पटना: बिहार के वृद्धजन, विधवा और दिव्यांग पेंशनधारियों के लिए 10 अगस्त का दिन अहम है। राज्य सरकार आज सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना के तहत 94 लाख से अधिक लाभार्थियों के बैंक खातों में 1,100 रुपये की मासिक पेंशन राशि सीधे ट्रांसफर करने जा रही है। इसके लिए समाज कल्याण विभाग की ओर से डीबीटी कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेंशन की राशि लाभार्थियों के खातों में भेजेंगे। सरकार के अनुसार इस भुगतान के तहत करीब 1,100 करोड़ रुपये की राशि ट्रांसफर की जाएगी। नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक महीने की 10 तारीख को पेंशन जारी करने का प्रावधान किया गया है। 94 लाख से ज्यादा पेंशनधारियों को मिलेगा लाभ सामाजिक सुरक्षा पेंशन के तहत बिहार के 94 लाख से अधिक लाभार्थियों को इस भुगतान का फायदा मिलेगा। जिन लाभार्थियों का बैंक खाता आधार से लिंक है और जिनका जरूरी सत्यापन पूरा हो चुका है, उनके खाते में राशि डीबीटी के माध्यम से पहुंचाई जाएगी। सरकार का कहना है कि नियमित भुगतान व्यवस्था से बुजुर्गों, विधवा महिलाओं और दिव्यांग लाभार्थियों को आर्थिक सहायता समय पर मिल सकेगी। इससे उन्हें रोजमर्रा की जरूरतों के लिए आर्थिक संबल मिलने की उम्मीद है। पहले 400 रुपये थी मासिक पेंशन बिहार सरकार ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि में बड़ा बदलाव करते हुए इसे 400 रुपये से बढ़ाकर 1,100 रुपये प्रतिमाह कर दिया है। इस बढ़ी हुई राशि का उद्देश्य पात्र लाभार्थियों को पहले की तुलना में अधिक आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है। इस व्यवस्था में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के पात्र बुजुर्गों के साथ-साथ विधवा और दिव्यांग लाभार्थियों को भी शामिल किया गया है। इन पेंशन योजनाओं में मिल रहा 1,100 रुपये का लाभ मुख्यमंत्री वृद्धजन पेंशन योजना बिहार निःशक्तता पेंशन योजना लक्ष्मीबाई सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना इंदिरा गांधी राष्ट्रीय निःशक्तता पेंशन योजना इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना इन योजनाओं के पात्र लाभार्थियों को निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद मासिक पेंशन का भुगतान किया जाता है। खाते में पैसा आया या नहीं, ऐसे करें चेक अगर आप पेंशन के लाभार्थी हैं और जानना चाहते हैं कि 1,100 रुपये की राशि खाते में पहुंची या नहीं, तो कई तरीकों से इसकी जांच कर सकते हैं। बैंक SMS: बैंक खाते से जुड़े मोबाइल नंबर पर आने वाले आधिकारिक एसएमएस को चेक करें। ATM या बैंक शाखा: नजदीकी बैंक शाखा या एटीएम के माध्यम से खाते का बैलेंस जांच सकते हैं। CSP: नजदीकी ग्राहक सेवा केंद्र पर जाकर भी खाते में आई राशि की जानकारी ली जा सकती है। ऑनलाइन स्टेटस: समाज कल्याण विभाग, बिहार के आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध डीबीटी सुविधा के माध्यम से भुगतान की स्थिति देखी जा सकती है। आधार लिंक नहीं है तो रुक सकती है पेंशन पेंशन का भुगतान सुचारू रूप से प्राप्त करने के लिए लाभार्थियों का बैंक खाता आधार से लिंक होना और आवश्यक सत्यापन पूरा होना महत्वपूर्ण है। अगर आधार सीडिंग या सत्यापन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, तो भुगतान में परेशानी आ सकती है। सरकार ने ऐसे लाभार्थियों से जल्द से जल्द जरूरी प्रक्रिया पूरी कराने की अपील की है। साथ ही 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के ऐसे वरिष्ठ नागरिकों से भी आवेदन करने को कहा गया है, जो अभी तक पात्र होने के बावजूद योजना का लाभ नहीं ले रहे हैं। हर महीने 10 तारीख को