सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार आज अपने मंत्रिमंडल का बड़ा विस्तार करने जा रही है। गुरुवार सुबह चेन्नई में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में 23 विधायक मंत्री पद की शपथ लेंगे। मुख्यमंत्री की सिफारिश पर राज्यपाल ने सभी नियुक्तियों को मंजूरी दे दी है। यह शपथ ग्रहण समारोह सुबह 10 बजे चेन्नई के लोक भवन में आयोजित होगा। सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, नए मंत्रियों के शामिल होने से प्रशासनिक कामकाज में तेजी और क्षेत्रीय संतुलन को मजबूती मिलने की उम्मीद है। कांग्रेस की सरकार में वापसी इस कैबिनेट विस्तार की सबसे बड़ी राजनीतिक खासियत कांग्रेस की सरकार में एंट्री मानी जा रही है। लंबे समय बाद तमिलनाडु में किसी क्षेत्रीय दल के नेतृत्व वाली सरकार में कांग्रेस को प्रतिनिधित्व मिला है। कांग्रेस के दो विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, जिससे राज्य की राजनीति में नए समीकरण बनने के संकेत मिल रहे हैं। ये विधायक बनेंगे मंत्री नई कैबिनेट में राज्य के विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई है। मंत्री पद की शपथ लेने वालों में थूथुकुडी से श्रीनाथ, अविनाशी से कमाली एस, कुमारपालयम से सी विजयलक्ष्मी और कांचीपुरम से आरवी रंजीतकुमार शामिल हैं। इसके अलावा कुंभकोणम से विनोद, तिरुवदानई से राजीव, कडलूर से बी राजकुमार, अरक्कोनम से वी गांधीराज और ओट्टापिडारम से मथन राजा पी को भी मंत्रिमंडल में जगह मिली है। सूची में राजपालयम से जगदेश्वरी के, किल्लियूर से कांग्रेस विधायक राजेश कुमार एस, ईरोड ईस्ट से एम विजय बालाजी, रासीपुरम से लोगेश तमिलसेल्वन डी और सेलम साउथ से विजय तमिलन पार्थिबन ए के नाम भी शामिल हैं। इसके साथ ही श्रीरंगम से रमेश, मेलूर से कांग्रेस विधायक पी विश्वनाथन, वेलाचेरी से कुमार आर, श्रीपेरंबदूर से थेन्नारासु के और कोयंबटूर नॉर्थ से वी संपत कुमार भी मंत्री पद की शपथ लेंगे। अंतिम सूची में अरंथांगी से मोहम्मद फरवास जे, तांबरम से डी सरथकुमार, डॉ. राधाकृष्णन नगर से एन मैरी विल्सन और किनाथुकादावु से विग्नेश के को भी शामिल किया गया है। सरकार को मिलेगी नई ऊर्जा राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस विस्तार के जरिए विजय सरकार संगठन और प्रशासन दोनों स्तरों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने की रणनीति इस कैबिनेट विस्तार में साफ दिखाई दे रही है।
Tamil Nadu में सरकार गठन को लेकर जारी राजनीतिक गतिरोध के बीच Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) या All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (AIADMK) सरकार बनाने की दिशा में आगे बढ़ती है, तो TVK अपने सभी 107 विधायकों से सामूहिक इस्तीफा दिलाने पर विचार कर सकती है. TVK के भीतर बढ़ रही नाराजगी सूत्रों के अनुसार, यह संकेत पार्टी के अंदर बढ़ती नाराजगी और राजनीतिक बेचैनी को दर्शाता है. TVK नेताओं का मानना है कि चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद उन्हें सत्ता से दूर रखने की कोशिश की जा रही है. हालांकि अभी तक पार्टी प्रमुख Vijay की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा चल रही है. सरकार गठन पर क्यों फंसा मामला? 