गांधीनगर, एजेंसियां। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम का ऐलान कर दिया है। गुजरात से रोहन गुप्ता और जगदीश ईश्वरभाई पटेल को राष्ट्रीय टीम में शामिल करते हुए राष्ट्रीय मंत्री की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं गुजरात के ही सांसद डॉ. हेमांग जोशी को भाजपा युवा मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है। रोहन गुप्ता को मिली राष्ट्रीय जिम्मेदारी रोहन गुप्ता पहले कांग्रेस से जुड़े रहे हैं और कांग्रेस के आईटी सेल के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामा था। अब बीजेपी की राष्ट्रीय टीम में उन्हें राष्ट्रीय मंत्री की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी में उनके संगठनात्मक और डिजिटल अनुभव को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जगदीश पटेल की भी राष्ट्रीय टीम में एंट्री अमराईवाड़ी से पूर्व विधायक जगदीश ईश्वरभाई पटेल को भी बीजेपी ने राष्ट्रीय मंत्री बनाया है। उन्हें गुजरात में संगठन के स्तर पर सक्रिय और जमीनी पकड़ रखने वाले नेताओं में माना जाता है। राष्ट्रीय टीम में शामिल किए जाने के साथ अब उनकी भूमिका गुजरात से आगे राष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ेगी। गुजरात से चार नेताओं को मिली जगह बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम में गुजरात से कुल चार नेताओं को जगह मिली है। इनमें रोहन गुप्ता और जगदीश पटेल के अलावा वर्षाबेन दोशी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डॉ. हेमांग जोशी को युवा मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है। पार्टी की नई टीम को आगामी चुनावों और संगठन को मजबूत करने की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। गुजरात से चार नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने के बाद प्रदेश बीजेपी में भी इसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। खासकर रोहन गुप्ता और जगदीश पटेल की नियुक्ति से गुजरात बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन में प्रतिनिधित्व को और मजबूती मिली है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा कर दी है। नई टीम को संगठनात्मक संतुलन और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर तैयार किए जाने की बात कही जा रही है, लेकिन बिहार को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। बिहार से इस बार केवल तीन नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में जगह मिली है। हालांकि, इनमें से किसी को भी राष्ट्रीय महामंत्री या राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे शीर्ष पद की जिम्मेदारी नहीं मिली। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या बिहार को राष्ट्रीय संगठन में अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिला? बिहार से सिर्फ तीन नेताओं को जिम्मेदारी नई टीम में बिहार से वैश्य समुदाय से आने वाले सिद्धार्थ शंभू को राष्ट्रीय मंत्री बनाया गया है। वहीं ऋतुराज सिन्हा को प्रकोष्ठ संकुल का सह संयोजक और शिवेश राम को अनुसूचित जाति मोर्चा का अध्यक्ष बनाया गया है। पार्टी संगठन में ये महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं, लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा इस बात को लेकर है कि बिहार से किसी नेता को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष या राष्ट्रीय महामंत्री का पद क्यों नहीं दिया गया। बिहार से लंबे समय से केंद्रीय संगठन में कई नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलती रही हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद भी भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री रह चुके हैं। इसके बाद लंबे समय से बिहार के किसी नेता को इस स्तर की जिम्मेदारी नहीं मिली है। बांकीपुर चुनाव का ‘इफेक्ट’ होने की चर्चा नई टीम को लेकर राजनीतिक विश्लेषण का एक हिस्सा इसे हालिया बांकीपुर चुनाव के परिणामों से जोड़कर देख रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बांकीपुर में प्रशांत किशोर के जनसुराज को कुछ सवर्ण समुदायों के मतदाताओं का समर्थन मिलने की चर्चा भाजपा के भीतर भी हुई। हालांकि, यह कहना कि नई राष्ट्रीय टीम में किसी विशेष समुदाय को जगह नहीं मिलने का सीधा कारण चुनावी मतदान रहा, फिलहाल राजनीतिक आकलन और चर्चा के दायरे में है। भाजपा की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है