वॉशिंगटन, एजेंसियां। रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका में नए और कड़े प्रतिबंधों को लेकर हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी सीनेट में रूस के ऊर्जा क्षेत्र और उसके साथ कारोबार करने वाले देशों पर कार्रवाई से जुड़े प्रस्ताव पर चर्चा हुई है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत रूस से तेल या अन्य ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान रखा गया है। इससे भारत समेत रूस से ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर अमेरिकी दबाव बढ़ सकता है। भारत पर क्यों पड़ सकता है असर? भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। ऐसे में यदि अमेरिकी प्रशासन रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100% तक अतिरिक्त शुल्क लागू करता है, तो भारतीय निर्यातकों पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका है। हालांकि, 100% टैरिफ अभी भारत पर लागू नहीं हुआ है। यह प्रस्तावित अमेरिकी कार्रवाई से जुड़ा संभावित शुल्क है और इसके लागू होने की स्थिति, दायरा तथा समय को लेकर आगे अमेरिकी प्रशासन और कांग्रेस के फैसले महत्वपूर्ण होंगे। रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बनाने की कोशिश अमेरिका और उसके सहयोगी देश यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की ऊर्जा आय को सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं। रूस की अर्थव्यवस्था में तेल और गैस से होने वाली कमाई महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी वजह से रूस के ऊर्जा कारोबार को निशाना बनाने वाली पाबंदियों को उसके खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने का प्रमुख माध्यम माना जा रहा है। नए प्रस्तावों का उद्देश्य रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों को भी अप्रत्यक्ष रूप से दबाव में लाना है, ताकि रूस की तेल आय को सीमित किया जा सके। भारत-अमेरिका संबंधों के लिए भी अहम भारत लंबे समय से रूस से कच्चे तेल की खरीद को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों से जोड़कर देखता रहा है। यदि अमेरिका रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी अतिरिक्त शुल्क लगाता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी पड़ सकता है। भारत पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि उसकी ऊर्जा खरीद का फैसला राष्ट्रीय हित और घरेलू जरूरतों के आधार पर किया जाता है। ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंधों से जुड़े किसी भी नए फैसले पर नई दिल्ली की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी। अब अमेरिकी प्रशासन के अगले कदम पर नजर फिलहाल 100% टैरिफ को लेकर ‘भारत पर शुल्क लागू हो गया’ कहना सही नहीं होगा। प्रस्ताव की आगे की प्रक्रिया और अमेरिकी प्रशासन द्वारा इसके इस्तेमाल का फैसला महत्वपूर्ण रहेगा। यदि ऐसा शुल्क वास्तव में लागू किया जाता है, तो भारत के लिए अमेरिका को होने वाले निर्यात की लागत बढ़ सकती है और दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता पर भी इसका असर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में अमेरिकी सरकार और भारतीय पक्ष की प्रतिक्रिया इस पूरे मामले की दिशा तय करेगी।
वॉशिंगटन: रूस से कच्चे तेल और ऊर्जा की खरीद को लेकर अमेरिका ने भारत समेत रूस के बड़े ऊर्जा खरीदार देशों पर दबाव बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी सीनेट ने रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से जुड़े एक व्यापक विधेयक को 86-11 के भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। प्रस्तावित कानून में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। भारत और चीन जैसे देश इस प्रावधान के संभावित दायरे में आ सकते हैं। