Neurology

Person experiencing lower back pain radiating to the legs, highlighting nerve compression and sciatica symptoms.
पीठ से पैरों तक बिजली जैसा दर्द और झनझनाहट? हो सकता है नस दबने का संकेत, जानें डॉक्टर कैसे करते हैं पहचान

Nerve Compression Symptoms: अगर आपकी कमर से शुरू होकर दर्द कूल्हों, जांघ, पिंडली या पैरों तक पहुंचता है और इसके साथ झनझनाहट, सुन्नपन या कमजोरी महसूस होती है, तो इसे सामान्य कमर दर्द या मांसपेशियों का खिंचाव समझकर नजरअंदाज न करें। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे लक्षण कई बार नस दबने (Nerve Compression) या साइटिका (Sciatica) जैसी समस्या का संकेत हो सकते हैं। समय पर जांच और सही इलाज न मिलने पर नस को स्थायी नुकसान भी पहुंच सकता है। आजकल लंबे समय तक बैठकर काम करना, गलत पॉश्चर, भारी वजन उठाना और बढ़ती उम्र के कारण रीढ़ से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि सामान्य मांसपेशियों के दर्द और नस के दर्द में क्या अंतर होता है। नस दबने की समस्या क्या होती है? विशेषज्ञों के अनुसार जब रीढ़ की हड्डी के आसपास मौजूद डिस्क, हड्डी, लिगामेंट या अन्य टिशू किसी नस पर दबाव डालने लगते हैं, तो उसे नस दबना या Nerve Compression कहा जाता है। इससे नस मस्तिष्क और शरीर के बीच सामान्य रूप से संदेश नहीं पहुंचा पाती, जिसके कारण दर्द, झनझनाहट, सुन्नपन और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें? यदि आपको इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी हो सकता है— कमर से शुरू होकर पैरों तक फैलने वाला तेज दर्द बिजली के झटके जैसा दर्द या झनझनाहट पैरों में सुन्नपन या जलन चलने या लंबे समय तक खड़े रहने में परेशानी पैरों में कमजोरी महसूस होना आराम करने के बाद भी दर्द का बने रहना नस के दर्द और मांसपेशियों के दर्द में अंतर नस दबने के दर्द के संकेत दर्द कमर से पैरों तक फैलता है। झनझनाहट और सुन्नपन महसूस होता है। बिजली के झटके जैसा दर्द हो सकता है। जलन और कमजोरी महसूस हो सकती है। आराम करने पर भी दर्द पूरी तरह कम नहीं होता। मांसपेशियों के दर्द के संकेत दर्द एक सीमित हिस्से में रहता है। दबाने पर दर्द बढ़ सकता है। झनझनाहट या सुन्नपन नहीं होता। आराम करने और हल्की स्ट्रेचिंग से धीरे-धीरे राहत मिलती है। नस दबने के सामान्य कारण स्लिप डिस्क (Slip Disc): रीढ़ की डिस्क बाहर निकलकर नस पर दबाव डाल सकती है। साइटिका (Sciatica): साइटिक नस दबने पर दर्द कमर से पैरों तक फैल सकता है। स्पाइनल स्टेनोसिस: उम्र बढ़ने के साथ रीढ़ की नलिका संकरी होने से नसों पर दबाव बढ़ सकता है। बोन स्पर: हड्डियों की अतिरिक्त वृद्धि नसों को दबा सकती है। चोट या दुर्घटना: गिरने या किसी चोट के कारण नस पर दबाव पड़ सकता है। डॉक्टर कैसे करते हैं पहचान? नस दबने की पुष्टि के लिए डॉक्टर सबसे पहले मरीज के लक्षण, मेडिकल हिस्ट्री और शारीरिक जांच करते हैं। जरूरत पड़ने पर निम्न जांच कराई जा सकती हैं— MRI Scan CT Scan X-ray Electromyography (EMG) Neurological Examination बचाव के लिए अपनाएं ये आसान उपाय लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठने से बचें। सही पॉश्चर में बैठें और काम करें। नियमित रूप से हल्की एक्सरसाइज करें। भारी वजन सही तकनीक से उठाएं। शरीर का वजन नियंत्रित रखें। पर्याप्त नींद लें और तनाव कम करें। योग और स्ट्रेचिंग से मिल सकती है मदद रीढ़ की सेहत बेहतर रखने और मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए विशेषज्ञों की सलाह से भुजंगासन, मकरासन, मार्जरी-व्याघ्रासन (Cat-Cow Pose), ताड़ासन और बालासन जैसे योगासन किए जा सकते हैं। इसके अलावा अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम तनाव कम करने और शरीर को रिलैक्स रखने में मदद कर सकते हैं। यदि दर्द तेज हो तो बिना विशेषज्ञ की सलाह के कोई भी व्यायाम न करें। हेल्दी डाइट भी है जरूरी नसों और हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित आहार लेना भी बेहद जरूरी है। अपनी डाइट में विटामिन B12, विटामिन D, कैल्शियम, मैग्नीशियम, ओमेगा-3 फैटी एसिड, हरी पत्तेदार सब्जियां, दूध, दही, अंडे, दालें, मेवे और मौसमी फल शामिल करें। पर्याप्त पानी पीना भी शरीर की रिकवरी में मदद करता है। कब तुरंत डॉक्टर से मिलें? अगर दर्द लगातार बढ़ रहा हो, पैरों में कमजोरी आ रही हो, चलने में कठिनाई हो, पेशाब या मल पर नियंत्रण कम हो जाए या सुन्नपन लगातार बना रहे, तो तुरंत ऑर्थोपेडिक, स्पाइन विशेषज्ञ या न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करें। ध्यान रखें: कमर से पैरों तक फैलने वाला दर्द हर बार सामान्य नहीं होता। समय पर जांच, संतुलित आहार, नियमित योग, सही पॉश्चर और उचित इलाज से नस दबने की समस्या को गंभीर होने से काफी हद तक रोका जा सकता है।  

