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Iranian airspace restrictions announced amid escalating tensions and fears of possible US military action
अमेरिकी हमले की आशंका के बीच अलर्ट मोड पर ईरान, बंद किया एयरस्पेस

Iran ने संभावित अमेरिकी सैन्य हमलों की आशंका के बीच अपना एयरस्पेस पूरी तरह बंद कर दिया है। क्षेत्र में बढ़ते तनाव और रुकती कूटनीतिक बातचीत के बीच यह फैसला लिया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, United States ईरान के खिलाफ नए सैन्य ऑपरेशन पर विचार कर रहा है। अमेरिकी हमले की तैयारी की रिपोर्ट अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, व्हाइट हाउस और रक्षा विभाग के भीतर ईरान के खिलाफ संभावित नए हमलों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों का दावा है कि यदि अगले 24 घंटों में कोई बड़ी कूटनीतिक सफलता नहीं मिलती, तो राष्ट्रपति Donald Trump बड़े स्तर पर सैन्य कार्रवाई को मंजूरी दे सकते हैं। प्रशासन की ओर से अभी तक किसी अंतिम फैसले की औपचारिक पुष्टि नहीं की गई है। इसके बावजूद अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियों के कई अधिकारियों ने अपनी मेमोरियल डे वीकेंड छुट्टियां रद्द कर दी हैं। ट्रंप ने रद्द किया वीकेंड कार्यक्रम तनावपूर्ण हालात के बीच राष्ट्रपति ट्रंप को न्यू जर्सी में अपना वीकेंड कार्यक्रम छोड़कर वॉशिंगटन लौटना पड़ा। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि मौजूदा सरकारी परिस्थितियों के कारण उनका व्हाइट हाउस में रहना ज्यादा जरूरी है। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि वह अपने बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर की शादी में शामिल नहीं हो पाएंगे। उन्होंने कहा कि देश की मौजूदा स्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय जिम्मेदारियां प्राथमिकता हैं। ईरान-अमेरिका बातचीत फिर अटकी दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत जारी रहने के बावजूद शांति वार्ता फिलहाल ठप मानी जा रही है। विवाद की सबसे बड़ी वजह ईरान का संवर्धित यूरेनियम कार्यक्रम बना हुआ है। अमेरिका का कहना है कि ईरान को न केवल परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना होगा, बल्कि उसके पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम भी हटाना होगा। दूसरी ओर ईरान इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं है और अपने परमाणु कार्यक्रम को राष्ट्रीय अधिकार बता रहा है। सीजफायर के बावजूद कायम है तनाव अप्रैल में घोषित अस्थायी सीजफायर अब भी तकनीकी रूप से लागू है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में छिटपुट हमलों और सैन्य गतिविधियों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। इसी वजह से मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कूटनीतिक बातचीत विफल रहती है, तो आने वाले दिनों में क्षेत्रीय संघर्ष और गहरा सकता है।  

surbhi मई 23, 2026 0
Donald Trump at the White House amid rising tensions and reports of possible US action against Iran
छुट्टी कैंसल, बेटे की शादी में भी नहीं जाएंगे ट्रंप! क्या ईरान पर दोबारा हमले की तैयारी कर रहा है अमेरिका?

Donald Trump प्रशासन एक बार फिर ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य कदम की तैयारी में जुटा दिखाई दे रहा है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक व्हाइट हाउस, पेंटागन और खुफिया एजेंसियों में हाई अलर्ट जैसी स्थिति बना दी गई है। इसी बीच ट्रंप ने अपने निजी कार्यक्रम और छुट्टियां भी रद्द कर दी हैं, जिससे अटकलें और तेज हो गई हैं। बेटे की शादी में भी नहीं जाएंगे ट्रंप अमेरिका में 25 मई को मेमोरियल डे के चलते लंबा वीकेंड है। ट्रंप पहले न्यू जर्सी स्थित अपने गोल्फ क्लब में समय बिताने वाले थे, लेकिन उन्होंने अचानक कार्यक्रम बदल दिया। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि वह अपने बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और बेटिना एंडरसन की शादी में शामिल नहीं हो पाएंगे। उन्होंने इसकी वजह “सरकारी परिस्थितियां” बताई। इसके बाद उनका काफिला वॉशिंगटन डीसी में तेजी से व्हाइट हाउस लौटता देखा गया। अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियां अलर्ट पर रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी सेना और इंटेलिजेंस एजेंसियों के कई अधिकारियों ने भी अपनी छुट्टियां रद्द कर दी हैं। विदेशों में तैनात अमेरिकी सैन्य ठिकानों के लिए “रिकॉल रोस्टर” अपडेट किए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार मध्य पूर्व में मौजूद कुछ अमेरिकी सैनिकों को संवेदनशील इलाकों से हटाया भी जा रहा है। माना जा रहा है कि अमेरिका संभावित जवाबी हमले की आशंका को देखते हुए अपनी तैयारियां मजबूत कर रहा है। ईरान के IRGC की बड़ी चेतावनी Islamic Revolutionary Guard Corps यानी IRGC ने अमेरिका और इजरायल को खुली चेतावनी दी है। IRGC ने कहा कि अगर ईरान पर फिर हमला हुआ तो जवाब सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। ईरान ने अपने पश्चिमी हवाई क्षेत्र में NOTAM जारी कर सोमवार तक उड़ानों पर रोक लगा दी है। इसे संभावित सैन्य गतिविधियों से जोड़कर देखा जा रहा है। अमेरिका ने दिया “फाइनल ऑफर” रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका ने ईरान को एक “अंतिम प्रस्ताव” दिया है। कहा जा रहा है कि अगर तेहरान इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करता, तो अगले 24 घंटे में सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू हो सकती है। ट्रंप ने हाल ही में बयान दिया कि “ईरान समझौता करना चाहता है” और अमेरिका हालात पर नजर बनाए हुए है। असली विवाद क्या है? अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़ा विवाद परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर है। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम एनरिचमेंट पूरी तरह बंद करे ईरान इस मांग को मानने को तैयार नहीं है तेहरान अपने विदेशी फ्रीज एसेट्स जारी करने और युद्ध नुकसान की भरपाई की मांग कर रहा है ईरान होर्मुज स्ट्रेट पर टोल व्यवस्था की भी बात कर रहा है विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के बीच तनाव की जड़ यही मुद्दे हैं। पाकिस्तान और कतर निभा रहे मध्यस्थ की भूमिका रिपोर्ट्स के अनुसार Asim Munir इस समय तेहरान में मौजूद हैं। वहीं कतर का प्रतिनिधिमंडल भी ईरान पहुंचा हुआ है। दोनों देश अमेरिका और ईरान के बीच बैक-चैनल बातचीत कराने की कोशिश कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान सेना प्रमुख की मुलाकात IRGC के वरिष्ठ अधिकारियों से हो सकती है। फरवरी में शुरू हुआ था संघर्ष 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर संयुक्त हवाई हमले किए थे। इसके बाद दोनों पक्षों में जवाबी कार्रवाई का दौर शुरू हुआ। 8 अप्रैल को सीजफायर पर सहमति बनी, लेकिन उसके बाद भी धमकियों, प्रतिबंधों और सैन्य तैयारियों का सिलसिला जारी है। अब ट्रंप प्रशासन की गतिविधियों से यह आशंका बढ़ गई है कि हालात फिर से बड़े टकराव की ओर बढ़ सकते हैं।  

surbhi मई 23, 2026 0
Donald Trump and Iran leadership amid rising tensions over nuclear talks and possible military action
समझौता होगा या हमला? ट्रंप के बयान से बढ़ा सस्पेंस, ईरान ने कहा- बातचीत के रास्ते खुले

ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। एक तरफ दोनों देशों के बीच युद्ध टालने को लेकर बातचीत तेज हो गई है, वहीं दूसरी तरफ संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर भी अटकलें जारी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों ने इस संकट को लेकर सस्पेंस और बढ़ा दिया है। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत “निर्णायक मोड़” पर पहुंच चुकी है और अगले कुछ दिन बेहद अहम होंगे। ईरान ने कहा- बातचीत के विकल्प खुले ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने कहा कि तेहरान की ओर से बातचीत के सभी रास्ते अब भी खुले हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ईरान ने हमेशा अपने वादों का सम्मान किया है और युद्ध टालने के लिए हर संभव प्रयास किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दबाव बनाकर ईरान को झुकाने की कोशिश सफल नहीं होगी। उनके मुताबिक, समस्या का समाधान केवल सम्मानजनक बातचीत से ही निकल सकता है। परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ा विवाद पिछले कुछ दिनों में दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत और प्रस्तावों का आदान-प्रदान हुआ, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सहमति नहीं बन पाई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने अपने प्रस्ताव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़ी शर्तें रखीं, जिन्हें तेहरान ने खारिज कर दिया। इसके बाद ईरान ने पाकिस्तान के मध्यस्थों के जरिए अमेरिका को 14 बिंदुओं वाला नया प्रस्ताव भेजा। वॉशिंगटन इस प्रस्ताव से भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। ऐसे में दोनों देशों के बीच तनाव और अनिश्चितता अभी बनी हुई है। ट्रंप ने टाला सैन्य हमला ट्रंप ने बताया कि उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमले को फिलहाल रोक दिया है। उनके अनुसार सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं ने बातचीत को मौका देने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों को उम्मीद है कि जल्द कोई समझौता हो सकता है। हालांकि ट्रंप ने यह भी साफ किया कि किसी भी समझौते की स्थिति में ईरान को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी। “जरूरत पड़ी तो बड़ा हमला करेंगे” अमेरिकी राष्ट्रपति ने चेतावनी देते हुए कहा कि वह युद्ध नहीं चाहते, लेकिन यदि बातचीत विफल रही तो अमेरिका “एक और बड़ा हमला” करने के लिए तैयार है। ट्रंप के मुताबिक, सैन्य कार्रवाई को लेकर अंतिम फैसला अगले कुछ दिनों में लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि शुक्रवार, शनिवार, रविवार या अगले सप्ताह की शुरुआत तक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। दुनिया की नजर मध्य पूर्व पर मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार नजर बनाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते तो क्षेत्र में बड़ा सैन्य संघर्ष छिड़ सकता है। वहीं कई अरब देश दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर हालात को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं।  

surbhi मई 21, 2026 0
Donald Trump and Benjamin Netanyahu discussing Iran strategy amid rising Middle East tensions
ईरान मुद्दे पर अमेरिका-इजराइल में मतभेद, ट्रंप और नेतन्याहू के बीच तीखी बातचीत की रिपोर्ट

डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच ईरान को लेकर रणनीति पर मतभेद सामने आने की खबर है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच फोन पर हुई बातचीत काफी तनावपूर्ण रही और ईरान पर आगे की कार्रवाई को लेकर दोनों की राय अलग-अलग नजर आई। रिपोर्ट के अनुसार, जहां इजराइल ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य अभियान शुरू करने के पक्ष में है, वहीं अमेरिका फिलहाल बातचीत और संभावित समझौते के रास्ते पर जोर देता दिखाई दे रहा है। ‘एक्सियोस’ की रिपोर्ट में बड़ा दावा अमेरिकी मीडिया संस्थान Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार को ट्रंप से बातचीत के बाद नेतन्याहू “बेहद नाराज” थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि इजराइली नेतृत्व ईरान की सैन्य क्षमता को और कमजोर करने तथा उसके अहम बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर दबाव बढ़ाने के पक्ष में है। बताया गया कि नेतन्याहू का मानना है कि मौजूदा हालात में सैन्य दबाव कम करना इजराइल की रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता है। ट्रंप ने टाली हमले की योजना ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि ईरान पर प्रस्तावित हमले की योजना को फिलहाल टाल दिया गया है। उन्होंने बताया कि कतर और संयुक्त अरब अमीरात समेत कई अरब देशों के अनुरोध के बाद यह फैसला लिया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने संकेत दिए कि वह अब भी कूटनीतिक समाधान की संभावना देख रहे हैं। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि यदि बातचीत असफल रहती है तो अमेरिका सैन्य विकल्प अपनाने के लिए तैयार रहेगा। नया शांति प्रस्ताव तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान और कतर सहित कुछ क्षेत्रीय मध्यस्थों ने अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के उद्देश्य से नया शांति प्रस्ताव तैयार किया है। सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव का मकसद दोनों देशों के बीच संवाद बहाल करना और संभावित सैन्य टकराव को टालना है। हालांकि नेतन्याहू इस प्रक्रिया को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं बताए जा रहे हैं। “समझौते और युद्ध के बीच खड़ी है दुनिया” ट्रंप ने बुधवार को कनेक्टिकट स्थित कोस्ट गार्ड अकादमी में संबोधन के दौरान कहा कि अमेरिका और ईरान फिलहाल “समझौते और युद्ध के बीच की सीमा” पर खड़े हैं। उन्होंने पत्रकारों से कहा, “स्थिति बेहद निर्णायक मोड़ पर है। अगर हमें संतोषजनक जवाब नहीं मिले तो हालात तेजी से बदल सकते हैं। हम हर स्थिति के लिए तैयार हैं।” क्षेत्रीय तनाव पर बढ़ी वैश्विक नजर ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते तो मध्य पूर्व में बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका बढ़ सकती है। वहीं अरब देशों की कोशिश है कि बातचीत के जरिए स्थिति को नियंत्रित रखा जाए।  

surbhi मई 21, 2026 0
Mahmoud Ahmadinejad amid reports of alleged US-Israel plan for regime change in Iran
ईरान में सत्ता परिवर्तन की बड़ी साजिश  रिपोर्ट में दावा- अहमदीनेजाद को दोबारा लाना चाहते थे अमेरिका और इजरायल

Iran को लेकर एक नई रिपोर्ट ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। दावा किया गया है कि United States और Israel का सैन्य अभियान केवल ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को निशाना बनाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे तेहरान में सत्ता परिवर्तन की बड़ी रणनीति भी शामिल थी। रिपोर्ट के मुताबिक, इस योजना में ईरान के पूर्व राष्ट्रपति Mahmoud Ahmadinejad को दोबारा सत्ता में लाने की कोशिश की जा रही थी। हालांकि एक हमले और बाद की घटनाओं ने इस पूरी रणनीति को कमजोर कर दिया। क्या था कथित प्लान? The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इजरायल ने कथित “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के जरिए ईरान के शीर्ष नेतृत्व को कमजोर करने की योजना बनाई थी। दावा किया गया कि इस ऑपरेशन के मुख्य उद्देश्य थे: ईरान के सैन्य और परमाणु ढांचे को नुकसान पहुंचाना शीर्ष नेतृत्व को खत्म करना देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना वैकल्पिक सत्ता व्यवस्था तैयार करना रिपोर्ट में कहा गया कि सार्वजनिक तौर पर अमेरिका केवल परमाणु खतरे की बात करता रहा, लेकिन इजरायल इससे कहीं बड़े राजनीतिक बदलाव की तैयारी में था। खामेनेई की मौत से बढ़ा संकट रिपोर्ट के मुताबिक, 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि सर्वोच्च नेता Ali Khamenei और कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी हमलों में मारे गए। खामेनेई करीब 37 वर्षों तक ईरान के सर्वोच्च नेता रहे थे। उनकी मौत के बाद देशभर में 40 दिनों का शोक घोषित किया गया और सत्ता को लेकर अस्थिरता बढ़ गई। अमेरिका और इजरायल को उम्मीद थी कि नेतृत्व हटते ही ईरानी सत्ता ढांचा बिखर जाएगा, लेकिन ऐसा पूरी तरह नहीं हुआ। अहमदीनेजाद को “मुक्त” कराने की कोशिश? रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान के पूर्वी हिस्से में एक गुप्त अभियान चलाया गया, जहां महमूद अहमदीनेजाद कथित तौर पर नजरबंद थे। बताया गया कि हमला सीधे उनके घर पर नहीं, बल्कि उस सुरक्षा चौकी पर किया गया जहां Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) के जवान तैनात थे। सैटेलाइट तस्वीरों में सुरक्षा चौकी तबाह दिखाई गई, जबकि अहमदीनेजाद का घर सुरक्षित बताया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, हमले में अहमदीनेजाद घायल हुए लेकिन बच गए। क्यों अहम थे अहमदीनेजाद? महमूद अहमदीनेजाद 2005 से 2013 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे। अपने कार्यकाल में वह पश्चिम विरोधी बयानों, परमाणु कार्यक्रम और इजरायल पर तीखे रुख को लेकर चर्चा में रहे। हालांकि बाद के वर्षों में उनका टकराव खामेनेई समर्थक सत्ता प्रतिष्ठान से बढ़ गया था। उन्होंने ईरानी शासन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे और बाद में उन्हें चुनाव लड़ने से भी रोका गया। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि मौजूदा सत्ता से उनकी दूरी उन्हें “संक्रमणकालीन नेतृत्व” के लिए उपयोगी बना सकती है। हमला फेल हुआ तो बिखर गई रणनीति रिपोर्ट में दावा किया गया कि हमले के बाद अहमदीनेजाद सार्वजनिक जीवन से अचानक गायब हो गए। उनके पीछे हटने से सत्ता परिवर्तन की पूरी योजना कमजोर पड़ गई। इसके अलावा: ईरान में बड़े पैमाने पर जनविद्रोह नहीं हुआ राजनीतिक ढांचा पूरी तरह नहीं टूटा कुर्द समूहों ने अपेक्षित भूमिका नहीं निभाई वैकल्पिक नेतृत्व उभर नहीं पाया इन वजहों से कथित योजना अधूरी रह गई। ट्रंप और नेतन्याहू के बयान भी चर्चा में रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu दोनों ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि ईरान में बदलाव “अंदर से” आना चाहिए। हालांकि रिपोर्ट का दावा है कि पर्दे के पीछे कहीं बड़ी रणनीति पर काम हो रहा था। सिर्फ एयरस्ट्राइक नहीं, ‘इन्फ्लुएंस ऑपरेशन’ भी रिपोर्ट के मुताबिक, योजना में केवल हवाई हमले ही नहीं बल्कि: साइकोलॉजिकल ऑपरेशन इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाना सोशल अस्थिरता बढ़ाना कुर्द लड़ाकों को सक्रिय करना जैसी रणनीतियां भी शामिल थीं, ताकि जनता में यह संदेश जाए कि ईरानी शासन नियंत्रण खो चुका है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया की राजनीति और ईरान में संभावित सत्ता परिवर्तन को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।  

surbhi मई 20, 2026 0
Russian President Vladimir Putin meets Chinese President Xi Jinping in Beijing amid global diplomatic tensions
ट्रंप की बीजिंग यात्रा के बाद चीन पहुंचे पुतिन, शी जिनपिंग के साथ हुई अहम बैठक

