अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने भारत और पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा मुद्दों पर बड़ा बयान दिया है। दिल्ली दौरे के दौरान उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से पाकिस्तान की जमीन से सक्रिय आतंकी संगठनों को लेकर चिंता जताता रहा है और यह चिंता पूरी तरह नई नहीं है। रूबियो ने यह बयान उस सवाल के जवाब में दिया, जिसमें उनसे पूछा गया था कि क्या भारत ने अमेरिका-ईरान तनाव के बीच पाकिस्तान की संभावित मध्यस्थ भूमिका को लेकर कोई आपत्ति जताई है। इस पर उन्होंने कहा कि भारत की मुख्य चिंता पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी नेटवर्क को लेकर रहती है, क्योंकि ये संगठन भारत को निशाना बनाते हैं। उन्होंने साफ कहा कि ईरान मुद्दे पर पाकिस्तान की भूमिका को लेकर भारत ने कोई विशेष आपत्ति दर्ज नहीं कराई। रूबियो के मुताबिक, भारत और पाकिस्तान के बीच जो मुद्दे हैं, उनकी प्रकृति अलग है और बातचीत के दौरान आतंकवाद तथा सुरक्षा से जुड़े विषय जरूर उठे। अजीत डोभाल से हुई अहम बैठक अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने रविवार को नई दिल्ली में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval से मुलाकात की। बैठक के दौरान भारत ने पाकिस्तान से संचालित आतंकी ढांचे को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। सूत्रों के मुताबिक, डोभाल ने कहा कि आतंकवाद अब केवल एक विचारधारा नहीं, बल्कि एक पूरा संगठित इकोसिस्टम बन चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान में मौजूद आतंकी नेटवर्क अब भी सक्रिय हैं और लगातार काम कर रहे हैं। इस दौरान विदेश मंत्री S. Jaishankar के साथ भी विभिन्न क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा हुई। ईरान मुद्दे पर क्या बोले रूबियो? ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव पर बात करते हुए रूबियो ने कहा कि बातचीत अभी जारी है और जल्द कोई बड़ा घटनाक्रम सामने आ सकता है। उन्होंने बताया कि होर्मुज स्ट्रेट खोलने और परमाणु मुद्दे पर तय समयसीमा के भीतर समाधान निकालने को लेकर एक मजबूत प्रस्ताव तैयार किया गया है। रूबियो ने कहा कि इस पहल को खाड़ी देशों समेत दुनिया के कई देशों का समर्थन मिल रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करेंगे और किसी खराब समझौते को स्वीकार नहीं किया जाएगा। भारत की सुरक्षा चिंताओं पर अमेरिका का संकेत मार्को रूबियो के बयान को भारत की लंबे समय से उठाई जा रही आतंकवाद संबंधी चिंताओं पर अमेरिकी समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। भारत लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों और उनके नेटवर्क का मुद्दा उठाता रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने शनिवार को प्रधानमंत्री Narendra Modi से नई दिल्ली में मुलाकात की। इस दौरान भारत-अमेरिका संबंधों को और मजबूत करने, वैश्विक सुरक्षा, व्यापार, तकनीक और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिति जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। बैठक में विदेश मंत्री S. Jaishankar और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval समेत कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। व्हाइट हाउस आने का दिया निमंत्रण बैठक के दौरान मार्को रूबियो ने प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिका आने और व्हाइट हाउस का दौरा करने का निमंत्रण भी दिया। इसे दोनों देशों के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा, व्यापार और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। पीएम मोदी ने जताई खुशी मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि अमेरिकी विदेश मंत्री का स्वागत कर उन्हें खुशी हुई। उन्होंने बताया कि बातचीत के दौरान भारत-अमेरिका व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी में हो रही प्रगति और क्षेत्रीय व वैश्विक शांति एवं सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। पीएम मोदी ने कहा कि भारत और अमेरिका वैश्विक भलाई के लिए मिलकर काम करते रहेंगे। व्यापार, AI और रक्षा सहयोग पर फोकस भारत में अमेरिका के राजदूत Sergio Gor ने भी बैठक