वॉशिंगटन, एजेंसियां। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई बैठक में ईरान के परमाणु और सैन्य कार्यक्रम से जुड़ी नई खुफिया जानकारी साझा की। रिपोर्टों के मुताबिक, इजरायल का दावा है कि ईरान अपनी सैन्य और परमाणु क्षमताओं को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जिसके चलते नेतन्याहू ने ट्रंप के सामने कड़ा रुख अपनाने और जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला रखने की बात रखी। ईरान की गतिविधियों पर बढ़ी चिंता बैठक के दौरान नेतन्याहू ने कथित तौर पर ऐसी खुफिया जानकारी पेश की, जिसमें ईरान की मिसाइल और परमाणु गतिविधियों को लेकर नई आशंकाएं जताई गई हैं। इजरायल का मानना है कि यदि इन गतिविधियों पर समय रहते रोक नहीं लगी, तो क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से संकेत दिया कि वे किसी भी बड़े फैसले से पहले सभी उपलब्ध सूचनाओं की समीक्षा करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की संवेदनशील जानकारी पहले सीधे उन्हें दी जानी चाहिए थी। सैन्य कार्रवाई और कूटनीति दोनों पर चर्चा बैठक में ईरान के खिलाफ संभावित रणनीति पर चर्चा हुई, जिसमें सैन्य विकल्पों के साथ-साथ कूटनीतिक प्रयासों पर भी विचार किया गया। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है, लेकिन वह कूटनीतिक रास्ते को भी पूरी तरह बंद नहीं करना चाहता। पश्चिम एशिया में बढ़ सकता है तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान को लेकर अमेरिका और इजरायल का रुख और सख्त होता है, तो पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ सकता है। इस घटनाक्रम पर दुनिया के कई देशों की नजर बनी हुई है, क्योंकि इसका असर क्षेत्रीय सुरक्षा, तेल बाजार और वैश्विक कूटनीति पर पड़ सकता है।
वॉशिंगटन/दुबई, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य संघर्ष और तेज हो गया है। अमेरिकी सेना ने लगातार 10वीं रात ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए। वहीं, ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी लागू करने की घोषणा कर दी है, जिससे पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है। ईरान के सैन्य ठिकानों को बनाया निशाना अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार, ताजा हवाई हमलों का उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना और सामरिक ठिकानों को निशाना बनाना था। इन हमलों के बाद कई इलाकों में विस्फोटों की खबरें सामने आई हैं। हूती विद्रोहियों ने सऊदी जहाजों पर दी कार्रवाई की चेतावनी यमन के हूती विद्रोहियों ने घोषणा की है कि वे सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी लागू करेंगे। उन्होंने कहा कि बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य से गुजरने वाले सऊदी जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है। इस घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों और तेल बाजारों में चिंता बढ़ गई है। वैश्विक तेल आपूर्ति पर मंडराया संकट विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बाब-अल-मंदेब और होर्मुज जैसे अहम समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं, तो वैश्विक तेल आपूर्ति और व्यापार पर बड़ा असर पड़ सकता है। तनाव बढ़ने के साथ कच्चे तेल की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। युद्ध के बीच कूटनीतिक प्रयास भी जारी लगातार सैन्य कार्रवाई के बावजूद कई मध्यस्थ देशों की ओर से युद्धविराम और बातचीत की कोशिशें जारी हैं। हालांकि फिलहाल दोनों पक्षों की ओर से कोई ठोस समझौता सामने नहीं आया है और क्षेत्र में हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं।
तेहरान: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की तैयारियां तेज हो गई हैं। राजधानी तेहरान में जगह-जगह बैनर लगाकर लोगों से अंतिम यात्रा में शामिल होने की अपील की जा रही है। ईरानी सरकार का अनुमान है कि शनिवार से शुरू होने वाले अंतिम संस्कार कार्यक्रम में लाखों लोग शामिल होंगे। सरकारी अधिकारियों का मानना है कि यह जनसैलाब वर्ष 1989 में अयातुल्ला रूहुल्ला खुमैनी के अंतिम संस्कार की याद ताजा कर सकता है। ग्रैंड मोसल्ला में रखे गए ताबूत तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला परिसर में अयातुल्ला अली खामेनेई का ताबूत ईरानी राष्ट्रीय ध्वज में लपेटकर रखा गया है। उनके साथ उन परिजनों के ताबूत भी रखे गए हैं, जिनकी हालिया संघर्ष के दौरान इजरायली हवाई हमलों में मौत हुई थी। इनमें उनके दामाद, सबसे बड़ी बेटी, 14 महीने की नातिन और नए सर्वोच्च नेता घोषित किए गए अयातुल्ला मुजतबा खामेनेई की पत्नी भी शामिल हैं। श्रद्धांजलि देने पहुंचे धार्मिक और विदेशी प्रतिनिधि देश-विदेश से पहुंचे धार्मिक नेताओं, सरकारी प्रतिनिधियों और विदेशी मेहमानों ने ताबूत के पास जाकर श्रद्धांजलि अर्पित की। सैन्य बैंड ने शोक धुन बजाई, जबकि कई श्रद्धालुओं ने परंपरा के अनुसार अपने स्कार्फ और अन्य वस्तुओं को ताबूत से स्पर्श कराकर श्रद्धा व्यक्त की। 