जिसमें नई टीम के गठन को किसी खास चुनावी समूह के खिलाफ कार्रवाई से जोड़ा गया हो। बिहार के भूमिहार, राजपूत और ब्राह्मण प्रतिनिधित्व पर चर्चा नई टीम में बिहार से भूमिहार, राजपूत और ब्राह्मण समुदाय के नेताओं को शीर्ष राष्ट्रीय पद नहीं मिलने को लेकर भी राजनीतिक चर्चा शुरू हुई है। बिहार की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। भाजपा के लिए भी राज्य में अलग-अलग सामाजिक समूहों का समर्थन चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय संगठन में बिहार के प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी के अंदर अलग-अलग तरह के आकलन सामने आना स्वाभाविक है। लेकिन इसे सीधे तौर पर किसी समुदाय के खिलाफ राजनीतिक फैसला मानने से पहले पार्टी की आधिकारिक रणनीति और आने वाले समय में संगठनात्मक नियुक्तियों को देखना जरूरी होगा। पहले बिहार के कई नेताओं को मिली बड़ी जिम्मेदारियां बिहार से भाजपा के कई वरिष्ठ नेता राष्ट्रीय संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। दिवंगत कैलाशपति मिश्र लंबे समय तक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे। पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और राधामोहन सिंह भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। रविशंकर प्रसाद राष्ट्रीय महामंत्री रह चुके हैं। इसके अलावा रजनीश कुमार और ऋतुराज सिन्हा जैसे नेताओं को राष्ट्रीय मंत्री के स्तर पर संगठन में जिम्मेदारी मिली। रेणु देवी भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा चुकी हैं। इन नियुक्तियों के कारण बिहार की नई टीम में अपेक्षाकृत सीमित और छोटे पदों पर मौजूदगी को लेकर पार्टी के भीतर चर्चा होना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। क्या बिहार को राष्ट्रीय संगठन में और जगह मिलेगी? नितिन नवीन की नई टीम में बिहार से तीन नेताओं की मौजूदगी जरूर है, लेकिन राष्ट्रीय महामंत्री और उपाध्यक्ष जैसे बड़े पदों पर प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से पार्टी के प्रदेश नेताओं और समर्थकों के बीच सवाल उठ रहे हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले समय में संगठन में कोई अतिरिक्त नियुक्ति होती है या बिहार के नेताओं को दूसरी जिम्मेदारियों के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका दी जाती है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने सोमवार को अपनी नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा कर दी। नई टीम में अनुभवी नेताओं के साथ कई प्रमुख चेहरों को अहम जिम्मेदारियां दी गई हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और विनोद तावड़े को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है, जबकि पीयूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। 13 नेताओं को बनाया गया राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बीजेपी की नई टीम में कुल 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए हैं। इनमें वसुंधरा राजे सिंधिया, तीरथ सिंह रावत, राम माधव, बैजयंत जय पांडा, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वर्षाबेन नरेंद्रभाई दोशी, भारती प्रवीण पवार, मनप्रीत सिंह बादल, लाल सिंह आर्य, एम. नागराजा, तारिक मंसूर और मधुचंद्र कर शामिल हैं। स्मृति ईरानी समेत 8 नेता बने महासचिव नई राष्ट्रीय टीम में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। उनके अलावा बिप्लब देब, सुनील बंसल, विनोद तावड़े, सतीश पूनिया, गजेंद्र पटेल, हरीश द्विवेदी और संजय भाटिया को राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया गया है। वहीं बीएल संतोष राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) के पद पर बने रहेंगे। शिवप्रकाश और सौदान सिंह को भी अहम जिम्मेदारी बीजेपी ने शिवप्रकाश और सौदान सिंह को राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव (संगठन) नियुक्त किया है। पार्टी के नए संगठनात्मक ढांचे में इन नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पीयूष गोयल होंगे राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को पार्टी का नया राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया गया है। नितिन नवीन की नई टीम के ऐलान के साथ बीजेपी के संगठनात्मक ढांचे में लंबे समय से चल रही बदलाव की प्रक्रिया अब पूरी हो गई है। नई टीम में अनुभव और अलग-अलग राज्यों के नेताओं को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश दिखाई दे रही है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय जनता पार्टी सोमवार, 17 अगस्त को अपनी नई राष्ट्रीय टीम का ऐलान कर सकती है। पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन के नेतृत्व में होने वाले इस संगठनात्मक बदलाव में अनुभवी नेताओं के साथ युवा चेहरों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलने की संभावना जताई जा रही है। युवा नेताओं को आगे लाने की तैयारी सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी का फोकस संगठन में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने पर है। इसे युवा और खासकर Gen Z तक पार्टी की पहुंच मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। जनवरी 2026 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने वाले नितिन नबीन नई टीम में कई बदलाव कर सकते हैं। कई वरिष्ठ नेताओं को संगठन में मिल सकती है जिम्मेदारी सूत्रों के अनुसार, कुछ वरिष्ठ नेताओं को केंद्रीय मंत्रिपरिषद से हटाकर संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है। ऐसे में बीजेपी की राष्ट्रीय टीम में बदलाव के बाद केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में भी फेरबदल की संभावना बढ़ गई है। संगठन में अनुभव और युवा चेहरों का संतुलन बीजेपी के मौजूदा संगठनात्मक ढांचे में वरिष्ठ नेताओं के साथ अनुभवी संगठनकर्ताओं की अहम भूमिका है। पार्टी के संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति में भी वरिष्ठ नेताओं के साथ राज्यों के प्रमुख नेताओं को जगह मिली हुई है। नई टीम में युवा चेहरों को शामिल कर पार्टी संगठन को नई दिशा देने की कोशिश कर सकती है। मंत्रिमंडल में भी बदलाव की अटकलें बीजेपी संगठन में संभावित बड़े फेरबदल के बीच मोदी मंत्रिमंडल में बदलाव की अटकलें भी तेज हो गई हैं। हालांकि, अभी तक पार्टी या सरकार की ओर से किसी मंत्री को हटाने या नए मंत्रियों को शामिल करने को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। अंतिम तस्वीर नई राष्ट्रीय टीम के ऐलान के बाद ही साफ होगी।
नई दिल्ली: बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और राष्ट्रीय प्रवक्ता के पद से इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया है। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन को पत्र लिखकर अपना इस्तीफा स्वीकार करने की अपील की है। पूनावाला के इस्तीफे के बाद बीजेपी की आंतरिक राजनीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। पूनावाला के मुताबिक, उन्होंने इससे पहले 30 जुलाई 2026 को आर्थिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों का हवाला देते हुए पार्टी के सभी पदों और प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफे की पेशकश की थी। उस समय पार्टी ने उनका इस्तीफा तुरंत स्वीकार नहीं किया था और उन्हें अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए कहा था। लंबी चर्चा के बाद लिया अंतिम फैसला अपने ताजा पत्र में शहजाद पूनावाला ने कहा कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ विचार-विमर्श और गंभीर मंथन के बाद उन्होंने अपने फैसले पर कायम रहने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में हुई घटनाओं और जिन लोगों के बारे में उन्होंने पार्टी नेतृत्व को जानकारी दी थी, उसके बाद उन्होंने इस्तीफा देने का अंतिम फैसला किया। इस तरह पूनावाला अब बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता के पद के साथ-साथ सक्रिय प्राथमिक सदस्यता से भी अलग होने की प्रक्रिया में हैं। पीएम मोदी समेत वरिष्ठ नेताओं का जताया आभार इस्तीफे के पत्र में पूनावाला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और संगठन महामंत्री बीएल संतोष के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ नेताओं के प्रति उनके मन में किसी तरह की नाराजगी या आहत भावना नहीं है। पिछले पांच वर्षों में पार्टी की ओर से मिले मंच और अवसरों के लिए उन्होंने नेतृत्व का धन्यवाद किया। निजी क्षेत्र में जाने की तैयारी पूनावाला ने अपने इस्तीफे की वजह मुख्य रूप से आर्थिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों को बताया है। उन्होंने कहा कि अब वह निजी क्षेत्र में प्रवेश करेंगे। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बीजेपी से संगठनात्मक रूप से अलग होने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के दृष्टिकोण तथा कार्यों का समर्थन करते रहेंगे। ‘व्यवस्था छोड़ रहा हूं, विचार और व्यक्ति नहीं’ शहजाद पूनावाला के इस्तीफे की सबसे अहम बात उनका यह बयान रहा कि वह “पार्टी की व्यवस्था छोड़ रहे हैं, लेकिन विचार और व्यक्ति नहीं।” इस बयान से साफ है कि पूनावाला ने संगठन से अलग होने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी की विचारधारा के प्रति अपना समर्थन बरकरार रखने की बात कही है। अब देखना होगा कि बीजेपी नेतृत्व उनके इस्तीफे को किस तरह स्वीकार करता है और आगे पार्टी में उनकी भूमिका क्या रहती है।
तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष K. Annamalai के राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलों का दौर तेज हो गया है। राज्य की राजनीति में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या अन्नामलाई भाजपा में बने रहेंगे या कोई नया राजनीतिक रास्ता चुनेंगे। इन अटकलों के बीच वह सोमवार को दिल्ली पहुंचे, जहां उनकी मंगलवार को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष Nitin Nabin से मुलाकात होनी है। सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में पार्टी में उनकी भविष्य की भूमिका और तमिलनाडु की राजनीतिक रणनीति पर चर्चा हो सकती है। भाजपा की ओर से अब तक किसी बड़े बदलाव की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। कोयंबटूर में लगे पोस्टरों ने बढ़ाई सियासी हलचल अन्नामलाई के जन्मदिन से पहले कोयंबटूर में उनके समर्थकों द्वारा लगाए गए पोस्टरों ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी है। पोस्टरों पर "हमारे नेता, आइए और हमारा नेतृत्व कीजिए" जैसे संदेश लिखे गए हैं, जिसके बाद उनके नए राजनीतिक मंच बनाने की संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई। इन पोस्टरों को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, अन्नामलाई ने अभी तक इस पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की है। 'दो दिन इंतजार कीजिए', अन्नामलाई का संकेत दिल्ली रवाना होने से पहले अन्नामलाई ने मीडिया के सवालों पर कहा कि लोग दो दिन इंतजार करें। उन्होंने कहा कि जल्द ही वह अपनी स्थिति और आगे की योजना पर खुलकर बात करेंगे। उनके इस बयान ने राजनीतिक अटकलों को और तेज कर दिया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में तमिलनाडु की राजनीति में कोई बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल सकता है। आईपीएस अधिकारी से भाजपा के प्रमुख चेहरे तक का सफर पूर्व आईपीएस अधिकारी अन्नामलाई वर्ष 2020 में भाजपा में शामिल हुए थे। इसके बाद उन्होंने तेजी से पार्टी में अपनी पहचान बनाई और 2021 से 2025 तक तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई राज्यव्यापी अभियानों का नेतृत्व किया और युवाओं के बीच मजबूत समर्थन आधार तैयार किया। सोशल मीडिया पर भी उनकी बड़ी लोकप्रियता रही है। त्रिभाषा नीति पर रुख से बढ़ीं चर्चाएं हाल के दिनों में अन्नामलाई ने कक्षा 9 के छात्रों के लिए लागू की जा रही त्रिभाषा नीति को लेकर अपनी असहमति जताई थी और अधिसूचना वापस लेने की मांग की थी। उनके इस रुख के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या वह पार्टी नेतृत्व से कुछ मुद्दों पर अलग राय रखते हैं। भाजपा नेताओं ने किसी भी तरह के मतभेद की अटकलों को खारिज किया है। नई पार्टी या भाजपा में बड़ी जिम्मेदारी? राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस बात को लेकर अलग-अलग राय है। कुछ का मानना है कि अन्नामलाई भाजपा में ही अधिक महत्वपूर्ण भूमिका की तलाश कर रहे हैं, जबकि कुछ पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि वह भविष्य में अलग राजनीतिक मंच तैयार कर सकते हैं। भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अन्नामलाई पार्टी के महत्वपूर्ण नेताओं में शामिल हैं और उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। पार्टी नेतृत्व भी किसी संभावित अलगाव की संभावना से इनकार कर रहा है। बैठक पर टिकीं राजनीतिक निगाहें फिलहाल तमिलनाडु की राजनीति की नजरें अन्नामलाई और नितिन नवीन की बैठक पर टिकी हुई हैं। इस मुलाकात के बाद ही साफ हो सकेगा कि अन्नामलाई भाजपा के साथ अपनी राजनीतिक यात्रा जारी रखेंगे या कोई नया राजनीतिक कदम उठाएंगे।