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अभी भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं हुआ है। सीनेट से पारित विधेयक को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से मंजूरी मिलनी बाकी है। इसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर ही यह कानून बन सकेगा। रूस की ऊर्जा कमाई पर दबाव बनाने की कोशिश इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा से होने वाली आय पर दबाव बढ़ाना है। अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देश अप्रत्यक्ष रूप से उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं। ऐसे देशों के खिलाफ अतिरिक्त टैरिफ की धमकी के जरिए रूस पर यूक्रेन युद्ध खत्म करने के लिए दबाव बढ़ाने की रणनीति अपनाई जा रही है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति को ऐसे देशों से आयात होने वाले सामान पर भारी अतिरिक्त शुल्क लगाने की शक्ति मिल सकती है, जो रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदार हैं। भारत के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस लंबे समय से भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। रूस से सस्ता तेल खरीदना भारत की ऊर्जा जरूरतों और आयात लागत को नियंत्रित करने की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। 100% टैरिफ का मतलब क्या है? खबर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि अमेरिकी सीनेट ने भारत पर तत्काल 100 प्रतिशत शुल्क नहीं लगाया है। विधेयक राष्ट्रपति को अधिकतम 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति देने का प्रस्ताव रखता है। यदि भविष्य में यह प्रावधान भारत पर लागू किया जाता है, तो अमेरिका में भारतीय उत्पादों पर भारी अतिरिक्त शुल्क लग सकता है। इससे भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात की लागत बढ़ सकती है और कई भारतीय कंपनियों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है। हालांकि, अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कानून बनने के बाद अमेरिकी प्रशासन किन देशों को इसके दायरे में रखता है और टैरिफ की वास्तविक दर कितनी तय की जाती है। बिल अभी कानून नहीं बना सीनेट में मंजूरी मिलने के बाद अब विधेयक अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में जाएगा। वहां से पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ही यह कानून का रूप लेगा। इसलिए फिलहाल भारत के कारोबार और निर्यात पर 100 प्रतिशत अमेरिकी शुल्क लागू होने की खबर को अंतिम फैसला मानना सही नहीं होगा। आने वाले समय में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में होने वाली चर्चा और मतदान महत्वपूर्ण होंगे। रूस पर भी कड़े प्रतिबंधों का प्रस्ताव विधेयक में केवल रूस से तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ संभावित टैरिफ का प्रावधान नहीं है। इसमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों पर नए प्रतिबंधों की व्यवस्था भी प्रस्तावित है। इसके अलावा रूसी निर्यात पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान भी चर्चा में है। विधेयक का एक हिस्सा रूस की वित्तीय व्यवस्था, ऊर्जा क्षेत्र और प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल होने वाले नेटवर्क पर दबाव बढ़ाने से जुड़ा है। ईरान को लेकर भी विधेयक में प्रावधान शामिल हैं। ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कुछ कंपनियों पर कार्रवाई का रास्ता मजबूत करने की बात कही गई है। 86-11 वोट से मिली बड़ी मंजूरी सीनेट में विधेयक को 86 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि 11 ने इसके खिलाफ मतदान किया। दोनों प्रमुख अमेरिकी राजनीतिक दलों के सांसदों के समर्थन के कारण इसे मजबूत राजनीतिक समर्थन मिला। विधेयक को आगे बढ़ाने में रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल समेत कई सांसदों की भूमिका रही है। विधेयक का नाम भी लिंडसे ओ. ग्राहम के नाम पर रखा गया है। समर्थकों का कहना है कि रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए कठोर प्रतिबंध जरूरी हैं। वहीं, कुछ सांसदों ने राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार देने को लेकर चिंता भी जताई है। ट्रंप के लिए क्यों अहम है यह विधेयक? यदि यह विधेयक कानून बनता है, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस के बड़े ऊर्जा खरीदार देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने के मामले में काफी व्यापक अधिकार मिल सकते हैं। अमेरिकी नीति निर्माताओं के लिए इसका उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय को कम करना और यूक्रेन युद्ध को लेकर मॉस्को पर दबाव बढ़ाना है। लेकिन दूसरी ओर, इतनी बड़ी टैरिफ शक्ति के इस्तेमाल से अमेरिका के अपने व्यापारिक संबंधों पर भी असर पड़ने की आशंका है। भारत के संदर्भ में यह मुद्दा और संवेदनशील हो जाता है, क्योंकि नई अमेरिकी व्यापार