इजरायल

Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu concerned over possible US-Iran agreement during ongoing diplomatic talks
अमेरिका-ईरान वार्ता के बीच इजरायल की बढ़ी बेचैनी, नेतन्याहू को सता रहा ‘खराब समझौते’ का डर

अमेरिका और ईरान के बीच जारी शांति समझौते की बातचीत ने पश्चिम एशिया की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं। इस बीच इजरायल की चिंता बढ़ती दिखाई दे रही है। रिपोर्टों के अनुसार, इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu को आशंका है कि अमेरिका और ईरान के बीच होने वाला संभावित समझौता इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को पर्याप्त महत्व दिए बिना आगे बढ़ सकता है। वार्ता में इजरायल का प्रभाव घटने की चर्चा रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में इजरायल की भूमिका पहले की तुलना में काफी सीमित हो गई है। बताया जा रहा है कि नेतन्याहू ने निजी बातचीत में स्वीकार किया है कि मौजूदा वार्ता प्रक्रिया पर उनका प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा और अंतिम निर्णय मुख्य रूप से वाशिंगटन और तेहरान के बीच ही तय हो रहे हैं। सार्वजनिक रूप से इजरायली नेतृत्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की आलोचना करने से बच रहा है, लेकिन अंदरखाने बढ़ती चिंता की खबरें सामने आ रही हैं। ईरान पर दबाव बनाए रखने की थी मांग सूत्रों के अनुसार, अप्रैल में घोषित शुरुआती युद्धविराम के बाद नेतन्याहू लगातार इस बात की वकालत करते रहे कि ईरान पर सैन्य और आर्थिक दबाव बनाए रखा जाए। उनका मानना था कि लगातार दबाव से तेहरान की रणनीतिक क्षमता कमजोर की जा सकती है। लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने सैन्य दबाव बढ़ाने के बजाय कूटनीतिक बातचीत और समझौते के रास्ते को प्राथमिकता दी। इससे दोनों सहयोगी देशों के दृष्टिकोण में अंतर स्पष्ट हो गया। किन मुद्दों को लेकर चिंतित है इजरायल? इजरायल की सबसे बड़ी चिंता यह है कि संभावित समझौते में ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों (प्रॉक्सी नेटवर्क) से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त प्रतिबंध या नियंत्रण शामिल न हो। इजरायली अधिकारियों का मानना है कि यदि इन प्रमुख सुरक्षा मुद्दों का समाधान किए बिना ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दी जाती है, तो तेहरान को रणनीतिक लाभ मिल सकता है। 'खराब अंतरिम समझौते' का डर रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली अधिकारियों को आशंका है कि अमेरिका किसी ऐसे अंतरिम समझौते पर सहमत हो सकता है जो ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर केवल सीमित नियंत्रण स्थापित करे। इजरायल चाहता है कि किसी भी समझौते में ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार को लेकर स्पष्ट और सत्यापित प्रावधान हों। इजरायली पक्ष का तर्क है कि केवल आश्वासनों के आधार पर किया गया समझौता भविष्य में नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। पश्चिम एशिया की राजनीति पर रहेगा असर विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच कोई व्यापक समझौता होता है, तो उसका असर पूरे पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन व्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में इजरायल, खाड़ी देशों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है, जबकि इजरायल अपनी सुरक्षा चिंताओं को लेकर लगातार अमेरिकी प्रशासन के संपर्क में बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि संभावित समझौते में इजरायल की मांगों को कितनी जगह मिलती है।  

surbhi मई 30, 2026 0
Pakistan Foreign Minister Ishaq Dar and Marco Rubio during press briefing on Israel recognition question
इजरायल को मान्यता देने के सवाल पर असहज दिखे पाक विदेश मंत्री, मार्को रुबियो के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़कर निकले

