नई दिल्ली, एजेंसियां। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने छात्र संगठनों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ सख्ती बरती जा रही है और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने वालों की आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। राहुल गांधी ने कहा कि लोकतंत्र में युवाओं और छात्रों को अपनी मांग रखने का पूरा अधिकार है। सोशल मीडिया पर सरकार को घेरा राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच एक्स (X) पर पोस्ट करते हुए कहा कि छात्रों पर बल प्रयोग और हिरासत जैसी घटनाएं लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं। उन्होंने सरकार से छात्रों की मांगों को गंभीरता से सुनने और संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की अपील की। पेपर लीक और परीक्षा सुधार का उठाया मुद्दा कांग्रेस नेता ने कहा कि छात्र लंबे समय से पेपर लीक, परीक्षा में अनियमितताओं और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। उनके अनुसार, इन मुद्दों का समाधान करने के बजाय प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि युवाओं के भविष्य से जुड़े मामलों पर सरकार को संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिए। सरकार का पक्ष भी आया सामने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए। प्रशासन के अनुसार, सुरक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना प्राथमिकता है तथा कार्रवाई कानून के दायरे में रहकर की गई है। राजनीतिक बहस हुई तेज राहुल गांधी के बयान के बाद छात्र आंदोलन और परीक्षा सुधार का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। विपक्ष सरकार पर छात्रों की आवाज अनसुनी करने का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि परीक्षा प्रणाली में सुधार और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए लगातार कदम उठाए जा रहे हैं।
संसद के मानसून सत्र के चौथे दिन भी NEET पेपर लीक और छात्रों के मुद्दे पर लोकसभा और राज्यसभा में जोरदार हंगामा देखने को मिला। विपक्ष ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए सदन की कार्यवाही बाधित की। हंगामे के चलते दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। खरगे की दो टूक: पहले इस्तीफा, फिर चर्चा राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि विपक्ष शुरू से ही NEET मामले पर चर्चा चाहता था, लेकिन सरकार ने पहले इस पर सहमति नहीं दी। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों पर पुलिस कार्रवाई हुई और विपक्षी नेताओं का अपमान किया गया। खरगे ने स्पष्ट कहा कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते, तब तक विपक्ष किसी भी चर्चा में शामिल नहीं होगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राज्यसभा परिसर में उन्हें रोकने की कोशिश की गई, जिसे उन्होंने लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताया। दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार स्थगित विपक्ष के लगातार हंगामे के कारण गुरुवार को भी संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से नहीं चल सकी। राज्यसभा की कार्यवाही पहले 12 बजे और बाद में दोपहर 2 बजे तक स्थगित कर दी गई। लोकसभा की कार्यवाही भी लगातार नारेबाजी के कारण पहले 12 बजे और फिर 2 बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी। पीएम मोदी और अमित शाह का संदेश देशभर में जारी छात्र आंदोलन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि युवाओं का भविष्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और पेपर लीक के दोषियों को जल्द सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी प्रधानमंत्री के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि यह कदम शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा। रिजिजू का विपक्ष पर हमला संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि सरकार शुरू से ही NEET मामले पर चर्चा चाहती है, लेकिन विपक्ष नई-नई शर्तें रख रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी विषय पर खुली चर्चा के पक्ष में है, लेकिन सदन की कार्यवाही शर्तों के आधार पर नहीं चल सकती। राहुल गांधी ने सरकार को घेरा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने शिक्षा प्रणाली को कमजोर होने दिया और छात्र लगातार परेशान हैं। राहुल गांधी ने कहा कि देश के युवाओं के भविष्य की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है और इस मुद्दे पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। प्रियंका गांधी और महुआ मोइत्रा का विरोध प्रियंका गांधी वाड्रा ने संसद परिसर में विपक्ष के प्रदर्शन में हिस्सा लिया और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। महुआ मोइत्रा ने दिल्ली मेट्रो स्टेशनों को बंद किए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार विपक्ष और छात्रों की आवाज दबाने की कोशिश कर रही है। सुरजेवाला ने नियम 267 के तहत दिया नोटिस कांग्रेस सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने राज्यसभा में नियम 267 के तहत नोटिस देकर NEET पेपर लीक, छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और शिक्षा व्यवस्था में सुधार पर तत्काल चर्चा की मांग की। उनका कहना है कि यह मुद्दा लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा है और इसे प्राथमिकता के आधार पर सदन में उठाया जाना चाहिए।
संसद के मॉनसून सत्र का बुधवार को तीसरा दिन भी हंगामेदार रहने के संकेत हैं। NEET पेपर लीक, छात्रों पर पुलिस कार्रवाई और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी में है। विरोध जताने के लिए कांग्रेस के सांसद काले कपड़े पहनकर संसद पहुंचे और परिसर में प्रदर्शन किया। मंगलवार को भी संसद की कार्यवाही विपक्ष के हंगामे की वजह से बार-बार स्थगित करनी पड़ी थी। इसी बीच कॉकरेच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के समर्थन में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी सांसद प्रधानमंत्री आवास के पास धरने पर बैठ गए थे। पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर वहां से हटाया था, जिसके बाद सियासी टकराव और तेज हो गया। राहुल गांधी की पांच मांगें धरने के बाद राहुल गांधी ने सरकार के सामने पांच प्रमुख मांगें रखीं। इनमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच, संसद में गृह मंत्री के बयान और NEET पेपर लीक पर विस्तृत चर्चा की मांग शामिल है। राहुल गांधी ने कहा कि विपक्ष छात्रों को न्याय दिलाने के लिए सदन से लेकर सड़क तक आवाज उठाता रहेगा। सरकार चर्चा के लिए तैयार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि सरकार NEET पेपर लीक मामले पर संसद में चर्चा के लिए तैयार है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि उन्होंने कांग्रेस पर छात्रों के मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप भी लगाया। आज NEET पर चर्चा की कोशिश सरकार ने संकेत दिए हैं कि वह लोकसभा और राज्यसभा दोनों में NEET पेपर लीक मुद्दे पर चर्चा शुरू कराने का प्रयास करेगी। किस नियम के तहत बहस होगी, इस पर लोकसभा अध्यक्ष और विपक्ष के बीच सहमति बनाने की कोशिश जारी है। पीएम मोदी संसद पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार सुबह संसद भवन पहुंचे और दिनभर की कार्यवाही में हिस्सा लेने की तैयारी की। सरकार की ओर से विपक्ष से लगातार बातचीत कर सदन को सुचारु रूप से चलाने का प्रयास किया जा रहा है। केजरीवाल-उद्धव की बैठक आज आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल शिवसेना (उद्धव गुट) प्रमुख उद्धव ठाकरे से मुलाकात करेंगे। यह बैठक सांसद संजय राउत के आवास पर होगी, जिसमें CJP आंदोलन और विपक्षी रणनीति पर चर्चा होने की संभावना है। राज्यसभा में CPM ने दिया नोटिस सीपीएम सांसद डॉ. वी. शिवदासन ने राज्यसभा में नियम 267 के तहत नोटिस देकर परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं और दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस लाठीचार्ज को लेकर तत्काल चर्चा की मांग की है।