anmol जुलाई 28, 2026 0
Person experiencing lower back pain radiating to the legs, illustrating symptoms of a pinched nerve and sciatica.
पीठ से पैरों तक झनझनाहट और तेज दर्द को न करें नजरअंदाज, नस दबने का हो सकता है संकेत; जानिए डॉक्टर कैसे करते हैं पहचान

कमर दर्द आज के समय में सबसे आम स्वास्थ्य समस्याओं में से एक बन चुका है। हालांकि हर कमर दर्द गंभीर नहीं होता, लेकिन यदि दर्द कमर से शुरू होकर कूल्हों, जांघों और पैरों तक फैलने लगे, साथ ही झनझनाहट, सुन्नपन या कमजोरी महसूस हो, तो इसे सामान्य मांसपेशियों का खिंचाव समझकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे लक्षण नस दबने (Nerve Compression) या साइटिका (Sciatica) जैसी समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं, जिसका समय रहते इलाज न होने पर नस को स्थायी नुकसान भी पहुंच सकता है। नस दबने पर कैसा महसूस होता है दर्द? कई लोगों को चलते, खड़े होने या लंबे समय तक बैठने के दौरान कमर से शुरू होकर पैरों तक जाने वाला तेज दर्द महसूस होता है। यह दर्द अक्सर बिजली के झटके जैसा, चुभने वाला या जलन पैदा करने वाला होता है। इसके साथ पैरों में झनझनाहट, सुन्नपन या कमजोरी भी महसूस हो सकती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ ऐसे लक्षणों को गंभीरता से लेने की सलाह देते हैं। रीढ़ की हड्डी के आसपास मौजूद डिस्क, हड्डी, लिगामेंट या अन्य ऊतक जब किसी नस पर दबाव डालने लगते हैं, तब नस सामान्य रूप से मस्तिष्क और शरीर के बीच संदेश नहीं पहुंचा पाती। इसी कारण दर्द और अन्य न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखाई देने लगते हैं। नस दबना क्या होता है? नस दबना एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की किसी नस पर आसपास के ऊतकों का अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यह समस्या सबसे अधिक रीढ़ की हड्डी में देखने को मिलती है। लगातार दबाव बने रहने से नस की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और समय पर इलाज न मिलने पर स्थायी क्षति का खतरा भी बढ़ जाता है। नस के दर्द और मांसपेशियों के दर्द में अंतर दोनों तरह के दर्द के लक्षण अलग-अलग होते हैं। इन्हें पहचानना जरूरी है। नस दबने का दर्द मांसपेशियों का दर्द दर्द कमर से पैर तक फैलता है दर्द एक ही हिस्से तक सीमित रहता है बिजली के झटके या झनझनाहट जैसा महसूस होता है दबाने पर दर्द बढ़ता है सुन्नपन और जलन हो सकती है सुन्नपन या झनझनाहट नहीं होती पैर में कमजोरी महसूस हो सकती है कमजोरी कम देखने को मिलती है आराम करने पर भी दर्द बना रह सकता है आराम करने से धीरे-धीरे राहत मिलती है नस दबने के प्रमुख कारण 1. स्लिप डिस्क रीढ़ की डिस्क अपनी जगह से खिसककर नस पर दबाव डाल सकती है। यह नस दबने के सबसे आम कारणों में से एक है। 