Supreme Court Decision

Karur Stampede Case
करूर भगदड़ मामला: सुप्रीम कोर्ट ने डीएमके की याचिका खारिज, सीएम विजय के दौरे पर रोक से किया इनकार

नई दिल्ली, एजेंसियां। तमिलनाडु के करूर भगदड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने डीएमके की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मुख्यमंत्री विजय को पीड़ित परिवारों से मिलकर मुआवजा और सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र वितरित करने से रोकने की मांग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि वह किसी मुख्यमंत्री की प्रशासनिक गतिविधियों का निर्धारण नहीं कर सकती और राजनीतिक विवादों को न्यायालय का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।   सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने डीएमके के वकील से कहा कि अदालत राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच नहीं है। यदि सत्तारूढ़ दल के नेता किसी मुद्दे पर बयान दे रहे हैं, तो विपक्ष भी उसका राजनीतिक जवाब दे सकता है। अदालत ने कहा कि ऐसी लड़ाइयां लोकतांत्रिक और राजनीतिक मंचों पर लड़ी जानी चाहिए, न कि न्यायालय में।   डीएमके ने अपनी याचिका क्या आरोप लगाया? डीएमके ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि पिछले वर्ष करूर में हुई भगदड़ की जांच को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। पार्टी का कहना था कि मुख्यमंत्री विजय का पीड़ित परिवारों से मिलना, उन्हें 10-10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और सरकारी नौकरी देने की घोषणा जांच की निष्पक्षता पर असर डाल सकती है। इसी आधार पर उनके प्रस्तावित दौरे पर रोक लगाने की मांग की गई थी।   क्या है मामला? यह मामला पिछले वर्ष सितंबर में करूर में तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) की एक रैली के दौरान हुई भगदड़ से जुड़ा है, जिसमें 41 लोगों की मौत हो गई थी। शुरुआत में मामले की जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंपी गई थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जांच राज्य पुलिस से लेकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी। मामले की निगरानी न्यायालय द्वारा गठित एक समिति भी कर रही है।   सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुख्यमंत्री विजय के करूर दौरे का रास्ता साफ हो गया है। वह जल्द ही पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर उन्हें घोषित आर्थिक सहायता और सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र सौंपेंगे। वहीं, इस फैसले के बाद राज्य की सियासत में इस मुद्दे पर बहस और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।

anjali kumari जुलाई 7, 2026 0
vinesh phogat
एशियन गेम्स ट्रायल में शामिल होंगी विनेश फोगाट, सुप्रीम कोर्ट ने दी इजाजत

नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय पहलवान विनेश फोगाट को एशियन गेम्स 2026 के चयन ट्रायल में हिस्सा लेने की अनुमति मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए उन्हें 30 और 31 मई को होने वाले ट्रायल में भाग लेने की इजाजत दी है। हालांकि कोर्ट ने सुनवाई के दौरान विनेश फोगाट से कई कड़े सवाल भी पूछे और साफ कहा कि “आपके नाम कई उपलब्धियां हैं, लेकिन देश पहले है। दरअसल, दिल्ली हाईकोर्ट ने विनेश को चयन ट्रायल में हिस्सा लेने की अनुमति दी थी, जिसे रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (WFI) ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। शुक्रवार को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि ट्रायल तुरंत होने वाले हैं, इसलिए फिलहाल उन्हें रोका नहीं जा रहा है, लेकिन मामले में कई गंभीर सवाल हैं जिनका जवाब देना होगा।   कोर्ट ने उठाए कई सवाल सुनवाई के दौरान विनेश की ओर से कहा गया कि वह सिर्फ ट्रायल में हिस्सा लेने का मौका चाहती हैं। उनकी वकील ने कोर्ट से कहा कि “एक महिला खिलाड़ी, जो एक साल पहले मां बनी है, सिर्फ चयन ट्रायल में भाग लेने की अनुमति मांग रही है।” इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिसंबर 2024 में विनेश ने ब्रेक लिया, इसके बाद उन्होंने डोपिंग टेस्ट में हिस्सा नहीं लिया और अपनी लोकेशन की जानकारी भी नहीं दी। कोर्ट ने यह भी कहा कि फरवरी 2026 से एशियन गेम्स की चयन प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, जिसमें खिलाड़ियों को चार प्रतियोगिताओं में भाग लेना था, लेकिन विनेश ने इनमें हिस्सा नहीं लिया।   ‘नियम सबके लिए बराबर’ कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि खेल संघों के नियम लंबे समय से लागू हैं और सभी खिलाड़ियों पर समान रूप से लागू होते हैं। जजों ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा इन नियमों को “बहिष्करणकारी” बताना उचित नहीं लगता। अब इस मामले में अगली सुनवाई 1 जून को होगी। फिलहाल विनेश फोगाट को ट्रायल में उतरने की अनुमति मिलने से उनके समर्थकों में उत्साह है, जबकि खेल प्रशासन और चयन प्रक्रिया को लेकर बहस भी तेज हो गई है।

