Biomarkers

Amateur football player heading the ball during a match as researchers study brain health effects
फुटबॉल में ‘हेडिंग’ से दिमाग पर असर: नए अध्ययन में मिला संकेत, बायोमार्कर में दिखे अस्थायी बदलाव

शौकिया स्तर के फुटबॉल खिलाड़ियों पर किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में यह संकेत मिला है कि मैच के दौरान बार-बार की जाने वाली ‘हेडिंग’ (ball heading) गतिविधि से मस्तिष्क से जुड़े कुछ बायोमार्कर्स में अस्थायी बदलाव हो सकते हैं। यह बदलाव न्यूरल इंजरी और ब्रेन इंटेग्रिटी से जुड़े संकेतकों में देखा गया है, जिससे खेल सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। क्या कहता है नया अध्ययन? यह रिसर्च नीदरलैंड्स में आयोजित शौकिया पुरुष फुटबॉल खिलाड़ियों पर आधारित एक केस-स्टडी है, जिसमें मैच के दौरान और बाद में खिलाड़ियों के रक्त नमूनों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि मैच के तुरंत बाद उन खिलाड़ियों में, जिन्होंने हेडिंग की थी, कुछ खास प्रोटीन स्तरों में बढ़ोतरी देखी गई, जो मस्तिष्क पर हल्के लेकिन मापने योग्य प्रभाव का संकेत देते हैं। कैसे किया गया शोध? इस अध्ययन में 300 से अधिक शौकिया खिलाड़ियों को शामिल किया गया। खिलाड़ियों के ब्लड सैंपल तीन चरणों में लिए गए- मैच से पहले मैच के तुरंत बाद (1 घंटे के भीतर) 24 से 48 घंटे बाद इसके साथ ही वीडियो एनालिसिस और हार्ट रेट ट्रैकिंग के जरिए यह भी रिकॉर्ड किया गया कि किस खिलाड़ी ने कितनी बार हेडिंग की और उसकी तीव्रता क्या थी। क्या मिले प्रमुख नतीजे? शोध में पाया गया कि: लगभग 72% खिलाड़ियों ने मैच के दौरान हेडिंग की औसतन प्रति खिलाड़ी लगभग 2 हेडिंग दर्ज की गई अधिक हेडिंग करने वालों में न्यूरल डैमेज से जुड़े बायोमार्कर्स में अधिक बढ़ोतरी देखी गई यह प्रभाव 24–48 घंटे के भीतर सामान्य हो गया विशेष रूप से S100B और phosphorylated tau 217 जैसे बायोमार्कर्स में बदलाव दर्ज किया गया, जो मस्तिष्क की कोशिकाओं से जुड़े संकेतक माने जाते हैं। विशेषज्ञों की राय और चिंता शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रभाव अस्थायी है, लेकिन यह इस बात का संकेत देता है कि बार-बार की जाने वाली हेडिंग से मस्तिष्क पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक इसके प्रभाव को समझने के लिए और विस्तृत अध्ययन की जरूरत है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पेशेवर और शौकिया दोनों स्तरों पर लगातार हेडिंग की आदत से जुड़ी संभावित न्यूरोलॉजिकल जोखिमों पर और शोध जरूरी है।  

surbhi मई 23, 2026 0
Scientists analyzing asthma blood biomarkers through metabolomic profiling to identify hidden biological asthma subtypes.
Metabolomic Profiling से सामने आए अस्थमा के छिपे हुए सबटाइप, लक्षण समान लेकिन बीमारी की प्रकृति अलग

