Garlic for Immunity: भारतीय रसोई में लहसुन केवल स्वाद बढ़ाने वाला मसाला नहीं, बल्कि पारंपरिक घरेलू नुस्खों का भी अहम हिस्सा माना जाता है। सर्दी, जुकाम और संक्रमण के मौसम में कई लोग सुबह खाली पेट कच्चा लहसुन खाने की सलाह देते हैं। आयुर्वेद में लहसुन को औषधीय गुणों से भरपूर माना गया है, जबकि आधुनिक शोध भी इसके कुछ स्वास्थ्य लाभों की पुष्टि करते हैं। लेकिन क्या वास्तव में सिर्फ लहसुन खाने से इम्यूनिटी मजबूत हो जाती है? आइए जानते हैं विशेषज्ञों की राय।
आयुर्वेदाचार्य डॉ. राजेश बयारी (एमडी, चित्रकूटा आयुर्वेद चिकित्सालय, कुंडापुरा) के अनुसार, लहसुन में मौजूद एलिसिन (Allicin), सल्फर यौगिक और एंटीऑक्सीडेंट शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं। ये तत्व एंटीबैक्टीरियल, एंटीवायरल और एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर होते हैं, जो शरीर को संक्रमण से लड़ने में मदद करते हैं।
इसके अलावा लहसुन:
आयुर्वेद में लहसुन को 'लशुन' कहा गया है। चरक संहिता और भावप्रकाश निघंटु जैसे प्राचीन ग्रंथों में इसे औषधीय पौधे के रूप में वर्णित किया गया है।
आयुर्वेद के अनुसार लहसुन:
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, लहसुन में एलिसिन, डायलिल सल्फाइड (Diallyl Sulfide), एजोइन (Ajoene) और अन्य ऑर्गेनोसल्फर यौगिक पाए जाते हैं। ये शरीर में एंटीऑक्सीडेंट और हल्के एंटीमाइक्रोबियल प्रभाव दिखा सकते हैं।
कुछ शोधों में यह भी पाया गया है कि नियमित मात्रा में लहसुन का सेवन प्रतिरक्षा कोशिकाओं के सामान्य कार्य को समर्थन दे सकता है और सामान्य सर्दी-जुकाम की संभावना कुछ हद तक कम कर सकता है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल लहसुन खाने से इम्यूनिटी चमत्कारिक रूप से नहीं बढ़ती। मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम, तनाव नियंत्रण और समय पर टीकाकरण भी बेहद जरूरी हैं।
आयुर्वेद के अनुसार इसका जवाब व्यक्ति की शारीरिक प्रकृति पर निर्भर करता है।
यदि:
तो सुबह गुनगुने पानी के साथ 1–2 कली कच्चा लहसुन लेना लाभकारी माना जा सकता है।
लेकिन यदि:
तो खाली पेट कच्चा लहसुन खाने से बचना चाहिए। ऐसे लोगों के लिए भोजन में पकाकर या हल्का भूनकर लहसुन खाना अधिक सुरक्षित माना जाता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
Gallbladder Stone Health Tips: गॉल ब्लैडर में स्टोन (पित्ताशय की पथरी) को अक्सर लोग एक सामान्य समस्या मानते हैं और ऑपरेशन के बाद इसे पूरी तरह खत्म हुई बीमारी समझ लेते हैं। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, गॉल ब्लैडर में स्टोन केवल पित्ताशय की समस्या नहीं, बल्कि शरीर के बिगड़ते मेटाबॉलिज्म, बढ़ते वजन और फैटी लिवर का संकेत भी हो सकता है। समय रहते इस पर ध्यान न देने से भविष्य में हाई ब्लड प्रेशर, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग और किडनी संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। क्यों बनती है गॉल ब्लैडर में स्टोन? गॉल ब्लैडर शरीर में लिवर द्वारा बनने वाले बाइल (पित्त) को स्टोर करने का काम करता है। जब शरीर में अतिरिक्त फैट जमा होने लगता है, तो बाइल में मौजूद कोलेस्ट्रॉल और अन्य तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है। धीरे-धीरे यही असंतुलन पथरी बनने का कारण बनता है। विशेषज्ञों के अनुसार, गॉल ब्लैडर स्टोन कई बार यह संकेत देता है कि शरीर का मेटाबॉलिज्म सही तरीके से काम नहीं कर रहा है। ऐसे लोगों में आगे चलकर कई मेटाबॉलिक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। किन बीमारियों का बढ़ सकता है खतरा? यदि गॉल ब्लैडर स्टोन के साथ मोटापा या फैटी लिवर भी मौजूद है, तो भविष्य में इन समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है— फैटी लिवर हाई ब्लड प्रेशर टाइप-2 डायबिटीज हृदय रोग किडनी से जुड़ी समस्याएं मेटाबॉलिक सिंड्रोम ऑपरेशन के बाद भी क्यों जरूरी है सावधानी? गॉल ब्लैडर निकालने की सर्जरी के बाद अधिकांश लोग सामान्य जीवन जी सकते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि समस्या की जड़ खत्म हो गई। यदि वजन, खानपान और जीवनशैली