अमेरिका के आग्रह के बावजूद पाकिस्तान ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि वह फिलहाल इजरायल को मान्यता देने के पक्ष में नहीं है। इस मुद्दे पर वॉशिंगटन में एक प्रेस कार्यक्रम के दौरान उस समय असहज स्थिति बन गई जब एक पत्रकार ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री Ishaq Dar से इजरायल को मान्यता देने को लेकर सवाल पूछा। सवाल के तुरंत बाद डार और अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio कार्यक्रम स्थल से निकल गए। रिपोर्टर के सवाल से बढ़ी चर्चा वॉशिंगटन में दोनों नेताओं की बैठक के बाद मीडिया से बातचीत के दौरान एक पत्रकार ने पूछा कि क्या पाकिस्तान इजरायल को मान्यता देने पर विचार कर रहा है। यह सवाल ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump कई मुस्लिम और अरब देशों से इजरायल के साथ संबंध सामान्य बनाने की अपील कर चुके हैं। इस सवाल का सीधा जवाब मौके पर नहीं दिया गया और दोनों नेता वहां से चले गए, जिससे इस मुद्दे पर नई चर्चा शुरू हो गई। पाकिस्तान ने दोहराया अपना पुराना रुख बाद में मीडिया से बातचीत में इशाक डार ने कहा कि फिलिस्तीन और गाजा के मुद्दे पर पाकिस्तान का रुख नहीं बदला है। उन्होंने कहा कि जब तक स्वतंत्र फलस्तीनी राज्य की दिशा में ठोस प्रगति नहीं होती, तब तक पाकिस्तान इजरायल के साथ अपने संबंधों या नीति में किसी बदलाव पर विचार नहीं करेगा। ट्रंप ने की थी मुस्लिम देशों से अपील राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि उन्होंने Saudi Arabia, Qatar, Pakistan, Turkey, Egypt और Jordan से सामूहिक रूप से अब्राहम समझौते में शामिल होने और इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने का आग्रह किया है। अमेरिका का मानना है कि इससे पश्चिम एशिया में स्थिरता बढ़ेगी और क्षेत्रीय तनाव कम करने में मदद मिलेगी। क्या है अब्राहम समझौता? Abraham Accords ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान शुरू की गई एक कूटनीतिक पहल थी, जिसका उद्देश्य इजरायल और अरब देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाना था। इस समझौते के तहत United Arab Emirates, Bahrain और Morocco ने इजरायल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए। Sudan ने भी समझौते में शामिल होने की घोषणा की थी, उसने अभी तक पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए हैं। पाकिस्तान ने क्यों ठुकराया प्रस्ताव? पाकिस्तान लंबे समय से यह कहता रहा है कि वह फिलिस्तीनी मुद्दे के स्थायी समाधान और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना से पहले इजरायल को मान्यता नहीं देगा। इसी वजह से ट्रंप की अपील के बावजूद इस्लामाबाद ने अब्राहम समझौते में शामिल होने के सुझाव को फिलहाल खारिज कर दिया है। पाकिस्तान और इजरायल के बीच आज भी कोई औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं।  

surbhi मई 30, 2026 0
Benjamin Netanyahu and Donald Trump discuss Israel’s security strategy, Iran talks, and Lebanon operations.
लेबनान में जारी रहेंगे इजरायली हमले! ट्रंप से बोले नेतन्याहू- खतरा खत्म करने की आजादी चाहिए

Benjamin Netanyahu ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के साथ हुई अहम बातचीत में साफ संकेत दिया है कि Israel अपनी सुरक्षा नीति में किसी तरह की नरमी नहीं बरतेगा। अमेरिका और Iran के बीच संभावित शांति समझौते की चर्चाओं के बीच नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल को Lebanon समेत हर मोर्चे पर सैन्य कार्रवाई करने की पूरी स्वतंत्रता चाहिए। लेबनान में कार्रवाई जारी रखने पर जोर रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेतन्याहू ने ट्रंप से फोन पर बातचीत के दौरान कहा कि इजरायल अपने खिलाफ किसी भी खतरे पर कार्रवाई करने की आजादी बनाए रखेगा। इसमें लेबनान में चल रहे अभियान भी शामिल हैं, जहां इजरायली सेना ईरान समर्थित Hezbollah के खिलाफ लगातार ऑपरेशन चला रही है। बताया गया कि ट्रंप ने भी इजरायल के इस रुख का समर्थन किया। ईरानी परमाणु कार्यक्रम पर ट्रंप सख्त रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने बातचीत में दोहराया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने और ईरानी क्षेत्र से समृद्ध यूरेनियम हटाने की मांग पर अमेरिका कायम रहेगा। उन्होंने साफ किया कि इन शर्तों के बिना किसी अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए जाएंगे। बातचीत के बाद ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि नेतन्याहू के साथ उनकी बातचीत “बेहद अच्छी” रही। नेतन्याहू ने किया बातचीत का खुलासा नेतन्याहू ने भी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बताया कि उन्होंने ट्रंप के साथ ईरान के परमाणु कार्यक्रम और Strait of Hormuz को दोबारा खोलने से जुड़े समझौते पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि “ऑपरेशन रोअरिंग लायन” और “एपिक फ्यूरी” के दौरान अमेरिकी और इजरायली सेनाओं ने मिलकर ईरानी खतरे के खिलाफ काम किया। साथ ही उन्होंने इजरायल की सुरक्षा के प्रति ट्रंप की प्रतिबद्धता की भी सराहना की। होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने पर बन रहा समझौता इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर बातचीत तेज हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर काफी हद तक चर्चा पूरी हो चुकी है, जिसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना है। फरवरी में अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद यह समुद्री मार्ग लगभग बंद हो गया था, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई। रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि Pakistan की मध्यस्थता से वार्ता आगे बढ़ रही है। ड्राफ्ट समझौते में क्या शर्तें? ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रस्तावित मसौदे में यह शर्त शामिल है कि अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान या उसके समर्थक समूहों पर हमला नहीं करेंगे। बदले में ईरान भी पहले हमला न करने का आश्वासन देगा। इजरायल के भीतर इस संभावित समझौते को लेकर मतभेद दिखाई दे रहे हैं। Benny Gantz ने चेतावनी दी है कि यदि समझौते के हिस्से के रूप में लेबनान में युद्धविराम लागू किया गया, तो यह इजरायल के लिए रणनीतिक गलती साबित हो सकती है।  

