रुद्राक्ष धारण करने के नियम: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में रुद्राक्ष का संबंध भी भगवान शिव से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि श्रावण मास में रुद्राक्ष धारण करना विशेष शुभ माना जाता है। हालांकि, धार्मिक परंपराओं के अनुसार रुद्राक्ष पहनने से पहले उसकी सही विधि और कुछ जरूरी नियमों का पालन करना चाहिए। ज्योतिष और वास्तु से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष के अलग-अलग मुख और प्रकार बताए गए हैं और प्रत्येक का अपना अलग महत्व माना जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान और श्रद्धा के साथ रुद्राक्ष धारण करने से सकारात्मकता बढ़ती है और मन को शांति मिल सकती है। सावन में रुद्राक्ष क्यों धारण किया जाता है? श्रावण मास को भगवान शिव का प्रिय महीना माना जाता है। धार्मिक कथाओं और शिवपुराण से जुड़ी मान्यताओं में रुद्राक्ष को भगवान शिव के आंसुओं से उत्पन्न बताया गया है। इसी वजह से रुद्राक्ष को शिवजी से विशेष रूप से जुड़ा हुआ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन में शिव आराधना और रुद्राक्ष धारण करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ मिल सकता है। इसे सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति से भी जोड़ा जाता है। रुद्राक्ष के अलग-अलग मुख बताए गए हैं और उनके महत्व भी अलग माने जाते हैं। इनमें एक मुखी रुद्राक्ष को विशेष और शक्तिशाली माना जाता है। हालांकि, अलग-अलग रुद्राक्ष धारण करने की विधि और मंत्र भी अलग हो सकते हैं। रुद्राक्ष कैसे धारण करें? धार्मिक परंपरा के अनुसार सामान्य रूप से रुद्राक्ष धारण करने के लिए इन बातों का ध्यान रखा जाता है: सावन का महीना रुद्राक्ष धारण करने के लिए शुभ माना जाता है। सोमवार को भगवान शिव का दिन माना जाता है, इसलिए इस दिन रुद्राक्ष धारण करना विशेष शुभ माना जाता है। सोमवार को सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। रुद्राक्ष को गंगाजल से शुद्ध करने की परंपरा है। इसके बाद रुद्राक्ष को हाथ में लेकर भगवान शिव का ध्यान करें। ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का कम से कम 11 बार जाप करने की मान्यता है। श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार शिवजी से संबंधित अन्य मंत्र का भी जाप कर सकते हैं। इसके बाद रुद्राक्ष को धागे में पिरोकर गले या हाथ में धारण किया जा सकता है। ध्यान रखें कि अलग-अलग मुखी रुद्राक्ष के लिए अलग विधि, मंत्र और धारण करने के नियम बताए जाते हैं। रुद्राक्ष धारण करने के जरूरी नियम रुद्राक्ष को लेकर धार्मिक मान्यताओं में कुछ सावधानियां भी बताई गई हैं। यदि आप इसे धारण करते हैं तो इन बातों का ध्यान रखने की परंपरा है: 1. सोते समय रुद्राक्ष उतार दें मान्यता के अनुसार रात में सोते समय रुद्राक्ष उतार देना चाहिए। सुबह स्नान करने से पहले भी इसे अलग रखने की सलाह दी जाती है। 2. स्नान के बाद दोबारा धारण करें सुबह स्नान और पूजा-पाठ करने के बाद रुद्राक्ष को दोबारा धारण करने की परंपरा है। इसे धार्मिक रूप से रुद्राक्ष की पवित्रता बनाए रखने से जोड़ा जाता है। 3. किसी दूसरे व्यक्ति का रुद्राक्ष न पहनें मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष व्यक्तिगत रूप से धारण किया जाना चाहिए। इसलिए किसी अन्य व्यक्ति का रुद्राक्ष अपने गले में पहनने से बचने की सलाह दी जाती है। इसी तरह अपना रुद्राक्ष भी किसी दूसरे व्यक्ति को पहनने के लिए न देने की परंपरा है। 4. सात्विक जीवनशैली अपनाएं धार्मिक मान्यताओं में रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को मांस और मदिरा से दूर रहने तथा अनैतिक कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है। इसके पीछे सात्विक जीवनशैली और भगवान शिव के प्रति श्रद्धा को महत्व दिया जाता है। रुद्राक्ष धारण करते समय सबसे जरूरी बात रुद्राक्ष केवल एक धार्मिक आस्था से जुड़ी वस्तु नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए भगवान शिव की भक्ति और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक भी है। इसलिए इसे धारण करते समय श्रद्धा, स्वच्छता और अपनी धार्मिक परंपरा का ध्यान रखना महत्वपूर्ण माना जाता है। साथ ही, यह समझना जरूरी है कि रुद्राक्ष से जुड़े लाभ और प्रभाव मुख्य रूप से धार्मिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित चिकित्सा या स्वास्थ्य उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
