Russia Telegram News: मैसेजिंग ऐप Telegram के संस्थापक Pavel Durov की मुश्किलें बढ़ गई हैं। रूस की फेडरल सिक्योरिटी सर्विस (FSB) ने उन पर आतंकवादी गतिविधियों में मदद करने का आरोप लगाते हुए इंटरनेशनल वॉन्टेड लिस्ट में शामिल कर दिया है। रूसी एजेंसी का दावा है कि टेलीग्राम ने ऐसे कई चैनल, चैट और बॉट नहीं हटाए, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर यूक्रेनी खुफिया एजेंसियां और चरमपंथी संगठन रूस के खिलाफ कर रहे थे। FSB ने क्या लगाए आरोप? रूस की सुरक्षा एजेंसी FSB के मुताबिक, टेलीग्राम पर मौजूद कुछ चैनल और बॉट का इस्तेमाल कथित तौर पर रूस में तोड़फोड़, आतंकवादी हमलों की साजिश, साइबर धोखाधड़ी और हिंसक गतिविधियों के समन्वय के लिए किया गया। एजेंसी का आरोप है कि इन गतिविधियों में यूक्रेनी खुफिया एजेंसियों और आतंकवादी संगठनों की भूमिका रही, लेकिन टेलीग्राम ने ऐसे अकाउंट्स और चैनलों को हटाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। रिपोर्ट के अनुसार, यदि रूस में इन आरोपों में ड्यूरोव दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें उम्रकैद तक की सजा का सामना करना पड़ सकता है। डेटिंग चैटबॉट को लेकर भी गंभीर दावा FSB ने यह भी दावा किया है कि टेलीग्राम पर मौजूद एक लोकप्रिय डेटिंग चैटबॉट का इस्तेमाल कथित तौर पर यूक्रेनी सुरक्षा एजेंसियों ने रूस के युवाओं को तोड़फोड़ और आतंकवादी गतिविधियों के लिए भर्ती करने में किया। एजेंसी के अनुसार, जुलाई 2025 से अब तक इस मामले में 12 से 22 वर्ष की आयु के 46 लोगों को हिरासत में लिया गया है। Telegram पर रूस की बढ़ती सख्ती रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से मॉस्को ने इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपना नियंत्रण लगातार बढ़ाया है। रूस में Facebook, Instagram और X पर पहले ही प्रतिबंध या कड़े प्रतिबंधात्मक कदम लागू किए जा चुके हैं। YouTube की स्पीड सीमित की गई है, जबकि Signal और Viber जैसे मैसेजिंग ऐप भी ब्लॉक किए जा चुके हैं। अब Telegram और WhatsApp पर भी निगरानी और सख्ती बढ़ाई जा रही है। कौन हैं Pavel Durov? Pavel Durov ने वर्ष 2013 में Telegram की स्थापना की थी। कंपनी के अनुसार, इस प्लेटफॉर्म के दुनिया भर में 1 अरब से अधिक सक्रिय यूजर्स हैं। इससे पहले उन्होंने रूस के लोकप्रिय सोशल नेटवर्क VKontakte (VK) की भी स्थापना की थी। हालांकि 2014 में रूसी अधिकारियों के साथ विवाद के बाद उन्होंने कंपनी छोड़ दी और विदेश चले गए। वर्तमान में उनके पास फ्रांस और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की नागरिकता है। पहले भी कानूनी जांच का सामना कर चुके हैं यह पहला मौका नहीं है जब पावेल ड्यूरोव कानूनी विवादों में घिरे हैं। 2024 में फ्रांस में उन्हें उन आरोपों की जांच के सिलसिले में हिरासत में लिया गया था, जिनमें टेलीग्राम के जरिए कथित आपराधिक गतिविधियों, ड्रग तस्करी, बच्चों से जुड़े यौन शोषण सामग्री के प्रसार को रोकने में विफल रहने और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ पर्याप्त सहयोग न करने के आरोप शामिल थे। रूस की इस ताजा कार्रवाई ने एक बार फिर डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर वैश्विक बहस तेज कर दी है।
रूस ने मैसेजिंग ऐप टेलीग्राम के संस्थापक पावेल डुरोव को अंतरराष्ट्रीय वांटेड सूची (International Wanted List) में शामिल कर दिया है। रूस की प्रमुख आंतरिक सुरक्षा एजेंसी फेडरल सिक्योरिटी सर्विस (FSB) ने उन पर आतंकवाद, तोड़फोड़ और साइबर अपराधों में इस्तेमाल हो रहे टेलीग्राम चैनलों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया है। FSB ने क्या लगाए आरोप? रूसी सुरक्षा एजेंसी FSB ने बुधवार (29 जुलाई) को जारी बयान में कहा कि टेलीग्राम प्रशासन ने ऐसे कई चैनल, चैट और बॉट नहीं हटाए, जिनका कथित तौर पर यूक्रेन