Vladimir Putin ने बुधवार को China की राजधानी बीजिंग में राष्ट्रपति Xi Jinping से मुलाकात की। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब कुछ ही दिन पहले Donald Trump चीन दौरे पर गए थे। ऐसे में पुतिन की यह यात्रा वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कई वैश्विक मुद्दों पर हुई चर्चा बीजिंग में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में दोनों नेताओं ने कई अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की। इनमें प्रमुख रूप से: ईरान संकट यूक्रेन युद्ध वैश्विक व्यापार पश्चिम एशिया की स्थिति ऊर्जा सुरक्षा रणनीतिक सहयोग जैसे विषय शामिल रहे। दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने तथा बदलते वैश्विक हालात में आपसी सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया। ग्रेट हॉल ऑफ द पीपुल में हुआ स्वागत बीजिंग स्थित Great Hall of the People में शी जिनपिंग ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन का औपचारिक स्वागत किया। इसके बाद दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच विस्तृत वार्ता हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुतिन मंगलवार रात बीजिंग पहुंचे थे, जहां उनका स्वागत चीन के विदेश मंत्री Wang Yi ने किया। पुतिन बोले- रिश्ते अभूतपूर्व स्तर पर चीन यात्रा से पहले जारी अपने वीडियो संदेश में पुतिन ने कहा कि रूस और चीन के संबंध “अभूतपूर्व स्तर” तक पहुंच चुके हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच लगातार हो रहे उच्चस्तरीय संपर्क रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बना रहे हैं और सहयोग की नई संभावनाएं खोल रहे हैं। चीन ने क्या कहा? चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Guo Jiakun ने कहा कि शी जिनपिंग और पुतिन के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को लेकर गहन चर्चा हुई। उन्होंने यह भी बताया कि यह पुतिन की 25वीं चीन यात्रा है, जो दोनों देशों के मजबूत संबंधों को दर्शाती है। ट्रंप की यात्रा के बाद बढ़ी कूटनीतिक हलचल इस बैठक को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया बीजिंग यात्रा के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। 14 और 15 मई को ट्रंप ने चीन का दौरा किया था, जहां उनकी और शी जिनपिंग की बातचीत में भी ईरान, यूक्रेन युद्ध, व्यापारिक तनाव और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल थे। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की यात्रा के तुरंत बाद पुतिन का बीजिंग पहुंचना चीन-रूस संबंधों की रणनीतिक गहराई को दिखाता है। ईरान और होर्मुज संकट पर भी फोकस पुतिन की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ रहा है। खास तौर पर Iran द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े कदमों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजारों में चिंता बढ़ गई है। रूस, चीन और ईरान के बीच पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक सहयोग मजबूत हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा ईरान से आयात करता रहा है। वैश्विक राजनीति में बढ़ती रूस-चीन साझेदारी विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के बीच रूस और चीन लगातार एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। दोनों देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, डॉलर पर निर्भरता कम करने और पश्चिमी प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में सहयोग बढ़ा रहे हैं।  

surbhi मई 20, 2026 0
Donald Trump and Xi Jinping discussing Iran nuclear issue and Hormuz Strait during China visit
ट्रंप का दावा- ‘ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं हो सकते’, होर्मुज खुला रखने पर चीन से सहमति

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने अपनी तीन दिवसीय चीन यात्रा के बाद दावा किया है कि अमेरिका और चीन इस बात पर सहमत हैं कि Iran के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए और होर्मुज जलडमरूमध्य हर हाल में खुला रहना चाहिए। ट्रंप ने यह बयान चीन से लौटते समय एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान दिया। उन्होंने बताया कि उनकी चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के साथ मध्य पूर्व, ताइवान और वैश्विक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई। ‘होर्मुज खुला रहना बेहद जरूरी’ ट्रंप ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इसे खुला रखा जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी नौसैनिक दबाव और नाकेबंदी के कारण पिछले ढाई सप्ताह में ईरान को प्रतिदिन लगभग 500 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है। ट्रंप ने कहा, “राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भी बहुत जोर देकर कहा कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं हो सकते और होर्मुज स्ट्रेट खुला रहना चाहिए।” ईरान को लेकर अमेरिका-चीन की ‘अच्छी समझ’ ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि ईरान और ताइवान के मुद्दों पर अमेरिका और चीन के बीच “अच्छी समझ” बनी है। उन्होंने कहा, “हमने ईरान और ताइवान दोनों मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। मुझे लगता है कि इन विषयों पर हमारी समझ काफी अच्छी रही।” हालांकि चीन की ओर से ट्रंप के इन दावों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ताइवान मुद्दे पर भी हुई चर्चा ट्रंप ने बताया कि शी चिनफिंग ने ताइवान को लेकर अपनी चिंताएं स्पष्ट रूप से रखीं। उनके अनुसार, चीनी राष्ट्रपति नहीं चाहते कि ताइवान में किसी तरह का स्वतंत्रता संघर्ष या सैन्य टकराव हो, क्योंकि इससे बड़ा क्षेत्रीय संकट पैदा हो सकता है। ट्रंप ने कहा, “मैंने उनकी बात पूरी तरह सुनी। मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है।” ताइवान को हथियार बिक्री पर क्या बोले ट्रंप? प्रेस वार्ता के दौरान ट्रंप से 1982 के उस अमेरिकी आश्वासन को लेकर सवाल पूछा गया जिसमें कहा गया था कि अमेरिका ताइवान को हथियार बिक्री के मामलों में चीन से सलाह नहीं लेगा। इस पर ट्रंप ने कहा, “1982 बहुत पुरानी बात हो चुकी है। हमने ताइवान और हथियारों की बिक्री पर चर्चा की। यह एक अहम मुद्दा है और मैं जल्द इस पर फैसला लूंगा।” वैश्विक तनाव के बीच अहम मानी जा रही यात्रा ट्रंप की यह चीन यात्रा ऐसे समय हुई जब मध्य पूर्व में तनाव, ईरान संकट और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर वैश्विक चिंता बढ़ी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और चीन वास्तव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और समुद्री सुरक्षा को लेकर साझा रुख अपनाते हैं, तो इसका असर वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।  

surbhi मई 16, 2026 0
CIA Director John Ratcliffe during discussions in Havana amid Cuba’s worsening energy crisis
ऊर्जा संकट के बीच क्यूबा पहुंचा CIA प्रमुख, क्या हवाना में सत्ता परिवर्तन की तैयारी?

