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Football Heading May Affect Brain Biomarkers Temporarily

फुटबॉल में ‘हेडिंग’ से दिमाग पर असर: नए अध्ययन में मिला संकेत, बायोमार्कर में दिखे अस्थायी बदलाव

surbhi मई 23, 2026 0
Amateur football player heading the ball during a match as researchers study brain health effects
Football Heading and Brain Biomarker Study

शौकिया स्तर के फुटबॉल खिलाड़ियों पर किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में यह संकेत मिला है कि मैच के दौरान बार-बार की जाने वाली ‘हेडिंग’ (ball heading) गतिविधि से मस्तिष्क से जुड़े कुछ बायोमार्कर्स में अस्थायी बदलाव हो सकते हैं। यह बदलाव न्यूरल इंजरी और ब्रेन इंटेग्रिटी से जुड़े संकेतकों में देखा गया है, जिससे खेल सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

क्या कहता है नया अध्ययन?

यह रिसर्च नीदरलैंड्स में आयोजित शौकिया पुरुष फुटबॉल खिलाड़ियों पर आधारित एक केस-स्टडी है, जिसमें मैच के दौरान और बाद में खिलाड़ियों के रक्त नमूनों का विश्लेषण किया गया।

अध्ययन में पाया गया कि मैच के तुरंत बाद उन खिलाड़ियों में, जिन्होंने हेडिंग की थी, कुछ खास प्रोटीन स्तरों में बढ़ोतरी देखी गई, जो मस्तिष्क पर हल्के लेकिन मापने योग्य प्रभाव का संकेत देते हैं।

कैसे किया गया शोध?

इस अध्ययन में 300 से अधिक शौकिया खिलाड़ियों को शामिल किया गया। खिलाड़ियों के ब्लड सैंपल तीन चरणों में लिए गए-

  • मैच से पहले
  • मैच के तुरंत बाद (1 घंटे के भीतर)
  • 24 से 48 घंटे बाद

इसके साथ ही वीडियो एनालिसिस और हार्ट रेट ट्रैकिंग के जरिए यह भी रिकॉर्ड किया गया कि किस खिलाड़ी ने कितनी बार हेडिंग की और उसकी तीव्रता क्या थी।

क्या मिले प्रमुख नतीजे?

शोध में पाया गया कि:

  • लगभग 72% खिलाड़ियों ने मैच के दौरान हेडिंग की
  • औसतन प्रति खिलाड़ी लगभग 2 हेडिंग दर्ज की गई
  • अधिक हेडिंग करने वालों में न्यूरल डैमेज से जुड़े बायोमार्कर्स में अधिक बढ़ोतरी देखी गई
  • यह प्रभाव 24–48 घंटे के भीतर सामान्य हो गया

विशेष रूप से S100B और phosphorylated tau 217 जैसे बायोमार्कर्स में बदलाव दर्ज किया गया, जो मस्तिष्क की कोशिकाओं से जुड़े संकेतक माने जाते हैं।

विशेषज्ञों की राय और चिंता

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रभाव अस्थायी है, लेकिन यह इस बात का संकेत देता है कि बार-बार की जाने वाली हेडिंग से मस्तिष्क पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक इसके प्रभाव को समझने के लिए और विस्तृत अध्ययन की जरूरत है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, पेशेवर और शौकिया दोनों स्तरों पर लगातार हेडिंग की आदत से जुड़ी संभावित न्यूरोलॉजिकल जोखिमों पर और शोध जरूरी है।

 