Unknown मई 29, 2026 0
election commission update
SIR पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी मुहर, चुनाव आयोग को मिली राहत

नई दिल्ली, एजेंसियां। SC ने वोटर रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बड़ा फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग की प्रक्रिया को पूरी तरह वैध करार दिया है। बुधवार को सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस Surya Kant और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि SIR प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है और यह चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है।   चुनाव आयोग को मिली बड़ी राहत अदालत ने स्पष्ट कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने और योग्य मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद हैं, इसलिए चुनाव आयोग द्वारा की जा रही यह प्रक्रिया जरूरी है। अदालत ने यह भी माना कि आयोग किसी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल करने से इनकार करने का अधिकार रखता है, यदि आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध न हों।   क्या था विवाद? याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि SIR प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के दायरे से बाहर है। विवाद मुख्य रूप से उस नियम को लेकर था, जिसमें जिन मतदाताओं या उनके परिवार का नाम 2002 या 2003 की वोटर सूची में नहीं था, उन्हें अपने पूर्वजों का लिंक साबित करना जरूरी बताया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इससे गरीब, प्रवासी और पिछड़े वर्ग के कई वास्तविक मतदाता मतदान अधिकार से वंचित हो सकते हैं, क्योंकि उनके पास पुराने दस्तावेज नहीं हैं।   आधार को भी मिली मान्यता सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता और सुविधा बढ़ाने के लिए आधार कार्ड को अतिरिक्त दस्तावेज के रूप में शामिल करने का निर्देश भी दिया था। चुनाव आयोग ने अदालत में कहा कि इस अभियान का उद्देश्य फर्जी और डुप्लीकेट वोटरों को हटाकर मतदाता सूची को शुद्ध बनाना है। कोर्ट के फैसले के बाद अब SIR प्रक्रिया पूरे देश में जारी रहेगी और चुनाव आयोग को इस अभियान को आगे बढ़ाने की कानूनी मंजूरी मिल गई है।

Unknown मई 27, 2026 0
Alamgir Alam release
रांची: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आज जेल से बाहर आएंगे आलमगीर आलम

रांची। झारखंड के पूर्व मंत्री आलमगीर आलम और उनके पूर्व आप्त सचिव संजीव लाल को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद बुधवार को रांची स्थित बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा से रिहा किया जाएगा। दोनों पिछले 23 महीनों से न्यायिक हिरासत में थे। मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपित दोनों को सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत प्रदान की थी, लेकिन आदेश की कॉपी समय पर अपलोड नहीं होने के कारण मंगलवार को उनकी रिहाई नहीं हो सकी। अब आदेश अपलोड होने के बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाएगी और बंध पत्र भरने के बाद दोनों जेल से बाहर आ सकेंगे।   पहले निचली अदालत और हाई कोर्ट से नहीं मिली थी राहत इस मामले में विशेष अदालत और झारखंड हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद दोनों ने 25 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। लंबी सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने उन्हें जमानत देने का फैसला सुनाया। इस खबर के बाद राज्य की राजनीतिक हलचल भी तेज हो गई है। माना जा रहा है कि आलमगीर आलम की रिहाई का असर आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है।

Unknown मई 13, 2026 0
पीरियड्स लीव पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, अनिवार्य छुट्टी की याचिका पर सुनवाई से इनकार
पीरियड्स लीव पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, अनिवार्य छुट्टी की याचिका पर सुनवाई से इनकार

नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं और छात्राओं के लिए देशभर में मासिक धर्म (पीरियड्स) अवकाश की राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि इसे कानून के जरिए अनिवार्य बनाने से महिलाओं के रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और जस्टिस Joymalya Bagchi की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर पीरियड्स लीव को अनिवार्य बना दिया गया तो नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से कतराने लग सकते हैं। इससे महिलाओं के प्रति लैंगिक रूढ़िवादिता भी बढ़ सकती है। अदालत ने क्या कहा? पीठ ने कहा कि मासिक धर्म को किसी कमजोरी या हीनता के रूप में पेश करना सही नहीं है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित सक्षम प्राधिकारी इस विषय पर याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए प्रतिनिधित्व पर विचार कर सकते हैं और सभी पक्षों से चर्चा के बाद नीति बनाने की संभावना पर फैसला ले सकते हैं। किसने दायर की थी याचिका? यह जनहित याचिका Shailendra Mani Tripathi ने दायर की थी। इसमें कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए देशभर में मासिक धर्म अवकाश की राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की गई थी। केरल का दिया गया उदाहरण सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता M. R. Shamshad ने बताया कि Kerala सहित कुछ राज्यों और निजी कंपनियों में महिलाओं को स्वैच्छिक रूप से पीरियड्स लीव दी जा रही है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वैच्छिक रूप से दी गई सुविधाएं अच्छी हैं, लेकिन इसे कानून के जरिए अनिवार्य बनाने से सामाजिक और पेशेवर प्रभाव पड़ सकते हैं। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए संबंधित अधिकारियों को इस मुद्दे पर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया।

Unknown मार्च 13, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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abhishek singh जुलाई 2, 2026 0