नीति और रूस से भारत की ऊर्जा खरीद के बीच सीधा टकराव पैदा हो सकता है। भारत के सामने क्या चुनौती? भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी। रूस से तेल खरीदने से भारत को अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी कीमतों पर ऊर्जा उपलब्ध होती है। वहीं, अमेरिका भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है। यदि रूस से ऊर्जा खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव बढ़ता है, तो नई दिल्ली को अपने ऊर्जा हितों, निर्यात और रणनीतिक विदेश नीति के बीच संतुलन बनाना होगा। भारत पहले भी यह स्पष्ट करता रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद मुख्य रूप से राष्ट्रीय हित और उपभोक्ताओं की जरूरतों के आधार पर होती है। आगे क्या होगा? अब सभी की नजर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा पर है। सीनेट की मंजूरी के बावजूद विधेयक को कानून बनने के लिए अभी एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक चरण से गुजरना होगा। अगर प्रतिनिधि सभा से भी इसे मंजूरी मिलती है और राष्ट्रपति इसे कानून का रूप देते हैं, तो उसके बाद यह तय होगा कि भारत जैसे देशों पर प्रस्तावित टैरिफ का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है। फिलहाल स्थिति यह है कि अमेरिकी सीनेट ने ऐसा विधेयक पास किया है, जिसमें भारत समेत रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की राष्ट्रपति को शक्ति देने का प्रावधान है। लेकिन भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है। यह घटनाक्रम भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के साथ-साथ भारत की रूस नीति और ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी आने वाले दिनों में बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।
US-Iran War Updates: अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य संघर्ष लगातार तेज होता जा रहा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, अमेरिकी सेना ने ईरान के खिलाफ लगातार 11वीं रात भी हवाई हमले किए। इस बीच अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने सीनेट में खुलासा किया कि अब तक इस सैन्य अभियान पर 37.5 अरब डॉलर (करीब 3.6 लाख करोड़ रुपये) खर्च हो चुके हैं। बढ़ते युद्ध खर्च को देखते हुए ट्रंप प्रशासन ने अब अतिरिक्त 70 अरब डॉलर के आपातकालीन रक्षा फंड की मांग की है, जिस पर अमेरिकी संसद में तीखी बहस छिड़ गई है। 11वीं रात भी जारी रहे अमेरिकी हमले CENTCOM ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि अमेरिकी सेना ने ईरान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए लगातार 11वीं रात ऑपरेशन जारी रखा। अमेरिका का कहना है कि इन हमलों का उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है, जिनका इस्तेमाल होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा पैदा करने में किया जा रहा है। 3.6 लाख करोड़ रुपये पहुंचा युद्ध का खर्च सीनेट एप्रोप्रिएशन कमिटी की सुनवाई के दौरान रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने बताया कि ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान पर अब तक 37.5 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं। अप्रैल के अंत में यह अनुमान करीब 25 अरब डॉलर था, लेकिन लगातार बढ़ते सैन्य अभियानों के कारण खर्च में लगभग 12 अरब डॉलर की अतिरिक्त बढ़ोतरी हुई है। 70 अरब डॉलर के नए फंड की मांग रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन अब कांग्रेस से 70 अरब डॉलर के अतिरिक्त रक्षा बजट की मंजूरी चाहता है। इसमें से करीब 46 अरब डॉलर अत्याधुनिक हथियारों के उत्पादन और आपूर्ति बढ़ाने पर खर्च किए जाने का प्रस्ताव है। इसमें प्रिसिजन बम, हाइपरसोनिक मिसाइल, काउंटर-ड्रोन सिस्टम और अन्य आधुनिक रक्षा तकनीकों को प्राथमिकता दी गई है। रक्षा मंत्री हेगसेथ ने कहा कि मौजूदा वैश्विक सुरक्षा हालात को देखते हुए अमेरिकी सेना को आधुनिक हथियारों और संसाधनों से लैस करना आवश्यक है। सीनेट में सरकार से तीखे सवाल ट्रंप सरकार की अतिरिक्त फंडिंग मांग पर डेमोक्रेट सांसदों के साथ कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने भी सवाल उठाए। सीनेट एप्रोप्रिएशन कमिटी की वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य पैटी मरे ने कहा कि सरकार आपातकालीन बजट के नाम