की खुफिया एजेंसियां, आतंकवादी और चरमपंथी संगठन इस्तेमाल कर रहे हैं। FSB के अनुसार, इन प्लेटफॉर्मों का उपयोग रूस के खिलाफ तोड़फोड़, आतंकवादी गतिविधियों, सामूहिक हमलों और साइबर धोखाधड़ी जैसी घटनाओं की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने के लिए किया जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच बढ़ा विवाद रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान टेलीग्राम दोनों देशों में सूचना साझा करने और संचार का प्रमुख माध्यम बन गया है। युद्ध से जुड़े अपडेट, सैन्य गतिविधियां और आधिकारिक संदेश बड़ी संख्या में इसी प्लेटफॉर्म के जरिए साझा किए जाते हैं। इसी कारण हाल के वर्षों में रूस ने टेलीग्राम के उपयोग पर नियंत्रण बढ़ाने की कई कोशिशें की हैं। टेलीग्राम के 1 अरब से अधिक यूजर्स साल 2013 में लॉन्च हुए एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम का दावा है कि दुनिया भर में उसके 1 अरब से अधिक सक्रिय यूजर्स हैं। रूस इसे देश के सबसे लोकप्रिय मैसेजिंग ऐप्स में से एक मानता है, लेकिन सरकार लंबे समय से इसके संचालन और कंटेंट मॉडरेशन को लेकर सवाल उठाती रही है। अपनी मैसेजिंग सेवा को बढ़ावा दे रहा रूस रूस हाल के वर्षों में टेलीग्राम पर निर्भरता कम करने और अपनी सरकारी मैसेजिंग सेवा 'MAX' को बढ़ावा देने की दिशा में भी काम कर रहा है। इसी रणनीति के तहत सरकार टेलीग्राम पर कई प्रतिबंधात्मक कदम उठा चुकी है। डुरोव ने पहले लगाए थे ये आरोप 41 वर्षीय पावेल डुरोव ने इस वर्ष की शुरुआत में दावा किया था कि रूसी अधिकारियों ने उनके खिलाफ आपराधिक जांच शुरू की है। उनका आरोप था कि सरकार निजता (Privacy) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) को सीमित करने के लिए टेलीग्राम पर दबाव बना रही है और झूठे आरोपों का सहारा ले रही है। डुरोव का जन्म रूस में हुआ था, लेकिन उनके पास फ्रांस और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की नागरिकता भी है। फिलहाल वह फ्रांस में रह रहे हैं। बढ़ सकता है विवाद रूस द्वारा डुरोव को इंटरनेशनल वॉन्टेड लिस्ट में डालने के बाद मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और तूल पकड़ सकता है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब डिजिटल प्लेटफॉर्म, साइबर सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर वैश्विक बहस तेज है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्र सरकार ने मैसेजिंग प्लेटफॉर्म Telegram को पायरेटेड फिल्मों, वेब सीरीज और अन्य कॉपीराइट वाले ऑडियो-वीडियो कंटेंट के व्यापक प्रसार को लेकर नोटिस जारी किया है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने Telegram को निर्देश दिया है कि वह प्लेटफॉर्म पर कॉपीराइट उल्लंघन रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए और 15 दिनों के भीतर Action Taken Report (ATR) सरकार को सौंपे। यह कार्रवाई फिल्म निर्माताओं, OTT प्लेटफॉर्म और प्रसारण कंपनियों की लगातार मिल रही शिकायतों के बाद की गई है। केवल चैनल हटाना नहीं, पूरी व्यवस्था सुधारने के निर्देश सरकार ने Telegram से कहा है कि वह केवल एक-एक चैनल हटाने तक सीमित न रहे, बल्कि ऐसा मजबूत सिस्टम विकसित करे जो पायरेटेड कंटेंट की पहचान, रिपोर्टिंग, ब्लॉकिंग और हटाने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाए। साथ ही बार-बार कॉपीराइट उल्लंघन करने वाले चैनलों, ग्रुपों, बॉट्स, एडमिन और संबंधित अकाउंट्स के खिलाफ भी कार्रवाई करने को कहा गया है। 