नई दिल्ली, एजेंसियां। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने Gen Z युवाओं के विरोध-प्रदर्शन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि किसी मुद्दे को लेकर प्रदर्शन करने वाले युवाओं को सिर्फ प्रदर्शन के आधार पर राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता। भागवत ने युवाओं की शिकायतों को वास्तविक बताते हुए उनके साथ संवाद की जरूरत पर जोर दिया। प्रदर्शन करना राष्ट्रविरोधी होने का प्रमाण नहीं मोहन भागवत ने कहा कि युवाओं का किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठाना अपने आप में राष्ट्रविरोधी गतिविधि नहीं है। उन्होंने Gen Z को लेकर लगाए जाने वाले ऐसे आरोपों से बचने की बात कही और कहा कि युवाओं की बात सुनी जानी चाहिए। भागवत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश में छात्रों और युवाओं के विभिन्न मुद्दों को लेकर प्रदर्शन और असंतोष चर्चा में है। उन्होंने युवाओं की भावनाओं और उनकी समस्याओं को समझने पर जोर दिया। युवाओं की शिकायतें वास्तविक, संवाद जरूरी RSS प्रमुख ने कहा कि Gen Z युवाओं की ओर से उठाई जा रही शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, युवाओं के सवालों और चिंताओं को समझने के लिए संवाद का रास्ता अपनाना जरूरी है। उन्होंने प्रदर्शन को भी संवाद का एक माध्यम बताया। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और अपनी बात रखने की प्रक्रिया को केवल राष्ट्रविरोधी गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। Gen Z और Gen Alpha के युवाओं से बातचीत भागवत ने यह टिप्पणी करीब 2,000 Gen Z और Gen Alpha युवाओं की मौजूदगी वाले एक कार्यक्रम में बातचीत के दौरान की। कार्यक्रम में युवाओं के सवालों और मौजूदा सामाजिक मुद्दों पर चर्चा हुई। भागवत के बयान को युवाओं के साथ संवाद बढ़ाने और उनकी चिंताओं को समझने की अपील के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि युवाओं के विरोध या असहमति को देशविरोधी नजरिए से देखने के बजाय उनके मुद्दों को समझना अधिक जरूरी है। बयान के बाद राजनीतिक चर्चा तेज मोहन भागवत के इस बयान के बाद Gen Z युवाओं के प्रदर्शन, उनकी शिकायतों और सरकार व समाज के साथ उनके संवाद को लेकर चर्चा तेज हो गई है। भागवत का संदेश स्पष्ट है कि युवाओं का विरोध करना या सवाल उठाना उन्हें राष्ट्रविरोधी ठहराने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। उनकी टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है जब युवा वर्ग शिक्षा, रोजगार और अन्य सार्वजनिक मुद्दों को लेकर अपनी आवाज मुखर कर रहा है।
नई दिल्ली: अभिनेत्री और सांसद कंगना रनौत एक बार फिर अपने पुराने बयान को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। हाल ही में उनके ‘जागृत हिंदू’ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा अपनाने की इच्छा से जुड़े बयान के बाद उनका एक पुराना वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो में कंगना पाकिस्तान से अपने लिए जीवनसाथी तलाशने की बात करती नजर आती हैं। पुराने वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स उनके पुराने और हालिया बयानों की तुलना कर रहे हैं। हालांकि, यह वीडियो कब का है और किस संदर्भ में बनाया गया था, इसे समझना भी जरूरी है। पुराने बयान को वर्तमान राजनीतिक विचारों के साथ जोड़कर देखने को लेकर सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। पुराने वीडियो में क्या कहती नजर आईं कंगना? वायरल वीडियो में एक पत्रकार कंगना से उनके लिए पाकिस्तान से लड़का तलाशने की बात करती नजर आती हैं। इसके जवाब में कंगना ने शादी के लिए 30 की उम्र के आसपास के व्यक्ति को पसंद करने की बात कही थी। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि वह व्यक्ति उनके बारे में ज्यादा नहीं जानता हो, तब भी उन्हें इससे कोई परेशानी नहीं होगी। कंगना ने उस बातचीत में सामान्य पारिवारिक जीवन जीने की इच्छा जताते हुए अपने खाना बनाने के शौक का भी जिक्र किया था। उन्होंने बताया था कि वह चिकन कोरमा और चिकन मखनी जैसी डिश बना सकती हैं और भारतीय तथा मुगलई खाना बनाना उन्हें आता है। पुराने बयान पर अब क्यों हो रही चर्चा? इस वीडियो के दोबारा सामने आने की टाइमिंग ने इसे खास बना दिया है। कंगना ने हाल ही में एक वीडियो में खुद को ‘मॉडरेट हिंदू’ बताते हुए कहा था कि वह अब आरएसएस और बीजेपी की विचारधारा को अपनाना चाहती हैं और एक ‘जागृत हिंदू’ बनना चाहती हैं। इसी बयान के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने उनका पुराना वीडियो सामने लाकर सवाल उठाने शुरू कर दिए। कुछ लोगों ने उनके पुराने बयान और मौजूदा राजनीतिक रुख के बीच विरोधाभास बताया, जबकि कुछ का कहना है कि किसी व्यक्ति के पुराने निजी विचारों को वर्षों बाद उसके वर्तमान राजनीतिक विचारों के खिलाफ इस्तेमाल करना उचित नहीं है। सोनाक्षी सिन्हा पर बयान के बाद बढ़ा विवाद कंगना का ताजा विवाद अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा को लेकर दिए गए उनके बयान से भी जुड़ा है। कंगना ने बिना नाम लिए फिल्म इंडस्ट्री की कुछ महिलाओं के राजनीतिक और धार्मिक विचारों पर टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि कुछ हिंदू महिलाएं धर्म और राजनीति के मामले में खुद को तटस्थ रखती हैं, लेकिन मुस्लिम व्यक्ति से संबंध या शादी के बाद उनकी राजनीतिक सोच बदल जाती है। इसी टिप्पणी को सोशल मीडिया यूजर्स ने सोनाक्षी सिन्हा और उनके पति जहीर इकबाल से जोड़कर देखा। इसके बाद कंगना के पुराने वीडियो को सोशल मीडिया पर दोबारा साझा किया जाने लगा। क्या पुराने बयान से मौजूदा विचारधारा तय होती है? यह इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। किसी सार्वजनिक व्यक्ति के पुराने बयान को उसके वर्तमान विचारों के संदर्भ में देखना स्वाभाविक है, लेकिन किसी पुराने निजी या मजाकिया बातचीत को वर्तमान राजनीतिक विचारधारा का अंतिम प्रमाण मानना भी सावधानी की मांग करता है। कंगना के पुराने वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर आलोचना और सवाल उठ रहे हैं, लेकिन उनके पुराने बयान और वर्तमान राजनीतिक रुख के बीच संबंध को लेकर अंतिम निष्कर्ष दर्शकों और मतदाताओं पर छोड़ना अधिक उचित होगा। फिलहाल यह मामला सोशल मीडिया पर राजनीतिक विचारधारा, निजी जीवन और सार्वजनिक बयानों के बीच संबंध को लेकर नई बहस छेड़ चुका है।