हिंदू धर्म में पूजा के दौरान दीपक जलाना शुभ और मंगलकारी माना जाता है। मान्यता है कि दीपक की लौ केवल प्रकाश ही नहीं देती, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक होती है। कई धार्मिक मान्यताओं और लोकविश्वासों के अनुसार, पूजा के समय दीपक की लौ में बनने वाली कुछ आकृतियां जीवन से जुड़े शुभ-अशुभ संकेत भी दे सकती हैं। ज्योतिष एवं वास्तु से जुड़े पारंपरिक मतों के अनुसार, दीपक की लौ में बनने वाली आकृतियों को दैवीय संकेत माना जाता है। हालांकि, इन मान्यताओं का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है और इन्हें धार्मिक आस्था एवं परंपरागत विश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए। आइए जानते हैं कि दीपक की लौ में दिखाई देने वाली अलग-अलग आकृतियों का पारंपरिक अर्थ क्या माना जाता है। दीपक की लौ में दिखने वाले शुभ संकेत त्रिशूल, ॐ या स्वास्तिक जैसी आकृति धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि दीपक की लौ में त्रिशूल, ॐ या स्वास्तिक जैसी आकृति दिखाई दे, तो इसे अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह ईश्वर की विशेष कृपा और सकारात्मक ऊर्जा का संकेत हो सकता है। साथ ही जीवन में चल रही बाधाएं धीरे-धीरे दूर होने की संभावना मानी जाती है। फूल जैसी आकृति यदि लौ में कमल या गुलाब जैसे फूल की आकृति प्रतीत हो, तो पारंपरिक मान्यता के अनुसार यह इस बात का संकेत माना जाता है कि आपकी पूजा-आराधना स्वीकार हो रही है। इसे आने वाले शुभ समाचार और मनोकामनाओं की पूर्ति से भी जोड़ा जाता है। हंस या मोर की आकृति हंस और मोर दोनों को भारतीय संस्कृति में शुभता, ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। यदि दीपक की लौ में ऐसी आकृति दिखाई दे, तो इसे परिवार में सुख-शांति, प्रेम और मानसिक संतुलन का संकेत माना जाता है। भगवान गणेश जैसी आकृति यदि लौ में भगवान गणेश का स्वरूप प्रतीत हो, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह कार्यों में आ रही बाधाओं के दूर होने और नए शुभ कार्यों के सफल होने का संकेत माना जाता है। दीपक की लौ में दिखाई देने वाले सतर्क करने वाले संकेत दो भागों में बंटी हुई लौ यदि दीपक की लौ बीच से दो हिस्सों में विभाजित दिखाई दे, तो पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इसे शुभ नहीं माना जाता। इसे परिवार में मतभेद, आर्थिक चुनौतियों या किसी प्रकार की अस्थिरता का संकेत माना जाता है। बिना हवा के काला धुआं निकलना यदि वातावरण शांत होने के बावजूद दीपक से लगातार काला धुआं निकल रहा हो, तो लोकमान्यताओं के अनुसार इसे नकारात्मक ऊर्जा का संकेत माना जाता है। ऐसी स्थिति में घर की साफ-सफाई, सकारात्मक वातावरण और पूजा-पाठ पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती है। लगातार फड़फड़ाती हुई लौ यदि दीपक की लौ बिना स्पष्ट कारण के लगातार तेज़ी से कांपती या फड़फड़ाती रहे, तो इसे आने वाली चुनौतियों, अनावश्यक खर्चों या स्वास्थ्य संबंधी सावधानी बरतने का संकेत माना जाता है। ध्यान रखने योग्य बात धार्मिक मान्यताएं व्यक्ति की आस्था और परंपराओं पर आधारित होती हैं। दीपक की लौ में दिखाई देने वाली आकृतियों को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। इन्हें भविष्य की निश्चित भविष्यवाणी या वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। सकारात्मक सोच, सत्कर्म और नियमित पूजा ही जीवन में मानसिक शांति और आत्मविश्वास का आधार बनते हैं।
दुबई, एजेंसियां। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) ने 2028 पुरुष T20 वर्ल्ड कप के फॉर्मेट में बड़े बदलावों को मंजूरी दे दी है। नए प्रारूप के तहत टूर्नामेंट में 20 टीमें हिस्सा लेंगी, लेकिन अब प्रतियोगिता ग्रुप स्टेज, एलिमिनेटर, सुपर 10 और नॉकआउट चरणों में खेली जाएगी। ICC का कहना है कि नए फॉर्मेट का उद्देश्य अधिक प्रतिस्पर्धी मुकाबले और उभरती टीमों को बेहतर अवसर देना है। एलिमिनेटर राउंड से बढ़ेगा रोमांच नए फॉर्मेट में ग्रुप चरण के बाद कुछ टीमें सीधे अगले दौर में पहुंचेंगी, जबकि अन्य क्वालीफाई करने वाली टीमें एलिमिनेटर मुकाबले खेलेंगी। इन मुकाबलों के विजेता आगे बढ़ेंगे, जबकि हारने वाली टीमों का सफर यहीं समाप्त हो जाएगा। 'सुपर 10' में होगा खिताब का असली मुकाबला एलिमिनेटर के बाद 10 टीमें 'सुपर 10' चरण में पहुंचेंगी। यहां सभी टीमों को दो समूहों में बांटा जाएगा और प्रत्येक टीम अपने समूह की अन्य टीमों से मुकाबला करेगी। इसके बाद शीर्ष टीमें सेमीफाइनल में जगह बनाएंगी। उभरती टीमों को मिलेगा बड़ा मौका ICC के अनुसार, नए फॉर्मेट से एसोसिएट और उभरती क्रिकेट टीमों को अधिक प्रतिस्पर्धी मैच खेलने का अवसर मिलेगा। साथ ही बड़े देशों के बीच अधिक हाई-वोल्टेज मुकाबले देखने को मिल सकते हैं। 2028 से लागू होगा नया प्रारूप ICC ने स्पष्ट किया है कि नया फॉर्मेट 2028 पुरुष T20 वर्ल्ड कप से लागू होगा। इस टूर्नामेंट की मेजबानी ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड संयुक्त रूप से करेंगे। नए प्रारूप को लेकर क्रिकेट जगत में उत्सुकता बढ़ गई है।