15 दिन में देनी होगी एक्शन रिपोर्ट नोटिस में Telegram को 15 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा गया है, जिसमें यह बताना होगा कि पायरेसी रोकने के लिए कौन-कौन से तकनीकी और प्रशासनिक कदम उठाए गए हैं। मंत्रालय ने कंटेंट क्रिएटर्स, OTT कंपनियों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए शिकायत निवारण तंत्र को भी मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। डिजिटल पायरेसी पर सरकार की सख्ती विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम डिजिटल पायरेसी के खिलाफ सरकार की नई रणनीति का हिस्सा है। सरकार अब केवल आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के बजाय प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने पर जोर दे रही है, ताकि फिल्म उद्योग, OTT प्लेटफॉर्म और कंटेंट निर्माताओं के कॉपीराइट की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। Telegram की ओर से फिलहाल इस नोटिस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर प्रस्तावित और मौजूदा 'यूजरनेम फीचर' को लेकर सख्त रुख अपनाया है। WhatsApp को नोटिस जारी करने के बाद अब सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने Telegram और Signal को भी नोटिस भेजकर उनके यूजरनेम सिस्टम और उससे जुड़े सुरक्षा उपायों पर जवाब मांगा है। सरकार ने इन प्लेटफॉर्म्स से पूछा है कि यूजरनेम फीचर के जरिए होने वाली धोखाधड़ी, फर्जी पहचान (Impersonation) और साइबर अपराधों को रोकने के लिए उन्होंने क्या सुरक्षा इंतजाम किए हैं। Telegram और Signal से मांगा जवाब सरकार ने नोटिस में पूछा है कि दोनों प्लेटफॉर्म अपने यूजरनेम फीचर को जारी रखने के पक्ष में क्या तर्क देते हैं और यह फीचर उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किस तरह काम करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, Telegram को भेजे गए नोटिस में सरकार ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि उसे यूजरनेम फीचर बनाए रखने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए। गौरतलब है कि Telegram और Signal पर यूजरनेम फीचर पहले से उपलब्ध है, जिससे बिना मोबाइल नंबर साझा किए भी यूजर्स एक-दूसरे से संपर्क कर सकते हैं। WhatsApp को भी भेजा गया था नोटिस इससे पहले केंद्र सरकार ने Meta को नोटिस जारी कर WhatsApp के प्रस्तावित यूजरनेम फीचर पर आपत्ति जताई थी। सरकार ने कहा था कि जब तक इस विषय पर विस्तृत चर्चा पूरी नहीं हो जाती, तब तक इस फीचर को भारत में लॉन्च नहीं किया जाए। सरकार की चिंता है कि मोबाइल नंबर की जगह यूजरनेम आधारित पहचान से ऑनलाइन ठगी, फर्जी प्रोफाइल और पहचान छिपाकर अपराध करने के मामलों में बढ़ोतरी हो सकती है। आईटी नियमों के तहत मांगा जवाब सरकार ने Meta से यह भी पूछा है कि प्रस्तावित फीचर को लेकर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। नोटिस में कहा गया है कि यदि यह फीचर पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना लागू किया जाता है, तो इससे साइबर अपराध और ऑनलाइन फ्रॉड का खतरा बढ़ सकता है। WhatsApp ने किया फीचर का बचाव WhatsApp ने सरकार की चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि प्रस्तावित यूजरनेम फीचर में उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है। कंपनी का दावा है कि इसमें फर्जी पहचान, प्रतिरूपण (Impersonation) और ऑनलाइन धोखाधड़ी को रोकने के लिए कई सुरक्षा उपाय पहले से शामिल किए गए हैं। भारत है सबसे बड़ा बाजार भारत WhatsApp के लिए दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में शामिल है। देश में WhatsApp के करीब 50 करोड़ उपयोगकर्ता हैं। वहीं, Telegram और Signal के भी लाखों सक्रिय यूजर्स हैं। ऐसे में सरकार का यह कदम डिजिटल सुरक्षा, ऑनलाइन पहचान और साइबर धोखाधड़ी को रोकने के प्रयासों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नई दिल्ली,एजेंसियां। केंद्र सरकार ने डिजिटल सुरक्षा और ऑनलाइन धोखाधड़ी को लेकर अपनी सख्ती बढ़ाते हुए WhatsApp के बाद अब Telegram और Signal को भी उनके यूजरनेम (Username) फीचर के संबंध में नोटिस जारी किया है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने दोनों प्लेटफॉर्म से इस फीचर से जुड़े सुरक्षा उपायों और संभावित जोखिमों पर विस्तृत जानकारी मांगी है। यूजरनेम फीचर पर सरकार की बढ़ी चिंता सरकार का कहना है कि यूजरनेम आधारित मैसेजिंग में मोबाइल नंबर छिपा रहता है, जिससे फर्जी पहचान , ऑनलाइन ठगी, फिशिंग और अन्य साइबर अपराधों का खतरा बढ़ सकता है। इसी कारण कंपनियों से पूछा गया है कि ऐसे मामलों को रोकने के लिए उन्होंने क्या सुरक्षा इंतजाम किए हैं। WhatsApp को पहले ही दिया जा चुका है निर्देश इससे पहले केंद्र सरकार ने Meta को निर्देश दिया था कि भारत में WhatsApp के प्रस्तावित यूजरनेम फीचर का रोलआउट फिलहाल रोका जाए। साथ ही कंपनी से तीन दिनों के भीतर इस फीचर और इसके सुरक्षा उपायों पर विस्तृत जवाब मांगा गया था। Telegram और Signal से भी मांगी गई रिपोर्ट सरकारी सूत्रों के अनुसार, Telegram और Signal से भी पूछा गया है कि उनके प्लेटफॉर्म पर लंबे समय से मौजूद यूजरनेम फीचर का दुरुपयोग रोकने के लिए कौन-कौन से सुरक्षा उपाय लागू हैं। दोनों कंपनियों को इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है। डिजिटल सुरक्षा पर सरकार की नजर विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जवाबदेही बढ़ाने और साइबर अपराधों पर रोक लगाने की दिशा में सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। अब सभी की नजर कंपनियों की प्रतिक्रिया और सरकार के अगले कदम पर बनी हुई है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम को लेकर केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में गंभीर आरोप लगाए हैं। सरकार ने दावा किया है कि यह प्लेटफॉर्म तेजी से “नया डार्क वेब” बनता जा रहा है और इसका इस्तेमाल पेपर लीक, साइबर ठगी, ड्रग तस्करी, आतंकवाद से जुड़ी गतिविधियों और अन्य अवैध कार्यों के लिए बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। हाईकोर्ट ने टेलीग्राम से मांगा जवाब सुनवाई के दौरान अदालत ने टेलीग्राम से पूछा कि वह अवैध और संवेदनशील सामग्री, खासकर परीक्षा पेपर लीक जैसे मामलों में, रियल-टाइम में रोकने के लिए क्या तकनीकी व्यवस्था अपनाता है। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि प्लेटफॉर्म पर मॉनिटरिंग और कंटेंट कंट्रोल कैसे किया जाता है। केंद्र सरकार के गंभीर आरोप सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) से मिले इनपुट के अनुसार टेलीग्राम पर अवैध गतिविधियां किसी एक घटना तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक संगठित पैटर्न का हिस्सा हैं। सरकार ने आरोप लगाया कि प्लेटफॉर्म की संरचना में मौजूद बॉट्स और चैनल्स का उपयोग तेजी से भ्रामक और गैरकानूनी कंटेंट फैलाने में किया जा रहा है। ‘डार्क वेब’ जैसा नेटवर्क बनने का दावा केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा है कि टेलीग्राम का इस्तेमाल पेपर लीक, साइबर क्राइम, मनी लॉन्ड्रिंग, मालवेयर वितरण, कॉपीराइट उल्लंघन और बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार तक में हो रहा है। सरकार का कहना है कि इसकी गोपनीयता सुविधाएं जांच एजेंसियों के लिए अपराधियों तक पहुंचना कठिन बना देती हैं। टेलीग्राम का पक्ष और बैठकें सरकार ने बताया कि उसने पहले कंपनी को सुधार का मौका दिया था और 3 जून 2026 को टेलीग्राम प्रतिनिधियों के साथ बैठक भी हुई थी। इसमें प्लेटफॉर्म ने स्वीकार किया कि वह सभी अवैध कंटेंट को पहले से पहचानने में पूरी तरह सक्षम नहीं है, हालांकि रिपोर्ट होने पर कार्रवाई की जाती है। कानूनी बहस जारी टेलीग्राम ने सरकार के आदेश को चुनौती देते हुए कहा है कि कानूनी आधार पर कार्रवाई में खामियां हैं। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को रिकॉर्ड में लेते हुए मामले की आगे की सुनवाई जारी रखने का संकेत दिया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।