संसद के मानसून सत्र का मंगलवार (21 जुलाई) को दूसरा दिन है। पहले दिन विपक्ष के जोरदार हंगामे के बाद आज भी लोकसभा और राज्यसभा में तीखी बहस और टकराव के आसार हैं। विपक्ष NEET 2026 पेपर लीक, राम मंदिर चंदा विवाद और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है, जबकि केंद्र सरकार महत्वपूर्ण विधेयकों को सदन में पेश कर अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी। अब तक के बड़े अपडेट NDA संसदीय दल की 'मंगल मिलन' बैठक शुरू संसद की कार्यवाही शुरू होने से पहले एनडीए संसदीय दल की बैठक शुरू हो गई है। बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत एनडीए के वरिष्ठ मंत्री और सांसद शामिल हैं। माना जा रहा है कि बैठक में संसद की रणनीति, विपक्ष के हमलों का जवाब और आगामी विधायी एजेंडे पर चर्चा हो रही है। आज राज्यसभा में पेश हो सकता है वंदे मातरम बिल सरकार आज राज्यसभा में राष्ट्रीय सम्मान संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश कर सकती है। प्रस्तावित विधेयक में 'वंदे मातरम' का अपमान करने या इसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने को दंडनीय अपराध बनाने का प्रावधान है। यह बिल सोमवार को पेश होना था, लेकिन विपक्ष के हंगामे के कारण इसे सूचीबद्ध नहीं किया जा सका। परीक्षा व्यवस्था पर चर्चा की मांग कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है। उन्होंने NEET पेपर लीक समेत देश की परीक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं पर तत्काल चर्चा कराने की मांग की है। विपक्ष का कहना है कि लगातार सामने आ रहे पेपर लीक के मामलों ने लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित किया है। आज इन मुद्दों पर घमासान संभव NEET 2026 पेपर लीक राम मंदिर चंदा विवाद छात्रों के प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई शिक्षा व्यवस्था में सुधार सरकार के विधायी एजेंडे पर विपक्ष का विरोध सरकार की क्या है तैयारी? सरकार आज संसद में अपने लंबित विधेयकों को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी। इसके साथ ही विपक्ष द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों का जवाब देने और सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने पर भी सरकार का फोकस रहेगा। सरकार की कोशिश रहेगी कि हंगामे के बीच भी महत्वपूर्ण विधायी कार्य पूरे किए जा सकें। पहले दिन जमकर हुआ था हंगामा मानसून सत्र के पहले दिन विपक्ष ने कई मुद्दों को लेकर सरकार को घेरा था, जिसके चलते दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार बाधित हुई। ऐसे में दूसरे दिन भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक होने की संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक गलियारों की नजर आज खासतौर पर वंदे मातरम बिल, NEET विवाद और विपक्ष की रणनीति पर रहेगी।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद का मानसून सत्र आज (20 जुलाई) से शुरू हो गया है। यह सत्र 13 अगस्त तक चलेगा और इस दौरान 19 बैठकें प्रस्तावित हैं। सरकार ने अपने विधायी एजेंडे में 8 नए विधेयकों को सूचीबद्ध किया है, जबकि विपक्ष ने नीट परीक्षा विवाद, राम मंदिर दान मामले, सोनम वांगचुक आंदोलन, परिसीमन समेत कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति बनाई है। सरकार के एजेंडे में 8 नए विधेयक सरकार इस सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने की तैयारी में है। इनमें 'वंदे मातरम्' के अपमान को दंडनीय अपराध बनाने वाला विधेयक भी शामिल है। इसके अलावा विभिन्न प्रशासनिक और कानूनी सुधारों से जुड़े अन्य विधेयकों पर भी चर्चा और पारित कराने की योजना है। विपक्ष ने बनाई आक्रामक रणनीति सत्र शुरू होने से पहले विपक्षी दलों ने बैठक कर कई मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का फैसला लिया। विपक्ष नीट परीक्षा विवाद, राम मंदिर दान प्रकरण, सोनम वांगचुक आंदोलन, परिसीमन और अन्य जनहित के मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगने की तैयारी में है। स्पीकर ने सहयोग की अपील की लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सभी राजनीतिक दलों से सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने और महत्वपूर्ण विषयों पर सार्थक चर्चा में सहयोग करने की अपील की है। सरकार और विपक्ष दोनों ने सत्र के दौरान जनहित के मुद्दों पर चर्चा की आवश्यकता जताई है। हंगामेदार रहने के आसार राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मानसून सत्र के पहले दिन से ही सदन में तीखी बहस और विरोध देखने को मिल सकता है। सरकार जहां अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने पर जोर देगी, वहीं विपक्ष विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश करेगा।
संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन केंद्र सरकार राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में बड़ा बदलाव करने जा रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सोमवार को 'राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026' संसद में पेश करेंगे। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' के सम्मान को कानूनी संरक्षण देना और इसके अपमान या गायन में बाधा डालने को दंडनीय अपराध की श्रेणी में लाना है। 'वंदे मातरम्' के सम्मान को मिलेगा कानूनी संरक्षण प्रस्तावित विधेयक के अनुसार यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय गीत का अपमान करता है या इसके गायन में जानबूझकर बाधा डालता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी। सरकार का कहना है कि यह संशोधन राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रीय गीत के सम्मान को और मजबूत करने के उद्देश्य से लाया जा रहा है। 