पूजा-पाठ में भगवान को फल अर्पित करना सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। हालांकि, कई श्रद्धालुओं के मन में यह सवाल रहता है कि क्या बीज वाले फल भगवान को चढ़ाए जा सकते हैं या नहीं। खासकर आम, तरबूज, लीची या अन्य बड़े बीज वाले फलों को लेकर लोगों में अलग-अलग धारणाएं देखने को मिलती हैं। आइए जानते हैं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस विषय में क्या माना जाता है और भोग लगाते समय किन नियमों का पालन करना चाहिए। क्या भगवान को बीज वाले फल चढ़ा सकते हैं? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान को बीज वाले फल अर्पित करना पूरी तरह स्वीकार्य माना जाता है। फल को सात्विक और पवित्र भोग माना गया है तथा मौसमी फलों का भोग विशेष शुभ माना जाता है। हालांकि, यदि फल में बड़ा बीज हो, जैसे आम, तरबूज या अन्य ऐसे फल, तो भोग लगाने से पहले उसका बीज निकाल देना उचित माना जाता है। मान्यता है कि भगवान को वही स्वरूप में भोग अर्पित करना चाहिए, जैसा भोजन सामान्य रूप से ग्रहण किया जाता है। भोग लगाने से पहले इन नियमों का रखें ध्यान भगवान को फल अर्पित करते समय केवल फल का चयन ही नहीं, बल्कि उसकी शुद्धता और प्रस्तुत करने का तरीका भी महत्वपूर्ण माना गया है। भोग में शामिल किए जाने वाले फलों को पहले साफ पानी से अच्छी तरह धो लें। पूजा से काफी पहले फल काटकर न रखें। भोग से ठीक पहले ही फल धोकर या काटकर अर्पित करें। यदि फल बड़ा है तो उसे स्वच्छ चाकू से काटकर भगवान के सामने रखें। भोग में संभव हो तो तुलसी दल भी शामिल करें, जिसे विशेष रूप से शुभ माना जाता है। भोग लगाते समय मन शांत रखें और पूरी श्रद्धा एवं भक्ति के साथ भगवान का स्मरण करें। श्रद्धा को सबसे अधिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान के लिए सबसे महत्वपूर्ण भक्त की सच्ची भावना और श्रद्धा होती है। भोग कितना बड़ा या महंगा है, इससे अधिक महत्व उसे अर्पित करने के भाव का माना गया है। इसलिए पूजा के दौरान अहंकार छोड़कर पूर्ण विश्वास और भक्ति के साथ भगवान को भोग अर्पित करना चाहिए। बड़े बीज वाले फलों के लिए क्या करें? यदि किसी फल में बड़ा और कठोर बीज हो, तो उसे निकालकर फल भगवान को अर्पित करना बेहतर माना जाता है। वहीं छोटे बीज वाले फलों को सामान्य रूप से भी चढ़ाया जा सकता है। उद्देश्य यह माना जाता है कि भगवान को वही भोजन प्रेमपूर्वक अर्पित किया जाए, जिसे आसानी से ग्रहण किया जा सके। ध्यान रखें धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं में विभिन्न क्षेत्रों और संप्रदायों के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। ऐसे में यदि आपके परिवार या गुरु द्वारा बताए गए विशेष पूजा-विधान हैं, तो उनका पालन करना अधिक उचित माना जाता है। पूजा में सबसे महत्वपूर्ण तत्व श्रद्धा, पवित्रता और सच्ची आस्था ही मानी जाती है।
नई दिल्ली: भारत और पोलैंड के रिश्ते नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहे हैं। भारत दौरे पर आए पोलैंड के विदेश मंत्रालय के सचिव व्लादिस्लाव तेओफिल बार्तोशेव्स्की ने कहा कि दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार, तकनीक और ऊर्जा समेत कई क्षेत्रों में सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की आर्थिक प्रगति की भी सराहना की और कहा कि भारत वैश्विक स्तर पर लगातार मजबूत भूमिका निभा रहा है। अक्टूबर में भारत आएंगे पोलैंड के प्रधानमंत्री पोलैंड के विदेश मंत्रालय के सचिव ने बताया कि पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क अक्टूबर में भारत की यात्रा करेंगे। इस दौरे की तैयारियों को लेकर दोनों देशों के अधिकारियों के बीच लगातार बातचीत चल रही है। उन्होंने कहा कि यह यात्रा भारत-पोलैंड रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करेगी। रक्षा क्षेत्र में बढ़ेगा सहयोग बार्तोशेव्स्की ने कहा कि भारत और पोलैंड रक्षा क्षेत्र में संयुक्त उत्पादन और तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पोलैंड पहले ही भारत में ड्रोन निर्माण शुरू कर चुका है। अब दोनों देश संयुक्त रक्षा उत्पादन, तकनीक हस्तांतरण और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पोलैंड भारत की 'मेक इन इंडिया' पहल का समर्थन करता है और भारतीय कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करने के लिए तैयार है। भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते से बढ़ेगा कारोबार पोलैंड के अधिकारी ने भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का स्वागत करते हुए कहा कि इससे दोनों देशों के बीच व्यापार को नई गति मिलेगी। उन्होंने बताया कि वर्तमान में भारत और पोलैंड के बीच करीब 6 अरब यूरो का द्विपक्षीय व्यापार होता है, जिसे आने वाले वर्षों में और बढ़ाने की बड़ी संभावना है। भारत की आर्थिक प्रगति की सराहना बार्तोशेव्स्की ने कहा कि पिछले 11 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक और तकनीकी प्रगति की है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का भारत का लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन देश उस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने भारत की खाद्यान्न उत्पादन क्षमता, तकनीकी विकास और आर्थिक सुधारों की भी प्रशंसा की। वैश्विक मुद्दों पर भारत के रुख का समर्थन पोलैंड के अधिकारी ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खुला रहना चाहिए और किसी भी प्रकार की बाधा स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम का विरोध किया और पश्चिम एशिया के मुद्दों पर भारत के संतुलित कूटनीतिक दृष्टिकोण की सराहना की। रूस-यूक्रेन युद्ध का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से सुना जाता है। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति का समर्थन करते हुए कहा कि पोलैंड की भी आतंकवाद के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति है। इन क्षेत्रों में भी बढ़ेगा सहयोग पोलैंड ने भारत के साथ निम्न क्षेत्रों में दीर्घकालिक सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई है- रक्षा और संयुक्त सैन्य उत्पादन ऊर्जा और हरित ऊर्जा स्वच्छ जल प्रबंधन अंतरिक्ष और सैटेलाइट तकनीक ड्रोन निर्माण तकनीकी नवाचार व्यापार और निवेश दोनों देशों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह साझेदारी आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी क्षेत्रों में और अधिक मजबूत होगी।
मुंबई, एजेंसियां। अजय देवगन, रितेश देशमुख, अरशद वारसी और जावेद जाफरी स्टारर कॉमेडी फिल्म 'धमाल 4' ने रिलीज के पहले ही दिन बॉक्स ऑफिस पर शानदार शुरुआत की है। निर्देशक इंद्र कुमार की इस मल्टीस्टारर फिल्म ने पहले दिन भारत में करीब ₹13.5–13.75 करोड़ का नेट कलेक्शन किया, जबकि दुनियाभर में इसकी कमाई ₹20 करोड़ का आंकड़ा पार कर लगभग ₹21 करोड़ से अधिक पहुंच गई। कॉमेडी का जादू दर्शकों को आया पसंद लंबे समय बाद बड़े पर्दे पर लौटी 'धमाल' फ्रेंचाइजी को दर्शकों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला है। फिल्म के हल्के-फुल्के हास्य, पुराने किरदारों की वापसी और दमदार स्टारकास्ट ने फैमिली ऑडियंस को सिनेमाघरों तक खींचने में अहम भूमिका निभाई। पहले दिन कई शहरों में शो के दौरान अच्छी ऑक्यूपेंसी दर्ज की गई, जिससे वीकेंड पर कमाई में और तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है। वीकेंड से बढ़ी उम्मीदें हालांकि फिल्म अपनी पिछली किस्त 'टोटल धमाल' की ओपनिंग को पीछे नहीं छोड़ सकी, लेकिन ट्रेड एक्सपर्ट्स का मानना है कि सकारात्मक वर्ड ऑफ माउथ और छुट्टियों का फायदा मिलने पर फिल्म शुरुआती वीकेंड में मजबूत कारोबार कर सकती है। मेकर्स को उम्मीद है कि 'धमाल 4' आने वाले दिनों में घरेलू और विदेशी बाजारों में अपनी कमाई का ग्राफ और ऊपर ले जाएगी।
हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान चरणामृत और पंचामृत का विशेष महत्व माना जाता है। हालांकि कई लोग इन्हें एक ही समझ लेते हैं, जबकि सनातन परंपरा में दोनों का अर्थ, बनाने की विधि और धार्मिक उपयोग अलग-अलग है। आइए जानते हैं कि चरणामृत और पंचामृत में क्या अंतर है और पूजा के बाद इनके बचे हुए भाग का क्या करना चाहिए। चरणामृत क्या होता है? चरणामृत का अर्थ है भगवान के चरणों का अमृत। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान के चरणों का स्पर्श प्राप्त जल अत्यंत पवित्र माना जाता है। चरणामृत तैयार करने के लिए आमतौर पर इन चीजों का उपयोग किया जाता है— स्वच्छ जल गंगाजल तुलसी के पत्ते चंदन मान्यता है कि चरणामृत का सेवन करने से मन को शांति मिलती है, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भगवान की कृपा प्राप्त होती है। इसे तांबे के पात्र में रखना शुभ माना जाता है। पंचामृत क्या होता है? पंचामृत का अर्थ है पांच अमृत तत्वों का मिश्रण। इसका उपयोग मुख्य रूप से देवी-देवताओं के अभिषेक (स्नान) में किया जाता है। पंचामृत बनाने में सामान्यतः इन सामग्रियों का प्रयोग होता है— गाय का दूध दही घी शहद शक्कर (या मिश्री) कई परंपराओं में इसमें थोड़ी मात्रा में जल भी मिलाया जाता है। अभिषेक के बाद यही पंचामृत भक्तों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। चरणामृत और पंचामृत में मुख्य अंतर चरणामृत पंचामृत भगवान के चरणों का पवित्र जल माना जाता है पांच पवित्र पदार्थों से तैयार किया जाता है जल, गंगाजल, तुलसी और चंदन का उपयोग दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का उपयोग पूजा के बाद प्रसाद स्वरूप दिया जाता है अभिषेक के लिए उपयोग होता है, फिर प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है तांबे के पात्र में रखना शुभ माना जाता है चांदी, कांसे या मिट्टी के पात्र में रखना शुभ माना जाता है बचा हुआ चरणामृत या पंचामृत क्या करें? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बचा हुआ चरणामृत या पंचामृत सिंक, नाली या किसी अपवित्र स्थान पर नहीं बहाना चाहिए। यदि पूजा के बाद यह बच जाए, तो इसे— तुलसी के पौधे में अर्पित करें। किसी पवित्र पौधे या स्वच्छ स्थान पर श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। ऐसा करना धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है। धार्मिक महत्व चरणामृत और पंचामृत दोनों ही हिंदू पूजा-पद्धति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चरणामृत जहां भगवान के चरणों की कृपा और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है, वहीं पंचामृत शुद्धता, समृद्धि और देवपूजन में श्रद्धा का प्रतीक है। दोनों का उपयोग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया जाता है और इन्हें श्रद्धा एवं सम्मान के साथ ग्रहण करने की परंपरा है.
