नई दिल्ली, एजेंसियां। जून महीने में कमजोर रहने के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, आने वाले दिनों में देश के कई हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश होने की संभावना है। मौसम विभाग ने 11 जुलाई तक दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में भारी बारिश का पूर्वानुमान जारी किया है। इसके साथ ही तेज हवाएं, गरज-चमक और बिजली गिरने की भी आशंका जताई गई है। उत्तर भारत से लेकर पश्चिमी तट तक बारिश का असर आईएमडी के मुताबिक, अगले तीन दिनों में दक्षिण-पश्चिम मानसून उत्तर अरब सागर, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब के अन्य हिस्सों में आगे बढ़ेगा। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, जून में मॉनसून ट्रफ के हिमालय की तलहटी की ओर खिसकने से बारिश में कमी आई थी, लेकिन अब इसके दोबारा सक्रिय होने से बारिश का दौर तेज होगा। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में भारी बारिश के कारण अलकनंदा नदी चेतावनी स्तर के करीब पहुंच गई है। मध्य, पूर्वी और दक्षिण भारत में भी भारी बारिश की संभावना मौसम विभाग ने छत्तीसगढ़, पश्चिम और पूर्वी मध्य प्रदेश, विदर्भ, झारखंड, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में भी अगले कुछ दिनों तक अच्छी बारिश की संभावना जताई है। वहीं, कोंकण-गोवा, गुजरात, मध्य महाराष्ट्र और सौराष्ट्र-कच्छ में 6 और 7 जुलाई को बहुत भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। केरल, तटीय कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में भी भारी बारिश और तेज हवाएं चलने का अनुमान है। मौसम विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का मिजाज अधिक अनिश्चित होता जा रहा है। कम समय में अत्यधिक बारिश से बाढ़ और लंबे समय तक बारिश की कमी से सूखे जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। ऐसे में लोगों को मौसम विभाग की चेतावनियों का पालन करने और खराब मौसम के दौरान सतर्क रहने की सलाह दी गई है।
लंदन: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK), बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के विरोध में यूनाइटेड किंगडम की राजधानी लंदन में रविवार को हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के लोगों के साथ-साथ बलोच और पश्तून समुदाय के लोगों ने भी हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान की सेना पर आम नागरिकों के अधिकारों के दमन और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई के आरोप लगाए। लंदन कश्मीर मिलियन मार्च में उमड़ी भीड़ जानकारी के अनुसार, लंदन में आयोजित "कश्मीर मिलियन मार्च" संसद परिसर (Parliament Square) से शुरू होकर पाकिस्तान हाई कमीशन तक निकाला गया। आयोजकों का दावा है कि मार्च में करीब 50 हजार लोगों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शन के दौरान लोगों ने पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ आवाज उठाई और गिरफ्तार राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने आजादी के समर्थन में नारे लगाए और जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के प्रमुख शौकत नवाज मीर समेत अन्य नेताओं की गिरफ्तारी का विरोध किया। बलोच और पश्तून समुदाय ने भी जताई एकजुटता इस मार्च में बलोच और पश्तून समुदाय के लोगों ने भी भाग लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की सेना उनके क्षेत्रों में भी नागरिकों के अधिकारों का हनन कर रही है। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा—तीनों क्षेत्रों में आम लोगों को दमन और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। पाकिस्तान सेना पर गंभीर आरोप प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के एक राजनीतिक कार्यकर्ता महमूद कश्मीरी ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की सेना ने टट्टापानी, सेंहसा और कोटली जैसे इलाकों में आम लोगों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई की है। उन्होंने कहा कि दुनियाभर में रहने वाले कश्मीरी अब इन घटनाओं के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठा रहे हैं। उनका कहना था कि पाकिस्तान को अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन करना चाहिए और क्षेत्र के लोगों को उनके अधिकार देने चाहिए। गिरफ्तार नेताओं की रिहाई की मांग प्रदर्शनकारियों ने कहा कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक नेताओं की गिरफ्तारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने मांग की कि सभी गिरफ्तार नेताओं और कार्यकर्ताओं को तत्काल रिहा किया जाए। इसके साथ ही प्रदर्शन में शामिल लोगों ने हिरासत में लिए गए युवाओं के शव उनके परिजनों को सौंपने और गिरफ्तार नागरिकों की रिहाई की भी मांग की। PoK में जारी है विरोध प्रदर्शन लंदन में हुआ यह प्रदर्शन ऐसे समय में सामने आया है, जब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पिछले कई सप्ताह से विरोध प्रदर्शन जारी हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कई लोगों की मौत हुई है और इसके बाद अनेक राजनीतिक नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। उनका कहना है कि क्षेत्र में राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए लगातार कार्रवाई की जा रही है, जिसके विरोध में विदेशों में रहने वाले कश्मीरी, बलोच और पश्तून समुदाय भी अब खुलकर आवाज उठा रहे हैं.