अस्थमा को अब तक मुख्य रूप से मरीज के लक्षणों और हालिया अटैक (exacerbation) के आधार पर नियंत्रित या स्थिर माना जाता रहा है। लेकिन एक नई रिसर्च ने इस धारणा को चुनौती देते हुए दिखाया है कि समान लक्षणों वाले अस्थमा मरीजों के शरीर में बीमारी की जैविक गतिविधियां पूरी तरह अलग हो सकती हैं। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने मेटाबोलोमिक्स-आधारित ब्लड एनालिसिस के जरिए अस्थमा के ऐसे छिपे हुए जैविक सबटाइप (endotypes) की पहचान की है, जो सामान्य क्लिनिकल जांच में दिखाई नहीं देते। यह रिसर्च भविष्य में अस्थमा के इलाज को अधिक व्यक्तिगत और सटीक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। क्या था अध्ययन का उद्देश्य? यह एक prospective observational study थी, जिसमें उन वयस्क मरीजों को शामिल किया गया जो नियमित inhaled corticosteroid therapy ले रहे थे और जिनका अस्थमा क्लिनिकली “well-controlled” माना जा रहा था। शोधकर्ताओं का उद्देश्य यह जानना था कि क्या खून में मौजूद मेटाबोलाइट्स की प्रोफाइलिंग के जरिए बीमारी के भीतर चल रही अलग-अलग जैविक प्रक्रियाओं को पहचाना जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने liquid chromatography–tandem mass spectrometry तकनीक का उपयोग करते हुए untargeted plasma metabolomic profiling की। इसके बाद consensus clustering analysis के माध्यम से मरीजों को तीन अलग-अलग जैविक समूहों में वर्गीकृत किया गया। तीन अलग-अलग अस्थमा एंडोटाइप की पहचान अध्ययन में पाया गया कि भले ही सभी मरीजों में लक्षण और हालिया अटैक लगभग समान थे, लेकिन फेफड़ों की कार्यक्षमता, एयरवे की संरचना और इम्यून सिस्टम की गतिविधियों में बड़ा अंतर मौजूद था। 1. “Remodeling-Prone” समूह (C1) इस समूह के मरीजों में glycerophospholipid-related metabolites की मात्रा अधिक पाई गई। इन मरीजों में: Post-bronchodilator FEV1 कम था एयरवे वॉल्स अधिक मोटी थीं Innate lymphoid cells का स्तर बढ़ा हुआ था वैज्ञानिकों के अनुसार यह संकेत देता है कि मरीजों में लक्षण नियंत्रित होने के बावजूद फेफड़ों की संरचना में बदलाव और एयरवे remodeling की प्रक्रिया जारी रह सकती है। 2. “Biologically Stable” समूह (C2) यह समूह सबसे अधिक स्थिर माना गया। इन मरीजों में: एयरवे वॉल्स पतली थीं Post-bronchodilator FEV1 बेहतर था फेफड़ों की संरचना अपेक्षाकृत सामान्य बनी हुई थी रिसर्चर्स का मानना है कि यह समूह वास्तव में नियंत्रित बीमारी वाले मरीजों का प्रतिनिधित्व कर सकता है। 3. “T2-High” समूह (C3) इस समूह में type-2 inflammation से जुड़े मेटाबोलाइट्स की पहचान हुई। इन मरीजों में: Fractional exhaled nitric oxide (FeNO) का स्तर अधिक था Blood eosinophil counts बढ़े हुए थे हालांकि, इनकी एयरवे संरचना अभी काफी हद तक सुरक्षित बनी हुई थी। क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज? अब तक अस्थमा नियंत्रण का मूल्यांकन मुख्य रूप से लक्षणों और हालिया अटैक पर आधारित रहा है। लेकिन यह अध्ययन दिखाता है कि केवल लक्षण देखकर बीमारी की वास्तविक स्थिति को समझना संभव नहीं है। कई मरीज बाहर से स्थिर दिख सकते हैं, जबकि उनके फेफड़ों में सूजन, airway remodeling या इम्यून एक्टिविटी लगातार जारी हो सकती है। यही कारण है कि भविष्य में कुछ मरीजों में बीमारी अचानक गंभीर रूप ले सकती है। Precision Medicine की दिशा में बड़ा कदम विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिसर्च precision medicine आधारित अस्थमा उपचार को मजबूत करेगी। यदि मेटाबोलोमिक प्रोफाइलिंग को भविष्य में नियमित क्लिनिकल प्रैक्टिस में शामिल किया जाता है, तो डॉक्टर: बीमारी के वास्तविक जैविक स्वरूप को पहचान सकेंगे हाई-रिस्क मरीजों की पहले से पहचान कर सकेंगे अधिक targeted therapies चुन सकेंगे लंबे समय में फेफड़ों की क्षति को कम कर सकेंगे हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि अभी और बड़े अध्ययन की जरूरत है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ये metabolite-defined subgroups भविष्य में बीमारी की प्रगति और इलाज के प्रति प्रतिक्रिया को किस तरह प्रभावित करते हैं।  

surbhi मई 18, 2026 0
Scientific illustration of gut microbiota linked with diabetes and heart disease research findings
डायबिटीज और दिल की बीमारी में गट माइक्रोबायोटा का बड़ा खुलासा, नई स्टडी में मिले संभावित बायोमार्कर