India-Taliban Relations: भारत और अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के बीच बढ़ते राजनयिक और व्यापारिक संबंधों पर पाकिस्तान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। पाकिस्तानी सेना के मीडिया विंग इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (ISPR) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने BJP, RSS और तालिबान के संबंधों पर विवादित टिप्पणी करते हुए इसे "मालिक और गुलाम" का रिश्ता बताया। रावलपिंडी में आतंकवाद विरोधी अभियानों और बलूचिस्तान की सुरक्षा स्थिति पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने यह बयान दिया। पाकिस्तान के सरकारी प्रसारक PTV ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस के कुछ हिस्से सोशल मीडिया पर साझा किए हैं। धार्मिक संदर्भ देकर तालिबान पर साधा निशाना प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अहमद शरीफ चौधरी ने धार्मिक आयतों का हवाला देते हुए तालिबान की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जो लोग गैर-मुस्लिमों को अपना मित्र या संरक्षक बनाते हैं, उनका इस्लामी मूल्यों से कोई संबंध नहीं रह जाता। उन्होंने कहा, "क्या मौजूदा तालिबान शासन का कोई भी आचरण इस्लामी मूल्यों को दर्शाता है? महिलाओं और बच्चों के साथ उनका व्यवहार, घर बैठे फतवे जारी करना और मुसलमानों के खून-खराबे को जायज ठहराना—इन सबका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है।" अफगान मंत्री के बयान के बाद बढ़ा विवाद पाकिस्तान की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है, जब हाल ही में अफगानिस्तान के कृषि मंत्री मौलवी अताउल्लाह ओमारी भारत दौरे पर आए थे। नई दिल्ली में आयोजित भारत-अफगानिस्तान व्यापार एवं उद्योग संवाद कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भारत सरकार और विदेश मंत्रालय की मेहमाननवाजी की सराहना करते हुए कहा था कि भारत आकर उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे वे अपने ही लोगों के बीच हों। उन्होंने अपने संबोधन में कहा था, "भारत की धरती पर कदम रखते ही जो अपनापन मिला, उससे लगा कि यह हमारा अपना देश है और हमारा डीएनए एक जैसा है।" भारत-अफगानिस्तान संबंधों पर पाकिस्तान की नजर हाल के महीनों में भारत और अफगानिस्तान के बीच व्यापार, मानवीय सहायता और राजनयिक संपर्कों में बढ़ोतरी देखने को मिली है। दोनों देशों के बीच बढ़ती नजदीकियों पर पाकिस्तान लगातार नजर बनाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि अफगानिस्तान के साथ भारत के बढ़ते संपर्क को पाकिस्तान अपनी क्षेत्रीय रणनीति के लिए चुनौती के रूप में देख रहा है। हालांकि भारत ने अब तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन मानवीय सहायता, व्यापार और राजनयिक संवाद के जरिए दोनों पक्षों के बीच संपर्क लगातार बढ़ रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान की ओर से आई यह टिप्पणी क्षेत्रीय राजनीति में नई बहस का कारण बन गई है।
Baba Ramdev on Gen Z Protest: योग गुरु बाबा रामदेव ने जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि भारत सड़क पर होने वाले प्रदर्शनों से नहीं, बल्कि संसद और संविधान के अनुसार चलता है। साथ ही उन्होंने आंदोलन के दौरान लगाए गए कुछ नारों पर भी आपत्ति जताई और कहा कि मतभेदों का समाधान लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से होना चाहिए। हरिद्वार में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान बाबा रामदेव ने कहा कि शिक्षा मंत्री कौन होगा, इसका फैसला प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री और संसद करती है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार और नीतियों को लेकर असहमति जताने का अधिकार सभी को है, लेकिन इसके लिए संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान जरूरी है। 'ब्राह्मणवाद से आजादी' जैसे नारों पर जताई आपत्ति रामदेव ने आंदोलन के दौरान लगाए गए 'ब्राह्मणवाद से आजादी' और 'आरएसएस से आजादी' जैसे नारों का जिक्र करते हुए कहा कि किसी भी जाति, समुदाय या संगठन के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और समाज को बांटने वाले नारों से बचना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से राष्ट्रवाद की भावना सीखी है तो इसमें आपत्ति की कोई बात नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार, समाज में सभी वर्गों के प्रति सम्मान का भाव होना चाहिए। 'Gen Z ने भारत की छवि खराब की' बाबा रामदेव ने कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कुछ युवाओं ने ऐसी भाषा और व्यवहार अपनाया, जिससे देश की छवि को नुकसान पहुंचा। उन्होंने कहा कि गाली-गलौज और अपमानजनक शब्द भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं। भारत की परंपरा संवाद, सम्मान और मर्यादा की रही है। संवैधानिक तरीके से दूर हों मतभेद अपने संबोधन में रामदेव ने कहा कि नया भारत समानता और समावेश की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि आज महिलाएं भी वेद-पुराणों का अध्ययन कर रही हैं, यज्ञोपवीत धारण कर रही हैं और वैदिक परंपराओं में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। उन्होंने कहा कि अलग-अलग धर्म और विचारधाराएं हो सकती हैं, लेकिन देश की एकता और सामाजिक सौहार्द सबसे महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी मुद्दे पर मतभेद हैं, तो उन्हें लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए।