20 जुलाई से शुरू हुआ मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलने वाले मानसून सत्र से पहले रविवार को सर्वदलीय बैठक आयोजित की गई। बैठक के दौरान कई राष्ट्रीय और राजनीतिक मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। इन मुद्दों पर विपक्ष ने सरकार को घेरा सर्वदलीय बैठक में विपक्ष ने कई अहम विषय उठाए, जिनमें शामिल हैं– अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे में कथित अनियमितता सोनम वांगचुक का अनशन विदेश नीति NEET पेपर लीक मामला अन्य समसामयिक राष्ट्रीय मुद्दे समाजवादी पार्टी ने संकेत दिया है कि वह राम मंदिर चढ़ावा मामले को संसद में प्रमुखता से उठाएगी। टीएमसी और शिवसेना के बागी सांसदों पर विवाद बैठक के दौरान विपक्ष ने तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (UBT) के बागी सांसदों को बैठक में बुलाने का विरोध किया। विपक्षी दलों ने कुछ समय के लिए वॉकआउट भी किया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इसे सरकार का "तानाशाही फैसला" बताया, जबकि शिवसेना (UBT) के नेता अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष के अंतिम निर्णय से पहले नए गुट को मान्यता दिए जाने पर सवाल उठाए। सरकार इन प्रमुख विधेयकों को भी करेगी पेश 1. राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 'वंदे मातरम्' के अपमान या गायन में बाधा डालने पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान। राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून को और सख्त बनाने की पहल। 2. जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 जन्म और मृत्यु के पंजीकरण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाना। विलंब से पंजीकरण कराने पर नियमों को और सख्त किया जाएगा। 3. आयकर (संशोधन) विधेयक, 2026 सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों को दी गई कर छूट को स्थायी कानूनी स्वरूप देना। विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम। बैठक में कई वरिष्ठ नेता रहे मौजूद सर्वदलीय बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू, कांग्रेस नेता जयराम रमेश, प्रमोद तिवारी, कोडिकुनिल सुरेश, समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव समेत विभिन्न दलों के वरिष्ठ नेता शामिल हुए। मानसून सत्र के पहले ही दिन सरकार और विपक्ष के बीच कई अहम मुद्दों पर टकराव के संकेत मिल रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में संसद में तीखी बहस और राजनीतिक गर्मी बढ़ने की संभावना है।
संसद का मानसून सत्र सोमवार से शुरू हो रहा है और पहले ही दिन सरकार तथा विपक्ष के बीच तीखे टकराव के संकेत मिल रहे हैं। विपक्ष कई प्रमुख मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति बना चुका है, जबकि सरकार अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। सत्र शुरू होने से पहले कांग्रेस ने अपने लोकसभा सांसदों की महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। कांग्रेस ने सांसदों की बुलाई अहम बैठक मानसून सत्र की शुरुआत से पहले कांग्रेस ने सुबह 10:30 बजे संसद परिसर स्थित कांग्रेस संसदीय दल (CPP) कार्यालय में अपने लोकसभा सांसदों की बैठक बुलाई है। बैठक में विपक्षी दलों की रणनीति, फ्लोर मैनेजमेंट और सदन में उठाए जाने वाले मुद्दों पर चर्चा होगी। इन मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी विपक्ष ने पहले ही साफ कर दिया है कि वह कई अहम मुद्दों को सदन में उठाएगा। इनमें शामिल हैं– NEET-UG परीक्षा में कथित पेपर लीक सोनम वांगचुक का अनशन और संसद मार्च महंगाई मणिपुर की स्थिति किसानों से जुड़े मुद्दे चुनाव आयोग के कामकाज अयोध्या राम मंदिर में कथित चढ़ावे से जुड़ा मामला एथनॉल नीति कांग्रेस सांसद माणिकम टैगोर ने लोकसभा में NEET-UG पेपर लीक मामले पर तत्काल चर्चा की मांग करते हुए कार्यस्थगन प्रस्ताव का नोटिस भी दिया है। सरकार का फोकस आठ विधेयकों पर संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बताया कि मानसून सत्र के लिए फिलहाल आठ विधेयकों को सूचीबद्ध किया गया है। उन्होंने कहा कि यदि कोई नया विधेयक लाया जाएगा तो उसकी जानकारी पहले कार्य मंत्रणा समिति और सभी राजनीतिक दलों को दी जाएगी। सरकार ने विपक्ष से सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने में सहयोग की अपील भी की है। टीएमसी के बागी सांसदों की सीटें बदलीं लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के लिए अलग बैठने की व्यवस्था की गई है। इस बदलाव के तहत कुल 39 सांसदों की सीटों का पुनः आवंटन किया गया है। संसद परिसर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी मानसून सत्र से पहले संसद भवन की सुरक्षा व्यवस्था का व्यापक परीक्षण किया गया। सीआईएसएफ, दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ, एनएसजी, एनडीआरएफ और संसद सुरक्षा कर्मियों ने संयुक्त रूप से मॉक ड्रिल कर आपात स्थिति से निपटने की तैयारियों की समीक्षा की। पहले दिन हंगामे के आसार संसद का यह सत्र राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विपक्ष जहां विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है, वहीं सरकार अपने विधायी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार है। ऐसे में पहले ही दिन सदन में जोरदार बहस और हंगामे की संभावना जताई जा रही है।
मुंबई, एजेंसियां। 20 से 26 जुलाई के बीच OTT प्लेटफॉर्म्स पर दर्शकों के लिए मनोरंजन का भरपूर डोज़ तैयार है। इस सप्ताह कई नई फिल्में और वेब सीरीज़ रिलीज़ होने जा रही हैं, जिनमें 'Musafir Cafe', 'Adarsh Baal Vidyalaya' जैसे कई अन्य चर्चित टाइटल शामिल हैं। अलग-अलग जॉनर की इन रिलीज़ का दर्शकों को बेसब्री से इंतजार है। 'Musafir Cafe' पर टिकी दर्शकों की नजर इस हफ्ते की सबसे चर्चित रिलीज़ 'Musafir Cafe' मानी जा रही है। फिल्म दोस्ती, रिश्तों और जीवन के नए अनुभवों की कहानी को हल्के-फुल्के अंदाज़ में पेश करती है। ट्रेलर को सोशल मीडिया पर शानदार प्रतिक्रिया मिली है और दर्शकों के बीच इसे लेकर अच्छा उत्साह देखने को मिल रहा है। 'Adarsh Baal Vidyalaya' भी बटोर रही सुर्खियां स्कूल जीवन और सामाजिक मुद्दों पर आधारित 'Adarsh Baal Vidyalaya' भी इस सप्ताह की प्रमुख रिलीज़ में शामिल है। फिल्म की कहानी और विषय को लेकर दर्शकों में खासा उत्साह है। रिलीज़ से पहले ही इसका ट्रेलर और पोस्टर चर्चा का विषय बने हुए हैं। हर जॉनर के दर्शकों के लिए विकल्प इस सप्ताह कॉमेडी, ड्रामा, फैमिली और थ्रिलर जैसे अलग-अलग जॉनर की कई नई फिल्में और सीरीज़ विभिन्न OTT प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज़ होंगी। ऐसे में दर्शकों को अपनी पसंद के अनुसार कई नए विकल्प मिलने वाले हैं। वीकेंड पर OTT दर्शकों की होगी मौज लगातार नई रिलीज़ के साथ यह सप्ताह OTT प्रेमियों के लिए बेहद खास रहने वाला है। दर्शक घर बैठे अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर नई फिल्मों और वेब सीरीज़ का आनंद ले सकेंगे, जिससे वीकेंड का मनोरंजन और भी शानदार होने की उम्मीद है।