'या हुसैन' वाला लाल झंडा बना आकर्षण खामेनेई के ताबूत पर लाल रंग का झंडा भी रखा गया है, जिस पर सफेद अक्षरों में "या हुसैन" लिखा हुआ है। शिया परंपरा में यह झंडा अन्याय के खिलाफ संघर्ष और बलिदान का प्रतीक माना जाता है। सरकार के लिए शक्ति प्रदर्शन का अवसर विश्लेषकों के अनुसार, यह अंतिम संस्कार केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं बल्कि हालिया संघर्ष के बाद सरकार के लिए जनसमर्थन दिखाने का बड़ा अवसर भी है। ईरान इस समय अमेरिका के साथ युद्धविराम और शांति वार्ता के दौर से गुजर रहा है। वहीं, इजरायल के साथ तनाव भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ऐसे में यह आयोजन राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सैन्य नेतृत्व भी रहा मौजूद कार्यक्रम में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के प्रमुख जनरल अहमद वाहिदी समेत कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, सरकारी प्रतिनिधि, धार्मिक नेता और विभिन्न देशों के मेहमान शामिल हुए। मुजतबा खामेनेई की मौजूदगी पर सस्पेंस ईरान के नए सर्वोच्च नेता घोषित किए गए अयातुल्ला मुजतबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, हालिया संघर्ष के दौरान उनके घायल होने की चर्चा है। हालांकि अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि वे अपने पिता के अंतिम संस्कार में सार्वजनिक रूप से शामिल होंगे या नहीं। ईरान की कड़ी चेतावनी मुजतबा खामेनेई को लेकर इजरायल की ओर से सामने आई कथित धमकियों के बाद ईरान की संयुक्त सैन्य कमान ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि यदि अमेरिका, इजरायल या उनके सहयोगियों ने ईरान के खिलाफ कोई सैन्य कार्रवाई की, तो उसका "कड़ा और निर्णायक जवाब" दिया जाएगा। 9 जुलाई को होगा अंतिम संस्कार ईरानी सरकार के अनुसार, अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की औपचारिक शुरुआत शनिवार से होगी। उनकी पार्थिव देह को श्रद्धांजलि के लिए ईरान और पड़ोसी इराक के विभिन्न शहरों में ले जाया जाएगा। इसके बाद 9 जुलाई 2026 को पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें उनकी 14 महीने की नातिन समेत अन्य दिवंगत परिजनों के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।
यरुशलम: Benjamin Netanyahu ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि आवश्यकता पड़ी तो इजरायल दोबारा सैन्य कार्रवाई करने से नहीं हिचकेगा। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय तनाव को लेकर कूटनीतिक बातचीत जारी है। तुर्की की सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलु के अनुसार, एक इंटरव्यू में नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल अपनी सुरक्षा के मामले में किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं रहेगा और ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने को तैयार है। 'जरूरत पड़ी तो तीसरी बार भी करेंगे कार्रवाई' नेतन्याहू ने दावा किया कि ईरान के खिलाफ पहले की गई सैन्य कार्रवाइयों ने इजरायल को संभावित परमाणु खतरे से बचाया। उन्होंने कहा कि यदि इजरायल की सुरक्षा को फिर से खतरा महसूस हुआ, तो ईरान के खिलाफ एक और सैन्य अभियान शुरू किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इजरायल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेगा और किसी भी संभावित खतरे का जवाब देने के लिए तैयार रहेगा। अमेरिका-ईरान वार्ता के बीच बढ़ा तनाव नेतन्याहू का बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और परमाणु मुद्दों पर सहमति बनाने के प्रयास जारी हैं। दोनों पक्ष संघर्षविराम को व्यापक राजनीतिक समझौते में बदलने की दिशा में बातचीत कर रहे हैं। इन वार्ताओं में क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों में संभावित राहत और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं। इजरायल ने दोहराया अपना रुख इजरायल पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि वह ऐसे किसी भी समझौते से स्वयं को बाध्य नहीं मानेगा, जो उसकी दृष्टि में ईरान की सैन्य या परमाणु क्षमताओं को बढ़ावा देता हो। इजरायली नेतृत्व का कहना है कि देश की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और आवश्यकता पड़ने पर वह एकतरफा कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रखता है। ट्रंप ने संयम बरतने की अपील की वहीं, Donald Trump ने सार्वजनिक रूप से सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि पश्चिम एशिया में दोबारा सैन्य तनाव बढ़ना किसी के हित में नहीं होगा और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
मुंबई,एजेंसियां। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में बुधवार को हुई भारी बारिश ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया। लगातार हो रही बारिश के कारण कई निचले इलाकों में जलभराव की स्थिति बन गई, जिससे सड़क यातायात बाधित रहा और लोगों को आवागमन में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। अंधेरी सबवे में करीब पांच फीट पानी भर जाने के कारण प्रशासन को एहतियातन इसे यातायात के लिए बंद करना पड़ा। लोकल ट्रेन सेवा पर पड़ा असर भारी बारिश का असर मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन सेवा पर भी देखने को मिला। वेस्टर्न, सेंट्रल और हार्बर लाइन की कई ट्रेनें देरी से चलीं। हार्बर लाइन पर ओवरहेड इलेक्ट्रिक (OHE) वायर में तकनीकी खराबी आने से कई लोकल ट्रेनें बीच रास्ते में ही रुक गईं। सुबह के व्यस्त समय में आई इस समस्या से हजारों यात्रियों को परेशानी उठानी पड़ी। रेलवे की तकनीकी टीम ने मौके पर पहुंचकर मरम्मत कार्य शुरू किया, जिसके बाद धीरे-धीरे सेवाएं सामान्य करने का प्रयास किया गया। बालकनी गिरने से व्यक्ति की मौत दक्षिण मुंबई के बाबुलनाथ रोड स्थित MHADA की 'सूर्यप्रकाश' इमारत में मंगलवार देर रात तीसरी मंजिल की बालकनी का एक हिस्सा अचानक गिर गया। हादसे में 51 वर्षीय संतोष रामचंद्र भारस्कर गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद फायर ब्रिगेड, पुलिस, एम्बुलेंस और नगर निगम की टीम मौके पर पहुंची तथा सुरक्षा के मद्देनजर आवश्यक कदम उठाए गए। कई जिलों में ऑरेंज अलर्ट भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने मुंबई, ठाणे, पालघर, रायगढ़, रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। विभाग ने अगले चार से पांच दिनों तक भारी बारिश, तेज हवाओं और कुछ स्थानों पर बिजली गिरने की चेतावनी दी है। प्रशासन ने नागरिकों से अनावश्यक यात्रा से बचने, जलभराव वाले क्षेत्रों से दूर रहने और मौसम विभाग की सलाह का पालन करने की अपील की है। वहीं, रेलवे, नगर निगम और आपदा प्रबंधन विभाग को किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए अलर्ट मोड पर रखा गया है।
तेल अवीव: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर इजराइल में बढ़ती राजनीतिक नाराजगी के बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दो टूक कहा है कि ईरान को कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि चाहे कोई समझौता हो या न हो, इजराइल अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। नेतन्याहू ने कहा, "ईरान के पास कभी परमाणु हथियार नहीं होंगे, न आज और न कल। हमने अपने देश पर मंडरा रहे विनाश के तत्काल खतरे को टाल दिया है और इजराइल को पूर्ण विनाश से बचाया है।" विपक्ष और सहयोगियों के निशाने पर नेतन्याहू प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है, जब उन्हें विपक्ष के साथ-साथ अपनी सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार के सहयोगियों की आलोचना का भी सामना करना पड़ रहा है। इजराइल में कई राजनीतिक दलों का मानना है कि अमेरिका-ईरान समझौते से क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट का हमला इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदार Naftali Bennett ने नेतन्याहू सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार का कार्यकाल राजनीतिक विभाजन, 7 अक्टूबर के नरसंहार और अब ईरान मुद्दे पर ऐतिहासिक विफलता से चिह्नित रहा है। बेनेट ने दावा किया कि यदि वह सत्ता में होते तो कूटनीतिक और सुरक्षा मामलों में अलग रणनीति अपनाते। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ उनके संबंध केवल इजराइल के राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए जाते। ट्रंप से मतभेद की अटकलों पर दिया जवाब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के साथ मतभेद की चर्चाओं पर नेतन्याहू ने कहा कि कुछ मुद्दों पर दोनों नेताओं के विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन इजराइल के सुरक्षा हित सर्वोपरि हैं। उन्होंने कहा, "ऐसे अवसर आते हैं जब राष्ट्रपति ट्रंप और मेरे विचार पूरी तरह समान नहीं होते, लेकिन इजराइल की सुरक्षा की समझदारी से रक्षा की जानी चाहिए।" लेबनान और सीरिया में सुरक्षा क्षेत्र बनाए रखेगा इजराइल प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने दक्षिणी लेबनान से सेना हटाने की संभावना को भी खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि इजराइल ने गाजा, लेबनान और सीरिया में सुरक्षा क्षेत्र स्थापित किए हैं और जरूरत पड़ने तक वहां अपनी उपस्थिति बनाए रखेगा। नेतन्याहू ने कहा, "हमने इजराइल के चारों ओर गहरे सुरक्षा क्षेत्र बनाए हैं। हमने सीरिया में असद की सेना के हथियारों को नष्ट किया है। अपने देश की सुरक्षा के लिए हम इन क्षेत्रों में तब तक बने रहेंगे, जब तक इसकी आवश्यकता होगी।" समझौते को लेकर जारी है सियासी बहस विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिणी लेबनान और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे अमेरिका-ईरान समझौते के कार्यान्वयन में बाधा बन सकते हैं। ऐसे में इजराइल के भीतर यह बहस तेज हो गई है कि क्या यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थिरता लाएगा या नए सुरक्षा संकट पैदा करेगा।
नई दिल्ली/तेल अवीव: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते की घोषणा के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति में नया भूचाल आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा समझौते को अंतिम रूप दिए जाने की घोषणा के कुछ घंटों के भीतर ही इजरायल ने इसका विरोध शुरू कर दिया। इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर और विपक्षी नेता बेनी गैंट्ज ने समझौते पर गंभीर आपत्तियां जताते हुए स्पष्ट कर दिया कि इजरायल अपनी सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि अमेरिका की मध्यस्थता में हुआ कोई भी समझौता इजरायल पर बाध्यकारी नहीं है। उन्होंने कहा, "इजरायल एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है। हमारी पहली जिम्मेदारी इजरायल के नागरिकों, इजरायली रक्षा बलों (आईडीएफ) और यहूदी समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।" 'इजरायल कोई बनाना रिपब्लिक नहीं' बेन-गवीर ने कहा कि इतिहास गवाह है कि जब-जब इजरायल ने अंतरराष्ट्रीय दबाव में सुरक्षा समझौते किए, तब उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी। उन्होंने ओस्लो समझौते, 2006 के लेबनान युद्धविराम और गाजा संघर्ष विराम के उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे समझौतों का परिणाम अक्सर नई हिंसा के रूप में सामने आया है। उन्होंने कहा, "हम अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रंप का सम्मान करते हैं, लेकिन इजरायल कोई बनाना रिपब्लिक नहीं है। देश के सुरक्षा संबंधी फैसले केवल इजरायल के हितों को ध्यान में रखकर लिए जाएंगे।" हिज्बुल्लाह के खिलाफ सख्त रुख बेन-गवीर ने मांग की कि लेबनान में हिज्बुल्लाह के सैन्य ढांचे को पूरी तरह समाप्त किया जाए और जिन क्षेत्रों को इजरायली सेना ने आतंकवादी गतिविधियों से मुक्त कराया है, वहां से सेना को पीछे नहीं हटना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि लेबनान से इजरायल की ओर कोई ड्रोन या मिसाइल दागी जाती है तो उसका जवाब दाहिया समेत अन्य ठिकानों पर कड़ी सैन्य कार्रवाई के रूप में दिया जाएगा। विपक्षी नेता बेनी गैंट्ज ने भी उठाए सवाल इजरायल के पूर्व रक्षा मंत्री और विपक्षी नेता बेनी गैंट्ज ने भी समझौते पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता जो लेबनान में इजरायल की सैन्य कार्रवाई की स्वतंत्रता को सीमित करता हो। गैंट्ज ने कहा, "ईरान के साथ उभरता यह समझौता एक रणनीतिक विफलता साबित हो सकता है। इसके कारण आने वाले वर्षों में इजरायल को कूटनीतिक, सैन्य और कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।" ट्रंप ने किया था समझौते का ऐलान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होने की घोषणा करते हुए कहा था, "इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ समझौता पूरा हो चुका है। सभी को बधाई।" ट्रंप ने यह भी कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को वाणिज्यिक जहाजों के लिए तत्काल प्रभाव से खोला जाएगा और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाई जाएगी, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद है। 