Rural Development

New Anganwadi centers planned in Dhanbad with over ₹14 crore investment for better child development facilities
धनबाद में 51 आंगनबाड़ी केंद्रों के बनेंगे नए भवन, 14 करोड़ से ज्यादा खर्च होंगे

धनबाद: जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों को बेहतर और सुविधाजनक बनाने की दिशा में जिला प्रशासन ने बड़ा कदम उठाया है। डीएमएफटी फंड से 51 आंगनबाड़ी केंद्रों के नए भवन बनाए जाएंगे। इन केंद्रों को मॉडल सेंटर के रूप में विकसित करने की योजना है, ताकि बच्चों को पढ़ाई, पोषण और अन्य गतिविधियों के लिए बेहतर वातावरण मिल सके। 51 केंद्रों पर खर्च होंगे 14.05 करोड़ रुपये प्रस्तावित भवनों के निर्माण पर कुल करीब 14.05 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यानी प्रत्येक भवन पर लगभग 27.54 लाख रुपये खर्च किए जाएंगे। निर्माण कार्य की जिम्मेदारी लघु सिंचाई विभाग को दी गई है। नए भवनों में बच्चों के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर रहेगा। इसका उद्देश्य आंगनबाड़ी केंद्रों को केवल बच्चों के बैठने की जगह तक सीमित न रखकर उन्हें बेहतर बाल विकास केंद्र के रूप में विकसित करना है। निरसा में बनेंगे सबसे ज्यादा 43 केंद्र कुल 51 प्रस्तावित आंगनबाड़ी केंद्रों में सबसे ज्यादा 43 केंद्र निरसा प्रखंड में बनाए जाएंगे। इसके अलावा केलियासोल में दो और चिरकुंडा नगर परिषद क्षेत्र में छह नए भवन बनाए जाने की योजना है। योजना में बांदा, पटलाबाड़ी, उरमा, धोबारी, सालूकचापड़ा, पांड्रा, मदनपुर और वीरसिंहपुर समेत कई क्षेत्र शामिल हैं। वहीं शिवलीबाड़ी, श्यामपुर, कालूबथान, कुमारधुबी, कुशडंगाल और चिरकुंडा में भी नए आंगनबाड़ी भवन प्रस्तावित हैं। बच्चों को मिलेगा बेहतर माहौल नए भवन तैयार होने के बाद आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों को अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक वातावरण मिलने की उम्मीद है। इन केंद्रों के जरिए बच्चों के पोषण, प्रारंभिक शिक्षा और समग्र विकास से जुड़ी गतिविधियों को बेहतर तरीके से संचालित किया जा सकेगा। संपादकीय नजरिया आंगनबाड़ी केंद्र ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बच्चों के शुरुआती विकास और पोषण की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। ऐसे में नए भवनों का निर्माण सकारात्मक पहल है। हालांकि, भवन बनने के साथ यह भी जरूरी है कि वहां स्वच्छ पेयजल, शौचालय, पोषण सामग्री, शिक्षण संसाधन और पर्याप्त मानव संसाधन जैसी सुविधाएं नियमित रूप से उपलब्ध रहें। तभी मॉडल आंगनबाड़ी केंद्र बनाने का उद्देश्य वास्तव में पूरा हो सकेगा।  

surbhi अगस्त 20, 2026 0
Bihar RWD district laboratories to test road construction materials and deliver quality reports within 24 hours
बिहार के हर जिले में बनेगी RWD लैब, 24 घंटे में मिलेगी रिपोर्ट; घटिया सड़क निर्माण पर कसेगा शिकंजा