को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सुरक्षा, व्यापार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आपूर्ति शृंखला, ऊर्जा और रक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर चर्चा हुई। उन्होंने भारत को अमेरिका का अहम रणनीतिक साझेदार बताया। चार दिवसीय भारत दौरे पर हैं रूबियो मार्को रूबियो चार दिवसीय भारत दौरे पर आए हैं। अपने दौरे के दौरान वह विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। इसके अलावा वह अमेरिकी दूतावास में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में भी शामिल होंगे। माना जा रहा है कि यह दौरा भारत-अमेरिका संबंधों को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाएगा।
अमेरिका के विदेश मंत्री Marco Rubio का भारत दौरा इस बार कई मायनों में खास माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्होंने अपनी यात्रा की शुरुआत भारत की राजनीतिक राजधानी New Delhi या आर्थिक राजधानी Mumbai से नहीं, बल्कि Kolkata से की। 23 मई 2026 की सुबह रूबियो कोलकाता पहुंचे, जहां भारत में अमेरिका के राजदूत Sergio Gor ने उनका स्वागत किया। करीब 14 साल बाद कोई अमेरिकी विदेश मंत्री कोलकाता पहुंचा है। इससे पहले 2012 में Hillary Clinton ने ‘सिटी ऑफ जॉय’ का दौरा किया था। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर कोलकाता को ही पहली मंजिल क्यों चुना गया? इस फैसले को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक कई तरह की चर्चाएं और थ्योरीज सामने आ रही हैं। हालांकि, इसके पीछे कुछ ठोस रणनीतिक और कूटनीतिक वजहें भी मानी जा रही हैं। पहला फैक्ट: पूर्वी भारत की बढ़ती रणनीतिक अहमियत भारत-अमेरिका संबंधों में अब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र सबसे अहम मुद्दों में शामिल है। कोलकाता भौगोलिक रूप से Bay of Bengal और पूर्वी एशियाई समुद्री मार्गों के काफी करीब माना जाता है। इसी वजह से Quadrilateral Security Dialogue यानी QUAD देशों-भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया-के बीच बढ़ते सहयोग में पूर्वी भारत की भूमिका अहम मानी जा रही है। रूबियो के दौरे में ऊर्जा, रक्षा और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख बताए जा रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि कोलकाता से यात्रा की शुरुआत इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत एक प्रतीकात्मक संदेश भी हो सकती है। दूसरा फैक्ट: मदर टेरेसा और ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ रिपोर्ट्स के मुताबिक मार्को रूबियो Missionaries of Charity के मुख्यालय Mother House भी जा सकते हैं। यह संस्था Mother Teresa से जुड़ी हुई है और दुनियाभर में मानवीय सेवा का प्रतीक मानी जाती है। अमेरिका लंबे समय से अपनी विदेश नीति में ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ का इस्तेमाल करता रहा है। ऐसे में रूबियो का कोलकाता दौरा सांस्कृतिक और मानवीय संदेश से भी जोड़ा जा रहा है। तीसरा फैक्ट: कोलकाता का ऐतिहासिक अमेरिका कनेक्शन कोलकाता में अमेरिका का बेहद पुराना राजनयिक इतिहास जुड़ा हुआ है। 19 नवंबर 1792 को George Washington ने Benjamin Joy को कलकत्ता के लिए पहला अमेरिकी वाणिज्य दूत नियुक्त किया था। ब्रिटिश दौर में कोलकाता एशिया में व्यापार और राजनीति का बड़ा केंद्र था। यही वजह है कि अमेरिका के लिए यह शहर सिर्फ सांस्कृतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व भी रखता है। विशेषज्ञों का मानना है कि Donald Trump के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ नैरेटिव के बीच इतिहास से जुड़े प्रतीकों को भी अहमियत दी जा रही है। अब बात उन 4 थ्योरीज की, जिनकी सोशल मीडिया पर चर्चा है थ्योरी 1: क्या बंगाल की राजनीति पर अमेरिका की नजर? सोशल मीडिया पर कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि अमेरिका पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति को करीब से समझना चाहता है। हालांकि, इस तरह के दावों का कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी बड़े देश के लिए क्षेत्रीय राजनीति को समझना सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है। थ्योरी 2: क्या चीन को संदेश देने की कोशिश? कई विश्लेषकों का मानना है कि कोलकाता का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से