2. साइटिका साइटिक नर्व शरीर की सबसे लंबी नस होती है। इसके दबने पर दर्द कमर से शुरू होकर पूरे पैर तक फैल सकता है। 3. स्पाइनल स्टेनोसिस उम्र बढ़ने के साथ रीढ़ की नलिका संकरी होने लगती है, जिससे नसों पर दबाव बढ़ जाता है। इससे चलने में दर्द, पैरों में भारीपन और कमजोरी महसूस हो सकती है। 4. बोन स्पर हड्डियों के अतिरिक्त उभार (Bone Spurs) आसपास की नसों पर दबाव डाल सकते हैं, जिससे दर्द और नस संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। 5. चोट या दुर्घटना गिरने, दुर्घटना या किसी गंभीर चोट के कारण नस खिंच सकती है, दब सकती है या उसके आसपास सूजन आ सकती है, जिससे नस पर दबाव बढ़ जाता है। डॉक्टर कैसे करते हैं नस दबने की जांच? यदि मरीज में नस दबने के लक्षण दिखाई देते हैं, तो डॉक्टर सबसे पहले उसकी मेडिकल हिस्ट्री और लक्षणों के बारे में जानकारी लेते हैं। इसके बाद शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल परीक्षण किया जाता है। जरूरत पड़ने पर निम्न जांच कराई जा सकती हैं: एमआरआई (MRI) सीटी स्कैन (CT Scan) एक्स-रे इलेक्ट्रोमायोग्राफी (EMG) इन जांचों के जरिए यह पता लगाया जाता है कि नस पर दबाव किस कारण से पड़ रहा है और उसकी गंभीरता कितनी है। किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें? यदि आपको निम्न में से कोई भी लक्षण महसूस हो रहा है, तो जल्द से जल्द ऑर्थोपेडिक, न्यूरोलॉजिस्ट या स्पाइन विशेषज्ञ से सलाह लें। कमर से पैर तक फैलने वाला तेज दर्द पैरों में लगातार झनझनाहट सुन्नपन या संवेदना कम होना पैर में कमजोरी चलने या संतुलन बनाने में कठिनाई आराम करने के बाद भी दर्द कम न होना समय पर इलाज है सबसे जरूरी विशेषज्ञों का कहना है कि कमर से पैरों तक फैलने वाला तेज या बिजली जैसा दर्द हमेशा सामान्य कमर दर्द नहीं होता। यदि इसके साथ झनझनाहट, सुन्नपन या कमजोरी जैसे लक्षण भी मौजूद हैं, तो यह नस दबने का संकेत हो सकता है। अच्छी बात यह है कि समय रहते सही जांच और उचित उपचार शुरू कर दिया जाए, तो अधिकांश मरीज बिना किसी स्थायी नुकसान के पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं। इसलिए ऐसे लक्षणों को हल्के में लेने के बजाय तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेना सबसे सुरक्षित विकल्प है।  

