उत्तर कोरिया पर ड्रोन ऑपरेशन से जुड़ा मामला, सत्ता से हटाए जा चुके हैं यून दक्षिण कोरिया की एक अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति Yoon Suk Yeol को बड़ा झटका देते हुए 30 साल की जेल की सजा सुनाई है। अदालत ने उन्हें उत्तर कोरिया के ऊपर सैन्य ड्रोन भेजने की साजिश और सत्ता के दुरुपयोग का दोषी पाया है। यह मामला अक्टूबर 2024 में प्योंगयांग के ऊपर कथित ड्रोन घुसपैठ से जुड़ा हुआ है। अदालत ने क्या कहा? Seoul Central District Court ने अपने फैसले में कहा कि यून शुरू से ही उस ड्रोन ऑपरेशन की योजना में शामिल थे, जिसके तहत उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग के ऊपर सैन्य ड्रोन भेजे गए थे। अदालत के अनुसार यह कार्रवाई बाद में दिसंबर 2024 में मार्शल लॉ लागू करने के लिए माहौल बनाने की कोशिश का हिस्सा थी। अदालत ने यून को "दुश्मन की सहायता करने" और "सत्ता के दुरुपयोग" का दोषी ठहराया। पहले भी मिल चुकी है उम्रकैद यह फैसला यून के खिलाफ आया दूसरा बड़ा न्यायिक झटका है। इससे पहले फरवरी 2026 में उन्हें मार्शल लॉ लागू करने की कोशिश से जुड़े विद्रोह (Insurrection) मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है। यून को पिछले वर्ष संवैधानिक अदालत द्वारा महाभियोग को बरकरार रखने के बाद राष्ट्रपति पद से हटा दिया गया था। इसके बाद हुए विशेष चुनाव में Lee Jae Myung ने जीत हासिल कर देश की सत्ता संभाली। यून ने आरोपों से किया इनकार पूर्व राष्ट्रपति यून ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया है। उनके वकीलों का कहना है कि उन्होंने न तो ड्रोन मिशन का आदेश दिया और न ही उसे मंजूरी दी। बचाव पक्ष के अनुसार यह अभियान उत्तर कोरिया द्वारा दक्षिण कोरिया की सीमा में कचरे से भरे गुब्बारे भेजने की घटनाओं के जवाब में किया गया था और इसका मार्शल लॉ से कोई संबंध नहीं था। अपील का रास्ता खुला अभियोजन पक्ष ने अप्रैल में यून के लिए 30 साल की सजा की मांग की थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। हालांकि यून अभी भी इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे सकते हैं। वह पहले से सुनाई गई उम्रकैद की सजा के खिलाफ भी अपील कर चुके हैं। दक्षिण कोरिया की राजनीति में बढ़ी हलचल पूर्व राष्ट्रपति के खिलाफ लगातार आ रहे फैसलों ने दक्षिण कोरिया की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला देश के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक और संवैधानिक संकटों में से एक माना जाएगा।
चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping सात वर्षों बाद उत्तर कोरिया की यात्रा पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात उत्तर कोरियाई नेता Kim Jong Un से होगी। यह दौरा केवल औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात नहीं माना जा रहा, बल्कि पूर्वी एशिया में बदलते शक्ति संतुलन के बीच चीन की नई रणनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत भी माना जा रहा है। रूस-उत्तर कोरिया की बढ़ती नजदीकियों से चिंतित है बीजिंग विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में रूस और उत्तर कोरिया के संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं। विशेष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच रक्षा, आर्थिक और राजनीतिक सहयोग बढ़ा है। इससे उत्तर कोरिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नया समर्थन मिला है। चीन नहीं चाहता कि उसका पारंपरिक सहयोगी पूरी तरह रूस के प्रभाव क्षेत्र में चला जाए। इसी कारण बीजिंग अब प्योंगयांग के साथ अपने संबंधों को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। 