नई दिल्ली: कतर के पूर्व अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी का रविवार को 74 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन पर भारत सरकार ने 13 जुलाई 2026 को पूरे देश में एक दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है। विदेश मंत्रालय ने इस संबंध में आधिकारिक जानकारी जारी की है। पूरे देश में आधा झुका रहेगा तिरंगा विदेश मंत्रालय के अनुसार, राष्ट्रीय शोक के दौरान देशभर की सभी सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा) आधा झुका रहेगा। इसके अलावा, इस दिन किसी भी प्रकार के आधिकारिक मनोरंजन या सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाएंगे। पीएम मोदी ने जताया गहरा शोक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर शोक व्यक्त करते हुए शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी को एक दूरदर्शी नेता बताया। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि शेख हमद ने कतर को आधुनिक और समृद्ध राष्ट्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि भारत उन्हें हमेशा एक "सच्चे मित्र" के रूप में याद रखेगा। पीएम मोदी ने यह भी कहा कि उन्हें फरवरी 2024 में कतर यात्रा के दौरान शेख हमद से मिलने का अवसर मिला था। उन्होंने कतर के वर्तमान अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी, शाही परिवार और कतर की जनता के प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त कीं। भारत की ओर से कतर जाएंगे किरेन रिजिजू केंद्रीय संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू भारत सरकार की ओर से कतर जाएंगे। वे वहां शाही परिवार से मुलाकात कर भारत की ओर से आधिकारिक संवेदना व्यक्त करेंगे। 18 वर्षों तक रहे कतर के अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी ने करीब 18 वर्षों तक कतर के अमीर के रूप में शासन किया। जून 2013 में उन्होंने स्वेच्छा से सत्ता अपने बेटे और वर्तमान अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी को सौंप दी थी। कतर को वैश्विक पहचान दिलाने का श्रेय अपने कार्यकाल के दौरान शेख हमद ने कतर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पहचान दिलाई। उनके नेतृत्व में देश ने— कूटनीति, वैश्विक निवेश, मीडिया, खेल, और आर्थिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की। उनके शासनकाल में कतर खाड़ी क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली देशों में शामिल हुआ। भारत-कतर संबंधों में निभाई अहम भूमिका शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी को भारत और कतर के बीच मजबूत द्विपक्षीय संबंधों का समर्थक माना जाता था। उनके कार्यकाल में दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, निवेश और रणनीतिक सहयोग में उल्लेखनीय विस्तार हुआ। भारत सरकार ने उनके निधन को दोनों देशों के संबंधों के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।
तेहरान, एजेंसियां। पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। ईरान द्वारा दुनिया के सबसे अहम तेल मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा के बाद अमेरिका ने बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई करते हुए ईरान के 140 सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए। अमेरिकी कार्रवाई में मिसाइल लॉन्च साइट, ड्रोन बेस, रडार सिस्टम, कमांड सेंटर और नौसैनिक ठिकानों को निशाना बनाया गया। होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से बढ़ी वैश्विक चिंता ईरान ने आरोप लगाया कि अमेरिकी हस्तक्षेप और विदेशी जहाजों की गतिविधियों के कारण उसने सुरक्षा कारणों से होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किया है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के करीब 20% कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में LNG की आपूर्ति का प्रमुख रास्ता है। इसके बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। अमेरिका का जवाबी हमला, 140 ठिकाने बने निशाना अमेरिकी सेना ने ईरान के खिलाफ तीन दिनों तक चले अभियान में करीब 140 सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाया। हमलों में वायु रक्षा प्रणाली, मिसाइल और ड्रोन लॉन्चर, तटीय रडार, कमांड एवं कंट्रोल नेटवर्क और कई सैन्य ठिकानों को नष्ट करने का दावा किया गया है। अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और ईरान के हमलों का जवाब देने के लिए की गई। ईरान का पलटवार, खाड़ी देशों में बढ़ा तनाव अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने कतर, कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों की ओर मिसाइल और ड्रोन दागे। कई जगह धमाकों की खबरें सामने आईं और क्षेत्र में एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय कर दिए गए। इस घटनाक्रम के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में युद्ध का खतरा और गहरा गया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान निकालने की अपील कर रहा है।
तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास एक बार फिर तेज हो गए हैं। हालिया सैन्य टकराव के बाद कतर ने दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए बातचीत बहाल कराने की पहल शुरू की है। इसी सिलसिले में कतर का एक प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार को तेहरान पहुंचा, जहां दोनों पक्षों के बीच रुकी हुई वार्ता को दोबारा शुरू कराने पर जोर दिया जा रहा है। कतर ने संभाली मध्यस्थ की भूमिका मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कतर के वार्ताकार तेहरान पहुंचे हैं ताकि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव को कम किया जा सके। यह पहल ऐसे समय में हुई है, जब हाल के दिनों में सैन्य गतिविधियों में कुछ नरमी देखने को मिली है और कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं फिर से बनती दिखाई दे रही हैं। अमेरिका की सहमति से शुरू हुई पहल रिपोर्ट के मुताबिक, कतर का यह प्रयास अमेरिका के साथ समन्वय में किया जा रहा है। मध्यस्थों का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच बढ़े अविश्वास को कम करना और संवाद की प्रक्रिया को फिर से शुरू करना है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि शुरुआती बातचीत सकारात्मक रहती है, तो आगे व्यापक वार्ता का रास्ता खुल सकता है। कैसे बढ़ा था अमेरिका-ईरान तनाव हालिया तनाव उस समय बढ़ा जब अमेरिका ने ईरान पर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों पर हमलों में शामिल होने का आरोप लगाया। इसके बाद अमेरिकी सेना ने ईरान से जुड़े कई सैन्य ठिकानों पर कार्रवाई की। जवाब में ईरान ने कुवैत, बहरीन और जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिससे पूरे पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया। सैन्य तैयारी के साथ कूटनीति भी जारी अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वॉशिंगटन ने सैन्य विकल्प खुले रखे हैं, लेकिन फिलहाल उसकी प्राथमिकता कूटनीतिक समाधान तलाशना है। अमेरिकी प्रशासन सीमित सैन्य कार्रवाई के बाद तनाव को नियंत्रित रखते हुए बातचीत का अवसर बनाए रखना चाहता है। पुरानी वार्ता को फिर पटरी पर लाने की कोशिश कतर इससे पहले भी अमेरिका और ईरान के बीच अप्रत्यक्ष वार्ताओं की मेजबानी कर चुका है। हालांकि हालिया सैन्य संघर्ष के बाद बातचीत की प्रक्रिया रुक गई थी। अब क्षेत्रीय देशों की कोशिश है कि दोनों पक्ष एक बार फिर बातचीत की मेज पर लौटें, ताकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को कम किया जा सके और किसी बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका को टाला जा सके। क्षेत्रीय स्थिरता पर टिकी नजरें विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कतर की मध्यस्थता और दोनों देशों की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि अमेरिका और ईरान के रिश्ते टकराव की दिशा में आगे बढ़ते हैं या फिर कूटनीति के जरिए समाधान का रास्ता निकलता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें तेहरान में चल रही इस नई पहल पर टिकी हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर रविवार से 5 से 15 जुलाई तक छह देशों की महत्वपूर्ण कूटनीतिक यात्रा पर रवाना हो गए हैं। इस दौरे के दौरान वह कतर, बहरीन, कुवैत, ओमान, अमेरिका और बेल्जियम का दौरा करेंगे। विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस यात्रा का उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना, पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति पर चर्चा करना और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के 2028-29 कार्यकाल के लिए भारत के अभियान को गति देना है। खाड़ी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी पर जोर जयशंकर 5 से 10 जुलाई के बीच कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान में अपने समकक्षों और शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात करेंगे। इन बैठकों में ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश, भारतीय प्रवासी समुदाय और पश्चिम एशिया के ताजा घटनाक्रम प्रमुख एजेंडा रहेंगे। यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब क्षेत्र में भू-राजनीतिक हालात तेजी से बदल रहे हैं। UNSC अभियान और भारत-EU सहयोग पर रहेगा फोकस खाड़ी देशों के दौरे के बाद विदेश मंत्री 13 जुलाई को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के 2028-29 के अस्थायी सदस्य पद के लिए भारत के आधिकारिक अभियान की शुरुआत करेंगे। इसके बाद वह ब्रुसेल्स में भारत-यूरोपीय संघ व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद (India-EU Trade and Technology Council) की तीसरी मंत्रिस्तरीय बैठक में हिस्सा लेंगे। भारत की वैश्विक कूटनीति को मिलेगी नई गति विशेषज्ञों का मानना है कि यह यात्रा भारत की वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता को और मजबूत करेगी। पश्चिम एशिया के प्रमुख साझेदार देशों के साथ संबंधों को नई दिशा देने के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ के मंचों पर भारत की भूमिका को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