19 जून को हो सकते हैं औपचारिक हस्ताक्षर रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर हो सकते हैं। समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही बहाल करने, क्षेत्रीय तनाव कम करने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम के भविष्य को लेकर आगे की बातचीत का ढांचा तय किया जाएगा। क्या ट्रंप के लिए बढ़ेगी मुश्किल? विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, लेकिन इजरायल की खुली नाराजगी ने नई कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। यदि इजरायल समझौते के कुछ प्रावधानों को मानने से इनकार करता है, तो क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करना आसान नहीं होगा और अमेरिकी प्रशासन को अपने दो प्रमुख सहयोगियों के बीच संतुलन बनाने की कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ सकता है।
ईरान पर हमले रोकने के फैसले से चौंके नेतन्याहू अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों के बीच एक नई रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu को उस समय बड़ा झटका लगा जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमले रोकने और कूटनीतिक रास्ता अपनाने का फैसला किया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप ने यह फैसला तब लिया जब उन्हें संकेत मिले कि ईरानी नेतृत्व युद्ध समाप्त करने के लिए तैयार किए गए एक प्रारूप समझौते पर सहमत हो गया है। बताया जा रहा है कि नेतन्याहू को इस बातचीत की पूरी जानकारी नहीं थी और वे अमेरिकी प्रशासन के करीबी लोगों से इसके बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे थे। क्या इजरायल को वार्ता से दूर रखा गया? सूत्रों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में इजरायल सीधे तौर पर शामिल नहीं है। जब ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ईरान के साथ समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, तो इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्पष्ट किया कि वह इस प्रस्तावित समझौते का हिस्सा नहीं है। यही कारण है कि यह सवाल उठने लगा है कि क्या क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर इजरायल को वार्ता प्रक्रिया से अलग रखा गया। 'इस्लामाबाद समझौता' बन सकता है नया मोड़ रिपोर्ट्स के मुताबिक, कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता में तैयार किए जा रहे इस समझौते को "इस्लामाबाद एग्रीमेंट" नाम दिया जा सकता है। प्रस्तावित समझौते में कई अहम बिंदु शामिल हैं। इसके तहत Strait of Hormuz को तुरंत फिर से खोलने, समुद्री व्यापार सामान्य करने, ईरान को सीमित प्रतिबंध राहत देने और 60 दिनों के युद्धविराम को आगे बढ़ाने जैसे प्रावधान शामिल बताए जा रहे हैं। इस दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी आगे बातचीत हो सकती है। इजरायल की शर्तें अब भी सख्त नेतन्याहू लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने की मांग करते रहे हैं। इजरायल चाहता है कि ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम भंडार को हटाए, परमाणु संवर्धन ढांचे को खत्म करे, मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाए और क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों को समर्थन देना बंद करे। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित समझौते में इजरायल की इन मांगों को कितना स्थान मिला है। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बढ़ रही दूरी? रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि हाल के दिनों में ट्रंप और नेतन्याहू के संबंधों में तनाव बढ़ा है। दोनों नेताओं की रणनीति में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। जहां ट्रंप युद्ध को जल्द समाप्त कर क्षेत्र में स्थिरता लाना चाहते हैं, वहीं नेतन्याहू ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के खिलाफ अधिक कठोर और लंबी रणनीति के पक्षधर माने जा रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बढ़ती तेल कीमतों, वैश्विक आर्थिक दबाव और घरेलू राजनीतिक चुनौतियों के कारण ट्रंप युद्ध को जल्द खत्म करना चाहते हैं, जबकि इजरायल अपनी सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता दे रहा है। पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव यदि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता अंतिम रूप ले लेता है, तो यह पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इससे न केवल क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार को भी राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि इजरायल की चिंताओं और उसकी भविष्य की रणनीति पर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति लाता है या नए राजनीतिक मतभेदों को जन्म देता है।
