देश में कामकाजी महिलाओं के अधिकारों को नई मजबूती देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को भी मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) से वंचित नहीं किया जा सकता। यह निर्णय न केवल दत्तक माताओं के अधिकारों को मान्यता देता है, बल्कि परिवार की बदलती परिभाषा को भी कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला? न्यायमूर्ति जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि मातृत्व अवकाश केवल जैविक माताओं तक सीमित नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि: 3 महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने पर भी मातृत्व अवकाश देना अनिवार्य है मातृत्व संरक्षण एक मौलिक मानवाधिकार है गैर-जैविक तरीके से परिवार बनाना भी समान रूप से वैध है कानून की किस धारा को ठहराया असंवैधानिक? अदालत ने सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4) को असंवैधानिक करार दिया। यह प्रावधान केवल उन दत्तक माताओं को मातृत्व अवकाश देता था, जो 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती थीं। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन बताया। अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां “गोद लिया हुआ बच्चा और जैविक बच्चा अलग नहीं हैं” “प्रजनन संबंधी स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) केवल जैविक प्रक्रिया तक सीमित नहीं” “कानून का उद्देश्य महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा है, न कि भेदभाव करना” कैसे शुरू हुआ यह मामला? यह मामला कर्नाटक की वकील हमसानंदिनी नंदूरी की याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने इस प्रावधान को चुनौती दी थी। उन्होंने 2017 में दो बच्चों को गोद लिया था, लेकिन उम्र सीमा के कारण उन्हें सीमित अवकाश मिला। याचिका में कहा गया कि यह कानून दत्तक माताओं और बच्चों के साथ भेदभाव करता है। पितृत्व अवकाश पर भी टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी आग्रह किया कि वह पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) पर भी नीति बनाने पर विचार करे, ताकि बच्चों की देखभाल में दोनों अभिभावकों की समान भूमिका सुनिश्चित हो सके। देशभर में क्या होगा असर? इस फैसले के बाद: सभी कामकाजी दत्तक माताओं को समान मातृत्व लाभ मिलेगा गोद लेने को लेकर सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ेगी कार्यस्थलों पर लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा यह फैसला भारतीय समाज में परिवार और मातृत्व की परिभाषा को व्यापक बनाते हुए एक बड़ी संवैधानिक और सामाजिक प्रगति के रूप में देखा जा रहा है।
चतरा: झारखंड के चतरा जिले में मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना की राशि नहीं मिलने से हजारों महिलाएं परेशान हैं। जनवरी और फरवरी महीने की किस्त अब तक खातों में नहीं पहुंची है, जिससे लाभुक महिलाएं बैंक और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं। दूसरे जिलों में भुगतान, चतरा में अब भी इंतजार लाभुक महिलाओं का कहना है कि राज्य के कई अन्य जिलों में योजना की राशि जारी कर दी गई है। वहां महिलाओं के खातों में एक साथ दो महीने की करीब 5-5 हजार रुपये की राशि पहुंच चुकी है, लेकिन चतरा जिले में अब तक भुगतान नहीं हुआ है। इससे महिलाओं में नाराजगी बढ़ती जा रही है। बैंक और कार्यालयों के चक्कर से बढ़ी परेशानी राशि की उम्मीद में महिलाएं रोजाना अपने बैंक पहुंच रही हैं और खाता अपडेट करवा रही हैं। इसके अलावा वे सामाजिक सुरक्षा कार्यालय और प्रखंड कार्यालयों में भी जानकारी लेने जा रही हैं, लेकिन हर जगह से उन्हें एक ही जवाब मिल रहा है-“अभी भुगतान नहीं आया है”। 