तेहरान/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर एक बार फिर विरोधाभासी बयान सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच कतर की राजधानी दोहा में जल्द बातचीत होगी, लेकिन ईरान ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है। तेहरान ने स्पष्ट कहा है कि अमेरिका के साथ किसी भी स्तर पर कोई बैठक तय नहीं की गई है। ट्रंप बोले- दोहा में होगी बातचीत वॉशिंगटन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित वार्ता का मुख्य विषय ईरान का परमाणु कार्यक्रम होगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका नहीं चाहता कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करे और ईरान भी इस बात से सहमत है। ट्रंप के मुताबिक, इसी मुद्दे पर दोनों देशों के बीच आगे की बातचीत होगी। Truth Social पर भी किया दावा ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर भी पोस्ट कर लिखा कि ईरान ने बैठक का अनुरोध किया है और मंगलवार को दोहा में बातचीत होगी। उन्होंने यह नहीं बताया कि बैठक में किन-किन प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। ईरान ने तुरंत किया खंडन ट्रंप के दावे के कुछ ही समय बाद ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने इसे खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में अमेरिका के साथ किसी भी स्तर पर कोई वार्ता या बैठक निर्धारित नहीं है। उनके बयान के बाद दोहा में संभावित बातचीत को लेकर स्थिति और अधिक अस्पष्ट हो गई है। संघर्षविराम के बीच बढ़ी अनिश्चितता दोनों देशों के बीच लंबे समय तक चले तनाव और सैन्य टकराव के बाद हाल ही में संघर्षविराम की स्थिति बनी है। ऐसे समय में वार्ता को लेकर अमेरिका और ईरान के अलग-अलग दावों ने कूटनीतिक प्रयासों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की तैयारी की खबर समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका की ओर से राष्ट्रपति के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर संभावित प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर सकते हैं। वहीं, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान इस सप्ताह कतर में एक तकनीकी टीम भेजने की तैयारी कर रहा है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इस तकनीकी दल की यात्रा का अमेरिकी अधिकारियों की किसी संभावित मौजूदगी या वार्ता से कोई संबंध नहीं है। फिलहाल तस्वीर साफ नहीं अमेरिका और ईरान की ओर से सामने आए अलग-अलग बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों के बीच औपचारिक बातचीत को लेकर अभी कोई स्पष्ट सहमति दिखाई नहीं दे रही है। ऐसे में दोहा में संभावित वार्ता होगी या नहीं, इस पर फिलहाल संशय बना हुआ है।
वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच संभावित वार्ता को लेकर विरोधाभासी दावे सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत का अनुरोध किया है और दोनों देशों के बीच कतर की राजधानी दोहा में बैठक होगी। ईरान ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि इस सप्ताह किसी भी तरह की बैठक या वार्ता तय नहीं है। ट्रंप बोले- ईरान ने मांगी बातचीत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि ईरान ने अमेरिका से बैठक का अनुरोध किया है और यह बैठक अगले दिन दोहा में आयोजित होगी। ट्रंप का यह दावा ऐसे समय सामने आया है, जब होर्मुज स्ट्रेट को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बना हुआ है। होर्मुज स्ट्रेट पर हो सकती है चर्चा यदि अमेरिका और ईरान के बीच दोहा में वार्ता होती है तो उसका मुख्य एजेंडा होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव को कम करना हो सकता है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। हाल के दिनों में क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों और सुरक्षा चिंताओं के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता बढ़ी है। अमेरिकी अधिकारी का दावा- सैन्य गतिविधियां रोकने पर सहमति समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि दोनों पक्षों ने फिलहाल सैन्य गतिविधियां रोकने पर सहमति जताई है। वहीं, एक अन्य अधिकारी ने कहा कि तकनीकी स्तर पर बातचीत जारी रहने तक होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही सामान्य रूप से जारी रह सकती है। ईरान ने बैठक की खबरों को किया खारिज दूसरी ओर, ईरान ने ट्रंप के दावे को सिरे से नकार दिया है। सरकारी प्रसारक आईआरआईबी (IRIB) के मुताबिक, ईरान के उप विदेश मंत्री (कानूनी एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों) काजेम गरीबाबादी ने स्पष्ट कहा कि इस सप्ताह किसी भी कार्य समूह की बैठक निर्धारित नहीं है। उन्होंने कहा कि कतर के साथ नियमित संपर्क और परामर्श जारी है, लेकिन दोहा में किसी तकनीकी बैठक की पुष्टि नहीं की जा सकती। उनके अनुसार, औपचारिक वार्ता तभी शुरू होगी जब दोनों पक्ष समय, स्थान और अन्य आवश्यक शर्तों पर सहमत होंगे। कतर निभा रहा है मध्यस्थ की भूमिका अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के प्रयासों में कतर लगातार मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। दोनों देशों के बीच संवाद बनाए रखने के लिए कूटनीतिक स्तर पर संपर्क जारी है और विभिन्न माध्यमों से बातचीत की संभावनाएं तलाश की जा रही हैं। विरोधाभासी दावों से बनी असमंजस की स्थिति ट्रंप के दावे और ईरान के आधिकारिक खंडन के बाद संभावित वार्ता को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। एक ओर अमेरिका बैठक होने की बात कह रहा है, जबकि ईरान किसी भी निर्धारित वार्ता से इनकार कर रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों देशों के रुख और कूटनीतिक प्रयासों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी रहेगी।
