World Cup 2027: वनडे वर्ल्ड कप 2027 का मंच तैयार हो रहा है। दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे और नामीबिया की संयुक्त मेजबानी में होने वाले इस टूर्नामेंट के लिए 12 मैदानों को चुना गया है। खास बात यह है कि भारतीय टीम इन 12 में से 10 मैदानों पर पहले ही वनडे मुकाबले खेल चुकी है। यानी वर्ल्ड कप के दौरान भारतीय खिलाड़ियों के लिए अधिकांश मैदान पूरी तरह अनजान नहीं होंगे। आईसीसी ने वर्ल्ड कप 2027 के वेन्यू का ऐलान कर दिया है। टूर्नामेंट के मुकाबले दक्षिण अफ्रीका के आठ, जिम्बाब्वे के तीन और नामीबिया के एक मैदान पर खेले जाएंगे। 1983 और 2011 की विश्व चैंपियन टीम इंडिया भी इस टूर्नामेंट का हिस्सा होगी। हालांकि, दो मैदान ऐसे हैं जहां भारतीय टीम ने अभी तक वनडे मुकाबला नहीं खेला है। इनमें नामीबिया की राजधानी विंडहोक स्थित नामीबिया क्रिकेट ग्राउंड और जिम्बाब्वे का मोसि-ओ-तुन्या इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम शामिल हैं। दक्षिण अफ्रीका में भारत का रिकॉर्ड कैसा है? दक्षिण अफ्रीका में भारतीय टीम का वनडे रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है। खबर में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने दक्षिण अफ्रीका में अब तक 59 वनडे मुकाबले खेले हैं, जिसमें टीम को 24 मैचों में जीत और 31 में हार मिली है। दक्षिण अफ्रीका में पिछला वनडे वर्ल्ड कप 2003 में खेला गया था। उस टूर्नामेंट में भारतीय टीम फाइनल तक पहुंची थी, लेकिन खिताबी मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। वहीं जिम्बाब्वे में भारत का रिकॉर्ड दक्षिण अफ्रीका के मुकाबले काफी बेहतर रहा है। भारतीय टीम ने वहां 34 वनडे मैच खेले हैं, जिनमें 26 जीत और सिर्फ 8 हार दर्ज की हैं। 12 में से 10 वर्ल्ड कप वेन्यू पर खेल चुकी है टीम इंडिया वर्ल्ड कप 2027 के लिए चुने गए 12 मैदानों में से 10 पर भारतीय टीम के वनडे मुकाबले खेलने का अनुभव है। अलग-अलग मैदानों पर भारत का रिकॉर्ड इस प्रकार रहा है: 1. मंगौंग ओवल, ब्लोमफोंटेन ब्लोमफोंटेन के मंगौंग ओवल में भारत ने अब तक 3 वनडे मैच खेले हैं। टीम को इनमें 1 जीत और 2 हार मिली हैं। यानी इस मैदान पर भारतीय टीम का रिकॉर्ड फिलहाल उसके पक्ष में नहीं है। 2. न्यूलैंड्स क्रिकेट ग्राउंड, केपटाउन केपटाउन के न्यूलैंड्स मैदान पर भारत ने 1992 से 2022 के बीच 6 वनडे मुकाबले खेले हैं। इनमें टीम ने 3 मैच जीते और 3 गंवाए हैं। इस मैदान पर भारत का रिकॉर्ड पूरी तरह बराबरी का रहा है। 3. सुपरस्पोर्ट्स पार्क, सेंचुरियन सेंचुरियन के सुपरस्पोर्ट्स पार्क में भारत ने 13 वनडे मैच खेले हैं। इनमें 6 जीत और 5 हार दर्ज हैं, जबकि 2 मैच रद्द हुए। इस लिहाज से भारत का रिकॉर्ड यहां सकारात्मक रहा है। 4. किंग्समीड क्रिकेट ग्राउंड, डरबन डरबन के किंग्समीड मैदान की पिच को बल्लेबाजी के लिहाज से चुनौतीपूर्ण माना जाता है। यहां भारत ने 10 वनडे मैच खेले हैं और उसे सिर्फ 3 मुकाबलों में जीत मिली है। यानी इस मैदान पर भारतीय टीम के सामने चुनौती आसान नहीं रही है। 5. बफेलो पार्क, ईस्ट लंदन ईस्ट लंदन के बफेलो पार्क में भारत ने अपना आखिरी वनडे मुकाबला 2001 में खेला था। यहां भारतीय टीम ने 3 मैच खेले, जिसमें उसे 2 मुकाबलों में हार मिली। 6. सेंट जॉर्ज पार्क, गकेबरहा सेंट जॉर्ज पार्क भारतीय टीम के लिए मुश्किल मैदानों में से एक रहा है। 1992 से 2023 के बीच यहां खेले 7 वनडे मुकाबलों में भारत को सिर्फ 1 जीत मिली, जबकि 6 मैचों में हार का सामना करना पड़ा। 7. वांडरर्स स्टेडियम, जोहानिसबर्ग जोहानिसबर्ग का वांडरर्स स्टेडियम भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों के लिए 2003 वर्ल्ड कप फाइनल की याद भी लेकर आता है। इसी मैदान पर भारत को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ फाइनल में हार मिली थी। इस मैदान पर भारत ने अब तक 9 वनडे मैच खेले हैं, जिसमें 4 जीत और 5 हार दर्ज हैं। 8. बोलैंड पार्क, पार्ल पार्ल के बोलैंड पार्क में भारतीय टीम ने 6 वनडे मुकाबले खेले हैं। यहां भारत ने 3 मैच जीते और 2 गंवाए, जबकि 1 मुकाबला टाई रहा। इस मैदान पर टीम इंडिया का रिकॉर्ड अपेक्षाकृत बेहतर रहा है। 