China को संदेश देने की कोशिश भी हो सकता है। पूर्वी भारत, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर क्षेत्र को लेकर अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसे में रूबियो का पहला पड़ाव इंडो-पैसिफिक रणनीति से जुड़ा प्रतीकात्मक संकेत माना जा रहा है। थ्योरी 3: इतिहास और कूटनीति का मेल कोलकाता में स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास दुनिया के सबसे पुराने अमेरिकी मिशनों में गिना जाता है। यही वजह है कि रूबियो की यात्रा को भारत-अमेरिका संबंधों के दो सौ साल पुराने इतिहास से जोड़कर भी देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक जुड़ाव को दोबारा रेखांकित करने की कोशिश भी हो सकता है। थ्योरी 4: ‘सांस्कृतिक भारत’ दिखाने की रणनीति? कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिका इस बार दुनिया को सिर्फ सत्ता वाला भारत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक भारत भी दिखाना चाहता है। कोलकाता लंबे समय से साहित्य, कला, थिएटर और राजनीतिक आंदोलनों का केंद्र रहा है। ऐसे में रूबियो का यहां से दौरा शुरू करना एक सांस्कृतिक संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है। क्यों अहम माना जा रहा है यह दौरा? विदेश नीति के जानकारों का कहना है कि किसी भी बड़े राजनयिक दौरे में शहरों का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होता है। दिल्ली राजनीतिक शक्ति का केंद्र है, मुंबई आर्थिक ताकत का प्रतीक है, जबकि कोलकाता ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक पहचान रखता है। ऐसे में मार्को रूबियो का यह दौरा सिर्फ एक सामान्य प्रोटोकॉल विजिट नहीं माना जा रहा। इसमें राजनीति, रणनीति, संस्कृति और वैश्विक कूटनीति के कई संकेत छिपे दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर चल रही कई कॉन्सिरेसी थ्योरीज के ठोस सबूत नहीं हैं, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि 14 साल बाद किसी अमेरिकी विदेश मंत्री का कोलकाता पहुंचना अपने आप में एक बड़ा कूटनीतिक संदेश है।
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (ट्रेड डील) को लेकर बड़ी प्रगति के संकेत मिले हैं। अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने कहा है कि दोनों देश समझौते पर हस्ताक्षर करने के “बेहद करीब” हैं और अब केवल आखिरी बाधा पार करना बाकी है। ‘भारत महान शक्तियों में से एक’ मैरीलैंड के नेशनल हार्बर में आयोजित SelectUSA Investment Summit के दौरान लैंडौ ने भारत की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि “इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत दुनिया की महान शक्तियों में से एक है।” साथ ही उन्होंने भारत की आर्थिक क्षमता को “अपार” बताते हुए कहा कि आने वाले समय में भारत बड़े पैमाने पर आर्थिक विकास कर सकता है और करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने की क्षमता रखता है। कई महीनों से जारी है बातचीत लैंडौ के मुताबिक, दोनों देशों के बीच पिछले कई महीनों से इस डील को लेकर लगातार बातचीत चल रही है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि दोनों पक्ष किसी ठोस नतीजे पर पहुंचें, ताकि व्यापार के साथ-साथ अन्य रणनीतिक मुद्दों पर भी आगे बढ़ा जा सके। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि “आखिरी बाधा” क्या है। डील कब होगी, स्पष्ट नहीं अमेरिकी उप विदेश मंत्री ने कहा कि उनके पास इस बात की कोई निश्चित जानकारी नहीं है कि यह समझौता कब साइन होगा, लेकिन उन्हें भरोसा है कि यह प्रक्रिया अंतिम चरण में है और जल्द ही सकारात्मक परिणाम सामने आ सकता है। क्या है ट्रेड डील का फ्रेमवर्क? भारत और अमेरिका ने 2 फरवरी को इस द्विपक्षीय व्यापार समझौते के फ्रेमवर्क की घोषणा की थी, जबकि 7 फरवरी को इसका प्रारूप (टेक्स्ट) जारी किया गया था। इस डील का लक्ष्य 2030 तक दोनों देशों के बीच 500 अरब डॉलर के व्यापार को हासिल करना है। फ्रेमवर्क के तहत: अमेरिका ने भारत पर लगाए गए कुछ टैरिफ को 50% से घटाकर 18% करने पर सहमति जताई थी रूसी तेल खरीद को लेकर भारतीय उत्पादों पर लगे 25% टैरिफ को हटाने और बाकी टैरिफ घटाने की बात कही गई थी भारत अमेरिकी बाजारों में अधिक पहुंच और व्यापारिक रियायतें चाहता है सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बदलाव