वॉशिंगटन/तेहरान: मध्य पूर्व में कई दिनों से जारी सैन्य तनाव के बीच राहत की खबर सामने आई है। अमेरिका और ईरान ने फिलहाल एक-दूसरे के खिलाफ सभी सैन्य हमले रोकने पर सहमति जताई है। दोनों देशों के बीच यह सहमति ऐसे समय बनी है, जब हाल के दिनों में सैन्य टकराव ने पूरे क्षेत्र में युद्ध की आशंकाएं बढ़ा दी थीं। अमेरिकी मीडिया कंपनी Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों पक्ष अब संघर्ष को और बढ़ाने के बजाय कूटनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने पर सहमत हुए हैं। इसी सिलसिले में मंगलवार (30 जून) को कतर की राजधानी दोहा में दोनों देशों के अधिकारियों के बीच अहम बैठक होगी। फिलहाल रुकी सैन्य कार्रवाई रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और ईरान ने अस्थायी रूप से सभी सैन्य (काइनेटिक) गतिविधियों पर रोक लगाने का फैसला किया है। यह कदम उस अंतरिम समझौते को बचाने की कोशिश माना जा रहा है, जिसकी घोषणा दोनों देशों ने करीब 11 दिन पहले लंबे तनाव को कम करने के उद्देश्य से की थी। समझौते के बाद भी दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाते हुए सीमित सैन्य कार्रवाई की थी, जिससे युद्धविराम पर सवाल उठने लगे थे। अब दोनों देशों ने स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए बातचीत का रास्ता चुना है। दोहा में होगी अहम बैठक अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, मंगलवार को कतर की राजधानी दोहा में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच उच्चस्तरीय वार्ता होगी। पहले यह बैठक स्विट्जरलैंड में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर व्यापक चर्चा के लिए प्रस्तावित थी, लेकिन हालिया सैन्य घटनाक्रम के बाद इसका स्थान बदलकर दोहा कर दिया गया। सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में मुख्य रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जुड़े विवादों और समुद्री सुरक्षा पर चर्चा होगी। समुद्री व्यापार रहेगा सामान्य अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों ने पुष्टि की है कि बातचीत शुरू होने तक दोनों देश सैन्य कार्रवाई से परहेज करेंगे। एक अधिकारी ने कहा कि सभी सैन्य गतिविधियों को फिलहाल रोकने पर सहमति बन गई है। दूसरे अधिकारी के अनुसार, दोनों पक्ष तनाव कम करने के लिए पीछे हटेंगे और अंतरराष्ट्रीय समुद्री जहाजों की आवाजाही सामान्य रूप से जारी रहेगी, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर तत्काल असर पड़ने की आशंका कम हो गई है। होर्मुज विवाद रहेगा वार्ता का केंद्र दोहा में होने वाली बैठक का मुख्य फोकस होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े विवादों का समाधान होगा। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा व्यापार मार्गों में से एक है और यहां किसी भी प्रकार का तनाव वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित कर सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोहा वार्ता सकारात्मक रहती है, तो मध्य पूर्व में हालिया सैन्य तनाव कम करने और व्यापक कूटनीतिक समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हो सकती है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के पाकिस्तान के प्रति नरम रुख और "हम पाकिस्तान से प्यार करते हैं" वाले बयान ने अमेरिका की घरेलू राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। वेंस के बयान के बाद दो रिपब्लिकन सीनेटरों ने पाकिस्तान और कतर की भूमिका पर सवाल उठाते हुए दोनों देशों पर आतंकवादियों को पनाह देने और चरमपंथी संगठनों को समर्थन देने के आरोप लगाए हैं। रिक स्कॉट बोले- पाकिस्तान और कतर का आतंकियों को शरण देने का इतिहास Rick Scott ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि दुनिया को अब यह समझ जाना चाहिए कि अमेरिका के असली सहयोगी कौन हैं। उन्होंने लिखा, "कतर और पाकिस्तान का आतंकवादियों को पनाह देने का लंबा इतिहास रहा है। दोनों देश सार्थक शांति स्थापित करने के बजाय ईरान के दशकों पुराने आतंकी नेटवर्क को बढ़ावा देने में अधिक रुचि रखते हैं।" स्कॉट ने यह भी कहा कि ईरान के साथ ऐसा समझौता संभव है जो सभी पक्षों के हित में हो, लेकिन किसी भी स्थिति में तेहरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जेडी वेंस के बयान से बढ़ा विवाद विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब JD Vance ने स्विट्जरलैंड में अमेरिका, पाकिस्तान और कतर के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के दौरान कहा था कि "हम पाकिस्तान से प्यार करते हैं।" वेंस उस समय ईरान के साथ संभावित शांति समझौते की तकनीकी और कूटनीतिक बारीकियों पर चर्चा कर रहे थे। उनके इस बयान के बाद रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ही पाकिस्तान को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। टिम शीही ने दिलाई ओसामा बिन लादेन की याद Tim Sheehy ने भी पाकिस्तान की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका को उसके अतीत को नहीं भूलना चाहिए। फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "हमें यह याद रखना चाहिए कि पाकिस्तान ने एक दशक तक ओसामा बिन लादेन को अपने यहां छिपाकर