वॉशिंगटन/लंदन: ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के इस्तीफे के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन पर तीखा हमला बोला है। ट्रंप ने कहा कि ऊर्जा नीति, आव्रजन (इमिग्रेशन) और अमेरिका के साथ संबंधों को संभालने के तरीके ने स्टार्मर को राजनीतिक रूप से भारी नुकसान पहुंचाया। ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, "मुझे लगता है कि वह एक अच्छे इंसान हैं, लेकिन उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए, जिन्होंने खुद उन्हें नुकसान पहुंचाया।" 'पवनचक्कियों के चक्कर में खुद को नुकसान पहुंचाया' ट्रंप ने ब्रिटेन की ऊर्जा नीति पर निशाना साधते हुए कहा कि स्टार्मर सरकार ने घरेलू ऊर्जा उत्पादन को बढ़ाने के बजाय पर्यावरणीय कारणों से उत्तरी सागर (North Sea) में तेल और गैस संसाधनों के दोहन को सीमित कर दिया। उन्होंने कहा, "ब्रिटेन अपनी अधिकांश ऊर्जा खरीदता है। जानते हैं कहां से? नॉर्वे से। और नॉर्वे को तेल कहां से मिलता है? उत्तरी सागर से। ब्रिटेन के पास इसका बेहतर हिस्सा है, लेकिन वे पवनचक्कियों और पर्यावरणीय नीतियों के कारण उसे छोड़ना चाहते हैं।" ट्रंप ने तंज कसते हुए कहा कि ऐसी नीतियों ने ब्रिटेन को ऊर्जा के मामले में कमजोर बनाया है। नाटो और ईरान मुद्दे पर भी जताई नाराजगी अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि स्टार्मर एक तरह से उनके मित्र थे, लेकिन उन्होंने नाटो और ईरान से जुड़े मुद्दों पर अमेरिका का पर्याप्त समर्थन नहीं किया। ट्रंप ने दावा किया कि साइप्रस स्थित ब्रिटिश सैन्य अड्डे के उपयोग को लेकर दोनों नेताओं के बीच मतभेद पैदा हो गए थे। उन्होंने कहा, "उन्होंने कहा कि हम द्वीप पर उतरने की अनुमति नहीं दे सकते। ऐसा पहली बार हुआ था। आखिरकार वे मान गए, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।" ट्रंप के मुताबिक, इस मामले ने भी स्टार्मर की राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचाया। पहले ही कर चुके थे इस्तीफे की भविष्यवाणी डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने पहले ही अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर कीर स्टार्मर के इस्तीफे की भविष्यवाणी कर दी थी। उनका कहना था कि ब्रिटेन में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता और सरकार की नीतियों से जनता की नाराजगी स्टार्मर के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही थी। दबाव के बीच दिया इस्तीफा कीर स्टार्मर ने सोमवार को लेबर पार्टी के नेता पद से इस्तीफा देने की घोषणा की। उन्होंने कहा है कि नए नेता और प्रधानमंत्री के चयन तक वह कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे। पिछले कुछ महीनों में लेबर पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष, स्थानीय और क्षेत्रीय चुनावों में खराब प्रदर्शन तथा लगातार गिरती लोकप्रियता ने स्टार्मर पर दबाव बढ़ा दिया था। एंडी बर्नहैम बन सकते हैं नए प्रधानमंत्री ब्रिटेन की राजनीति में अब सबसे ज्यादा चर्चा अनुभवी लेबर नेता और ग्रेटर मैनचेस्टर के पूर्व मेयर एंडी बर्नहैम के नाम को लेकर हो रही है। माना जा रहा है कि संसद में उनकी वापसी के बाद वे प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार बन सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो पिछले एक दशक में ब्रिटेन को सातवां प्रधानमंत्री मिल सकता है, जो देश की राजनीति में बढ़ती अस्थिरता को भी दर्शाता है।