Bihar RWD Laboratory: बिहार में ग्रामीण सड़कों और पुल-पुलियों की गुणवत्ता सुधारने के लिए ग्रामीण कार्य विभाग ने एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। अब सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाली गिट्टी, मिट्टी, सीमेंट और डामर की गुणवत्ता जांच के लिए नमूनों को पटना भेजकर लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। विभाग राज्य के सभी जिलों में जिला स्तरीय प्रयोगशालाएं स्थापित करने की तैयारी कर रहा है। इन प्रयोगशालाओं में निर्माण सामग्री की जांच स्थानीय स्तर पर की जाएगी और विभाग की योजना के अनुसार 24 घंटे के भीतर जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराने की व्यवस्था होगी। इससे न केवल सड़क निर्माण की प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है, बल्कि निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर निगरानी भी मजबूत होगी। हर जिले में होगी RWD की अपनी प्रयोगशाला ग्रामीण कार्य विभाग ने जिला स्तर पर प्रयोगशालाएं स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। विभाग के मुख्य अभियंता ने सभी कार्यपालक अभियंताओं को करीब 2,000 से 2,500 वर्ग फीट उपयुक्त जगह चिह्नित करने का निर्देश दिया है। जिन जिलों में सरकारी जमीन या भवन उपलब्ध नहीं है, वहां किराये के भवन में भी प्रयोगशाला शुरू करने का विकल्प रखा गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भवन या जमीन की अनुपलब्धता के कारण लैब की स्थापना में अनावश्यक देरी न हो। अधिकारियों को जल्द से जल्द उपयुक्त स्थान चिह्नित कर रिपोर्ट देने को कहा गया है, ताकि प्रयोगशालाओं को जल्द कार्यशील बनाया जा सके। अब पटना भेजने की जरूरत कम होगी फिलहाल सड़क निर्माण से जुड़े कई नमूनों को जांच के लिए दूसरे स्थानों, विशेष रूप से पटना भेजना पड़ता है। नमूने भेजने और रिपोर्ट प्राप्त करने में लगने वाला समय कई बार निर्माण कार्य की निगरानी को प्रभावित करता है। जिला स्तर पर प्रयोगशाला शुरू होने के बाद संबंधित जिले में ही निर्माण सामग्री की वैज्ञानिक जांच संभव होगी। इससे अधिकारियों को मौके के करीब रहते हुए गुणवत्ता संबंधी निर्णय लेने में मदद मिलेगी। गिट्टी की मजबूती, मिट्टी की गुणवत्ता, सीमेंट और डामर जैसे महत्वपूर्ण निर्माण पदार्थों की जांच स्थानीय स्तर पर की जा सकेगी। 24 घंटे में रिपोर्ट मिलने से क्या बदलेगा? इस पूरी योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जांच रिपोर्ट की समयसीमा है। विभाग की योजना के मुताबिक नमूने की जांच के बाद 24 घंटे के भीतर रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाएगी। इससे निर्माण के दौरान यदि किसी सामग्री की गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं मिलती है, तो समय रहते उस पर कार्रवाई की जा सकेगी। घटिया सामग्री को निर्माण में इस्तेमाल होने से पहले ही हटाने या बदलने का रास्ता साफ हो सकता है। इससे निर्माण पूरा होने के बाद सड़क की गुणवत्ता खराब होने पर दोबारा मरम्मत कराने जैसी स्थिति को भी कम करने में मदद मिल सकती है। ठेकेदारों की मनमानी पर बढ़ेगी निगरानी ग्रामीण इलाकों में सड़क बनने के कुछ समय बाद उसके टूटने, उखड़ने या गड्ढों की शिकायतें अक्सर सामने आती हैं। ऐसी स्थिति में सड़क निर्माण में इस्तेमाल सामग्री की गुणवत्ता भी सवालों के घेरे में आती है। जिला स्तरीय प्रयोगशालाएं विभाग को निर्माण सामग्री की जांच के लिए एक स्थानीय और तेज व्यवस्था उपलब्ध करा सकती हैं। यदि किसी ठेकेदार या निर्माण एजेंसी द्वारा निर्धारित मानकों से कम गुणवत्ता वाली सामग्री इस्तेमाल की जाती है, तो जांच रिपोर्ट के आधार पर जवाबदेही तय करने में मदद मिल सकती है। यही वजह है कि इस व्यवस्था को ठेकेदारों की निगरानी मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। भ्रष्टाचार और अनियमितता पर भी लग सकता है अंकुश सड़क निर्माण में गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतों के साथ-साथ अनियमितताओं के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक जांच की व्यवस्था विभाग के लिए निगरानी का एक अतिरिक्त माध्यम बन सकती है। यदि किसी निर्माण स्थल से लिए गए नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं, तो उसकी जांच रिपोर्ट रिकॉर्ड के रूप में उपलब्ध रहेगी। इससे निर्माण एजेंसी या ठेकेदार की जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया को मजबूती मिल सकती है। हालांकि, लैब की स्थापना के साथ-साथ यह भी जरूरी होगा कि नमूने पारदर्शी तरीके से लिए जाएं और जांच रिपोर्ट के आधार पर समय पर कार्रवाई की जाए। आम लोगों को भी मिलेगा फायदा इस योजना का असर केवल विभाग और ठेकेदारों तक सीमित नहीं रहेगा। बिहार की ग्रामीण सड़कें गांवों को बाजार, स्कूल, अस्पताल, प्रखंड कार्यालय और जिला मुख्यालय से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। सड़क की खराब गुणवत्ता का सीधा असर ग्रामीणों के आवागमन, व्यापार और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर निर्माण सामग्री की जांच होने से गुणवत्ता संबंधी शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है। यदि किसी गांव में सड़क निर्माण को लेकर शिकायत सामने आती है, तो संबंधित विभाग स्थानीय स्तर पर सामग्री और निर्माण की जांच कराने में पहले की तुलना में अधिक सक्षम हो सकता है। मुजफ्फरपुर में भी शुरू हुई जगह की तलाश जिला स्तरीय प्रयोगशालाओं के लिए जगह चिह्नित करने की प्रक्रिया विभिन्न जिलों में आगे बढ़ रही है। मुजफ्फरपुर में भी प्रयोगशाला के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश शुरू कर दी गई है। सरकार की कोशिश है कि सभी जिलों में आवश्यक आधारभूत व्यवस्था तैयार कर प्रयोगशालाओं को जल्द से जल्द काम करने की स्थिति में लाया जाए। गांवों की सड़कों की गुणवत्ता पर होगा सीधा असर बिहार में ग्रामीण सड़कें केवल परिवहन का साधन नहीं हैं। ये ग्रामीण क्षेत्रों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बाजार से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इसलिए इनकी मजबूती और टिकाऊपन सीधे ग्रामीण विकास से जुड़ा हुआ है। जिला स्तर पर RWD लैब की स्थापना से निर्माण सामग्री की जांच में तेजी, गुणवत्ता की बेहतर निगरानी और शिकायतों के त्वरित समाधान की उम्मीद है। हालांकि, इस योजना की वास्तविक सफलता केवल लैब स्थापित करने से तय नहीं होगी। प्रयोगशालाओं में पर्याप्त तकनीकी संसाधन, प्रशिक्षित कर्मी, पारदर्शी सैंपलिंग और जांच रिपोर्ट के आधार पर सख्त कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी होगी। अगर इन सभी पहलुओं पर प्रभावी तरीके से काम हुआ, तो बिहार की ग्रामीण सड़कों के निर्माण में गुणवत्ता सुधारने की दिशा में यह व्यवस्था बड़ा बदलाव ला सकती है।  

surbhi अगस्त 13, 2026 0
VB-G RAM G records 9.69 crore person-days of rural employment as average daily wages rise to ₹327.4.
VB-G RAM G: पहले महीने में 9.69 करोड़ पर्सन-डे रोजगार, मजदूरी 327.4 रुपये; 400 रुपये न्यूनतम वेतन की सिफारिश