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष Nitin Nabin ने अपने पहले टीवी इंटरव्यू में विपक्ष पर जोरदार हमला बोला है। एबीपी न्यूज को दिए इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रमुख Akhilesh Yadav, कांग्रेस नेता Rahul Gandhi और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee को निशाने पर लिया। उनके बयानों ने एक बार फिर राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। अखिलेश यादव पर ‘टोपी’ वाला तंज इंटरव्यू के दौरान जब उनसे उत्तर प्रदेश की राजनीति और समाजवादी पार्टी के प्रदर्शन पर सवाल पूछा गया, तो नितिन नवीन ने सीधे तौर पर अखिलेश यादव की राजनीतिक शैली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा: “आजकल अखिलेश यादव ने टोपी पहनना थोड़ा कम कर दिया है” “पहले ये लोग हर जगह टोपी पहनकर जाते थे” यह बयान केवल एक प्रतीकात्मक टिप्पणी नहीं, बल्कि विपक्ष की कथित “पहचान आधारित राजनीति” पर निशाना माना जा रहा है। उन्होंने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) जैसे नारों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इससे उनकी सोच और राजनीति का अंदाजा लगाया जा सकता है। ‘टोपी’ और वोट बैंक की राजनीति पर जवाब जब इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि क्या बीजेपी “टोपी पहनने वालों” को पसंद नहीं करती, तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा: “हमें टोपी से कोई दिक्कत नहीं है, हमें ढोंग से दिक्कत है” “जो लोग केवल दिखावे के लिए पहचान का इस्तेमाल करते हैं, उनसे समस्या है” उन्होंने आगे यह भी कहा कि: तीन तलाक कानून के बाद बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं ने बीजेपी को समर्थन दिया इससे यह साबित होता है कि बीजेपी का समर्थन किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है राहुल गांधी पर भी साधा निशाना नितिन नवीन ने Rahul Gandhi और अखिलेश यादव के पुराने राजनीतिक समीकरणों का जिक्र करते हुए कहा कि: दोनों नेताओं ने पहले कई संयुक्त रैलियां और अभियान चलाए लेकिन इन अभियानों का जनता पर कोई ठोस असर नहीं पड़ा उन्होंने कहा कि केवल रैलियां और जुलूस निकालने से जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता। ममता बनर्जी पर गंभीर आरोप पश्चिम बंगाल की राजनीति पर बोलते हुए नितिन नवीन ने Mamata Banerjee सरकार पर तीखा हमला किया। उन्होंने आरोप लगाया कि: राज्य में अवैध घुसपैठ एक बड़ी समस्या बन चुकी है “बांग्लादेशी घुसपैठिए” भारत में आकर बस गए हैं इन लोगों को चिन्हित कर वापस भेजने (डिपोर्ट) की जरूरत है यह बयान ऐसे समय में आया है जब बंगाल में चुनावी माहौल अपने चरम पर है और सुरक्षा तथा पहचान के मुद्दे प्रमुख बने हुए हैं। चुनावी रणनीति या राजनीतिक हमला? विश्लेषकों का मानना है कि नितिन नवीन के ये बयान: सीधे तौर पर विपक्ष की सामाजिक और राजनीतिक रणनीति पर हमला हैं चुनावी माहौल को प्रभावित करने की कोशिश भी माने जा सकते हैं “टोपी” जैसे प्रतीकों पर टिप्पणी अक्सर संवेदनशील मानी जाती है, क्योंकि यह पहचान और समुदाय से जुड़े मुद्दों को छूती है। क्या हो सकता है राजनीतिक असर? इस बयान के बाद: समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल पलटवार कर सकते हैं मुद्दा चुनावी सभाओं और मीडिया बहस का केंद्र बन सकता है
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ईस्टर के मौके पर केरल के ईसाई समुदाय से भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का समर्थन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि केरल में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार बने, जो राज्य के भविष्य को नई दिशा दे सके। “यह चुनाव सिर्फ सरकार बदलने का नहीं, भविष्य सुधारने का है” कुन्नाथुनाडु में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि केरल के विकास और बेहतर भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे राजग के साथ खड़े होकर एक “समृद्ध केरल” के निर्माण में योगदान दें। ईसाई समुदाय को दी ईस्टर की शुभकामनाएं अमित शाह ने ईस्टर के अवसर पर ईसाई समुदाय को बधाई देते हुए कहा, “मैं अपने ईसाई भाइयों और बहनों से अपील करता हूं कि वे राजग का समर्थन करें और केरल में विकास की नई शुरुआत करें।” वोट शेयर बढ़ने का किया दावा शाह ने कहा कि 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से केरल में भाजपा-राजग का वोट शेयर लगातार बढ़ा है, जो इस बात का संकेत है कि जनता बदलाव चाहती है। विजयन सरकार पर साधा निशाना केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन पर निशाना साधते हुए शाह ने कहा कि राज्य सरकार केंद्र की योजनाओं के नाम बदलकर उनका श्रेय लेने की कोशिश करती