पेंशन देने की व्यवस्था बिहार सरकार ने पेंशन भुगतान को नियमित बनाने के लिए हर महीने की 10 तारीख को पेंशन जारी करने की व्यवस्था लागू की है। इसका उद्देश्य लाभार्थियों को भुगतान की निश्चित तारीख उपलब्ध कराना और पेंशन वितरण में अनिश्चितता कम करना है। आज होने वाला डीबीटी भुगतान इसी व्यवस्था का हिस्सा है। हालांकि, किसी भी लाभार्थी के खाते में राशि पहुंचने का वास्तविक समय बैंकिंग प्रक्रिया और खाते की स्थिति पर निर्भर कर सकता है। कुल मिलाकर, 1,100 रुपये की मासिक पेंशन और निश्चित भुगतान तिथि की व्यवस्था बिहार के लाखों सामाजिक सुरक्षा पेंशनधारियों के लिए महत्वपूर्ण बदलाव है। अब सबसे अहम यह है कि पात्र लाभार्थियों का आधार, बैंक खाता और सत्यापन संबंधी प्रक्रिया पूरी हो, ताकि उन्हें पेंशन का लाभ बिना किसी बाधा के मिल सके।
पटना, एजेंसियां। बिहार में अब हर महीने 10 तारिख को सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि का भुगतान किया जाएगा। इसे लेकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने लोक सेवक आवास स्थित संकल्प सभागार में समाज कल्याण विभाग की समीक्षा बैठक की। इस दौरान मौके पर मौजूद सभी पदाधिकारियों को दिशा-निर्देश दिए की हर हाल में पेंशन के लाभुकों के खाते में 10 तारीख को पैसे ट्रांसफर हो जाने चाहिए। बैठक में मुख्यमंत्री ने आंगनबाड़ी केंद्रों पर दी जानेवाली सेवाओं की तकनीक के माध्यम से गहन निगरानी करने के भी निर्देश दिए। कमजोर और वंचित वर्गों को सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ सीएम ने कहा कि आंगनबाड़ी केंद्र जितना अच्छा बनेगा, बच्चों का विकास भी उतना ही अच्छा होगा। आंगनबाड़ी केंद्रों में सेविकाओं और शत प्रतिशत लक्षित बच्चों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए। इस दौरान मुख्यमंत्री ने विभाग में रिक्त पदों को भरने के लिए दिशा-निर्देश दिए। इस दौरान उन्होंने कहा कि राज्य में स्टेटिंग और वेस्टिंग के आंकड़ों में सुधार करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि परवरिश योजना सहित अन्य सामाजिक कल्याण योजनाओं का दायरा बढ़ाकर अधिक से अधिक पात्र लोगों तक लाभ पहुंचाया जाए। उन्होंने योजनाओं के तहत मिलने वाली सुविधाओं और सहायता राशि की पुनर्समीक्षा करने पर जोर देते हुए कहा कि आंगनबाड़ी केंद्रों के संचालन को और सुदृढ़ बनाने के लिए कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के माध्यम से सहयोग की संभावनाएं तलाश की जाएं। मुख्यमंत्री ने राज्य के सभी आंगनबाड़ी केंद्रों का नियमित और प्रभावी संचालन सुनिश्चित करने तथा योजनाओं के पारदर्शी और समयबद्ध क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान देने का निर्देश दिया, ताकि कमजोर और वंचित वर्गों को सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ मिल सके। लोगों को कार्यालयों का चक्कर न लगाना पड़े मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में निवेश और कारोबार को बढ़ावा देने के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाएगा। उन्होंने संबंधित विभागों को लाइसेंस जारी करने, अनुमति प्रदान करने और निरीक्षण जैसी प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिए ठोस प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया। बैठक में उन्होंने कहा कि उद्योगों, निवेशकों, स्टार्टअप्स और आम नागरिकों को सेवाओं के लिए बार-बार कार्यालयों का चक्कर न लगाना पड़े, यह सुनिश्चित किया जाए। साथ ही अनावश्यक अनुपालनों को समाप्त कर बिहार में निवेश और व्यवसाय के लिए सुगम वातावरण तैयार करने पर बल दिया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।