पटना: पटना हाईकोर्ट को जल्द ही स्थायी मुख्य न्यायाधीश मिल सकता है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस वी. कामेश्वर राव को पटना हाईकोर्ट का अगला मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने के लिए केंद्र सरकार से सिफारिश की है। कॉलेजियम की सिफारिश के बाद अब नियुक्ति की प्रक्रिया केंद्र सरकार के स्तर पर आगे बढ़ेगी। जरूरी औपचारिकताएं पूरी होने और नियुक्ति आदेश जारी होने के बाद जस्टिस वी. कामेश्वर राव पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पद संभाल सकते हैं। फिलहाल जस्टिस सुधीर सिंह पटना हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। कौन हैं जस्टिस वी. कामेश्वर राव? जस्टिस वी. कामेश्वर राव का न्यायिक और कानूनी क्षेत्र में लंबा अनुभव रहा है। उनका जन्म 7 अगस्त 1965 को हुआ था। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से वर्ष 1987 में भूगोल विषय में बीए ऑनर्स की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद 1990 में उन्होंने एलएलबी की डिग्री हासिल की। मार्च 1991 में उन्होंने बार काउंसिल ऑफ दिल्ली में अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराया। करीब दो दशक तक वकालत करने के बाद जनवरी 2010 में उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा दिया गया। इसके बाद उनके न्यायिक करियर की शुरुआत हुई। 17 अप्रैल 2013 को उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया। करीब दो साल बाद 18 मार्च 2015 को वे स्थायी न्यायाधीश बने। दिल्ली से कर्नाटक और फिर दिल्ली लौटे जस्टिस कामेश्वर राव का न्यायिक करियर दिल्ली हाईकोर्ट तक सीमित नहीं रहा। 1 जून 2024 को उनका तबादला कर्नाटक हाईकोर्ट किया गया। कर्नाटक हाईकोर्ट में जिम्मेदारी संभालने के बाद 30 मई 2025 को उन्हें वहां कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। इसके बाद 21 जुलाई 2025 को वे दोबारा दिल्ली हाईकोर्ट लौटे। वर्तमान में वे दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं। इन कानूनों में है लंबा अनुभव जस्टिस वी. कामेश्वर राव को कानून के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अनुभव है। इनमें प्रमुख रूप से: सेवा कानून श्रम कानून संवैधानिक कानून प्रशासनिक कानून इन क्षेत्रों में उनके लंबे न्यायिक अनुभव को पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद के लिए उनकी सिफारिश की प्रमुख विशेषताओं में देखा जा रहा है। पटना हाईकोर्ट में हाल में बदला नेतृत्व पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद पर पिछले कुछ समय में तेजी से बदलाव हुए हैं। 5 जून 2026 को न्यायमूर्ति मीनाक्षी मदन राय ने पटना हाईकोर्ट की 48वीं मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी। वह इस पद पर पहुंचने वाली पटना हाईकोर्ट की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनी थीं। हालांकि उनका कार्यकाल बहुत छोटा रहा और 11 जुलाई 2026 को वे सेवानिवृत्त हो गईं। इसके बाद जस्टिस सुधीर सिंह को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी सौंपी गई। अब कॉलेजियम की ओर से जस्टिस वी. कामेश्वर राव के नाम की सिफारिश के बाद पटना हाईकोर्ट को स्थायी मुख्य न्यायाधीश मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। कब संभाल सकते हैं पद? कॉलेजियम की सिफारिश के बाद नियुक्ति की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। अब केंद्र सरकार के स्तर पर आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जाएगी। नियुक्ति की मंजूरी और औपचारिक आदेश जारी होने के बाद ही जस्टिस वी. कामेश्वर राव पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाल सकेंगे। इसलिए फिलहाल उन्हें पटना हाईकोर्ट का अगला मुख्य न्यायाधीश सिफारिश के आधार पर संभावित माना जा रहा है, न कि नियुक्त मुख्य न्यायाधीश। पटना हाईकोर्ट के लिए क्यों अहम है यह नियुक्ति? पटना हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश का स्थायी नेतृत्व मिलने से न्यायिक प्रशासन को स्थिरता मिलने की उम्मीद है। जस्टिस कामेश्वर राव का संवैधानिक, प्रशासनिक और सेवा कानून का अनुभव अदालत के कामकाज में उपयोगी हो सकता है। अब निगाहें केंद्र सरकार की मंजूरी और नियुक्ति आदेश पर टिकी हैं। इसके बाद यह स्पष्ट होगा कि जस्टिस वी. कामेश्वर राव औपचारिक रूप से कब पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पद संभालेंगे।
