Jharkhand Politics News

Rajya Sabha election 2026
Rajya Sabha election 2026: परिमल नाथवानी की धमाकेदार जीत, विधानसभा में गूंजे ‘जय श्रीराम’ के नारे

रांची। झारखंड राज्यसभा चुनाव में एक बार फिर बड़ा उलटफेर हुआ है। तमाम राजनीतिक जोड़-घटाव और कयासों को धता बताते हुए निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने शानदार जीत दर्ज की है। नाथवाणी की इस जीत के साथ ही एनडीए खेमे में जश्न का माहौल है, जबकि सत्तारूढ़ गठबंधन को करारा झटका लगा है। ‘जय श्रीराम’ के नारे लगे जैसे ही परिमल नाथवानी की जीत की आधिकारिक घोषणा हुई, विधानसभा परिसर ‘जय जगन्नाथ’ और ‘जय श्रीराम’ के गगनभेदी नारों से गूंज उठा। एनडीए विधायकों ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर इस जीत का जश्न मनाया। इस कड़े मुकाबले में जेएमएम उम्मीदवार को जहां 30 वोट मिले, वहीं परिमल नाथवानी ने 28 वोटों के साथ बाजी मार ली। हालांकि उन्हें कुल 30 वोट मिले थे, लेकिन इनमें से दो इनवेलिड करार दिये गये। संख्या बल के इस खेल में नाथवानी को मिले क्रॉस वोटिंग के समर्थन ने नतीजों को पूरी तरह बदल कर रख दिया। ‘विकास’ और ‘अंतरात्मा’ की हुई जीत: नीरा यादव इस चौंकाने वाली जीत पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा नेता और पूर्व मंत्री नीरा यादव ने विपक्ष पर बड़ा तंज कसा। उन्होंने कहा कि जनता और उनके प्रतिनिधि अब सिर्फ और सिर्फ विकास में विश्वास करते हैं। यह किसी पार्टी विशेष की नहीं, बल्कि विकास की सोच की जीत है। यही कारण है कि कई विधायकों ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपनी ‘अंतरात्मा की आवाज’ सुनी और नाथवानी के पक्ष में मतदान किया। क्या है इसके सियासी मायने? इस चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है, कि झारखंड की सियासत में पर्दे के पीछे की पटकथा कुछ और ही लिखी जा रही थी। जेएमएम सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद अपने गठबंधन के कुनबे को पूरी तरह एकजुट रखने में नाकाम रही। वहीं, नाथवानी की जीत ने यह साबित कर दिया कि झारखंड में विकास के एजेंडे और सही रणनीतिक घेराबंदी के आगे सत्ता का रसूख भी फीका पड़ सकता है।

anjali kumari जून 18, 2026 0
Rajya Sabha election results
Big Breaking: राज्यसभा चुनाव :बैद्यनाथ राम और परिमल नथवाणी जीते

रांची। झारखंड में हुए राज्यसभा चुनाव के नतीजे घोषित हो गए हैं, जिसमें भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवाणी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की है। इस चुनाव में कुल दो सीटों के लिए मतदान हुआ था, जहां एक सीट पर बैजनाथ राम की जीत पहले ही तय मानी जा रही थी, जबकि दूसरी सीट पर कड़ा मुकाबला देखने को मिला।   परिमल नाथवाणी और प्रणव झा के बीच सीधी टक्कर थी दूसरी सीट पर परिमल नाथवाणी और प्रणव झा के बीच सीधी टक्कर थी, जिसमें नाथवाणी ने बढ़त बनाते हुए जीत दर्ज की। चुनाव में सभी 81 विधायकों ने मतदान किया। अंतिम चरण में मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने वोट डाला, जबकि इससे पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी मतदान किया। मतगणना के अनुसार परिमल नाथवाणी को 30 वोट मिले, जिनमें 2 वोट अवैध घोषित हुए। परिमल नथवाणी  की जीत को देखकर लग रहा कि अगर क्रॉस  वोटिंग नहीं होती तो उनका जीतना  मुश्किल था। इधर प्रणव झा को 20 वोट प्राप्त हुए, जबकि बैजनाथ राम को 29 वोट मिले। चुनाव परिणाम के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। बता दे  नामांकन से ही यह चुनाव चर्चा में था और नाथवाणी लगातार अपनी जीत का दावा कर रहे थे। उन्होंने कहा था कि झारखंड से उनका पुराना जुड़ाव है और राज्य के विकास में उनका योगदान रहा है। इस जीत के साथ राज्यसभा की एक सीट पर एनडीए समर्थित उम्मीदवार का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखा है।