surbhi जुलाई 27, 2026 0
Person using a smartphone and laptop for long hours, showing the effects of excessive screen time on mental health.
ऑनलाइन रहने की आदत दिमाग को बुरी तरह थका सकती है, अकेले नींद से नहीं मिलता आराम: डॉक्टर

आज के डिजिटल दौर में मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट जहां नई चीजें सीखने और दुनिया से जुड़े रहने का अवसर देते हैं, वहीं इनका अत्यधिक इस्तेमाल शरीर और दिमाग पर गंभीर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार ऑनलाइन रहने की आदत मानसिक थकान को बढ़ा रही है और सिर्फ नींद लेने से इस समस्या से पूरी तरह राहत नहीं मिलती। कैलाश दीपक हॉस्पिटल के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. बिपिन कुमार शर्मा के अनुसार, लंबे समय तक स्क्रीन के संपर्क में रहने से मस्तिष्क को लगातार भारी मात्रा में जानकारी प्रोसेस करनी पड़ती है, जिससे मानसिक ऊर्जा तेजी से खत्म होने लगती है। क्यों थकने लगता है दिमाग? विशेषज्ञों के मुताबिक, लगातार मोबाइल और लैपटॉप इस्तेमाल करने से मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स प्रभावित होता है। यह हिस्सा निर्णय लेने, ध्यान केंद्रित करने और भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार होता है। जब यह हिस्सा लगातार ओवरलोड रहता है, तो व्यक्ति में निम्न समस्याएं दिखाई देने लगती हैं— ध्यान लगाने में कठिनाई चिड़चिड़ापन भावनात्मक सुन्नता लगातार थकान महसूस होना मानसिक तनाव बढ़ना डॉक्टरों का कहना है कि इस तरह की मानसिक थकान केवल अच्छी नींद से पूरी तरह दूर नहीं होती, बल्कि दिमाग को डिजिटल आराम (Digital Detox) की भी जरूरत होती है। कैसे बदल रहा है इंटरनेट हमारे दिमाग को? लगातार स्क्रॉलिंग और बार-बार ऐप्स बदलने की आदत मस्तिष्क को तेज उत्तेजनाओं का आदी बना देती है। इससे किसी एक काम पर लंबे समय तक फोकस बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा— नोटिफिकेशन और लाइक्स डोपामाइन को बार-बार सक्रिय करते हैं। धीरे-धीरे डिजिटल कंटेंट पर निर्भरता बढ़ने लगती है। आत्म-नियंत्रण और निर्णय क्षमता प्रभावित हो सकती है। रिसर्च के अनुसार, अत्यधिक इंटरनेट उपयोग मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में ग्रे मैटर के घनत्व को भी प्रभावित कर सकता है। सिर्फ दिमाग ही नहीं, शरीर के अन्य अंग भी होते हैं प्रभावित आंखों पर असर लगातार स्क्रीन देखने से डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम की समस्या हो सकती है। इसके लक्षण हैं— आंखों में सूखापन जलन धुंधला दिखाई देना सिरदर्द गर्दन और रीढ़ की हड्डी पर दबाव लंबे समय तक झुककर मोबाइल देखने से "टेक नेक" की समस्या हो सकती है, जिससे गर्दन और ऊपरी रीढ़ में दर्द बढ़ सकता है। मांसपेशियों में तनाव कीबोर्ड और टचस्क्रीन के लगातार उपयोग से कंधों, हाथों और कलाइयों में दर्द या रिपिटिटिव स्ट्रेन इंजरी की समस्या हो सकती है। दिल और वजन पर असर अधिक स्क्रीन टाइम शारीरिक गतिविधियों को कम कर देता है, जिससे— मोटापे का खतरा बढ़ता है ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होता है हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है नींद और इम्यूनिटी पर प्रभाव स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट नींद की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, जिससे हार्मोनल संतुलन, मेटाबॉलिज्म और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी असर पड़ सकता है। क्या करें? विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि— स्क्रीन टाइम सीमित करें। हर 30-40 मिनट में छोटा ब्रेक लें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल का इस्तेमाल बंद करें। नियमित व्यायाम और आउटडोर गतिविधियों को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। समय-समय पर डिजिटल डिटॉक्स अपनाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक का संतुलित उपयोग ही बेहतर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की कुंजी है।  