ग्रामीण भारत में रोजगार और मजदूरी को लेकर नई योजना VB-G RAM G के शुरुआती आंकड़े सामने आए हैं। सरकार ने लोकसभा में बताया कि योजना लागू होने के करीब एक महीने में 9.69 करोड़ से अधिक पर्सन-डे रोजगार दर्ज किए गए हैं। इसके साथ ही औसत दैनिक मजदूरी बढ़कर 327.4 रुपये हो गई है। वहीं, ग्रामीण विकास और पंचायती राज पर संसदीय स्थायी समिति ने मजदूरी निर्धारण की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करते हुए 400 रुपये प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी तय करने पर विचार करने की सिफारिश की है। इससे ग्रामीण श्रमिकों की आय और रोजगार व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। एक महीने में 9.69 करोड़ से ज्यादा रोजगार लोकसभा में दिए गए लिखित जवाब के अनुसार, VB-G RAM G लागू होने के बाद पहले महीने में 9.69 करोड़ से अधिक पर्सन-डे रोजगार दर्ज किए गए। सरकार के मुताबिक, यह योजना देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लागू है और इसके तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के वेतन वाले रोजगार की कानूनी गारंटी दी गई है। यह सुविधा उन परिवारों के वयस्क सदस्यों के लिए है, जो अकुशल शारीरिक श्रम करने के लिए स्वेच्छा से तैयार हों। मजदूरी बढ़कर 327.4 रुपये प्रतिदिन नई व्यवस्था में ग्रामीण मजदूरों की औसत दैनिक मजदूरी में भी बढ़ोतरी हुई है। 1 जुलाई से 300 रुपये प्रतिदिन की अंतरिम बेस वेज रेट लागू की गई थी। इसके बाद राष्ट्रीय औसत घोषित मजदूरी 298.8 रुपये से बढ़कर 327.4 रुपये प्रतिदिन हो गई। यानी औसत आधार पर मजदूरी में 28.6 रुपये प्रतिदिन की बढ़ोतरी हुई है। इससे पहले कई राज्यों में घोषित मजदूरी 300 रुपये से भी कम थी। सबसे कम घोषित मजदूरी दर 241 रुपये प्रतिदिन बताई गई थी। संसदीय समिति ने मांगी 400 रुपये न्यूनतम मजदूरी इसी बीच ग्रामीण विकास और पंचायती राज पर संसदीय स्थायी समिति ने मजदूरी तय करने की मौजूदा प्रणाली में बदलाव की जरूरत बताई है। कांग्रेस सांसद सप्तगिरि शंकर उलका की अध्यक्षता वाली समिति ने 2011 के आधार वर्ष और CPI-AL यानी कृषि श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की पर्याप्तता की समीक्षा करने की सिफारिश की है। समिति का कहना है कि अलग-अलग क्षेत्रों में महंगाई और जीवन-यापन की लागत को देखते हुए 400 रुपये प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी तय करने पर विचार किया जाना चाहिए। महंगाई के अनुसार मजदूरी तय करने पर जोर संसदीय समिति ने ग्रामीण इलाकों में वास्तविक जीवन-यापन की लागत को दर्शाने वाले बेहतर महंगाई संकेतक की जरूरत पर जोर दिया है। समिति ने मजदूरी में व्यवस्थित और प्रभावी इंडेक्सेशन की सिफारिश की है, ताकि महंगाई बढ़ने के साथ ग्रामीण श्रमिकों की आय में भी उचित बदलाव हो सके। समिति ने यह भी कहा है कि जब तक मजदूरी निर्धारण की संरचना में व्यापक बदलाव नहीं होता, तब तक मौजूदा चक्र में वेतन बढ़ाने के लिए पर्याप्त वित्तीय गुंजाइश तैयार की जानी चाहिए। तीन महीने में कार्रवाई रिपोर्ट संसदीय समिति ने अपनी सिफारिशों पर सरकार से तीन महीने के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट ग्रामीण विकास विभाग से जुड़ी वर्ष 2026-27 की अनुदान मांगों पर की गई सिफारिशों और उनके अनुपालन से संबंधित है। अब देखना होगा कि सरकार 400 रुपये न्यूनतम मजदूरी की सिफारिश को किस रूप में आगे बढ़ाती है। राज्यों के सामने 60:40 फंडिंग की चुनौती VB-G RAM G की फंडिंग व्यवस्था को लेकर राज्यों की चिंता भी सामने आई है। ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुताबिक, योजना में सामान्य राज्यों के लिए 60:40 का फंडिंग मॉडल अपनाया गया है। यानी योजना के खर्च में केंद्र और राज्य दोनों की हिस्सेदारी होगी। सरकार का कहना है कि राज्यों के साथ इस विषय पर नियमित बातचीत जारी है। वहीं, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 90:10 का फंडिंग पैटर्न रखा गया है। इसमें 90 फीसदी खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी। रोजगार के साथ मजदूरी पर भी नजर VB-G RAM G के शुरुआती आंकड़ों ने ग्रामीण रोजगार व्यवस्था की तस्वीर को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी सामने रखी है। एक तरफ सरकार 9.69 करोड़ से अधिक पर्सन-डे रोजगार का आंकड़ा बता रही है, तो दूसरी तरफ संसदीय समिति मजदूरी को मौजूदा महंगाई और जीवन-यापन की लागत के अनुरूप बढ़ाने की जरूरत पर जोर दे रही है। अब आने वाले समय में योजना की असली परीक्षा इस बात से होगी कि 125 दिनों की रोजगार गारंटी कितने परिवारों तक प्रभावी रूप से पहुंचती है और मजदूरी में प्रस्तावित बढ़ोतरी का वास्तविक लाभ ग्रामीण श्रमिकों को कितना मिलता है।  

surbhi अगस्त 12, 2026 0
Over 2,000 Bihar mukhiyas face scrutiny over alleged irregularities in development schemes, with action initiated against 12.
बिहार के 2 हजार से अधिक मुखिया जांच के घेरे में, 12 पर पद से हटाने की कार्रवाई शुरू; विकास योजनाओं में अनियमितता के आरोप