2019 के बाद पहली बार आमने-सामने होंगे दोनों नेता शी जिनपिंग आखिरी बार 2019 में उत्तर कोरिया गए थे। उस समय अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच परमाणु निरस्त्रीकरण वार्ता विफल होने के बाद चीन और उत्तर कोरिया के संबंध काफी मजबूत दिखाई दिए थे। बाद के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ दूरी देखने को मिली। ऐसे में सात साल बाद हो रही यह यात्रा दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कूटनीतिक तौर पर किम जोंग उन के लिए बड़ी उपलब्धि हाल के महीनों में चीन और उत्तर कोरिया के रिश्तों में तनाव की चर्चाएं भी सामने आई थीं। कुछ महत्वपूर्ण सरकारी आयोजनों में चीनी प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति ने इन अटकलों को और बढ़ाया था। ऐसे माहौल में चीन के राष्ट्रपति का प्योंगयांग पहुंचना उत्तर कोरिया के लिए एक बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है। इससे किम जोंग उन की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को भी मजबूती मिल सकती है। सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता भी अहम मुद्दा चीन और उत्तर कोरिया के बीच करीब 1,400 किलोमीटर लंबी सीमा है। बीजिंग के लिए यह सीमा रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। चीन चाहता है कि उसके पड़ोस में किसी प्रकार की राजनीतिक अस्थिरता या सैन्य संकट पैदा न हो। इसके अलावा उत्तर कोरिया अपनी नई विकास योजनाओं के तहत पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। चीन की कंपनियां और निवेशक भी इसमें अवसर तलाश रहे हैं। परमाणु कार्यक्रम पर भी हो सकती है चर्चा उत्तर कोरिया का परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है। चीन लगातार कोरियाई प्रायद्वीप में स्थिरता और संवाद की वकालत करता रहा है। वहीं उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम को राष्ट्रीय सुरक्षा का अनिवार्य हिस्सा बताता है। माना जा रहा है कि शी जिनपिंग इस यात्रा के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और परमाणु मुद्दों पर भी चर्चा कर सकते हैं। चीन का बड़ा लक्ष्य: प्योंगयांग पर प्रभाव बनाए रखना विश्लेषकों के अनुसार इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य उत्तर कोरिया पर चीन का राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव बनाए रखना है। रूस के बढ़ते प्रभाव के बीच बीजिंग यह संदेश देना चाहता है कि पूर्वी एशिया की सुरक्षा और क्षेत्रीय राजनीति में उसकी भूमिका अब भी केंद्रीय बनी हुई है। शी जिनपिंग और किम जोंग उन की यह मुलाकात केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि यह रूस, अमेरिका और पूरे पूर्वी एशिया की भू-राजनीति पर भी असर डाल सकती है।
चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping अगले सप्ताह उत्तर कोरिया की राजधानी Pyongyang का दौरा करेंगे। सात वर्षों बाद होने जा रही यह यात्रा चीन और उत्तर कोरिया के संबंधों के लिए अहम मानी जा रही है। चीनी सरकारी मीडिया के अनुसार, शी जिनपिंग 8 और 9 जून को उत्तर कोरिया के नेता Kim Jong Un के निमंत्रण पर राजकीय यात्रा पर रहेंगे। इस दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। परमाणु कार्यक्रम पर हो सकती है अहम बातचीत इस दौरे की घोषणा ऐसे समय हुई है जब उत्तर कोरिया ने हाल ही में एक नई सुविधा का खुलासा किया है, जिसे परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़ा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्योंगयांग के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और पूर्वी एशिया की रणनीतिक स्थिति पर दोनों नेताओं के बीच विस्तृत चर्चा हो सकती है। उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षणों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहले से चिंता जताता रहा है। रूस-उत्तर कोरिया की बढ़ती नजदीकियां भी चर्चा में हाल के वर्षों में उत्तर कोरिया और रूस के बीच संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं। रक्षा सहयोग, सैन्य संपर्क और विभिन्न रणनीतिक समझौतों ने दोनों देशों को और करीब लाया है। विश्लेषकों का मानना है कि चीन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उत्तर कोरिया पर उसका पारंपरिक प्रभाव बरकरार रहे। ऐसे में शी जिनपिंग की यह यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से