नई दिल्ली: संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले दिल्ली की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हुए सांसदों को लेकर नई राजनीतिक गतिविधियां सामने आ रही हैं। सूत्रों के अनुसार, 19 जुलाई को होने वाली सर्वदलीय बैठक में एनसीपीआई को आमंत्रित किए जाने की संभावना जताई जा रही है। सुदीप बंद्योपाध्याय बन सकते हैं सदन के नेता सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय को लोकसभा में एनसीपीआई का नेता चुना जा सकता है। वहीं शताब्दी रॉय को उपनेता और काकोली घोष दस्तीदार को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाए जाने की संभावना है। पार्टी अपने संसदीय दल के गठन को अंतिम रूप देने में जुटी है। लोकसभा अध्यक्ष से की मुलाकात जानकारी के अनुसार, सुदीप बंद्योपाध्याय और काकोली घोष दस्तीदार ने सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की। इस दौरान एनसीपीआई के 20 सांसदों के लिए लोकसभा में बैठने की व्यवस्था और नए संसद भवन में पार्टी कार्यालय आवंटित करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। एनडीए को समर्थन पर भी चर्चा सूत्रों का कहना है कि एनसीपीआई के नेताओं की यह सक्रियता संसदीय मान्यता हासिल करने की प्रक्रिया का हिस्सा है। बताया जा रहा है कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की थी। एनडीए का सहयोगी दल बनने की प्रक्रिया के तहत पार्टी से केंद्र सरकार को समर्थन संबंधी औपचारिक पत्र देने को कहा गया है। टीएमसी ने दायर की अयोग्यता याचिकाएं दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने पार्टी छोड़ने वाले 20 सांसदों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। लोकसभा में टीएमसी के नेता अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत सभी 20 सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग करते हुए अलग-अलग याचिकाएं सौंपी हैं। टीएमसी का आरोप है कि इन सांसदों ने दूसरे दल में शामिल होकर स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष के साथ हुई बैठक में इन अयोग्यता याचिकाओं पर चर्चा नहीं हुई। विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हुई बगावत 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में असंतोष बढ़ा और कई सांसदों एवं विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। बागी सांसदों ने दावा किया कि उन्हें दो-तिहाई से अधिक समर्थन प्राप्त है और बाद में उन्होंने एनसीपीआई में विलय की घोषणा कर दी। अब संसद के मानसून सत्र से पहले एनसीपीआई की संसदीय मान्यता, सर्वदलीय बैठक में संभावित भागीदारी और टीएमसी की अयोग्यता याचिकाओं पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त 2026 तक चलेगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने केंद्र सरकार की सिफारिश पर लोकसभा और राज्यसभा की बैठकें बुलाने को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इसकी जानकारी साझा करते हुए कहा कि राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद संसद के दोनों सदनों का मानसून सत्र निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आयोजित किया जाएगा। संसदीय परंपरा के अनुसार संसदीय परंपरा के अनुसार मानसून सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होगी। इसके बाद लोकसभा और राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा कराई जाएगी। करीब तीन सप्ताह तक चलने वाले इस सत्र में सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पेश करने और उन्हें पारित कराने का प्रयास करेगी। इसके साथ ही विभिन्न राष्ट्रीय और जनहित से जुड़े मुद्दों पर भी दोनों सदनों में विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने अपने बयान में कहा कि मानसून सत्र लोकतांत्रिक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच होगा, जहां राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर सार्थक बहस, चर्चा और निर्णय लिए जाएंगे। उन्होंने उम्मीद जताई कि सभी राजनीतिक दल सकारात्मक सहयोग के साथ संसद की कार्यवाही को सफल बनाने में योगदान देंगे। इस बार के मानसून सत्र पर राजनीतिक दृष्टि इस बार के मानसून सत्र पर राजनीतिक दृष्टि से भी खास नजर रहेगी। विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, कृषि, आर्थिक स्थिति, कानून-व्यवस्था और अन्य समसामयिक मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। वहीं सरकार अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने के साथ विभिन्न नीतिगत फैसलों पर सदन की सहमति हासिल करने की कोशिश करेगी। संसद का यह सत्र कई महत्वपूर्ण विधेयकों, नीति संबंधी चर्चाओं और सरकार-विपक्ष के बीच होने वाली बहस के कारण बेहद अहम माना जा रहा है। ऐसे में आगामी तीन सप्ताह तक देश की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र संसद भवन रहेगा।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लेकर लगाए गए 'गुमशुदा' पोस्टरों ने राजनीतिक विवाद को हवा दे दी है। शहर के कई इलाकों में लगाए गए इन पोस्टरों में राहुल गांधी की तस्वीर के साथ उन्हें "गुमशुदा" बताया गया है और उनकी विदेश यात्राओं को लेकर तंज कसा गया है। इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। पोस्टरों में क्या लिखा है? दिल्ली में लगाए गए पोस्टरों में बड़े अक्षरों में "गुमशुदा" लिखा गया है। पोस्टर में राहुल गांधी की तस्वीर के साथ लिखा गया है: नाम: राहुल गांधी पहचान: हमेशा विदेश में पाए जाते हैं। किसी पब में हो सकते हैं, किसी बीच पर हो सकते हैं। तलाश जारी है। इन पोस्टरों के सामने आने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। बीजेपी ने राहुल गांधी पर साधा निशाना बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर राहुल गांधी को निशाने पर लेते हुए उन्हें "पर्यटन का नेता" और "लापता राहुल बाबा" बताया। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में बिना छुट्टी लिए लगातार काम किया है, जबकि राहुल गांधी महत्वपूर्ण राजनीतिक अवसरों पर अक्सर विदेश यात्राओं पर चले जाते हैं। पूनावाला ने आरोप लगाया कि जब संसद, देश या उनकी पार्टी को उनकी जरूरत होती है, तब राहुल गांधी विदेश में होते हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि राहुल गांधी की विदेश यात्राओं का खर्च किस स्रोत से उठाया जाता है। अर्जुन राम मेघवाल ने भी किया हमला केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने भी पोस्टरों के मुद्दे पर राहुल गांधी की आलोचना की। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी का तरीका "झूठ बोलो और फिर भाग जाओ" जैसा हो गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी कई बार ऐसे मुद्दों पर राजनीति करते हैं, जिनसे देश में भ्रम और अशांति फैलती है। उन्होंने कहा कि यदि किसी नीति या परीक्षा व्यवस्था पर सुझाव हैं तो उन्हें रचनात्मक तरीके से रखा जाना चाहिए। कांग्रेस की ओर से नहीं आई प्रतिक्रिया पोस्टर विवाद पर कांग्रेस की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद सत्र और आगामी राजनीतिक कार्यक्रमों के बीच यह मुद्दा सियासी बहस का हिस्सा बना रह सकता है। दिल्ली में लगे इन पोस्टरों ने एक बार फिर राहुल गांधी की विदेश यात्राओं को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।