पर सामान्य संसदीय प्रक्रिया से बचने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि समस्या धन की कमी नहीं, बल्कि रक्षा विभाग की योजना और संसाधनों के प्रबंधन में खामियां हैं। बाइडेन प्रशासन पर साधा निशाना आलोचनाओं का जवाब देते हुए रक्षा मंत्री हेगसेथ ने पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया। उनका आरोप था कि पिछली सरकार की लापरवाही और रक्षा तैयारियों में कमी के कारण अब अतिरिक्त निवेश की जरूरत पड़ रही है। उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन और नई सैन्य तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए रक्षा व्यवस्था को तेजी से अपग्रेड करना जरूरी है।
वॉशिंगटन: अमेरिका के वरिष्ठ रिपब्लिकन सीनेटर और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी सहयोगी लिंडसे ग्राहम का 71 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके कार्यालय के अनुसार, शनिवार शाम एक संक्षिप्त और अचानक आई बीमारी के बाद उनका निधन हुआ। बाद में शुरुआती मेडिकल जांच में मौत का कारण महाधमनी (एओर्टिक) डिसेक्शन बताया गया। ग्राहम के निधन के बाद अमेरिका और इजरायल के नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी, जबकि ईरान से जुड़े कुछ सरकारी मीडिया संस्थानों, सोशल मीडिया खातों और समर्थकों ने उनके निधन पर खुशी जाहिर की। ट्रंप और नेतन्याहू ने दी श्रद्धांजलि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लिंडसे ग्राहम को "महान सीनेटर" और "सच्चा देशभक्त" बताते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि इजरायल ने अपना एक मजबूत मित्र खो दिया है। ईरान से जुड़े मीडिया प्लेटफॉर्म पर अलग प्रतिक्रिया ईरान से जुड़े कुछ समाचार प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया खातों ने ग्राहम के निधन पर जश्न जैसा रुख अपनाया। कुछ पोस्टों में उनके खिलाफ तीखी टिप्पणियां की गईं और उनके लंबे समय से ईरान विरोधी रुख का उल्लेख किया गया। सोशल मीडिया पर कुछ ईरान समर्थक खातों ने ग्राहम की तस्वीर वाला एक ग्राफिक भी साझा किया, जिसमें लाल "X" का निशान लगाया गया था। इन पोस्टों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। निर्वासित युवराज रजा पहलवी ने जताया दुख ईरान के निर्वासित युवराज रजा पहलवी ने ग्राहम के निधन पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ग्राहम ईरानी जनता की स्वतंत्रता के समर्थक थे और लोकतंत्र समर्थक ईरानियों के बीच उनका सम्मान था। ईरान सरकार के मुखर आलोचक थे ग्राहम लिंडसे ग्राहम लंबे समय से ईरान की मौजूदा सरकार के आलोचक रहे थे। वे ईरान के खिलाफ कड़े अमेरिकी रुख के समर्थक माने जाते थे और कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरानी विपक्ष तथा लोकतांत्रिक बदलाव के समर्थन में बयान दे चुके थे। लंबे राजनीतिक करियर का हुआ अंत दक्षिण कैरोलिना से रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम 2002 से अमेरिकी सीनेट के सदस्य थे। इससे पहले वे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के सदस्य भी रह चुके थे। विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा मामलों में उनकी सक्रिय भूमिका के कारण वे रिपब्लिकन पार्टी के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। उनके निधन से अमेरिकी राजनीति में एक महत्वपूर्ण आवाज का अंत माना जा रहा है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान नीति के मोर्चे पर बड़ी राजनीतिक जीत मिली है। अमेरिकी सीनेट ने उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया, जिसका उद्देश्य राष्ट्रपति की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की शक्तियों पर कांग्रेस का नियंत्रण बढ़ाना था। मतदान के दौरान दो रिपब्लिकन सीनेटरों के अंतिम समय में रुख बदलने से ट्रंप प्रशासन को राहत मिल गई। प्रस्ताव के रुकने के बाद ट्रंप ने इसे ईरान के लिए "कड़ा संदेश" बताया और अपने सहयोगी सांसदों का धन्यवाद किया। ट्रंप ने जताई खुशी, बोले- ईरान के लिए चेतावनी सीनेट में मतदान के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, "वाह! सीनेट ने ईरान पर अपना वोट बदल दिया। रैंड पॉल और बिल कैसिडी ने अपना रुख बदला। नेता जॉन थ्यून, लिंडसे ग्राहम, बर्नी मोरेनो और सभी का धन्यवाद। यह वोट ईरान के लिए एक चेतावनी है।" ट्रंप का कहना है कि राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव अमेरिका की कूटनीतिक और रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता था। राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों पर लगाम लगाने की कोशिश नाकाम सीनेट में पेश किए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान से पहले कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी आवश्यक हो। सीनेट ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया और इस तरह राष्ट्रपति की मौजूदा युद्ध शक्तियों को सीमित करने की कोशिश फिलहाल विफल हो गई। दो रिपब्लिकन सांसदों ने बदला फैसला इस मतदान का सबसे बड़ा मोड़ दो रिपब्लिकन सांसदों के रुख बदलने से आया। सीनेटर रैंड पॉल ने इस बार 'प्रेजेंट' वोट किया, यानी उन्होंने पक्ष या विपक्ष में मतदान नहीं किया। सीनेटर बिल कैसिडी ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के खिलाफ मतदान किया। अंतिम मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका और परिणाम 47-50-1 रहा। रैंड पॉल बोले- शांति वार्ता के लिए दिया राष्ट्रपति को मौका मतदान से पहले रैंड पॉल ने सोशल मीडिया पर कहा कि उनकी युद्ध शक्तियों को लेकर राय नहीं बदली है। उन्होंने लिखा कि उनका 'प्रेजेंट' वोट राष्ट्रपति को स्थायी शांति के लिए बातचीत करने की अधिक गुंजाइश देने के उद्देश्य से है। बिल कैसिडी ने पहले उठाए सवाल, फिर बदला रुख सीनेटर बिल कैसिडी ने पहले ट्रंप प्रशासन से ईरान संघर्ष को लेकर कई सवाल पूछे थे। उनका कहना था कि सांसदों और जनता को युद्ध की वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए। बाद में उन्होंने बताया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने उन्हें विस्तृत जानकारी दी, जिससे उनकी कई चिंताएं दूर हो गईं। इसके बाद उन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। कुछ रिपब्लिकन ने किया समर्थन, डेमोक्रेट में भी दिखी अलग राय रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स और लिसा मुर्कोव्स्की ने राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को सीमित करने वाले प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव का विरोध किया। इससे साफ हुआ कि ईरान नीति को लेकर मतभेद केवल पार्टी लाइनों तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रपति की शक्तियों पर बहस जारी अमेरिका में राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों का तर्क है कि यदि कोई फैसला अमेरिका को बड़े सैन्य संघर्ष की ओर ले जा सकता है, तो उसमें कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी अनिवार्य होनी चाहिए। वहीं ट्रंप समर्थकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के समय राष्ट्रपति के पास त्वरित निर्णय लेने की पर्याप्त संवैधानिक शक्तियां बनी रहनी चाहिए। ईरान को लेकर जारी तनाव के बीच सीनेट का यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक जीत माना जा रहा है, जबकि राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में बहस आगे भी जारी रहने के संकेत हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। अमेरिकी संसद के दोनों सदनों ने एक ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसमें ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को सीमित करने और राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों पर नियंत्रण लगाने की मांग की गई है। खास बात यह रही कि ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के कई सांसदों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। सीनेट में 50-48 वोट से पारित हुआ प्रस्ताव अमेरिकी सीनेट में युद्ध शक्तियों (War Powers) से जुड़े इस प्रस्ताव के पक्ष में 50 वोट पड़े, जबकि 48 सांसदों ने इसका विरोध किया। मतदान के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के चार सीनेटरों ने पार्टी लाइन से हटकर प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया। वहीं, दो रिपब्लिकन सांसद मतदान के समय अनुपस्थित रहे। यह प्रस्ताव राष्ट्रपति को कांग्रेस की मंजूरी के बिना किसी बड़े सैन्य संघर्ष को आगे बढ़ाने से रोकने की मंशा से लाया गया है। प्रस्ताव के पारित होने को ट्रंप प्रशासन की विदेश और सुरक्षा नीति के लिए एक राजनीतिक चुनौती माना जा रहा है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी मिला समर्थन इससे पहले अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भी