23 अप्रैल को हुए विधानसभा चुनाव में: TVK को 108 सीटें मिलीं DMK ने 59 सीटें जीतीं AIADMK के खाते में 47 सीटें आईं चूंकि विजय दो सीटों से जीते हैं, इसलिए नियम के तहत उन्हें एक सीट छोड़नी होगी. इसके बाद TVK की प्रभावी संख्या 107 रह जाएगी. Indian National Congress के 5 विधायकों के समर्थन के बाद भी TVK का आंकड़ा 112 तक ही पहुंचता है, जबकि 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 118 सीटों की जरूरत है. DMK-AIADMK बैकचैनल बातचीत की चर्चा राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि DMK और AIADMK के बीच बैकचैनल बातचीत चल रही है, ताकि TVK को सत्ता से दूर रखा जा सके. हालांकि दोनों दलों ने किसी औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं की है. TVK नेताओं का दावा है कि जनता ने बदलाव के पक्ष में वोट दिया है और सबसे बड़ी पार्टी को नजरअंदाज करना जनादेश का अपमान होगा. इस्तीफे की रणनीति से क्या होगा? अगर TVK के विधायक सामूहिक इस्तीफा देते हैं, तो: राज्य में संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है कई सीटों पर उपचुनाव की नौबत आ सकती है सरकार गठन की प्रक्रिया और जटिल हो जाएगी राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम दबाव की राजनीति का हिस्सा भी हो सकता है, ताकि अन्य दल TVK के साथ बातचीत के लिए मजबूर हों. तमिलनाडु में अब सबकी नजर राज्यपाल की अगली चाल और राजनीतिक दलों के बीच जारी बातचीत पर टिकी हुई है.
चेन्नई, 4 मई: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के साथ यह बड़ा सवाल सामने है कि क्या राज्य में एक बार फिर द्रविड़ पहचान वाली पार्टियों का वर्चस्व कायम रहेगा या इस बार ‘राष्ट्रीय पहचान’ की राजनीति अपनी जगह बना पाएगी। दशकों से DMK और AIADMK के इर्द-गिर्द घूमने वाली तमिलनाडु की राजनीति इस बार नए मोड़ पर खड़ी दिख रही है। 1967 से द्रविड़ दलों का दबदबा तमिलनाडु में 1967 के बाद से द्रविड़ विचारधारा से निकली पार्टियों का ही शासन रहा है। DMK और AIADMK के बीच सत्ता का परिवर्तन होता रहा है, जिसे राज्य की “बायपोलर पॉलिटिक्स” कहा जाता है। 234 सीटों वाले विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है। फिलहाल M. K. Stalin के नेतृत्व में DMK की सरकार है, जिसके पास मजबूत ओबीसी वोट बैंक और द्रविड़ पहचान का समर्थन है। AIADMK की चुनौती और कमजोर नेतृत्व AIADMK, जो कभी J. Jayalalithaa के नेतृत्व में मजबूत थी, अब नेतृत्व संकट से जूझती नजर आती है। भाजपा के साथ गठबंधन में होने के बावजूद पार्टी का संगठन पहले जैसा प्रभावशाली नहीं रहा। BJP का ‘नेशनल नैरेटिव’ इस बार Bharatiya Janata Party (BJP) ने तमिलनाडु में अपनी जमीन मजबूत करने के लिए “द्रविड़ बनाम राष्ट्रीय पहचान” का नैरेटिव पेश किया है। पार्टी हिंदुत्व और विकास मॉडल को आगे रख रही है प्रधानमंत्री Narendra Modi और गृहमंत्री Amit Shah ने कई रैलियां कीं लक्ष्य: राज्य में वोट शेयर को 10% से बढ़ाकर 15% तक ले जाना हालांकि, तमिलनाडु में BJP की स्वीकार्यता अभी सीमित रही है, लेकिन इस बार पार्टी DMK के खिलाफ सीधी चुनौती देने की कोशिश में दिख रही है। ‘विजय फैक्टर’ से बदला समीकरण इस चुनाव का सबसे बड़ा ट्विस्ट है अभिनेता से नेता बने Vijay की एंट्री। उनकी पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) ने पहली बार चुनाव लड़ते हुए ही राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। विजय ने आम लोगों के मुद्दों को उठाया युवा और शहरी वोटर्स में मजबूत पकड़ बड़ा फैन बेस, जो वोट में तब्दील होता दिख रहा है राजनीतिक इतिहास में M. G. Ramachandran और J. Jayalalithaa जैसे उदाहरण रहे हैं, जिन्होंने फिल्मी दुनिया से राजनीति में आकर सफलता हासिल की। ऐसे में विजय को भी संभावित ‘गेमचेंजर’ माना जा रहा है। क्या टूटेगा द्रविड़ वर्चस्व? एग्जिट पोल और शुरुआती रुझान संकेत दे रहे हैं कि इस बार मुकाबला पारंपरिक नहीं रहा। DMK अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश में AIADMK अस्तित्व की लड़ाई में BJP नैरेटिव बदलने की कोशिश में TVK नए विकल्प के रूप में उभर रही