नई दिल्ली: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी शुक्रवार (19 जून, 2026) को 56 वर्ष के हो गए। उनके जन्मदिन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें शुभकामनाएं दीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए राहुल गांधी को जन्मदिन की बधाई दी। प्रधानमंत्री ने लिखा, "लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को जन्मदिन की शुभकामनाएं। उनके अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करता हूं।" 56 साल के हुए राहुल गांधी राहुल गांधी का जन्म 19 जून, 1970 को नई दिल्ली में हुआ था। वह पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के पुत्र हैं। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की रायबरेली लोकसभा सीट से सांसद हैं और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। राहुल गांधी पिछले 22 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं और कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। मल्लिकार्जुन खरगे ने बताया प्रेरणास्रोत कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने X पर पोस्ट कर राहुल गांधी को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने लिखा कि संविधान के आदर्शों के प्रति राहुल गांधी की अटूट निष्ठा और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए उनका संघर्ष लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत रहा है। खरगे ने कहा कि समावेशिता, सामाजिक न्याय, सद्भाव और करुणा की कांग्रेस पार्टी की परंपरा राहुल गांधी के सार्वजनिक जीवन और नेतृत्व में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि जनता के बीच निरंतर संवाद और सत्ता के सामने निर्भीक होकर सच बोलने के कारण राहुल गांधी ने समाज के कमजोर और हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज को मजबूती से उठाया है। पवन खेड़ा ने राहुल गांधी के संघर्ष को सराहा कांग्रेस के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने भी राहुल गांधी को जन्मदिन की बधाई दी। उन्होंने कहा कि बहुत कम नेताओं ने लंबे समय तक इतनी तीखी आलोचना और लगातार सार्वजनिक जांच-परख का सामना किया है। पवन खेड़ा ने कहा, "ऐसी परिस्थितियों में अधिकांश लोग सार्वजनिक जीवन से पीछे हट जाते हैं, लेकिन राहुल गांधी को कमजोर करने का हर प्रयास उनके संकल्प को और मजबूत करता गया, उनकी राजनीति को और परिपक्व बनाता गया तथा जनता से उनके संबंध को और गहरा करता गया।" राहुल गांधी के जन्मदिन के अवसर पर देशभर से कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने भी उन्हें शुभकामनाएं दीं और उनके लंबे एवं स्वस्थ जीवन की कामना की।
नई दिल्ली: लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 सांसदों के बागी रुख अपनाने और नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय के ऐलान के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस बीच बागी सांसदों ने साफ किया है कि उनका संघर्ष ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर विकसित हुई कार्यशैली और नेतृत्व के तौर-तरीकों के खिलाफ है। 'ममता बनर्जी के प्रति सम्मान हमेशा रहेगा' लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद बागी गुट के एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि ममता बनर्जी उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं और उनके प्रति सम्मान हमेशा बना रहेगा। उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी हमारी नेता रही हैं। उन्होंने कई नेताओं को राजनीति में आगे बढ़ने का अवसर दिया। उनके प्रति हमारे मन में सम्मान हमेशा रहेगा, लेकिन अब बंगाल के विकास और नई दिशा के लिए काम करने का समय है।" 'बंगाल के विकास के लिए दिल्ली के साथ मिलकर काम करना होगा' बागी सांसद ने कहा कि वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद राज्य के विकास को प्राथमिकता देना जरूरी हो गया है। उनका दावा है कि कई केंद्रीय योजनाओं का लाभ राज्य के लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया। उन्होंने कहा कि बंगाल के विकास को गति देने के लिए केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है और अब दिल्ली के साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। 'लड़ाई ममता से नहीं, पार्टी के भीतर के कॉर्पोरेट कल्चर से' बागी गुट के नेताओं का कहना है कि उनका विरोध ममता बनर्जी से नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर कथित तौर पर विकसित हुए केंद्रीकृत और कॉर्पोरेट शैली के प्रबंधन से है। उनका आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के सांसदों और विधायकों की भूमिका सीमित हो गई थी और फैसलों में उनकी भागीदारी कम हो गई थी। अभिषेक बनर्जी के करीबियों पर भी उठाए सवाल बागी नेताओं ने दावा किया कि पार्टी के भीतर कुछ नेताओं और प्रभावशाली समूहों के बढ़ते प्रभाव से पुराने और वरिष्ठ नेताओं में असंतोष बढ़ रहा था। उनका कहना है कि यही असंतोष धीरे-धीरे बड़े राजनीतिक बदलाव का कारण बना। इन आरोपों पर टीएमसी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली All India Trinamool Congress (टीएमसी) के 20 बागी सांसदों ने पार्टी से अलग होकर Nationalist Citizens Party of India (एनसीपीआई) में विलय का ऐलान कर दिया है। इतना ही नहीं, बागी गुट अब तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न 'जोड़ाफूल' (दो फूल) पर भी दावा करने की तैयारी में है। तृणमूल के बागी सांसद Arup Chakraborty ने सोमवार को दावा किया कि उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी है, बल्कि पार्टी को "सुधारने" की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "एक नया खेल शुरू हो गया है… खेला होबे।" 'हम ही असली तृणमूल हैं' अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि बागी सांसद ही असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके पास पार्टी के 20 सांसदों का समर्थन है। उन्होंने कहा, "हमने तृणमूल नहीं छोड़ी है। हम तृणमूल में ही हैं और पार्टी को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी को नुकसान क्यों पहुंचा, इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। हमारे पास 20 सांसद हैं, इसलिए हम चुनाव चिह्न के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।" उन्होंने यह भी दावा किया कि इस राजनीतिक बदलाव से पश्चिम बंगाल में विकास और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। ममता बनर्जी पर साधा निशाना अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि ममता बनर्जी डरी हुई हैं और पार्टी की बैठक तक बुलाने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया, "ममता बनर्जी चुनाव से पहले अपने क्षेत्र में एक बैठक भी नहीं कर सकीं। पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक चर्चा समाप्त हो चुकी है।" 20 सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का किया ऐलान रविवार को बागी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने Om Birla से मुलाकात कर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की। सांसदों ने घोषणा की कि वे एनसीपीआई में विलय कर चुके हैं और एक अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता चाहते हैं। एनसीपीआई एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसने वर्ष 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया था। टीएमसी ने बताया गैरकानूनी कदम तृणमूल कांग्रेस ने बागी सांसदों के कदम को संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत अवैध बताया है। Sagarika Ghose ने कहा कि केवल सांसदों के समूह का अलग होना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, "दलबदल विरोधी कानून के तहत पहले संसद के बाहर मौजूद पूरी राजनीतिक पार्टी का विलय या विभाजन होना चाहिए। केवल सांसदों का समूह अलग होकर किसी अन्य पार्टी में शामिल नहीं हो सकता।" 