उत्तर कोरिया ने एक बार फिर अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करते हुए इस सप्ताह कई नए हथियारों का परीक्षण किया है, जिससे कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव और बढ़ गया है। सरकारी मीडिया के अनुसार, तीन दिनों तक चले इन परीक्षणों में बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ क्लस्टर-बम वारहेड्स, एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम, कथित इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हथियार और कार्बन-फाइबर बमों का प्रदर्शन शामिल था।
रिपोर्ट के मुताबिक, ये परीक्षण सोमवार से शुरू हुए और गुरुवार को सार्वजनिक किए गए। इससे एक दिन पहले दक्षिण कोरिया की सेना ने पुष्टि की थी कि उत्तर कोरिया ने अपने पूर्वी तटीय क्षेत्र से कई मिसाइलें दागी हैं। ये मिसाइलें 240 से 700 किलोमीटर तक की दूरी तय कर समुद्र में गिरीं।
उत्तर कोरिया की सरकारी एजेंसी KCNA ने दावा किया कि इन मिसाइलों में “क्लस्टर म्यूनिशन वारहेड” लगाए गए थे, जो 6.5 से 7 हेक्टेयर क्षेत्र को पूरी तरह तबाह करने में सक्षम हैं। ये मिसाइलें Hwasong-11 श्रेणी की हैं, जिनकी डिजाइन रूस की इस्कंदर मिसाइलों से मिलती-जुलती बताई जाती है, और ये कम ऊंचाई पर उड़कर रक्षा प्रणालियों को चकमा देने में सक्षम हैं।
हालांकि, दक्षिण कोरिया की सेना ने उत्तर कोरिया के इस दावे पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं जापान और अमेरिका ने कहा कि इन परीक्षणों से फिलहाल उनके देशों या सहयोगियों को कोई सीधा खतरा नहीं है।
इन घटनाओं ने उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच पहले से ही खराब रिश्तों को और तनावपूर्ण बना दिया है। उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया को “सबसे शत्रुतापूर्ण देश” बताते हुए बातचीत की कोशिशों का मजाक उड़ाया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु-सक्षम मिसाइल कार्यक्रम को लगातार मजबूत कर रहा है, खासकर 2019 में अमेरिका के साथ वार्ता विफल होने के बाद। इसके साथ ही, वह रूस और चीन जैसे देशों के साथ अपने संबंध भी मजबूत करने की दिशा में सक्रिय है।
इसी बीच, चीन के विदेश मंत्री वांग यी के उत्तर कोरिया दौरे की भी खबर है, जिसे क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
उत्तर कोरिया ने एक बार फिर अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करते हुए इस सप्ताह कई नए हथियारों का परीक्षण किया है, जिससे कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव और बढ़ गया है। सरकारी मीडिया के अनुसार, तीन दिनों तक चले इन परीक्षणों में बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ क्लस्टर-बम वारहेड्स, एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम, कथित इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हथियार और कार्बन-फाइबर बमों का प्रदर्शन शामिल था। रिपोर्ट के मुताबिक, ये परीक्षण सोमवार से शुरू हुए और गुरुवार को सार्वजनिक किए गए। इससे एक दिन पहले दक्षिण कोरिया की सेना ने पुष्टि की थी कि उत्तर कोरिया ने अपने पूर्वी तटीय क्षेत्र से कई मिसाइलें दागी हैं। ये मिसाइलें 240 से 700 किलोमीटर तक की दूरी तय कर समुद्र में गिरीं। उत्तर कोरिया की सरकारी एजेंसी KCNA ने दावा किया कि इन मिसाइलों में “क्लस्टर म्यूनिशन वारहेड” लगाए गए थे, जो 6.5 से 7 हेक्टेयर क्षेत्र को पूरी तरह तबाह करने में सक्षम हैं। ये मिसाइलें Hwasong-11 श्रेणी की हैं, जिनकी डिजाइन रूस की इस्कंदर मिसाइलों से मिलती-जुलती बताई जाती है, और ये कम ऊंचाई पर उड़कर रक्षा प्रणालियों को चकमा देने में सक्षम हैं। हालांकि, दक्षिण कोरिया की सेना ने उत्तर कोरिया के इस दावे पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं जापान और अमेरिका ने कहा कि इन परीक्षणों से फिलहाल उनके देशों या सहयोगियों को कोई सीधा खतरा नहीं है। इन घटनाओं ने उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच पहले से ही खराब रिश्तों को और तनावपूर्ण बना दिया है। उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया को “सबसे शत्रुतापूर्ण देश” बताते हुए बातचीत की कोशिशों का मजाक उड़ाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु-सक्षम मिसाइल कार्यक्रम को लगातार मजबूत कर रहा है, खासकर 2019 में अमेरिका के साथ वार्ता विफल होने के बाद। इसके साथ ही, वह रूस और चीन जैसे देशों के साथ अपने संबंध भी मजबूत करने की दिशा में सक्रिय है। इसी बीच, चीन के विदेश मंत्री वांग यी के उत्तर कोरिया दौरे की भी खबर है, जिसे क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मिडिल ईस्ट में तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। Israel ने Lebanon पर ऐसा भीषण हमला किया है, जिसे पिछले 30 वर्षों का सबसे बड़ा सैन्य अभियान बताया जा रहा है। सीजफायर के बीच हमला, हालात बेकाबू Iran और अमेरिका के बीच हुए संघर्षविराम के महज 24 घंटे के भीतर यह हमला हुआ। इजरायल का कहना है कि यह सीजफायर लेबनान पर लागू नहीं होता और उसका निशाना ईरान समर्थित संगठन Hezbollah के ठिकाने हैं। 