कैरेबियाई देश Cuba इन दिनों गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। देश के कई हिस्सों में 22 घंटे तक बिजली कटौती हो रही है और ईंधन की भारी कमी ने अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसी बीच John Ratcliffe की हवाना यात्रा ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह दौरा केवल औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात नहीं, बल्कि क्यूबा पर बढ़ते अमेरिकी दबाव का संकेत भी हो सकता है। बे ऑफ पिग्स के बाद फिर चर्चा में अमेरिका-क्यूबा संबंध करीब छह दशक पहले Bay of Pigs Invasion के जरिए अमेरिका ने फिदेल कास्त्रो सरकार को हटाने की कोशिश की थी। अब एक बार फिर क्यूबा में राजनीतिक बदलाव की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। CIA प्रमुख जॉन रैटक्लिफ ने हवाना में क्यूबा के शीर्ष खुफिया और राजनीतिक अधिकारियों से मुलाकात की। रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने आंतरिक मंत्री लाजारो अल्वारेज कैसास और राउल कास्त्रो परिवार से जुड़े अधिकारियों से भी बातचीत की। ट्रंप प्रशासन का ‘कड़ा संदेश’ रिपोर्ट्स के अनुसार, रैटक्लिफ ने क्यूबा नेतृत्व को अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump का संदेश दिया कि अमेरिका आर्थिक और सुरक्षा सहयोग पर गंभीर बातचीत तभी करेगा, जब हवाना “मौलिक बदलाव” के लिए तैयार होगा। बताया जा रहा है कि अमेरिका एक तरफ मानवीय सहायता और राहत पैकेज की पेशकश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर उसने क्यूबा पर ऊर्जा दबाव भी बढ़ा दिया है। तेल आपूर्ति पर असर, बढ़ा संकट अमेरिकी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनावों के कारण क्यूबा को वेनेजुएला समेत अन्य स्रोतों से मिलने वाली तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसके चलते देश में डीजल और ईंधन की भारी कमी हो गई है। क्यूबा के ऊर्जा मंत्री विसेंटे डे ला ओ लेवी ने स्वीकार किया है कि देश गंभीर ईंधन संकट का सामना कर रहा है। हालात इतने खराब हैं कि कई शहरों में लंबी बिजली कटौती लागू करनी पड़ी है, जिससे आम जनजीवन प्रभावित हुआ है। अमेरिका क्यूबा में क्या चाहता है? विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका लंबे समय से क्यूबा में एक अधिक “मित्रवत” और पश्चिम समर्थक शासन चाहता रहा है। ट्रंप प्रशासन के दौरान क्यूबा के खिलाफ सख्त नीति अपनाई गई थी। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio भी लंबे समय से हवाना के कम्युनिस्ट नेतृत्व के आलोचक रहे हैं। रुबियो का मानना रहा है कि क्यूबा का मौजूदा कम्युनिस्ट ढांचा खुद को सुधार नहीं सकता और वहां राजनीतिक बदलाव जरूरी है। क्या सत्ता परिवर्तन की ओर बढ़ रहा क्यूबा? अब तक अमेरिका या क्यूबा की ओर से “सत्ता परिवर्तन” को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन CIA प्रमुख की यह यात्रा ऐसे समय हुई है जब देश आर्थिक संकट, ऊर्जा संकट और जन असंतोष से जूझ रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आर्थिक हालात और बिगड़े, तो क्यूबा में राजनीतिक दबाव और बढ़ सकता है।  

surbhi मई 16, 2026 0
Massive blackout in Havana as Cuba faces severe diesel and fuel oil shortage crisis
ईंधन संकट से जूझ रहा क्यूबा, डीजल और फ्यूल ऑयल पूरी तरह खत्म; राजधानी में 22 घंटे तक ब्लैकआउट

ऊर्जा मंत्री ने कहा- देश की स्थिति बेहद गंभीर Cuba में ऊर्जा संकट अब चरम पर पहुंच गया है। देश के ऊर्जा मंत्री Vicente de la O Levy ने कहा है कि क्यूबा में डीजल और फ्यूल ऑयल पूरी तरह खत्म हो चुका है। उन्होंने सरकारी मीडिया से बातचीत में बताया कि देश का पावर ग्रिड “क्रिटिकल स्थिति” में पहुंच गया है और ईंधन का कोई रिजर्व नहीं बचा है। हवाना में 20 से 22 घंटे तक बिजली कटौती राजधानी Havana में हालात सबसे ज्यादा खराब बताए जा रहे हैं। कई इलाकों में रोजाना 20 से 22 घंटे तक बिजली गुल रहने की खबर है। लगातार हो रही बिजली कटौती के खिलाफ बुधवार को कई जगहों पर लोगों ने प्रदर्शन भी किया। प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर उतरकर बिजली बहाल करने की मांग की। अस्पताल, स्कूल और पर्यटन व्यवस्था प्रभावित ईंधन संकट का असर अब रोजमर्रा की जिंदगी पर साफ दिखाई देने लगा है। अस्पताल सामान्य तरीके से काम नहीं कर पा रहे हैं, जबकि कई स्कूल और सरकारी दफ्तर बंद करने पड़े हैं। पर्यटन उद्योग, जो क्यूबा की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार माना जाता है, वह भी इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। अमेरिका के प्रतिबंधों से बढ़ा संकट रिपोर्ट के मुताबिक, क्यूबा आमतौर पर Venezuela और Mexico से तेल आयात करता था। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा ईंधन सप्लाई करने वाले देशों पर टैरिफ की चेतावनी दिए जाने के बाद तेल आपूर्ति लगभग रुक गई। अमेरिका ने हाल के दिनों में क्यूबा के अधिकारियों पर नए प्रतिबंध भी लगाए हैं। वहीं अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने क्यूबा को 100 मिलियन डॉलर की मानवीय सहायता की पेशकश की, जिसे क्यूबा सरकार ने खारिज कर दिया। सौर ऊर्जा पर बढ़ती निर्भरता ऊर्जा मंत्री ने बताया कि क्यूबा फिलहाल घरेलू कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और रिन्यूएबल एनर्जी के सहारे बिजली व्यवस्था चलाने की कोशिश कर रहा है। पिछले दो वर्षों में देश ने 1300 मेगावॉट सोलर पावर क्षमता स्थापित की है, लेकिन ग्रिड अस्थिरता के कारण उसका पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है।  

surbhi मई 14, 2026 0
Donald Trump and Xi Jinping during a high-level meeting amid US-China geopolitical tensions
चीन दौरे पर ट्रंप, लेकिन इस बार शी जिनपिंग मजबूत स्थिति में! ईरान, ताइवान और ट्रेड बने बड़े मुद्दे

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump 13 से 15 मई तक चीन दौरे पर रहने वाले हैं। यह दौरा अमेरिका-चीन संबंधों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। करीब एक दशक बाद कोई मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति चीन जा रहा है। इससे पहले ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में 2017 में चीन का दौरा किया था। हालांकि ट्रंप कई बार चीन के खिलाफ सख्त बयान दे चुके हैं, लेकिन उन्होंने हाल के दिनों में चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping की खुलकर तारीफ भी की है। पिछले सप्ताह ट्रंप ने शी जिनपिंग को “अच्छा और समझदार व्यक्ति” बताया था और कहा था कि दोनों के रिश्ते काफी अच्छे हैं। लेकिन इस दोस्ताना बयानबाजी के पीछे कई बड़े वैश्विक दबाव छिपे हुए हैं। खासकर ईरान संकट, ताइवान विवाद और ट्रेड वॉर इस मुलाकात को बेहद संवेदनशील बना रहे हैं। ईरान संकट बना ट्रंप की बड़ी चुनौती ट्रंप के चीन दौरे पर सबसे बड़ा असर ईरान संकट का माना जा रहा है। अमेरिका लंबे समय से चीन पर दबाव बना रहा है कि वह तेहरान को समझाकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने और संघर्ष कम करने में मदद करे। हालांकि अब तक वॉशिंगटन को इसमें खास सफलता नहीं मिली है। अमेरिका की कोशिशों के बावजूद मध्य पूर्व में तनाव बना हुआ है और इसका असर वैश्विक तेल बाजारों पर भी पड़ रहा है। ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि शी जिनपिंग भी इस संकट का समाधान चाहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ ईरान ने अमेरिका को सख्त संदेश दिया है। ईरान के वरिष्ठ नेता अली अकबर वेलायती ने कहा कि अमेरिका यह न सोचे कि मौजूदा हालात का फायदा उठाकर वह बीजिंग में बड़ी कूटनीतिक जीत हासिल कर लेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय अमेरिका को चीन की जरूरत ज्यादा है, क्योंकि चीन ईरान का बड़ा आर्थिक साझेदार है और वह बड़ी मात्रा में ईरानी तेल खरीदता है। ताइवान मुद्दे पर चीन बना सकता है दबाव विश्लेषकों का कहना है कि अगर चीन ईरान मुद्दे पर अमेरिका की मदद करता है तो बदले में वह ताइवान को लेकर रियायत मांग सकता है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और अमेरिका-ताइवान संबंधों पर लगातार आपत्ति जताता रहा है। ऐसे में बीजिंग ट्रंप की मौजूदा कूटनीतिक मजबूरी का फायदा उठाने की कोशिश कर सकता है। यह बैठक इस बात की भी परीक्षा मानी जा रही है कि ट्रंप चीन से सहयोग पाने के लिए कितनी दूर तक समझौता करने को तैयार हैं। ट्रेड वॉर और रेयर अर्थ पर भी होगी बड़ी बातचीत अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर भी इस मुलाकात का अहम मुद्दा रहेगा। पिछले साल दोनों देशों के बीच टैरिफ युद्ध ने वैश्विक बाजारों को हिला दिया था। अमेरिका ने चीनी सामानों पर 145 प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिए थे, जिसके जवाब में चीन ने रेयर अर्थ मिनरल्स के निर्यात पर सख्ती बढ़ा दी थी। इन मिनरल्स का इस्तेमाल अमेरिकी टेक्नोलॉजी और रक्षा उद्योग में बड़े पैमाने पर होता है। चीन की इस रणनीति से कई अमेरिकी फैक्ट्रियों पर असर पड़ा था। अब दोनों देश रिश्तों को कुछ हद तक स्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका चाहता है कि चीन ज्यादा अमेरिकी कृषि और ऊर्जा उत्पाद खरीदे, जबकि चीन अमेरिकी तकनीक तक पहुंच और एक्सपोर्ट प्रतिबंधों में राहत चाहता है। बोइंग डील पर भी टिकी नजरें रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन और अमेरिका के बीच बड़ी एविएशन डील की भी संभावना है। चीन करीब 500 Boeing 737 Max विमान खरीदने पर विचार कर रहा है। अगर यह समझौता होता है तो यह 2017 के बाद बोइंग के लिए चीन का सबसे बड़ा ऑर्डर होगा। क्या ट्रंप को मिलेगा कूटनीतिक फायदा? ट्रंप की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब आलोचक उनकी विदेश नीति को लेकर सवाल उठा रहे हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और ईरान जैसे देशों ने अमेरिका को कई मुद्दों पर रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि बीजिंग में होने वाली ट्रंप-शी मुलाकात वैश्विक राजनीति, व्यापार और सुरक्षा समीकरणों को किस दिशा में ले जाती है।  