परिवार और सामाजिक व्यवस्था पर दिया बयान नई दिल्ली, एजेंसियां। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने विवाह और परिवार व्यवस्था को लेकर बयान दिया है। उन्होंने कहा कि शादी जीवन में अनुशासन लाती है और व्यक्ति को जिम्मेदारियों का एहसास कराती है। उन्होंने परिवार को समाज की मूल इकाई बताते हुए कहा कि मजबूत परिवार व्यवस्था से समाज भी मजबूत होता है। विवाह को बताया जिम्मेदारी का माध्यम मोहन भागवत ने कहा कि विवाह केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं बल्कि जिम्मेदारी और कर्तव्यों से जुड़ी व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि शादी के बाद व्यक्ति अपने जीवन में अधिक अनुशासन और संतुलन लाने का प्रयास करता है। परिवार व्यवस्था पर दिया जोर RSS प्रमुख ने कहा कि भारतीय संस्कृति में परिवार का विशेष महत्व रहा है। परिवार व्यक्ति को संस्कार, सहयोग और सामाजिक मूल्यों से जोड़ता है। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के बेहतर निर्माण के लिए परिवार व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना जरूरी है। युवाओं को लेकर भी रखी बात मोहन भागवत ने युवाओं से जीवन में जिम्मेदारी, संयम और मूल्यों को महत्व देने की अपील की। उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में बदलाव के बावजूद परिवार और सामाजिक संबंधों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। बयान पर शुरू हुई चर्चा मोहन भागवत के इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई है। कुछ लोगों ने इसे पारिवारिक मूल्यों से जोड़कर देखा, जबकि कुछ लोगों ने इसे व्यक्तिगत जीवन से जुड़े विषय पर टिप्पणी बताया।
Mohan Bhagwat on Live-in Relationship: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने हैदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान विवाह, ब्रह्मचर्य और बदलते सामाजिक मूल्यों पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज की परंपराएं और जीवन मूल्य हजारों वर्षों के अनुभव पर आधारित हैं, इसलिए आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी जीवनशैली की अंधी नकल करना उचित नहीं है। उन्होंने विशेष रूप से लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि इसे आधुनिकता का प्रतीक मानना गलत है। 'हर व्यक्ति के लिए विवाह अनिवार्य नहीं' मोहन भागवत ने कहा कि भारतीय संस्कृति में विवाह को महत्वपूर्ण संस्था माना गया है, लेकिन यह हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य नहीं है। उन्होंने बताया कि जो लोग विवाह नहीं करते, उनके लिए भी भारतीय परंपरा में स्पष्ट जीवन-पद्धति और अनुशासन निर्धारित किए गए हैं। उन्होंने कहा कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका और जीवनशैली के अनुरूप अलग-अलग नियम बनाए गए हैं। ब्रह्मचारी और संन्यासियों के लिए अलग व्यवस्था आरएसएस प्रमुख ने कहा कि ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारिणी, संन्यासी और संन्यासिनी के लिए आचार्यों ने अलग अनुशासन तय किया है। ऐसे लोग सांसारिक जीवन से अलग रहकर समाज और आध्यात्मिक जीवन के लिए समर्पित रहते हैं। उनके अनुसार, भारतीय परंपरा में हर जीवन-चरण के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन मौजूद है, जिसका उद्देश्य व्यक्ति और समाज दोनों का संतुलित विकास है। 'लिव-इन रिलेशनशिप आधुनिकता नहीं, पतन का संकेत' अपने संबोधन में मोहन भागवत ने लिव-इन रिलेशनशिप पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देशों में इसके सामाजिक परिणाम सामने आ चुके हैं। उनके मुताबिक, समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन हर बदलाव को आधुनिकता मान लेना सही नहीं है। उन्होंने कहा, "यह आधुनिकता नहीं, बल्कि समाज के पतन का संकेत है। यह पश्चिम की अंधी नकल है।" उनका कहना था कि भारतीय समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक मूल्यों को बनाए रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए। 'बदलाव जरूरी है, लेकिन विवेक के साथ' भागवत ने कहा कि समाज को समय के अनुरूप बदलना चाहिए, लेकिन बिना सोचे-समझे किसी भी विदेशी विचार या जीवनशैली को अपनाना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की सामाजिक व्यवस्था परिवार, संस्कार और जिम्मेदारियों पर आधारित रही है और इन्हीं मूल्यों ने समाज को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखा है। उन्होंने लोगों से अपील की कि आधुनिकता और प्रगति के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों का भी सम्मान किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक संतुलित और मजबूत सामाजिक व्यवस्था मिल सके।
नई दिल्ली/अयोध्या: अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट की हालिया बैठक के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और विश्व हिंदू परिषद (VHP) पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने मंदिर में चढ़ावे और चंदे में कथित अनियमितताओं को लेकर कई सवाल उठाए और विशेष जांच दल (SIT) की निष्पक्षता पर भी संदेह जताया। ट्रस्ट की बैठक पर उठाए सवाल पीटीआई के अनुसार, दिग्विजय सिंह ने कहा कि ट्रस्ट की बैठक का परिणाम पहले से तय था। उनके मुताबिक, बैठक में केवल कुछ इस्तीफे स्वीकार किए गए, जबकि पूरे मामले की गंभीरता के अनुरूप कोई ठोस फैसला सामने नहीं आया। उन्होंने कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय होना जरूरी है, ताकि श्रद्धालुओं का भरोसा बना रहे। चंपत राय की भूमिका पर भी उठाए सवाल कांग्रेस नेता ने दावा किया कि चंपत राय विश्व हिंदू परिषद के दिवंगत नेता अशोक सिंघल के करीबी रहे हैं और उन्हें VHP से RSS की भूमिका में लाया गया था। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान चंपत राय की क्या भूमिका थी। दिग्विजय सिंह ने राम मंदिर आंदोलन के दौरान गोली लगने वाले कार्यकर्ता संतोष दुबे का भी उल्लेख करते हुए कहा कि उनके योगदान को भुला दिया गया, जबकि कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाने वालों की बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। VHP और RSS पर साधा निशाना दिग्विजय सिंह ने कहा कि वह वैचारिक रूप से VHP और RSS से असहमत हैं। उनका आरोप है कि ये संगठन लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना में विश्वास नहीं करते। उन्होंने कहा कि भारत सभी नागरिकों का देश है और किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं है। SIT जांच की निष्पक्षता पर सवाल कांग्रेस सांसद ने आरोप लगाया कि मंदिर से जुड़े कथित चंदा गबन का मामला कई वर्षों से सामने आ रहा है। उन्होंने कहा कि जांच के लिए SIT का गठन किया गया है, लेकिन इसमें शामिल अधिकारियों को लेकर निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने मांग की कि पूरे मामले की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच हो, ताकि दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके। जांच जारी राम मंदिर से जुड़े कथित चंदा गबन मामले की जांच फिलहाल SIT कर रही है। ट्रस्ट का कहना है कि जांच पूरी पारदर्शिता के साथ चल रही है और अंतिम रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। वहीं, मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी लगातार जारी है।
अयोध्या: अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे को लेकर सामने आए कथित अनियमितताओं के मामले ने नया राजनीतिक और सामाजिक मोड़ ले लिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है, जबकि बजरंग दल के संस्थापक और पूर्व भाजपा सांसद विनय कटियार ने दावा किया है कि उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत की है। इस बीच, उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है, जो कथित वित्तीय अनियमितताओं और दान प्रबंधन से जुड़े पहलुओं की जांच कर रही है। RSS ने संयम बरतने की अपील की RSS के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। यदि जांच में कोई भी व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने हिंदू समाज से अपील करते हुए कहा कि मामले को लेकर धैर्य बनाए रखें और किसी भी अफवाह या भड़काऊ प्रचार से बचें। उनके अनुसार, कुछ हिंदू विरोधी और राष्ट्र विरोधी ताकतें इस विवाद का फायदा उठाकर समाज में भ्रम फैलाने की कोशिश कर सकती हैं। 'मंदिर प्रबंधन की कमियां दूर हों' होसबाले ने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को इस पूरे मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि मंदिर के प्रबंधन और व्यवस्था में यदि कहीं कोई कमी है तो उसे जल्द दूर किया जाना चाहिए, ताकि करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास कायम रहे। विनय कटियार ने ट्रस्ट के पुनर्गठन की मांग की पूर्व भाजपा सांसद और बजरंग दल के संस्थापक विनय कटियार ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पुनर्गठन की मांग की है। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने इस पूरे मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चर्चा की है। कटियार ने यह भी कहा कि जांच पूरी होने के बाद दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। उनके इस बयान पर अब तक सरकार या जांच एजेंसियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। अब तक आठ गिरफ्तार, दो पदाधिकारियों ने दिया इस्तीफा पुलिस के अनुसार, इस मामले में अब तक आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। वहीं, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पदाधिकारी चंपत रायऔर अनिल मिश्रा ने अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। SIT कर रही है पूरे मामले की जांच उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) दान प्रबंधन, वित्तीय लेन-देन और कथित अनियमितताओं से जुड़े सभी पहलुओं की जांच कर रहा है। जांच रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज अयोध्या राम मंदिर आंदोलन से जुड़े संगठनों और नेताओं के बयान सामने आने के बाद यह मामला राजनीतिक रूप से भी चर्चा का विषय बन गया है। फिलहाल सभी की नजर SIT की जांच और उसकी रिपोर्ट पर टिकी हुई है, जिससे पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। अयोध्या राम मंदिर के दानपात्र से कथित धन गबन के मामले पर पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है। संघ ने इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे करोड़ों राम भक्तों की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंची है। साथ ही, दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की है। दान विवाद पर जताई गहरी चिंता RSS के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है और दान से जुड़ी अनियमितताओं को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों को सख्त सजा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। ट्रस्ट से कमियां दूर करने की अपील RSS ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से मंदिर प्रबंधन में यदि कोई खामियां हैं तो उन्हें तत्काल दूर करने की अपील की। संघ का कहना है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है। 'विवाद का गलत फायदा न उठाएं' RSS ने अपने बयान में लोगों से संयम बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि इस घटना का इस्तेमाल समाज में विभाजन पैदा करने या धार्मिक भावनाएं भड़काने के लिए नहीं होना चाहिए। संगठन ने आरोप लगाया कि कुछ "राष्ट्रविरोधी और हिंदू विरोधी ताकतें" इस विवाद का लाभ उठाने की कोशिश कर रही हैं।