हालांकि, बाद में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद टैरिफ से जुड़ी नीतियों में बदलाव आया। इसके चलते भारत अब इस समझौते को नए वैश्विक टैरिफ फ्रेमवर्क के तहत अपने हितों के अनुसार संशोधित करने की कोशिश कर रहा है। आगे की राह दोनों देशों के बीच यह ट्रेड डील केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी बेहद अहम मानी जा रही है। अगर यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो इससे वैश्विक व्यापार संतुलन और भारत-अमेरिका संबंधों को नई दिशा मिल सकती है। फिलहाल, सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि कब यह “आखिरी बाधा” पार होती है और डी
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने एक बार फिर प्रधानमंत्री Narendra Modi की तारीफ करते हुए उन्हें “अच्छा काम करने वाला नेता” बताया है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और सीजफायर की कोशिशों के बीच दोनों नेताओं के बीच हाल ही में फोन पर बातचीत हुई, जिसे ट्रंप ने “बहुत सकारात्मक” करार दिया। ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उनकी पीएम मोदी के साथ बातचीत काफी अच्छी रही। उन्होंने कहा, “वह मेरे अच्छे मित्र हैं और बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।” सीजफायर और मिडिल ईस्ट पर चर्चा राष्ट्रपति ट्रंप के मुताबिक, इस बातचीत में पश्चिम एशिया की स्थिति, खासकर इजरायल और लेबनान के बीच सीजफायर जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका इस क्षेत्र में तनाव कम करने और शांति स्थापित करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी रखे हुए है। पाकिस्तान दौरे के दिए संकेत ट्रंप ने यह भी कहा कि अगर ईरान के साथ सीजफायर समझौता होता है, तो वह पाकिस्तान का दौरा कर सकते हैं। उन्होंने कहा, “अगर इस्लामाबाद में डील साइन होती है, तो मैं वहां जा सकता हूं।” उन्होंने पाकिस्तान की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि वह शांति प्रक्रिया में अच्छा काम कर रहा है और अमेरिका के साथ सहयोग कर रहा है। कूटनीतिक कोशिशें तेज यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका मिडिल ईस्ट में कई स्तर पर कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। इसमें ईरान के साथ बातचीत, इजरायल-लेबनान सीमा पर तनाव कम करना और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना शामिल है। ट्रंप ने यह भी उम्मीद जताई कि हिजबुल्लाह जैसे समूह सीजफायर का पालन करेंगे और क्षेत्र में हिंसा कम होगी।
रूस पर लगे प्रतिबंधों और ईरान युद्ध के बीच भी भारत के रूस से तेल खरीदने के फैसले को लेकर अमेरिका की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आई है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी Scott Bessent ने भारत को एक जिम्मेदार और भरोसेमंद भागीदार बताया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए संतुलित और जिम्मेदार रवैया अपनाया है। अमेरिका का मानना है कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति को समझते हुए अपने फैसले लिए हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद कई पश्चिमी देशों ने Russia के तेल पर प्रतिबंध लगाए थे। इसके बावजूद भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदना जारी रखा, जिससे देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिली। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि भारत जैसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश के लिए ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर रखना बेहद जरूरी है। इसलिए भारत के फैसलों को व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर चल रहे Iran–Israel Conflict और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। ऐसे में भारत द्वारा विभिन्न देशों से तेल आयात कर आपूर्ति संतुलित रखना अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए भी अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने रूस से तेल खरीदते समय वैश्विक नियमों और आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखा है, जिसकी वजह से अमेरिका ने भी भारत की नीति की सराहना की है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।