रखा था।" शीही ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अतीत में ऐसे तत्वों को समर्थन दिया, जिन्होंने अमेरिकी हितों के खिलाफ काम किया। UAE, इजरायल और सऊदी अरब को बातचीत में शामिल करने की मांग सीनेटर शीही ने कहा कि यदि पाकिस्तान और कतर को मध्यस्थ की भूमिका दी जा रही है, तो अमेरिका को अपने पारंपरिक सहयोगियों को भी वार्ता प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए। उन्होंने कहा, "संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल और सऊदी अरब मध्य पूर्व में अमेरिका के सबसे विश्वसनीय सहयोगी हैं। किसी भी शांति प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।" कतर पर भी लगाए गंभीर आरोप शीही ने कतर पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वह वर्षों से विभिन्न चरमपंथी संगठनों के लिए वित्तीय नेटवर्क और मनी लॉन्ड्रिंग का केंद्र रहा है। उन्होंने कहा, "यह मान लेना कि पाकिस्तान और कतर पूरी तरह निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाएंगे, वास्तविकता से दूर है।" अमेरिका में पाकिस्तान की भूमिका पर फिर छिड़ी बहस रिपब्लिकन सांसदों के बयानों से साफ है कि अमेरिका में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर पुराने सवाल एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। जेडी वेंस के हालिया बयान के बाद वॉशिंगटन में यह बहस तेज हो गई है कि मध्य पूर्व की नई कूटनीतिक पहल में पाकिस्तान और कतर की भूमिका कितनी प्रभावी और निष्पक्ष मानी जा सकती है।
वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते की घोषणा के बाद दुनिया भर के नेताओं ने इसका स्वागत किया है। कतर, तुर्किये, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस समेत कई देशों ने इसे पश्चिम एशिया में स्थिरता बहाल करने, होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को दोबारा खोलने और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे दबाव को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शांति समझौते के दावे और पाकिस्तान की ओर से 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर होने की घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। ईरान ने भी संकेत दिया है कि निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद समझौते पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। कतर ने कहा- स्थायी शांति की दिशा में अहम पहल Mohammed bin Abdulrahman Al Thani ने अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि यह पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे की वार्ताएं सकारात्मक और रचनात्मक माहौल में आगे बढ़ेंगी। एर्दोआन बोले- दुनिया लंबे समय से इस खबर का इंतजार कर रही थी Recep Tayyip Erdoğan ने कहा कि पूरी दुनिया लंबे समय से इस तरह की खबर का इंतजार कर रही थी। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त करेगा। एर्दोआन ने सभी पक्षों से संयम बरतने और उकसावे वाली गतिविधियों से बचने की अपील की। साथ ही उन्होंने पाकिस्तान, कतर और सऊदी अरब के कूटनीतिक प्रयासों की सराहना की। ब्रिटेन ने बताया युद्ध समाप्ति की दिशा में बड़ी उपलब्धि Keir Starmer ने इस समझौते को युद्ध समाप्त करने और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करने की दिशा में बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। स्टार्मर ने यह भी कहा कि समझौते को पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए और ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाने की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता बनी रहनी चाहिए। जर्मनी ने कहा- वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत Friedrich Merz ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि यह पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और वैश्विक अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाला कदम साबित हो सकता है। उन्होंने इसे दूरगामी प्रभाव वाला कूटनीतिक समाधान बताते हुए कहा कि इससे ऊर्जा बाजारों में स्थिरता लौट सकती है और व्यापारिक अनिश्चितताएं कम हो सकती हैं। फ्रांस ने होर्मुज जलडमरूमध्य तत्काल खोलने की मांग की Emmanuel Macron ने कहा कि समझौते का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम होर्मुज जलडमरूमध्य का तत्काल और बिना किसी शर्त के दोबारा खुलना होना चाहिए। मैक्रों ने कहा कि फ्रांस और ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात को सामान्य बनाने के प्रयासों में सहयोग देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समझौते के बाद ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों सहित क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े व्यापक मुद्दों पर भी बातचीत आगे बढ़नी चाहिए। ट्रंप ने किया समझौता पूरा होने का दावा Donald Trump ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पूरा हो चुका है और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की अनुमति दी जा रही है। ट्रंप ने कहा, "दुनिया के जहाज अब अपने इंजन शुरू करें, तेल का प्रवाह जारी रहने दें।" पाकिस्तान की मध्यस्थता की चर्चा Shehbaz Sharif ने दावा किया कि लंबी बातचीत के बाद दोनों पक्ष समझौते पर सहमत हुए हैं और 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि समझौते को अंतिम रूप देने में कतर, सऊदी अरब और तुर्किये की भूमिका अहम रही है। वैश्विक बाजार की नजरें 19 जून पर यदि प्रस्तावित समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर होते हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य दोबारा खुलता है, तो इसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति, ऊर्जा कीमतों और पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब 19 जून को होने वाली संभावित औपचारिक प्रक्रिया और उसके बाद की घटनाओं पर नजर बनाए हुए है।