बेलफास्ट/लंदन: उत्तरी आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट में एक स्थानीय व्यक्ति पर कथित जानलेवा चाकू हमले के बाद शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब बड़े पैमाने पर प्रवासी विरोधी दंगों में बदल गया है। हिंसा की लपटें बेलफास्ट से निकलकर ब्रिटेन और आयरलैंड के कई अन्य शहरों तक पहुंच गई हैं, जहां आगजनी, लूटपाट और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आई हैं। चाकूबाजी की घटना के बाद सड़कों पर उतरी भीड़ जानकारी के अनुसार, बेलफास्ट में एक आयरिश नागरिक पर चाकू से हमला किए जाने की घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद लोगों में आक्रोश फैल गया। बताया जा रहा है कि हमले में घायल 40 वर्षीय व्यक्ति की हालत गंभीर है। घटना के बाद विभिन्न समूहों ने विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया, जो जल्द ही हिंसक रूप ले बैठा। बेलफास्ट में घर, दुकानें और वाहन बने निशाना बेलफास्ट और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए। कई स्थानों पर भीड़ ने वाहनों को आग के हवाले कर दिया, दुकानों में तोड़फोड़ की और कुछ प्रतिष्ठानों को लूट लिया। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, एक अफ्रीकी मूल के व्यापारी की दुकान में भी आग लगा दी गई। सुरक्षा बलों ने हालात पर नियंत्रण पाने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया है और संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी गई है। लंदन और ग्लासगो तक फैला विरोध बेलफास्ट की घटनाओं के बाद लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर और स्कॉटलैंड के ग्लासगो सहित कई शहरों में भी प्रवासन नीति के खिलाफ प्रदर्शन हुए। कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पों की भी खबर है। आरोपी शरणार्थी की पृष्ठभूमि पर छिड़ी बहस पुलिस के अनुसार, हमले का आरोपी सूडान मूल का शरणार्थी है, जो पहले फ्रांस और आयरलैंड होते हुए बेलफास्ट पहुंचा था। उसे ब्रिटेन में अस्थायी रूप से रहने की अनुमति मिली हुई थी। घटना के बाद देश में शरणार्थी और प्रवासन नीतियों को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्टों की जांच अधिकारियों का कहना है कि सोशल मीडिया पर घटना से जुड़े वीडियो और संदेशों के तेजी से प्रसार ने तनाव बढ़ाने में भूमिका निभाई। पुलिस कई ऑनलाइन पोस्ट और खातों की जांच कर रही है, जिन पर हिंसा भड़काने के आरोप लगाए जा रहे हैं। कई प्रवासी परिवारों ने छोड़े घर हिंसा और बढ़ते तनाव के बीच कई प्रवासी परिवारों ने सुरक्षा कारणों से अपने घर छोड़ दिए हैं। कुछ इलाकों में धार्मिक और सामुदायिक गतिविधियों को भी अस्थायी रूप से रोक दिया गया है। स्थानीय संगठनों ने प्रशासन से प्रभावित लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। राजनीतिक बयानबाजी से बढ़ा विवाद घटना के बाद कई राजनीतिक नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों के बयानों ने विवाद को और बढ़ा दिया है। जहां कुछ नेताओं ने इसे प्रवासन नीति की विफलता बताया, वहीं अन्य ने हिंसा और घृणा फैलाने वाली राजनीति की आलोचना की है। प्रशासन की अपील- शांति बनाए रखें ब्रिटेन और उत्तरी आयरलैंड के अधिकारियों ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपील की है। पुलिस ने चेतावनी दी है कि हिंसा, आगजनी या नफरत फैलाने वाली गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