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Surbhi

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नई दिल्ली,एजेंसियां। बदलती जीवनशैली, बढ़ता तनाव, प्रदूषण और बढ़ती उम्र के कारण दुनियाभर में इनफर्टिलिटी (बांझपन) की समस्या तेजी से बढ़ रही है। इसी के चलते इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) जैसी सहायक प्रजनन तकनीकों की मांग भी लगातार बढ़ रही है। हर साल 25 जुलाई को वर्ल्ड आईवीएफ डे मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस तकनीक के महत्व और इसके जरिए लाखों परिवारों को मिली नई उम्मीद का सम्मान करना है।   विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में करोड़ों लोग किसी न किसी रूप में इनफर्टिलिटी की समस्या से प्रभावित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि देर से शादी, करियर को प्राथमिकता, मोटापा, धूम्रपान, शराब का सेवन, तनाव और पुरुषों में बढ़ती प्रजनन संबंधी समस्याएं इसके प्रमुख कारण हैं।   भारत में तेजी से बढ़ रही है IVF की मांग   विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में भी पिछले कुछ वर्षों में आईवीएफ उपचार कराने वाले दंपतियों की संख्या बढ़ी है। केवल बांझपन ही नहीं, बल्कि अधिक उम्र में परिवार शुरू करने की योजना, कैंसर उपचार के बाद प्रजनन क्षमता में कमी और पुरुष बांझपन के मामलों में भी आईवीएफ का सहारा लिया जा रहा है।   कब पड़ती है IVF की जरूरत?   डॉक्टरों के अनुसार, यदि 35 वर्ष से कम उम्र का कोई दंपती एक वर्ष तक नियमित असुरक्षित संबंध बनाने के बाद भी गर्भधारण नहीं कर पाता, तो विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। शुरुआती उपचारों जैसे दवाइयों और ओव्यूलेशन इंडक्शन से सफलता नहीं मिलने या समस्या गंभीर होने पर आईवीएफ की सलाह दी जाती है।   आईवीएफ प्रक्रिया में महिला के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु को शरीर के बाहर प्रयोगशाला में निषेचित किया जाता है। इसके बाद विकसित भ्रूण को महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है।   क्या है ICSI तकनीक?   आईसीएसआई (Intracytoplasmic Sperm Injection) आईवीएफ की एक उन्नत तकनीक है। इसमें एक स्वस्थ शुक्राणु को माइक्रोस्कोप की सहायता से सीधे अंडाणु के भीतर इंजेक्ट किया जाता है। यह तकनीक विशेष रूप से उन मामलों में उपयोगी होती है, जहां पुरुष में शुक्राणुओं की संख्या कम हो, उनकी गतिशीलता कमजोर हो या निषेचन में कठिनाई आ रही हो।   IVF और ICSI में क्या है अंतर?   सामान्य आईवीएफ में अंडाणु और शुक्राणु को प्रयोगशाला में एक साथ रखा जाता है और निषेचन स्वाभाविक रूप से होता है। वहीं, आईसीएसआई में विशेषज्ञ सीधे एक शुक्राणु को अंडाणु के अंदर पहुंचाते हैं, जिससे निषेचन की संभावना बढ़ जाती है। डॉक्टर मरीज की मेडिकल स्थिति और जांच रिपोर्ट के आधार पर तय करते हैं कि किस तकनीक का उपयोग किया जाएगा।   लाखों परिवारों के लिए बनी उम्मीद   विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक प्रजनन तकनीकों ने उन दंपतियों के लिए नई उम्मीद पैदा की है, जो प्राकृतिक रूप से संतान प्राप्ति में कठिनाई का सामना कर रहे हैं। समय पर जांच, सही उपचार और विशेषज्ञ की सलाह से कई मामलों में सफल गर्भधारण संभव हो सकता है।