Bihar Mukhiya News: बिहार की ग्राम पंचायतों में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सामने आई कथित वित्तीय अनियमितताओं ने पंचायती राज व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य की 2,000 से अधिक पंचायतों के मुखिया जांच के दायरे में बताए जा रहे हैं। वहीं, गंभीर आरोपों के चलते 12 मुखियाओं के खिलाफ पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई है। जांच का दायरा मुख्यमंत्री ग्रामीण सोलर स्ट्रीट लाइट योजना, नल-गली, नल-जल और स्वच्छता समेत विभिन्न विकास योजनाओं तक फैला हुआ है। प्रमंडलीय आयुक्तों के स्तर पर हुई जांच में कई पंचायतों में निर्धारित प्रक्रियाओं की अनदेखी, दस्तावेजों की कमी और सरकारी राशि के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, जांच के दायरे में आने का अर्थ दोषी साबित होना नहीं है। संबंधित मामलों में अंतिम कार्रवाई जांच और विभागीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही तय होगी। सोलर स्ट्रीट लाइट योजना में भी उठे सवाल जांच के दौरान कुछ पंचायतों में सोलर स्ट्रीट लाइट की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आई हैं। आरोप है कि निर्धारित मानकों के अनुरूप सामग्री नहीं लगाई गई और कुछ स्थानों पर सोलर लाइट, बैटरी तथा पोल की गुणवत्ता संतोषजनक नहीं थी। कुछ मामलों में लगाए गए उपकरण थोड़े समय बाद खराब होने की बात भी सामने आई। इसके अलावा खरीद प्रक्रिया और संबंधित भुगतान को लेकर भी जांच अधिकारियों ने सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों और वार्ड सदस्यों को योजना से संबंधित पर्याप्त जानकारी नहीं दिए जाने के आरोप भी जांच का हिस्सा हैं। एस्टीमेट और मेजरमेंट बुक नहीं मिलने से बढ़ी परेशानी जांच में कई पंचायतों में विकास कार्यों से जुड़े जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई है। इनमें एस्टीमेट, मेजरमेंट बुक यानी एमबी और अन्य संबंधित अभिलेख शामिल हैं। कुछ मामलों में आरोप है कि काम पूरा होने से पहले ही राशि की निकासी कर ली गई। वहीं, कुछ योजनाओं में कागजों पर काम पूरा दिखाकर भुगतान किए जाने की शिकायत भी जांच में सामने आई है। यदि जांच में ऐसे आरोप प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय की जा सकती है। ग्राम सभा की प्रक्रिया पर भी सवाल पंचायत स्तर पर योजनाओं की स्वीकृति और क्रियान्वयन में ग्राम सभा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन जांच के दौरान कुछ पंचायतों में ग्राम सभा नहीं कराने या निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना राशि खर्च करने के आरोप सामने आए हैं। कुछ मामलों में वार्ड सदस्यों को जरूरी सूचनाएं उपलब्ध नहीं कराने और पंचायत बैठकों से लगातार अनुपस्थित रहने की शिकायत भी दर्ज की गई है। यही वजह है कि विभागीय स्तर पर केवल योजनाओं की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया और वित्तीय दस्तावेजों की भी जांच की जा रही है। समस्तीपुर में ललिता देवी पर कार्रवाई की सिफारिश समस्तीपुर जिला प्रशासन ने मुखिया ललिता देवी के खिलाफ पद से हटाने की कार्रवाई की सिफारिश की है। रिपोर्ट के मुताबिक, समस्तीपुर के डीएम रोशन कुशवाहा ने लोक प्रहरी-सह-प्रमंडलीय आयुक्त को पत्र भेजकर बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 18(5) के तहत कार्रवाई का अनुरोध किया है। यह कार्रवाई जांच में सामने आए आरोपों और प्रशासनिक रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है। इन 12 मुखियाओं के खिलाफ शुरू हुई प्रक्रिया गंभीर अनियमितताओं, पंचायत बैठकों से लगातार अनुपस्थित रहने और ग्राम सभा नहीं कराने समेत अलग-अलग आरोपों में जिन 12 मुखियाओं के खिलाफ पदमुक्ति की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी दी गई है, उनमें शामिल हैं: इम्तियाज अंसारी — काजीपुर सिमरी, बक्सर दीपनारायण सिंह — पहरी सिमरी, बक्सर बटोरन कुमार — डोमा, बख्तियारपुर, पटना अजय कुमार — बरिसवन, शाहपुर, भोजपुर शिवशंकर सिंह — रामपुर डीह, हनुमान नगर, दरभंगा रमेश मांझी — श्रीपुर गाहर पश्चिमी, खानपुर, समस्तीपुर मोहम्मद नदीमुर रहमान — ठिकही, कटरा, मुजफ्फरपुर किरण बाला — अखलासपुर, कैमूर अखिलेश रजक — भीखनपुरा, देसरी, वैशाली रामानंद सिंह — पिंजौरा, जहानाबाद अंजली कुमारी — सहाजितपुर, सारण आजाद शाह — मोकरमपुर, मधुबनी इन मामलों में विभागीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अंतिम निर्णय सामने आएगा। दोष साबित हुआ तो क्या हो सकता है? पंचायती राज विभाग ने विकास योजनाओं में सरकारी धन के दुरुपयोग को गंभीर मामला माना है। जांच में आरोप सही पाए जाने पर संबंधित जनप्रतिनिधि को पद से हटाने की कार्रवाई हो सकती है। इसके अलावा नियमों के तहत दोषी पाए जाने वाले जनप्रतिनिधियों पर पंचायत चुनाव लड़ने से पांच साल तक रोक लग सकती है। यदि सरकारी राशि के गबन या दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो संबंधित रकम की वसूली की कार्रवाई भी की जा सकती है। 2 हजार से अधिक मुखियाओं की जांच क्यों महत्वपूर्ण? बिहार में पंचायत स्तर पर बड़ी संख्या में विकास योजनाओं का संचालन होता है और इनके लिए सरकारी धन आवंटित किया जाता है। ऐसे में योजनाओं की गुणवत्ता, भुगतान की पारदर्शिता और ग्राम सभा की प्रक्रिया का पालन सीधे तौर पर ग्रामीण विकास से जुड़ा विषय है। 2,000 से अधिक मुखियाओं का जांच के दायरे में आना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पंचायतों में योजनाओं के क्रियान्वयन और वित्तीय प्रबंधन की व्यापक समीक्षा का संकेत मिलता है। अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि जांच में कितने मामलों में आरोप प्रमाणित होते हैं और कितने मामलों में संबंधित जनप्रतिनिधियों को क्लीन चिट मिलती है। अंतिम कार्रवाई जांच रिपोर्ट और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही तय होगी।  

surbhi अगस्त 11, 2026 0
Jharkhand government approves new JSLPS HR policy with 1300 new posts, increased insurance cover and employee benefits.
JSLPS में 1300 नए पदों पर होगी भर्ती, 30 लाख का एक्सीडेंटल कवर और बढ़े भत्ते; हेमंत सरकार का बड़ा फैसला