Donald Trump अब सिर्फ Iran के साथ युद्धविराम या शांति समझौते तक सीमित नहीं रहना चाहते। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप अब पूरे पश्चिम एशिया की राजनीतिक व्यवस्था को नए सिरे से आकार देने की कोशिश में जुटे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने कई अरब और मुस्लिम देशों के नेताओं से कहा है कि ईरान युद्ध खत्म होने के बाद वे Israel के साथ अपने संबंध सामान्य करें और Abraham Accords में शामिल हों। हाई-लेवल कॉल में उठी मांग रिपोर्ट में दावा किया गया है कि शनिवार को हुई एक उच्चस्तरीय कॉन्फ्रेंस कॉल में ट्रंप ने यह मुद्दा उठाया। इस बातचीत में Saudi Arabia, United Arab Emirates, Qatar, Pakistan, Turkey, Egypt, Jordan और Bahrain के नेता शामिल थे। बताया गया कि ट्रंप ने कहा कि जो देश अब तक इजरायल को मान्यता नहीं देते हैं, उन्हें अब रिश्ते सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। ट्रंप की बात के बाद छा गया सन्नाटा अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ट्रंप के इस बयान के बाद कॉल पर कुछ देर के लिए खामोशी छा गई। माहौल हल्का करने के लिए ट्रंप ने मजाक में पूछा, “क्या आप लोग अभी भी लाइन पर हैं?” रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई। इन देशों के इजरायल के साथ अब तक औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। ईरान को भी दिया संकेत ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी कहा कि अगर पश्चिम एशिया के देश अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होते हैं तो क्षेत्र में स्थिरता बढ़ेगी। उन्होंने यह भी कहा, “कौन जानता है, शायद ईरान भी इसमें शामिल होना चाहे। इसे फिलहाल बेहद मुश्किल संभावना माना जा रहा है। ईरान लंबे समय से इजरायल को मान्यता देने से इनकार करता रहा है। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi पहले ही कह चुके हैं कि ईरान ऐसे शासन को कभी मान्यता नहीं देगा, जिस पर बच्चों की हत्या और नरसंहार के आरोप हों। क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स? अब्राहम अकॉर्ड्स की शुरुआत साल 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में हुई थी। इसका उद्देश्य अरब देशों और इजरायल के बीच संबंध सामान्य करना था। सबसे पहले United Arab Emirates और Bahrain ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। बाद में Sudan और Morocco भी इसमें शामिल हुए। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पहल पश्चिम एशिया में ईरान के प्रभाव को सीमित करने और इजरायल व अरब देशों के बीच व्यापार, तकनीक और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। सऊदी अरब सबसे बड़ी चुनौती ट्रंप की इस योजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती Mohammed bin Salman के नेतृत्व वाला सऊदी अरब माना जा रहा है। सऊदी अरब ने साफ कहा है कि इजरायल के साथ किसी भी औपचारिक रिश्ते की शुरुआत तभी होगी, जब फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन की दिशा में ठोस और स्थायी कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर, इजरायल फिलहाल इस मांग को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं दिख रहा। ईरान समझौते पर अब भी कई अड़चनें ट्रंप पश्चिम एशिया में नए समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ईरान के साथ समझौता अभी आसान नहीं दिख रहा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित समझौते में 60 दिन का युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आगे की बातचीत शामिल हो सकती है। लेकिन प्रतिबंध हटाने, यूरेनियम भंडार और फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों जैसे मुद्दों पर अब भी सहमति नहीं बन पाई है।
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के खिलाफ प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल कुछ समय के लिए टाल दिया है। ट्रंप ने कहा कि खाड़ी देशों के शीर्ष नेताओं की अपील और ईरान के साथ जारी गंभीर बातचीत को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। ट्रंप के मुताबिक, Tamim bin Hamad Al Thani, Mohammed bin Salman और Mohammed bin Zayed Al Nahyan ने उनसे सीधे संपर्क कर सैन्य कार्रवाई को कुछ दिनों के लिए टालने का अनुरोध किया था। “समझौते की संभावना बढ़ी” ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर जारी बयान में कहा कि खाड़ी देशों की ईरान के साथ “गंभीर बातचीत” चल रही है और कूटनीतिक समाधान की संभावना पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि इन देशों का मानना है कि यदि अमेरिका कुछ समय इंतजार करे तो बातचीत के जरिए ऐसा समझौता हो सकता है, जिससे ईरान परमाणु हथियार हासिल न कर सके। “उम्मीद है हमला हमेशा के लिए टल जाए” ट्रंप ने कहा कि उन्होंने सैन्य कार्रवाई को “कुछ समय के लिए” रोका है और उम्मीद जताई कि शायद इसकी जरूरत कभी न पड़े। उन्होंने कहा, “अगर बिना बमबारी के मामला सुलझ जाए तो मुझे बहुत खुशी होगी।