यह प्रस्ताव पारित हो चुका है। वहां इसके समर्थन में 215 वोट पड़े, जबकि विरोध में 208 सांसदों ने मतदान किया। हाउस में भी चार रिपब्लिकन सांसदों ने डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर प्रस्ताव का समर्थन किया था। ट्रंप की पार्टी में बढ़ी असहमति रिपब्लिकन पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद खुलकर सामने आए हैं। कई सांसदों का मानना है कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना राष्ट्रपति को व्यापक सैन्य कार्रवाई का अधिकार नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर ट्रंप समर्थक नेताओं का कहना है कि राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में त्वरित निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। क्या ट्रंप पर पड़ेगा कोई असर? हालांकि यह प्रस्ताव राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इसका तत्काल कानूनी प्रभाव सीमित है। यह एक ‘कॉनकरेंट रिजॉल्यूशन’ है, जिसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं होती और यह सीधे कानून का रूप भी नहीं लेता। व्हाइट हाउस ने प्रस्ताव को प्रतीकात्मक बताते हुए कहा है कि इसका प्रशासन की सैन्य नीति पर कोई बाध्यकारी प्रभाव नहीं पड़ेगा। प्रशासन का तर्क है कि राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों को इस तरह के प्रस्तावों से सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत तक पहुंच सकता है मामला संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति और कांग्रेस की युद्ध संबंधी शक्तियों को लेकर लंबे समय से विवाद बना हुआ है। ऐसे में यदि इस प्रस्ताव को लेकर टकराव बढ़ता है तो मामला अदालतों तक पहुंच सकता है। व्हाइट हाउस पहले ही इस तरह के प्रस्तावों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठा चुका है। ईरान के साथ जारी है कूटनीतिक बातचीत यह राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर बातचीत जारी है। दोनों देशों के बीच हाल के हफ्तों में कई दौर की वार्ताएं हुई हैं और कूटनीतिक प्रयास तेज हुए हैं। ऐसे में अमेरिकी संसद का यह संदेश संकेत देता है कि कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग मध्य पूर्व में किसी नए सैन्य संघर्ष से बचने के पक्ष में है। अमेरिकी राजनीति में बढ़ी हलचल विश्लेषकों का मानना है कि प्रस्ताव के पक्ष में रिपब्लिकन सांसदों का मतदान ट्रंप के लिए केवल राजनीतिक झटका नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति का संकेत भी है। आने वाले दिनों में ईरान नीति और सैन्य शक्तियों के मुद्दे पर अमेरिका की राजनीति में बहस और तेज होने की संभावना है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अमेरिकी सीनेट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य शक्तियों को सीमित करने से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान में राष्ट्रपति की स्वतंत्र कार्रवाई पर नियंत्रण सुनिश्चित करना है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ संभावित शांति समझौते और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर कूटनीतिक प्रयासों में भी जुटा हुआ है। 50-48 वोट से पारित हुआ प्रस्ताव मंगलवार को हुए मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में 50 और विरोध में 48 वोट पड़े। दिलचस्प बात यह रही कि राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों—रैंड पॉल, सुसान कॉलिन्स, लिसा मर्कोव्स्की और बिल कैसिडी—ने डेमोक्रेट सांसदों के साथ मिलकर प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं, डेमोक्रेट सांसद जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। इस मतदान ने अमेरिकी राजनीति में ईरान नीति को लेकर दोनों दलों के भीतर मौजूद मतभेदों को भी उजागर कर दिया। प्रतिनिधि सभा से भी मिल चुकी है मंजूरी इससे पहले अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दे चुकी है। वहां यह प्रस्ताव 215-208 वोटों से पारित हुआ था। हाउस में भी कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने पार्टी लाइन से अलग जाकर इसका समर्थन किया था। प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इसकी आलोचना करते हुए समर्थक सांसदों को निशाने पर लिया था। क्या है इस प्रस्ताव का उद्देश्य? यह प्रस्ताव अमेरिकी संविधान में राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच युद्ध संबंधी शक्तियों के संतुलन से जुड़ा हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रपति किसी बड़े सैन्य संघर्ष में देश को शामिल करने से पहले कांग्रेस की स्वीकृति प्राप्त करें। अमेरिका में लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि सैन्य कार्रवाई जैसे महत्वपूर्ण फैसलों में कांग्रेस की भूमिका को मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि युद्ध संबंधी निर्णयों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण बना रहे। क्या ट्रंप प्रशासन पर पड़ेगा कोई असर? राजनीतिक रूप से यह प्रस्ताव महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन कानूनी दृष्टि से इसका प्रभाव सीमित है। यह एक "कॉनकरेंट रिजॉल्यूशन" है, जिसे कानून का दर्जा प्राप्त नहीं होता और न ही इसके लिए राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक होती है। व्हाइट हाउस का कहना है कि इस प्रस्ताव का प्रशासन की सैन्य नीति पर कोई बाध्यकारी प्रभाव नहीं पड़ेगा। प्रशासन के अनुसार, यह केवल एक प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश है। व्हाइट हाउस ने बताया प्रतीकात्मक कदम व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने प्रस्ताव को महज राजनीतिक अभिव्यक्ति बताया है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों पर इसका कोई प्रत्यक्ष असर नहीं पड़ेगा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले पहले की तरह कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में रहेंगे। प्रशासन ने यह भी दावा किया कि वर्तमान में ईरान के साथ किसी सक्रिय सैन्य संघर्ष की स्थिति नहीं है और हालिया युद्धविराम के बाद तनाव में कमी आई है। कांग्रेस में बढ़ रही सैन्य कार्रवाई को लेकर चिंता सीनेट में हुए इस मतदान ने संकेत दिया है कि कांग्रेस के कई सदस्य मध्य पूर्व में संभावित सैन्य तनाव को लेकर चिंतित हैं। सांसदों का एक वर्ग मानता है कि बिना कांग्रेस की मंजूरी के बड़े सैन्य कदम उठाने से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है और अमेरिका लंबे संघर्ष में उलझ सकता है। इसी वजह से हाल के महीनों में ईरान से जुड़े युद्ध शक्तियों के मुद्दे पर कांग्रेस में कई बार बहस और मतदान हो चुके हैं। अमेरिका-ईरान वार्ता पर बनी हुई है नजर सीनेट के इस फैसले के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत जारी है। दोनों देशों के बीच हाल में हुई वार्ताओं को क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि सीनेट का यह प्रस्ताव भले ही कानूनी रूप से बाध्यकारी न हो, लेकिन यह स्पष्ट संकेत देता है कि अमेरिकी संसद का एक बड़ा वर्ग ईरान के खिलाफ किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई पर अधिक राजनीतिक और संसदीय निगरानी चाहता है।
United States में चीन को लेकर चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। अब अमेरिकी सांसदों के एक द्विदलीय समूह ने चीन को अमेरिका का “सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंदी” बताते हुए ट्रंप प्रशासन से भारत के साथ रिश्ते और मजबूत करने की अपील की है। अमेरिकी सीनेट में पेश किए गए इस प्रस्ताव में कहा गया है कि China के पास अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सुरक्षा, आर्थिक ताकत और रणनीतिक हितों को कमजोर करने की क्षमता और मंशा दोनों मौजूद हैं। प्रस्ताव में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और आर्थिक दबाव की रणनीति पर भी चिंता जताई गई है। दोनों पार्टियों के सांसदों ने पेश किया प्रस्ताव यह प्रस्ताव अमेरिकी सीनेटर Chris Coons समेत रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक सांसदों के समूह ने पेश किया। प्रस्ताव में आरोप लगाया गया कि चीन: अपनी सैन्य ताकत तेजी से बढ़ा रहा है साइबर और स्पेस तकनीक में विस्तार कर रहा है हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दबाव की नीति अपना रहा है ताइवान के खिलाफ आक्रामक रवैया दिखा रहा है सांसदों ने कहा कि बीजिंग इंडो-पैसिफिक में “जबरदस्ती और आक्रामक रणनीति” के जरिए क्षेत्रीय संतुलन बदलने की कोशिश कर रहा है। भारत के साथ गहरे जुड़ाव की सलाह प्रस्ताव का सबसे अहम हिस्सा भारत को लेकर माना जा रहा है। अमेरिकी सांसदों ने कहा कि चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका को भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी और मजबूत करनी चाहिए। सीनेटरों ने खासतौर पर Quadrilateral Security Dialogue यानी QUAD को मजबूत करने की बात कही। इस समूह में: India United States Japan Australia शामिल हैं। अमेरिका का मानना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में QUAD की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। चीन पर लगे गंभीर आरोप अमेरिकी सांसदों ने चीन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। प्रस्ताव में कहा गया कि: चीन अमेरिकी तकनीक और बौद्धिक संपदा चोरी करता है जबरन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कराता है वैश्विक बाजारों में अनुचित प्रतिस्पर्धा करता है सरकारी मदद से रणनीतिक उद्योगों पर कब्जा करने की कोशिश करता है इसके अलावा चीन पर रूस, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देशों को सैन्य तकनीक और सामग्री उपलब्ध कराने का भी आरोप लगाया गया। AI और क्वांटम टेक्नोलॉजी को लेकर चिंता प्रस्ताव में कहा गया कि चीन: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) क्वांटम कंप्यूटिंग एडवांस सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सांसदों ने चेतावनी दी कि ये तकनीकें भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत तय करेंगी। उन्होंने अमेरिका से इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने और चीन पर कड़े एक्सपोर्ट कंट्रोल लगाने की मांग की। ताइवान और साउथ चाइना सी पर भी फोकस प्रस्ताव में Taiwan Strait और South China Sea में शांति और स्थिरता बनाए रखने पर जोर दिया गया। अमेरिकी सांसदों ने कहा कि इन क्षेत्रों में नेविगेशन की आजादी सुनिश्चित करना जरूरी है, क्योंकि चीन लगातार वहां सैन्य दबाव बढ़ा रहा है। क्यों अहम माना जा रहा है यह प्रस्ताव? हालांकि यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन इसे वॉशिंगटन में चीन को लेकर बढ़ती चिंता का बड़ा संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि: अमेरिका अब चीन को केवल आर्थिक प्रतिद्वंदी नहीं, बल्कि सुरक्षा चुनौती के रूप में देख रहा है भारत की रणनीतिक अहमियत तेजी से बढ़ रही है इंडो-पैसिफिक क्षेत्र आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है अमेरिका की यह नई रणनीति आने वाले समय में चीन-अमेरिका संबंधों को और तनावपूर्ण बना सकती है, जबकि भारत की भूमिका वैश्विक शक्ति संतुलन में और मजबूत होती दिखाई दे रही है।
रांची। रांची जिले के निजी स्कूलों के लिए जिला प्रशासन की ओर से महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है। यह बैठक शनिवार को रांची विश्वविद्यालय स्थित आर्यभट्ट सभागार में आयोजित होगी। बैठक की अध्यक्षता रांची उपायुक्त Manjunath Bhajantri करेंगे। इसमें जिले के सभी CBSE, ICSE, JAC समेत अन्य बोर्डों से संबद्ध निजी विद्यालयों के प्राचार्य या उनके अधिकृत प्रतिनिधियों को शामिल होना अनिवार्य किया गया है। जिला प्रशासन के अनुसार बैठक सुबह 11:30 बजे शुरू होगी, जबकि पंजीकरण प्रक्रिया सुबह 11:00 बजे से आरंभ कर दी जाएगी। सभी प्रतिनिधियों को समय पर पहुंचने का निर्देश दिया गया है ताकि बैठक निर्धारित समय पर शुरू हो सके। RTE से जुड़े मुद्दों पर रहेगा फोकस बैठक में मुख्य रूप से शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की जाएगी। इसमें निजी स्कूलों में आरटीई के तहत दाखिला प्रक्रिया, सीट आवंटन, नियमों के अनुपालन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। जिला प्रशासन की ओर से स्कूल प्रबंधन को जरूरी दिशा-निर्देश भी दिए जा सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, हाल के दिनों में आरटीई के तहत नामांकन और सीट आवंटन को लेकर कई स्तरों पर सवाल उठे थे। ऐसे में यह बैठक शिक्षा व्यवस्था में समन्वय और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। प्रशासन ने जारी किया सख्त निर्देश जिला प्रशासन ने साफ कहा है कि यह केवल औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े अहम विषयों पर विचार-विमर्श का मंच है। इसलिए सभी निजी विद्यालयों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति जरूरी है। प्रशासन ने स्कूल प्रबंधन से अपील की है कि वे समय से पहले पहुंचकर पंजीकरण प्रक्रिया पूरी करें और बैठक को सफल बनाने में सहयोग दें।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।