surbhi मई 25, 2026 0
Donald Trump announces Israel Lebanon ceasefire extension amid Hezbollah tensions and diplomatic talks
ट्रंप का बड़ा दावा: इजरायल–हिज़्बुल्लाह सीजफायर 3 हफ्ते बढ़ा, लेबनान युद्ध में कूटनीतिक मोड़

व्हाइट हाउस में बातचीत के बाद सीजफायर बढ़ाने की घोषणा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि इजरायल और लेबनान के बीच चल रहे संघर्ष में लागू सीजफायर को तीन सप्ताह के लिए बढ़ा दिया गया है। यह फैसला व्हाइट हाउस में हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद लिया गया बताया जा रहा है, जिसमें दोनों देशों के राजदूतों की मुलाकात भी शामिल थी। ट्रंप ने कहा कि बातचीत “सकारात्मक और सफल” रही, हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस प्रक्रिया में हिज़्बुल्लाह की भूमिका एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। दशकों बाद सीधी बातचीत, लेकिन तनाव अभी भी कायम रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह पहली बार है जब इजरायल और लेबनान के बीच दशकों बाद सीधे कूटनीतिक बातचीत हुई है। दोनों देश औपचारिक रूप से लंबे समय से युद्ध की स्थिति में माने जाते रहे हैं। पहले लागू 10 दिनों के अस्थायी सीजफायर की समय सीमा सोमवार को खत्म होनी थी, लेकिन अब इसे तीन हफ्ते और बढ़ा दिया गया है। ट्रंप का बयान: “इजरायल को आत्मरक्षा का अधिकार है” व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि इजरायल को आत्मरक्षा का पूरा अधिकार है, खासकर तब जब उस पर हमला हो। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए आगे भी बातचीत जारी रहेगी और अमेरिका इस प्रक्रिया में सहयोग करेगा। लेबनान और इजरायल के बीच शांति की उम्मीद लेबनान और इजरायल के राजनयिकों ने इस बातचीत को सकारात्मक बताया है। लेबनान के प्रतिनिधियों ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच स्थायी शांति की दिशा में प्रगति हो सकती है। लेबनान के नेतृत्व ने संकेत दिया है कि भविष्य की बातचीत में सीमा विवाद, सैनिकों की वापसी और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण जैसे मुद्दे शामिल होंगे। हिज़्बुल्लाह बना सबसे बड़ी चुनौती हालांकि, इस कूटनीतिक पहल के बीच हिज़्बुल्लाह एक प्रमुख बाधा के रूप में सामने है। संगठन ने अब तक इस बातचीत का हिस्सा बनने से इनकार किया है और किसी भी समझौते को मानने से भी इंकार किया है। इजरायल का कहना है कि जब तक हिज़्बुल्लाह का प्रभाव कम नहीं होता, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति मुश्किल है। युद्ध और मानवीय संकट का गंभीर असर इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर लेबनान की जनता पर पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले युद्ध में हजारों लोगों की मौत हुई है, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा, लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं, जिससे मानवीय संकट और गहरा गया है। शांति की दिशा में कदम, लेकिन चुनौतियां बरकरार इजरायल और लेबनान के बीच सीधी बातचीत और सीजफायर विस्तार को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम माना जा रहा है। हालांकि, हिज़्बुल्लाह की भूमिका, क्षेत्रीय तनाव और पुराना युद्ध इतिहास इस प्रक्रिया को अभी भी जटिल बनाए हुए हैं।  

surbhi अप्रैल 24, 2026 0
Iranian Foreign Ministry spokesperson Esmail Baghaei addressing media amid rising Middle East tensions
ईरान की पड़ोसी देशों से अपील: अमेरिका-इजरायल का साथ न दें, क्षेत्र की शांति पर सवाल