anjali kumari जून 18, 2026 0
Bhanu Pratap Shahi
भानू प्रताप शाही का दावा-नाथवानी को मिले 35 वोट

रांची। झारखंड में राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले नेताओं के बयान भी लगातार सुर्खियां बटोर रहे हैं। इसी बीच बीजेपी नेता और पूर्व मंत्री भानु प्रताप शाही ने बड़ा दावा किया है। भानु प्रताप शाही ने कहा है कि राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित उम्मीदवार को कुल 35 वोट मिलेंगे। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। उनका कहना है कि आंकड़े भाजपा के पक्ष में मजबूत स्थिति दिखा रहे हैं और उम्मीदवार आसानी से अच्छा प्रदर्शन करेगा। हर खेमा कर रहा अपनी जीत का दावा राज्यसभा चुनाव में जीत-हार का पूरा खेल विधायकों के संख्या बल पर निर्भर करता है। ऐसे में हर दल अपने-अपने समर्थन का दावा कर रहा है। जहां एक ओर इंडिया गठबंधन अपनी मजबूती दिखा रहा है, वहीं एनडीए भी अपने उम्मीदवार की जीत को लेकर भरोसा जता रहा है।   खूब हो रही बयानबाजी मतदान से पहले नेताओं के इस तरह के दावों से राजनीतिक सरगर्मी और बढ़ गई है। हर पक्ष अपने-अपने आंकड़े पेश कर माहौल अपने पक्ष में बनाने की कोशिश कर रहा है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि मतदान के बाद असल में किसके पक्ष में कितने वोट जाते हैं। राज्यसभा चुनाव के नतीजे जल्द ही सामने आएंगे, जिसके बाद यह साफ हो जाएगा कि भानु प्रताप शाही का दावा कितना सही साबित होता है।

anjali kumari जून 18, 2026 0
Congress Rajya Sabha Elections
राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस एक्टिव, रांची पहुंचे भूपेश बघेल

रांची। झारखंड में होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक गतिविधियां तेज कर दी हैं। पार्टी आलाकमान द्वारा नियुक्त राज्यसभा चुनाव पर्यवेक्षक भूपेश भघेल  और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजय शर्मा शनिवार को रांची पहुंचे। उनके आगमन के साथ ही राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस संगठन पूरी तरह चुनावी मोड में नजर आने लगा है।   एयरपोर्ट पर हुआ जोरदार स्वागत रांची के बिरसा एयरपोर्ट  पर दोनों नेताओं का कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने गर्मजोशी से स्वागत किया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष Keshav Mahato Kamlesh के नेतृत्व में पार्टी नेताओं ने पुष्पगुच्छ और अंगवस्त्र भेंट कर उनका अभिनंदन किया। इस दौरान बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और पदाधिकारी मौजूद रहे। एयरपोर्ट परिसर में कांग्रेस समर्थकों ने नारेबाजी कर राज्यसभा चुनाव में जीत का भरोसा भी जताया।   विधायकों और सहयोगी दलों के साथ होगी चर्चा सूत्रों के अनुसार, रांची प्रवास के दौरान भूपेश बघेल और अजय शर्मा कांग्रेस विधायकों, वरिष्ठ नेताओं और महागठबंधन के सहयोगी दलों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक करेंगे। इन बैठकों में राज्यसभा चुनाव की रणनीति, विधायकों की स्थिति और चुनावी गणित पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। पर्यवेक्षकों की जिम्मेदारी चुनाव प्रक्रिया की निगरानी करने और पार्टी नेतृत्व को जमीनी हालात से अवगत कराने की भी होगी।   महागठबंधन की जीत को लेकर आश्वस्त कांग्रेस कांग्रेस नेताओं का दावा है कि राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन पूरी तरह एकजुट है और गठबंधन समर्थित उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित है। पार्टी का मानना है कि यह चुनाव केवल एक सीट जीतने का मामला नहीं, बल्कि गठबंधन की राजनीतिक मजबूती और एकता का प्रदर्शन भी होगा।   झामुमो के अगले कदम पर नजर राजनीतिक गलियारों में अब सबकी निगाहें Jharkhand Mukti Morcha के अगले कदम पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि यदि झामुमो दूसरा उम्मीदवार मैदान में उतारता है तो चुनावी मुकाबला और रोचक हो सकता है। फिलहाल कांग्रेस और उसके सहयोगी दल चुनावी तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। पार्टी नेतृत्व किसी भी तरह की चूक से बचना चाहता है और इसी उद्देश्य से वरिष्ठ नेताओं को झारखंड भेजकर चुनावी रणनीति को मजबूत किया जा रहा है।