surbhi मई 13, 2026 0
Oil refinery and fuel price board amid rising global crude oil prices due to Middle East tensions
मिडिल ईस्ट संकट का असर: पाकिस्तान से अमेरिका तक तेल के दाम में भारी उछाल, कई देशों में 50% से ज्यादा बढ़ोतरी

Strait of Hormuz में बढ़ते तनाव और Iran, United States तथा Israel के बीच जारी टकराव का असर अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। दुनिया के करीब 20 फीसदी कच्चे तेल की सप्लाई इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है। जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल के दामों पर पड़ रहा है। कई देशों में तेल की कीमतें आसमान पर हालिया आंकड़ों के अनुसार कई देशों में ईंधन की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी Malaysia – 56% Pakistan – 55% United Arab Emirates – 52% United States – 45% Canada – 32% China – 22% United Kingdom – 19% रिपोर्ट्स के मुताबिक दुनिया के लगभग 85 देशों में ईंधन की कीमतें बढ़ी हैं। कई देशों में अभी और संशोधन बाकी हैं, इसलिए आने वाले हफ्तों में कीमतें और बढ़ सकती हैं। पाकिस्तान और मलेशिया में सबसे ज्यादा असर विशेषज्ञों के मुताबिक पाकिस्तान और मलेशिया जैसे देशों की अर्थव्यवस्था आयातित ईंधन पर काफी निर्भर है। ऐसे में वैश्विक सप्लाई चेन बाधित होने का असर वहां सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है। इन देशों में ट्रांसपोर्ट, बिजली और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बढ़ने लगा है। अमेरिका और यूरोप में भी महंगाई का खतरा अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में करीब 45% तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जारी रहा तो ऊर्जा संकट और महंगाई दोनों बढ़ सकते हैं। United Kingdom और यूरोप के अन्य देशों में भी तेल की बढ़ती कीमतें आर्थिक चिंता का बड़ा कारण बन रही हैं। भारत में फिलहाल कीमतें स्थिर दूसरी ओर India में फिलहाल पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं हुई है। Delhi समेत कई शहरों में पिछले करीब डेढ़ साल से ईंधन की कीमतें लगभग स्थिर बनी हुई हैं। आखिरी बड़ा बदलाव अक्टूबर 2024 में देखा गया था। रिपोर्ट्स के अनुसार इस दौरान भारत में पेट्रोल की कीमत में केवल मामूली बढ़ोतरी दर्ज हुई है। आने वाले दिनों में और बढ़ सकती है चिंता ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ता है या होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तो वैश्विक तेल बाजार में और अस्थिरता आ सकती है। इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि परिवहन, खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।  

surbhi मई 13, 2026 0
Donald Trump speaking to media amid rising US-Iran tensions and military conflict debate
“ये अमेरिकी कायर हैं...”, ईरान युद्ध के बीच ट्रंप का बड़ा बयान, आलोचकों पर साधा निशाना

Donald Trump ने ईरान के साथ जारी तनाव के बीच अमेरिका की सैन्य ताकत पर सवाल उठाने वालों पर तीखा हमला बोला है। चीन दौरे पर रवाना होने से पहले ट्रंप ने कहा कि जो लोग यह दावा कर रहे हैं कि ईरान सैन्य मोर्चे पर अमेरिका के खिलाफ बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, वे “देशद्रोही” मानसिकता दिखा रहे हैं। ट्रंप ने कहा: “ये अमेरिकी कायर हैं जो हमारे देश के खिलाफ हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे बयान ईरान को “झूठी उम्मीद” देते हैं, जबकि वास्तविक स्थिति बिल्कुल अलग है। “ईरान की नेवी और एयर फोर्स खत्म” ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई ने ईरान की नौसैनिक और वायु सैन्य क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। उनके मुताबिक: ईरान के 159 नौसैनिक जहाज अब नष्ट हो चुके हैं ईरानी एयर फोर्स लगभग खत्म हो गई है सैन्य तकनीक और नेतृत्व को भारी नुकसान हुआ है हालांकि ट्रंप के इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ईरान की आर्थिक स्थिति पर भी टिप्पणी ट्रंप ने कहा कि ईरान अब आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि केवल “लूजर और एहसान फरामोश लोग” ही अमेरिका की सैन्य क्षमता पर सवाल उठा सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान को घरेलू आलोचकों और विपक्षी नेताओं पर सीधा हमला माना जा रहा है। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी किया बचाव इस बीच Pete Hegseth ने भी ट्रंप प्रशासन की सैन्य रणनीति का बचाव किया। सीनेट एप्रोप्रिएशन सबकमेटी के सामने पेश होते हुए उन्होंने कहा कि बढ़ती लागत और Strait of Hormuz में तनाव के बावजूद अमेरिका के पास अभी भी “सभी कार्ड” मौजूद हैं। इंडो-पैसिफिक सहयोगियों को संदेश पीट हेगसेथ ने Dan Caine के साथ सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपने सहयोगियों को भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा है। यह बयान ऐसे समय आया है जब ट्रंप का प्रस्तावित चीन दौरा वैश्विक राजनीति और सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। बढ़ते तनाव से वैश्विक चिंता अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक बाजारों, तेल कीमतों और पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष और बढ़ा, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।  

surbhi मई 13, 2026 0
Pentagon building and military operations imagery amid rising US-Iran conflict spending concerns
ईरान युद्ध पर अमेरिका का बढ़ता खर्च चिंता का कारण, पेंटागन के आंकड़ों ने बढ़ाई बहस

United States और Iran के बीच बढ़ते तनाव का असर अब सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका आर्थिक दबाव भी तेजी से बढ़ रहा है। United States Department of Defense (पेंटागन) ने हाल ही में इस संघर्ष की लागत 29 अरब डॉलर बताई है। खास बात यह है कि दो हफ्ते पहले यही अनुमान 25 अरब डॉलर था। यानी केवल 14 दिनों में खर्च का अनुमान 4 अरब डॉलर बढ़ गया। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों के अनुसार नए आंकड़ों में हथियारों की मरम्मत, पुराने उपकरणों को बदलने और सैन्य ऑपरेशन की लागत को शामिल किया गया है। विशेषज्ञ बोले- असली खर्च कहीं ज्यादा हो सकता है हालांकि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार द्वारा बताए जा रहे आंकड़े वास्तविक लागत से काफी कम हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार पहले जारी किए गए 25 अरब डॉलर के अनुमान में मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हुए नुकसान और उनकी मरम्मत का खर्च पूरी तरह शामिल नहीं था। इसी वजह से अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या अमेरिकी प्रशासन जनता के सामने युद्ध की वास्तविक आर्थिक तस्वीर नहीं रख रहा। हार्वर्ड विशेषज्ञ ने जताई 1 ट्रिलियन डॉलर खर्च की आशंका Harvard Kennedy School की सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ Linda Bilmes ने चेतावनी दी है कि यह युद्ध अमेरिकी टैक्सपेयर्स पर कम से कम 1 ट्रिलियन डॉलर का बोझ डाल सकता है। उनके मुताबिक इतिहास बताता है कि युद्धों की वास्तविक लागत शुरुआती अनुमानों से कई गुना ज्यादा होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि इराक युद्ध को शुरू में सस्ता बताया गया था, लेकिन बाद में उसकी लागत 5 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा पहुंच गई। क्यों तेजी से बढ़ रहा है सैन्य खर्च? विशेषज्ञों के अनुसार युद्ध की लागत कई स्तरों पर बढ़ती है। अल्पकालिक खर्च मिसाइल और बम इंटरसेप्टर सिस्टम लड़ाकू विमानों का रखरखाव सैनिकों का वेतन और तैनाती सबसे महंगी चीज- हथियारों की रिप्लेसमेंट कॉस्ट उदाहरण के तौर पर, सेना के स्टॉक में मौजूद Tomahawk missile की पुरानी लागत करीब 20 लाख डॉलर थी, लेकिन अब उसी मिसाइल को दोबारा बनाने या खरीदने में 35 लाख डॉलर तक खर्च हो रहा है। दीर्घकालिक खर्च सैन्य ठिकानों की मरम्मत नई रक्षा तकनीकों की खरीद मध्य पूर्व में तैनात लगभग 55,000 अमेरिकी सैनिकों की स्वास्थ्य सेवाएं पूर्व सैनिक कल्याण (Veterans Care) विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध खत्म होने के बाद भी इसका आर्थिक बोझ कई वर्षों तक बना रहता है। आम अमेरिकी नागरिक पर भी पड़ रहा असर युद्ध का असर अब अमेरिकी आम जनता की जिंदगी में भी दिखाई देने लगा है। ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रह सकती हैं। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर तनाव कम नहीं हुआ तो अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत 5 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच सकती है। इसका सीधा असर महंगाई, ट्रांसपोर्ट खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।  

surbhi मई 13, 2026 0
Security personnel and rescue teams at blast site after suicide attack in Pakistan’s Khyber Pakhtunkhwa
पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में आत्मघाती हमला, 8 लोगों की मौत, 35 से ज्यादा घायल

