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Donald Trump
ट्रम्प का तेल कंपनियों पर सख्त रुख, बोले- कच्चा तेल सस्ता हुआ तो पेट्रोल के दाम भी तुरंत घटाएं जाए

वाशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पेट्रोल बेचने वाली तेल कंपनियों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट का लाभ तुरंत उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाए। ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत घटकर करीब 68 डॉलर प्रति बैरल रह गई है, लेकिन इसके बावजूद पेट्रोल की खुदरा कीमतों में अपेक्षित कमी नहीं की गई है।   'लोगों से जरूरत से ज्यादा पैसे वसूले जा रहे' ट्रम्प ने कहा कि जब कच्चा तेल लगातार सस्ता हो रहा है, तब भी आम अमेरिकी उपभोक्ताओं से अधिक कीमत वसूली जा रही है। उन्होंने तेल कंपनियों से पेट्रोल की कीमत लगभग 2.50 डॉलर प्रति गैलन तक लाने की अपील की। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि उपभोक्ताओं से अनावश्यक रूप से अधिक पैसे लेना स्वीकार्य नहीं है और इसे गैरकानूनी माना जा सकता है।   तेल कंपनियों को दी सख्त चेतावनी राष्ट्रपति ट्रम्प ने साफ शब्दों में कहा कि यदि कंपनियों ने जल्द कीमतों में कटौती नहीं की, तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि सरकार इस मामले में कड़ी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगी। इससे पहले भी ट्रम्प अमेरिकी न्याय विभाग को बड़ी तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण संबंधी गतिविधियों की जांच के निर्देश दे चुके हैं।   मध्य पूर्व तनाव के बाद बदला बाजार का रुख हाल के दिनों में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़े तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया था। हालांकि अब स्थिति कुछ सामान्य होने के साथ तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। इसके बावजूद पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में अपेक्षित कमी नहीं आने पर ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई है।   ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका में महंगाई और ईंधन की कीमतें आम लोगों के लिए बड़ा मुद्दा बनी हुई हैं। राष्ट्रपति का कहना है कि बाजार में पारदर्शिता और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा सरकार की प्राथमिकता है।

anjali kumari जून 30, 2026 0
US President Donald Trump meets NATO Secretary General Mark Rutte amid tensions over support for Iran-related military action.
पैसा नहीं, वफादारी चाहिए... ईरान युद्ध में साथ न देने पर NATO पर भड़के ट्रंप, मार्क रूटे ने दिया जवाब

  वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के दौरान अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने पर नाटो सहयोगी देशों पर नाराजगी जताई है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को अपने सहयोगियों से आर्थिक मदद नहीं, बल्कि वफादारी और राजनीतिक समर्थन की उम्मीद थी। उनके इस बयान पर नाटो महासचिव Mark Rutte ने यूरोपीय देशों का बचाव करते हुए कहा कि गठबंधन के सदस्य अमेरिका के साथ खड़े रहे हैं और उन्होंने सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। व्हाइट हाउस में ट्रंप ने जताई नाराजगी व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में नाटो प्रमुख मार्क रूटे के साथ बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान के खिलाफ अभियान में अमेरिका ने अपने दम पर कार्रवाई की। उन्होंने कहा कि अमेरिका को सैन्य सहायता की जरूरत नहीं थी, लेकिन सहयोगी देशों की ओर से समर्थन का संकेत मिलना महत्वपूर्ण था। ट्रंप ने कहा कि यदि यूरोपीय देश यह कहते कि वे अमेरिका के साथ खड़े हैं या किसी भी तरह मदद के लिए तैयार हैं, तो यह गठबंधन की एकजुटता का संदेश होता। उन्होंने कहा कि इस मामले में उन्हें सहयोगियों से निराशा हाथ लगी। स्पेन, इटली, ब्रिटेन और जर्मनी पर साधा निशाना बैठक के दौरान ट्रंप ने कई नाटो देशों की आलोचना करते हुए कहा कि कुछ सदस्य देश सुरक्षा के लाभ तो उठाना चाहते हैं, लेकिन जिम्मेदारियों को साझा करने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने विशेष रूप से स्पेन, इटली, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस का उल्लेख करते हुए कहा कि कई देश रक्षा सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारियों को लेकर अपेक्षित भूमिका नहीं निभा रहे हैं। ट्रंप ने आरोप लगाया कि कुछ सहयोगी देशों को लगता है कि वे बिना पर्याप्त योगदान दिए भी अमेरिकी सुरक्षा छतरी का लाभ ले सकते हैं। “हमें पैसे नहीं, वफादारी चाहिए” एक पत्रकार के सवाल के जवाब में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को सहयोगी देशों के धन की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना अमेरिका के पास है और उसे आर्थिक मदद की जरूरत नहीं पड़ती। ट्रंप ने कहा कि उनकी अपेक्षा केवल इतनी है कि जब अमेरिका अपने सहयोगियों की सुरक्षा के लिए आगे आए, तो बदले में उसे राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन मिले। उन्होंने कहा कि यूरोप में तैनात हजारों अमेरिकी सैनिक वहां के देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मौजूद हैं। नाटो प्रमुख मार्क रूटे ने किया सहयोगियों का बचाव ट्रंप की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए नाटो महासचिव मार्क रूटे ने कहा कि यूरोपीय देशों ने अमेरिका का समर्थन किया है और ईरान की परमाणु गतिविधियों से पैदा होने वाला खतरा केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं था, बल्कि वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा था। रूटे ने कहा कि अभियान के दौरान यूरोप स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बताया कि यूरोपीय आधारभूत ढांचे और एयरबेस का उपयोग अमेरिकी अभियानों के लिए किया गया, जिससे मिशन को रणनीतिक सहायता मिली। रक्षा खर्च में बढ़ोतरी को बताया ‘ट्रंप ट्रिलियन’ मार्क रूटे ने दावा किया कि ट्रंप के पहले कार्यकाल के बाद से यूरोपीय देशों और कनाडा ने रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी की है। उन्होंने इस अतिरिक्त निवेश को “ट्रंप ट्रिलियन” का नाम देते हुए कहा कि सहयोगी देश धीरे-धीरे सुरक्षा बोझ साझा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। रूटे के अनुसार, यूरोप और कनाडा ने रक्षा क्षेत्र में लगभग 1.2 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त निवेश किया है। इसके अलावा अमेरिकी रक्षा कंपनियों को भी बड़े पैमाने पर सैन्य उपकरणों के ऑर्डर दिए गए हैं। नाटो शिखर सम्मेलन से पहले बढ़ी बयानबाजी ट्रंप और रूटे के बीच यह सार्वजनिक मतभेद ऐसे समय सामने आया है, जब नाटो का अगला शिखर सम्मेलन 7-8 जुलाई को Ankara में आयोजित होने वाला है। सम्मेलन में गठबंधन के 32 सदस्य देशों के नेता भाग लेंगे और रक्षा खर्च, सामूहिक सुरक्षा तथा वैश्विक संकटों पर चर्चा करेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के ताजा बयान नाटो के भीतर रक्षा जिम्मेदारियों और अमेरिका की भूमिका को लेकर चल रही पुरानी बहस को फिर से तेज कर सकते हैं।  

Deepshikha जून 25, 2026 0
US President Donald Trump speaks about Iran talks and possible nuclear deal during a political event.
ट्रंप का बड़ा दावा: ‘दो हफ्तों में ईरान पर पूर्ण विजय’, परमाणु समझौते के भी दिए संकेत