Unknown जून 6, 2026 0
Rajya sabha election
राज्यसभा का रण – JMM का 'खेला' या कांग्रेस से 'मेल-मिलाप'?

रांची। झारखंड की सियासत में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल तैर रहा है—क्या झारखंड मुक्ति मोर्चा, अपनी सहयोगी पार्टी कांग्रेस को राज्यसभा की एक सीट देगी? निर्वाचन आयोग ने झारखंड की दो राज्यसभा सीटों पर 18 जून को चुनाव कराने का एलान कर दिया है। अधिसूचना 1 जून को जारी होने वाली है। एक तरफ जहां सत्ताधारी 'इंडिया' गठबंधन के पास नंबर गेम में पूरी ताकत है, वहीं पर्दे के पीछे शह और मात का ऐसा खेल शुरू हो चुका है, जिसने रांची से लेकर दिल्ली तक हलचल तेज कर दी है। इस बीच, भारतीय जनता पार्टी ने केवल 21 विधायक होने के बावजूद अपना उम्मीदवार उतारने का एलान करके सबको चौंका दिया है। बीजेपी के इस कदम से सत्ताधारी गठबंधन में ऐसी खलबली मची है कि झामुमो को सीधे चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। आइए देखते हैं इस पूरे सियासी गणित और सीट शेयरिंग के पेच पर हमारी यह विशेष ग्राउंड रिपोर्ट।  राज्यसभा की 2 सीटों के लिए होंगे चुनाव  झारखंड की दो राज्यसभा सीटें खाली हो रही हैं। पहली सीट झारखंड के आंदोलनकारी नेता और झामुमो के सर्वेसर्वा रहे स्वर्गीय शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली हुई है। वहीं दूसरी सीट बीजेपी के निवर्तमान सांसद दीपक प्रकाश की है, जिनका कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो रहा है। जीत के लिए 28 वोट की जरूरत नियमों के मुताबिक, इस चुनाव में जीत के लिए एक उम्मीदवार को कम से कम 28 प्रथम वरीयता के वोटों यानी First Preference Votes की जरूरत है। झारखंड विधानसभा में विधायकों की कुल संख्या 81 है। अब जरा नजर डालिए विधानसभा के मौजूदा नंबर गेम पर।   विधानसभा का नंबर गेम कुल सीटें: 81 जीत के लिए जरूरी वोट (प्रति सीट): 28 सत्तारूढ़ 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन: 56 विधायक झामुमो (JMM): 34 कांग्रेस (Congress): 16 राजद (RJD): 04 माले (CPI-ML): 02 (बाहरी समर्थन) विपक्षी एनडीए (NDA) गठबंधन: 24 विधायक भाजपा (BJP): 21 आजसू (AJSU): 01 जदयू (JD-U): 01 लोजपा-आर (LJP-R): 01 इंडी गठबंधन के पास 56 वोट गणित बिल्कुल साफ है। 'इंडिया' गठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं। यानी 28 गुणा 2 बराबर 56! सत्तारूढ़ गठबंधन चाहे तो बेहद आसानी से दोनों की दोनों सीटें अपनी झोली में डाल सकता है। लेकिन, पेच यहीं फंसता है। सवाल यह है कि ये दो सीटें गठबंधन के अंदर किस-किसके खाते में जाएंगी? क्या झामुमो अपनी सहयोगी कांग्रेस को एक सीट सौंपेगी, या अपनी पार्टी की ताकत के दम पर दोनों सीटों पर खुद के उम्मीदवार उतारेगी? कांग्रेस का एक सीट पर दावा इस पूरे मामले पर कांग्रेस का रुख साफ है। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ताओं का कहना है कि वे इस बार एक सीट पर अपना दावा ठोक रहे हैं और इसके लिए गठबंधन के शीर्ष नेताओं से बातचीत हो रही है। लेकिन, झामुमो के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि चूंकि एक सीट झामुमो के अपने नेता शिबू सोरेन की रही है, इसलिए उस पर झामुमो का स्वाभाविक दावा है। वहीं दूसरी सीट पर भी 34 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते झामुमो अपना दावा छोड़ना नहीं चाहती।   इस संबंध में कांग्रेस प्रवक्ता राकेश सिन्हा का कहना है कि "गठबंधन में सभी सहयोगियों का सम्मान होता है। कांग्रेस ने हमेशा राज्य के विकास और गठबंधन धर्म का पालन किया है। हमारा लक्ष्य स्पष्ट है कि हम एक सीट पर चुनाव लड़ें, इसके लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जी और झामुमो के नेतृत्व के साथ जल्द ही समन्वय बैठक होगी और कोई बीच का रास्ता निकाल लिया जाएगा।" वहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव सह केंद्रीय प्रवक्ता  सुप्रियो भट्टाचार्य का कहना है कि "संख्या बल किसके पास है, यह पूरा देश देख रहा है। हमारे पास 56 विधायकों का अटूट बहुमत है। उम्मीदवार कौन होगा, यह गठबंधन के नेता बैठकर तय करेंगे। लेकिन, यह तय है कि दोनों सीटें 'इंडिया' गठबंधन ही जीतेगा। बीजेपी के पास नंबर नहीं हैं, फिर भी वो उम्मीदवार उतारने की बात कर रहे हैं, जो उनके मंसूबों को साफ करता है।" बीजेपी की एंट्री से खेल हुआ रोचको कांग्रेस और झामुमो अभी आपसी सीट शेयरिंग का फॉर्मूला सुलझा भी नहीं पाए थे कि बीजेपी ने इस रेस में एंट्री मारकर खेल को सस्पेंस से भर दिया है। बीजेपी प्रदेश चुनाव समिति की बैठक में प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी की मौजूदगी में यह फैसला लिया गया कि बीजेपी अपना प्रत्याशी मैदान में उतारेगी। बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि उनके पास अपने और सहयोगियों के मिलाकर 24 वोट हैं और उन्हें जीत के लिए सिर्फ 4 और वोटों की दरकार है। बीजेपी का यह आत्मविश्वास झामुमो के खेमे में डर पैदा करने के लिए काफी था। यही वजह रही कि झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर केंद्रीय जांच एजेंसियों (CBI, ED, CVC) और राज्य के एंटी-करप्शन ब्यूरो को चुनाव के दौरान विशेष सतर्कता बरतने की मांग कर डाली। झामुमो को अंदेशा है कि बीजेपी यहाँ 'बिहार फॉर्मूला' दोहरा सकती है।   