तेहरान/नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में एक बार फिर बढ़ते सैन्य तनाव के बीच भारत ने अपने नागरिकों के लिए उच्च स्तरीय सुरक्षा चेतावनी जारी की है। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने ईरान में मौजूद भारतीयों को जल्द से जल्द देश छोड़ने की सलाह दी है, जबकि अन्य नागरिकों से फिलहाल ईरान की यात्रा पूरी तरह टालने की अपील की गई है। दूतावास की यह एडवाइजरी ऐसे समय में जारी हुई है जब इजरायल और ईरान के बीच पिछले 24 घंटों में सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति लगातार बिगड़ती नजर आ रही है। भारतीय दूतावास ने जारी की नई चेतावनी भारतीय दूतावास ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि क्षेत्र में तेजी से बदलते सुरक्षा हालात को देखते हुए भारतीय नागरिकों को अत्यधिक सतर्क रहने की जरूरत है। दूतावास ने कहा, “हाल के घटनाक्रमों को देखते हुए भारतीय नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे ईरान की यात्रा से बचें। जो भारतीय वर्तमान में ईरान में मौजूद हैं, वे उपलब्ध परिवहन साधनों का उपयोग कर जल्द से जल्द देश से बाहर निकलने की व्यवस्था करें।” दूतावास ने यह भी कहा कि भारतीय नागरिक स्थानीय प्रशासन की सलाह का पालन करें और सुरक्षा संबंधी अपडेट पर लगातार नजर बनाए रखें। 24 घंटे में तेजी से बदले हालात पश्चिम एशिया में तनाव तब और बढ़ गया जब इजरायल और ईरान के बीच एक बार फिर प्रत्यक्ष सैन्य टकराव की खबरें सामने आईं। दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ की गई कार्रवाई ने पहले से नाजुक स्थिति को और गंभीर बना दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि हालिया घटनाक्रमों ने क्षेत्र में व्यापक संघर्ष की आशंकाओं को फिर से बढ़ा दिया है। बेरूत हमलों के बाद बढ़ा संकट तनाव की शुरुआत रविवार को हुई, जब इजरायल ने लेबनान की राजधानी बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में हवाई हमले किए। इसके बाद ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई की गई और दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तथा सैन्य गतिविधियां तेज हो गईं। रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने एक ईरानी पेट्रोकेमिकल परिसर को निशाना बनाया, जबकि ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने इजरायली सैन्य ठिकानों पर हमले का दावा किया है। लाल सागर में भी बढ़ी चिंता क्षेत्रीय तनाव का असर समुद्री मार्गों पर भी दिखाई देने लगा है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में इजरायल से जुड़े जहाजों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति और बिगड़ती है तो इसका असर वैश्विक व्यापार, तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात पर पड़ सकता है। लाल सागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक समुद्री मार्गों में शामिल है। ट्रंप की कूटनीतिक कोशिशों को झटका बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ संभावित परमाणु समझौते के जरिए क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। हालिया हमलों ने इन प्रयासों को कठिन बना दिया है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि यदि सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो बातचीत की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। नेतन्याहू से ट्रंप की फोन पर बातचीत अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, ईरानी मिसाइल हमलों के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बातचीत की। बताया जा रहा है कि ट्रंप ने नेतन्याहू से आगे सैन्य कार्रवाई से बचने और कूटनीतिक रास्ता अपनाने का आग्रह किया। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि दोनों पक्ष किसी संभावित समझौते के करीब पहुंच सकते हैं, बशर्ते तनाव को और न बढ़ाया जाए। ‘अब बातचीत की मेज पर लौटने का समय’ एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि समझौते की संभावनाएं अभी भी मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि हाल के घटनाक्रमों के बावजूद बातचीत का रास्ता खुला है और क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी रहने चाहिए। भारतीयों के लिए क्या है सलाह? भारत सरकार और भारतीय दूतावास ने ईरान में मौजूद नागरिकों से अपील की है कि वे स्थिति को हल्के में न लें और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन करें। दूतावास ने भारतीयों से कहा है कि वे अपनी यात्रा योजनाओं की समीक्षा करें, स्थानीय परिस्थितियों पर नजर रखें और आवश्यकता पड़ने पर जल्द से जल्द सुरक्षित स्थानों की ओर रवाना हों। पश्चिम एशिया पर टिकी दुनिया की नजर इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक सुरक्षा पर इसके संभावित प्रभाव को देखते हुए दुनिया भर की सरकारें हालात पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। आने वाले दिनों में दोनों देशों के कदम यह तय करेंगे कि क्षेत्र शांति की ओर बढ़ता है या एक नए बड़े संघर्ष की ओर।
Mojtaba Khamenei को लेकर अमेरिकी मीडिया में बड़ा दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के शीर्ष नेता इस समय बेहद गोपनीय तरीके से एक अज्ञात स्थान पर रह रहे हैं और बाहरी दुनिया से उनका संपर्क लगभग सीमित कर दिया गया है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के हवाले से आई रिपोर्ट में कहा गया है कि मोजतबा खामेनेई तक सीधे पहुंचना लगभग असंभव हो गया है। उनसे संपर्क केवल विशेष दूतों और गुप्त कुरियर नेटवर्क के जरिए किया जा रहा है। यही वजह है कि Iran और United States के बीच चल रही शांति वार्ता और संभावित पीस डील की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। ट्रंप प्रशासन के साथ बातचीत में देरी रिपोर्ट के अनुसार, Donald Trump प्रशासन के साथ बातचीत कर रहे ईरानी अधिकारियों को भी अपने ही सिस्टम के भीतर संवाद स्थापित करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। बताया गया कि अमेरिका की ओर से भेजे गए किसी भी प्रस्ताव या समझौते के मसौदे को मोजतबा खामेनेई तक पहुंचाने और वहां से जवाब वापस आने में काफी समय लग रहा है। इसका कारण यह है कि उनके पास सीधे संपर्क का सामान्य माध्यम अब मौजूद नहीं है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मोजतबा खामेनेई ने अपने करीबी अधिकारियों को पहले से निर्देश दे रखे हैं कि किन मुद्दों पर बातचीत की जा सकती है और किन विषयों से बचना है। शीर्ष अधिकारियों को भी नहीं पता लोकेशन अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सुरक्षा कारणों से ईरानी सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों को भी मोजतबा खामेनेई की वास्तविक लोकेशन की जानकारी नहीं है। संदेशों के आदान-प्रदान के लिए विशेष कुरियर नेटवर्क बनाया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य उनकी लोकेशन को पूरी तरह गुप्त रखना है। एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से कहा गया कि जवाब आने में काफी देर हो रही है और इससे वार्ता प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। अमेरिकी-इजरायली ऑपरेशन के बाद बढ़ी सुरक्षा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हाल के अमेरिकी और इजरायली सैन्य अभियानों के दौरान ईरानी सरकारी तंत्र से मिली खुफिया जानकारी के आधार पर कई वरिष्ठ नेताओं की पहचान की गई थी। इसी क्रम में “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के दौरान हुए हमलों में मोजतबा खामेनेई के घायल होने का भी दावा किया गया है। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। बताया जा रहा है कि इन घटनाओं के बाद उनकी सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह बदल दी गई है और उनकी सार्वजनिक मौजूदगी लगभग समाप्त हो गई है। पिता अली खामेनेई के बाद और बढ़ी सतर्कता रिपोर्ट के मुताबिक, Ali Khamenei की मौत के बाद सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। इसी कारण मोजतबा खामेनेई अब सार्वजनिक कार्यक्रमों से लगभग दूर हैं। ईरानी मीडिया में समय-समय पर उनके नाम से जारी संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान के कई अधिकारी फिलहाल भूमिगत बंकरों से काम कर रहे हैं और सीधे संवाद से बच रहे हैं, जिससे अमेरिका के साथ बातचीत की गति और धीमी हो गई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।