  वॉशिंगटन: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी कूटनीतिक और रणनीतिक टकराव को लेकर बड़ा दावा किया है। ट्रंप ने कहा कि अगले दो सप्ताह अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे और इसी अवधि में ईरान के खिलाफ “पूर्ण विजय” हासिल होने की संभावना है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि दोनों देशों के बीच एक नए परमाणु समझौते की राह खुल सकती है। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के दिनों में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ा सैन्य तनाव फिलहाल कम होता दिखाई दे रहा है और क्षेत्र में युद्ध की आशंकाओं के बीच कूटनीतिक प्रयास तेज हो गए हैं। चुनावी कार्यक्रम में किया बड़ा दावा अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप ने यह टिप्पणी एक वर्चुअल राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान की, जहां उन्होंने अपने समर्थकों को संबोधित किया। कार्यक्रम रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के समर्थन में आयोजित किया गया था। अपने संबोधन में ट्रंप ने दावा किया कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि ईरान अमेरिकी मांगों पर गंभीरता से विचार कर रहा है और समझौते की संभावना पहले की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई दे रही है। ट्रंप ने कहा, “हम बातचीत कर रहे हैं और वे एक अच्छा समझौता करना चाहते हैं। वे हमें लगभग हर वह चीज देने को तैयार हैं जिसकी हमें जरूरत है। वे परमाणु हथियार नहीं रखने पर भी तैयार हैं।” ‘दो सप्ताह में दिखेगी असली जीत’ राष्ट्रपति ट्रंप ने अगले पखवाड़े को निर्णायक बताते हुए कहा कि अमेरिका जल्द ही अपनी रणनीतिक सफलता की घोषणा कर सकता है। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि हम यह संघर्ष जीत रहे हैं, लेकिन असली जीत अगले दो सप्ताह में दिखाई देगी। हम पूर्ण विजय की घोषणा करेंगे। यह पूरी जीत होगी और बहुत जल्द होगी।” ट्रंप ने यह भी दावा किया कि यदि समझौता सफल रहा तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और तेल की कीमतों में गिरावट देखने को मिल सकती है। ईरान-इजरायल तनाव के बीच आया बयान ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब सप्ताहांत में ईरान और इजरायल के बीच तनाव खतरनाक स्तर तक पहुंच गया था। दोनों देशों के बीच मिसाइल हमलों और जवाबी सैन्य कार्रवाइयों ने पूरे पश्चिम एशिया में युद्ध की आशंकाएं बढ़ा दी थीं। तनाव बढ़ने के बाद इजरायल ने ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया, जबकि ईरान ने भी जवाबी हमले किए। बाद में दोनों पक्षों की ओर से सैन्य गतिविधियों में कमी देखने को मिली। नेतन्याहू ने हमले रोकने की पुष्टि की इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पुष्टि की है कि इजरायली सेना ने फिलहाल ईरानी ठिकानों पर अपने सैन्य अभियान रोक दिए हैं। उन्होंने किसी औपचारिक युद्धविराम की घोषणा नहीं की, लेकिन सैन्य कार्रवाई में आई नरमी को क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। दूसरी ओर, ईरान ने भी संकेत दिया है कि वह फिलहाल अपने सैन्य अभियान को आगे नहीं बढ़ाएगा।  तेहरान ने चेतावनी दी है कि यदि उसके हितों को नुकसान पहुंचाने वाली कोई नई कार्रवाई होती है तो जवाबी कदम उठाए जा सकते हैं। परमाणु समझौते पर फिर बढ़ीं उम्मीदें ट्रंप के बयान के बाद अमेरिका और ईरान के बीच संभावित परमाणु समझौते को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। पिछले कुछ वर्षों से दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं और परमाणु कार्यक्रम को लेकर कई दौर की वार्ताएं भी विफल रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों पक्ष किसी नए समझौते पर सहमत होते हैं तो इससे न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी इसका व्यापक असर पड़ सकता है। पहले भी दे चुके हैं ऐसी समयसीमा यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने किसी कूटनीतिक सफलता के लिए दो सप्ताह की समयसीमा तय की हो। इससे पहले भी उन्होंने क्षेत्रीय संघर्षों और युद्धविराम प्रयासों को लेकर इसी तरह की समय-सीमा का उल्लेख किया था। अब एक बार फिर ट्रंप ने अगले दो सप्ताह को निर्णायक बताते हुए संकेत दिया है कि अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इन दावों पर अंतिम तस्वीर आने वाले दिनों में ही साफ हो पाएगी। पश्चिम एशिया पर टिकी दुनिया की नजर ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते घटनाक्रमों पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। क्षेत्र में शांति बहाल करने के प्रयासों और संभावित परमाणु समझौते की दिशा में होने वाली प्रगति आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है।  

Deepshikha जून 9, 2026 0
Donald Trump announces joint US-Nigeria operation killing senior ISIS commander in Nigeria
नाइजीरिया में ISIS का बड़ा आतंकी ढेर, ट्रंप बोले- मेरे निर्देश पर चला ऑपरेशन