रांची: झारखंड सरकार ने झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) के कर्मचारियों और नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने JSLPS की नई मानव संसाधन (HR) पॉलिसी को मंजूरी दे दी है। नई नीति के तहत करीब 1300 नए पदों का सृजन किया जाएगा, जिससे राज्य में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। साथ ही मौजूदा कर्मचारियों को वेतन-भत्तों, बीमा और अन्य सुविधाओं में भी बड़ा लाभ मिलेगा। ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह की पहल पर तैयार की गई इस नई नीति का उद्देश्य JSLPS को अधिक मजबूत बनाना, कार्यक्षमता बढ़ाना और ग्रामीण विकास योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना है। सरकार का मानना है कि अतिरिक्त मानव संसाधन मिलने से स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़े कार्यक्रमों को और गति मिलेगी। 1300 नए पदों से बढ़ेंगे रोजगार के अवसर नई HR पॉलिसी के तहत JSLPS में लगभग 1300 अतिरिक्त पदों का सृजन किया जाएगा। इन पदों पर भर्ती होने से बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार का अवसर मिलेगा। साथ ही विभिन्न प्रखंडों और जिलों में चल रहे आजीविका कार्यक्रमों के संचालन के लिए पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध हो सकेगा। कर्मचारियों को मिलेंगे कई नए लाभ नई व्यवस्था लागू होने के बाद JSLPS के कर्मचारियों को कई नई सुविधाएं मिलेंगी। सरकार ने लैपटॉप भत्ता और संचार भत्ता बढ़ाने का फैसला किया है, ताकि फील्ड में काम करने वाले कर्मचारियों को तकनीकी और संचार संबंधी दिक्कतों का सामना न करना पड़े। इसके अलावा पहली बार कर्मचारियों को शिक्षा भत्ता और व्यावसायिक विकास भत्ता भी दिया जाएगा। सरकार का कहना है कि इससे कर्मचारियों और उनके परिवार के शैक्षणिक एवं पेशेवर विकास को बढ़ावा मिलेगा। स्वास्थ्य और बीमा सुविधाओं में बड़ा इजाफा नई HR पॉलिसी में कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। स्वास्थ्य संबंधी खर्चों के लिए कर्मचारी अब हर महीने 1000 रुपये तक का हेल्थ क्लेम कर सकेंगे। पात्र कर्मचारियों को ग्रेच्युटी का लाभ भी मिलेगा। प्रखंड स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों के फील्ड विजिट (क्षेत्र भ्रमण) भत्ते में बढ़ोतरी की गई है। पहली बार जिला स्तर के कर्मचारियों को भी क्षेत्र भ्रमण भत्ते का लाभ मिलेगा। 30 लाख का दुर्घटना बीमा, 20 लाख का मेडिक्लेम नई नीति के तहत कर्मचारियों के बीमा कवर में भी बड़ा इजाफा किया गया है। समूह व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा की राशि 20 लाख रुपये से बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दी गई है। समूह मेडिक्लेम बीमा को 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि इससे कर्मचारियों और उनके परिवारों को आर्थिक सुरक्षा मिलेगी और आपात परिस्थितियों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ मिल सकेगा। क्या बोलीं ग्रामीण विकास मंत्री? ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि यह JSLPS कर्मचारियों के सुरक्षित, समृद्ध और बेहतर भविष्य की दिशा में बड़ा कदम है। उन्होंने बताया कि लंबे समय से नई HR पॉलिसी लागू करने की मांग की जा रही थी, जिसे अब सरकार ने मंजूरी दे दी है। उन्होंने कहा कि नई व्यवस्था से न केवल कर्मचारियों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी, बल्कि 1300 नए पदों के सृजन से युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और JSLPS की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय सुधार होगा। ग्रामीण विकास योजनाओं को मिलेगी नई रफ्तार सरकार का मानना है कि नई HR पॉलिसी लागू होने के बाद JSLPS की प्रशासनिक क्षमता मजबूत होगी। इससे स्वयं सहायता समूहों, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण आजीविका और रोजगार से जुड़ी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में तेजी आएगी। साथ ही नई भर्तियों और बेहतर कर्मचारी सुविधाओं से संस्था की कार्यप्रणाली अधिक प्रभावी और परिणामोन्मुख बनने की उम्मीद है।  

kalpana अगस्त 7, 2026 0
Union Panchayati Raj Minister chairs a national workshop on implementing the 16th Finance Commission recommendations to strengthen rural local bodies across India.
16वें वित्त आयोग की सिफारिशों पर अमल की तैयारी, पंचायतों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए केंद्र-राज्य मिलकर करेंगे काम

नई दिल्ली: पंचायती राज संस्थाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और ग्रामीण स्थानीय निकायों को अधिक संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए शुक्रवार से केंद्र और राज्यों के पंचायती राज मंत्रियों की दो दिवसीय कार्यशाला शुरू हुई। इसमें वर्ष 2026-31 के लिए वित्त आयोग की सिफारिशों के प्रभावी क्रियान्वयन पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यशाला में ग्रामीण स्थानीय निकाय (RLB) अनुदान की संचालन संबंधी गाइडलाइंस, अनुदान जारी करने की प्रक्रिया, वित्तीय अनुपालन, संस्थागत तैयारियों और पंचायतों द्वारा समयबद्ध एवं प्रभावी धन उपयोग जैसे मुद्दों पर मंथन किया गया। पंचायतों को मिलेगा 4.35 लाख करोड़ रुपये का अनुदान 16वें वित्त आयोग ने ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए 4.35 लाख करोड़ रुपये के आवंटन की सिफारिश की है। इसमें— 80 प्रतिशत राशि बेसिक ग्रांट के रूप में 20 प्रतिशत राशि प्रदर्शन आधारित (Performance-based) ग्रांट के रूप में दी जाएगी। यह राशि 15वें वित्त आयोग के 2.36 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले लगभग 84 प्रतिशत अधिक है। पांच वर्षों में बढ़ेगा अनुदान वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार ग्रामीण स्थानीय निकायों को मिलने वाला वार्षिक आवंटन इस प्रकार होगा— 2026-27: ₹55,909 करोड़ 2027-28: ₹71,300 करोड़ 2028-29: ₹92,166 करोड़ 2029-30: ₹1,02,303 करोड़ 2030-31: ₹1,13,558 करोड़ अगर शहरी स्थानीय निकायों के लिए प्रस्तावित ₹2.90 लाख करोड़ को भी शामिल किया जाए, तो स्थानीय निकायों के लिए कुल आवंटन ₹7.91 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगा। बिहार और झारखंड को मिलेगा बड़ा फायदा बेसिक ग्रांट के तहत बिहार को पांच वर्षों में कुल ₹41,539 करोड़ मिलेंगे। इसमें— 2026-27: ₹6,670 करोड़ 2027-28: ₹7,404 करोड़ 2028-29: ₹8,218 करोड़ 2029-30: ₹9,122 करोड़ 2030-31: ₹10,125 करोड़ वहीं झारखंड को पांच वर्षों में ₹11,385 करोड़ का बेसिक ग्रांट मिलेगा। इसमें— 2026-27: ₹1,828 करोड़ 2027-28: ₹2,029 करोड़ 2028-29: ₹2,253 करोड़ 2029-30: ₹2,500 करोड़ 2030-31: ₹2,775 करोड़ प्रदर्शन आधारित अनुदान भी मिलेगा 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार प्रदर्शन आधारित अनुदान के तहत— बिहार को ₹10,384 करोड़ झारखंड को ₹2,846 करोड़ दिए जाएंगे। इस योजना में 60 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत राशि राज्य सरकारें उपलब्ध कराएंगी। स्थानीय निकायों की आर्थिक आत्मनिर्भरता पर जोर केंद्र सरकार का उद्देश्य पंचायतों को केवल अनुदान देना नहीं, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना भी है। इसके लिए पंचायतों को स्वयं राजस्व जुटाने की क्षमता विकसित करने और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग पर भी विशेष बल दिया जाएगा। राज्यों के अनुभव साझा होंगे कार्यशाला की अध्यक्षता केंद्रीय पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) ने की। इस दौरान विभिन्न राज्यों की सफल पंचायत मॉडल और बेहतर प्रशासनिक पहल को अन्य राज्यों के साथ साझा किया जा रहा है, ताकि पंचायतों के सुशासन, बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक सेवाओं और समावेशी ग्रामीण विकास को नई गति मिल सके।  