में सुधार नहीं किया गया, तो फैटी लिवर और अन्य मेटाबॉलिक बीमारियों का खतरा बना रह सकता है। इसलिए ऑपरेशन के बाद भी हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना बेहद जरूरी है। फैमिली हिस्ट्री भी बढ़ा सकती है जोखिम यदि परिवार में माता-पिता या करीबी रिश्तेदारों को गॉल ब्लैडर स्टोन की समस्या रही है, तो अगली पीढ़ी में भी इसका खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में बचपन से ही संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ वजन बनाए रखना जरूरी है। किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें? पेट के दाईं ओर तेज दर्द तैलीय भोजन के बाद पेट दर्द मतली या उल्टी अपच और गैस पीठ या दाएं कंधे तक फैलने वाला दर्द यदि ये लक्षण बार-बार दिखाई दें, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। क्या खाएं? स्वस्थ गॉल ब्लैडर और लिवर के लिए इन चीजों को आहार में शामिल करें— हरी पत्तेदार सब्जियां मौसमी फल ओट्स और साबुत अनाज दालें और बीन्स लो-फैट दही ब्राउन राइस पर्याप्त पानी सीमित मात्रा में ड्राई फ्रूट्स किन चीजों से बचें? डीप फ्राइड फूड फास्ट फूड अधिक घी और मक्खन मीठे पेय और सॉफ्ट ड्रिंक्स अत्यधिक चीनी प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड कौन-सी एक्सरसाइज करें? रोजाना कम से कम 30–45 मिनट शारीरिक गतिविधि अपनाएं— तेज चाल से वॉक साइकिलिंग स्विमिंग योग सूर्य नमस्कार हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज एक्सपर्ट टिप्स वजन को नियंत्रित रखें। अचानक बहुत तेजी से वजन कम करने की कोशिश न करें। संतुलित और कम वसा वाला भोजन लें। रोजाना पर्याप्त पानी पिएं। नियमित हेल्थ चेकअप कराएं। लंबे समय तक पेट दर्द या पाचन संबंधी परेशानी को नजरअंदाज न करें। ध्यान रखें: गॉल ब्लैडर स्टोन केवल सर्जरी तक सीमित समस्या नहीं है। यह शरीर के मेटाबॉलिक स्वास्थ्य का संकेत भी हो सकता है। यदि समय रहते स्वस्थ खानपान, नियमित व्यायाम और वजन नियंत्रण पर ध्यान दिया जाए, तो कई गंभीर बीमारियों के खतरे को कम किया जा सकता है। किसी भी लक्षण या परेशानी की स्थिति में स्वयं इलाज करने के बजाय योग्य चिकित्सक से सलाह लेना सबसे सुरक्षित विकल्प है.
नई दिल्ली, एजेंसियां। बारिश के मौसम में दोपहिया वाहन चलाते समय हेलमेट आपकी सुरक्षा का सबसे अहम साधन होता है। लेकिन लगातार नमी, बारिश और गंदगी हेलमेट की मजबूती और सुरक्षा क्षमता को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के दौरान हेलमेट की सही देखभाल करना उतना ही जरूरी है, जितना उसे पहनना। EPS लाइनर को सही तरीके से सुखाएं हेलमेट के अंदर मौजूद EPS (Expanded Polystyrene) लाइनर झटकों को सोखने का काम करता है। बारिश में भीगने के बाद हेलमेट को बंद जगह पर छोड़ देने से यह परत कमजोर हो सकती है। ऐसे में पैडिंग निकालकर पंखे की हवा में सुखाएं और हेयर ड्रायर या तेज धूप से बचें। रबर बीडिंग और वाइजर की नियमित देखभाल करें हेलमेट के वाइजर के चारों ओर लगी रबर बीडिंग पानी को अंदर आने से रोकती है। मानसून में इस पर समय-समय पर सिलिकॉन स्प्रे या सिलिकॉन ग्रीस लगाने से इसकी लचक बनी रहती है। साथ ही बेहतर विजिबिलिटी के लिए एंटी-फॉग और स्क्रैच-रेजिस्टेंट वाइजर का इस्तेमाल करना चाहिए। डबल-लेयर फॉग प्रोटेक्शन से बढ़ेगी सुरक्षा बारिश के दौरान तापमान में अंतर के कारण वाइजर पर धुंध जम जाती है। ऐसे में पिनलॉक लेंस या डबल-लेयर फॉग प्रोटेक्शन वाले हेलमेट बेहतर विकल्प साबित होते हैं। इससे विजिबिलिटी बनी रहती है और दुर्घटना का खतरा कम होता है। स्ट्रैप और बकल को जंग से बचाएं लगातार नमी के संपर्क में रहने से हेलमेट का मेटल बकल और लॉकिंग सिस्टम जाम हो सकता है। विशेषज्ञ हर 15 दिन में इसकी सफाई करने और जरूरत पड़ने पर हल्के एंटी-रस्ट स्प्रे का उपयोग करने की सलाह देते हैं, ताकि लॉकिंग सिस्टम सही तरीके से काम करता रहे। छोटी सावधानियां, बड़ी सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, सूखा EPS लाइनर, साफ वाइजर, मजबूत रबर सील और जंग-रहित बकल जैसी छोटी-छोटी सावधानियां हेलमेट की उम्र बढ़ाने के साथ-साथ आपकी सुरक्षा भी सुनिश्चित करती हैं। नियमित रूप से बाइक चलाने वाले लोगों को मानसून में इन उपायों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा जरूर बनाना चाहिए।