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया है कि आतंकवादी संगठन Islamic State के वैश्विक स्तर के दूसरे सबसे बड़े कमांडर अबू-बिलाल अल-मिनुकी को अमेरिकी और नाइजीरियाई सेनाओं के संयुक्त ऑपरेशन में मार गिराया गया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘Truth Social’ पर इस ऑपरेशन की जानकारी देते हुए कहा कि यह मिशन उनके निर्देश पर बेहद गुप्त और जटिल तरीके से अंजाम दिया गया। ‘अफ्रीका में छिपने की कोशिश कर रहा था’ ट्रंप ने कहा कि अबू-बिलाल अल-मिनुकी अफ्रीका में छिपकर ISIS के वैश्विक नेटवर्क को संचालित करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने उसकी गतिविधियों और लोकेशन को ट्रैक कर लिया। उन्होंने लिखा, “दुनिया के सबसे सक्रिय आतंकवादियों में से एक को खत्म करने के लिए अमेरिकी सेना और नाइजीरिया की सशस्त्र सेनाओं ने बेहद सटीक और कठिन मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया।” ISIS के ग्लोबल ऑपरेशन को बड़ा झटका ट्रंप के अनुसार, अबू-बिलाल अल-मिनुकी ISIS के वैश्विक संचालन में अहम भूमिका निभा रहा था और वह अमेरिकी हितों को निशाना बनाने की साजिशों में भी शामिल था। उन्होंने कहा, “उसकी मौत के बाद ISIS के वैश्विक ऑपरेशन को बड़ा नुकसान पहुंचा है।” नाइजीरिया सरकार को दिया धन्यवाद ट्रंप ने इस अभियान में सहयोग के लिए Nigeria सरकार और वहां की सेना का धन्यवाद भी किया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है। लंबे समय से तलाश में था आतंकी रिपोर्ट्स के मुताबिक, अबू-बिलाल अल-मिनुकी लंबे समय से अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की निगरानी में था। वह अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों में लगातार अपना ठिकाना बदल रहा था। अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि वह ISIS के नेटवर्क को फिर से संगठित करने और नए हमलों की योजना बनाने में जुटा हुआ था। वैश्विक आतंकवाद पर अमेरिका का बड़ा संदेश विशेषज्ञों का मानना है कि यह ऑपरेशन अमेरिका की आतंकवाद विरोधी नीति के तहत एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। मध्य पूर्व और अफ्रीका में ISIS की गतिविधियों को लेकर हाल के महीनों में चिंता बढ़ी थी। ऐसे में इस कार्रवाई को आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।  

surbhi मई 16, 2026 0
Brent crude oil prices surge above $120 amid Trump Iran sanctions and Hormuz tensions
ट्रंप की सख्ती से कच्चे तेल में लगी आग, ब्रेंट क्रूड $120 के पार, वैश्विक बाजार में हड़कंप

वैश्विक ऊर्जा बाजारों में एक बार फिर भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है और ब्रेंट क्रूड ऑयल $120 प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। इस अचानक बढ़ोतरी ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चिंता बढ़ा दी है और इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। इस उछाल की मुख्य वजह अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump का कड़ा रुख बताया जा रहा है, जिन्होंने स्पष्ट किया है कि ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध और समुद्री नाकाबंदी फिलहाल जारी रहेगी। ईरान पर सख्ती और बढ़ता तनाव डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में कहा कि जब तक ईरान अमेरिका की शर्तों पर परमाणु समझौते को स्वीकार नहीं करता, तब तक Strait of Hormuz पर नौसैनिक दबाव और नाकाबंदी जारी रहेगी। यह क्षेत्र वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि यह रणनीति सैन्य कार्रवाई की तुलना में अधिक प्रभावी है, क्योंकि इससे ईरान की अर्थव्यवस्था पर सीधा दबाव बनता है। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि अगर कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता है तो आगे सैन्य विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज क्यों है दुनिया के लिए अहम? स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया के सबसे संवेदनशील तेल परिवहन मार्गों में से एक है। खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ा हिस्सा कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है। जब इस मार्ग में बाधा आती है, तो सप्लाई चेन प्रभावित होती है और तेल की उपलब्धता घट जाती है। परिणामस्वरूप कीमतों में तेज उछाल देखने को मिलता है, जिसका असर सीधे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर भी पड़ता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर खतरे के बादल इस स्थिति को लेकर आर्थिक विशेषज्ञों ने गंभीर चेतावनी दी है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री Jeffrey Sachs ने कहा है कि अगर यह तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि बाजार फिलहाल यह उम्मीद लगाए बैठा है कि स्थिति जल्द सामान्य हो जाएगी, लेकिन यदि सप्लाई बाधित रही तो कीमतों में और तेजी आ सकती है। आम जनता पर सीधा असर तेल कीमतों में इस बढ़ोतरी का असर सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है। इससे परिवहन, खाद्य वस्तुएं और अन्य जरूरी सेवाएं भी महंगी हो सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात नहीं सुधरे तो महंगाई एक बार फिर आम लोगों की जेब पर भारी पड़ सकती है।  

surbhi अप्रैल 30, 2026 0
Limited edition US passport featuring Donald Trump for America's 250th Independence Day celebration
अमेरिका के 250वें स्वतंत्रता दिवस पर जारी होगा ट्रंप वाला खास पासपोर्ट