गुरु पूर्णिमा भारतीय सनातन परंपरा का एक अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गुरु ही शिष्य को अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं और आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। शास्त्रों के अनुसार, जिस व्यक्ति पर आपकी पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा हो, उसी को अपना गुरु बनाना चाहिए। एक बार गुरु से दीक्षा और गुरु मंत्र प्राप्त होने के बाद शिष्य का कर्तव्य है कि वह गुरु की आज्ञा का पालन करे, उनके बताए मार्ग पर चले और गुरु मंत्र को सदैव गोपनीय रखे। गुरु मंत्र को गोपनीय रखने की परंपरा क्यों है? धर्मग्रंथों में गुरु मंत्र को अत्यंत गोपनीय रखने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि गुरु द्वारा दिया गया मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं होता, बल्कि वह आध्यात्मिक ऊर्जा और साधना का माध्यम होता है। शास्त्रों के अनुसार, गुरु मंत्र की शक्ति तभी प्रभावी होती है जब साधक उसका नियमित और निष्ठापूर्वक जप करता है तथा उसे अनावश्यक रूप से दूसरों के सामने प्रकट नहीं करता। प्रकृति भी देती है यही संदेश धार्मिक व्याख्याओं में गुरु मंत्र की तुलना प्रकृति के नियमों से की गई है। जैसे— बीज मिट्टी के भीतर छिपकर ही विशाल वृक्ष बनता है। गर्भ में पल रहा जीवन पूर्ण विकसित होने तक सुरक्षित और गोपनीय रहता है। संचित ऊर्जा समय आने पर सबसे अधिक प्रभावशाली रूप में प्रकट होती है। उसी प्रकार गुरु मंत्र भी साधक के अंतर्मन में मौन रूप से विकसित होने वाली आध्यात्मिक शक्ति माना जाता है। इसलिए इसे गोपनीय रखने की परंपरा बनाई गई है। गुरु मंत्र सार्वजनिक करने से क्या माना जाता है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि साधक बार-बार अपने गुरु मंत्र की चर्चा करता है, तो उसका ध्यान साधना से हटकर दूसरों की प्रतिक्रिया, प्रशंसा, शंका या तुलना की ओर जा सकता है। ऐसी स्थिति में साधना का केंद्र भीतर की बजाय बाहर हो जाता है, जिससे आध्यात्मिक एकाग्रता प्रभावित हो सकती है। इसी कारण गुरु मंत्र को निजी साधना का विषय माना गया है। शास्त्रों में क्या कहा गया है? धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि व्यक्ति के कल्याण के लिए कुछ बातों को सदैव गोपनीय रखना चाहिए और उनमें गुरु मंत्र प्रमुख है। मान्यता के अनुसार— गुरु मंत्र किसी भी व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए। परिवार, मित्र या परिचितों के बीच भी इसे साझा नहीं करना चाहिए। गुरु द्वारा दी गई मंत्र-जप की विशेष विधि भी गोपनीय रखनी चाहिए। गुरु के निर्देशों का श्रद्धापूर्वक पालन करना ही शिष्य का धर्म माना गया है। पति-पत्नी को भी गुरु मंत्र साझा न करने की सलाह परंपरागत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि पति ने गुरु मंत्र प्राप्त किया है तो उसे अपनी पत्नी को भी वह मंत्र नहीं बताना चाहिए। इसी प्रकार यदि पत्नी ने गुरु मंत्र प्राप्त किया है तो उसे भी अपने पति के साथ मंत्र साझा नहीं करना चाहिए। इसी कारण कई परंपराओं में पति-पत्नी एक साथ गुरु से मंत्र दीक्षा ग्रहण करते हैं, ताकि दोनों अपनी-अपनी साधना गुरु के निर्देशानुसार कर सकें। एक गुरु और एक मंत्र पर निष्ठा का महत्व धार्मिक ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि जिस प्रकार पूर्ण श्रद्धा के साथ किसी एक आराध्य की उपासना करने से साधक को आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है, उसी प्रकार एक गुरु से प्राप्त गुरु मंत्र का नियमित जप और गुरु के प्रति अटूट निष्ठा साधना को सफल बनाने का माध्यम माना गया है।
पूजा में हर वस्तु का होता है विशेष महत्व सनातन धर्म में पूजा-पाठ के दौरान इस्तेमाल होने वाली प्रत्येक वस्तु का अपना धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। अलग-अलग देवी-देवताओं की प्रिय सामग्री भी अलग होती है। इसी कारण कुछ वस्तुएं कुछ देवताओं को अर्पित की जाती हैं, जबकि कुछ वस्तुओं का उपयोग वर्जित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद (वट वृक्ष) का पत्ता कुछ देवी-देवताओं की पूजा में अर्पित नहीं किया जाता। आइए जानते हैं इसके पीछे की मान्यताएं। भगवान विष्णु को क्यों नहीं चढ़ाया जाता बरगद का पत्ता? Lord Vishnu की पूजा में तुलसी दल का विशेष महत्व माना गया है। तुलसी को भक्ति, पवित्रता और सात्विकता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद का वृक्ष तप, वैराग्य और स्थिरता का प्रतीक है, जबकि भगवान विष्णु को कोमल और सात्विक अर्पण अधिक प्रिय माने जाते हैं। इसी कारण उनकी पूजा में बरगद के पत्ते चढ़ाने की परंपरा नहीं है। मां लक्ष्मी की पूजा में क्यों माना जाता है वर्जित? Goddess Lakshmi धन, वैभव और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद का वृक्ष स्थायित्व, तपस्या और मोक्ष का प्रतीक माना जाता है। गृहस्थ जीवन में लक्ष्मी पूजा के दौरान कमल, गुलाब और अन्य शुभ पुष्पों का प्रयोग अधिक शुभ माना जाता है। इसलिए मां लक्ष्मी को बरगद