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बातचीत विफल रहती है तो अमेरिका बड़े सैन्य अभियान के लिए तैयार रहेगा। अमेरिकी सेना को अलर्ट रहने के निर्देश ट्रंप ने बताया कि उन्होंने अमेरिकी रक्षा मंत्री Pete Hegseth, ज्वाइंट चीफ्स चेयरमैन Daniel Caine और अमेरिकी सेना को किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए हैं। खाड़ी देशों में बढ़ी चिंता पिछले कुछ महीनों में कतर, सऊदी अरब और यूएई पर ईरान समर्थित हमलों का दबाव बढ़ा है। ईरान ने 28 फरवरी के बाद हुए हमलों के जवाब में अमेरिकी सहयोगी देशों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी दी थी। ऐसे में खाड़ी देशों का एकजुट होकर अमेरिका से सैन्य कार्रवाई टालने का अनुरोध करना क्षेत्रीय तनाव को कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। पाकिस्तान फिर मध्यस्थ की भूमिका में रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। बताया गया है कि ईरान का संशोधित शांति प्रस्ताव पाकिस्तान के जरिए अमेरिका तक पहुंचाया गया। हालांकि अमेरिकी प्रशासन इस प्रस्ताव से पूरी तरह संतुष्ट नहीं बताया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, नए प्रस्ताव में पहले की तुलना में केवल सीमित बदलाव किए गए हैं। परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ा विवाद अमेरिका और ईरान के बीच मुख्य विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बना हुआ है। अमेरिका का दावा है कि ईरान के पास बड़ी मात्रा में संवर्धित यूरेनियम मौजूद है और वह परमाणु हथियार क्षमता की दिशा में बढ़ सकता है। वहीं ईरान ने यूरेनियम संवर्धन के अधिकार से पीछे हटने से इनकार कर दिया है। तेहरान प्रतिबंधों में राहत, जब्त संपत्तियों की वापसी और भविष्य में सैन्य कार्रवाई न होने की गारंटी की मांग कर रहा है। CENTCOM ने जारी रखी नाकेबंदी इस बीच United States Central Command (CENTCOM) ने कहा है कि अमेरिकी सेना ईरानी बंदरगाहों पर लागू प्रतिबंधों को सख्ती से लागू कर रही है। CENTCOM के अनुसार, अब तक 85 व्यावसायिक जहाजों का रास्ता बदला जा चुका है ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों और नाकेबंदी का पालन सुनिश्चित किया जा सके। कूटनीति और सैन्य दबाव दोनों जारी अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन अब भी बातचीत के जरिए समाधान चाहता है, लेकिन साथ ही सैन्य विकल्पों को भी खुला रखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ दिन पश्चिम एशिया की स्थिति के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने एक बड़ा कदम उठाते हुए अपने सहयोगी देशों को 8.6 अरब डॉलर से ज्यादा के हथियार बेचने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ईरान के साथ जारी टकराव ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। किन देशों को मिलेंगे हथियार? अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, जिन देशों को यह सैन्य उपकरण दिए जाएंगे, उनमें शामिल हैं: इजरायल कतर कुवैत संयुक्त अरब अमीरात ये सभी देश लंबे समय से अमेरिका के रणनीतिक सहयोगी रहे हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं। युद्ध और व्यापार साथ-साथ ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिका अब तक करीब 25 अरब डॉलर (लगभग 2.37 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर चुका है। यह खर्च मुख्य रूप से: गोला-बारूद मिसाइल सिस्टम ड्रोन सैन्य तैनाती पर हुआ है। इस दौरान अमेरिका को हाईटेक हथियारों और डिफेंस सिस्टम के नुकसान का भी सामना करना पड़ा। ऐसे में हथियारों की यह बिक्री एक तरह से उस आर्थिक नुकसान की भरपाई के रूप में देखी जा रही है। डर बना हथियार बाजार की वजह ईरान के हमलों ने इन देशों की सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार: मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने में कई डिफेंस सिस्टम पूरी तरह सफल नहीं रहे सैन्य ठिकानों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा “स्वार्म अटैक” (एक साथ कई हमले) से रक्षा तंत्र पर दबाव बढ़ा इन हालातों ने मिडिल ईस्ट के देशों को अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करने के लिए मजबूर कर दिया। THAAD और पैट्रियट भी पड़े कमजोर? इन देशों ने THAAD और Patriot Missile System जैसे एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया, लेकिन ईरान के कुछ हमलों को रोकने में ये भी पूरी तरह सफल नहीं रहे। इससे यह साफ हुआ कि आधुनिक युद्ध में पारंपरिक रक्षा सिस्टम को और अपग्रेड करने की जरूरत है। अस्थायी शांति, लेकिन खतरा बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष अब नौवें सप्ताह में पहुंच चुका है। हालांकि, 8 अप्रैल से एक नाजुक युद्धविराम लागू है, लेकिन हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे में मिडिल ईस्ट के देश: भविष्य के हमलों के लिए तैयार हो रहे हैं अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग मजबूत कर रहे हैं ट्रंप का दावा और सख्त रुख डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम परमाणु खतरे को रोकने के लिए जरूरी था। उन्होंने दावा किया कि: ईरान की सैन्य क्षमता कमजोर हो चुकी है उसके कई डिफेंस सिस्टम नष्ट हो चुके हैं यह कार्रवाई मिडिल ईस्ट और यूरोप को सुरक्षित रखने के लिए की गई दोहरा फायदा: रणनीति और कारोबार विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका को दोहरा फायदा हुआ है: ईरान पर दबाव बनाकर उसे कमजोर करना सहयोगी देशों को हथियार बेचकर आर्थिक लाभ कमाना यानी, युद्ध के माहौल ने हथियारों के बाजार को और तेज कर दिया है।