लंदन: ब्रिटेन की राजधानी लंदन में भारतीय मूल के एक परिवार की दर्दनाक मौत ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है। भारतीय मूल के राकेश पई, उनकी पत्नी अदिति पारलकर और उनके नौ वर्षीय बेटे सिड की 36वीं मंजिल से गिरने के बाद मौत हो गई। घटना की जांच जारी है और स्थानीय पुलिस ने अभी तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से इनकार किया है। ब्रिटिश मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह परिवार लंदन के एक हाई-राइज टावर ब्लॉक की 36वीं मंजिल पर स्थित अपार्टमेंट में रहता था। 27 मई को हुई इस घटना के बाद इलाके में सनसनी फैल गई। आपातकालीन सेवाओं को तुरंत मौके पर बुलाया गया, लेकिन तीनों को बचाया नहीं जा सका। मुंबई से लंदन तक का सफर रिपोर्ट्स के अनुसार, 47 वर्षीय राकेश पई और 46 वर्षीय अदिति पारलकर वर्ष 2000 के दशक में मुंबई से लंदन चले गए थे। राकेश वित्तीय सलाहकार के रूप में कार्यरत थे, जबकि अदिति निर्माण क्षेत्र में वरिष्ठ पद पर काम कर रही थीं। दोनों ने ब्रिटेन में सफल पेशेवर जीवन स्थापित किया था। उनके बेटे सिड की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं ने परिवार के सामने लगातार चुनौतियां खड़ी कर दी थीं। बताया जाता है कि सिड कई स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों से जूझ रहा था और उसे विशेष शैक्षणिक एवं चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता थी। बेटे की बीमारी बनी बड़ी चुनौती मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिड किडनी संबंधी गंभीर बीमारी से पीड़ित था और बोलने में भी असमर्थ था। उसकी देखभाल की मुख्य जिम्मेदारी अदिति पारलकर पर थी। उन्होंने बेटे की विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उसे घर पर ही पढ़ाने और उसकी देखभाल करने का निर्णय लिया था। परिवार के करीबी लोगों का कहना है कि लगातार देखभाल और जिम्मेदारियों का दबाव परिवार के लिए भावनात्मक और मानसिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा था। इलाज के लिए भारत लौटे, फिर ब्रिटेन वापस गए करीबी सूत्रों के अनुसार, परिवार करीब छह वर्ष पहले बेहतर इलाज की तलाश में लंदन छोड़कर मुंबई लौट आया था। बाद में चिकित्सा विकल्प सीमित होने के कारण वे दोबारा ब्रिटेन चले गए। इस दौरान परिवार कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था। परिवार के एक मित्र ने ब्रिटिश मीडिया से बातचीत में कहा कि अदिति पर नौकरी, घर और बेटे की देखभाल का भारी दबाव था। उनके अनुसार, ब्रिटेन में परिवार का कोई करीबी सहारा भी मौजूद नहीं था, जिससे हालात और चुनौतीपूर्ण हो गए थे। पुलिस जांच जारी, कारणों पर सस्पेंस इस घटना को लेकर ब्रिटिश मीडिया में विभिन्न तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं, लेकिन स्थानीय पुलिस ने मामले को फिलहाल "अप्रत्याशित मौत" (Unexplained Death) के रूप में दर्ज किया है। बर्मंडसी और ओल्ड साउथवार्क से सांसद नील कॉयल ने घटना पर दुख जताते हुए इसे बेहद त्रासद बताया। उन्होंने कहा कि कुछ स्थानीय लोगों ने इस घटना को अपनी आंखों से देखा था और पूरा समुदाय इस घटना से स्तब्ध है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मौत की परिस्थितियों की जांच की जा रही है और अभी किसी भी संभावना को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। मृतकों के परिजनों को घटना की जानकारी दे दी गई है और उन्हें आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। जांच पूरी होने का इंतजार परिवार के मित्रों और परिचितों ने घटना को लेकर सामने आ रहे कुछ दावों पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि जांच पूरी होने से पहले किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। फिलहाल सभी की नजरें पुलिस जांच पर टिकी हैं, जिससे इस दर्दनाक घटना की वास्तविक परिस्थितियां सामने आ सकें।