surbhi जून 10, 2026 0
Amateur football player heading the ball during a match as researchers study brain health effects
फुटबॉल में ‘हेडिंग’ से दिमाग पर असर: नए अध्ययन में मिला संकेत, बायोमार्कर में दिखे अस्थायी बदलाव

शौकिया स्तर के फुटबॉल खिलाड़ियों पर किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में यह संकेत मिला है कि मैच के दौरान बार-बार की जाने वाली ‘हेडिंग’ (ball heading) गतिविधि से मस्तिष्क से जुड़े कुछ बायोमार्कर्स में अस्थायी बदलाव हो सकते हैं। यह बदलाव न्यूरल इंजरी और ब्रेन इंटेग्रिटी से जुड़े संकेतकों में देखा गया है, जिससे खेल सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। क्या कहता है नया अध्ययन? यह रिसर्च नीदरलैंड्स में आयोजित शौकिया पुरुष फुटबॉल खिलाड़ियों पर आधारित एक केस-स्टडी है, जिसमें मैच के दौरान और बाद में खिलाड़ियों के रक्त नमूनों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि मैच के तुरंत बाद उन खिलाड़ियों में, जिन्होंने हेडिंग की थी, कुछ खास प्रोटीन स्तरों में बढ़ोतरी देखी गई, जो मस्तिष्क पर हल्के लेकिन मापने योग्य प्रभाव का संकेत देते हैं। कैसे किया गया शोध? इस अध्ययन में 300 से अधिक शौकिया खिलाड़ियों को शामिल किया गया। खिलाड़ियों के ब्लड सैंपल तीन चरणों में लिए गए- मैच से पहले मैच के तुरंत बाद (1 घंटे के भीतर) 24 से 48 घंटे बाद इसके साथ ही वीडियो एनालिसिस और हार्ट रेट ट्रैकिंग के जरिए यह भी रिकॉर्ड किया गया कि किस खिलाड़ी ने कितनी बार हेडिंग की और उसकी तीव्रता क्या थी। क्या मिले प्रमुख नतीजे? शोध में पाया गया कि: लगभग 72% खिलाड़ियों ने मैच के दौरान हेडिंग की औसतन प्रति खिलाड़ी लगभग 2 हेडिंग दर्ज की गई अधिक हेडिंग करने वालों में न्यूरल डैमेज से जुड़े बायोमार्कर्स में अधिक बढ़ोतरी देखी गई यह प्रभाव 24–48 घंटे के भीतर सामान्य हो गया विशेष रूप से S100B और phosphorylated tau 217 जैसे बायोमार्कर्स में बदलाव दर्ज किया गया, जो मस्तिष्क की कोशिकाओं से जुड़े संकेतक माने जाते हैं। विशेषज्ञों की राय और चिंता शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रभाव अस्थायी है, लेकिन यह इस बात का संकेत देता है कि बार-बार की जाने वाली हेडिंग से मस्तिष्क पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक इसके प्रभाव को समझने के लिए और विस्तृत अध्ययन की जरूरत है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पेशेवर और शौकिया दोनों स्तरों पर लगातार हेडिंग की आदत से जुड़ी संभावित न्यूरोलॉजिकल जोखिमों पर और शोध जरूरी है।  

surbhi मई 23, 2026 0
Illustration of pulmonary arterial hypertension showing affected lungs, heart, and brain inflammation.
Pulmonary Arterial Hypertension: फेफड़ों से आगे बढ़कर दिमाग को भी कर रहा प्रभावित, नई स्टडी में बड़ा खुलासा