क्या है बिहार फॉर्मूला? हाल ही में बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों पर चुनाव के दौरान एनडीए के पास चार सीटों का स्पष्ट बहुमत था, जबकि राजद के पास एक सीट का सुरक्षित आंकड़ा (41 विधायक) था। लेकिन, बीजेपी ने पांचवें उम्मीदवार के तौर पर एक बड़ा दांव खेला। ऐन वक्त पर कांग्रेस और राजद के कुछ विधायकों की अनुपस्थिति और क्रॉस-वोटिंग के कारण एनडीए वह पांचवीं सीट भी झटकने में कामयाब रहा था।  बीजेपी के मूवमेंट पर झामुमो की नजर  बीजेपी के इसी 'सीक्रेट प्लान' और हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका से सत्ताधारी दल फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। बीजेपी के प्रदेश महामंत्री अमर कुमार बाउरी ने झामुमो के इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में हर पार्टी को चुनाव लड़ने का अधिकार है  और अगर गठबंधन को अपने विधायकों पर इतना ही भरोसा है, तो वे डरे हुए क्यों हैं? क्या होगा असर लेकिन, इस शोर के बीच बड़ा सवाल वही खड़ा है—क्या झामुमो कांग्रेस को सीट देगा? राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इसके तीन मुख्य पहलू हैं: विधानसभा चुनाव का असर: पिछले विधानसभा चुनाव में झामुमो ने 34 सीटें जीतकर प्रचंड प्रदर्शन किया है, जबकि कांग्रेस 16 सीटों पर सिमट गई थी। झामुमो इस वक्त खुद को 'बड़े भाई' की मजबूत भूमिका में देख रहा है। सहानुभूति और हक: एक सीट शिबू सोरेन की थी, जिसे झामुमो किसी भी कीमत पर अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहेगा। कांग्रेस का दबाव: कांग्रेस आलाकमान का दबाव है कि राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन को मजबूत दिखाने के लिए झारखंड में उसे एक सीट मिलनी चाहिए। यदि झामुमो कांग्रेस को नजरअंदाज करता है, तो दोनों दलों के बीच मनमुटाव बढ़ सकता है, जिसका असर सरकार चलाने पर भी पड़ सकता है। विपक्ष इसी अंदरूनी कलह और असंतोष की दरार में अपनी जीत की उम्मीदें तलाश रहा है। यदि झामुमो दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारता है, तो नाराज कांग्रेस विधायकों के टूटने या क्रॉस वोटिंग का खतरा बढ़ जाएगा। और अगर झामुमो एक सीट कांग्रेस को दे देता है, तो गठबंधन पूरी तरह सुरक्षित होकर दोनों सीटें आसानी से निकाल सकता है। ..तो कुल मिलाकर तस्वीर यह है कि संख्या बल के आधार पर पलड़ा भले ही झामुमो और कांग्रेस के गठबंधन का भारी हो, लेकिन बीजेपी के दांव ने इस चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया है। क्या मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बड़ा दिल दिखाते हुए कांग्रेस को एक सीट सौंपेंगे और गठबंधन को सुरक्षित करेंगे? या फिर झामुमो दोनों सीटों पर अड़कर एक बड़ा सियासी जोखिम उठाएगा? 1 जून को नोटिफिकेशन जारी होने के बाद नामांकन के साथ ही इस सस्पेंस से पूरी तरह पर्दा उठ जाएगा।

