यरुशलम, एजेंसियां। गाजा में युद्ध समाप्त करने की अमेरिकी कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 15 सूत्री गाजा शांति योजना को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। नेतन्याहू ने साफ कहा है कि जब तक हमास पूरी तरह हथियार नहीं डालता, तब तक इजरायली सेना गाजा से पीछे नहीं हटेगी। इस रुख के बाद ट्रंप प्रशासन और इजरायली सरकार के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। हमास के पूर्ण निरस्त्रीकरण पर अड़े नेतन्याहू अमेरिका की प्रस्तावित योजना में गाजा में युद्ध रोकने, हमास के निरस्त्रीकरण और चरणबद्ध तरीके से इजरायली सेना की वापसी का प्रावधान है। इसके साथ ही गाजा में अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल और नई फिलिस्तीनी पुलिस व्यवस्था स्थापित करने की योजना भी शामिल है। लेकिन नेतन्याहू ने योजना के उस हिस्से पर आपत्ति जताई है, जिसमें इजरायली सेना की वापसी को व्यापक शांति प्रक्रिया से जोड़ा गया है। उनका कहना है कि इजरायल तब तक अपनी सेना वापस नहीं बुलाएगा, जब तक हमास का वास्तविक और पूर्ण निरस्त्रीकरण नहीं हो जाता। ट्रंप की योजना को लेकर बढ़ी चुनौती नेतन्याहू के विरोध से ट्रंप की गाजा शांति पहल के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। अमेरिकी योजना को लेकर इजरायल के भीतर भी राजनीतिक दबाव बना हुआ है। नेतन्याहू को एक तरफ ट्रंप प्रशासन के साथ तालमेल बनाए रखना है, वहीं दूसरी तरफ उनकी सरकार में शामिल दक्षिणपंथी सहयोगी हमास के खिलाफ कड़े रुख की मांग कर रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिकी पक्ष और इजरायल के बीच योजना के क्रियान्वयन और इजरायली सेना की वापसी के समय को लेकर बातचीत जारी है। गाजा बोर्ड ऑफ पीस से जुड़े एक अधिकारी ने भी कहा है कि नेतन्याहू की आपत्ति के बावजूद योजना अभी समाप्त नहीं हुई है और इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश जारी है। ट्रंप बोले- नेतन्याहू से रिश्ते अभी भी अच्छे मतभेदों के बीच ट्रंप ने 11 अगस्त को नेतन्याहू के साथ अपने रिश्तों को खराब बताने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि दोनों के संबंध “बहुत अच्छे” हैं। इससे संकेत मिलता है कि गाजा योजना पर दोनों नेताओं के बीच गंभीर मतभेद होने के बावजूद अमेरिका और इजरायल के रिश्तों में तत्काल किसी बड़े टूट की स्थिति नहीं है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप प्रशासन नेतन्याहू पर गाजा योजना को स्वीकार करने के लिए दबाव बढ़ाएगा या फिर इजरायल की सुरक्षा संबंधी शर्तों को शामिल करते हुए योजना में बदलाव किया जाएगा। गाजा में युद्ध समाप्त करने की अमेरिकी कोशिशों के लिए आने वाले दिनों में यह घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कंपाला, एजेंसियां। गाजा में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (International Stabilization Force) में सैनिक भेजने की दिशा में युगांडा ने बड़ा कदम उठाया है। युगांडा की संसद ने गुरुवार को देश की सेना को गाजा भेजने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यह बल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की गाजा योजना के तहत प्रस्तावित किया गया है। संसद ने तैनाती को दी मंजूरी युगांडा के रक्षा मंत्री किर्योवा किवानुका ने सांसदों को बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने जुलाई में राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी से संपर्क कर गाजा के लिए प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय बल में युगांडा की भागीदारी का अनुरोध किया था। संसद की मंजूरी के बाद युगांडा ने पहली बार सार्वजनिक रूप से इस मिशन में शामिल होने की अपनी तैयारी स्पष्ट की है। हालांकि, सैनिकों की तैनाती की तारीख और संख्या अभी स्पष्ट नहीं की गई है। गाजा में क्या करेगा अंतरराष्ट्रीय बल? ट्रंप की योजना के तहत प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल का उद्देश्य गाजा में सुरक्षा और स्थिरता कायम करने में मदद करना है। योजना में मानवीय सहायता बढ़ाने, फिलिस्तीनी तकनीकी विशेषज्ञों के प्रशासन और हमास के निरस्त्रीकरण के साथ इजरायली सेना की वापसी का भी प्रावधान बताया गया है। प्रस्तावित बल को गाजा के उन हिस्सों में तैनात किया जाना है जो इजरायल के प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं होंगे। हालांकि, योजना के क्रियान्वयन में अभी कई बाधाएं बनी हुई हैं और बल की तैनाती की समयसीमा तय नहीं हुई है। सैनिक भेजने से पहले समझौता जरूरी युगांडा के रक्षा मंत्री ने संसद में यह भी स्पष्ट किया कि सैनिकों की तैनाती से पहले Status of Forces Agreement यानी सेना की कानूनी स्थिति और अधिकारों को तय करने वाला समझौता किया जाएगा। युगांडा पहले भी सोमालिया, दक्षिण सूडान और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में शांति अभियानों में सैनिक भेज चुका है। इसी अनुभव के आधार पर उसे प्रस्तावित गाजा मिशन में संभावित योगदानकर्ता के रूप में देखा जा रहा है। तैनाती को लेकर अभी कई सवाल संसद की मंजूरी के बावजूद गाजा में युगांडा के सैनिकों की वास्तविक तैनाती अभी तय नहीं हुई है। अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल के गठन, उसके अधिकार क्षेत्र और विभिन्न देशों की भागीदारी को लेकर आगे बातचीत होनी बाकी है। ऐसे में युगांडा की संसद का फैसला ट्रंप की गाजा योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय बल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, लेकिन सैनिकों की वास्तविक तैनाती कब और किस भूमिका में होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
गाजा में इजरायली हमलों पर सऊदी अरब, मिस्र समेत 8 देशों ने जताई कड़ी आपत्ति गाजा/रियाद, एजेंसियां। गाजा में जारी इजरायली सैन्य कार्रवाई को लेकर सऊदी अरब, मिस्र समेत आठ अरब और मुस्लिम देशों ने कड़ी आपत्ति जताई है। संयुक्त बयान में इन देशों ने गाजा में स्वास्थ्य सुविधाओं और नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाए जाने पर चिंता जताई और कहा कि ऐसी कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। किन देशों ने किया विरोध संयुक्त बयान पर सऊदी अरब, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्किये, कतर, जॉर्डन, पाकिस्तान और इंडोनेशिया के विदेश मंत्रियों ने हस्ताक्षर किए। इन देशों ने गाजा में लगातार हो रही नागरिकों की मौत और अस्पतालों तथा अन्य आवश्यक सेवाओं से जुड़े ढांचे पर हमलों को लेकर चिंता जाहिर की। युद्धविराम प्रयासों पर असर की चिंता इन देशों ने कहा कि गाजा में जारी हमले राजनीतिक प्रक्रिया और युद्धविराम लागू करने के प्रयासों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। बयान में नागरिकों और चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का सम्मान करने की मांग की गई। इजरायल ने आरोपों को खारिज किया इजरायल ने संयुक्त बयान पर आपत्ति जताते हुए आरोपों को वास्तविकता का गलत चित्रण बताया। इजरायल का कहना है कि हमास अभी भी हथियार जुटाने, लड़ाकों की भर्ती और सुरंगों के निर्माण जैसी गतिविधियों में शामिल है। इस बयान के बाद गाजा में जारी संघर्ष को लेकर इजरायल और अरब-मुस्लिम देशों के बीच कूटनीतिक मतभेद और गहराने के संकेत हैं।
गाजा में मलबे से निकाले गए 112 शव, एक ही परिवार के 78 लोगों के होने का दावा गाजा, एजेंसियां। गाजा पट्टी में लंबे समय से मलबे में दबे शवों को निकालने का अभियान जारी है। इसी दौरान 112 शव बरामद किए गए हैं, जिनमें एक ही परिवार के करीब 78 लोगों के शामिल होने की बात सामने आई है। घटना ने गाजा में युद्ध से हुई भारी तबाही और मानवीय संकट की भयावह तस्वीर एक बार फिर सामने ला दी है। मलबे के नीचे दबे थे शव स्थानीय अधिकारियों और बचावकर्मियों के अनुसार, लगातार हमलों के कारण ध्वस्त हुई इमारतों के मलबे के नीचे बड़ी संख्या में शव दबे हुए हैं। राहत और बचाव दल मलबा हटाकर इन शवों को बाहर निकालने का काम कर रहे हैं। कई इलाकों में भारी तबाही के कारण शवों तक पहुंचना बेहद मुश्किल बना हुआ है। क्षतिग्रस्त इमारतों और बुनियादी ढांचे के बीच बचाव अभियान में भी लगातार चुनौतियां सामने आ रही हैं। एक परिवार के 78 लोगों की मौत का दावा बरामद शवों में एक ही परिवार के 78 लोगों के शामिल होने का दावा किया गया है। यदि यह आंकड़ा पुष्ट होता है, तो यह गाजा में युद्ध के दौरान परिवारों पर पड़े विनाशकारी प्रभाव का एक बेहद गंभीर उदाहरण होगा। गाजा में कई परिवारों के कई-कई सदस्यों के मारे जाने की घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं। लगातार जारी हिंसा ने बड़ी संख्या में परिवारों को बिखेर दिया है। गाजा में मानवीय संकट गहराया गाजा में बड़े पैमाने पर इमारतें नष्ट होने के कारण मलबे के नीचे दबे लोगों और शवों को निकालना बड़ी चुनौती बना हुआ है। राहत एजेंसियों के सामने भोजन, पानी, चिकित्सा सुविधा और सुरक्षित आश्रय की कमी जैसी समस्याएं भी बनी हुई हैं। मलबे से शवों की बरामदगी यह बताती है कि संघर्ष के मानवीय नुकसान का पूरा आकलन अभी बाकी है। स्थानीय प्रशासन और बचाव दल प्रभावित इलाकों में खोज एवं राहत अभियान जारी रखे हुए हैं।
