बिहार में बालू, पत्थर और अन्य विशिष्ट लघु खनिजों के खनन कारोबार को लेकर राज्य सरकार ने नियमों में बड़ा बदलाव किया है। बिहार खनिज नियमावली, 2019 में दूसरे संशोधन के बाद अब किसी एक व्यक्ति के नाम पर राज्यभर में कुल 200 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल का खनिज पट्टा नहीं हो सकेगा। सरकार के इस फैसले को खनिज पट्टों के अत्यधिक केंद्रीकरण पर रोक लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। नई व्यवस्था का असर सिर्फ एक जिले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्य के अलग-अलग जिलों में किसी व्यक्ति के नाम पर मौजूद सभी खनिज पट्टों का क्षेत्रफल जोड़कर 200 हेक्टेयर की अधिकतम सीमा तय की जाएगी। अलग-अलग जिलों के पट्टे भी कुल सीमा में शामिल होंगे संशोधित नियम की सबसे अहम बात यह है कि 200 हेक्टेयर की सीमा जिलेवार नहीं, बल्कि पूरे बिहार के स्तर पर लागू होगी। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी व्यक्ति के पास एक जिले में 100 हेक्टेयर, दूसरे जिले में 70 हेक्टेयर और तीसरे जिले में 30 हेक्टेयर का खनिज पट्टा है, तो उसका कुल पट्टा क्षेत्रफल 200 हेक्टेयर माना जाएगा। इसके बाद वह नए पट्टे के जरिए इस सीमा को पार नहीं कर सकेगा। इस प्रावधान के पीछे सरकार का उद्देश्य खनिज संसाधनों पर कुछ चुनिंदा लोगों या समूहों के अत्यधिक नियंत्रण को रोकना और बंदोबस्ती प्रक्रिया में अधिक लोगों के लिए अवसर उपलब्ध कराना बताया जा रहा है। पत्थर खदानों के भूखंडों को जोड़ने और बांटने का रास्ता साफ सरकार ने पत्थर खदानों की बंदोबस्ती प्रक्रिया को भी अधिक लचीला बनाने की व्यवस्था की है। जरूरत और परिस्थितियों के अनुसार खनन क्षेत्र के अलग-अलग भूखंडों को आपस में जोड़ा जा सकेगा। इसके साथ ही बड़े भूखंडों को छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित करके उनकी अलग-अलग बंदोबस्ती भी की जा सकेगी। इससे खनन क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति और वास्तविक जरूरत के आधार पर नीलामी की प्रक्रिया को संचालित करने में सुविधा मिलने की उम्मीद है। नीलामी जीतने वाले को पांच दिन में जमा करनी होगी 25 प्रतिशत राशि संशोधित नियमों में नीलामी के बाद भुगतान की व्यवस्था में भी बदलाव किया गया है। सफल उच्चतम बोलीदाता को नीलामी राशि का 25 प्रतिशत हिस्सा पांच कार्य दिवस के भीतर जमा करना होगा। इस प्रावधान का उद्देश्य नीलामी प्रक्रिया में गंभीर बोलीदाताओं की भागीदारी सुनिश्चित करना और सफल बोली के बाद भुगतान में होने वाली अनावश्यक देरी को कम करना है। असफल बोलीदाताओं को 10 दिन में लौटाई जाएगी अग्रधन राशि नीलामी में सफल नहीं होने वाले बोलीदाताओं के लिए भी संशोधित नियम में स्पष्ट व्यवस्था की गई है। विभाग को उनकी अग्रधन राशि अधिकतम 10 दिनों के भीतर वापस करनी होगी। वहीं, प्रतिभूति राशि पट्टा अवधि समाप्त होने के बाद लौटाई जाएगी। इसके लिए संबंधित पट्टाधारक का किसी भुगतान में डिफाल्टर नहीं होना जरूरी होगा। इस व्यवस्था से नीलामी में शामिल होने वाले लोगों और कंपनियों की रकम लंबे समय तक विभाग के पास अटके रहने की समस्या कम हो सकती है। पट्टा क्षेत्र से दो किलोमीटर के दायरे में क्रशर की अनुमति खनन कारोबार से जुड़े लोगों के लिए क्रशर स्थापना के नियमों में भी महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। अब पट्टाधारक अपने खनिज पट्टा क्षेत्र की सीमा से अधिकतम दो किलोमीटर की परिधि में मोबाइल क्रशर समेत क्रशर स्थापित कर सकेंगे। हालांकि इसके लिए विभाग द्वारा निर्धारित नियमों और शर्तों का पालन करना अनिवार्य होगा। इस बदलाव से खनन स्थल से निकाले गए पत्थरों को प्रसंस्करण के लिए दूर ले जाने की जरूरत कम हो सकती है। इससे परिवहन लागत और समय दोनों में कमी आने की संभावना है। निर्माण स्थल से 500 मीटर के भीतर भी क्रशर लगाया जा सकेगा निर्माण परियोजनाओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने एक और प्रावधान किया है। अब निर्माण कार्य से सीधे जुड़े संवेदक को निर्माण स्थल से 500 मीटर की परिधि में क्रशर स्थापित करने की अनुमति मिल सकती है। इसके लिए संबंधित कार्य विभाग की अनुशंसा जरूरी होगी। यानी