Unknown मई 27, 2026 0
Babulal Marandi
JET परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर बाबूलाल मरांडी ने सरकार को घेरा , JPSC अध्यक्ष हटाने की मांग

रांची। झारखंड में 26 अप्रैल को आयोजित JET परीक्षा में सामने आई अनियमितताओं को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। भाजपा नेता और विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है।   JPSC अध्यक्ष पर उठाए सवाल, हटाने की मांग मरांडी ने Jharkhand Public Service Commission (JPSC) के अध्यक्ष पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आयोग का नेतृत्व पूरी तरह विफल हो चुका है। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मांग की कि “अयोग्य और नकारा” अध्यक्ष को तत्काल पद से हटाया जाए। उनके अनुसार, बार-बार हो रही गड़बड़ियों के लिए शीर्ष स्तर की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।   परीक्षा में सामने आईं गंभीर खामियां JET परीक्षा के दौरान कई बड़ी गड़बड़ियां सामने आईं। रांची के एक केंद्र पर उड़िया विषय का प्रश्नपत्र इतनी खराब प्रिंटिंग में था कि उसे पढ़ना मुश्किल हो गया। वहीं Bokaro के एक परीक्षा केंद्र पर शिक्षा विषय का प्रश्नपत्र पहुंचा ही नहीं। इसके अलावा अंग्रेजी विषय में एक ही प्रश्न दो बार पूछे जाने और कुछ सवालों में विकल्प नहीं दिए जाने जैसी त्रुटियां भी सामने आईं।   दो विषयों की परीक्षा रद्द इन अनियमितताओं के चलते JPSC ने उड़िया और शिक्षा विषय की परीक्षा को रद्द कर दिया है। आयोग ने कहा है कि इन परीक्षाओं की नई तिथि की जानकारी बाद में दी जाएगी। यह परीक्षा राज्य के छह जिलों में 430 केंद्रों पर आयोजित की गई थी।   ‘भ्रष्टाचार का अड्डा बना JPSC’ मरांडी ने आरोप लगाया कि आयोग में परीक्षा संचालन से लेकर आउटसोर्सिंग और ठेकों तक में गड़बड़ियां हैं। उन्होंने इसे “भ्रष्टाचार का अड्डा” बताते हुए कहा कि इसमें कमीशनखोरी और अनियमितताओं का बोलबाला है।

Unknown अप्रैल 27, 2026 0
Jtet controversy
Jharkhand: भोजपुरी-मगही भाषा विवाद में फंसा JTET

रांची। झारखंड में भोजपुरी और मगही को लेकर भाषा विवाद एक बार फिर गहरा गया है। इसके कारण जेटेट नियमावली भी फंस गई है। बता दें कि जेटेट परीक्षा का इंतजार वर्षों से लाखों छात्र कर रहे हैं। वहीं जल्द लेने को लेकर सरकार पर झारखंड हाईकोर्ट का भी दबाव सरकार पर बना हुआ है।  2 मंत्रियों के विरोध से फंसा मामला झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी जेटेट की नियमावली को बीते बुधवार को कैबिनेट से पारित नहीं हो सका। जानकारी के अनुसार बैठक में वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर और ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडे सिंह ने नियमावली में वर्ष 2012 के अनुरूप भाषाओं को शामिल करने की मांग की। पलामू में भोजपुरी व मगही और संताल परगना में अंगिका भाषा को शामिल करने की मांग की गई। दोनों मंत्री ने कैबिनेट में नियमावली में इन भाषाओं को शामिल करने की मांग रखी। इसके बाद नियमावली पर फैसला टाल दिया गया। अब इस पर आगे निर्णय लिया जाएगा।  अब जानिये क्या है पूरा मामला दरअसल, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग द्वारा झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा नियमावली तैयार की गई है। नियमावली में जिलावार जनजातीय और क्षेत्रीय भाषा का प्रावधान है। अभ्यर्थी के लिए इसमें से एक भाषा का चयन करना और  परीक्षा में शामिल होना अनिवार्य है। परीक्षा की प्रक्रिया शुरू इधर, राज्य में झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा की प्रक्रिया शुरू हो गई है। कैबिनेट की स्वीकृति के उम्मीद में झारखंड एकेडमिक काउंसिल द्वारा परीक्षा के लिए विज्ञापन भी जारी किया गया है। परीक्षा के लिए 28 अप्रैल से आवेदन जमा लिया जाना है। 10 साल से नहीं हुई परीक्षा बताते चलें कि राज्य में 10 वर्षों से झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा नहीं हुई है। राज्य में लगभग चार लाख से अधिक परीक्षार्थी परीक्षा का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में अगर 28 अप्रैल से पहले नियमावली को स्वीकृति नहीं मिली तो आवेदन जमा करने की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाएगी।

Unknown अप्रैल 16, 2026 0
Jharkhand ST seats reduction
झारखंड में घट सकती हैं ST सीटें? पक्ष-विपक्ष चिंतित, परिसीमन को लेकर सियासत गर्म