Deepshikha जुलाई 4, 2026 0
Self-Reliant Women
झारखंड की 65 हजार महिला किसान बनेंगी आत्मनिर्भर, 748 करोड़ की जलवायु अनुकूल बागवानी परियोजना को मिली सशर्त मंजूरी

रांची। झारखंड सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों की महिला किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने 748 करोड़ रुपये की 'झारखंड की महिला समूहों द्वारा जलवायु अनुकूल बागवानी उद्यमिता परियोजना' तैयार की है। गुरुवार को विकास आयुक्त की अध्यक्षता वाली राज्य योजना प्राधिकृत समिति ने इस महत्वाकांक्षी योजना को सशर्त मंजूरी दे दी। अब बजट और विदेशी ऋण पर ब्याज दर को लेकर वित्त विभाग की सहमति तथा कैबिनेट की मंजूरी के बाद योजना लागू की जाएगी।   19 जिलों की 65 हजार महिला किसानों को मिलेगा लाभ परियोजना के दूसरे चरण में राज्य के 19 जिलों के 65 प्रखंडों की करीब 65 हजार महिला किसानों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। यह योजना आठ वर्षों तक संचालित होगी। लाभार्थियों का चयन स्थानीय संसाधनों, उत्पादन क्षमता, बाजार तक पहुंच और सखी मंडलों की सक्रियता के आधार पर किया जाएगा।   बहुफसली खेती और आधुनिक तकनीक पर रहेगा जोर परियोजना का उद्देश्य महिला किसानों की आय बढ़ाने के साथ जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा देना है। इसके तहत महिलाओं को 25 डिसमिल मॉडल पर एक फसल की जगह साल में दो से तीन फसल लेने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। साथ ही माइक्रो ड्रिप सिंचाई, जल संरक्षण, आधुनिक कृषि तकनीक और बागवानी आधारित उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे उनकी आय में स्थायी वृद्धि हो सके।   पहले चरण में बढ़ी किसानों की आय परियोजना का पहला चरण वर्ष 2016-17 से 2024-25 तक नौ जिलों के 30 प्रखंडों में संचालित किया गया था। इस दौरान 31,819 किसानों को माइक्रो ड्रिप सिंचाई प्रणाली से जोड़ा गया और प्रति किसान औसतन 22 हजार रुपये वार्षिक आय में वृद्धि दर्ज की गई। इसके अलावा 300 कृषि यंत्र बैंक, 14 बहुउद्देश्यीय सामुदायिक केंद्र और 10 कोल्ड चैंबर भी स्थापित किए गए।   इन महिलाओं को मिलेगी प्राथमिकता योजना का लाभ केवल सखी मंडल से जुड़ी महिलाओं को मिलेगा। लाभार्थी के पास कम से कम 25 डिसमिल भूमि होना अनिवार्य होगा। गरीब परिवारों और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) की महिलाओं को प्राथमिकता दी जाएगी।

anjali kumari जून 26, 2026 0
Jharkhand agriculture news
पथरगामा की बंजर जमीन बनी कमाई का जरिया: किसान ने रची सफलता की कहानी

बीआरएलएफ (BRLF) की पहल से झारखंड के एक दिहाड़ी मज़दूर की ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई है। वैज्ञानिक खेती और पशुपालन के दम पर आज यह परिवार न सिर्फ आत्मनिर्भर है, बल्कि अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में शिक्षा भी दिला रहा है।   किसी समय परिवार की रोजी-रोटी चलाने के लिए दूसरों के यहां दिहाड़ी मज़दूरी करना और ताड़ी निकालकर गुजारा करना इस परिवार की नियति थी। घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि खाने के लिए चावल भी खरीद कर लाना पड़ता था। लेकिन, दृढ़ इच्छाशक्ति और सही मार्गदर्शन ने झारखंड के पथरगामा में रहने वाले इस किसान परिवार की तकदीर बदल कर रख दी है। आज यह परिवार अपने खेत की उपज और पशुपालन के जरिए लाखों की कमाई कर रहा है और इलाके के अन्य किसानों के लिए एक बड़ी मिसाल बन गया है।   बंजर ज़मीन बनी आय का ज़रिया इस बदलाव की शुरुआत एक खाली पड़े बंजर मैदान और एक कुएं से हुई। शुरुआत में किसान को खेती का कोई खास अनुभव नहीं था। लेकिन, बीआरएलएफ (BRLF - भारत रूरल लाइवलीहुड्स फाउंडेशन) के प्रतिनिधियों (जिन्हें स्थानीय लोग 'दादा' कहते हैं) ने इलाके में दस्तक दी। संस्था के लोगों ने न सिर्फ बीज उपलब्ध कराए, बल्कि बंजर ज़मीन पर खेती करने की आधुनिक तकनीकें भी सिखाईं।   नतीजतन, एक छोटे से ज़मीन के टुकड़े पर मात्र दो से तीन महीने की मेहनत के बाद ही किसान को 30,000 रुपये की शानदार आमदनी हुई। इस शुरुआती सफलता ने किसान का हौसला बढ़ा दिया। अब किसान की योजना अपने बगल में पड़ी दो एकड़ की बंजर भूमि को भी उपजाऊ बनाने की है। उसे उम्मीद है कि सिर्फ मिर्च की खेती से ही आने वाले समय में उसे 2 से ढाई लाख रुपये तक की शानदार कमाई हो सकती है।   बकरी पालन और वैज्ञानिक प्रशिक्षण से मिला बूस्टर डोज़ पथरगामा में स्थानीय किसानों को आर्थिक रूप से और मजबूत करने के लिए बीआरएलएफ के तहत एक बकरी प्रजनन केंद्र भी स्थापित किया गया है। यहां किसानों को बकरियों के टीकाकरण (Vaccination), कृमिनाशन (Deworming), पोषण और पशुओं की उचित देखभाल का वैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है।   इस प्रशिक्षण का फायदा उठाते हुए, इस किसान ने 20 बकरियों के साथ अपना व्यवसाय शुरू किया था। अब तक वह करीब 20 बकरियां बेच चुका है, जिससे उसे 80,000 रुपये का सीधा मुनाफा हुआ है। जानवरों के बेहतर स्वास्थ्य और इस बंपर मुनाफे को देखकर अब गांव के अन्य किसान भी पशुपालन की इन आधुनिक पद्धतियों को अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं।   'क्रॉप बास्केट' और नई पीढ़ी का भविष्य इस क्षेत्र में अब पारंपरिक खेती की जगह 'क्रॉप बास्केट' (Crop Basket) मॉडल को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत खरीफ, रबी और गरमा—तीनों मौसमों में फसलें उगाई जा रही हैं, जिससे साल भर खेती और आमदनी का पहिया घूमता रहता है। साथ ही, ज़मीन की उर्वरता बनाए रखने के लिए जैविक खाद (कम्पोस्ट) और जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है।   इस पूरी सफलता के पीछे पति-पत्नी की साझा मेहनत है। दोनों मिलकर खेतों में सब्जियां तोड़ते हैं और फिर स्थानीय हाट-बाज़ार में जाकर उपज बेचते हैं। आर्थिक स्थिति सुधरने का सबसे बड़ा फायदा उनकी अगली पीढ़ी को मिल रहा है। जो शिक्षा कभी इस किसान या उसके पिता-दादा को नसीब नहीं हुई, वही शिक्षा आज वे अपने दोनों बेटों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में दिला रहे हैं।   दूसरों के लिए बने प्रेरणा आज यह किसान पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुका है। उसे अब खाद बनाने से लेकर, सही समय पर बीज बोने और हार्वेस्टिंग (फसल कटाई) करने की पूरी समझ हो गई है। किसान गर्व से कहता है, "अब मुझे दादा लोगों (संस्था के लोगों) की हर कदम पर ज़रूरत नहीं है। अगर दूसरे किसान भी मुझसे आइडिया लेना चाहेंगे, तो अब मैं उन्हें भी खेती के तरीके बता सकता हूं।" यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि सही दिशा और संसाधनों से बदलते ग्रामीण भारत की एक जीती-जागती तस्वीर है।