Pakistan के Khyber Pakhtunkhwa प्रांत में मंगलवार को बड़ा आत्मघाती हमला हुआ। लक्की मारवत जिले के नौरंग बाजार इलाके में हुए इस विस्फोट में कम से कम 8 लोगों की मौत हो गई, जबकि 35 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं। पुलिस के मुताबिक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से भरे ऑटो रिक्शा में धमाका किया। धमाका इतना जोरदार था कि आसपास के इलाके में अफरा-तफरी मच गई। सुरक्षा अधिकारी और महिला समेत कई लोगों की मौत अधिकारियों के अनुसार मृतकों में दो सुरक्षा अधिकारी और एक महिला भी शामिल हैं। कई घायलों की हालत गंभीर बताई जा रही है, जिसके चलते मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। धमाका नौरंग बाजार के फाटक चौक इलाके में हुआ, जो उस समय काफी भीड़भाड़ वाला क्षेत्र था। गंभीर घायलों को पेशावर और बन्नू रेफर किया गया घायलों को पहले सराय नौरंग के तहसील मुख्यालय अस्पताल में भर्ती कराया गया। बाद में जिन लोगों की हालत ज्यादा गंभीर थी, उन्हें Bannu और Peshawar के अस्पतालों में रेफर किया गया। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक कई घायलों की हालत अब भी नाजुक बनी हुई है। अस्पतालों में आपातकाल घोषित विस्फोट के बाद इलाके के अस्पतालों में इमरजेंसी घोषित कर दी गई। सभी डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ को तत्काल ड्यूटी पर बुलाया गया। राहत एवं बचाव एजेंसी Rescue 1122 की कई टीमें मौके पर पहुंचीं और घायलों को अस्पताल पहुंचाने का काम शुरू किया गया। मुख्यमंत्री ने मांगी रिपोर्ट खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री Mohammad Suhail Afridi ने घटना पर दुख जताते हुए पुलिस महानिरीक्षक से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। उन्होंने कहा कि प्रांतीय सरकार पीड़ित परिवारों के साथ खड़ी है और घायलों के इलाज समेत हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। इलाके में बढ़ाई गई सुरक्षा हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे इलाके की घेराबंदी कर जांच शुरू कर दी है। बाजार और आसपास के इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है, जबकि हमले के पीछे शामिल नेटवर्क की तलाश जारी है।  

surbhi मई 13, 2026 0
Donald Trump announces temporary Russia-Ukraine ceasefire agreement and prisoner exchange amid ongoing war
रूस-यूक्रेन में 3 दिन का सीजफायर, ट्रंप बोले- मेरे कहने पर बनी सहमति

रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के बीच तीन दिन के युद्धविराम का ऐलान किया गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि उनकी पहल और मध्यस्थता के बाद दोनों देशों ने अस्थायी सीजफायर पर सहमति जताई है. ट्रंप के मुताबिक, यह युद्धविराम 9, 10 और 11 मई तक लागू रहेगा. इस दौरान दोनों देशों के बीच सभी सैन्य गतिविधियां रोकी जाएंगी और युद्धबंदियों की अदला-बदली भी की जाएगी. ट्रंप ने किया सीजफायर का ऐलान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर पोस्ट कर कहा, “मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध में तीन दिन का सीजफायर होगा.” उन्होंने कहा कि रूस में यह अवधि “विक्ट्री डे” समारोह के कारण महत्वपूर्ण है, जबकि यूक्रेन भी द्वितीय विश्व युद्ध का अहम हिस्सा रहा है. ट्रंप ने दावा किया कि युद्धविराम के लिए अनुरोध उन्होंने सीधे किया था और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तथा यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की दोनों ने इस पर सहमति जताई. 1,000-1,000 युद्धबंदियों की अदला-बदली सीजफायर के तहत दोनों देशों के बीच 1,000-1,000 युद्धबंदियों की अदला-बदली भी होगी. ट्रंप ने कहा कि इस दौरान सभी “काइनेटिक एक्टिविटी” यानी सैन्य हमलों और लड़ाई को पूरी तरह रोका जाएगा. उन्होंने उम्मीद जताई कि यह समझौता लंबे और विनाशकारी युद्ध को समाप्त करने की दिशा में पहला बड़ा कदम साबित हो सकता है. जेलेंस्की ने भी की पुष्टि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने भी इस अस्थायी युद्धविराम की पुष्टि की है. उन्होंने टेलीग्राम पर लिखा कि अमेरिकी मध्यस्थता में चल रही बातचीत के तहत रूस ने युद्धबंदियों की अदला-बदली पर सहमति दी है. जेलेंस्की ने कहा, “हमें 1,000 के बदले 1,000 युद्धबंदियों की अदला-बदली के लिए रूस की मंजूरी मिल गई है.” उन्होंने इसे शांति वार्ता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया. युद्ध खत्म करने की कोशिशें तेज ट्रंप ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह सबसे बड़ा सैन्य संघर्ष है और इसे खत्म करने के लिए लगातार बातचीत चल रही है. उन्होंने लिखा, “हम हर दिन युद्ध खत्म होने के और करीब पहुंच रहे हैं.” हालांकि यह सीजफायर फिलहाल केवल तीन दिनों के लिए है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे संभावित व्यापक शांति समझौते की शुरुआत के रूप में देख रहा है.  

surbhi मई 9, 2026 0
Australian Federal Police detain women linked to ISIS after arrival at Melbourne International Airport
ISIS से जुड़ी महिलाओं की ऑस्ट्रेलिया वापसी, एयरपोर्ट पर ही तीन गिरफ्तार

ऑस्ट्रेलिया में उस समय बड़ा सुरक्षा और कानूनी मामला सामने आया, जब सीरिया में आतंकी संगठन Islamic State से जुड़ी महिलाओं को वापस लाया गया और मेलबर्न एयरपोर्ट पर उतरते ही तीन महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया गया. इन पर मानवता के खिलाफ अपराध, गुलामी और आतंकी संगठन का समर्थन करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं. एयरपोर्ट पर उतरते ही गिरफ्तारी ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों के मुताबिक, ये महिलाएं गुरुवार शाम Qatar Airways की फ्लाइट से Melbourne International Airport पहुंचीं. जैसे ही वे एयरपोर्ट पर उतरीं, ऑस्ट्रेलियाई फेडरल पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. पुलिस ने बताया कि गिरफ्तार महिलाओं में: 53 वर्षीय एक महिला उसकी 31 वर्षीय बेटी और 32 वर्षीय जनई सफर शामिल हैं. इनके साथ चार अन्य महिलाएं और नौ बच्चे भी ऑस्ट्रेलिया लौटे हैं. “गुलाम” बनाकर रखने का आरोप जांच एजेंसियों के अनुसार, 53 वर्षीय महिला पर आरोप है कि उसने सीरिया में लगभग 10,000 अमेरिकी डॉलर देकर एक महिला को “गुलाम” के रूप में खरीदा था. वहीं उसकी बेटी पर आरोप है कि उसने जानबूझकर उस महिला को अपने घर में गुलाम बनाकर रखा. ऑस्ट्रेलियाई फेडरल पुलिस के काउंटर-टेररिज्म अधिकारियों ने इसे “मानवता के खिलाफ अपराध” बताया है. ISIS के शासन में गई थीं सीरिया पुलिस के अनुसार, मां और बेटी 2014 में सीरिया गई थीं, जहां उन्होंने ISIS के तथाकथित “खलीफा शासन” का समर्थन किया. तीसरी आरोपी जनई सफर पर आरोप है कि वह 2015 में अपने पति के पास सीरिया गई थी, जो ISIS का लड़ाका था. उस पर प्रतिबंधित क्षेत्र में जाने और आतंकी संगठन में शामिल होने का आरोप लगाया गया है. रोज कैंप में रह रही थीं महिलाएं ये महिलाएं 2019 में ISIS के पतन के बाद कुर्द बलों द्वारा पकड़ी गई थीं. तब से वे सीरिया के कुख्यात Roj Camp में रह रही थीं. रोज कैंप में ISIS से जुड़े परिवारों, महिलाओं और बच्चों को रखा जाता है. लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन कैंपों को लेकर मानवाधिकार और सुरक्षा को लेकर बहस होती रही है. ऑस्ट्रेलिया में छिड़ी नई बहस इन महिलाओं की वापसी के बाद ऑस्ट्रेलिया में “ISIS ब्राइड्स” को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है. ऑस्ट्रेलियाई गृह मंत्री Tony Burke ने कहा कि इन महिलाओं ने एक खतरनाक आतंकी संगठन का साथ देने का “भयानक फैसला” किया था. वहीं मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि कैंपों में फंसे बच्चों और महिलाओं को मानवीय आधार पर वापस लाना जरूरी है, खासकर उन बच्चों के लिए जो संघर्ष क्षेत्र में पैदा हुए. कानून के तहत होगी सख्त कार्रवाई ऑस्ट्रेलिया में 2010 के दशक के दौरान सीरिया के ISIS-नियंत्रित इलाकों की यात्रा को अपराध घोषित कर दिया गया था. इसी वजह से लौटने वाले लोगों पर आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में मुकदमे चलाए जा रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया इससे पहले भी 2019, 2022 और 2025 में सीरिया से कुछ महिलाओं और बच्चों को वापस ला चुका है, लेकिन इस बार लगे आरोप कहीं ज्यादा गंभीर माने जा रहे हैं.  

