दक्षिण भारत की राजनीति में इस समय सबसे बड़ी चर्चा Indian National Congress के अंदर चल रही मुख्यमंत्री पद की दौड़ को लेकर है। Kerala में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) को विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत मिलने के बावजूद अब तक मुख्यमंत्री के नाम पर अंतिम फैसला नहीं हो पाया है। चुनाव परिणाम आए एक सप्ताह से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन दिल्ली से लेकर तिरुवनंतपुरम तक लगातार बैठकों और मंथन का दौर जारी है। दिल्ली में होगी अहम बैठक कांग्रेस हाईकमान ने मंगलवार (12 मई) को केरल कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और पूर्व प्रदेश अध्यक्षों को दिल्ली बुलाया है। पूर्व KPCC अध्यक्ष K. Muraleedharan और V. M. Sudheeran को भी आलाकमान की ओर से बुलावा भेजा गया है। सुधीरन ने कहा कि उन्हें AICC से अचानक कॉल आना थोड़ा हैरान करने वाला था, लेकिन उन्होंने तुरंत दिल्ली जाने की तैयारी कर ली। माना जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व उनसे राज्य के मौजूदा राजनीतिक हालात, संभावित नेतृत्व और संगठनात्मक संतुलन को लेकर राय ले सकता है। 140 में से 102 सीटें जीतकर सत्ता में लौटा UDF 9 अप्रैल को हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई वाले UDF ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 140 में से 102 सीटों पर जीत दर्ज की। यह जीत केरल की राजनीति में बड़ा बदलाव मानी जा रही है। हालांकि भारी बहुमत के बावजूद मुख्यमंत्री पद को लेकर पार्टी के भीतर सहमति नहीं बन पाई है। खरगे आवास पर हुई थी बड़ी बैठक शनिवार (9 मई) को दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष Mallikarjun Kharge के आवास पर एक अहम बैठक हुई थी। इसमें Rahul Gandhi, केरल प्रभारी Deepa Dasmunsi, KPCC अध्यक्ष Sunny Joseph, संगठन महासचिव K. C. Venugopal, वरिष्ठ नेता Ramesh Chennithala और V. D. Satheesan शामिल हुए थे। बैठक में सरकार गठन, कैबिनेट संतुलन और संगठनात्मक समीकरणों पर चर्चा हुई, लेकिन मुख्यमंत्री के नाम पर अंतिम सहमति नहीं बन सकी। सीएम पद की दौड़ में कौन-कौन? चुनाव नतीजों के बाद से कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर लॉबिंग तेज हो गई है। फिलहाल तीन बड़े नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं— V. D. Satheesan Ramesh Chennithala K. C. Venugopal सूत्रों के मुताबिक, तीनों खेमे दिल्ली में अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं। पार्टी नेतृत्व जातीय और क्षेत्रीय संतुलन, संगठन पर पकड़ और भविष्य की रणनीति को ध्यान में रखते हुए फैसला लेना चाहता है। क्या है कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती? कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मुख्यमंत्री ऐसा चुना जाए जो सरकार और संगठन दोनों को साथ लेकर चल सके। पार्टी हाईकमान नहीं चाहता कि नेतृत्व चयन को लेकर किसी तरह की अंदरूनी नाराजगी सामने आए, क्योंकि इससे नई सरकार की शुरुआत प्रभावित हो सकती है। अब सबकी नजर दिल्ली में होने वाली बैठकों पर टिकी है, जहां से केरल के अगले मुख्यमंत्री के नाम पर तस्वीर साफ हो सकती है।
नई दिल्ली/गुवाहाटी/तिरुवनंतपुरम/पुडुचेरी: केरल, असम और पुडुचेरी की सभी विधानसभा सीटों पर आज (गुरुवार, 9 अप्रैल) मतदान जारी है। सुबह 7 बजे से शुरू हुई वोटिंग एक ही चरण में हो रही है। इन राज्यों में कुल 296 सीटों पर वोट डाले जा रहे हैं और नतीजे 4 मई को घोषित होंगे। कहां कितनी सीटों पर मतदान? असम: 126 सीटें केरल: 140 सीटें पुडुचेरी: 30 सीटें असम: 722 उम्मीदवार मैदान में कुल 722 उम्मीदवारों की किस्मत दांव पर करीब 2.50 करोड़ मतदाता मतदान करेंगे 31,490 मतदान केंद्र बनाए गए शाम 5 बजे तक वोटिंग जारी बीजेपी तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश में, कांग्रेस भी जोरदार मुकाबले में केरल: 883 उम्मीदवार, कड़ी सुरक्षा 883 उम्मीदवार चुनावी मैदान में करीब 2.71 करोड़ मतदाता वोट डालेंगे 30,495 