anjali kumari जून 17, 2026 0
Stray cattle standing on road in Chhattisgarh amid delays in Godham shelter scheme implementation
छत्तीसगढ़ में जमीन के इंतजार में अटकी गोधाम योजना, कई जिलों में भूमि की कमी बनी बड़ी चुनौती

Chhattisgarh सरकार की महत्वाकांक्षी गोधाम योजना जमीन आवंटन में हो रही देरी के कारण धीमी पड़ती नजर आ रही है। प्रदेशभर में 1,460 गोधाम स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन कई जिलों में पर्याप्त जमीन उपलब्ध नहीं होने से योजना अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रही है। बेसहारा मवेशियों की बढ़ती समस्या को देखते हुए राज्य सरकार ने प्रत्येक विकासखंड में 10-10 गोधाम खोलने की योजना बनाई है। हालांकि, Raipur, Bilaspur और Raigarh समेत कई जिलों में अब तक पर्याप्त भूमि का आवंटन नहीं हो पाया है। मुख्यमंत्री ने किया था 29 गोधामों का शुभारंभ मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai ने 14 मार्च को बिलासपुर से 29 गोधामों का औपचारिक शुभारंभ किया था। सरकार का उद्देश्य सड़कों पर घूम रहे बेसहारा मवेशियों को सुरक्षित आश्रय देना और यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाना है। प्रदेश में आवारा मवेशियों की वजह से सड़क हादसों की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इस मुद्दे पर Chhattisgarh High Court ने भी हाल ही में राज्य सरकार से कड़ी टिप्पणी करते हुए पूछा था कि यदि व्यवस्थाएं पर्याप्त हैं तो पशु अब भी सड़कों पर क्यों दिखाई दे रहे हैं। गोधाम के लिए कम से कम एक एकड़ जमीन जरूरी सरकारी योजना के अनुसार प्रत्येक गोधाम में चारा विकास के लिए न्यूनतम एक एकड़ भूमि आवश्यक है। सरकार की ओर से प्रति एकड़ 47 हजार रुपये प्रतिवर्ष की सहायता दी जाएगी। अधिकतम पांच एकड़ भूमि तक 2.35 लाख रुपये वार्षिक सहायता का प्रावधान किया गया है। प्रत्येक गोधाम में लगभग 200 गोवंश रखने की व्यवस्था की जाएगी। कर्मचारियों के लिए मानदेय तय राज्य सरकार ने गोधाम संचालन और पशुओं के संरक्षण के लिए कर्मचारियों का मानदेय भी निर्धारित कर दिया है। गोधाम कर्मचारियों को 10,916 रुपये प्रतिमाह पशुसेवकों (परिचारकों) को 13,126 रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाएगा। इसके अलावा मवेशियों के चारे और रखरखाव के लिए भी चरणबद्ध आर्थिक सहायता तय की गई है। पहले वर्ष: 10 रुपये प्रति पशु प्रतिदिन दूसरे वर्ष: 20 रुपये प्रति पशु प्रतिदिन तीसरे वर्ष: 30 रुपये प्रति पशु प्रतिदिन चौथे वर्ष: 35 रुपये प्रति पशु प्रतिदिन चारा विकास कार्यक्रम के तहत एक एकड़ भूमि के लिए 47 हजार रुपये और पांच एकड़ तक के लिए 2.85 लाख रुपये की सहायता का प्रावधान किया गया है। जमीन आवंटन बना सबसे बड़ी चुनौती सरकार की योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने में सबसे बड़ी बाधा जमीन की उपलब्धता बनकर सामने आई है। कई जिलों में उपयुक्त भूमि की पहचान और आवंटन की प्रक्रिया अभी भी अधूरी है। ऐसे में गोधाम योजना के लक्ष्य को समय पर पूरा करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है।  

surbhi मई 20, 2026 0
Tribal villagers raise issues on forest rights, malnutrition and lack of development in Saranda forests Jharkhand
सारंडा के जंगलों में ‘विकास’ पर सवाल: कोल्हान रक्षा संघ की बैठक में आदिवासियों ने खोली जमीनी हकीकत