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Morning Health Tips: सुबह का पहला भोजन पूरे दिन की पाचन क्रिया और ऊर्जा स्तर को प्रभावित करता है। इसलिए दिन की शुरुआत सही खानपान से करना बेहद जरूरी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि खाली पेट कुछ खाद्य पदार्थों का सेवन करने से एसिडिटी, पेट में जलन, गैस और अपच जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। वहीं, सही और संतुलित नाश्ता शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा देने के साथ पाचन तंत्र को भी स्वस्थ रखने में मदद करता है। सुबह खाली पेट किन 3 चीजों से बचें? 1. खट्टे फल और नींबू पानी डॉक्टरों के अनुसार, खाली पेट अत्यधिक खट्टे फल या नींबू पानी पीने से पेट में एसिड का स्तर बढ़ सकता है। इससे कुछ लोगों में एसिडिटी, जलन और पेट की अंदरूनी परत में असहजता हो सकती है, खासकर जिन लोगों को पहले से गैस्ट्रिक समस्या हो। 2. ब्लैक कॉफी खाली पेट ब्लैक कॉफी पीने से पेट में एसिड का उत्पादन बढ़ सकता है। इससे गैस, पेट फूलना, जलन और बेचैनी जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं। यदि कॉफी पीनी हो तो बेहतर है कि हल्का नाश्ता करने के बाद लें। 3. ज्यादा मसालेदार और तला-भुना भोजन सुबह-सुबह कचौड़ी, छोले-भटूरे, पाव भाजी या अन्य मसालेदार और तले हुए खाद्य पदार्थ खाने से पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इससे एसिडिटी, अपच और पेट में भारीपन की शिकायत हो सकती है। सुबह खाली पेट क्या खाना बेहतर रहेगा? डॉक्टरों के अनुसार, दिन की शुरुआत हल्के, पौष्टिक और आसानी से पचने वाले भोजन से करनी चाहिए। आप इन विकल्पों को अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं— भीगे हुए बादाम, अखरोट या अन्य नट्स ओट्स या दलिया केला या सेब इडली-सांभर डोसा-सांभर ब्रेड ऑमलेट 2 उबले अंडे दही के साथ फल (यदि आपको एसिडिटी की समस्या न हो) मूंग दाल चीला पोहा या उपमा अंकुरित मूंग सलाद सुबह स्वस्थ रहने के लिए अपनाएं ये आदतें उठने के बाद सबसे पहले पर्याप्त मात्रा में सादा या गुनगुना पानी पिएं। नाश्ता कभी भी स्किप न करें। प्रोटीन और फाइबर युक्त भोजन को प्राथमिकता दें। अत्यधिक मीठे, प्रोसेस्ड और जंक फूड से बचें। भोजन को अच्छी तरह चबाकर खाएं। ध्यान रखें: हर व्यक्ति की पाचन क्षमता अलग होती है। यदि आपको गैस्ट्रिक अल्सर, एसिडिटी, IBS या कोई अन्य पाचन संबंधी बीमारी है, तो अपनी डाइट में बदलाव करने से पहले डॉक्टर या पंजीकृत डाइटिशियन की सलाह जरूर लें।  

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नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय रसोई में घी और मक्खन दोनों का लंबे समय से उपयोग होता आ रहा है, लेकिन स्वास्थ्य को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि दोनों में से कौन अधिक फायदेमंद है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, घी और मक्खन दोनों ही डेयरी उत्पाद हैं और इनमें आवश्यक वसा, विटामिन तथा ऊर्जा देने वाले पोषक तत्व मौजूद होते हैं। हालांकि, इनके सेवन की मात्रा और उपयोग का तरीका ही तय करता है कि यह शरीर के लिए कितना लाभकारी होगा। विशेषज्ञ बताते हैं कि मक्खन दूध की मलाई या क्रीम से तैयार किया जाता है, जबकि घी मक्खन को गर्म करके बनाया जाता है, जिससे उसमें मौजूद पानी और दूध के ठोस तत्व अलग हो जाते हैं। घी में विटामिन A, D, E और K के साथ ब्यूटिरिक एसिड पाया जाता है, जिसे आंतों के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। वहीं, मक्खन में विटामिन A के साथ कुछ मात्रा में प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं। खाना पकाने के लिहाज से घी को बेहतर माना जाता है क्योंकि इसका स्मोक पॉइंट मक्खन की तुलना में अधिक होता है, जिससे यह तेज आंच पर भी स्थिर रहता है। दूसरी ओर, मक्खन का उपयोग ब्रेड, पराठे, बेकिंग और कम तापमान पर बनने वाले व्यंजनों में अधिक किया जाता है। हालांकि, दोनों में ही कैलोरी और संतृप्त वसा (सैचुरेटेड फैट) की मात्रा अधिक होती है। इसलिए वजन नियंत्रित करने वाले लोगों या हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे व्यक्तियों को इनका सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित आहार और व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार घी या मक्खन का सेवन करना ही सबसे बेहतर विकल्प है।

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kalpana जुलाई 21, 2026 0

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