रांची। झारखंड में परिसीमन यानी Delimitation का मुद्दा इन दिनों गरमाया हुआ है। राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक संगठनों तक, सभी इस पर अपनी गंभीर चिंता जतार रहे हैं। खासतौर पर आदिवासी (ST) आरक्षित सीटों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर सियासत गरम है। पक्ष और विपक्ष के तमाम बड़े नेता, आदिवासी सीटों के संरक्षण की बात कर रहे हैं। क्या है परिसीमन और क्यों है जरूरी परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं जनसंख्या के आधार पर तय की जाती हैं। इसका मुख्य मकसद, हर क्षेत्र को उसकी आबादी के अनुसार उचित प्रतिनिधित्व देना होता है। इसी प्रक्रिया के दौरान यह भी तय होता है कि कौन-सी सीटें सामान्य वर्ग के लिए होंगी और कौन-सी अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित रहेंगी। आदिवासी सीटों पर असर की आशंका झारखंड में परिसीमन विवाद की सबसे बड़ी वजह, आदिवासी आरक्षित सीटों पर पड़ने वाला संभावित असर है। कल्याण मंत्री चमरा लिंडा ने आशंका जताई है कि, यदि पूरी तरह जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हुआ, तो ST सीटों की संख्या कम हो सकती है। वर्तमान में राज्य में लोकसभा की 5 और विधानसभा की 28 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। ऐसे में किसी भी बदलाव का सीधा असर आदिवासी राजनीति पर पड़ सकता है।  सभी दल एकमत इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता भी एकमत नजर आ रहे हैं। कांग्रेस के रामेश्वर उरांव का कहना है कि केवल जनसंख्या के आधार पर आदिवासी सीटों को कम करना सही नहीं होगा। वहीं, भाजपा नेता सह नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने भी आदिवासी सीटों के संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया है और इस मुद्दे पर राज्य सरकार को समर्थन देने की बात कही है।  अभी कोई अंतिम फैसला नहीं, प्रक्रिया जारी फिलहाल झारखंड के लिए परिसीमन को लेकर कोई आधिकारिक अंतिम नक्शा जारी नहीं हुआ है। वर्तमान निर्वाचन क्षेत्र 2026 के बाद होने वाली जनगणना तक लागू रहेंगे। इसके बाद ही परिसीमन आयोग के गठन और संसद के नए कानून के अनुसार आगे की प्रक्रिया शुरू होगी। हालांकि, यह विषय सामाजिक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बन गया है, जिस पर आने वाले समय में बहस और तेज होने की संभावना है।

Unknown मार्च 30, 2026 0
Pratul Shahdev Congress statement
हेमंत सोरेन को खुश करने में जुटी कांग्रेस - प्रतुल शाहदेव

रांची। झारखंड की सियासत में पूर्व मंत्री योगेंद्र साव के घर ध्वस्तीकरण मामले को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेरते हुए उसकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।   ‘सीएम को खुश करने के लिए कार्यकर्ताओं की अनदेखी’ बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सत्ता में बने रहने और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को खुश करने के लिए अपने ही समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर रही है। उन्होंने कहा कि योगेंद्र साव लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े रहे, लेकिन उनके साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया गया।   घर तोड़े जाने पर उठाए सवाल प्रतुल शाहदेव ने कहा कि योगेंद्र साव का घर ऐसे समय में तोड़ा गया जब मामला कोर्ट में लंबित था। उन्होंने इसे न केवल एक व्यक्ति के साथ अन्याय बताया, बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए।   कांग्रेस के अंदर असंतोष का दावा बीजेपी प्रवक्ता ने दावा किया कि कांग्रेस के भीतर भी असंतोष उभर रहा है। उन्होंने पूर्व विधायक अंबा प्रसाद के बयान का हवाला देते हुए कहा कि अब पार्टी के अंदर से ही विरोध की आवाजें उठने लगी हैं।   ‘बिना नोटिस निष्कासन’ पर सवाल शाहदेव ने आरोप लगाया कि योगेंद्र साव को बिना नोटिस पार्टी से निष्कासित कर दिया गया, जबकि अन्य नेताओं पर कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने इरफान अंसारी और केएन त्रिपाठी जैसे नेताओं के विवादित बयानों के बावजूद कांग्रेस की चुप्पी पर सवाल उठाए।   ओबीसी मुद्दे को भी उठाया बीजेपी ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस का रवैया ओबीसी विरोधी रहा है। प्रतुल शाहदेव ने कहा कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पार्टी के चरित्र को दर्शाता है।