गाजा, एजेंसियां। गाजा में युद्धविराम समझौते को आगे बढ़ाने की कोशिशों के बीच ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ने इस्राइल और हमास दोनों से सीजफायर फ्रेमवर्क के तहत तय दायित्वों का पूरी तरह पालन करने की अपील की है। बोर्ड ने कहा है कि समझौते के अगले चरण में प्रगति तभी संभव होगी, जब दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारियां पूरी करेंगे। दोनों पक्षों से समझौते का पालन करने की अपील बोर्ड ऑफ पीस की ओर से यह अपील ऐसे समय की गई है जब गाजा में युद्धविराम के बावजूद हिंसा और सैन्य कार्रवाई को लेकर चिंता बनी हुई है। बोर्ड ने इस बात पर जोर दिया कि सीजफायर फ्रेमवर्क की सभी शर्तों को लागू करना आगे की शांति प्रक्रिया के लिए जरूरी है। गाजा में लागू होना है समझौते का अगला चरण बोर्ड ऑफ पीस के गाजा मामलों के उच्च प्रतिनिधि निकोलाय म्लादेनोव ने इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात कर समझौते के कार्यान्वयन पर चर्चा की। म्लादेनोव ने गाजा में हवाई हमले रोकने की अपील भी की, ताकि समझौते को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया प्रभावित न हो। इस्राइल और हमास के बीच बनी हुई है असहमति समझौते के कार्यान्वयन को लेकर दोनों पक्षों की स्थिति में अंतर बना हुआ है। इस्राइल हमास के पूर्ण निरस्त्रीकरण को अपनी सैन्य वापसी से जोड़ रहा है, जबकि हमास इस्राइली सैन्य कार्रवाई और वापसी के मुद्दे पर अलग शर्तें रख रहा है। यही मतभेद सीजफायर के अगले चरण की राह में बड़ी चुनौती बने हुए हैं। शांति प्रक्रिया के सामने बड़ी चुनौती बोर्ड ऑफ पीस का कहना है कि समझौते के तहत तय चरणों को आगे बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों को अपने दायित्व पूरे करने होंगे। गाजा में जारी हिंसा के बीच अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों की कोशिश है कि युद्धविराम को प्रभावी बनाया जाए और निरस्त्रीकरण, इस्राइली सैन्य वापसी तथा नागरिक प्रशासन की स्थापना की प्रक्रिया आगे बढ़े।
गाजा सिटी, एजेंसियां। गाजा में लंबे समय से जारी संघर्ष के बीच शांति की नई उम्मीद जगी है। अमेरिका की मध्यस्थता में तैयार किए गए नए प्रस्ताव पर बातचीत आगे बढ़ी है, जिसमें हमास के चरणबद्ध निरस्त्रीकरण, इजरायली सेना की क्रमिक वापसी और गाजा में नई प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने का रोडमैप शामिल है। हालांकि दोनों पक्षों के बीच कई अहम मुद्दों पर मतभेद अब भी बने हुए हैं। युद्धविराम लागू करने पर बनी सहमति की कोशिश प्रस्तावित योजना के तहत संघर्ष विराम लागू करने, मानवीय सहायता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय निगरानी में गाजा के प्रशासन को नई व्यवस्था के तहत संचालित करने का प्रस्ताव रखा गया है। हमास ने कुछ शर्तों के साथ योजना पर आगे बातचीत की इच्छा जताई है, जबकि इजरायल का कहना है कि स्थायी शांति के लिए हमास का पूर्ण निरस्त्रीकरण जरूरी होगा। मतभेद बने रहने से आसान नहीं होगा समझौता विशेषज्ञों का मानना है कि शांति प्रक्रिया अभी शुरुआती दौर में है। सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि पहले कौन-सा पक्ष कदम उठाएगा। हमास पहले इजरायली सेना की वापसी और हमलों पर रोक चाहता है, जबकि इजरायल पहले सुरक्षा संबंधी सभी शर्तें पूरी होने की मांग कर रहा है। यही मतभेद समझौते के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर वार्ता पर संयुक्त राष्ट्र सहित कई देशों ने गाजा में स्थायी शांति स्थापित करने के प्रयासों का स्वागत किया है। यदि वार्ता सफल रहती है तो इससे गाजा में मानवीय संकट कम होने, पुनर्निर्माण कार्य शुरू होने और क्षेत्र में लंबे समय से जारी हिंसा पर विराम लगने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि अंतिम समझौता दोनों पक्षों की सहमति और उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