  तेहरान: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका और इजरायल पर गंभीर आरोप लगाते हुए पड़ोसी देशों से अहम अपील की है। ईरान का कहना है कि अमेरिका और इजरायल क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहे हैं और उन्हें यहां के लोगों की सुरक्षा से कोई मतलब नहीं है। ‘हमले के लिए अपनी जमीन न दें’ ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने साफ कहा कि पड़ोसी देश अपनी जमीन, समुद्र या हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए न होने दें। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि कुछ देशों ने “अनजाने में” अपनी सुविधाओं का गलत इस्तेमाल होने दिया है, जिसे तुरंत रोका जाना चाहिए। ‘अमेरिका-इजरायल से शांति को खतरा’ ईरान का आरोप है कि पिछले 40 दिनों की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि अमेरिका और इजरायल की नीतियां क्षेत्र में शांति के बजाय तनाव बढ़ाने वाली हैं। तेहरान ने दोहराया कि वह अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध और संप्रभुता के सम्मान में विश्वास रखता है, लेकिन किसी भी तरह की सैन्य साझेदारी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पाकिस्तान के जरिए बातचीत की कोशिश तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयास भी तेज हो गए हैं। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर तेहरान पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से हुई। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान, वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत का नया रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है। ट्रंप का रुख सख्त वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि वह सीजफायर बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं, हालांकि उन्होंने बातचीत के जरिए समाधान की उम्मीद जताई है। डिप्लोमैटिक सूत्रों के मुताबिक, आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बड़ा अपडेट सामने आ सकता है। बढ़ सकता है क्षेत्रीय तनाव मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बदल रहे हैं। एक तरफ सैन्य तनाव बना हुआ है, तो दूसरी तरफ कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं। अब नजर इस बात पर है कि क्या बातचीत के जरिए समाधान निकलता है या क्षेत्र में टकराव और गहराता है।  

surbhi अप्रैल 16, 2026 0
US-Israel Strikes Fail to Stop Iran Nuclear Program
US-इजरायल हमलों के बावजूद सुरक्षित ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम, रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। अमेरिका और इजरायल के हमलों के बावजूद ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम लगभग सुरक्षित बना हुआ है। हमलों का सीमित असर The Wall Street Journal की रिपोर्ट के मुताबिक, हफ्तों तक चले हवाई हमलों और मिसाइल स्ट्राइक के बाद भी ईरान के परमाणु ढांचे को पूरी तरह नुकसान नहीं पहुंचाया जा सका। कुछ लैब्स और ‘येलोकेक’ साइट्स जरूर प्रभावित हुई हैं, लेकिन मुख्य इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी सक्रिय है। गुप्त सुरंगों में छिपा यूरेनियम रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने अपने वेपन्स-ग्रेड यूरेनियम का बड़ा हिस्सा गहरी भूमिगत सुरंगों में सुरक्षित रखा हुआ है। International Atomic Energy Agency के अनुसार, ईरान के पास करीब 450 किलोग्राम उच्च संवर्धित यूरेनियम मौजूद है, जो परमाणु हथियार बनाने के लिए अहम माना जाता है। सेंट्रीफ्यूज और टेक्नोलॉजी बरकरार विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के पास अब भी उन्नत सेंट्रीफ्यूज और ऐसे गुप्त ठिकाने हैं, जहां यूरेनियम को हथियार-स्तर तक संवर्धित किया जा सकता है। इससे साफ है कि ईरान की परमाणु क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इस्फहान साइट बनी अहम केंद्र रिपोर्ट के मुताबिक, यूरेनियम का एक बड़ा हिस्सा Isfahan स्थित परमाणु साइट के नीचे गहरी सुरंगों में सुरक्षित रखा गया है। यह जगह ईरान के परमाणु कार्यक्रम का महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई है। वैश्विक चिंता बढ़ी इस खुलासे के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन बंद करे, लेकिन ईरान इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं है।  

surbhi अप्रैल 13, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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