पुणे: राष्ट्रीय एकात्मता को समर्पित संस्था भारत भारती का पंचम राष्ट्रीय अधिवेशन पुणे में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। तीन दिवसीय यह आयोजन 26 से 28 जुलाई 2026 तक पुणे स्थित नाजोश्री जैन भवन में आयोजित किया गया, जिसमें देशभर के 24 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से 400 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस अधिवेशन में कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से कामरूप तक देश के विभिन्न हिस्सों का प्रतिनिधित्व देखने को मिला। पहली बार लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड से भी प्रतिनिधियों की भागीदारी दर्ज की गई, जिससे आयोजन की व्यापकता और अधिक बढ़ गई। राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समरसता पर जोर अधिवेशन के दौरान राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक विरासत, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक समरसता को मजबूत करने पर विशेष चर्चा की गई। प्रतिभागियों ने भारत की विविधता में एकता को और मजबूत करने का संकल्प दोहराया। झारखंड सहित विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने पारंपरिक परिधानों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ कार्यक्रम में भाग लेकर आयोजन को विशेष स्वरूप प्रदान किया। इसरो पूर्व अध्यक्ष डॉ. एस. सोमनाथ ने किया उद्घाटन 26 जुलाई को अधिवेशन का उद्घाटन इसरो के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एस. सोमनाथ ने दीप प्रज्वलन कर किया। अपने संबोधन में उन्होंने भारतीय वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन परंपराओं और वैज्ञानिक सोच के बीच गहरा सामंजस्य है और आने वाले समय में भारत वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर होगा। उन्होंने विकास के साथ विरासत को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। सांस्कृतिक और वैचारिक सत्रों में विविध विषयों पर चर्चा दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरसंघचालक रामदत्त चक्रधर ने संबोधित किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति, एकता और राष्ट्रभावना को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम में विभिन्न सत्रों के दौरान भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। चावल-मिट्टी संग्रह और भारत माता आरती रहा आकर्षण अधिवेशन की विशेष परंपरा के तहत प्रतिभागियों से उनके घर से एक मुट्ठी चावल और एक मुट्ठी मिट्टी लाने का आग्रह किया गया था। इन्हें मिलाकर अंतिम दिन सामूहिक रूप से खीर तैयार की गई, जो एकता का प्रतीक बनी। साथ ही एकत्रित मिट्टी को भविष्य में भारत माता मंदिर निर्माण में उपयोग किए जाने की योजना है। अंतिम दिन 400 से अधिक प्रतिभागियों ने सामूहिक रूप से भारत माता की आरती की, जिसका दृश्य ड्रोन कैमरे से भी रिकॉर्ड किया गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम और राष्ट्रभक्ति का माहौल तीन दिनों तक चले इस अधिवेशन में महाराष्ट्र सहित विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी आकर्षण का केंद्र रहीं। पूरे आयोजन स्थल पर “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम्” के नारों से वातावरण गूंजता रहा। कार्यक्रम में सरदार वल्लभभाई पटेल, भगवान बिरसा मुंडा, छत्रपति शिवाजी महाराज और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जैसी महान विभूतियों को भी स्मरण किया गया। अगले अधिवेशन की जिम्मेदारी जयपुर को कार्यक्रम के समापन पर अगले राष्ट्रीय अधिवेशन की जिम्मेदारी जयपुर को सौंपी गई। साथ ही आगामी कार्यकारिणी बैठक और अन्य राष्ट्रीय कार्यक्रमों की रूपरेखा भी तय की गई।
रांची। आतंकियों के स्लीपर सेल का मॉड्यूल रांची में भी सक्रिय है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) कार्यालय पर पेट्रोल बम से हमले के बाद इसका खुलासा हुआ है। यह हमला एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा था। इसके बाद लखनऊ दहलाने की साजिश थी। दुबई में बैठे तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान (टीटीएच) के सदस्य आवेश राजपूत उर्फ राणा और सहजाद उर्फ शाहनवाज आलम उर्फ भट्ठी ने इसका फरमान जारी कर दिया था। गिरफ्तारी नहीं होती, तो लखनऊ दहलता लखनऊ दहलाने के लिए अमन अंसारी उर्फ गोलू और सैफ अंसारी 17 जून को दोपहर रांची भागकर ट्रेन से कानपुर जा रहे थे। लेकिन, रांची पुलिस ने दोनों को कोडरमा के निकट गझंडी स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया। पुलिस की पूछताछ में अमन अंसारी ने यह खुलासा किया पेट्रोल बम फेंकने का निर्देश दुबई से मिला था। दुबई से लौटकर आया है सैफ उसने बताया कि सितंबर 2025 में वह नौकरी के लिए मुंबई गया था। वहां से जिशान नामक एजेंट ने दुबई भेज दिया। वहां मरमुम स्टार टेक्निकल सर्विस एलएलसी कंपनी में एसी बनाने का काम मिला। वीजा समाप्त होने के बाद कंपनी के सुपरवाइजर अहमद अली ने इसी साल उसे वापस मुंबई भेज दिया। फिर वहां से झारखंड लौट आया। यहां आने के बाद अहमद अली ने ही राणा से फोन पर संपर्क कराया। उसे आरएसएस कार्यालय पर बम फेंकने के लिए तीन लड़कों को तैयार करने के लिए कहा गया। इसकी एवज में पैसे देने की बात कही गई। दुबई से भेजा गया था फोटो और लोकेशन अमन ने पुलिस को बताया कि दुबई से राणा ने 15 जून की रात उसके वॉट्सएप पर रांची आरएसएस कार्यालय का फोटो और लोकेशन भेजा। पेट्रोल बम फेंक कर आरएसएस कार्यालय में आग लगाने का निर्देश दिया। तय योजना के अनुसार सैफ और अमन 16 जून की रात अपने दोस्त सायम सुजान के साथ आरएसएस कार्यालय के पास पहुंचा। सैफ ने पेट्रोल बम फेंका, जबकि अमन पूरी घटना का वीडियो बना रहा था। पहला बम नहीं फटा, जिसकी सूचना राणा को दी। सुनते ही राणा भड़क गया और दूसरा बम फेंकने को