भी जुड़ी हुई मानी जा रही है। बीजिंग के लिए क्यों महत्वपूर्ण है प्योंगयांग? चीन लंबे समय से उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा आर्थिक और राजनीतिक सहयोगी रहा है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और वैश्विक दबावों के बीच बीजिंग ने कई मौकों पर प्योंगयांग का समर्थन किया है। चीन के लिए उत्तर कोरिया केवल पड़ोसी देश नहीं, बल्कि पूर्वी एशिया में उसकी रणनीतिक सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। इसलिए कोरियाई प्रायद्वीप में स्थिरता बनाए रखना बीजिंग की प्राथमिकताओं में शामिल है। अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया की भी नजर शी जिनपिंग की यात्रा पर अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया समेत कई देशों की करीबी नजर रहेगी। इन देशों को आशंका है कि चीन और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ता सहयोग क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस दौरे के बाद परमाणु नीति, सैन्य सहयोग और क्षेत्रीय रणनीति को लेकर नए संकेत मिल सकते हैं। 2019 के बाद पहली उत्तर कोरिया यात्रा शी जिनपिंग इससे पहले वर्ष 2019 में उत्तर कोरिया गए थे। उससे पहले किसी चीनी राष्ट्रपति की प्योंगयांग यात्रा 2005 में हुई थी। ऐसे में सात साल बाद होने वाली यह यात्रा दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है। क्षेत्रीय राजनीति में बढ़ सकती है नई हलचल पूर्वी एशिया में बदलते भू-राजनीतिक हालात, रूस-उत्तर कोरिया संबंधों की मजबूती और उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम के बीच शी जिनपिंग का प्योंगयांग दौरा अंतरराष्ट्रीय राजनीति की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जा रहा है। अब दुनिया की नजर इस बात पर होगी कि इस मुलाकात से चीन-उत्तर कोरिया साझेदारी को नई मजबूती मिलती है या फिर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में कोई नया संदेश सामने आता है।
एक ओर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव, आर्थिक संकट और सैन्य हमलों का सामना कर रहा है, वहीं उत्तर कोरिया अपने परमाणु अभियान को और तेज करता दिखाई दे रहा है। उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन ने हाल ही में एक नए परमाणु सामग्री उत्पादन केंद्र का दौरा कर संकेत दिया है कि देश अपने परमाणु हथियार भंडार का तेजी से विस्तार करने की तैयारी में है। दक्षिण कोरिया की समाचार एजेंसी योनहाप के अनुसार, सरकारी मीडिया केसीएनए ने बताया कि किम ने हाल ही में शुरू हुए परमाणु केंद्र का निरीक्षण किया। इस केंद्र का स्थान सार्वजनिक नहीं किया गया है। ‘परमाणु ताकत कई गुना बढ़ानी होगी’, किम का निर्देश निरीक्षण के दौरान किम जोंग उन ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां उत्तर कोरिया से और अधिक मजबूत परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की मांग करती हैं। उन्होंने अधिकारियों और वैज्ञानिकों को निर्देश दिया कि देश की परमाणु शक्ति को गुणवत्ता और संख्या दोनों स्तरों पर तेजी से बढ़ाया जाए ताकि संभावित सुरक्षा चुनौतियों का सामना किया जा सके। पांच साल में दोगुनी हुई उत्पादन क्षमता का दावा उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में हथियार-ग्रेड परमाणु सामग्री उत्पादन की क्षमता दोगुने से अधिक बढ़ चुकी है। किम ने इस उपलब्धि का श्रेय देश के वैज्ञानिकों को दिया और कहा कि परमाणु कार्यक्रम का विस्तार राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा बना रहेगा। परमाणु हथियारों के विस्तार पर हुई विशेष बैठक परमाणु केंद्र के दौरे के दौरान उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु बलों को मजबूत करने के लिए एक उच्चस्तरीय बैठक भी आयोजित की। बैठक में किम जोंग उन ने नई कार्ययोजना को मंजूरी दी और परमाणु क्षमता बढ़ाने से जुड़े कई दिशा-निर्देश जारी किए। उन्होंने इस कदम को देश के परमाणु कार्यक्रम के लिए "ऐतिहासिक उपलब्धि" बताया। तस्वीरों