पटना, एजेंसियां। पटना हाईकोर्ट को नई मुख्य न्यायाधीश मिल गई हैं। न्यायमूर्ति Meenakshi M. Rai ने शुक्रवार को पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पद की शपथ ली। यह शपथ समारोह पटना के राजभवन में आयोजित किया गया, जहां बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस अवसर पर मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और गणमान्य लोग मौजूद रहे। न्यायमूर्ति संगम कुमार साहू की जगह ली जिम्मेदारी न्यायमूर्ति मीनाक्षी राय ने इस पद पर न्यायमूर्ति संगम कुमार साहू का स्थान लिया है, जो 4 जून को सेवानिवृत्त हुए थे। अब पटना हाईकोर्ट की कमान उनके हाथों में आ गई है। उम्मीद जताई जा रही है कि उनके लंबे न्यायिक अनुभव से बिहार की न्यायिक व्यवस्था और अधिक मजबूत होगी तथा लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी। 30 वर्षों से अधिक का समृद्ध न्यायिक अनुभव न्यायमूर्ति मीनाक्षी एम. राय के पास 30 साल से अधिक का न्यायिक अनुभव है। उन्होंने अपने करियर में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है और न्यायपालिका में अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्हें एक ईमानदार, अनुभवी और दक्ष न्यायिक अधिकारी के रूप में जाना जाता है। उनका प्रशासनिक और न्यायिक दोनों क्षेत्रों में योगदान उल्लेखनीय रहा है। शिक्षा और शुरुआती करियर मीनाक्षी राय का जन्म 12 जुलाई 1964 को सिक्किम में हुआ था। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्री राम कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक किया और इसके बाद कैंपस लॉ सेंटर से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की। वर्ष 1990 में उन्होंने दिल्ली बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण कराया और दिल्ली हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में वकालत शुरू की। न्यायिक सेवा में ऐतिहासिक उपलब्धियां उसी वर्ष उन्हें सिक्किम न्यायिक सेवा में न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी सह सिविल जज के रूप में नियुक्त किया गया। वह सिक्किम की पहली महिला बनीं जिन्हें इस पद पर नियुक्त किया गया था, जो उनके करियर की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य अपने लंबे करियर में उन्होंने जिला एवं सत्र न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट जज, रजिस्ट्रार जनरल, एनडीपीएस मामलों की विशेष न्यायाधीश और भ्रष्टाचार निरोधक मामलों की जज जैसे कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है। न्यायपालिका में उनकी प्रशासनिक क्षमता और निर्णय लेने की दक्षता की व्यापक सराहना होती रही है। 2015 में बनीं हाईकोर्ट जज 15 अप्रैल 2015 को उन्हें सिक्किम हाईकोर्ट का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। लगभग एक दशक तक वहां सेवाएं देने के बाद अब उन्हें पटना हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनके अनुभव और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए न्यायिक व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद जताई जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक क्षमता बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने पांच नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद अब शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों की संख्या लगभग अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुंच जाएगी। इन नियुक्तियों के साथ सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 37 हो जाएगी और केवल एक पद रिक्त रहेगा। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद नियुक्तियों का रास्ता साफ केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) Arjun Ram Meghwal ने जानकारी दी कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 124(2) के तहत पांच नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी प्रदान कर दी है। इन नियुक्तियों में चार उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ अधिवक्ता शामिल हैं। सरकार का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है। कौन हैं सुप्रीम कोर्ट के पांच नए न्यायाधीश? सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किए गए नए न्यायाधीशों में शामिल हैं: Justice Sheel Nagu, मुख्य न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट Justice S. Chandrashekhar, मुख्य न्यायाधीश, बॉम्बे हाईकोर्ट Justice Sanjeev Sachdeva, मुख्य न्यायाधीश, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट Justice Arun Palli, मुख्य न्यायाधीश, जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट Venkita Subramani Mohan, वरिष्ठ अधिवक्ता इन नियुक्तियों में वरिष्ठता, योग्यता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और न्यायपालिका में विविधता जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा गया है। कॉलेजियम ने 27 मई को की थी सिफारिश इन नामों की सिफारिश 27 मई को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने की थी। यह सूची भारत के प्रधान न्यायाधीश Justice Surya Kant के नेतृत्व वाले कॉलेजियम की पहली प्रमुख सिफारिशों में शामिल मानी जा रही है। कॉलेजियम ने न्यायपालिका की बढ़ती जरूरतों और लंबित मामलों के दबाव को देखते हुए इन नियुक्तियों की अनुशंसा की थी। सुप्रीम कोर्ट की क्षमता बढ़ने का क्या होगा असर? हाल ही में केंद्र सरकार ने Supreme Court (Number of Judges) Amendment Ordinance, 2026 के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़ाई थी। इस संशोधन के तहत शीर्ष अदालत में जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 (मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) कर दी गई। नई नियुक्तियों के बाद सुप्रीम कोर्ट लगभग अपनी पूरी स्वीकृत क्षमता पर पहुंच जाएगा और केवल एक पद ही रिक्त रहेगा। लंबित मामलों के निपटारे में मिलेगी मदद विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के बोझ को कम करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा संविधान पीठों का अधिक नियमित गठन संभव होगा, जिससे महत्वपूर्ण संवैधानिक और राष्ट्रीय महत्व के मामलों की सुनवाई तेज हो सकेगी। न्यायिक विशेषज्ञों के अनुसार, नई नियुक्तियां शीर्ष अदालत की कार्यक्षमता बढ़ाने और न्याय वितरण प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती हैं।
रांची। झारखंड के साहिबगंज अवैध खनन मामले में फरार आरोपी राजेश यादव उर्फ दाहू यादव की अग्रिम जमानत याचिका पर शुक्रवार को झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अदालत के आदेश का इंतजार है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद नहीं किया सरेंडर अंग्रेज़ी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2023 में दाहू यादव को पीएमएलए कोर्ट में सरेंडर करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद वह फरार रहा और अब जमानत याचिका गंभीर स्थिति में है। ED की लगातार कार्रवाई और समन प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दाहू यादव को कई बार समन भेजा, लेकिन वह एक बार भी पेश नहीं हुआ। इसके बाद ED ने अन्य आरोपियों के खिलाफ भी केस दर्ज किया और जांच तेज कर दी। 1250 करोड़ के अवैध खनन का नेटवर्क साहिबगंज में 1250 करोड़ रुपये के अवैध खनन का मामला सामने आया। ED की जांच में कई बड़े नाम शामिल पाए गए, जिनमें पंकज मिश्रा, बच्चू यादव, सुनील यादव और पशुपति यादव शामिल हैं। एजेंसी ने इनके खिलाफ प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट दाखिल किया। जब्त किए गए बैंक खाते, नकद और अवैध उपकरण जांच के दौरान ED ने 37 बैंक खातों में जमा 11.88 करोड़ रुपये जब्त किए। इसके अलावा, छापेमारी में 5.34 करोड़ रुपये नकद, दस्तावेज और अवैध रूप से चल रहे पांच स्टोन क्रशर बरामद हुए। साथ ही पांच अवैध हथियार और कारतूस भी मिले। छापेमारी और केस की शुरुआत ED ने साहिबगंज, बरहेट, राजमहल, मिर्जा चौकी और बरहरवा समेत 19 जगहों पर छापेमारी की। इस पूरे मामले की शुरुआत बरहरवा थाने में दर्ज केस संख्या 85/2020 से हुई थी, जो बाद में मनी लॉन्ड्रिंग जांच के रूप में सामने आया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।