हाल ही में सामने आई एक पायलट स्टडी में टाइप-2 डायबिटीज मेलिटस (T2DM) और कोरोनरी आर्टेरियोस्क्लेरोटिक हार्ट डिजीज के बीच गट माइक्रोबायोटा और मेटाबोलिक बदलावों को लेकर महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि ये बदलाव कार्डियोमेटाबोलिक बीमारियों के संभावित बायोमार्कर हो सकते हैं। स्टडी में क्या किया गया अध्ययन? शोधकर्ताओं ने कुल 30 प्रतिभागियों के फीकल और प्लाज्मा सैंपल का विश्लेषण किया, जिनमें शामिल थे— 10 स्वस्थ व्यक्ति 10 टाइप-2 डायबिटीज मरीज 10 ऐसे मरीज जिनमें डायबिटीज के साथ हार्ट डिजीज भी थी इस दौरान मेटाजीनोमिक सीक्वेंसिंग और लिक्विड क्रोमैटोग्राफी–मास स्पेक्ट्रोमेट्री (LC-MS) तकनीक का उपयोग किया गया। गट माइक्रोबायोटा में क्या बदलाव मिले? स्टडी में कई बैक्टीरियल स्पीशीज में अंतर पाया गया, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: Prevotella disiens Bacteroides sp._CAG_875 Sutterella wadsworthensis Paraprevotella clara Anaerobutyricum hallii शोधकर्ताओं के अनुसार, खासकर Bacteroides sp._CAG_875 एक महत्वपूर्ण संभावित बायोमार्कर के रूप में उभरा, जो स्वस्थ व्यक्तियों और T2DM-CAD मरीजों के बीच स्पष्ट अंतर दिखाने में सक्षम रहा। हालांकि कुल माइक्रोबायोटा विविधता में बड़ा अंतर नहीं पाया गया, लेकिन विशिष्ट बैक्टीरिया में महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए। मेटाबोलिक बदलाव और संभावित संकेत शोध में 42 अलग-अलग मेटाबोलाइट्स की पहचान की गई, जिनमें शामिल हैं: फ्रक्टोज गैलिक एसिड पाइरोग्लूटामिक एसिड एडिपिक एसिड सबेरिक एसिड 12-ketolithocholic acid (12-ketoLCA) इनमें 12-ketoLCA को सबसे अहम संभावित बायोमार्कर माना गया, जो बाइल एसिड मेटाबॉलिज्म और मेटाबोलिक डिसफंक्शन से जुड़ा हो सकता है। “गट-हार्ट एक्सिस” पर बड़ा संकेत स्टडी में यह भी पाया गया कि गट माइक्रोब्स और मेटाबोलाइट्स के बीच गहरा संबंध है, जो “gut–heart axis” की ओर संकेत करता है। यह डायबिटीज से जुड़ी हार्ट बीमारियों में एक अहम भूमिका निभा सकता है। इसके अलावा अमीनो एसिड, लिनोलिक एसिड और ग्लूटामेट मेटाबॉलिज्म जैसे पाथवे में भी बदलाव देखे गए, जो इंसुलिन रेजिस्टेंस और कार्डियोवस्कुलर डिजीज से जुड़े हैं। सीमाएं और आगे की जरूरत शोधकर्ताओं ने माना कि यह एक छोटा पायलट अध्ययन था, इसलिए निष्कर्षों को अभी शुरुआती स्तर का माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि: सैंपल साइज छोटा था मेकैनिज्म की पुष्टि बाकी है बड़े और लंबे समय के अध्ययन की जरूरत है

surbhi मई 16, 2026 0
Saliva sample in laboratory for Alzheimer’s disease biomarker testing.
क्या लार (Saliva) से अल्जाइमर का सही पता चल सकता है? नई स्टडी ने उठाए सवाल

अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारी की शुरुआती पहचान आसान बनाने के लिए वैज्ञानिक लगातार नए तरीके खोज रहे हैं। हाल के वर्षों में लार (Saliva) में मौजूद बायोमार्कर्स को एक आसान और गैर-आक्रामक (non-invasive) टेस्ट के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन नई रिसर्च से पता चलता है कि इनकी सटीकता अभी भरोसेमंद नहीं है। क्या कहती है नई रिसर्च? Alzheimer’s disease की पहचान के लिए किए गए एक बड़े सिस्टमेटिक रिव्यू में 3118 स्टडीज की जांच की गई, जिनमें से केवल 18 स्टडीज ही मानकों पर खरी उतरीं। इन स्टडीज में मुख्य रूप से दो तरह के सैलिवरी मार्कर्स पर ध्यान दिया गया: Amyloid beta (Aβ42) Lactoferrin इनकी जांच sensitivity (संवेदनशीलता), specificity (विशिष्टता) और AUC (accuracy measure) के आधार पर की गई। सबसे बड़ी समस्या: परिणामों में भारी अंतर रिव्यू में पाया गया कि अलग-अलग स्टडीज के नतीजों में काफी अंतर (variability) है, जिससे इन टेस्ट्स की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं। मुख्य कारण: सैंपल लेने के तरीके अलग-अलग कुछ स्टडीज में फास्टिंग (खाली पेट) नहीं थी कहीं stimulated saliva (उत्तेजित लार) इस्तेमाल हुई स्टोरेज और प्रोसेसिंग के तरीके अलग-अलग यही वजह है कि कई स्टडीज में यह टेस्ट अल्जाइमर और स्वस्थ लोगों के बीच फर्क तक नहीं कर पाया। किन चीजों से बेहतर रिजल्ट मिले? रिसर्च में कुछ ऐसे फैक्टर भी सामने आए जिनसे टेस्ट की सटीकता बेहतर हुई: सैंपल से पहले फास्टिंग Unstimulated saliva का उपयोग −80°C पर सैंपल स्टोर करना हालांकि, कलेक्शन का समय, सेंट्रीफ्यूगेशन और अन्य तकनीकी प्रक्रियाओं का असर स्पष्ट नहीं पाया गया। अभी क्यों नहीं है पूरी तरह भरोसेमंद? सबसे बड़ी कमी यह सामने आई कि किसी भी स्टडी ने सैलिवा टेस्टिंग के लिए तय मानकों (standard guidelines) का पूरी तरह पालन नहीं किया। इस वजह से: हर स्टडी का तरीका अलग रहा रिजल्ट्स में एकरूपता नहीं आई क्लिनिकल उपयोग (hospital use) के लिए भरोसा नहीं बन पाया आगे क्या है रास्ता? विशेषज्ञों का मानना है कि: एक समान (standardized) टेस्टिंग प्रक्रिया जरूरी है बड़े स्तर पर नई स्टडीज करनी होंगी तभी यह तय हो पाएगा कि सैलिवरी मार्कर्स भविष्य में अल्जाइमर की शुरुआती पहचान में मददगार होंगे या नहीं