थायरॉइड से जुड़ी समस्याएं महिलाओं में आम हैं, लेकिन उनमें Hashimoto’s Thyroiditis (हाशिमोटो थायरॉइडिटिस) सबसे अधिक पाई जाने वाली ऑटोइम्यून थायरॉइड बीमारी मानी जाती है। इस बीमारी में शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से थायरॉइड ग्रंथि पर ही हमला करने लगता है, जिससे धीरे-धीरे उसकी कार्यक्षमता कम होने लगती है और हाइपोथायरॉइडिज्म (Hypothyroidism) विकसित हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह बीमारी पुरुषों की तुलना में महिलाओं में 7 से 10 गुना अधिक देखी जाती है। इसके पीछे हार्मोनल बदलाव, आनुवंशिक कारण और इम्यून सिस्टम की कार्यप्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। क्या है Hashimoto’s Thyroiditis? Hashimoto’s Thyroiditis एक क्रोनिक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली थायरॉइड ग्रंथि के खिलाफ एंटीबॉडी बनाती है। ये एंटीबॉडी धीरे-धीरे थायरॉइड कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे थायरॉइड हार्मोन का उत्पादन कम होने लगता है। शुरुआत में कई मरीजों में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन समय के साथ यह बीमारी हाइपोथायरॉइडिज्म का कारण बन सकती है। महिलाओं में यह बीमारी ज्यादा क्यों होती है? स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार महिलाओं में एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन इम्यून सिस्टम को अधिक सक्रिय बनाते हैं। यही वजह है कि महिलाओं में ऑटोइम्यून बीमारियों का खतरा पुरुषों की तुलना में अधिक होता है। इन परिस्थितियों में जोखिम और बढ़ सकता है— गर्भावस्था के दौरान प्रसव के बाद मेनोपॉज के समय हार्मोनल बदलाव के दौरान Hashimoto’s Thyroiditis होने के प्रमुख कारण यह बीमारी किसी एक कारण से नहीं होती, बल्कि कई कारकों के संयुक्त प्रभाव से विकसित होती है। मुख्य कारणों में शामिल हैं— परिवार में थायरॉइड या ऑटोइम्यून बीमारी का इतिहास हार्मोनल बदलाव वायरल संक्रमण अत्यधिक आयोडीन का सेवन (कुछ मामलों में) विटामिन D या सेलेनियम की कमी पर्यावरणीय कारण आनुवंशिक संवेदनशीलता इन शुरुआती लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें Hashimoto’s Thyroiditis के लक्षण धीरे-धीरे विकसित होते हैं। इनमें शामिल हैं— हर समय थकान महसूस होना बिना कारण वजन बढ़ना ठंड अधिक लगना बालों का झड़ना त्वचा का रूखा होना कब्ज की समस्या चेहरे या गर्दन में सूजन ध्यान लगाने में कठिनाई याददाश्त कमजोर होना महिलाओं में अनियमित पीरियड्स मूड में बदलाव या अवसाद किन लोगों में ज्यादा रहता है खतरा? इन लोगों में Hashimoto’s Thyroiditis होने का जोखिम अधिक माना जाता है— 30 से 60 वर्ष की महिलाएं परिवार में थायरॉइड रोग का इतिहास टाइप-1 डायबिटीज के मरीज रूमेटाइड आर्थराइटिस से पीड़ित लोग सीलिएक डिजीज के मरीज विटिलिगो या अन्य ऑटोइम्यून बीमारी वाले लोग हाल ही में मां बनी महिलाएं क्या यह बीमारी पूरी तरह ठीक हो सकती है? विशेषज्ञों के अनुसार Hashimoto’s Thyroiditis को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन सही इलाज और नियमित निगरानी से इसे प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। यदि थायरॉइड हार्मोन का स्तर कम हो जाता है, तो डॉक्टर थायरॉइड हार्मोन रिप्लेसमेंट दवा देते हैं, जिससे हार्मोन की कमी पूरी होती है और अधिकांश लक्षणों में सुधार आता है। कुछ मरीजों में थायरॉइड ग्रंथि बड़ी होकर गोइटर (Goiter) का रूप ले सकती है। यदि इससे निगलने, बोलने या सांस लेने में परेशानी हो, तो डॉक्टर सर्जरी की सलाह भी दे सकते हैं। कब डॉक्टर से मिलना चाहिए? यदि लंबे समय तक— लगातार थकान बनी रहे, बिना वजह वजन बढ़ने लगे, बाल तेजी से झड़ने लगें, ठंड अधिक महसूस हो, पीरियड्स अनियमित हो जाएं, तो बिना देरी किए एंडोक्राइनोलॉजिस्ट से सलाह लें और थायरॉइड की जांच कराएं। समय पर पहचान और नियमित उपचार से इस बीमारी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।