मतदान केंद्र स्थापित 1.46 लाख चुनाव कर्मी तैनात सुरक्षा के लिए 76,000 पुलिस और केंद्रीय बल मौजूद PM मोदी की अपील प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम, केरल और पुडुचेरी के लोगों से बड़ी संख्या में मतदान करने की अपील की। युवाओं और महिलाओं से खासतौर पर आगे आने को कहा लोकतंत्र के इस पर्व में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का आग्रह नेताओं ने डाला वोट केरल की स्वास्थ्य मंत्री वीना जॉर्ज ने पथानामथिट्टा में मतदान किया मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने धर्मदम सीट पर वोट डाला
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के एक बयान को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है। केरल में चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए उनके बयान पर बीजेपी ने कड़ा ऐतराज जताया है और इसे “अपमानजनक” बताते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा है। क्या कहा था खड़गे ने? दरअसल, 5 अप्रैल को केरल में एक रैली को संबोधित करते हुए खड़गे ने कहा कि केरल के लोग “समझदार और शिक्षित” हैं, इसलिए उन्हें गुमराह नहीं किया जा सकता। इसी दौरान उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “गुजरात या अन्य जगहों के अशिक्षित लोगों को मूर्ख बना सकते हैं”, लेकिन केरल के लोगों को नहीं। उनके इस बयान को बीजेपी ने गुजरात और उत्तर भारत के लोगों का अपमान बताया है। बीजेपी का तीखा पलटवार बीजेपी ने खड़गे के बयान को लेकर कांग्रेस पर जमकर हमला बोला। पार्टी के नेताओं ने इसे “फूट डालो और राज करो” की राजनीति का उदाहरण बताया। बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि कांग्रेस चुनाव हारने पर जनता का अपमान करने लगती है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के अन्य नेता भी इस तरह की टिप्पणी से सहमत हैं। वहीं, बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि केरल के लोग सच में शिक्षित और समझदार हैं, लेकिन कांग्रेस और वाम दलों ने उनके साथ न्याय नहीं किया। उन्होंने दावा किया कि आने वाले चुनाव में जनता कांग्रेस को करारा जवाब देगी। “विभाजनकारी राजनीति” का आरोप बीजेपी के अन्य नेताओं ने भी कांग्रेस पर क्षेत्रीय विभाजन पैदा करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि पार्टी लंबे समय से उत्तर और दक्षिण भारत के बीच विभाजन की राजनीति करती रही है। चुनावी माहौल में बढ़ा विवाद केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा के लिए 9 अप्रैल को मतदान होना है। ऐसे में खड़गे के बयान ने चुनावी माहौल को और गर्म कर दिया है। चुनाव से ठीक पहले इस तरह के बयान से राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ीं खड़गे के इस बयान के बाद कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है, खासकर उन राज्यों में जहां पार्टी पहले से ही अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
आगामी विधानसभा चुनावों से पहले Bharatiya Janata Party ने असम, केरल और पश्चिम बंगाल को लेकर अपनी व्यापक रणनीति तैयार कर ली है। राजधानी दिल्ली में हुई केंद्रीय चुनाव समिति की अहम बैठक में प्रधानमंत्री Narendra Modi, गृह मंत्री Amit Shah और रक्षा मंत्री Rajnath Singh समेत शीर्ष नेतृत्व ने इन राज्यों में चुनावी गणित और संभावनाओं पर विस्तार से मंथन किया। असम: गठबंधन के साथ चुनावी मैदान Assam में पार्टी ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। Asom Gana Parishad Bodoland People's Front इन दलों के साथ सीट शेयरिंग के जरिए चुनावी मजबूती बढ़ाने की रणनीति बनाई गई है। बताया जा रहा है कि 89 सीटों पर गहन चर्चा हुई है और जल्द ही उम्मीदवारों की सूची जारी की जा सकती है। इस रणनीति में मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma की अहम भूमिका रही है। केरल: 100 सीटों पर बड़ा दांव Kerala में पार्टी ने इस बार आक्रामक रणनीति अपनाई है। 