surbhi अप्रैल 14, 2026 0
Microscopic view of gastric cancer cells highlighting biomarkers CXCL12 and eotaxin in medical research
गैस्ट्रिक कैंसर में बड़ी खोज: CXCL12 और Eotaxin बने सर्वाइवल के नए संकेतक

गैस्ट्रिक कैंसर के इलाज और पूर्वानुमान (प्रोग्नोसिस) को लेकर एक नई रिसर्च ने अहम जानकारी सामने रखी है। इस अध्ययन में दो नए बायोमार्कर-CXCL12 और eotaxin-की पहचान की गई है, जो मरीजों की जीवित रहने की संभावना का अनुमान लगाने में मदद कर सकते हैं। यह खोज Gastric Cancer के उपचार और निगरानी के तरीकों को बदल सकती है। क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज? गैस्ट्रिक कैंसर दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से एक है। इसकी बड़ी वजह है-देर से पहचान और एडवांस स्टेज में सीमित इलाज विकल्प। ऐसे में, ब्लड टेस्ट के जरिए मापे जा सकने वाले बायोमार्कर डॉक्टरों को यह समझने में मदद करते हैं कि कौन सा मरीज ज्यादा जोखिम में है और किसे ज्यादा निगरानी या अलग इलाज की जरूरत है। रिसर्च में क्या पाया गया? यह अध्ययन Helsinki University Hospital में 2000 से 2009 के बीच सर्जरी करा चुके 240 मरीजों पर आधारित था। वैज्ञानिकों ने 48 अलग-अलग प्रोटीन का विश्लेषण किया, जिनमें से तीन ने शुरुआती स्तर पर अहम भूमिका दिखाई: CXCL12 Stem Cell Factor Eotaxin लेकिन विस्तृत विश्लेषण (Multivariate Analysis) में केवल CXCL12 और Eotaxin ही स्वतंत्र (independent) रूप से सर्वाइवल के मजबूत संकेतक साबित हुए। कैसे काम करते हैं ये बायोमार्कर? CXCL12: यह एक केमोकिन है, जो इम्यून सेल्स की गतिविधि और ट्यूमर के माइक्रोएनवायरमेंट को नियंत्रित करता है। अध्ययन में यह बेहतर सर्वाइवल से जुड़ा पाया गया। Eotaxin: यह एक इंफ्लेमेटरी प्रोटीन है, जो शरीर में सूजन और इम्यून प्रतिक्रिया से संबंधित है। इसका भी स्वतंत्र प्रभाव सर्वाइवल पर देखा गया। यह संकेत देता है कि कैंसर के विकास में इम्यून सिस्टम की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। क्लिनिकल महत्व क्या है? इस खोज से भविष्य में: मरीजों के लिए सटीक जोखिम आकलन संभव होगा डॉक्टर बेहतर तरीके से ट्रीटमेंट प्लान बना सकेंगे हाई-रिस्क मरीजों की करीबी निगरानी की जा सकेगी यह पर्सनलाइज्ड मेडिसिन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। सीमाएं और आगे की जरूरत हालांकि, यह अध्ययन एक ही सेंटर और पुराने डेटा पर आधारित है, जिससे इसके परिणामों की व्यापकता सीमित हो सकती है। साथ ही, इन बायोमार्कर्स को रोजमर्रा की क्लिनिकल प्रैक्टिस में लागू करने से पहले बड़े और भविष्य-आधारित (prospective) अध्ययनों की जरूरत होगी।  

surbhi अप्रैल 6, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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