निर्माण परियोजना से जुड़े ठेकेदार को निर्धारित प्रक्रिया पूरी करने और विभागीय शर्तों का पालन करने के बाद निर्माण स्थल के नजदीक क्रशर लगाने का विकल्प मिलेगा। अवैध खनन पर लगाम लगाने की कोशिश बिहार में बालू और पत्थर का खनन लंबे समय से सरकार और प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। अवैध खनन, खनिजों के अवैध परिवहन और भंडारण को लेकर समय-समय पर कार्रवाई होती रही है। ऐसे में खनिज पट्टों की अधिकतम सीमा तय करने के साथ नीलामी, भुगतान और क्रशर स्थापना के नियमों में बदलाव को खनन व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि नियमों में बदलाव के बाद इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन प्रावधानों को जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है। खासकर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 200 हेक्टेयर की सीमा वास्तव में पट्टों के केंद्रीकरण को कितना कम करती है और अवैध खनन पर इसका कितना असर पड़ता है। कारोबार और सरकार दोनों के लिए अहम बदलाव बिहार सरकार का यह संशोधन खनिज पट्टों की बंदोबस्ती से लेकर नीलामी, भुगतान और खनन के बाद पत्थर के प्रसंस्करण तक कई स्तरों पर असर डाल सकता है। खनन कारोबारियों के लिए जहां 200 हेक्टेयर की अधिकतम सीमा सबसे बड़ा बदलाव है, वहीं क्रशर स्थापना और नीलामी राशि से जुड़े नए प्रावधान भी महत्वपूर्ण हैं। अब निगाह इस बात पर होगी कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद खनिज पट्टों की बंदोबस्ती कितनी पारदर्शी होती है, छोटे और नए कारोबारियों को कितना अवसर मिलता है और अवैध खनन पर सरकार की कार्रवाई कितनी प्रभावी साबित होती है।
पटना, एजेंसियां। बिहार सरकार ने राज्य में बालू घाटों के संचालन और खनन व्यवस्था को और पारदर्शी बनाने के लिए सख्त कदम उठाया है। नई व्यवस्था के तहत अब यदि किसी घाट से तय सीमा से अधिक बालू का खनन किया जाता है, तो संबंधित बंदोबस्तधारी को अतिरिक्त स्वामित्व राशि सरकार को जमा करनी होगी। इस कदम का उद्देश्य खनन गतिविधियों पर नियंत्रण बढ़ाना और राजस्व नुकसान को रोकना है। वार्षिक आधार पर होगी खनन की गणना नई नीति के अनुसार बालू घाटों से निकाले गए खनिज की वार्षिक आधार पर गणना की जाएगी। यदि किसी घाट से निकाले गए बालू की मात्रा, बंदोबस्ती के समय तय राशि से अधिक पाई जाती है, तो उस अंतर की राशि को अतिरिक्त रूप से वसूला जाएगा। इससे खनन की वास्तविक मात्रा का सटीक आकलन संभव होगा और सरकारी राजस्व में पारदर्शिता आएगी। 2026 संशोधित नियमावली लागू राज्य सरकार ने बिहार खनिज (समानुदान, अवैध खनन, परिवहन एवं भंडारण निवारण) (संशोधन) नियमावली, 2026 को लागू कर दिया है, जो 6 मई 2026 से प्रभावी है। इस नियमावली में बालू घाटों के संचालन, सुरक्षा जमा राशि और स्वामित्व दरों में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। सरकार का मानना है कि ये संशोधन खनन क्षेत्र में जवाबदेही और नियंत्रण को मजबूत करेंगे। अवैध खनन पर रोक लगाने की कोशिश खनन विभाग का कहना है कि इस नई व्यवस्था से अवैध खनन और कम स्वामित्व राशि जमा करने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। इससे न केवल सरकारी राजस्व में वृद्धि होगी बल्कि खनन गतिविधियों की निगरानी भी अधिक प्रभावी हो सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बालू कारोबार में अनुशासन और पारदर्शिता लाने में मदद करेगा। जिलाधिकारियों को दिए गए निर्देश खनन विभाग ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश जारी किया है कि वे अपने-अपने जिलों में अतिरिक्त स्वामित्व राशि की गणना शीघ्र पूरी करें। जहां भी अतिरिक्त राशि पाई जाएगी, वहां संबंधित बंदोबस्तधारियों से वसूली कर उसे सरकारी खनन मद में जमा कराया जाएगा। इसकी निगरानी मुख्यालय स्तर से भी की जाएगी। राजस्व बढ़ने की उम्मीद सरकार को उम्मीद है कि इस नई व्यवस्था से राज्य के राजस्व संग्रह में वृद्धि होगी और बालू घाटों के संचालन में पारदर्शिता आएगी। साथ ही, खनन गतिविधियों पर निगरानी और नियंत्रण पहले से अधिक मजबूत होगा, जिससे पूरे सिस्टम में सुधार देखने को मिलेगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।