surbhi मई 8, 2026 0
murder of a five-year-old Indigenous girl
ऑस्ट्रेलिया में 5 साल की बच्ची की हत्या के बाद हिंसा, गुस्साई भीड़ ने मचाया बवाल

Violence in Australia: ऑस्ट्रेलिया के सिडनी और नॉर्दर्न टेरिटरी क्षेत्र में उस समय तनाव फैल गया, जब 5 साल की एक आदिवासी बच्ची की हत्या के मामले ने हिंसक रूप ले लिया. बच्ची की हत्या के आरोप में एक व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आये और कई जगहों पर हिंसा व झड़पें देखने को मिलीं. बच्ची की हत्या से भड़का गुस्सा रिपोर्ट्स के मुताबिक, बच्ची शनिवार देर शाम लापता हो गयी थी. बाद में पुलिस ने उसका शव बरामद किया. नॉर्दर्न टेरिटरी के पुलिस कमिश्नर मार्टिन डोल ने बताया कि जेफरसन लुईस नामक व्यक्ति पर बच्ची के अपहरण और हत्या का आरोप है. बताया गया कि आरोपी खुद एलिस स्प्रिंग्स के एक टाउन कैंप में पहुंचा था, जिसके बाद स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा फैल गया. आरोपी की भीड़ ने की पिटाई गुस्साई भीड़ ने आरोपी को पकड़कर बुरी तरह पीटा, जिससे वह बेहोश हो गया. बाद में उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया. इसी दौरान अस्पताल के बाहर बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग जमा हो गये. रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब 400 लोगों की भीड़ ने इलाके में विरोध प्रदर्शन किया और आरोपी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की. पुलिस और प्रदर्शनकारियों में झड़प प्रदर्शन के दौरान हालात हिंसक हो गये. भीड़ ने पत्थरबाजी की और पुलिस वाहनों, एंबुलेंस तथा फायर ब्रिगेड की गाड़ियों को नुकसान पहुंचाया. झड़प में कई पुलिसकर्मी और मेडिकल स्टाफ घायल हुए. स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया और प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर किया. “पेबैक” की मांग ऑस्ट्रेलियाई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान कुछ लोग “पेबैक” की मांग कर रहे थे. आदिवासी समुदायों में “पेबैक” का मतलब पारंपरिक या शारीरिक सजा से होता है. घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर भी सामने आये, जिनमें भीड़ आरोपी के खिलाफ गुस्सा जाहिर करती दिखाई दी. जंगल में चला सर्च ऑपरेशन बच्ची के लापता होने के बाद सैकड़ों लोगों ने घने जंगलों में तलाशी अभियान चलाया था. बाद में पुलिस और स्थानीय लोगों की मदद से बच्ची का शव बरामद किया गया. पुलिस ने सुरक्षा कारणों से आरोपी जेफरसन लुईस को नॉर्दर्न टेरिटरी की राजधानी डार्विन भेज दिया है. पीएम ने की शांति की अपील ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री Anthony Albanese ने घटना पर दुख जताते हुए कहा कि वह लोगों के गुस्से और दर्द को समझते हैं. उन्होंने समुदाय से शांति और एकजुटता बनाये रखने की अपील की. वहीं पुलिस कमिश्नर मार्टिन डोल ने भी लोगों से कानून अपने हाथ में न लेने की अपील की है. पूरे इलाके में तनाव फिलहाल इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है और स्थिति पर नजर रखी जा रही है. इस घटना ने ऑस्ट्रेलिया में आदिवासी समुदायों की सुरक्षा, सामाजिक तनाव और कानून-व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है.  

surbhi मई 7, 2026 0
Chinese naval warships operating near Taiwan amid rising Indo-Pacific military tensions
ताइवान के पास बढ़ी चीनी सैन्य गतिविधि, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में फिर बढ़ा तनाव

Indo-Pacific Tension: मिडिल ईस्ट में ईरान-अमेरिका तनाव के बीच अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है. ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने दावा किया है कि उसके आसपास चीन के सात नौसैनिक युद्धपोत और एक सरकारी पोत सक्रिय पाए गए हैं. इस घटनाक्रम ने एक बार फिर क्षेत्रीय सुरक्षा और चीन-ताइवान संबंधों को लेकर चिंता बढ़ा दी है. ताइवान के आसपास दिखे चीनी युद्धपोत ताइवान के रक्षा मंत्रालय (MND) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी देते हुए कहा कि ताइवान के आसपास सात PLAN (People’s Liberation Army Navy) जहाज और एक आधिकारिक पोत की गतिविधि दर्ज की गयी है. मंत्रालय ने कहा कि ताइवान की सशस्त्र सेनाओं ने पूरी स्थिति पर नजर रखी और आवश्यक प्रतिक्रिया दी. हालांकि इस दौरान चीनी वायुसेना की कोई गतिविधि दर्ज नहीं की गयी. लगातार दूसरे दिन बढ़ी सैन्य गतिविधि यह लगातार दूसरा दिन है जब ताइवान के आसपास चीनी सैन्य गतिविधि देखी गयी है. इससे एक दिन पहले भी ताइवान ने एक चीनी सैन्य विमान, छह नौसैनिक जहाज और एक सरकारी पोत की मौजूदगी दर्ज की थी. ताइवान के मुताबिक, उस दौरान एक चीनी सैन्य विमान ताइवान के एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन जोन (ADIZ) के उत्तरी हिस्से में भी प्रवेश कर गया था. इसे क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाला संकेत माना जाता है. चीन की “ग्रे ज़ोन” रणनीति? विशेषज्ञों का मानना है कि चीन अब ताइवान पर दबाव बनाने के लिए “ग्रे ज़ोन टैक्टिक्स” का इस्तेमाल कर रहा है. इसका मतलब है कि बिना खुला युद्ध छेड़े लगातार सैन्य मौजूदगी और गतिविधियों के जरिए दबाव बनाना. इस रणनीति के तहत चीन नियमित रूप से अपने नौसैनिक जहाजों और विमानों को ताइवान के आसपास भेजता है, ताकि सैन्य और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सके. विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस बार केवल नौसैनिक गतिविधि और वायुसेना की अनुपस्थिति यह संकेत देती है कि चीन फिलहाल सीमित लेकिन लगातार दबाव की नीति अपना रहा है. ताइवान ने कहा- स्थिति पर नजर ताइवान की सेना ने कहा कि उसने पूरी स्थिति पर नजर रखी और जरूरत के मुताबिक जवाबी कदम उठाये. हालांकि सेना ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उसकी प्रतिक्रिया क्या रही. लगातार दो दिनों तक चीनी नौसैनिक गतिविधियों के बढ़ने से यह संकेत मिल रहे हैं कि बीजिंग क्षेत्र में अपना दबदबा लगातार दिखाना चाहता है. ताइवान-चीन विवाद क्या है? चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और “वन चाइना पॉलिसी” के तहत उस पर दावा करता है. दूसरी तरफ ताइवान खुद को अलग लोकतांत्रिक शासन वाला क्षेत्र मानता है, जिसकी अपनी सरकार, सेना और आर्थिक व्यवस्था है. इतिहास के अनुसार, 1895 में चीन-जापान युद्ध के बाद ताइवान जापान के नियंत्रण में चला गया था. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह फिर चीन के प्रभाव में आया, लेकिन इसकी राजनीतिक स्थिति को लेकर विवाद आज तक जारी है. इंडो-पैसिफिक में बढ़ी वैश्विक चिंता मिडिल ईस्ट संकट के बीच हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की चिंता भी बढ़ा दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह गतिविधियां लगातार बढ़ती रहीं, तो आने वाले समय में बड़े सैन्य अभ्यास या और आक्रामक कदम भी देखने को मिल सकते हैं.  