9. क्वींस स्पोर्ट्स पार्क, बुलावायो जिम्बाब्वे के बुलावायो स्थित क्वींस स्पोर्ट्स पार्क में भारत का रिकॉर्ड मजबूत रहा है। यहां खेले 10 वनडे मुकाबलों में टीम इंडिया ने 7 मैच जीते, जबकि 3 में हार मिली। 10. हरारे स्पोर्ट्स क्लब, हरारे हरारे स्पोर्ट्स क्लब भारतीय टीम के लिए सबसे सफल मैदानों में शामिल है। भारत ने यहां 24 वनडे मैच खेले हैं, जिनमें 19 में जीत दर्ज की और सिर्फ 5 मुकाबलों में हार का सामना किया। दो मैदानों पर पहली बार खेलने उतरेगी टीम इंडिया वर्ल्ड कप 2027 के 12 वेन्यू में से दो ऐसे हैं, जहां भारतीय टीम ने अभी तक वनडे मैच नहीं खेला है। इनमें नामीबिया क्रिकेट ग्राउंड, विंडहोक और मोसि-ओ-तुन्या इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम, जिम्बाब्वे शामिल हैं। इसका मतलब है कि इन दोनों मैदानों पर भारतीय टीम को परिस्थितियों को समझने और पिच के मिजाज के अनुसार खुद को ढालने की नई चुनौती का सामना करना पड़ेगा। वर्ल्ड कप में अनुभव बन सकता है भारत की ताकत वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में परिस्थितियों की जानकारी टीम के लिए अहम होती है। भारतीय टीम के लिए राहत की बात यह है कि 12 में से 10 संभावित होस्ट मैदानों पर वह पहले ही वनडे मुकाबले खेल चुकी है। हालांकि, मैदान का अनुभव अपने आप में जीत की गारंटी नहीं होता। दक्षिण अफ्रीका की परिस्थितियां, तेज गेंदबाजों के लिए मददगार पिचें और टूर्नामेंट का दबाव भारतीय टीम के लिए असली परीक्षा होंगे। फिलहाल आंकड़ों पर नजर डालें तो जिम्बाब्वे के मैदानों पर भारत का रिकॉर्ड मजबूत है, जबकि दक्षिण अफ्रीका के कुछ मैदानों पर टीम को संघर्ष करना पड़ा है। 2027 वर्ल्ड कप में इन पुराने रिकॉर्ड्स के साथ-साथ मौजूदा फॉर्म और परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बनाना भी टीम इंडिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।
पांच मैचों की टी20 सीरीज के पहले मुकाबले में South Africa national cricket team ने New Zealand national cricket team को सात विकेट से हराकर सीरीज में 1-0 की बढ़त बना ली। Bay Oval में खेले गए इस मैच में न्यूजीलैंड की टीम महज 91 रन पर सिमट गई, जो दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ उसका दूसरा सबसे छोटा टी20 स्कोर है। कीवी बल्लेबाजी पूरी तरह फ्लॉप टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी न्यूजीलैंड की शुरुआत बेहद खराब रही। दक्षिण अफ्रीका के गेंदबाजों के सामने मेजबान बल्लेबाज टिक ही नहीं पाए और पूरी टीम सिर्फ 14.3 ओवर में 91 रन पर ऑलआउट हो गई। टीम का कोई भी बल्लेबाज बड़ी पारी नहीं खेल सका। गौरतलब है कि इस सीरीज में न्यूजीलैंड ने ICC Men's T20 World Cup फाइनल खेलने वाली टीम के आठ खिलाड़ियों को आराम दिया है, जिसका असर बल्लेबाजी पर साफ दिखाई दिया। 19 साल के मोकोएना ने डेब्यू में मचाया धमाल दक्षिण अफ्रीका की जीत के असली हीरो 19 वर्षीय डेब्यूटेंट Nqobani Mokoena रहे। उन्होंने अपने पहले अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में 26 रन देकर तीन विकेट झटके और न्यूजीलैंड की बल्लेबाजी की कमर तोड़ दी। इसके अलावा Gerald Coetzee और Ottniel Baartman ने दो-दो विकेट लिए, जबकि कप्तान Keshav Maharaj ने भी दो सफलताएं हासिल कर कीवी टीम को सस्ते में समेटने में अहम भूमिका निभाई। 17 ओवर से पहले ही हासिल कर लिया लक्ष्य 92 रन के आसान लक्ष्य का पीछा करते हुए दक्षिण अफ्रीका ने 16.4 ओवर में 3 विकेट खोकर जीत दर्ज कर ली। विकेटकीपर बल्लेबाज Connor Esterhuizen ने 48 गेंदों में नाबाद 45 रन की संयमित पारी खेलकर टीम को जीत तक पहुंचाया। डेब्यू मैच में शानदार प्रदर्शन के लिए Nqobani Mokoena को प्लेयर ऑफ द मैच चुना गया। मैच के बाद उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में डेब्यू करना उनके लिए खास अनुभव रहा और हालात गेंदबाजों के लिए काफी मददगार थे।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।