Pakistan-US Relations: पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्री अताउल्लाह तरार ने अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि पाकिस्तान के खिलाफ संगठित दुष्प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा एजेंसियों ने एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार किया है, जिसका संबंध अमेरिका से था और जिसे कथित तौर पर पाकिस्तान विरोधी डिजिटल प्रचार के लिए विदेश से भुगतान किया जा रहा था। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी एक वीडियो संदेश में तरार ने कहा कि कुछ दिन पहले गिरफ्तार किया गया व्यक्ति डिजिटल मार्केटिंग सेवाएं प्रदान करता था और प्रारंभिक जांच में उसके अमेरिका से जुड़े होने के संकेत मिले हैं। 'अमेरिका से हो रही थी पेमेंट' अताउल्लाह तरार ने दावा किया कि जांच के दौरान सामने आया कि आरोपी को अमेरिका से भुगतान किया जा रहा था। उनके मुताबिक पूछताछ में यह भी पता चला कि वह कथित 'बॉट फार्म' के जरिए सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चला रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस नेटवर्क के माध्यम से पाकिस्तान सरकार, सेना, सेना प्रमुख, सरकारी संस्थानों और विभिन्न सरकारी विभागों के खिलाफ भ्रामक और नकारात्मक सामग्री सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही थी। सरकार और सेना को निशाना बनाने का आरोप पाकिस्तानी मंत्री ने कहा कि कथित अभियान का उद्देश्य केवल सरकार की आलोचना करना नहीं था, बल्कि देश की संस्थाओं पर लोगों का भरोसा कमजोर करना भी था। उन्होंने दावा किया कि इस सामग्री को अमेरिका से संचालित नेटवर्क के जरिए बड़े स्तर पर वायरल किया जा रहा था। हालांकि, तरार ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई सार्वजनिक दस्तावेज, जांच रिपोर्ट या अन्य ठोस सबूत पेश नहीं किए। वहीं अमेरिका की ओर से भी इन आरोपों पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों के बीच नया विवाद यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के वर्षों में अमेरिका और पाकिस्तान के बीच संबंधों में सुधार की चर्चा रही है। दोनों देशों के बीच सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और कूटनीतिक सहयोग को लेकर कई स्तरों पर बातचीत होती रही है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा अमेरिका पर पाकिस्तान विरोधी प्रचार अभियान चलाने का आरोप लगाना दोनों देशों के रिश्तों में नई बहस को जन्म दे सकता है। फिलहाल यह मामला पाकिस्तान के दावों तक सीमित है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
Pakistan-US Relations: आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान ने अमेरिका से 10 अरब डॉलर (करीब 96 हजार करोड़ रुपये) की वित्तीय सहायता मांगी है। यह राशि द्विपक्षीय एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन सपोर्ट फैसिलिटी के तहत मांगी गई है, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना और पाकिस्तानी रुपये को स्थिर रखना है। यह मांग ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव में पाकिस्तान ने मध्यस्थता की भूमिका निभाने की कोशिश की थी। 5 साल के लिए मांगी वित्तीय सहायता रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट को भेजे अनुरोध में 10 अरब डॉलर की सहायता सुविधा पांच वर्षों के लिए उपलब्ध कराने की मांग की है। यदि अमेरिका इस प्रस्ताव को मंजूरी देता है, तो इससे पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिल सकती है। पाकिस्तान को क्या होगा फायदा? अगर यह फंड मिलता है, तो पाकिस्तान को कई आर्थिक लाभ मिल सकते हैं: विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी होगी। पाकिस्तानी रुपये पर दबाव कम होगा। आयात और बाहरी भुगतान की क्षमता मजबूत होगी। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से कर्ज पर निर्भरता घट सकती है। आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलेगी। हालांकि, पाकिस्तान ने यह भी कहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कार्यक्रम के तहत लागू वित्तीय और मौद्रिक सुधारों को जारी रखेगा। स्कॉट बेसेंट से हुई मुलाकात पाकिस्तान के वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब ने वॉशिंगटन में अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट से मुलाकात की। पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय के अनुसार, बैठक में क्षेत्रीय भू-राजनीतिक हालात और उनके पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव पर चर्चा हुई। हालांकि, मंत्रालय के आधिकारिक बयान में 10 अरब डॉलर की सहायता मांग का उल्लेख नहीं किया गया। क्यों अहम है यह मांग? विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान लंबे समय से विदेशी मुद्रा संकट, बढ़ते कर्ज और कमजोर आर्थिक वृद्धि जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में अमेरिका से इस स्तर की वित्तीय सहायता मिलने पर उसकी अर्थव्यवस्था को अस्थायी राहत मिल सकती है। हालांकि, अभी तक ट्रंप प्रशासन की ओर से इस मांग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