10 मिनट में 100 से ज्यादा हमले रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायली वायुसेना ने महज 10 मिनट के भीतर 100 से अधिक हवाई हमले किए। इस ऑपरेशन में करीब 50 फाइटर जेट शामिल थे। राजधानी बेरूत और दक्षिणी लेबनान के कई शहरों में भारी तबाही देखी गई। 250 से ज्यादा मौतें, 1100 घायल हमलों में अब तक 250 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 1100 से ज्यादा लोग घायल हैं। मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। अस्पतालों में अफरातफरी का माहौल है और कई लोग अभी भी मलबे में दबे हुए हैं। रिहायशी इलाकों पर भारी तबाही सबसे ज्यादा नुकसान घनी आबादी वाले इलाकों में हुआ है। कई ऊंची इमारतें ध्वस्त हो गईं, जिससे बचाव कार्य बेहद मुश्किल हो गया है। साइदा और बालबेक जैसे शहरों में जनाजों और रिहायशी क्षेत्रों को भी निशाना बनाए जाने की खबरें हैं। रक्तदान की अपील, राहत कार्य जारी घायलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए लेबनान रेडक्रॉस ने लोगों से रक्तदान की अपील की है। बचाव दल लगातार मलबा हटाकर फंसे लोगों को निकालने की कोशिश कर रहे हैं। ईरान की चेतावनी, बढ़ सकता है संकट हमलों के बाद Iran ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए चेतावनी दी है कि अगर इजरायल ने हमले नहीं रोके, तो वह संघर्षविराम से पीछे हट सकता है। इसके साथ ही Strait of Hormuz को फिर से बंद करने की धमकी भी दी गई है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। नेतन्याहू का बयान इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने कहा कि यह कार्रवाई देश की सुरक्षा के लिए जरूरी है और इसमें लेबनान को शामिल नहीं किया गया था। वैश्विक चिंता बढ़ी इस हमले ने पूरे मिडिल ईस्ट को फिर अस्थिर कर दिया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर हालात जल्द नहीं संभले, तो यह संघर्ष क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। ईरान-अमेरिका सीजफायर के बावजूद लेबनान में जारी यह हिंसा दिखाती है कि क्षेत्र में शांति अभी दूर है। लगातार बढ़ती हिंसा और बड़े पैमाने पर जनहानि वैश्विक समुदाय के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है।
भारत और Bangladesh के बीच संबंधों को नई दिशा देने की उम्मीदों के बीच बांग्लादेश के विदेश मंत्री Khalilur Rahman का भारत दौरा कई अहम संदेश छोड़ गया। जहां एक ओर ऊर्जा, व्यापार और वीजा जैसे मुद्दों पर सकारात्मक बातचीत हुई, वहीं दौरे के अंत में प्रत्यर्पण की मांग ने कूटनीतिक समीकरणों को जटिल बना दिया। प्रत्यर्पण की मांग ने बढ़ाया तनाव बांग्लादेश ने एक बार फिर पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina और पूर्व गृह मंत्री Asaduzzaman Khan Kamal के प्रत्यर्पण की मांग दोहराई। बांग्लादेश सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद उन्हें देश वापस लाना जरूरी है। यह मांग केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश भी मानी जा रही है। भारत के लिए कठिन संतुलन भारत के सामने यह मुद्दा बेहद संवेदनशील बन गया है। एक ओर पड़ोसी देश के साथ रिश्तों को मजबूत बनाए रखने की जरूरत है, तो दूसरी ओर भारत में रह रही पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस दौरान विदेश मंत्री S. Jaishankar और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval के साथ हुई बैठकों में इस विषय पर चर्चा ने साफ कर दिया कि यह सिर्फ औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि रणनीतिक बातचीत का हिस्सा था। अन्य मुद्दों पर भी बनी सहमति दोनों देशों के बीच वार्ता केवल प्रत्यर्पण तक सीमित नहीं रही। ऊर्जा सहयोग बढ़ाने पर चर्चा डीजल और उर्वरक आपूर्ति पर सकारात्मक संकेत मेडिकल और बिजनेस वीजा को आसान बनाने पर सहमति व्यापारिक संबंध मजबूत करने की दिशा में कदम इन पहलुओं से यह भी स्पष्ट हुआ कि दोनों देश रिश्तों को मजबूत बनाए रखना चाहते हैं, भले ही कुछ मुद्दों पर मतभेद क्यों न हों। नई सरकार का ‘Bangladesh First’ रुख बांग्लादेश की नई सरकार, जिसका नेतृत्व Tarique Rahman कर रहे हैं, ‘Bangladesh First’ नीति पर जोर दे रही है। इसी नीति के तहत प्रत्यर्पण का मुद्दा प्राथमिकता में रखा गया है। रिश्तों के लिए अग्निपरीक्षा यह पूरा घटनाक्रम संकेत देता है कि भारत-बांग्लादेश संबंध एक नए मोड़ पर हैं। जहां सहयोग और साझेदारी की संभावनाएं हैं, वहीं संवेदनशील मुद्दे दोनों देशों के बीच संतुलन की परीक्षा ले सकते हैं। आने वाले समय में भारत का रुख तय करेगा कि यह मामला रिश्तों को मजबूत करेगा या तनाव बढ़ाएगा।