एक नई रिसर्च में सामने आया है कि Pulmonary Arterial Hypertension (PAH) सिर्फ दिल और फेफड़ों तक सीमित बीमारी नहीं है, बल्कि यह दिमाग पर भी गंभीर असर डाल सकती है। अध्ययन के मुताबिक, यह बीमारी ब्रेन इंफ्लेमेशन, ब्लड-ब्रेन बैरियर (BBB) में गड़बड़ी और धीरे-धीरे कॉग्निटिव डिक्लाइन (याददाश्त व सोचने की क्षमता में कमी) का कारण बन सकती है। क्या है PAH और क्यों है खतरनाक? PAH एक प्रोग्रेसिव बीमारी है, जिसमें फेफड़ों की धमनियों में दबाव बढ़ जाता है, जिससे दिल के दाहिने हिस्से पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। अब तक इसे मुख्य रूप से कार्डियोपल्मोनरी डिजीज माना जाता था, लेकिन मरीजों में लगातार मेमोरी प्रॉब्लम और सोचने की क्षमता में गिरावट देखी जा रही थी। रिसर्च में क्या सामने आया? वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में चूहों (rats) में PAH की स्थिति उत्पन्न कर 14 दिनों तक उनके व्यवहार और शारीरिक बदलावों का विश्लेषण किया। PAH से ग्रस्त चूहों में फेफड़ों की धमनियों का दबाव बढ़ा और दिल के दाहिने हिस्से में सूजन देखी गई साथ ही उनकी याददाश्त और नई चीजों को पहचानने की क्षमता कमजोर पाई गई खास बात यह रही कि उनमें एंग्जायटी जैसे लक्षण नहीं दिखे, जिससे स्पष्ट हुआ कि असर सीधे कॉग्निशन पर पड़ रहा है दिमाग में सूजन और BBB डैमेज रिसर्च में पाया गया कि PAH के कारण दिमाग के महत्वपूर्ण हिस्सों - कॉर्टेक्स और हिप्पोकैम्पस - में सूजन बढ़ गई। माइक्रोग्लिया और एस्ट्रोसाइट्स (ब्रेन सेल्स) सक्रिय हो गए इंफ्लेमेटरी मार्कर्स जैसे TNF-α और IL-1β का स्तर बढ़ा ब्लड-ब्रेन बैरियर (BBB) कमजोर हुआ, जिससे दिमाग में बाहरी तत्वों का प्रवेश बढ़ा यह संकेत देते हैं कि PAH सीधे ब्रेन फंक्शन को प्रभावित कर सकता है। क्या हैं इसके मायने? यह स्टडी बताती है कि PAH को अब सिर्फ दिल और फेफड़ों की बीमारी मानना गलत होगा। यह एक मल्टीसिस्टम डिजीज है, जो दिमाग को भी नुकसान पहुंचा सकती है। हालांकि, यह रिसर्च जानवरों पर आधारित है और इसका समयकाल भी सीमित (14 दिन) था, इसलिए इसे सीधे इंसानों पर लागू करने से पहले और अध्ययन की जरूरत है। आगे क्या? विशेषज्ञों का मानना है कि: PAH मरीजों में कॉग्निटिव लक्षणों पर ज्यादा ध्यान देना होगा इंफ्लेमेशन को कम करने और BBB को सुरक्षित रखने वाली थेरेपी पर रिसर्च जरूरी है

surbhi अप्रैल 11, 2026 0
Popular post
शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Top week

Prime Minister Narendra Modi announces fast-track courts and strict action against those involved in paper leak cases.
राष्ट्रीय

PM मोदी का बड़ा ऐलान: पेपर लीक के दोषियों पर सख्ती, फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा

kalpana जुलाई 23, 2026 0