इस्लामाबाद, एजेंसियां। आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे पाकिस्तान ने अमेरिका के ट्रंप प्रशासन से 10 अरब डॉलर की एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन सपोर्ट फैसिलिटी (Exchange Stabilisation Support Facility) का अनुरोध किया है। यह प्रस्ताव पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगज़ेब ने अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के साथ बातचीत के दौरान रखा। यदि इसे मंजूरी मिलती है तो इससे पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती मिलेगी और रुपये पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है. विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने पर जोर पाकिस्तान सरकार का उद्देश्य इस सुविधा के जरिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में निवेशकों का भरोसा बढ़ाना है। सरकार का मानना है कि इससे अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने और आईएमएफ कार्यक्रम के साथ सुधारों को आगे बढ़ाने में सहायता मिलेगी। अमेरिका की ओर से अभी कोई आधिकारिक मंजूरी नहीं अमेरिकी ट्रेजरी विभाग और पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय ने इस प्रस्ताव पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है। फिलहाल यह अनुरोध विचाराधीन है और इस पर अंतिम निर्णय अमेरिकी प्रशासन द्वारा लिया जाएगा। आईएमएफ पर निर्भरता घटाने की कोशिश विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान इस व्यवस्था के जरिए आईएमएफ और अन्य बहुपक्षीय संस्थानों पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। यदि यह सुविधा मिलती है तो इसे पाकिस्तान के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय सुरक्षा कवच माना जाएगा।
Pakistan की राजनीति में पूर्व प्रधानमंत्री Imran Khan की सत्ता से विदाई और सेना प्रमुख Asim Munir के तेजी से उभार को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह केवल पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था, जिसमें United States की भूमिका भी चर्चा में है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन की पटकथा काफी पहले लिखी जा चुकी थी और घटनाएं धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़ती गईं। ‘साइफर केस’ से शुरू हुआ विवाद अमेरिकी मीडिया प्लेटफॉर्म Drop Site News की रिपोर्ट में दावा किया गया कि पूरा विवाद एक गोपनीय राजनयिक संदेश यानी “साइफर” से शुरू हुआ। मार्च 2022 में पाकिस्तान के तत्कालीन अमेरिका स्थित राजदूत Asad Majeed Khan ने इस्लामाबाद को एक संदेश भेजा था। रिपोर्ट के अनुसार, इसमें अमेरिकी अधिकारी Donald Lu का कथित बयान शामिल था कि यदि इमरान खान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सफल हो जाता है, तो “वॉशिंगटन सब कुछ माफ कर देगा।” इमरान खान ने इसे विदेशी साजिश का प्रमाण बताया था और कई रैलियों में इसे “लंदन प्लान” कहा। अमेरिका से क्यों बिगड़े इमरान के रिश्ते? प्रधानमंत्री बनने के बाद इमरान खान ने धीरे-धीरे अमेरिका से दूरी बनाने वाली विदेश नीति अपनाई। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद उन्होंने अमेरिका को सैन्य ठिकाने देने से साफ इनकार कर दिया था। अमेरिकी मीडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था — “Absolutely Not।” सबसे बड़ा विवाद तब हुआ जब 24 फरवरी 2022 को, रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के दिन, इमरान खान ने Vladimir Putin से मॉस्को में मुलाकात की। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मुलाकात से वॉशिंगटन बेहद नाराज हुआ। सेना और इमरान खान के बीच बढ़ा टकराव रिपोर्ट में दावा किया गया कि पाकिस्तान की सेना को लगने लगा था कि इमरान खान की नीतियां देश को अमेरिका से दूर कर सकती हैं, जिससे रणनीतिक नुकसान हो सकता है। यहीं से सेना और इमरान खान के बीच तनाव बढ़ने लगा। आसिम मुनीर का उभार कैसे हुआ? रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में इमरान खान के ईरान दौरे के दौरान आसिम मुनीर, जो उस समय ISI प्रमुख थे, ने ईरानी अधिकारियों के साथ बेहद सख्त रुख अपनाया था। रिपोर्ट में इसे अमेरिकी रणनीतिक सोच के करीब माना गया, क्योंकि उस समय अमेरिका पाकिस्तान-ईरान संबंधों को मजबूत होते नहीं देखना चाहता था। कुछ समय बाद इमरान खान ने खुद आसिम मुनीर को ISI प्रमुख पद से हटा दिया था। CIA प्रमुख से मिलने से इनकार रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि इमरान खान ने 2021 में William J. Burns से मिलने से इनकार कर दिया था। वह सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति Joe Biden से बात करना चाहते थे। हालांकि बाइडेन प्रशासन ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से संपर्क नहीं किया। अविश्वास प्रस्ताव और सत्ता से बाहर होना अप्रैल 2022 में संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए इमरान खान की सरकार गिर गई। तकनीकी रूप से यह संवैधानिक प्रक्रिया थी, लेकिन उनके समर्थकों ने इसे सेना और अमेरिका के बीच समझौते का परिणाम बताया। सरकार गिरने के बाद Pakistan Tehreek-e-Insaf (PTI) पर कार्रवाई शुरू हुई। इमरान खान और उनकी पत्नी Bushra Bibi को जेल भेज दिया गया। यूक्रेन युद्ध के बाद बदला पाकिस्तान का रुख रिपोर्ट में दावा किया गया कि इमरान खान के हटने के बाद पाकिस्तान धीरे-धीरे अमेरिका के करीब आने लगा। इस दौरान पाकिस्तान ने अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन को हथियार और गोला-बारूद उपलब्ध कराए। साथ ही आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को International Monetary Fund से राहत पैकेज भी मिला। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद और मजबूत हुए मुनीर आसिम मुनीर नवंबर 2022 में पाकिस्तान के सेना प्रमुख बने। बाद में उनका कार्यकाल 2027 तक बढ़ा दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 में भारत के कथित “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद पाकिस्तान में उनकी स्थिति और मजबूत हो गई। इसके बाद उन्हें फील्ड मार्शल बनाया गया और नए बनाए गए चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) पद की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। अमेरिका, सऊदी अरब और पाकिस्तान की नई रणनीति? रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान अब Saudi Arabia के साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है और आसिम मुनीर विभिन्न संघर्षग्रस्त क्षेत्रों के दौरों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। साथ ही पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की संभावनाओं में भी चर्चा में है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट ने पाकिस्तान की राजनीति, सेना और वैश्विक शक्तियों के संबंधों पर नई बहस जरूर छेड़ दी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के साथ हुए संघर्षविराम को लेकर पाकिस्तान की भूमिका पर बड़ा बयान दिया है। चीन यात्रा से लौटते समय एयरफोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि उन्होंने युद्धविराम कराकर “पाकिस्तान पर एहसान किया” है। ट्रंप के इस बयान के बाद पाकिस्तान की मध्यस्थता भूमिका को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। सीजफायर में पाकिस्तान की अहम भूमिका का दावा रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और Iran के बीच तनाव कम कराने में पाकिस्तान ने बैकचैनल संपर्कों के जरिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बताया जा रहा है कि इस्लामाबाद ने ईरान के पांच सूत्रीय प्रस्ताव को वॉशिंगटन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी, जिसके बाद युद्धविराम की दिशा में प्रगति हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पाकिस्तान ने खुद को क्षेत्रीय मध्यस्थ और संवाद मंच के रूप में पेश करने की कोशिश की है। शहबाज शरीफ और इशाक डार की तारीफ ट्रंप ने बातचीत के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif और उप प्रधानमंत्री Ishaq Dar की भी तारीफ की। हालांकि, उन्होंने साथ ही यह संकेत भी दिया कि अमेरिका क्षेत्रीय सुरक्षा मामलों में पाकिस्तान से लगातार सहयोग की उम्मीद करता है। होर्मुज और ऊर्जा सुरक्षा बना बड़ा मुद्दा विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान के लिए यह संघर्षविराम सिर्फ कूटनीतिक सफलता नहीं बल्कि आर्थिक जरूरत भी था। Strait of Hormuz में बढ़ते तनाव से तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार प्रभावित होने का खतरा था, जिसका असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता था। युद्धविराम के बाद पाकिस्तान को अपने ऊर्जा मार्ग सुरक्षित रखने में राहत मिली है। ट्रंप के बयान के क्या मायने? ट्रंप का “पाकिस्तान पर एहसान” वाला बयान पाकिस्तान के लिए मिश्रित संकेत माना जा रहा है। एक ओर इससे इस्लामाबाद की कूटनीतिक भूमिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत भी दिया है कि पाकिस्तान को क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों, खासकर सीमा पार आतंकवाद, पर ज्यादा सक्रिय भूमिका निभानी होगी। अफगान सीमा और आतंकवाद पर भी इशारा रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने हालिया सुरक्षा घटनाओं का जिक्र करते हुए पाकिस्तान को अपनी सीमाओं पर सुरक्षा मजबूत करने का संदेश दिया। हाल ही में Bannu में पुलिस चौकी पर हुए हमले के बाद पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठे हैं। क्षेत्रीय राजनीति में बढ़ी हलचल मध्य पूर्व में जारी तनाव, होर्मुज संकट और अमेरिका-ईरान संबंधों के बीच पाकिस्तान की भूमिका ने दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति को नई दिशा दे दी है। फिलहाल अमेरिकी और पाकिस्तानी सरकारों की ओर से बैकचैनल कूटनीति के कई पहलुओं पर आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन ट्रंप के बयान ने इस मुद्दे को वैश्विक चर्चा का विषय बना दिया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।