'असली तृणमूल वही है जिसकी अध्यक्ष ममता हैं' तृणमूल के वरिष्ठ नेता Sougata Roy ने कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस वही है, जिसकी अध्यक्ष ममता बनर्जी हैं और जिसका चुनाव चिह्न 'जोड़ाफूल' है। उन्होंने आरोप लगाया कि बागी सांसदों ने मतदाताओं के साथ विश्वासघात किया है। सौगत रॉय ने कहा, "तृणमूल के टिकट पर जीतकर सांसद बने लोगों ने एक अज्ञात पार्टी में शामिल होकर एनडीए का समर्थन करने का फैसला किया है। यह जनता के जनादेश के साथ धोखा है।" सुदीप बंद्योपाध्याय भी बागी गुट में शामिल छह बार के सांसद Sudip Bandyopadhyay भी बागी गुट में शामिल हो गए हैं। उन्होंने दावा किया कि बागी समूह ही असली तृणमूल कांग्रेस है और वह चुनाव चिह्न तथा पार्टी की मान्यता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेगा। विधानसभा से संसद तक छिड़ी नियंत्रण की जंग तृणमूल पर नियंत्रण की लड़ाई केवल संसद तक सीमित नहीं है। हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी पार्टी के 80 में से 64 विधायकों ने अलग समूह के रूप में मान्यता हासिल करने का दावा किया है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में बड़ा पुनर्संयोजन देखने को मिल सकता है। क्या ममता बनर्जी से छिन सकता है तृणमूल का चुनाव चिह्न? राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी राजनीतिक दल का चुनाव चिह्न तभी दूसरे गुट को मिल सकता है जब पार्टी में वास्तविक विभाजन, संगठनात्मक समर्थन और निर्वाचन आयोग के समक्ष पर्याप्त कानूनी आधार साबित हो। इसलिए बागी सांसदों के दावे के बावजूद अंतिम फैसला Election Commission of India और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। फिलहाल इतना तय है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुआ यह नया 'खेला' पश्चिम बंगाल की राजनीति को आने वाले महीनों में पूरी तरह बदल सकता है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय हलचल मच गई, जब लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसदों के पार्टी से अलग होकर त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी (NCP) में विलय करने के दावे सामने आए। रिपोर्टों के मुताबिक, इस गुट का नेतृत्व वरिष्ठ सांसद डॉ. काकोली घोष दस्तीदार और सुदीप बंद्योपाध्याय कर रहे हैं। दावों के अनुसार, बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को एक पत्र सौंपकर नए राजनीतिक गठन की जानकारी दी है। हालांकि, इस संबंध में अभी तक लोकसभा सचिवालय, चुनाव आयोग या तृणमूल कांग्रेस की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। दलबदल कानून से बचने की रणनीति? रिपोर्टों में कहा गया है कि सांसदों ने अलग संसदीय गुट बनाने के बजाय किसी अन्य क्षेत्रीय दल में विलय का रास्ता चुना है, ताकि दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के प्रावधानों से बचा जा सके। भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) के तहत किसी दल के कम-से-कम दो-तिहाई निर्वाचित सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय का निर्णय लेते हैं, तो कुछ परिस्थितियों में अयोग्यता से राहत मिल सकती है। इस पर अंतिम निर्णय संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद ही संभव होता है। क्या टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न पर भी हो सकता है विवाद? कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि नया गुट भविष्य में तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा कर सकता है। यदि ऐसा होता है, तो मामला चुनाव आयोग और न्यायालय के समक्ष जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि इन दावों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति और राष्ट्रीय विपक्षी खेमे के लिए बड़ा घटनाक्रम साबित हो सकता है। टीएमसी की प्रतिक्रिया का इंतजार तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है। पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि यह महज राजनीतिक दावा है या भारतीय राजनीति में किसी बड़े पुनर्गठन की शुरुआत।
नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में एक बार फिर अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आती दिखाई दे रही है। पार्टी की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने का फैसला किया है। इस दावे के बाद पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। काकोली घोष दस्तीदार ने सोमवार को कहा कि इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक पत्र भी सौंपा गया है। उन्होंने दावा किया कि यह निर्णय कई सांसदों के बीच विस्तृत चर्चा और सहमति के बाद लिया गया है। उन्होंने कहा, “हमने लोकसभा अध्यक्ष को अपने निर्णय से अवगत करा दिया है। यह फैसला सांसदों के बीच विचार-विमर्श के बाद लिया गया है।” दावे से बढ़ी राजनीतिक हलचल काकोली घोष दस्तीदार के अनुसार, इस फैसले के समर्थन में करीब 20 सांसद हैं। टीएमसी के लोकसभा में कुल 28 सांसद हैं, ऐसे में यह दावा पार्टी के भीतर संभावित बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है। लोकसभा सचिवालय की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। ऐसे में दावे की वास्तविक स्थिति को लेकर राजनीतिक हलकों में उत्सुकता बनी हुई है। पार्टी नेतृत्व की चुप्पी ने बढ़ाई अटकलें काकोली घोष दस्तीदार के बयान के बाद भी तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी तथा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेतृत्व की चुप्पी ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अटकलों को और बढ़ा दिया है। पहले भी सामने आ चुके हैं असंतोष के संकेत पिछले कुछ समय से तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और मतभेदों की खबरें सामने आती रही हैं। कई नेताओं द्वारा संगठनात्मक मुद्दों और नेतृत्व शैली को लेकर अलग-अलग मंचों पर अपनी राय रखी गई थी। ऐसे में काकोली घोष दस्तीदार का यह दावा पार्टी के भीतर चल रही हलचलों को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। विपक्षी राजनीति पर पड़ सकता है असर यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ व्यापक राजनीतिक एकजुटता बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यदि टीएमसी के भीतर बड़े स्तर पर कोई राजनीतिक पुनर्संरचना होती है, तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति और विपक्षी गठबंधन की रणनीतियों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व और लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय की ओर हैं, जहां से इस पूरे मामले पर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी राजनीतिक हलचल अब राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचती दिखाई दे रही है. पार्टी के भीतर संभावित बगावत और सांसदों के अलग गुट बनाने की अटकलों के बीच दलबदल-रोधी कानून (Anti-Defection Law) एक बड़ी कानूनी बाधा बनकर सामने आया है. पार्टी नेतृत्व और संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि संसद में अलग समूह बनाने की चर्चा जितनी आसान दिखाई दे रही है, व्यवहार में