लंदन: ब्रिटेन में न्यायिक व्यवस्था की सबसे बड़ी भूलों में गिने जा रहे एक मामले ने एक बार फिर सुर्खियां बटोर ली हैं। एंड्रयू माल्किंसन नामक व्यक्ति ने जिस अपराध को कभी स्वीकार नहीं किया, उसी के लिए 17 साल जेल में बिताए। अब 23 साल बाद उस अपराध के वास्तविक दोषी को सजा मिलने के बाद यह मामला फिर चर्चा में है। 2003 की घटना से शुरू हुई पूरी कहानी मामला वर्ष 2003 का है, जब ग्रेटर मैनचेस्टर में एक महिला के साथ दुष्कर्म की घटना हुई थी। जांच के दौरान पीड़िता ने पहचान परेड में एंड्रयू माल्किंसन की पहचान की, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 2004 में अदालत ने माल्किंसन को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। उन्होंने शुरुआत से ही खुद को निर्दोष बताया और अपराध स्वीकार करने से इनकार कर दिया। बेगुनाही की जिद ने बढ़ाई जेल की अवधि माल्किंसन ने कभी अपराध स्वीकार नहीं किया। यही वजह रही कि उन्हें सजा में राहत नहीं मिली और वे 17 साल तक जेल में रहे। वर्ष 2020 में रिहा होने के बाद भी उनका नाम यौन अपराधियों के रजिस्टर में दर्ज रहा। रिहाई के बाद उन्होंने अपनी बेगुनाही साबित करने की कानूनी लड़ाई जारी रखी। डीएनए जांच ने पलट दिया पूरा मामला मामले में बड़ा मोड़ तब आया जब आधुनिक डीएनए तकनीक की मदद से पुराने सबूतों की दोबारा जांच कराई गई। जांच में मिले नए वैज्ञानिक साक्ष्य सीधे पॉल क्विन नामक व्यक्ति की ओर इशारा कर रहे थे। इसके बाद जुलाई 2023 में कोर्ट ऑफ अपील ने एंड्रयू माल्किंसन की सजा रद्द कर दी और उन्हें आधिकारिक रूप से निर्दोष घोषित कर दिया। 23 साल तक आजाद रहा असली अपराधी डीएनए सबूतों के आधार पर पॉल क्विन के खिलाफ मुकदमा चलाया गया। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने उसे दोषी करार देते हुए 21 साल की जेल की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि क्विन ने अपनी स्वतंत्रता का लाभ उठाया, जबकि एक निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक जेल में रहा। पीड़िता को दो बार देना पड़ा बयान मामले की पीड़िता को अलग-अलग समय पर दो मुकदमों में गवाही देनी पड़ी। अदालत ने उनके साहस की सराहना करते हुए उन्हें "असाधारण रूप से बहादुर" बताया। इस मामले ने न केवल न्यायिक भूल को उजागर किया, बल्कि पीड़िता के लंबे संघर्ष को भी सामने रखा। अब मुआवजे की लड़ाई लड़ रहे हैं माल्किंसन निर्दोष साबित होने के बाद माल्किंसन अब ब्रिटिश सरकार से मुआवजे की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके जीवन के 17 महत्वपूर्ण वर्ष गलत सजा की वजह से बर्बाद हो गए। उनकी कानूनी टीम न्यायिक भूल के शिकार लोगों के लिए बेहतर मुआवजा व्यवस्था की भी मांग कर रही है। जांच के घेरे में पुलिस और न्यायिक संस्थाएं मामले के बाद पुलिस और न्यायिक संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। समीक्षा रिपोर्ट में कई ऐसी कमियां सामने आईं, जिनकी वजह से माल्किंसन को वर्षों पहले ही निर्दोष साबित किया जा सकता था। ग्रेटर मैनचेस्टर पुलिस के कई अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा रही है, जबकि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने पदों से इस्तीफा भी दिया है। ब्रिटेन के लिए बड़ा सबक एंड्रयू माल्किंसन का मामला केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की जवाबदेही का भी सवाल बन गया है। असली अपराधी को सजा मिल चुकी है, लेकिन माल्किंसन के जीवन के वे 17 साल वापस नहीं लौट सकते, जो उन्होंने एक ऐसे अपराध की सजा काटते हुए गंवा दिए, जिसे उन्होंने कभी किया ही नहीं था।