में दिखीं यूरेनियम संवर्धन की अत्याधुनिक मशीनें सरकारी मीडिया द्वारा जारी तस्वीरों में बड़े हॉल के भीतर कतारबद्ध सेंट्रीफ्यूज मशीनें दिखाई दीं, जिनका उपयोग यूरेनियम संवर्धन प्रक्रिया में किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन मशीनों की बढ़ती संख्या उत्तर कोरिया की परमाणु उत्पादन क्षमता में वृद्धि का संकेत हो सकती है। क्या कोई नया गुप्त परमाणु केंद्र भी बना रहा है उत्तर कोरिया? विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तर कोरिया के प्रमुख यूरेनियम संवर्धन केंद्र योंगब्योन, कुसोंग और कांगसोंग में स्थित हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि किम ने जिन सुविधाओं का दौरा किया, वे मौजूदा केंद्रों का हिस्सा हैं या किसी नए गुप्त परमाणु परिसर का। यही वजह है कि इस दौरे ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। दुनिया के लिए नया संकेत, पीछे हटने के मूड में नहीं प्योंगयांग किम जोंग उन के ताजा कदम से स्पष्ट संकेत मिलता है कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के बजाय उसे और अधिक आधुनिक और व्यापक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रुख क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकता है, खासकर ऐसे समय में जब उत्तर कोरिया लगातार मिसाइल परीक्षणों और सैन्य गतिविधियों को बढ़ा रहा है। जापान और दक्षिण कोरिया की बढ़ सकती है चिंता हाल के महीनों में उत्तर कोरिया ने कई मिसाइल परीक्षण किए हैं, जिनमें कुछ परीक्षण जापान की दिशा में भी किए गए। मिसाइलें अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा से पहले ही गिर गईं, लेकिन इससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ा है। दक्षिण कोरिया और जापान लंबे समय से उत्तर कोरिया की बढ़ती परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती मानते रहे हैं।
उत्तर कोरिया ने एक बार फिर अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करते हुए इस सप्ताह कई नए हथियारों का परीक्षण किया है, जिससे कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव और बढ़ गया है। सरकारी मीडिया के अनुसार, तीन दिनों तक चले इन परीक्षणों में बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ क्लस्टर-बम वारहेड्स, एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम, कथित इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हथियार और कार्बन-फाइबर बमों का प्रदर्शन शामिल था। रिपोर्ट के मुताबिक, ये परीक्षण सोमवार से शुरू हुए और गुरुवार को सार्वजनिक किए गए। इससे एक दिन पहले दक्षिण कोरिया की सेना ने पुष्टि की थी कि उत्तर कोरिया ने अपने पूर्वी तटीय क्षेत्र से कई मिसाइलें दागी हैं। ये मिसाइलें 240 से 700 किलोमीटर तक की दूरी तय कर समुद्र में गिरीं। उत्तर कोरिया की सरकारी एजेंसी KCNA ने दावा किया कि इन मिसाइलों में “क्लस्टर म्यूनिशन वारहेड” लगाए गए थे, जो 6.5 से 7 हेक्टेयर क्षेत्र को पूरी तरह तबाह करने में सक्षम हैं। ये मिसाइलें Hwasong-11 श्रेणी की हैं, जिनकी डिजाइन रूस की इस्कंदर मिसाइलों से मिलती-जुलती बताई जाती है, और ये कम ऊंचाई पर उड़कर रक्षा प्रणालियों को चकमा देने में सक्षम हैं। हालांकि, दक्षिण कोरिया की सेना ने उत्तर कोरिया के इस दावे पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं जापान और अमेरिका ने कहा कि इन परीक्षणों से फिलहाल उनके देशों या सहयोगियों को कोई सीधा खतरा नहीं है। इन घटनाओं ने उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच पहले से ही खराब रिश्तों को और तनावपूर्ण बना दिया है। उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया को “सबसे शत्रुतापूर्ण देश” बताते हुए बातचीत की कोशिशों का मजाक उड़ाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु-सक्षम मिसाइल कार्यक्रम को लगातार मजबूत कर रहा है, खासकर 2019 में अमेरिका के साथ वार्ता विफल होने के बाद। इसके साथ ही, वह रूस और चीन जैसे देशों के साथ अपने संबंध भी मजबूत करने की दिशा में सक्रिय है। इसी बीच, चीन के विदेश मंत्री वांग यी के उत्तर कोरिया दौरे की भी खबर है, जिसे क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