हॉर्मुज संकट के बाद ट्रंप का तीखा बयान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) पर कड़ा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जब हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव चरम पर था, तब NATO ने कोई प्रभावी मदद नहीं की, लेकिन स्थिति सामान्य होने के बाद सहायता की पेशकश की गई। “अब आपकी मदद की जरूरत नहीं” – ट्रंप एरिजोना में आयोजित Turning Point USA कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने कहा कि NATO ने अमेरिका से तब संपर्क किया जब हालात लगभग स्थिर हो चुके थे। उन्होंने कहा कि अगर मदद चाहिए थी, तो “दो महीने पहले चाहिए थी, अब नहीं।” ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “वे उस समय पूरी तरह बेकार साबित हुए जब हमें उनकी जरूरत थी। लेकिन सच यह है कि हमें उनकी जरूरत कभी नहीं थी, उन्हें हमारी जरूरत थी।” हॉर्मुज संकट और वैश्विक तनाव यह बयान उस समय आया है जब हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के चलते हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक सुर्खियों में रहा। यह वही समुद्री मार्ग है, जिससे दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का परिवहन होता है। हालांकि अब स्थिति कुछ हद तक स्थिर बताई जा रही है, लेकिन क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। नाटो को बताया ‘पेपर टाइगर’ ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में NATO को “पेपर टाइगर” तक कह दिया। उन्होंने लिखा कि संकट के दौरान संगठन कमजोर और निष्क्रिय रहा, लेकिन अब जब स्थिति सुधर रही है, तो मदद की बात कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर NATO को सहयोग करना ही है, तो वे “तेल ले जाने के लिए जहाज भर सकते हैं।” क्षेत्रीय देशों की तारीफ अपने बयान में ट्रंप ने खाड़ी क्षेत्र के कुछ देशों की तारीफ भी की। उन्होंने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर का उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों ने संकट के दौरान स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। ईरान और हॉर्मुज को लेकर स्थिति ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पुष्टि की है कि युद्धविराम अवधि में सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहेगा। हालांकि अमेरिका ने इस क्षेत्र में कड़ा रुख बनाए रखा है और नौसैनिक दबाव जारी है। ट्रंप का यह बयान एक बार फिर अमेरिका और NATO के बीच मतभेद को उजागर करता है। साथ ही यह भी दिखाता है कि हॉर्मुज संकट ने वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों पर गहरा असर डाला है।
पाकिस्तान को बड़ी आर्थिक राहत मिलने जा रही है। सऊदी अरब और कतर मिलकर उसे 5 अरब डॉलर (करीब ₹46,500 करोड़) की वित्तीय मदद देंगे। यह सहायता ऐसे समय पर मिल रही है, जब पाकिस्तान पर UAE का 3.5 अरब डॉलर (करीब ₹29,000 करोड़) का कर्ज चुकाने का दबाव है। सिर्फ 11 दिन में चुकाना है कर्ज रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान को 23 अप्रैल तक UAE का पूरा कर्ज चुकाना है। तय शेड्यूल के अनुसार 11, 17 और 23 अप्रैल को किस्तों में भुगतान किया जाएगा। यानी देश के पास कर्ज चुकाने के लिए बहुत कम समय बचा है। विदेशी मुद्रा संकट में राहत पाकिस्तान की कमजोर विदेशी मुद्रा स्थिति को देखते हुए यह मदद बेहद अहम मानी जा रही है। देश को अप्रैल में कुल करीब 4.8 अरब डॉलर का भुगतान करना है, जिसमें एक बड़ा इंटरनेशनल बॉन्ड भी शामिल है। IMF की शर्तें भी अहम International Monetary Fund (IMF) ने पाकिस्तान के लिए 7 अरब डॉलर का 3 साल का राहत पैकेज शुरू किया है। इसके तहत शर्त रखी गई है कि बड़े कर्जदाता–जैसे चीन, सऊदी अरब और UAE–अपना पैसा कम से कम 3 साल तक पाकिस्तान में ही बनाए रखें। UAE की नई नीति से बढ़ा दबाव हाल ही में UAE ने कर्ज रोलओवर पॉलिसी में बदलाव कर शॉर्ट-टर्म एक्सटेंशन लागू किया है, जिससे पाकिस्तान पर जल्दी भुगतान का दबाव बढ़ गया। इसके बाद पाकिस्तान ने तय समय में कर्ज चुकाने का फैसला लिया। सऊदी-पाक रिश्ते और मजबूत सऊदी अरब पहले भी पाकिस्तान को आर्थिक मदद देता रहा है और 5 अरब डॉलर तक के डिपॉजिट को आगे बढ़ा चुका है। दोनों देशों के बीच आर्थिक और रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। IMF मीटिंग के लिए वॉशिंगटन दौरा पाकिस्तान के वित्त मंत्री Muhammad Aurangzeb 13–18 अप्रैल तक Washington, D.C. में होने वाली IMF और वर्ल्ड बैंक की स्प्रिंग मीटिंग में हिस्सा ले रहे हैं। इस दौरान वे कई देशों और निवेशकों के साथ अहम बैठकों में शामिल होंगे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।