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के लिए गुरुवार सुबह से मतदान जारी है। सुबह 7 बजे शुरू हुई वोटिंग में मतदाताओं का उत्साह साफ नजर आ रहा है। चुनाव आयोग के मुताबिक, सुबह 9 बजे तक राज्यभर में 17.69% मतदान दर्ज किया गया, जबकि राजधानी चेन्नई में यह आंकड़ा 16.51% रहा। शुरुआती रुझानों से संकेत मिल रहे हैं कि इस बार भी मतदाता बड़ी संख्या में अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। फिल्मी सितारों ने बढ़ाया मतदान का उत्साह साउथ सुपरस्टार Rajinikanth चेन्नई के स्टेला मैरिस कॉलेज स्थित मतदान केंद्र पर पहुंचे और वोट डालने के बाद लोगों से लोकतंत्र के इस पर्व में भाग लेने की अपील की। वहीं अभिनेता Dhanush ने भी कामराजर रोड कॉर्पोरेशन स्कूल बूथ पर मतदान कर युवाओं को खास संदेश दिया कि वे बढ़-चढ़कर वोटिंग करें। इसके अलावा अभिनेता अजित कुमार और गौतम राम कार्तिक जैसे कई अन्य फिल्मी चेहरों ने भी मतदान कर लोगों को प्रेरित किया। राजनीतिक नेताओं ने भी निभाई जिम्मेदारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता P. Chidambaram ने शिवगंगा जिले के कराईकुडी में वोट डाला और लोगों से लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए मतदान करने की अपील की। बीजेपी नेता Khushbu Sundar ने चेन्नई में मतदान के बाद कहा कि जनता को हर सरकार से सवाल पूछने का अधिकार है, इसलिए घर से बाहर निकलकर वोट जरूर करें। 5.73 करोड़ मतदाता, 4,000 से अधिक उम्मीदवार इस बार राज्य की 234 विधानसभा सीटों पर एक ही चरण में मतदान हो रहा है। करीब 5.73 करोड़ मतदाता 4,023 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे। चुनाव प्रचार 21 अप्रैल को समाप्त हो गया था और अब सभी की नजरें मतदान प्रतिशत और नतीजों पर टिकी हैं। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम चुनाव को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष बनाने के लिए पूरे राज्य में करीब 1.40 लाख से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। मतदान से पहले सभी बूथों पर मॉक पोल के जरिए ईवीएम मशीनों की जांच की गई, ताकि किसी तरह की तकनीकी समस्या न आए। कब आएंगे नतीजे? तमिलनाडु विधानसभा चुनाव की मतगणना 4 मई को होगी। इसके बाद यह साफ हो जाएगा कि राज्य की सत्ता किसके हाथों में जाएगी। फिलहाल, शुरुआती मतदान रुझान लोकतंत्र के प्रति लोगों की जागरूकता और उत्साह को दर्शा रहे हैं।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 से पहले आए ताज़ा ओपिनियन पोल्स ने सियासी तस्वीर को बेहद दिलचस्प और अनिश्चित बना दिया है। राज्य में 23 अप्रैल को मतदान और 4 मई को मतगणना होनी है, लेकिन उससे पहले ही सर्वे रिपोर्ट्स ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। मुकाबला मुख्य रूप से DMK और AIADMK के बीच है, जबकि अभिनेता Vijay की पार्टी TVK ने समीकरणों को और जटिल बना दिया है। ओपिनियन पोल्स: तस्वीर साफ नहीं, मुकाबला बेहद करीबी तीन प्रमुख सर्वे-VoteVibe, IANS-Matrize और Agni News