1.74 लाख से ज्यादा महिलाएं प्रभावित जानकारी के अनुसार, चतरा जिले में इस योजना के करीब 1 लाख 74 हजार 491 लाभुक हैं। इतनी बड़ी संख्या में भुगतान लंबित होना प्रशासन के लिए भी चिंता का विषय बन गया है। महिलाओं का कहना है कि यह राशि उनके घर के खर्च और जरूरतों के लिए बेहद जरूरी है। तकनीकी समस्या बनी देरी की वजह जिला सामाजिक सुरक्षा पदाधिकारी सुकरमनी लिंडा ने बताया कि तकनीकी समस्या के कारण भुगतान में देरी हो रही है। उन्होंने आश्वासन दिया कि जैसे ही समस्या दूर होगी, जनवरी और फरवरी दोनों महीनों की राशि एक साथ लाभुकों के खातों में भेज दी जाएगी। जल्द भुगतान की उठी मांग लाभुक महिलाओं ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन से जल्द समाधान निकालने की मांग की है। उनका कहना है कि यह योजना उनके आर्थिक सशक्तिकरण का अहम हिस्सा है, ऐसे में भुगतान में देरी से उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। उम्मीद पर टिकी निगाहें फिलहाल चतरा की महिलाएं इस उम्मीद में हैं कि जल्द ही उनके खातों में योजना की राशि पहुंच जाएगी। लेकिन जब तक भुगतान नहीं होता, तब तक उनका इंतजार और परेशानी दोनों जारी रहने वाली है।
असम: देश की राजनीति में हाल के वर्षों में महिलाओं को केंद्र में रखकर शुरू की गई कल्याणकारी योजनाएं चुनावी समीकरणों को प्रभावित करती रही हैं। कई राज्यों में ऐसी योजनाओं ने सरकारों की वापसी का रास्ता आसान किया है। इसी पृष्ठभूमि में असम में भी विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। असम सरकार ने मंगलवार को अरुणोदय (Arunodoi) योजना के तहत करीब 40 लाख लाभार्थियों के बैंक खातों में ₹9,000 की एकमुश्त सहायता राशि ट्रांसफर की। यह राज्य में अब तक की सबसे बड़ी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) पहलों में से एक मानी जा रही है। इस पूरी प्रक्रिया के तहत करीब ₹3,600 करोड़ सीधे लाभार्थियों के खातों में भेजे गए। चुनाव से पहले बड़ा कदम, लेकिन सरकार का दावा-राजनीति से नहीं जुड़ा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम बिहार के उस मॉडल से मिलता-जुलता है, जिसमें चुनाव से पहले महिलाओं को सीधे आर्थिक सहायता देकर सरकार ने बड़ा राजनीतिक संदेश दिया था। हालांकि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस योजना को चुनाव से जोड़ने से साफ इनकार किया है। गुवाहाटी के खानापाड़ा स्थित ज्योति-बिष्णु अंतर्राष्ट्रीय कला मंदिर ऑडिटोरियम से वर्चुअल कार्यक्रम के माध्यम से लाभार्थियों को यह राशि जारी करते हुए सरमा ने कहा कि अरुणोदय योजना कई वर्षों से चल रही है और इसका उद्देश्य केवल आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की मदद करना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पहल चुनावी रणनीति नहीं बल्कि राज्य सरकार की दीर्घकालिक सामाजिक कल्याण नीति का हिस्सा है। चार महीने की सहायता और बिहू बोनस शामिल सरकार द्वारा जारी की गई इस राशि में चार महीनों की वित्तीय सहायता के साथ-साथ महिलाओं के लिए दिया जाने वाला विशेष बिहू बोनस भी शामिल है। राज्य सरकार का कहना है कि त्योहारों के समय आर्थिक मदद से गरीब परिवारों को राहत मिलती है और उनकी जरूरतें पूरी करने में सहायता मिलती है। किन लोगों को मिलता है योजना का लाभ मुख्यमंत्री सरमा के अनुसार, अरुणोदय योजना खासतौर पर समाज के कमजोर वर्गों की महिलाओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इसमें मुख्य रूप से शामिल हैं- विधवा महिलाएं तलाकशुदा या परित्यक्त महिलाएं गंभीर बीमारियों से प्रभावित परिवार आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद घर-परिवार सरकार का कहना है कि लाभ केवल उन्हीं लोगों को दिया जाता है जो निर्धारित मानकों के आधार पर वास्तव में इसके पात्र हैं। महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की पहल असम की वित्त मंत्री अजंता नियोग ने इस पहल को राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक कदम बताया। उन्होंने कहा कि इस योजना के तहत लगभग 40 लाख परिवारों को सहायता मिल रही है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं। नियोग के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में राज्य सरकार ने गरीब परिवारों और महिलाओं के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं, जिनका उद्देश्य उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाना और समाज में उनका सम्मान बढ़ाना है। लाभार्थियों में खुशी योजना के तहत राशि सीधे बैंक खातों में पहुंचने से लाभार्थियों में उत्साह देखा गया। सोनापुर की शिवानी बोरो डेका ने बताया कि ₹9,000 की सहायता मिलने से उन्हें काफी राहत मिली है। उन्होंने कहा कि वह इस राशि का उपयोग परिवार की जरूरतों को पूरा करने में करेंगी। वहीं एक अन्य लाभार्थी राधिका मंडल ने कहा कि यह आर्थिक सहायता उनके लिए छोटा व्यवसाय शुरू करने और रोजगार के नए अवसर तलाशने में मददगार साबित हो सकती है। राजनीतिक और सामाजिक असर पर नजर विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं को सीधे आर्थिक सहायता देने वाली योजनाएं सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टि से भी प्रभावशाली साबित होती हैं। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनावों के संदर्भ में असम सरकार की इस पहल पर राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी दलों की नजरें टिकी हुई हैं।
