अदालत ने नहीं मानीं हाई कोर्ट में अपील करते हुए दोषियों के वकीलों ने कहा कि अभियोजन पक्ष की कहानी में कई विरोधाभास हैं और प्रस्तुत साक्ष्य पूरी तरह भरोसेमंद नहीं हैं। उन्होंने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करने की मांग की। सरकारी पक्ष ने अदालत को बताया कि डीएनए रिपोर्ट, डिजिटल सबूत और गवाहियों के आधार पर आरोप पूरी तरह साबित होते हैं। अदालत ने इन दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप का कोई ठोस आधार नहीं है। हाई कोर्ट के फैसले के बाद मस्क की प्रतिक्रिया चर्चा में लाहौर हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद अमेरिकी उद्योगपति Elon Musk ने सोशल मीडिया पर इसकी सराहना की। उन्होंने एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए पाकिस्तान को बधाई दी और कहा कि पश्चिमी देशों में भी ऐसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए। फैसले ने फिर छेड़ी सख्त सजा बनाम सुधार की बहस इस फैसले के बाद एक बार फिर अपराधियों को कठोर दंड देने और सुधारात्मक न्याय की अवधारणा पर बहस तेज हो गई है। जहां पाकिस्तान में अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए फांसी की सजा बरकरार रखी, वहीं कई पश्चिमी देशों में मृत्युदंड समाप्त किया जा चुका है और वहां अपराधियों के पुनर्वास पर अधिक जोर दिया जाता है।  

Deepshikha जून 4, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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abhishek singh अगस्त 14, 2026 0