surbhi मई 7, 2026 0
IAS officers posting delay
12 आईएएस समेत 72 अफसरों को पोस्टिंग का इंतजार

रांची। राज्य भर में प्रशासनिक सेवा के 72 अधिकारी बिना पोस्टिंग के बैठे हैं, जबकि कई महत्वपूर्ण पद खाली पड़े हैं। इन 72 अधिकारियों में 12 आईएएस अधिकारी हैं। 17 अप्रैल की रात राज्य सरकार ने 17 जिलों के उपायुक्तों का तबादला किया था। उस तबादला में 11 जिलों के डीसी की कहीं पदस्थापना नहीं हुई थी। उन्हें मुख्यालय में योगदान करने का निर्देश दिया गया था। कार्मिक विभाग में योगदान के बाद वे अबतक पदस्थापन की प्रतीक्षा में हैं। उनकी कहीं पोस्टिंग नहीं हुई है। इसके अलावा कृषि विभाग में बदलाव के बाद जीशान कमर भी वेटिंग फॉर पोस्टिंग में बैठे हैं। JAS के 60 अफसर पोस्टिंग के इंतजार मे इसके अलावा झारखंड प्रशासनिक सेवा के 60 अधिकारी भी पोस्टिंग की प्रतीक्षा में हैं। इधर, ट्रेनिंग पूरा होने के ढाई साल बाद भी 39 नवनियुक्त डीएसपी को पोस्टिंग नहीं मिल सकी है। राज्य के कई अनुमंडलों में एसडीएम के पद खाली हैं। कई महत्वपूर्ण पद प्रभार में हैं। सचिवालय सेवा के करीब डेढ़ दर्जन अधिकारी भी पोस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं।

Anjali Kumari मई 7, 2026 0
Chinese and Iranian foreign ministers meeting in Beijing to discuss Middle East ceasefire and regional tensions
युद्ध के बाद पहली बार चीन-ईरान की बड़ी बैठक, युद्धविराम पर हुई अहम चर्चा

Middle East Conflict: ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव और युद्ध जैसे हालात के बीच चीन और ईरान के विदेश मंत्रियों की पहली अहम मुलाकात हुई है. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बीजिंग पहुंचकर चीन के विदेश मंत्री वांग यी से बातचीत की. दोनों नेताओं के बीच मिडिल ईस्ट की मौजूदा स्थिति, युद्धविराम और शांति प्रक्रिया को लेकर विस्तृत चर्चा हुई. वांग यी ने कहा- व्यापक युद्धविराम जरूरी बीजिंग में हुई बैठक के दौरान चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि दो महीने से ज्यादा समय से जारी संघर्ष को अब रोका जाना चाहिए. उन्होंने जोर देकर कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए व्यापक युद्धविराम बेहद जरूरी है. वांग यी ने कहा कि दुश्मनी का दोबारा शुरू होना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए और सभी पक्षों को बातचीत और कूटनीतिक समाधान के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए. युद्ध शुरू होने के बाद पहली उच्चस्तरीय मुलाकात 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद यह पहली बार है जब ईरान और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच आमने-सामने बातचीत हुई है. चीन लंबे समय से ईरान का महत्वपूर्ण आर्थिक और राजनीतिक साझेदार रहा है. ऐसे में इस मुलाकात को मिडिल ईस्ट संकट के बीच बेहद अहम माना जा रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन ने क्षेत्रीय स्थिरता बनाये रखने और तनाव कम करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने के संकेत दिये हैं. चीन ने शांति वार्ता पर दिया जोर न्यूज एजेंसी AP के अनुसार, बैठक के दौरान चीनी पक्ष ने स्पष्ट कहा कि बातचीत और समझौते के जरिए ही इस संकट का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है. चीन ने कहा कि युद्धविराम को मजबूत करना और सभी पक्षों को संवाद की प्रक्रिया में शामिल रखना बेहद जरूरी है, ताकि मिडिल ईस्ट में बड़ा युद्ध टाला जा सके. अमेरिका और ईरान के बीच 14 सूत्रीय समझौते की चर्चा इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गयी हैं. सूत्रों के मुताबिक, दोनों देश 14 सूत्रीय समझौते की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. बताया जा रहा है कि अमेरिका ने ईरान से अपने परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को लंबे समय तक रोकने की मांग की है. अमेरिकी पक्ष चाहता है कि ईरान कम से कम 20 वर्षों तक परमाणु संवर्धन गतिविधियों को बंद रखे. वहीं ईरान कथित तौर पर पांच वर्षों तक कार्यक्रम सीमित रखने के प्रस्ताव पर सहमत होने की बात कर रहा है. हालांकि अब तक किसी औपचारिक समझौते की पुष्टि नहीं हुई है. मिडिल ईस्ट में बढ़ी वैश्विक चिंता ईरान-अमेरिका तनाव और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े संकट ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. वैश्विक शक्तियां लगातार युद्धविराम और कूटनीतिक समाधान की अपील कर रही हैं, क्योंकि इस संघर्ष का असर तेल आपूर्ति, वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है.  

surbhi मई 7, 2026 0
Donald Trump speaking on Middle East tensions and warning Iran over the Strait of Hormuz crisis
ट्रंप की ईरान को खुली चेतावनी, बोले- समझौता नहीं किया तो होगी भीषण बमबारी

Middle East Conflict: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को एक बार फिर कड़ी चेतावनी दी है. ट्रंप ने कहा है कि अगर ईरान अमेरिका की शर्तों को नहीं मानता और होर्मुज स्ट्रेट को नहीं खोलता, तो उस पर पहले से ज्यादा तीव्र और ताकतवर बमबारी की जाएगी. डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि यदि ईरान तय शर्तों को स्वीकार कर लेता है, तो अमेरिकी सैन्य अभियान “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” को समाप्त कर दिया जाएगा और होर्मुज स्ट्रेट को ईरान सहित सभी देशों के लिए फिर से खोल दिया जाएगा. ट्रंप बोले- नहीं माने तो बरसेंगे बम ट्रंप ने अपने पोस्ट में साफ कहा कि अगर ईरान समझौते पर सहमत नहीं होता है, तो अमेरिका की सैन्य कार्रवाई और ज्यादा आक्रामक होगी. उन्होंने कहा कि अमेरिका किसी भी कीमत पर वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को बाधित नहीं होने देगा. उन्होंने लिखा कि “अगर ईरान सहमत नहीं होता, तो बमबारी पहले से कहीं अधिक ताकतवर होगी.” ट्रंप के इस बयान के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ गया है. ईरान ने भी दी चेतावनी ट्रंप का यह बयान ईरानी संसद अध्यक्ष एमबी गालिबफ की टिप्पणी के बाद आया है. गालिबफ ने कहा था कि होर्मुज स्ट्रेट को लेकर “नया समीकरण” तैयार हो रहा है और अमेरिका की नाकाबंदी नीति उसके लिए भारी साबित होगी. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि अमेरिका और उसके सहयोगियों ने युद्धविराम का उल्लंघन कर क्षेत्र में तनाव बढ़ाया है. ईरान ने आरोप लगाया कि नाकाबंदी की वजह से जहाजों, तेल और गैस आपूर्ति की सुरक्षा प्रभावित हुई है. प्रोजेक्ट फ्रीडम अस्थायी रूप से रोका गया इस बीच ट्रंप प्रशासन ने होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की सुरक्षित निकासी के लिए शुरू किये गये “प्रोजेक्ट फ्रीडम” को फिलहाल अस्थायी रूप से रोक दिया है. ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच “पूर्ण और अंतिम समझौते” को लेकर बातचीत में कुछ प्रगति हुई है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान समेत कई देशों के अनुरोध और कूटनीतिक प्रयासों को देखते हुए यह फैसला लिया गया. हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि समुद्री नाकाबंदी अभी भी जारी रहेगी. पाकिस्तान ने ट्रंप को कहा धन्यवाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ट्रंप के फैसले का स्वागत किया है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि ट्रंप का यह कदम क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बढ़ावा देगा. शहबाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान हमेशा कूटनीति और संवाद के जरिए विवादों के समाधान का समर्थन करता है. उन्होंने उम्मीद जतायी कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी बातचीत से स्थायी शांति का रास्ता निकलेगा. होर्मुज स्ट्रेट क्यों अहम? होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है. वैश्विक तेल और गैस सप्लाई का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. ऐसे में यहां बढ़ता तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर असर डाल सकता है.  

surbhi मई 7, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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