अलग-अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं: VoteVibe सर्वे के अनुसार DMK गठबंधन को 113–123 सीटें मिल सकती हैं, जबकि AIADMK गठबंधन 106–116 सीटों के बीच रह सकता है। IANS-Matrize सर्वे AIADMK को 114–127 सीटों के साथ बढ़त में दिखाता है, जबकि DMK 104–114 सीटों पर सिमट सकती है। Agni सर्वे सबसे अलग तस्वीर दिखाता है, जिसमें DMK को 180 सीटों की बड़ी जीत का अनुमान है, जबकि AIADMK 54 सीटों तक सीमित रह सकती है। इन विरोधाभासी आंकड़ों से साफ है कि चुनाव बेहद करीबी और अनिश्चित होने वाला है, जहां मामूली वोट शेयर का अंतर भी नतीजों को पूरी तरह बदल सकता है। वोटर मूड: बटी हुई जनता सर्वे बताते हैं कि मतदाता पूरी तरह विभाजित हैं: करीब 40% लोग सरकार के काम से संतुष्ट हैं लगभग 39% मतदाता असंतोष जाहिर कर रहे हैं यानी राज्य में न तो स्पष्ट सरकार विरोधी लहर है और न ही पूरी तरह समर्थन-यही वजह है कि मुकाबला इतना टाइट बना हुआ है। किस वर्ग का झुकाव किस ओर? महिलाएं और अल्पसंख्यक वोटर DMK के साथ दिख रहे हैं पुरुष, OBC और सवर्ण वोटर AIADMK की ओर झुकाव दिखा रहे हैं युवा मतदाता बदलाव की ओर देख रहे हैं यह सामाजिक विभाजन चुनाव को और जटिल बना रहा है। विजय की TVK: गेम चेंजर या वोट कटवा? Vijay की पार्टी TVK पहली बार चुनावी मैदान में है। सर्वे के मुताबिक TVK को 2–8 सीटें मिल सकती हैं युवाओं में इसकी पकड़ जरूर दिख रही है हालांकि, अभी तक TVK को निर्णायक “गेम चेंजर” के बजाय “वोट कटवा” के रूप में देखा जा रहा है, जो किसी एक बड़े दल का खेल बिगाड़ सकती है। CM फेस: स्टालिन को मामूली बढ़त मुख्यमंत्री M. K. Stalin को AIADMK नेता Edappadi K. Palaniswami पर हल्की बढ़त मिलती दिख रही है, लेकिन अंतर इतना कम है कि इसे निर्णायक नहीं कहा जा सकता। निष्कर्ष: हाई-वोल्टेज और अनप्रेडिक्टेबल चुनाव कुल मिलाकर, तमिलनाडु चुनाव 2026 एक बेहद रोमांचक और अनिश्चित मुकाबले की ओर बढ़ रहा है। DMK को हल्की बढ़त जरूर दिख रही है, लेकिन AIADMK पूरी ताकत से चुनौती दे रही है। अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि आखिरी समय में मतदाता किस ओर झुकते हैं और मतदान प्रतिशत कैसा रहता है।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ DMK (द्रमुक) ने अपने सहयोगी दलों के साथ सीट बंटवारे को लगभग अंतिम रूप दे दिया है। अब सिर्फ VCK (विदुथलाई चिरुथैगल काची) के साथ समझौता बाकी है, जिसे आज फाइनल किया जा सकता है। राज्य के परिवहन और बिजली मंत्री एस.एस. शिवशंकर ने बताया कि DMK और VCK के बीच बातचीत अंतिम चरण में है। किसे कितनी सीटें मिलीं? DMK के नेतृत्व वाले सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस में सीटों का बंटवारा इस तरह हुआ है- कांग्रेस: 28 सीटें भाकपा (CPI): 5 सीटें माकपा (CPM): 5 सीटें एमडीएमके: 4 सीटें IUML, MMK, KMDK: 2-2 सीटें कई दौर की बातचीत के बाद वाम दलों के साथ भी सहमति बन गई है। 23 अप्रैल को होंगे चुनाव तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव 23 अप्रैल को होने हैं। चुनाव की तारीख नजदीक आने के साथ ही सभी दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। DMK ने शुरू किया प्रचार अभियान DMK ने पहले ही अपना चुनाव प्रचार अभियान शुरू कर दिया है। उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन लगातार रैलियां और जनसभाएं कर रहे हैं। मंत्री शिवशंकर के मुताबिक, पार्टी पूरी ताकत के साथ चुनाव मैदान में उतर चुकी है और गठबंधन भी मजबूत स्थिति में है। क्या है राजनीतिक मायने? सीट बंटवारे का लगभग पूरा होना यह संकेत देता है कि DMK गठबंधन चुनाव से पहले एकजुट दिखना चाहता है। VCK के साथ समझौता होते ही गठबंधन पूरी तरह तैयार हो जाएगा।