140 सदस्यीय विधानसभा में से 100 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का लक्ष्य रखा गया है। पहली सूची में ही कई बड़े नामों को टिकट दिया गया है: Rajeev Chandrasekhar – नेमोम सीट George Kurian – कांजिराप्पिली सीट गौरतलब है कि 2021 के चुनाव में पार्टी को यहां एक भी सीट नहीं मिली थी। ऐसे में यह रणनीति राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने और तीसरे विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश मानी जा रही है। बंगाल: पहली बार सत्ता में आने का लक्ष्य West Bengal में पार्टी ने इस बार ‘क्लीन स्वीप’ का लक्ष्य रखा है। बीजेपी 150 से अधिक सीटों पर मजबूत लड़ाई की तैयारी में है। पहले ही 144 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की जा चुकी है, जिसमें प्रमुख चेहरे शामिल हैं: Suvendu Adhikari Dilip Ghosh राज्य की कुल 294 सीटों में मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है, क्योंकि सत्तारूढ़ दल All India Trinamool Congress भी 291 सीटों पर उम्मीदवार उतार चुका है। चुनावी टाइमलाइन और सियासी समीकरण Kerala में 9 अप्रैल को एक चरण में मतदान होना है। वहीं कांग्रेस और वाम दल भी अपनी-अपनी रणनीतियों के साथ मैदान में उतर चुके हैं। बीजेपी का यह पूरा प्लान दर्शाता है कि पार्टी उन राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है, जहां अब तक उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि यह रणनीति जमीन पर कितनी कारगर साबित होती है।
केरल में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इसी क्रम में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 55 सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की नई सूची जारी कर दी है। इस सूची में पार्टी ने अनुभव और संगठनात्मक संतुलन साधते हुए 20 मौजूदा विधायकों को दोबारा मौका दिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस इस चुनाव में स्थिरता और भरोसे की रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है। दिग्गज नेताओं पर कांग्रेस का भरोसा घोषित सूची में कई प्रमुख नेताओं को फिर से चुनावी मैदान में उतारा गया है: रमेश चेन्निथला – हरिपद सीट वी.डी. सतीशन – परवूर सीट सनी जोसेफ – पेरावूर सीट इन नामों से स्पष्ट है कि पार्टी नेतृत्व अनुभवी चेहरों के सहारे मजबूत प्रदर्शन की उम्मीद कर रहा है। वाम मोर्चा भी तैयार, CPI ने जारी की सूची सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) की सहयोगी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी 25 सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है। पार्टी के चारों मौजूदा मंत्री फिर से चुनाव लड़ेंगे यह संकेत है कि LDF सरकार अपने प्रदर्शन पर भरोसा जता रही है कब होंगे चुनाव और कब आएंगे नतीजे? केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा के लिए: मतदान: 9 अप्रैल 2026 मतगणना: 4 मई 2026 कार्यकाल समाप्त: 23 मई 2026 यह चुनाव राज्य की राजनीतिक दिशा तय करने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। पिछला चुनाव और मौजूदा सियासी परिदृश्य 2021 के विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाले LDF ने 140 में से 99 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। इसके बाद पिनाराई विजयन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की। अब 2026 में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती LDF के मजबूत किले को भेदने की है। चुनावी तस्वीर: क्या कहती है रणनीति? कांग्रेस: अनुभव + संगठन का संतुलन LDF: प्रदर्शन और स्थिर सरकार का दावा मुकाबला: सीधा और कड़ा राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार मुकाबला पहले से ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो सकता है। केरल चुनाव 2026 में कांग्रेस की नई सूची ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। अनुभवी नेताओं पर भरोसा और रणनीतिक चयन से पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंकने को तैयार है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।