खगड़िया: बिहार के खगड़िया जिले में अब केले की खेती सिर्फ फल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगी। केले के तनों से रेशा निकालकर विभिन्न उत्पाद तैयार करने की पहल के साथ महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार किए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जिला प्रशासन और नाबार्ड की ओर से ‘वेस्ट टू वेल्थ’ पहल के तहत महिलाओं के लिए एक महीने का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया है। प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ इस कार्यक्रम का उद्घाटन जिला पदाधिकारी नवीन कुमार, डीडीसी श्वेता भारती और नाबार्ड की डीडीएम पूजा भारती ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस मौके पर केले के तनों से रेशा निकालकर उत्पाद बनाने वाली महिलाओं को सम्मानित भी किया गया। केले के तने से बनेंगे कई उपयोगी उत्पाद खगड़िया में बड़े पैमाने पर केले की खेती होती है। अब आधुनिक तकनीक की मदद से केले के तनों से रेशा निकालकर कई प्रकार के आकर्षक और उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाएंगे। प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को हस्तशिल्प से जुड़े कई उत्पाद बनाना सिखाया जा रहा है। इनमें फैंसी बैग, चटाई, टोकरियां, फाइल कवर, फोल्डर, सजावटी सामान और मजबूत रस्सियां शामिल हैं। महिलाओं को मिलेगा स्वरोजगार जिला पदाधिकारी नवीन कुमार ने कहा कि खगड़िया में केले की प्रचुरता है और इसके तनों से निकलने वाला रेशा पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ महिलाओं के लिए अतिरिक्त आय का बेहतर साधन बन सकता है। उन्होंने बताया कि प्रशासन महिलाओं को इस कार्य के लिए आवश्यक मशीनें और बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में भी प्रयास करेगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल डीडीसी श्वेता भारती ने कहा कि महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ इस तरह के उद्योग से जुड़कर आत्मनिर्भर बन सकती हैं। उनके अनुसार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में महिलाओं की भूमिका बेहद अहम है और यह पहल उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में मददगार साबित होगी। ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की दिशा में अहम कदम अब तक किसान केले के तनों को बेकार समझकर खेतों में छोड़ देते थे, लेकिन अब इन्हीं तनों से कीमती रेशा निकालकर उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाएंगे। इससे जहां पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, वहीं महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। कार्यक्रम का संचालन नाबार्ड की डीडीएम पूजा भारती ने किया, जबकि इसका संयोजन J.J.B.F. संस्था द्वारा किया गया। इस पहल से जिले में ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की अवधारणा को मजबूती मिलने के साथ-साथ महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर रेलवे की अनोखी पहल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर झारखंड के रांची और धनबाद रेल मंडलों में महिला सशक्तिकरण की एक प्रेरक पहल देखने को मिली। रेलवे प्रशासन ने इस अवसर पर ट्रेनों के संचालन से लेकर सुरक्षा और टिकट जांच तक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां महिला कर्मचारियों को सौंपीं। इस पहल के तहत कई ट्रेनों को पूरी तरह महिला क्रू द्वारा संचालित किया गया, जिससे महिलाओं की क्षमता और नेतृत्व कौशल का शानदार उदाहरण सामने आया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दी शुभकामनाएं