'बोर्ड ऑफ पीस' के जरिए समझौते का दावा, चरणबद्ध तरीके से हथियार छोड़ने और नई प्रशासनिक व्यवस्था का प्रस्ताव वॉशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि गाज़ा में हमास और अन्य सशस्त्र समूहों के पूर्ण एवं चरणबद्ध निरस्त्रीकरण को लेकर एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है। ट्रंप ने इसे "स्थायी शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम" बताया। उनके अनुसार, इस समझौते के तहत हमास अपने हथियार छोड़ेगा और गाज़ा में नई प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने का रास्ता तैयार होगा। चरणबद्ध तरीके से होगा निरस्त्रीकरण ट्रंप के अनुसार, प्रस्तावित योजना में हमास के हथियारों के भंडार, सुरंग नेटवर्क और सैन्य ढांचे को चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जाएगा। इसके बाद गाज़ा में एक नई तकनीकी फिलिस्तीनी प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने और सुरक्षा की जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय बलों तथा पुनर्गठित स्थानीय पुलिस को सौंपने की योजना है। समझौते पर अभी भी बनी हुई है अनिश्चितता हालांकि, इस घोषणा के बावजूद समझौते के लागू होने को लेकर कई सवाल बने हुए हैं। इज़राइल की ओर से योजना पर औपचारिक सहमति नहीं दी गई है, जबकि हमास ने संकेत दिया है कि जब तक इज़राइली सेना गाज़ा से पीछे नहीं हटती, तब तक निरस्त्रीकरण लागू नहीं होगा। मध्यस्थ देशों की रही अहम भूमिका इस प्रस्ताव को तैयार करने में मिस्र, कतर और तुर्की की मध्यस्थता अहम बताई जा रही है। ट्रंप ने इन देशों और अपनी वार्ता टीम की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि कई महीनों की बातचीत के बाद यह प्रारूप तैयार हुआ है। जमीन पर हिंसा अभी भी जारी ट्रंप की घोषणा के बावजूद गाज़ा में संघर्ष पूरी तरह नहीं थमा है। क्षेत्र में अब भी छिटपुट सैन्य कार्रवाई और हवाई हमलों की खबरें आ रही हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि समझौते को लागू करने के लिए अभी कई कूटनीतिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बाकी हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। गाजा में जारी संघर्ष को लेकर भारत की विदेश नीति पर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस संसदीय दल (CPP) की अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा केंद्र सरकार की नीति की आलोचना करने के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। कांग्रेस ने सरकार पर गाजा संकट को लेकर "चुप्पी" साधने का आरोप लगाया, जबकि भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कांग्रेस पर "वोट बैंक की राजनीति" करने का आरोप लगाया। सोनिया गांधी ने उठाए सवाल सोनिया गांधी ने एक लेख में कहा कि गाजा को लेकर केंद्र सरकार का रुख भारत की पारंपरिक विदेश नीति और नैतिक जिम्मेदारियों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने दावा किया कि इस मुद्दे पर सरकार की चुप्पी से भारत की नैतिक और रणनीतिक स्थिति प्रभावित हुई है। राहुल गांधी ने भी किया समर्थन लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोनिया गांधी के लेख का समर्थन करते हुए कहा कि भारत को "नैतिक स्पष्टता" के साथ अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को आगे बढ़ाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार का रुख भारत की पारंपरिक कूटनीतिक नीति से अलग दिखाई देता है। भाजपा का पलटवार भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भारत की गाजा नीति संतुलित रही है। पार्टी का कहना है कि भारत ने लगातार शांति, मानवीय सहायता और युद्धविराम की आवश्यकता का समर्थन किया है तथा संयुक्त राष्ट्र में भी इसी दिशा में अपना रुख स्पष्ट किया है। भाजपा ने कांग्रेस पर विदेश नीति के मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगाया। विदेश नीति पर बढ़ी राजनीतिक बहस गाजा संकट को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच जारी बयानबाज़ी से यह मुद्दा घरेलू राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि सरकार ने अपनी आधिकारिक नीति में कोई बदलाव घोषित नहीं किया है और भारत अब भी क्षेत्र में शांति, मानवीय सहायता तथा संवाद के माध्यम से समाधान की बात दोहरा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।