सीमित संस्करण में मिलेगा नया अमेरिकी पासपोर्ट अमेरिका अपनी आजादी की 250वीं वर्षगांठ को यादगार बनाने की तैयारी में जुटा है। इसी कड़ी में अमेरिकी सरकार एक विशेष लिमिटेड-एडिशन पासपोर्ट जारी करने जा रही है, जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तस्वीर और हस्ताक्षर शामिल होंगे। यह खास पासपोर्ट जुलाई 2026 से अमेरिकी नागरिकों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। इसकी संख्या सीमित होगी और यह "पहले आओ, पहले पाओ" के आधार पर जारी किया जाएगा। डिजाइन में दिखेगी ट्रंप की खास छाप व्हाइट हाउस और अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा जारी तस्वीरों में नए पासपोर्ट का डिजाइन सामने आया है। इसमें ट्रंप का चित्र, सुनहरे रंग में उनके हस्ताक्षर, अमेरिकी ध्वज और स्वतंत्रता घोषणा पत्र की झलक दिखाई दे रही है। पासपोर्ट के एक अन्य पृष्ठ पर अमेरिका के संस्थापक नेताओं को स्वतंत्रता घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए दर्शाया गया है। 250वीं वर्षगांठ के जश्न का हिस्सा अमेरिका जुलाई 2026 में स्वतंत्रता घोषणा की 250वीं वर्षगांठ मनाएगा। इस अवसर पर देशभर में बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने कहा कि यह पासपोर्ट इस ऐतिहासिक अवसर को चिह्नित करने के लिए तैयार किया गया है। वॉशिंगटन से होगी शुरुआत यह विशेष पासपोर्ट सबसे पहले वॉशिंगटन पासपोर्ट एजेंसी के जरिए जारी किया जाएगा। वितरण इस गर्मी से शुरू होगा और स्टॉक खत्म होने तक जारी रहेगा। पहले भी दिखी है ट्रंप ब्रांडिंग यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप का नाम या छवि सरकारी योजनाओं में शामिल की गई हो। 2026 के नेशनल पार्क पास पर ट्रंप की तस्वीर दिखाई गई। अमेरिकी टकसाल ने ट्रंप की प्रोफाइल वाला 1 डॉलर का स्मारक सिक्का भी प्रस्तावित किया है। वॉशिंगटन के कई सरकारी भवनों पर ट्रंप की तस्वीर वाले बैनर लगाए गए हैं। राजनीतिक बहस तेज होने के आसार ट्रंप की इस नई पहल को लेकर अमेरिका में राजनीतिक बहस छिड़ सकती है। समर्थक इसे ऐतिहासिक सम्मान बता रहे हैं, जबकि आलोचक इसे सरकारी संस्थानों के निजी ब्रांडिंग के रूप में देख रहे हैं। इतिहास और राजनीति का अनोखा संगम अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ पर जारी होने वाला यह पासपोर्ट न केवल एक यात्रा दस्तावेज होगा, बल्कि अमेरिकी राजनीति और इतिहास के मौजूदा दौर का प्रतीक भी बनेगा।  

surbhi अप्रैल 29, 2026 0
congressional proposal to limit presidential war powers against Iran.
अमेरिका में ट्रंप पर लगाम की तैयारी: ईरान पर हमले से पहले US कांग्रेस की मंजूरी जरूरी बनाने का प्रस्ताव