का पत्ता अर्पित करने की परंपरा नहीं है। गणेश जी की पूजा में भी नहीं होता उपयोग Lord Ganesha की पूजा में दूर्वा, मोदक और लाल पुष्पों का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश जी को ऐसी वस्तुएं अर्पित की जाती हैं जो मंगल, सौभाग्य और शुभता का प्रतीक हों। बरगद का पत्ता वैराग्य और कठोर तपस्या से जुड़ा माना जाता है, इसलिए इसे गणेश पूजा में उपयोग नहीं किया जाता। बरगद के वृक्ष का धार्मिक महत्व हालांकि कुछ देवताओं की पूजा में बरगद का पत्ता अर्पित नहीं किया जाता, लेकिन वट वृक्ष स्वयं हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। Vat Savitri Vrat और वट पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में बरगद के वृक्ष की विशेष पूजा की जाती है। इसे दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। पूजा करते समय रखें इन बातों का ध्यान देवी-देवताओं की प्रिय और वर्जित वस्तुओं की जानकारी रखें। ताजे और स्वच्छ फूल-पत्तियों का ही उपयोग करें। श्रद्धा और विधि-विधान के साथ पूजा करें। पूजा सामग्री का चयन धार्मिक परंपराओं के अनुसार करें। धार्मिक मान्यता क्या कहती है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा में बरगद का पत्ता अर्पित नहीं किया जाता। माना जाता है कि प्रत्येक देवता की प्रिय सामग्री अलग होती है और उसी के अनुरूप पूजा करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। नोट: यह जानकारी प्रचलित धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं में मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं।
सनातन धर्म में तिलक केवल एक धार्मिक चिन्ह नहीं, बल्कि आस्था, ऊर्जा और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। पूजा-पाठ, यज्ञ, दान और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में तिलक का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार तिलक धारण करने से व्यक्ति को शुभ फल प्राप्त होते हैं और उसकी आध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि होती है। शास्त्रों में तिलक का महत्व धार्मिक ग्रंथों में तिलक को अत्यंत पवित्र माना गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मपर्व में उल्लेख मिलता है कि स्नान, दान, तप, हवन, देवपूजन और पितरों से जुड़े कर्म यदि तिलक लगाए बिना किए जाएं तो उनका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। यही कारण है कि वैदिक परंपरा में पूजा और धार्मिक अनुष्ठान से पहले तिलक धारण करने की परंपरा रही है। किस अंगुली से तिलक लगाने का क्या फल मिलता है? स्कंदपुराण में तिलक लगाने की विधि और उसके प्रभाव का विस्तार से वर्णन किया गया है। अनामिका (रिंग फिंगर) से तिलक लगाने पर शांति और मानसिक संतुलन की प्राप्ति होती है। मध्यमा अंगुली से तिलक करने पर आयु वृद्धि का फल बताया गया है। अंगूठे से लगाया गया तिलक स्वास्थ्य और बल प्रदान करने वाला माना जाता है। तर्जनी अंगुली से तिलक लगाने को मोक्ष प्राप्ति से जोड़ा गया है। देवी-देवताओं के अनुसार अलग-अलग तिलक हिंदू धर्म में विभिन्न संप्रदायों और उपासना पद्धतियों के अनुसार तिलक के स्वरूप भी अलग-अलग होते हैं। विष्णु भक्तों का ऊर्ध्व तिलक भगवान विष्णु के उपासक माथे पर दो सीधी रेखाओं वाला ऊर्ध्व तिलक धारण करते हैं, जो भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। शक्ति उपासकों का तिलक मां शक्ति की आराधना करने वाले साधक प्रायः दो बिंदुओं या विशेष स्वरूप का तिलक लगाते हैं, जो शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक होता है। शिव भक्तों का त्रिपुंड भगवान शिव के भक्त भस्म से तीन आड़ी रेखाओं वाला त्रिपुंड धारण करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि त्रिपुंड धारण कर जप, तप और पूजा करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है। तिलक का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व माथे के बीच का भाग, जहां तिलक लगाया जाता है, शरीर का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा केंद्र माना जाता है। योग और ध्यान परंपरा में इसे आज्ञा चक्र कहा जाता है। यह स्थान दोनों भौंहों के बीच स्थित होता है और मानसिक एकाग्रता तथा चेतना से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि इस स्थान पर चंदन, कुमकुम या भस्म का तिलक लगाने से मन को शांति मिलती है, एकाग्रता बढ़ती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि माथे के इस हिस्से पर हल्का दबाव मानसिक तनाव को कम करने और ध्यान केंद्रित करने में सहायक हो सकता है। केवल परंपरा नहीं, आस्था और ऊर्जा का प्रतीक तिलक सनातन संस्कृति की एक महत्वपूर्ण पहचान है। यह व्यक्ति की धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। पूजा, व्रत और शुभ कार्यों में तिलक लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी श्रद्धालु इसे शुभता, सकारात्मकता और ईश्वरीय कृपा का प्रतीक मानते हैं।
हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार का विशेष महत्व माना गया है। सनातन परंपरा के अनुसार प्रत्येक धार्मिक कार्य को विधि-विधान और निर्धारित नियमों के साथ करना जरूरी माना जाता है। यही वजह है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार भी पूरी श्रद्धा और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है। Garuda Purana में मृत्यु, आत्मा और मोक्ष से जुड़े कई नियमों और मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। इन्हीं मान्यताओं के अनुसार सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार करना अशुभ माना गया है। अंतिम संस्कार का क्या है धार्मिक महत्व? हिंदू मान्यता के अनुसार मृत्यु केवल शरीर का अंत है, जबकि आत्मा अमर मानी जाती है। अंतिम संस्कार को आत्मा की मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है। धार्मिक विश्वास है कि यदि दाह संस्कार सही विधि-विधान, मंत्रों और परंपराओं के अनुसार न किया जाए, तो आत्मा को शांति नहीं मिलती और उसे मोक्ष प्राप्त करने में बाधा आ सकती है। सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार क्यों नहीं किया जाता? Garuda Purana और अन्य धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार: सूर्य देव प्रकाश, ऊर्जा और सकारात्मकता के प्रतीक माने जाते हैं। दिन के समय किए गए संस्कारों को शुभ और देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त माना जाता है। रात का समय नकारात्मक शक्तियों और अशुभ प्रभावों से जुड़ा माना गया है। इसी वजह से माना जाता है कि सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार करने से आत्मा को मोक्ष प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है। यही कारण है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु रात में हो जाए, तो शव को अगले दिन सूर्योदय तक सुरक्षित रखा जाता है। इसके पीछे वैज्ञानिक और व्यावहारिक कारण भी हैं धार्मिक मान्यताओं के अलावा इसके पीछे कुछ व्यावहारिक वजहें भी बताई जाती हैं। प्राचीन समय में: रात में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था नहीं होती थी जंगलों और श्मशान घाटों में सुरक्षा का खतरा रहता था अंतिम संस्कार की प्रक्रिया सही ढंग से पूरी करना कठिन होता था इन्हीं कारणों से दिन के समय अंतिम संस्कार करने की परंपरा विकसित हुई, जो आज भी कई परिवारों में निभाई जाती है। परंपरा और आस्था का प्रतीक सनातन धर्म में अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और मोक्ष से जुड़ा पवित्र संस्कार माना जाता है। इसलिए आज भी अधिकांश लोग सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से बचते हैं और पारंपरिक मान्यताओं का पालन करते हैं।
इस्लामाबाद, एजेंसियां। लाहौर से एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के वरिष्ठ नेता अमीर हमजा पर अज्ञात हमलावरों ने ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। यह हमला एक निजी न्यूज़ चैनल के कार्यालय के बाहर हुआ, जिससे इलाके में हड़कंप मच गया। कई गोलियां लगने से हालत नाजुक हमले में अमीर हमजा को कई गोलियां लगी हैं, जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया। फिलहाल उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया है और उनकी हालत गंभीर बताई जा रही है। हाफिज सईद का करीबी सहयोगी अमीर हमजा को हाफिज सईद का करीबी सहयोगी माना जाता है और वह संगठन की केंद्रीय सलाहकार समिति का अहम सदस्य है। उस पर भारत विरोधी कई आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप रहे हैं, जिसके कारण वह लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर था। हमले से मचा हड़कंप लाहौर के व्यस्त और सुरक्षित माने जाने वाले इलाके में हुए इस हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद इलाके को घेर लिया गया और सुरक्षा बलों ने जांच शुरू कर दी। हमलावर फरार, जांच जारी स्थानीय पुलिस ने हमलावरों की तलाश के लिए सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया है, लेकिन अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। जांच एजेंसियां इस हमले के पीछे की वजह और हमलावरों की पहचान जानने में जुटी हैं। बढ़ सकती है अंदरूनी हलचल विशेषज्ञों का मानना है कि इस हमले के बाद आतंकी संगठन के भीतर और पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था में हलचल बढ़ सकती है। आने वाले दिनों में इस घटना के कई अहम पहलू सामने आने की संभावना है।
हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया को बेहद शुभ और पुण्यदायी पर्व माना जाता है। ‘अक्षय’ का अर्थ होता है—जिसका कभी क्षय न हो। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, जप, तप और पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाते, बल्कि उसका फल कई जन्मों तक मिलता है। साल 2026 में यह पर्व 19 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। साथ ही दान-पुण्य का अत्यधिक महत्व बताया गया है। लेकिन आखिर इस दिन दान क्यों इतना खास माना जाता है? इसके पीछे एक पौराणिक कथा जुड़ी है। पौराणिक कथा: धर्मदास की अटूट श्रद्धा प्राचीन समय में धर्मदास नाम का एक गरीब व्यापारी रहता था। उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन वह बेहद धार्मिक और श्रद्धालु था। एक बार उसे अक्षय तृतीया के महत्व के बारे में पता चला। जब यह दिन आया, तो उसने प्रातः स्नान कर विधि-विधान से पूजा की और अपनी क्षमता के अनुसार दान किया। उसने जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को जल से भरे घड़े, जौ, सत्तू, चावल, नमक, गुड़, घी, पंखे और वस्त्र दान किए। परिवार का विरोध, लेकिन अडिग विश्वास धर्मदास की गरीबी को देखते हुए उसके परिवार ने उसे इतना दान करने से रोका। उन्हें चिंता थी कि घर का खर्च कैसे चलेगा। लेकिन धर्मदास ने विश्वास नहीं छोड़ा और हर साल अक्षय तृतीया पर दान करता रहा। भक्ति का मिला “अक्षय” फल धर्मदास की निस्वार्थ भक्ति और दान के प्रभाव से अगले जन्म में वह कुशावती नगर का एक समृद्ध और प्रतापी राजा बना। कहा जाता है कि उसके यज्ञ में स्वयं त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) भी ब्राह्मण रूप में शामिल होते थे। दान का आध्यात्मिक महत्व अक्षय तृतीया पर दान करने के पीछे मुख्य मान्यता यह है कि इस दिन किया गया हर शुभ कार्य “अक्षय” यानी कभी समाप्त न होने वाला पुण्य देता है। इसलिए लोग इस दिन अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, जल, वस्त्र, सोना या अन्य जरूरी चीजें दान करते हैं। अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि श्रद्धा, त्याग और परोपकार का प्रतीक है। यह दिन हमें सिखाता है कि सच्चे मन से किया गया छोटा सा दान भी जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है—और उसका फल कभी समाप्त नहीं होता।
कलावा के रंगों का रहस्य: कौन सा धागा देता है किस तरह का लाभ, जानें धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान हाथ में कलावा या मौली बांधने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसे केवल एक साधारण धागा नहीं माना जाता, बल्कि आस्था, सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक समझा जाता है। आमतौर पर लोग लाल रंग का कलावा बांधते हैं, लेकिन ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग रंग के कलावे का अपना अलग महत्व बताया गया है। माना जाता है कि यदि व्यक्ति अपनी जरूरत या उद्देश्य के अनुसार कलावा धारण करता है, तो उसे जीवन में विशेष लाभ मिल सकता है। लाल कलावा: शक्ति और साहस का प्रतीक लाल रंग का कलावा सबसे अधिक प्रचलित है और इसे ऊर्जा, शक्ति और साहस का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे धारण करने से व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है और जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है। इसे भगवान हनुमान और देवी दुर्गा की कृपा से भी जोड़ा जाता है, इसलिए पूजा-पाठ के समय अक्सर यही कलावा बांधा जाता है। पीला कलावा: गुरु कृपा और ज्ञान की वृद्धि पीले रंग का कलावा गुरु ग्रह से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि इसे धारण करने से ज्ञान, बुद्धि और शुभता में वृद्धि होती है। शिक्षा, अध्यात्म या ज्ञान से जुड़े कार्य करने वाले लोगों के लिए पीला कलावा विशेष रूप से शुभ माना जाता है। काला कलावा: नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा काले रंग का कलावा आमतौर पर बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों से बचाव के लिए बांधा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्यक्ति को नजर दोष से बचाने के साथ-साथ शनि से जुड़ी परेशानियों को कम करने में भी सहायक माना जाता है। हरा कलावा: स्वास्थ्य और तरक्की का संकेत हरा रंग समृद्धि, विकास और उन्नति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि हरा कलावा बांधने से स्वास्थ्य में सुधार होता है और जीवन में प्रगति के नए अवसर मिलते हैं। ज्योतिष के अनुसार यह रंग बुध ग्रह से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। सफेद कलावा: शांति और पवित्रता का प्रतीक सफेद रंग शांति, पवित्रता और संतुलन का प्रतीक है। सफेद कलावा धारण करने से मन में स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। इसे चंद्रमा और शुक्र ग्रह की कृपा से भी जोड़ा जाता है। नीला कलावा: कर्म और सफलता के लिए नीला रंग धैर्य, अनुशासन और कर्म का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि नीला कलावा पहनने से व्यक्ति अपने कार्यों में एकाग्रता बनाए रखता है और सफलता की ओर आगे बढ़ता है। कई लोग इसे शनि से जुड़ी सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए भी धारण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलावा केवल एक धागा नहीं, बल्कि आस्था और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। सही उद्देश्य और श्रद्धा के साथ इसे धारण करने से जीवन में मानसिक संतुलन, सुरक्षा और सफलता की भावना को बल मिलता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।