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 से पहले सियासी माहौल गरमा गया है, लेकिन आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि सत्ताधारी Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) और उसके सहयोगी दल बेहद मजबूत स्थिति में हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों और 2021 के विधानसभा चुनावों के आधार पर देखें तो विपक्ष फिलहाल काफी पीछे नजर आ रहा है। 223 सीटों का गणित: DMK गठबंधन की बड़ी बढ़त 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों के विधानसभा क्षेत्रों के विश्लेषण से पता चलता है कि DMK गठबंधन ने 234 में से 223 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी। यह आंकड़ा बहुमत के लिए जरूरी 118 सीटों के आंकड़े से बहुत आगे है, जो इस बात का संकेत है कि अगर यही ट्रेंड जारी रहा तो DMK को सत्ता में वापसी से रोकना विपक्ष के लिए बेहद मुश्किल होगा। वहीं, All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (AIADMK) सिर्फ 8 सीटों पर बढ़त बना पाई, जबकि Pattali Makkal Katchi (PMK) को सिर्फ 3 सीटों पर बढ़त मिली। लोकसभा 2024 में ‘INDIA’ गठबंधन का दबदबा 2024 के लोकसभा चुनावों में DMK के नेतृत्व वाले ‘INDIA’ गठबंधन ने 39 में से 38 सीटों पर जीत दर्ज की। इस प्रदर्शन ने साफ कर दिया कि राज्य में सत्ताधारी गठबंधन की पकड़ मजबूत बनी हुई है। M. K. Stalin के नेतृत्व में DMK ने 22 सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी जीतीं, साथ ही 125 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की। वोट शेयर बनाम सीटों की कहानी DMK: 26.93% वोट शेयर AIADMK: 20.46% वोट शेयर हालांकि वोट शेयर का अंतर ज्यादा बड़ा नहीं दिखता, लेकिन सीटों में यह अंतर बहुत बड़ा हो गया है। राज्य के 234 विधानसभा क्षेत्रों में से 52 में DMK को 50% से ज्यादा वोट मिले, जबकि AIADMK सिर्फ 1 सीट पर ही यह आंकड़ा छू पाई। करीबी मुकाबलों में भी DMK आगे जिन 26 लोकसभा सीटों पर जीत का अंतर 10,000 वोट से कम था, उनमें भी DMK गठबंधन ने 19 सीटों पर बढ़त बनाई, जबकि AIADMK सिर्फ 7 सीटों पर ही आगे रही। यह दर्शाता है कि कड़े मुकाबलों में भी सत्ताधारी गठबंधन का पलड़ा भारी रहा। विपक्ष के लिए चुनौती क्यों बढ़ी? AIADMK का 2024 लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन 2021 विधानसभा चुनाव के मुकाबले कमजोर रहा। जहां 2021 में उसने 66 सीटें जीती थीं, वहीं 2024 में उसे कई सीटों पर DMK, कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों से हार का सामना करना पड़ा। नए खिलाड़ी से बदलेगा खेल? इस बार चुनाव में अभिनेता से नेता बने Vijay की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) भी मैदान में उतर रही है। TVK की एंट्री मुकाबले को दिलचस्प बना सकती है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह पार्टी विपक्ष को मजबूत करेगी या DMK के वोट बैंक में सेंध लगाएगी। मौजूदा आंकड़ों और चुनावी ट्रेंड को देखते हुए DMK गठबंधन स्पष्ट रूप से बढ़त में है। हालांकि, अंतिम नतीजे इस बात पर निर्भर करेंगे कि चुनावी मैदान में नए समीकरण कैसे बनते हैं और TVK जैसे नए खिलाड़ी कितना असर डालते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।