सरायकेला: झारखंड के सारंडा क्षेत्र से एक बार फिर विकास कार्यों की वास्तविक तस्वीर सामने आई है। कोल्हान रक्षा संघ द्वारा नोवामुंडी प्रखंड के पोखरिया गांव में आयोजित बैठक में ग्रामीणों ने खुलकर अपनी समस्याएं रखीं। इस दौरान वन अधिकार से लेकर कुपोषण, पेंशन, रोजगार और शिक्षा तक कई गंभीर मुद्दे सामने आए, जिससे सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े हो गए। वन अधिकारों से वंचित ग्रामीण बैठक में सबसे प्रमुख मुद्दा वन पट्टा का रहा। ग्रामीणों ने बताया कि राजस्व गांव होने के बावजूद उन्हें अब तक वन अधिकार नहीं मिला है। पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आने के बावजूद संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी पर लोगों ने गहरा आक्रोश जताया। कुपोषण की भयावह स्थिति गांव में महिलाओं और बच्चों के बीच कुपोषण की स्थिति चिंताजनक पाई गई। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पोषाहार केंद्र से नियमित रूप से भोजन नहीं मिल रहा है। बच्चों और महिलाओं में कुपोषण के स्पष्ट लक्षण दिखाई दे रहे हैं, जो स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करते हैं। योजनाएं कागजों तक सीमित? ‘मंईयां सम्मान योजना’ को लेकर भी गंभीर गड़बड़ी सामने आई। ग्रामीणों के अनुसार, लगभग 300 पात्र महिलाओं में से सिर्फ एक को ही योजना का लाभ मिला है। इससे योजना के क्रियान्वयन पर सवाल उठ रहे हैं। घटती औसत आयु बना चिंता का विषय बैठक में यह तथ्य सामने आया कि क्षेत्र में लोगों की औसत आयु काफी कम है। बड़ी संख्या में ग्रामीणों के बीच 48 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की संख्या बेहद कम पाई गई। विशेषज्ञ इसे कुपोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से जोड़कर देख रहे हैं। पेंशन और रोजगार का संकट वृद्धावस्था पेंशन कई महीनों से बंद होने की शिकायत सामने आई। वहीं रोजगार के अभाव में ग्रामीण जंगल से पत्ता, लकड़ी और दातुन बेचकर जीवनयापन कर रहे हैं। लेकिन वन विभाग की कार्रवाई का डर इस जीविका को भी अस्थिर बना रहा है। शिक्षा व्यवस्था की बदहाली शिक्षा के क्षेत्र में भी हालात बेहद खराब हैं। पूरे गांव में केवल एक स्कूल है, जो एक पारा शिक्षक के भरोसे चल रहा है। यह स्थिति ग्रामीण शिक्षा तंत्र की जमीनी चुनौतियों को उजागर करती है। बैठक में कौन-कौन रहे शामिल? इस बैठक की अध्यक्षता डिबार जोंकों ने की। इसके अलावा कई सामाजिक कार्यकर्ता और मुंडा-माणकी समुदाय के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए और अपनी समस्याएं साझा कीं। बड़ा सवाल: क्या बदलेगी तस्वीर? कोल्हान रक्षा संघ की इस बैठक ने साफ कर दिया है कि सारंडा जैसे सुदूर इलाकों में विकास योजनाओं का लाभ अभी भी पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इन मुद्दों पर गंभीरता से कार्रवाई करेगा या फिर ये समस्याएं यूं ही बनी रहेंगी।  

surbhi मार्च 24, 2026 0
Women training to make handicraft products from banana stem fiber in Khagaria Bihar
‘वेस्ट से वेल्थ’ की मिसाल: खगड़िया में केले के तने से बनेगा रोजगार, महिलाओं को दिया जा रहा विशेष प्रशिक्षण

खगड़िया: बिहार के खगड़िया जिले में अब केले की खेती सिर्फ फल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगी। केले के तनों से रेशा निकालकर विभिन्न उत्पाद तैयार करने की पहल के साथ महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार किए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जिला प्रशासन और नाबार्ड की ओर से ‘वेस्ट टू वेल्थ’ पहल के तहत महिलाओं के लिए एक महीने का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया है।   प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ इस कार्यक्रम का उद्घाटन जिला पदाधिकारी नवीन कुमार, डीडीसी श्वेता भारती और नाबार्ड की डीडीएम पूजा भारती ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस मौके पर केले के तनों से रेशा निकालकर उत्पाद बनाने वाली महिलाओं को सम्मानित भी किया गया।   केले के तने से बनेंगे कई उपयोगी उत्पाद खगड़िया में बड़े पैमाने पर केले की खेती होती है। अब आधुनिक तकनीक की मदद से केले के तनों से रेशा निकालकर कई प्रकार के आकर्षक और उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाएंगे। प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को हस्तशिल्प से जुड़े कई उत्पाद बनाना सिखाया जा रहा है। इनमें फैंसी बैग, चटाई, टोकरियां, फाइल कवर, फोल्डर, सजावटी सामान और मजबूत रस्सियां शामिल हैं।   महिलाओं को मिलेगा स्वरोजगार जिला पदाधिकारी नवीन कुमार ने कहा कि खगड़िया में केले की प्रचुरता है और इसके तनों से निकलने वाला रेशा पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ महिलाओं के लिए अतिरिक्त आय का बेहतर साधन बन सकता है। उन्होंने बताया कि प्रशासन महिलाओं को इस कार्य के लिए आवश्यक मशीनें और बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में भी प्रयास करेगा।   ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल डीडीसी श्वेता भारती ने कहा कि महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ इस तरह के उद्योग से जुड़कर आत्मनिर्भर बन सकती हैं। उनके अनुसार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में महिलाओं की भूमिका बेहद अहम है और यह पहल उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में मददगार साबित होगी।   ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की दिशा में अहम कदम अब तक किसान केले के तनों को बेकार समझकर खेतों में छोड़ देते थे, लेकिन अब इन्हीं तनों से कीमती रेशा निकालकर उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाएंगे। इससे जहां पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, वहीं महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। कार्यक्रम का संचालन नाबार्ड की डीडीएम पूजा भारती ने किया, जबकि इसका संयोजन J.J.B.F. संस्था द्वारा किया गया। इस पहल से जिले में ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की अवधारणा को मजबूती मिलने के साथ-साथ महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।  

surbhi मार्च 10, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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