है। उन्होंने इसे “नाम बदलने का नया स्टार्टअप” करार दिया। कोझिकोड में भव्य रोड शो अमित शाह ने कोझिकोड में रोड शो भी किया, जहां बड़ी संख्या में भाजपा समर्थक मौजूद रहे। फूलों से सजे वाहन पर सवार शाह का लोगों ने जोरदार स्वागत किया और उन्होंने भी जनता का अभिवादन स्वीकार किया। पुडुचेरी में भी NDA के समर्थन का दावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने पुडुचेरी में रोड शो के दौरान कहा कि आगामी चुनावों में राजग के पक्ष में जबरदस्त समर्थन देखने को मिल रहा है। उन्होंने दावा किया कि जनता विकास के रास्ते को चुन रही है। निमोम सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला केरल की निमोम विधानसभा सीट पर इस बार दिलचस्प त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा। यहां एलडीएफ, यूडीएफ और भाजपा-नीत एनडीए के बीच कड़ी टक्कर है। माकपा नेता और शिक्षा मंत्री वी. शिवांकुट्टी इस सीट को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भाजपा की ओर से राजीव चंद्रशेखर उन्हें कड़ी चुनौती दे रहे हैं। यह सीट भाजपा के लिए खास मानी जाती है क्योंकि 2016 में यहीं से पार्टी ने केरल विधानसभा में पहली बार जीत दर्ज की थी। चुनावी माहौल गरम 9 अप्रैल को होने वाले केरल विधानसभा चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दल पूरी ताकत झोंक रहे हैं। ऐसे में अमित शाह की यह अपील चुनावी समीकरणों पर असर डाल सकती है।
16 मार्च को मतदान और उसी दिन आएंगे नतीजे बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए इस बार मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है। चुनाव के लिए 16 मार्च को मतदान होगा और उसी दिन मतगणना के बाद परिणाम भी घोषित कर दिए जाएंगे। इस बार कुल छह उम्मीदवार मैदान में हैं, जिससे करीब 12 साल बाद बिहार में राज्यसभा चुनाव में वोटिंग की स्थिति बनी है। आमतौर पर ये चुनाव निर्विरोध हो जाते थे, लेकिन इस बार सियासी समीकरणों ने मुकाबले को रोचक बना दिया है। 12 साल बाद बना मुकाबले का माहौल राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस बार का चुनाव कई मायनों में खास है। बिहार में आखिरी बार 2014 में राज्यसभा सीटों के लिए वोटिंग हुई थी, जब Pavan Varma और Ghulam Rasool Balyawi को कड़ी टक्कर के बाद जीत मिली थी। उस समय निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी चुनाव को रोचक बना दिया था। वहीं एक सीट पर Sharad Yadav निर्विरोध निर्वाचित हुए थे। अब एक दशक से ज्यादा समय बाद फिर से मुकाबले की स्थिति बनती दिख रही है। चार सीटों पर स्थिति साफ, पांचवीं पर सस्पेंस बिहार विधानसभा में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए एनडीए की चार सीटों पर जीत लगभग तय मानी जा रही है। लेकिन पांचवीं सीट पर सियासी गणित उलझा हुआ है। चार सीटों के बाद एनडीए के पास करीब 38 वोट अतिरिक्त रह सकते हैं, जबकि राजद के पास लगभग 35 वोट हैं। ऐसे में छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों के वोट निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। विशेष रूप से एआईएमआईएम के पांच विधायक और बसपा का एक विधायक इस चुनाव में किंगमेकर साबित हो सकते हैं। अगर कहीं क्रॉस वोटिंग हुई तो परिणाम पूरी तरह बदल सकता है। मैदान में कौन-कौन उम्मीदवार इस बार राज्यसभा की पांच सीटों के लिए कुल छह उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। Ram Nath Thakur – जदयू Nitin Nabin – भाजपा Shivesh Ram – भाजपा Amarendra Dhari Singh – राजद जदयू का एक और उम्मीदवार एक अन्य प्रत्याशी संख्याबल को देखते हुए राजद ने इस बार सिर्फ एक ही उम्मीदवार मैदान में उतारा है। अनंत सिंह को वोट देने की अनुमति इस चुनाव से जुड़ा एक अहम घटनाक्रम भी सामने आया है। Anant Singh, जो फिलहाल Beur Central Jail में बंद हैं, उन्हें अदालत ने मतदान की अनुमति दे दी है। Mokama से विधायक अनंत सिंह को दुलारचंद हत्याकांड में न्यायिक हिरासत में रहने के बावजूद 16 मार्च को विधानसभा जाकर वोट डालने की इजाजत मिली है। पांचवीं सीट पर टिकी सबकी नजर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार का राज्यसभा चुनाव खासतौर पर पांचवीं सीट को लेकर बेहद रोमांचक हो सकता है। छोटे दलों के वोट और संभावित क्रॉस वोटिंग चुनाव का रुख बदल सकती है। अब सबकी निगाहें 16 मार्च पर टिकी हैं, जब मतदान के बाद साफ होगा कि बिहार की राजनीति में इस बार कौन बाजी मारता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।