London में एक पूर्व इमाम को महिलाओं और बच्चियों के साथ रेप और यौन शोषण के गंभीर मामलों में उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। आरोपी Abdul Halim Khan धार्मिक प्रभाव और अंधविश्वास का इस्तेमाल कर पीड़ितों को डराता था। अदालत में सामने आया कि वह खुद के भीतर “जिन्न” होने और “काला जादू” करने की शक्ति होने का दावा करता था। इसी डर का फायदा उठाकर वह महिलाओं और नाबालिग लड़कियों का शोषण करता था। कोर्ट ने सुनाई उम्रकैद Snaresbrook Crown Court में हुई सुनवाई के बाद जस्टिस लेस्ली कथबर्ट ने आरोपी को लाइफ इम्प्रिजनमेंट की सजा सुनाई। अदालत ने कहा कि पैरोल पर विचार किए जाने से पहले आरोपी को कम से कम 20 साल जेल में बिताने होंगे। 21 मामलों में दोषी करार अब्दुल हलीम खान को 2004 से 2015 के बीच सात महिलाओं और बच्चियों के साथ रेप, यौन उत्पीड़न और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों समेत कुल 21 मामलों में दोषी पाया गया। जूरी ने उसे 9 रेप, 4 यौन उत्पीड़न और कई गंभीर यौन अपराधों में दोषी ठहराया। बांग्लादेशी मुस्लिम समुदाय की महिलाओं को बनाया निशाना जांच में सामने आया कि आरोपी ने खास तौर पर पूर्वी लंदन के Tower Hamlets इलाके में रहने वाले बांग्लादेशी मुस्लिम समुदाय की महिलाओं और लड़कियों को निशाना बनाया। उसे पता था कि धार्मिक गुरु होने के कारण समुदाय में उसका प्रभाव है और पीड़ित सामाजिक बदनामी या डर की वजह से उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगी। ‘काला जादू’ का डर दिखाकर करता था धमकी अदालत में बताया गया कि आरोपी पीड़ितों को धमकाता था कि अगर उन्होंने किसी को कुछ बताया तो वह उनके परिवार पर “काला जादू” कर देगा। इसी डर और धार्मिक विश्वास का फायदा उठाकर वह वर्षों तक अपराध करता रहा। 50 से ज्यादा गवाह, लंबी जांच के बाद खुला मामला Metropolitan Police और Crown Prosecution Service ने इस मामले की लंबी जांच की। जांच के दौरान: 50 से ज्यादा गवाहों के बयान दर्ज किए गए 10 मोबाइल फोन की जांच हुई सांस्कृतिक और धार्मिक पहलुओं को समझाने के लिए विशेषज्ञों की मदद ली गई पीड़ितों की सुरक्षा और मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उनकी गवाही पहले से रिकॉर्ड कराई गई थी। आरोपी ने खुद को बताया निर्दोष पूरी जांच और सुनवाई के दौरान आरोपी लगातार खुद को निर्दोष बताता रहा। उसने आरोपों को साजिश करार दिया और कहा कि बदला लेने के लिए झूठे आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, अदालत ने सभी सबूतों और गवाहियों के आधार पर उसे दोषी मानते हुए कड़ी सजा सुनाई। अदालत की टिप्पणी अदालत ने कहा कि आरोपी ने धार्मिक विश्वास और सामाजिक सम्मान का बेहद गलत तरीके से इस्तेमाल किया और कमजोर महिलाओं व बच्चियों का शोषण किया।
United Kingdom की राजनीति में बड़ा संकट खड़ा होता दिखाई दे रहा है। सत्तारूढ़ Labour Party के 70 से अधिक सांसदों ने प्रधानमंत्री Keir Starmer से इस्तीफा देने की मांग की है। यह दबाव स्थानीय और क्षेत्रीय चुनावों में लेबर पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद बढ़ा है, जिससे पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। चुनावी हार के बाद बढ़ा संकट रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स में हुए स्थानीय चुनावों में लेबर पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। सबसे बड़ा झटका वेल्स में लगा, जहां पार्टी ने 1999 के बाद पहली बार वेल्श संसद पर अपना नियंत्रण खो दिया। यह सत्ता अब Plaid Cymru के हाथों में चली गई। चुनावी नतीजों के बाद पार्टी के भीतर यह सवाल उठने लगा है कि क्या स्टार्मर 2029 के आम चुनाव तक पार्टी का नेतृत्व जारी रख पाएंगे। चार सहयोगियों के इस्तीफे से बढ़ा दबाव सोमवार को संकट तब और गहरा गया जब स्टार्मर के चार मंत्री सहयोगियों ने इस्तीफा दे दिया। ब्रिटिश मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कई वरिष्ठ नेताओं ने निजी तौर पर नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत पर चर्चा शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि: Yvette Cooper Shabana Mahmood जैसे वरिष्ठ मंत्रियों ने भी पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद सत्ता के “सुव्यवस्थित हस्तांतरण” पर विचार करने की सलाह दी है। क्या स्टार्मर की कुर्सी खतरे में है? लेबर पार्टी के नियमों के अनुसार, नेतृत्व के खिलाफ औपचारिक चुनौती शुरू करने के लिए 81 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। फिलहाल 70 से ज्यादा सांसद खुलकर विरोध में आ चुके हैं, इसलिए राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि अगर असंतोष और बढ़ा तो स्टार्मर के खिलाफ औपचारिक नेतृत्व चुनौती भी शुरू हो सकती है। स्टार्मर ने इस्तीफे से किया इनकार बढ़ते दबाव के बावजूद Keir Starmer ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है। लंदन में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा: “मुझे पता है कि कुछ लोग मुझ पर शक कर रहे हैं, लेकिन मैं उन्हें गलत साबित करूंगा।” स्टार्मर ने यह भी कहा कि वह पार्टी में भरोसा बहाल करने और सरकार की नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष जारी रखेंगे। 2024 में मिली थी बड़ी जीत स्टार्मर जुलाई 2024 में बड़ी जीत के साथ सत्ता में आए थे। उन्होंने 14 साल पुराने Conservative Party शासन को खत्म कर लेबर पार्टी को सत्ता में वापसी दिलाई थी। हालांकि सत्ता में आने के बाद उन्हें: आर्थिक सुस्ती महंगाई और जीवन-यापन संकट ऊर्जा कीमतों राजनीतिक विवादों को लेकर लगातार आलोचना का सामना करना पड़ा है।
ब्रिटेन की महिला के फैसले ने फिर छेड़ी Assisted Dying पर वैश्विक बहस ब्रिटेन की एक महिला ने अपने इकलौते बेटे की मौत के गहरे सदमे से उबर न पाने के बाद स्विट्जरलैंड में Assisted Suicide का रास्ता चुना। इस घटना ने एक बार फिर दुनिया भर में Assisted Dying, कानून और नैतिकता को लेकर बहस तेज कर दी है। बेटे की मौत के बाद टूट गई थी जिंदगी 56 वर्षीय वेंडी डफी अपने इकलौते बेटे मार्कस की मौत के बाद पूरी तरह टूट गई थीं। मार्कस की 23 वर्ष की उम्र में भोजन के दौरान दम घुटने से मौत हो गई थी। इस हादसे ने वेंडी को मानसिक रूप से झकझोर कर रख दिया था। स्विट्जरलैंड के क्लिनिक में कराया Assisted Suicide वेंडी ने स्विट्जरलैंड के बेसल स्थित पेगासोस क्लिनिक में Assisted Suicide कराया। बताया जा रहा है कि इसके लिए उन्होंने लगभग 10 हजार पाउंड खर्च किए। क्लिनिक प्रशासन ने पुष्टि की कि पूरी प्रक्रिया उनकी इच्छा और कानूनी नियमों के तहत पूरी की गई। "मेरा जीवन, मेरा फैसला" मृत्यु से पहले वेंडी ने कहा था, "मैं मरना चाहती हूं। मेरे चेहरे पर मुस्कान होगी। यह मेरी जिंदगी है, मेरा फैसला है।" उनके इस बयान ने Assisted Dying पर चल रही बहस को और तेज कर दिया है। बेटे की टी-शर्ट पहनकर दी अंतिम विदाई वेंडी ने अपनी अंतिम यात्रा के दौरान अपने बेटे की टी-शर्ट पहनने की इच्छा जताई थी। उनका कहना था कि उसमें अभी भी बेटे की खुशबू बाकी है। उन्होंने अपने अंतिम पलों में एक पसंदीदा गीत बजाने की भी इच्छा व्यक्त की थी। ब्रिटेन में छिड़ी नई बहस ब्रिटेन में Assisted Suicide अभी भी अवैध है। ऐसे में वेंडी का स्विट्जरलैंड जाना "सुसाइड टूरिज्म" को लेकर नई बहस खड़ी कर रहा है। कुछ लोग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता मान रहे हैं, जबकि कई संगठनों ने इस पर गंभीर नैतिक सवाल उठाए हैं। कानून, नैतिकता और व्यक्तिगत अधिकार पर सवाल वेंडी डफी की कहानी ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्या असहनीय मानसिक पीड़ा भी Assisted Dying का आधार हो सकती है। यह मामला दुनिया भर में कानून निर्माताओं और समाज के लिए नई चुनौती बन गया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।