इस अवसर पर झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren ने महिलाओं को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर अपने संदेश में कहा कि देश की आधी आबादी को इस खास दिन की हार्दिक शुभकामनाएं। मुख्यमंत्री ने कहा कि माताएं और बहनें केवल परिवार की ताकत ही नहीं, बल्कि समाज और राज्य के विकास की मजबूत आधारशिला भी हैं। उन्होंने कहा कि महिलाएं अपनी मेहनत, साहस और दृढ़ संकल्प से हर क्षेत्र में नई पहचान बना रही हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन रही हैं। रांची–इरगांव ट्रेन का संचालन महिलाओं ने किया रांची रेलवे स्टेशन से चलने वाली रांची–इरगांव ट्रेन का संचालन पूरी तरह महिला कर्मचारियों की टीम ने संभाला। इस विशेष पहल के तहत करीब 15 महिला रेलकर्मियों की टीम बनाई गई थी। इस टीम में लोको पायलट, सहायक लोको पायलट, ट्रेन मैनेजर, टीटीई और रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) की महिला जवान शामिल थीं। ट्रेन की रवानगी से लेकर यात्रियों की सुरक्षा और व्यवस्था तक की सभी जिम्मेदारियां महिला टीम ने सफलतापूर्वक निभाईं। यात्रियों ने तालियां बजाकर किया उत्साहवर्धन रांची रेल मंडल की सीनियर डीसीएम सूची सिंह ने स्टेशन पर मौजूद महिला रेलकर्मियों को गुलाब का फूल देकर सम्मानित किया। इस दौरान प्लेटफॉर्म पर मौजूद यात्रियों में भी इस पहल को लेकर उत्साह दिखाई दिया। लोगों ने तालियां बजाकर महिला कर्मचारियों का हौसला बढ़ाया और उनकी सराहना की। अधिकारियों ने कहा कि महिला दिवस महिलाओं के संघर्ष, उपलब्धियों और समाज में उनके योगदान को सम्मान देने का अवसर है। धनबाद–सिंदरी टाउन ट्रेन भी महिला क्रू ने चलाई धनबाद रेल मंडल में भी महिला दिवस के अवसर पर विशेष पहल की गई। धनबाद से सुबह 11:30 बजे खुलने वाली धनबाद–सिंदरी टाउन पैसेंजर ट्रेन का संचालन पूरी तरह महिला क्रू ने किया। इस ट्रेन में रेल चालक के रूप में जानकी बल्लभ बारी, सहायक रेल चालक के रूप में वंदना कुमारी और ट्रेन मैनेजर के रूप में दीपा कुमारी ने जिम्मेदारी निभाई। वापसी में सिंदरी टाउन से धनबाद आने वाली ट्रेन का संचालन भी महिला कर्मचारियों ने ही किया। स्टेशन की जिम्मेदारी भी महिलाओं के हाथ धनबाद स्टेशन पर टिकट काउंटर, टिकट जांच, ट्रेन सिग्नलिंग और सुरक्षा से जुड़ी कई जिम्मेदारियां भी महिला कर्मचारियों को सौंपी गईं। रेलवे अधिकारियों के अनुसार इस पहल का उद्देश्य महिलाओं की क्षमता को सामने लाना और समाज में यह संदेश देना है कि महिलाएं हर क्षेत्र में जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह सक्षम हैं। अधिकारियों ने यह भी कहा कि महिलाओं को समान अवसर देने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए इस तरह की पहल आगे भी जारी रहेगी।
झारखंड में मंईयां सम्मान योजना की दो किश्तों की राशि जारी होने के बाद राज्य के कई जिलों के बाजारों में रौनक बढ़ गई है। सरकार की इस योजना के तहत महिलाओं के खातों में दो महीनों की कुल 5000 रुपये की राशि ट्रांसफर की जा रही है। राजधानी Ranchi सहित कई जिलों में योजना की राशि मिलते ही महिलाओं में उत्साह देखा जा रहा है। खासकर Jamtara के बाजारों में महिलाओं की भीड़ बढ़ने लगी है। बाजारों में बढ़ी खरीदारी राशि मिलने के बाद महिलाएं कपड़े, कॉस्मेटिक, घरेलू सामान, किराना और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी कर रही हैं। बाजारों में ग्राहकों की संख्या पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है। दुकानदारों का कहना है कि मंईयां सम्मान योजना की राशि जारी होने के बाद व्यापार में तेजी आई है। खासकर कपड़े और कॉस्मेटिक की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ ज्यादा देखने को मिल रही है। ईद से पहले बाजारों में हलचल ईद का त्योहार आने में अभी करीब दो हफ्ते का समय बाकी है, लेकिन बाजारों में अभी से त्योहार की हलचल शुरू हो गई है। महिलाएं त्योहार और घर की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए खरीदारी कर रही हैं। व्यापारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में बाजारों में और भी ज्यादा रौनक देखने को मिल सकती है, जिससे स्थानीय व्यापार को भी बड़ा फायदा होगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।