कहा। दूसरा बम फेंकने के बाद धमाका हुआ तो तीनों वहां से फरार हो गए। अगले दिन सुबह राणा ने फोन कर कहा-वहां से निकलकर कानपुर चले जाओ। कानपुर से लखनऊ जाकर दूसरी घटना को अंजाम देना है। मोबाइल अमन के पास, दुबई से वॉट्सएप चला रहा था राणा अमन अंसारी ने बताया कि अपने दोस्त हैदर अली से एक मोबाईल और सिमकार्ड 9334314899 लिया था। हैदर ने यह मोबाइल और सिमकार्ड लोहरदगा में रहने वाले एक युवक से गिरवी के रूप में रखा था। युवक ने पैसे देने में देर की तो हैदर ने वह मोबाइल अमन को बेच दिया। अमन इस नंबर का इस्तेमाल अलग-अलग लोगों को फोन करने में करता था। जबकि, दुबई में बैठा राणा 10 जून के बाद इसी नंबर से वाट्सएप अकाउंट बनाकर इस्तेमाल कर रहा था। वॉट्सएप अकाउंट बनाने के लिए अमन ने ही राणा को ओटीपी उपलब्ध कराया था। पहले फायरिंग की थी योजना अमन ने पुलिस को बताया कि राणा और भट्ठी पहले गोली चलवाकर दहशत फैलाना चाहते था। इसके लिए पाकिस्तान से हथियार रांची भेजने का प्लान था। अमन 8 जून को टाटा-अमृतसर एक्सप्रेस से अमृतसर के लिए निकला। लेकिन, डालटनगंज में आनंद विहार जाने वाली ट्रेन में बैठ गया। वह 10 जून को अमृतसर पहुंचा और राजू मेहता के होटल में रुका। इसके बाद राणा ने फोन कर बताया कि हथियार उपलब्ध नहीं हो पाया है, वापस लौट जाओ। 12 जून को वह रवाना हुआ और दिल्ली से ट्रेन पकड़कर लोहरदगा आ गया। फिर प्लान बदला। राणा ने पेट्रोल बम से हमला करने का आदेश दिया। आरोपियों के ठिकाने पर एटीएस की छापेमारी झारखंड एटीएस की टीम ने शुक्रवार की अहले सुबह लोहरदगा स्थित सैफ अंसारी और अमन अंसारी के अलावा रांची में सायन सुजान के घर पर छापेमारी की। एटीएस की एक टीम ने लोहरदगा स्थित दोनों आरोपियों के घर की तलाशी ली। एक-एक सामान की जांच की। इसके बाद घर में मौजूद सैफ के बड़े भाई चांद अंसारी से लंबी पूछताछ भी की। आरोपी अमन की मां से भी कई सवाल किए। एटीएस की दूसरी टीम लोअर बाजार थाना क्षेत्र के कर्बला चौक के पथलकुदवा में सायम सुजान के घर पहुंची जहां घर के एक-एक कोने में गहन तलाशी ली। रांची और लोहरदगा में सक्रिय है स्लीपर सेल बताते चलें कि रांची, लोहरदगा, हजारीबाग और धनबाद में पहले से आतंकियों के स्लीपर सेल सक्रिय हैं। यहां से कई आतंकी संगठनों के गुर्गे पकड़े जा चुके हैं, जो यहां कई तरह की आतंकी गतिविधियों में सक्रिय हैं। पर रांची में आतंकी हमले की यह पहली घटना है।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में एक नए राजनीतिक और कानूनी विवाद के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस नेता प्रियांक खरगे ने संघ प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर सवाल उठाया है कि देश का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करने वाला RSS आज तक औपचारिक रूप से पंजीकृत (Registered) क्यों नहीं हुआ। खरगे ने संगठन की फंडिंग, टैक्स अनुपालन और सार्वजनिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़े किए हैं। प्रियांक खरगे ने कहा कि जब नागरिकों, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), ट्रस्टों, मंदिरों और कंपनियों को कानून के तहत पंजीकरण, लेखा-परीक्षा और पारदर्शिता के नियमों का पालन करना पड़ता है, तो RSS को इससे अलग क्यों रखा जाए। उन्होंने कहा कि 60,000 से अधिक शाखाओं और करोड़ों स्वयंसेवकों का दावा करने वाले संगठन को भी संवैधानिक जवाबदेही के मानकों पर खरा उतरना चाहिए। संघ का पक्ष: रजिस्ट्रेशन कभी अनिवार्य नहीं रहा विवाद के बीच संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि RSS की स्थापना 1925 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी, जब संगठन के पंजीकरण को लेकर कोई अनिवार्य कानूनी व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भी ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया, जिसने RSS के लिए रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाया हो। भागवत के अनुसार, RSS सरकार से कोई अनुदान या वित्तीय लाभ नहीं लेता और एक स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करता है। उन्होंने कहा कि संघ अपने वित्तीय लेन-देन का पूरा रिकॉर्ड रखता है और यदि सरकार कभी जानकारी मांगे तो वह अपना पूरा हिसाब-किताब प्रस्तुत कर सकता है। गुरु दक्षिणा पर नहीं लगता टैक्स RSS की आय का प्रमुख स्रोत ‘गुरु दक्षिणा’ है, जो स्वयंसेवकों द्वारा हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर स्वेच्छा से दिया जाने वाला आर्थिक योगदान है। संघ का तर्क है कि यह व्यावसायिक आय नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों का स्वैच्छिक योगदान है। 1970 के दशक में इस आय पर कर लगाने का प्रयास किया गया था, लेकिन मामला आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) की बंबई पीठ तक पहुंचा। 26 जुलाई 1980 को दिए गए फैसले में न्यायाधिकरण ने माना कि RSS और उसके स्वयंसेवकों के बीच ‘म्यूचुअलिटी’ (Mutuality) का संबंध है, इसलिए गुरु दक्षिणा को कर योग्य आय नहीं माना जा सकता। 