अमेरिका की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जहां Donald Trump के युद्ध संबंधी अधिकारों को सीमित करने की तैयारी हो रही है। United States Congress में एक प्रस्ताव लाया जा रहा है, जिसके तहत ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई से पहले राष्ट्रपति को संसद की मंजूरी लेनी होगी। डेमोक्रेट्स का बड़ा कदम डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ नेता Chuck Schumer ने कहा कि मौजूदा हालात में कांग्रेस को अपने संवैधानिक अधिकारों को फिर से लागू करना चाहिए। उनका मानना है कि राष्ट्रपति द्वारा बिना अनुमति के युद्ध जैसे फैसले लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। इसी कड़ी में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में डेमोक्रेटिक नेता Hakeem Jeffries ने भी इस प्रस्ताव पर वोटिंग कराने की मांग की है। ट्रंप के बयान से बढ़ी चिंता हाल ही में Iran के साथ तनाव के बीच ट्रंप ने कड़ा रुख अपनाते हुए धमकी दी थी कि अगर Strait of Hormuz नहीं खोला गया तो अमेरिका बड़ा सैन्य हमला कर सकता है। उनके इस बयान ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी। हालांकि बाद में अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का सीजफायर हुआ, लेकिन ट्रंप की आक्रामक भाषा और नीति को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर बना हुआ है। संविधान क्या कहता है? अमेरिकी संविधान के अनुसार युद्ध की घोषणा करने का अधिकार कांग्रेस के पास होता है, न कि राष्ट्रपति के पास। हालांकि, आपातकालीन स्थितियों में राष्ट्रपति सीमित समय के लिए सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं। आरोप है कि ट्रंप इसी प्रावधान का इस्तेमाल कर लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई जारी रखे हुए हैं। रिपब्लिकन बनाम डेमोक्रेट टकराव कांग्रेस में ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन के पास मामूली बहुमत है, जिसके चलते इस तरह के प्रस्ताव पहले भी पारित नहीं हो पाए हैं। लेकिन डेमोक्रेट्स लगातार इस मुद्दे को उठाकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह प्रस्ताव सिर्फ ईरान नीति तक सीमित नहीं, बल्कि अमेरिका में राष्ट्रपति और संसद के बीच शक्तियों के संतुलन की बड़ी बहस का हिस्सा है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि ट्रंप की सैन्य नीतियों पर लगाम लगती है या नहीं।  

surbhi अप्रैल 9, 2026 0
Mojtaba Khamenei message controversy amid Trump claim of death and rising Iran-US tensions
ट्रंप के दावे से मचा भूचाल: ‘मारे गए’ बताए जा रहे सुप्रीम लीडर का नया संदेश, ईरान-यूएस टकराव और गहराया

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच एक बड़ा विरोधाभास सामने आया है। एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया कि ईरान के नए सुप्रीम लीडर Mojtaba Khamenei मारे जा चुके हैं, वहीं दूसरी ओर ईरानी मीडिया में उनके नाम से लगातार नए संदेश सामने आ रहे हैं। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस और अनिश्चितता पैदा कर दी है। ट्रंप का बड़ा दावा, लेकिन सवाल बरकरार रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने 27 मार्च को कहा था कि ईरान का शीर्ष नेतृत्व खत्म हो चुका है और देश में कोई सक्रिय सुप्रीम लीडर नहीं है। उन्होंने यहां तक संकेत दिया कि मोजतबा खामेनेई या तो मारे गए हैं या गंभीर रूप से घायल हैं। हालांकि, इस दावे की अब तक स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है। दूसरी तरफ जारी हो रहे संदेश ट्रंप के दावे के विपरीत, ईरान की तरफ से मोजतबा खामेनेई के नाम से लिखित संदेश जारी किए जा रहे हैं। एक हालिया संदेश में उन्होंने: अमेरिका और इजरायल के खिलाफ संघर्ष में समर्थन के लिए इराक की जनता का धन्यवाद किया खास तौर पर Ali al-Sistani का उल्लेख किया यह संदेश बगदाद में हुई एक बैठक के बाद सामने आया, जिससे यह संकेत मिलता है कि ईरानी नेतृत्व सक्रिय है। सार्वजनिक रूप से नहीं आए सामने मोजतबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए हैं। केवल लिखित बयान जारी किए जा रहे हैं उनके बयान टीवी पर दूसरे लोग पढ़कर सुनाते हैं उनकी ताजा तस्वीरों को लेकर भी संशय बना हुआ है इससे उनकी स्थिति और लोकेशन को लेकर अटकलें और तेज हो गई हैं। पृष्ठभूमि: युद्ध और सत्ता का संकट ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच जारी यह संघर्ष अब एक महीने से ज्यादा समय से चल रहा है। पूर्व सुप्रीम लीडर Ali Khamenei की युद्ध की शुरुआत में ही मौत हो चुकी है इसके बाद मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर बनाया गया लेकिन उनकी गैर-मौजूदगी और विरोधाभासी खबरें सत्ता को लेकर असमंजस पैदा कर रही हैं क्या है इसका वैश्विक असर? यह घटनाक्रम कई बड़े सवाल खड़े करता है: क्या ट्रंप का दावा सही है या यह रणनीतिक बयान है? क्या ईरान में नेतृत्व संकट गहराता जा रहा है? क्या इससे युद्ध और भड़क सकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की विरोधाभासी सूचनाएं वैश्विक बाजार, कूटनीति और सुरक्षा स्थिति पर बड़ा असर डाल सकती हैं।  

surbhi मार्च 30, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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