तेहरान/प्योंगयांग: मध्य पूर्व में जारी युद्ध के बीच ईरान के नए सर्वोच्च नेता Mojtaba Khamenei को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति और भी तेज हो गई है। अब North Korea ने भी खुले तौर पर उनके नेतृत्व का समर्थन किया है और अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों को “अवैध सैन्य कार्रवाई” बताया है। उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी KCNA के मुताबिक, देश के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि ईरान के लोगों को अपने सर्वोच्च नेता चुनने का पूरा अधिकार है और प्योंगयांग तेहरान के इस फैसले का सम्मान करता है। 28 फरवरी के हमले के बाद बदला नेतृत्व मध्य पूर्व में मौजूदा संकट की शुरुआत तब हुई जब 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल ने संयुक्त हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei को निशाना बनाया, जिसमें उनकी मौत हो गई। इसके बाद ईरान की सर्वोच्च धार्मिक परिषद, Assembly of Experts ने उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर चुना। इस फैसले के बाद दुनिया के कई देशों की प्रतिक्रियाएं सामने आईं, जो स्पष्ट रूप से अलग-अलग खेमों में बंटी दिखाई दे रही हैं। इन देशों और संगठनों ने किया समर्थन मोजतबा खामेनेई के नेतृत्व का समर्थन करने वालों में कई देश और संगठन शामिल हैं। Vladimir Putin की अगुवाई वाला Russia ईरान के साथ “अटूट साझेदारी” की बात कह चुका है। China ने भी कहा कि यह फैसला ईरान के संविधान के तहत लिया गया है और बाहरी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। Haitham bin Tariq के नेतृत्व वाला Oman भी नए नेतृत्व को बधाई दे चुका है। Mohammed Shia al-Sudani की सरकार वाले Iraq ने भी मोजतबा खामेनेई पर भरोसा जताया है। यमन के Houthi Movement ने इसे “इस्लामिक क्रांति की नई जीत” बताया। अब North Korea ने भी खुलकर समर्थन कर दिया है। इन देशों ने जताया विरोध दूसरी ओर कई देशों ने नए नेतृत्व की आलोचना की है। Donald Trump ने मोजतबा खामेनेई को “कमजोर नेता” बताते हुए कहा कि उनके पास ईरान के लिए अलग विकल्प हो सकता है। Israel के विदेश मंत्रालय ने उन्हें “एक और तानाशाह” बताया और कहा कि उनकी नीतियां भी उनके पिता की तरह हिंसक होंगी। रिपोर्टों के मुताबिक इज़राइली सेना ने मोजतबा खामेनेई को भी निशाना बनाने की चेतावनी दी है। उत्तर कोरिया की कड़ी प्रतिक्रिया उत्तर कोरिया ने अमेरिका और इज़राइल के हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह कार्रवाई क्षेत्रीय शांति और वैश्विक स्थिरता को कमजोर करती है। प्योंगयांग ने कहा कि किसी भी देश की राजनीतिक व्यवस्था और क्षेत्रीय अखंडता पर हमला पूरी दुनिया द्वारा निंदा किए जाने योग्य है। किम जोंग उन ने कराया मिसाइल परीक्षण इसी बीच उत्तर कोरिया के नेता Kim Jong Un ने देश के सबसे बड़े युद्धपोत से रणनीतिक क्रूज मिसाइल का परीक्षण भी करवाया। KCNA के अनुसार यह परीक्षण Choe Hyon नाम के नए विध्वंसक युद्धपोत से किया गया। किम जोंग उन ने इस दौरान कहा कि देश के लिए “मजबूत और विश्वसनीय परमाणु प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखना बेहद जरूरी है।” वैश्विक राजनीति में बढ़ता तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान-अमेरिका संघर्ष में उत्तर कोरिया जैसे परमाणु हथियार संपन्न देश की खुली भागीदारी से स्थिति और जटिल हो सकती है। यह भी माना जा रहा है कि अगर यह टकराव और बढ़ता है, तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। कुल मिलाकर, ईरान के नए सुप्रीम लीडर को लेकर दुनिया साफ तौर पर दो खेमों में बंटती दिखाई दे रही है-एक तरफ ईरान के सहयोगी देश हैं, जबकि दूसरी ओर अमेरिका और उसके करीबी सहयोगी इस बदलाव को चुनौती दे रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।