'Body of Individuals' के रूप में मान्यता RSS का कहना है कि आयकर अधिकारियों और न्यायालयों ने उसे ‘Body of Individuals’ (BOI) यानी ‘व्यक्तियों का समूह’ माना है। इसका अर्थ यह है कि कुछ व्यक्ति मिलकर एक संगठनात्मक इकाई के रूप में कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनका किसी कंपनी, ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में पंजीकृत होना आवश्यक नहीं है। संघ नेतृत्व का तर्क है कि इसी आधार पर उस पर आयकर की देनदारी लागू नहीं होती और वह मौजूदा कानूनों के तहत वैध रूप से काम कर रहा है। क्या बिना रजिस्ट्रेशन के संगठन गैरकानूनी हो जाता है? कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी संगठन का गैर-पंजीकृत होना उसे स्वतः गैरकानूनी नहीं बनाता। झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अवनीश रंजन मिश्रा के अनुसार, भारत में रजिस्ट्रेशन मुख्य रूप से उन संस्थाओं के लिए आवश्यक होता है, जो सरकार से अनुदान, वित्तीय सहायता या विशेष कानूनी लाभ प्राप्त करना चाहती हैं। ऐसे में केवल रजिस्ट्रेशन न होने के आधार पर RSS को अवैध नहीं कहा जा सकता। क्यों महत्वपूर्ण बन गया है यह विवाद? RSS के रजिस्ट्रेशन को लेकर उठी बहस अब केवल एक कानूनी प्रश्न नहीं रह गई है। यह मुद्दा देश के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में से एक की वित्तीय पारदर्शिता, सार्वजनिक जवाबदेही और संस्थागत नियमन से जुड़ गया है। एक ओर आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं कि इतने बड़े संगठन को अन्य संस्थाओं की तरह पारदर्शिता के नियमों के दायरे में लाया जाना चाहिए, वहीं RSS का कहना है कि उसने कभी कानून का उल्लंघन नहीं किया और मौजूदा कानूनी ढांचे के भीतर ही अपना कार्य संचालित किया है। RSS के शताब्दी वर्ष में उठा यह विवाद आने वाले दिनों में संगठन की संरचना, वित्तीय जवाबदेही और कानूनी स्थिति पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दे सकता है।
फिरोजाबाद: उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले में गुरुवार शाम लखनऊ-दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस पर पथराव की घटना सामने आई। उस समय ट्रेन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख Mohan Bhagwat भी यात्रा कर रहे थे। घटना में ट्रेन के एक कोच की खिड़की का शीशा टूट गया, किसी यात्री के घायल होने की सूचना नहीं है। फिरोजाबाद के पास हुई घटना पुलिस के अनुसार, यह घटना गुरुवार शाम करीब 7:45 बजे इटावा-टुंडला रेलखंड पर पेमेश्वर गेट पुल के पास हुई। इसी दौरान 12003 अप लखनऊ-दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस पर किसी अज्ञात व्यक्ति ने पत्थर फेंक दिया, जिससे एक कोच की खिड़की क्षतिग्रस्त हो गई। मोहन भागवत को कोई नुकसान नहीं पुलिस अधिकारियों ने बताया कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ट्रेन के ई-1 कोच में यात्रा कर रहे थे। वह कानपुर से दिल्ली जा रहे थे। घटना के बावजूद उन्हें किसी प्रकार की चोट नहीं पहुंची और वह पूरी तरह सुरक्षित हैं। रेलवे और पुलिस ने शुरू की जांच घटना की जानकारी मिलते ही रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और स्थानीय पुलिस सक्रिय हो गई। अधिकारियों ने घटनास्थल के आसपास जांच शुरू कर दी है और पथराव करने वाले व्यक्ति की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है। सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा संघ प्रमुख की यात्रा के दौरान हुई इस घटना को गंभीरता से लिया जा रहा है। रेलवे और सुरक्षा एजेंसियां मामले की जांच कर रही हैं तथा यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि पथराव जानबूझकर किया गया था या कोई अन्य कारण था। आरोपियों की तलाश जारी पुलिस का कहना है कि आसपास के क्षेत्र के सीसीटीवी फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्यों की मदद से आरोपी की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है। फिलहाल मामले में किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है और जांच जारी है।
सोशल मीडिया पर चर्चा में रही "कॉकरोच जनता पार्टी" को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख Sunil Ambekar ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र इतना मजबूत है कि वह सभी विचारों, भावनाओं और मतों को अपने भीतर समाहित कर सकता है। नागपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान आंबेकर ने कहा कि भारत में लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत हैं और लोगों को देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भरोसा रखना चाहिए। लोकतंत्र में हर विचार के लिए जगह: आंबेकर कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर पूछे गए सवाल पर आंबेकर ने कहा कि भारत में पारदर्शी चुनाव, स्वतंत्र मीडिया और खुली अभिव्यक्ति की व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में अलग-अलग विचारों और चर्चाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विभिन्न मुद्दे उठना स्वाभाविक है और उन्हें सुलझाने के लिए संवैधानिक तथा लोकतांत्रिक तरीके मौजूद हैं। 'जेन-Z' को देश और संविधान पर भरोसा आंबेकर ने कहा कि भारत का 'जेन-Z' यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी युवा पीढ़ी बेहद आशावादी है। उनके अनुसार, देश के युवाओं का भारत और उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरा विश्वास है। उन्होंने कहा कि युवा संवैधानिक ढांचे के भीतर रहकर अपनी बात रखते हैं और लोकतांत्रिक माध्यमों से बदलाव में विश्वास करते हैं। RSS ने लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जताया भरोसा RSS नेता ने कहा कि भारत की जनता, लोकतांत्रिक संस्थाएं और राजनीतिक व्यवस्था मजबूत हैं। उन्होंने कहा कि देश का लोकतंत्र हर नागरिक की आवाज और भावनाओं को समायोजित करने की क्षमता रखता है। आंबेकर के मुताबिक, मीडिया स्वतंत्र है, राजनीतिक दल सक्रिय हैं और किसी भी संस्था को कमजोर नहीं माना जा सकता। पाकिस्तान से संवाद पर भी रखी राय पाकिस्तान के साथ बातचीत को लेकर RSS सरकार्यवाह Dattatreya Hosabale के हालिया बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए आंबेकर ने कहा कि संघ हमेशा लोगों के बीच संवाद का समर्थक रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकारों के बीच औपचारिक वार्ता राजनीतिक और कूटनीतिक निर्णय का विषय है, लेकिन लोगों के बीच संपर्क और संवाद जारी रहना चाहिए। उनका मानना है कि व्यापार, सामाजिक संपर्क और संवाद से दोनों देशों के संबंधों में सुधार की संभावना बनी रहती है। विभाजन पर RSS का पुराना रुख दोहराया आंबेकर ने कहा कि RSS ऐतिहासिक रूप से भारत के विभाजन का विरोध करता रहा है। उन्होंने दावा किया कि यदि उस समय संगठन अधिक मजबूत स्थिति में होता तो देश का विभाजन टाला जा सकता था। उन्होंने कहा कि संघ आज भी राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को अपनी प्राथमिकता मानता है।