Unknown मार्च 23, 2026 0
नीरज कुमार रांची नगर निगम के नए डिप्टी मेयर के रूप में
नीरज कुमार बने रांची नगर निगम के नए डिप्टी मेयर

रांची। रांची नगर निगम में डिप्टी मेयर पद के चुनाव में वार्ड 31 के पार्षद नीरज कुमार ने जीत दर्ज की है। उन्हें कुल 39 वोट मिले, जिससे उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। इस जीत के साथ नीरज कुमार रांची के निर्वाचित डिप्टी मेयर बन गए हैं। चुनाव प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई और परिणाम घोषित होते ही उनके समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई। विशेष रूप से यह परिणाम नगर निगम की राजनीति में अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे शहर की आगामी नीतियों और विकास कार्यों पर असर पड़ने की संभावना है।

Unknown मार्च 19, 2026 0
बाबूलाल मरांडी प्रिंस खान गैंग और कानून-व्यवस्था पर बयान देते हुए
प्रिंस खान गैंग पर गरजे बाबूलाल मरांडी, कानून-व्यवस्था पर उठाए सवाल

रांची। रांची में बढ़ते अपराध और गैंगस्टर गतिविधियों को लेकर झारखंड की राजनीति गरमा गई है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी  ने कुख्यात गैंगस्टर प्रिंस खान  और उसके गुर्गों द्वारा फैलाए जा रहे आतंक पर सरकार और पुलिस प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया है।   सरकार और पुलिस पर लगाया ढुलमुल रवैये का आरोप मीडिया से बातचीत में बाबूलाल मरांडी ने कहा कि राज्य में अपराधियों का मनोबल सरकार और पुलिस की “लुंज-पुंज व्यवस्था” के कारण बढ़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रिंस खान और उसके गुर्गे खुलेआम दहशत फैला रहे हैं, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि उन्हें कहीं न कहीं संरक्षण मिल रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार ठोस कार्रवाई करे, तो अपराधियों को एक रात में भागने पर मजबूर किया जा सकता है।   गुर्गों पर कार्रवाई की मांग मरांडी ने कहा कि भले ही प्रिंस खान देश से बाहर रहकर गैंग चला रहा हो, लेकिन उसके गुर्गे झारखंड में सक्रिय हैं। उन्होंने पुलिस को सख्त कार्रवाई करने की सलाह देते हुए कहा कि यदि 8-10 अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए, तो बाकी अपराधियों में भी डर पैदा होगा और अपराध पर लगाम लगेगी।   विधानसभा में भी गूंजा मामला प्रिंस खान गैंग का मुद्दा झारखंड विधानसभा के बजट सत्र में भी उठ चुका है। नेता प्रतिपक्ष ने सदन में सरकार से इस पर जवाब मांगा और राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि गैंगस्टर विदेश में बैठकर अपने नेटवर्क के जरिए रंगदारी और अपराध का संचालन कर रहा है।   हत्या और रंगदारी के मामलों का जिक्र मरांडी ने हाल के आपराधिक घटनाओं का हवाला देते हुए बताया कि रांची के टीटॉस होटल में गोलीबारी कर एक कर्मचारी की हत्या कर दी गई थी। इसके अलावा बोकारो में एक शोरूम संचालक से रंगदारी मांगे जाने का मामला भी सामने आया है। इन घटनाओं से व्यापारियों और आम लोगों में डर का माहौल बना हुआ है।   कानून-व्यवस्था पर बढ़ी चिंता लगातार बढ़ती आपराधिक घटनाओं के बीच सरकार और पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति और बिगड़ सकती है।

Unknown मार्च 17, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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राजनीति

टीएमसी के बागियों को रोकने की आखिरी कोशिश! अभिषेक बनर्जी ने ओम बिरला को लिखा पत्र, कहा- सदन में TMC को एकल पार्टी माना जाए

Deepshikha जून 15, 2026 0