उतनी ही जटिल और कानूनी चुनौतियों से भरी हुई है. ऐसे किसी भी कदम के लिए सांसदों को कड़े संवैधानिक प्रावधानों का सामना करना पड़ेगा. सांसदों के बीच बढ़ी हलचल टीएमसी के पूर्व नेता रीतब्रत बनर्जी के दावों के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी के कुछ सांसद अलग राजनीतिक रास्ता तलाश सकते हैं. सूत्रों के मुताबिक, असंतुष्ट सांसदों के बीच समर्थन जुटाने को लेकर बातचीत भी चल रही है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि संसद में अलग गुट बनाने का कोई सीधा संवैधानिक प्रावधान मौजूद नहीं है और ऐसे प्रयासों को कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है. दो-तिहाई समर्थन के बिना संभव नहीं टूट दलबदल-रोधी कानून के तहत किसी भी संसदीय दल में वैध विभाजन या विलय के लिए कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है. वर्तमान में लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसद हैं. ऐसे में यदि कोई समूह पार्टी से अलग होना चाहता है, तो उसे कम से कम 19 सांसदों का समर्थन जुटाना होगा. इसके बिना अलग होने वाले सांसदों की सदस्यता खतरे में पड़ सकती है. अलग गुट नहीं, केवल विलय का विकल्प कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, दो-तिहाई सांसदों का समर्थन मिलने के बाद भी अलग संसदीय समूह बनाना आसान नहीं होगा. संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत ऐसे सांसदों को किसी अन्य मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में विलय करना होगा. केवल अलग गुट बनाकर स्वतंत्र रूप से काम करने का विकल्प कानून में उपलब्ध नहीं है. संसदीय नेता बदलने का अधिकार किसके पास? राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि असंतुष्ट सांसद लोकसभा अध्यक्ष के माध्यम से संसदीय दल के नेतृत्व में बदलाव की कोशिश कर सकते हैं. पार्टी सूत्रों का कहना है कि संसदीय दल का नेता चुनने का अधिकार मूल राजनीतिक दल के पास होता है. इसलिए टीएमसी संसदीय दल के नेतृत्व में किसी भी बदलाव का अंतिम फैसला पार्टी अध्यक्ष के स्तर पर ही संभव है. INDIA गठबंधन की बैठक से पहले बढ़ी सियासी चर्चा टीएमसी नेताओं का आरोप है कि संभावित टूट की खबरों को ऐसे समय में हवा दी जा रही है, जब विपक्षी गठबंधन INDIA की महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है. पार्टी का मानना है कि इन अटकलों का उद्देश्य विपक्षी एकजुटता से ध्यान हटाना और राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनाना है. दो मॉडल पर हो रही चर्चा राजनीतिक विश्लेषकों के बीच फिलहाल दो संभावित परिदृश्यों पर चर्चा हो रही है. पहला, पश्चिम बंगाल विधानसभा में हाल में हुई राजनीतिक टूट जैसा मॉडल, जहां विधायकों के एक वर्ग ने नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोला था. दूसरा, आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा अपनाया गया मॉडल, जिसमें संवैधानिक प्रावधानों का पालन करते हुए राजनीतिक पुनर्संरेखण किया गया था. कानूनी और राजनीतिक तैयारी में जुटी टीएमसी पार्टी नेतृत्व का कहना है कि संसद के आगामी सत्र से पहले किसी भी संभावित बगावत को रोकने के लिए राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर रणनीति तैयार की जा रही है. टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि दलबदल-रोधी कानून के कारण किसी भी असंतुष्ट समूह के लिए पार्टी से अलग होकर स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाना आसान नहीं होगा. ऐसे में आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर की राजनीतिक गतिविधियों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी.
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी शुक्रवार को एक बार फिर आम लोगों के बीच अलग अंदाज में नजर आए। कांग्रेस सांसद ने दिल्ली स्थित अपने सरकारी आवास पर ऑटो रिक्शा चालकों से मुलाकात की, उनकी समस्याएं सुनीं और उनके साथ जमीन पर बैठकर भोजन किया। राहुल गांधी इस दौरान ऑटो ड्राइवरों की वर्दी पहने हुए दिखाई दिए। उन्होंने ऑटो चालकों के साथ बातचीत कर उनकी रोजमर्रा की चुनौतियों, सामाजिक सुरक्षा, बीमा और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। संसद में आवाज उठाने का दिया आश्वासन मुलाकात के दौरान राहुल गांधी ने ऑटो चालकों को भरोसा दिलाया कि उनके मुद्दों को संसद में उठाया जाएगा। उन्होंने कहा कि मेहनतकश वर्ग की समस्याओं को समझना और उन्हें उचित मंच पर रखना जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है। ऑटो चालकों ने भी अपने अनुभव साझा किए और परिवहन क्षेत्र से जुड़ी विभिन्न समस्याओं की जानकारी दी। राहुल गांधी ने उनकी बातों को ध्यानपूर्वक सुना और आवश्यक सहायता के लिए प्रयास करने का आश्वासन दिया। चालकों के साथ सादा भोजन किया कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने ऑटो चालकों के साथ जमीन पर बैठकर सादा भोजन भी किया। इस दौरान उन्होंने अनौपचारिक बातचीत करते हुए उनकी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के बारे में जानकारी ली। मुलाकात के बाद एक ऑटो चालक ने बताया कि राहुल गांधी ने उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना और बीमा योजनाओं समेत अन्य सुविधाओं के मुद्दे पर सहयोग का आश्वासन दिया। चालक ने कहा कि यह मुलाकात उनके लिए यादगार अनुभव रही। पहले भी आम लोगों के बीच पहुंचते रहे हैं राहुल गांधी यह पहला अवसर नहीं है जब राहुल गांधी आम लोगों के बीच इस तरह पहुंचे हों। इससे पहले भी वे भारत जोड़ो यात्रा के दौरान ट्रक चालकों के साथ सफर करते, मैकेनिकों के साथ काम करते और विभिन्न वर्गों के लोगों से सीधे संवाद करते नजर आए थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी लगातार विभिन्न पेशों से जुड़े लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझने और उनसे संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसी क्रम में ऑटो चालकों के साथ उनकी यह मुलाकात भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
केंद्रीय मंत्री Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi की विदेश यात्राओं को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी बिना पूर्व सूचना दिए विदेश यात्रा करते हैं, जबकि नियमों के तहत सांसदों को अपनी यात्रा की जानकारी पहले देना अनिवार्य है। ‘तीन हफ्ते पहले सूचना देना जरूरी’ किरेन रिजिजू ने शुक्रवार को मीडिया से बातचीत में कहा कि किसी भी सांसद को विदेश यात्रा से कम से कम तीन सप्ताह पहले लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय को इसकी सूचना देनी होती है। उन्होंने कहा, “यह अनुमति लेने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि सूचना देने का नियम है। सांसद विदेश यात्रा कर सकते हैं, लेकिन उन्हें निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।” राहुल गांधी की यात्राओं पर उठाए सवाल रिजिजू ने दावा किया कि राहुल गांधी 2004 से सांसद हैं और अब तक उनकी 54 विदेश यात्राएं दर्ज की गई हैं। उन्होंने कहा कि केवल यात्राओं की संख्या ही नहीं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि वह विदेश में कितने दिन रहे और उन यात्राओं पर कितना खर्च हुआ। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अगर कोई सांसद विदेश में किसी संस्था या संगठन की ओर से आतिथ्य स्वीकार करता है, तो वह मामला Foreign Contribution Regulation Act यानी FCRA के दायरे में आता है और इसकी जानकारी गृह मंत्रालय को देना जरूरी होता है। ‘कांग्रेस नियमों का पालन करे’ किरेन रिजिजू ने कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी से नियमों का पालन करने की अपील करते हुए कहा कि विदेश यात्रा से पहले लोकसभा अध्यक्ष और संबंधित एजेंसियों को आवश्यक जानकारी दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा, “राहुल गांधी को स्पष्ट करना चाहिए कि उन्होंने इतनी विदेश यात्राएं क्यों कीं, किसने उन्हें आमंत्रित किया और विदेश में उनके खर्च का वहन किसने किया।” ‘कानून सबके लिए समान’ केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यात्रा करना किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है, लेकिन सभी नागरिकों और खासकर सांसदों को देश के कानूनों का पालन करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी मामले में जांच या कार्रवाई होती है, तो इसे किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना नहीं माना जाना चाहिए। “कानून सबके लिए बराबर है,” रिजिजू ने कहा।
अमित शाह ने लोकसभा में नक्सलवाद के मुद्दे पर लगभग 90 मिनट तक ऐसा आक्रामक और रणनीतिक भाषण दिया, जिसने पूरे सदन का माहौल बदल दिया। उनका यह संबोधन केवल एक राजनीतिक जवाब नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित सियासी हमला था, जिसमें उन्होंने आंकड़ों, इतिहास और तर्कों के जरिए विपक्ष को घेरने की कोशिश की। खामोशी से शुरुआत, रणनीति की तैयारी भाषण देने से करीब दो घंटे पहले ही अमित शाह सदन में मौजूद थे। वे शांत बैठकर हर वक्ता की बात ध्यान से सुन रहे थे और अहम बिंदुओं को नोट कर रहे थे। इस दौरान विपक्ष की बेंच काफी हद तक खाली दिखीं- Rahul Gandhi, Priyanka Gandhi Vadra और Dimple Yadav जैसे बड़े चेहरे मौजूद नहीं थे। बहस के बीच भावनात्मक मोड़ बीजेपी सांसद Nishikant Dubey ने अपने परिवार की निजी त्रासदी का जिक्र किया, जिसमें उनके दादा की नक्सलियों द्वारा हत्या की बात सामने आई। इससे बहस का माहौल भावनात्मक हो गया। वहीं अभिनेत्री और सांसद Kangana Ranaut ने कांग्रेस नेतृत्व पर तीखा हमला बोला, जिससे सदन में हंगामा भी हुआ। 6:04 बजे शुरू हुआ ‘मुख्य प्रहार’ शाम 6:04 बजे अमित शाह बोलने के लिए खड़े हुए और सीधे इतिहास से शुरुआत की। उन्होंने Indira Gandhi पर नक्सल विचारधारा को राजनीतिक संरक्षण देने का आरोप लगाया, जिस पर विपक्ष ने जोरदार विरोध किया। ‘गरीबी नहीं, नक्सलवाद से फैली गरीबी’ अपने भाषण के दौरान शाह ने विपक्ष के तर्क को पलटते हुए कहा: “नक्सलवाद गरीबी की वजह से नहीं फैला, बल्कि नक्सलवाद की वजह से गरीबी फैली।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार नक्सल हिंसा के खिलाफ सख्त रुख अपनाएगी- “जो हथियार उठाएंगे, उन्हें समझाया जाएगा, नहीं मानेंगे तो बल का इस्तेमाल होगा।” तारीख, डेटा और रणनीतिक रोडमैप अमित शाह ने अपने तर्कों को मजबूत करने के लिए कई अहम तारीखें पेश कीं: 20 अगस्त 2019: पुनर्वास और मुख्यधारा में लाने की नीति की शुरुआत 24 अगस्त 2024: भारत को 31 मार्च 2026 तक नक्सल-मुक्त करने का लक्ष्य उन्होंने दावा किया कि सरकार की रणनीति और लगातार कार्रवाई से देश नक्सलवाद से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ चुका है। 90 मिनट में बदला पूरा माहौल करीब 7:25 बजे जब उनका भाषण खत्म हुआ, तब तक सदन में कई बार हंगामा और नारेबाजी हो चुकी थी। लेकिन यह साफ था कि अमित शाह ने बहस की दिशा तय कर दी थी। उनका यह भाषण एक राजनीतिक प्रदर्शन जैसा था-जो खामोशी से शुरू हुआ और आक्रामक अंदाज में खत्म हुआ।
संसद के मानसून सत्र के दौरान मंगलवार को लोकसभा में तीखी राजनीतिक हलचल देखने को मिली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका-इजरायल के बीच जारी संघर्ष को लेकर विपक्ष ने सदन में तत्काल चर्चा की मांग की, जिससे सदन का माहौल गरमा गया। इसी बीच लोकसभा अध्यक्ष Om Birla के खिलाफ विपक्ष की ओर से लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को लेकर भी सियासी टकराव तेज हो गया। सदन की कार्यवाही के दौरान विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने मिडिल ईस्ट संकट पर विस्तृत चर्चा कराने की मांग रखी। उनका कहना था कि अंतरराष्ट्रीय हालात का असर भारत की सुरक्षा, कूटनीति और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है, इसलिए इस मुद्दे पर संसद में गंभीर चर्चा जरूरी है। अविश्वास प्रस्ताव को लेकर आरोप-प्रत्यारोप लोकसभा की कार्यसूची के अनुसार बिहार के किशनगंज से सांसद Mohammad Jawed ने स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। प्रस्ताव को सदन में रखने के लिए आवश्यक 50 सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे स्वीकार कर लिया गया और उस पर चर्चा कराने की प्रक्रिया शुरू की गई। इस प्रस्ताव में आरोप लगाया गया है कि लोकसभा अध्यक्ष ने सदन के संचालन में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है और विपक्ष को पर्याप्त अवसर नहीं दिया जा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि सदन की कार्यवाही निष्पक्ष तरीके से चलनी चाहिए और सभी दलों को अपनी बात रखने का समान अवसर मिलना चाहिए। ‘दुखी हैं, लेकिन मजबूर’ – गौरव गोगोई बहस के दौरान कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना किसी भी विपक्षी दल के लिए आसान निर्णय नहीं होता। उन्होंने कहा कि यह कदम “दुख के साथ” उठाया गया है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में विपक्ष खुद को मजबूर महसूस कर रहा है। गोगोई ने आरोप लगाया कि सदन के संचालन में संतुलन बनाए रखना अध्यक्ष की जिम्मेदारी होती है, लेकिन हाल के दिनों में विपक्ष को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा है। हंगामे के कारण कार्यवाही स्थगित इससे पहले सोमवार को भी लोकसभा में पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा की मांग को लेकर विपक्षी दलों ने जोरदार हंगामा किया था। लगातार शोर-शराबे के कारण सदन की कार्यवाही दो बार स्थगित करनी पड़ी और अंततः दिनभर के लिए स्थगित कर दी गई। जब दोपहर तीन बजे सदन की कार्यवाही फिर से शुरू हुई तो पीठासीन सभापति Jagadambika Pal ने कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद को स्पीकर के खिलाफ अपना प्रस्ताव रखने के लिए कहा। हालांकि उस दौरान भी विपक्षी सदस्य पश्चिम एशिया के हालात पर चर्चा की मांग करते हुए नारेबाजी करते रहे और कई सांसद आसन के समीप पहुंच गए। संसद में बढ़ा सियासी तापमान इस पूरे घटनाक्रम के चलते लोकसभा का माहौल काफी गरमाया हुआ नजर आया। एक ओर विपक्ष अंतरराष्ट्रीय संकट जैसे गंभीर मुद्दे पर तत्काल चर्चा की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ने राजनीतिक टकराव को और तीखा कर दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि सदन में इस प्रस्ताव पर बहस और मतदान की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है और सरकार तथा विपक्ष के बीच जारी टकराव का क्या परिणाम निकलता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।