भारत और पाकिस्तान के संबंधों को लेकर हाल में आई कुछ अहम टिप्पणियों ने दोनों देशों के बीच संवाद की संभावनाओं पर नई बहस छेड़ दी है। Rashtriya Swayamsevak Sangh के महासचिव Dattatreya Hosabale और पूर्व सेना प्रमुख Manoj Naravane के बयानों पर पाकिस्तान ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। ‘संवाद के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं होने चाहिए’ RSS महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत को पाकिस्तान के साथ बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आतंकवाद के खिलाफ भारत का सख्त रुख जारी रहना चाहिए। उनके बयान के बाद पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे ने भी लोगों के बीच संपर्क बनाए रखने की वकालत की। उन्होंने कहा, “सीमा के दोनों ओर आम लोग रहते हैं और उनकी रोजमर्रा की समस्याएं काफी हद तक समान हैं। लोगों के बीच संपर्क बेहतर संबंध बनाने में मदद कर सकते हैं।” पाकिस्तान ने क्या कहा? इन बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए Ministry of Foreign Affairs के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने इन्हें “सकारात्मक संकेत” बताया। उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि भारत में समझदारी की आवाजें और मजबूत होंगी। पिछले कई वर्षों से जो आक्रामक बयानबाजी और तनाव देखने को मिला है, वह खत्म होना चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान संवाद को एक विकल्प के रूप में स्वीकार किए जाने का स्वागत करता है। बैकचैनल बातचीत पर टिप्पणी से इनकार ताहिर अंद्राबी ने बैकचैनल या अनौपचारिक संपर्कों को लेकर चल रही अटकलों पर टिप्पणी करने से इनकार किया। उन्होंने कहा, “अगर मैं बैकचैनल पर टिप्पणी करूंगा, तो वह बैकचैनल नहीं रहेगा। इस विषय पर मैं कुछ नहीं कहना चाहता।” पाकिस्तान में RSS को कैसे देखा जाता है? पाकिस्तान में RSS को आमतौर पर एक हिंदू राष्ट्रवादी संगठन के रूप में देखा जाता है, जिसका भारत की मौजूदा सत्तारूढ़ व्यवस्था से करीबी संबंध माना जाता है। ऐसे में RSS नेतृत्व की ओर से संवाद पर दिया गया बयान पाकिस्तान में विशेष रूप से चर्चा का विषय बना हुआ है। क्या बदल सकते हैं भारत-पाक संबंध? विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच फिलहाल कई संवेदनशील मुद्दे मौजूद हैं, जिनमें आतंकवाद, सीमा सुरक्षा और राजनीतिक तनाव शामिल हैं। हालांकि, संवाद और लोगों के बीच संपर्क को लेकर आई हालिया टिप्पणियां भविष्य में कूटनीतिक माहौल को प्रभावित कर सकती हैं। भारत सरकार की ओर से इन बयानों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
Pakistan ने भारत में पाकिस्तान के साथ बातचीत की वकालत करने वाली आवाजों का स्वागत किया है। पाकिस्तान ने कहा कि दोनों देशों के बीच शांति, सुरक्षा और साझा समृद्धि के लिए संवाद और रचनात्मक सहयोग जरूरी हैं। यह प्रतिक्रिया उस समय आई है जब भारत के पूर्व सेना प्रमुख Manoj Naravane ने Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) के नेता दत्तात्रेय होसबाले के उस बयान का समर्थन किया था, जिसमें पाकिस्तान के साथ बातचीत के दरवाजे खुले रखने की बात कही गई थी। पाकिस्तान ने क्या कहा? पाकिस्तान विदेश कार्यालय के प्रवक्ता Tahir Andrabi ने कहा कि भारत के भीतर संवाद पर जोर देने वाली आवाजें “सकारात्मक घटनाक्रम” हैं। उन्होंने कहा, “हम आशा करते हैं कि भारत में समझदारी बढ़ेगी। अब यह देखना होगा कि इन आवाजों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है या नहीं।” हालांकि, उन्होंने दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे किसी तरह की बातचीत की पुष्टि या खंडन करने से इनकार कर दिया। ‘गोपनीय बातचीत पर टिप्पणी नहीं’ ताहिर अंद्राबी ने कहा कि अगर किसी बैकचैनल या गोपनीय बातचीत पर सार्वजनिक टिप्पणी की जाए, तो उसका उद्देश्य ही खत्म हो जाता है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान कूटनीति, संप्रभुता के सम्मान और सार्थक अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध है। भारत का रुख अब भी सख्त भारत सरकार पहले कई बार साफ कर चुकी है कि “आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते।” केंद्र सरकार का कहना रहा है कि सीमा पार आतंकवाद खत्म होने के बाद ही संबंधों में सामान्य स्थिति संभव है। LOC और क्षेत्रीय हालात पर भी बयान पाकिस्तानी प्रवक्ता ने कहा कि नियंत्रण रेखा (LoC) पर पाकिस्तानी सैनिक हर स्थिति के लिए सतर्क हैं और किसी भी युद्धविराम उल्लंघन का जवाब देने के लिए तैयार रहते हैं। अमेरिका-ईरान वार्ता पर भी बोला पाकिस्तान अंद्राबी ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी शांति प्रयासों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इस प्रक्रिया में सकारात्मक भूमिका निभा रहा है और दोनों पक्षों के बीच स्थायी शांति की उम्मीद रखता है। फिर उठा कश्मीर मुद्दा प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर मुद्दा उठाया। प्रवक्ता ने भारतीय प्रशासित कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए और कहा कि पाकिस्तान इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहेगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान एक तरफ बातचीत की बात कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ कश्मीर को केंद्र में रखकर अपने पुराने रुख पर कायम है। ऐसे में दोनों देशों के रिश्तों में तत्काल नरमी की संभावना फिलहाल कम दिखाई दे रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।