राजनीति

गाजा मुद्दे पर केंद्र और विपक्ष में तीखी बयानबाजी, सोनिया गांधी के लेख से सियासी घमासान

abhishek singh जून 28, 2026 0
Sonia Gandhi Narendra Modi
Sonia Gandhi on the Gaza Issue

नई दिल्ली, एजेंसियां। गाजा में जारी संघर्ष को लेकर भारत की विदेश नीति पर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस संसदीय दल (CPP) की अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा केंद्र सरकार की नीति की आलोचना करने के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। कांग्रेस ने सरकार पर गाजा संकट को लेकर "चुप्पी" साधने का आरोप लगाया, जबकि भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कांग्रेस पर "वोट बैंक की राजनीति" करने का आरोप लगाया।

 

सोनिया गांधी ने उठाए सवाल

 

सोनिया गांधी ने एक लेख में कहा कि गाजा को लेकर केंद्र सरकार का रुख भारत की पारंपरिक विदेश नीति और नैतिक जिम्मेदारियों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने दावा किया कि इस मुद्दे पर सरकार की चुप्पी से भारत की नैतिक और रणनीतिक स्थिति प्रभावित हुई है।

 

राहुल गांधी ने भी किया समर्थन

 

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोनिया गांधी के लेख का समर्थन करते हुए कहा कि भारत को "नैतिक स्पष्टता" के साथ अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को आगे बढ़ाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार का रुख भारत की पारंपरिक कूटनीतिक नीति से अलग दिखाई देता है।

 

भाजपा का पलटवार

 

भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भारत की गाजा नीति संतुलित रही है। पार्टी का कहना है कि भारत ने लगातार शांति, मानवीय सहायता और युद्धविराम की आवश्यकता का समर्थन किया है तथा संयुक्त राष्ट्र में भी इसी दिशा में अपना रुख स्पष्ट किया है। भाजपा ने कांग्रेस पर विदेश नीति के मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगाया।

 

विदेश नीति पर बढ़ी राजनीतिक बहस

 

गाजा संकट को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच जारी बयानबाज़ी से यह मुद्दा घरेलू राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि सरकार ने अपनी आधिकारिक नीति में कोई बदलाव घोषित नहीं किया है और भारत अब भी क्षेत्र में शांति, मानवीय सहायता तथा संवाद के माध्यम से समाधान की बात दोहरा रहा है।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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बंगाल के डेबरा में TMC नेता हुमायूं कबीर गिरफ्तार, आरोपों का खुलासा नहीं; पुलिस जांच जारी

  कोलकाता: पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के डेबरा में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के एक प्रभावशाली नेता हुमायूं कबीर की गिरफ्तारी के बाद इलाके की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। डेबरा ब्लॉक पंचायत समिति के सदस्य और तृणमूल कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष हुमायूं कबीर को डेबरा थाना पुलिस ने हिरासत में लिया है। पुलिस ने अभी तक उनके खिलाफ दर्ज आरोपों का आधिकारिक तौर पर खुलासा नहीं किया है। शिकायतों के आधार पर हुई कार्रवाई पुलिस के अनुसार, हुमायूं कबीर के खिलाफ कुछ शिकायतें प्राप्त हुई थीं, जिनकी जांच शुरू की गई। प्रारंभिक जांच में पर्याप्त तथ्य सामने आने के बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि मामला किस प्रकृति का है और किन धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है। जिले की राजनीति में बढ़ी हलचल एक प्रभावशाली टीएमसी नेता की गिरफ्तारी के बाद पश्चिम मेदिनीपुर के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। स्थानीय स्तर पर भी इस कार्रवाई को लेकर लोगों में उत्सुकता बनी हुई है। विभिन्न राजनीतिक दल इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। पुलिस ने कहा- जांच जारी पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी पहलुओं की जांच की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल पुलिस पूरे मामले से जुड़े तथ्यों को जुटाने में लगी हुई है। आरोपों पर अब भी सस्पेंस हुमायूं कबीर की गिरफ्तारी के बावजूद पुलिस ने अभी तक यह नहीं बताया है कि उनके खिलाफ आरोप क्या हैं। ऐसे में मामले को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। पुलिस का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की जाएगी। आगे क्या? जिले के राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर अब पुलिस जांच की दिशा और आगे होने वाली कानूनी कार्रवाई पर टिकी हुई है। इस मामले में पुलिस की अगली कार्रवाई और संभावित खुलासों का इंतजार किया जा रहा है।  

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राहुल गांधी ने कांग्रेस नेताओं से 'छात्रों की गूंज' अभियान तेज करने की अपील, युवाओं के मुद्दों को गांव-गांव तक ले जाने का आह्वान

नई दिल्ली, एजेंसियां। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं, प्रदेश इकाइयों, भारतीय युवा कांग्रेस (IYC) और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) से 'छात्रों की गूंज' अभियान को देशभर में और तेज करने की अपील की है। राहुल गांधी ने कहा कि देश के युवा शिक्षा, रोजगार, भर्ती में देरी और परीक्षा प्रणाली से जुड़े गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं, इसलिए उनकी आवाज़ को हर जिले और हर राज्य तक पहुंचाना जरूरी है।   नेताओं को लिखा पत्र   राहुल गांधी ने पार्टी नेताओं को लिखे पत्र में कहा कि 'छात्रों की गूंज' केवल एक अभियान नहीं, बल्कि देश के छात्रों और युवाओं की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने का प्रयास है। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से इस अभियान को जन-आंदोलन का रूप देने और अधिक से अधिक छात्रों को इससे जोड़ने का आग्रह किया।   किन मुद्दों पर फोकस?   कांग्रेस के इस अभियान में मुख्य रूप से इन मुद्दों को उठाया जा रहा है: प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक भर्ती परीक्षाओं में देरी बढ़ती शिक्षा फीस युवाओं में बेरोजगारी शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग पार्टी का कहना है कि इन मुद्दों से लाखों छात्र प्रभावित हो रहे हैं और उनकी समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाना चाहिए।   40 दिन तक चलेगा अभियान   कांग्रेस ने 'छात्रों की गूंज' अभियान को 40 दिनों के राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम के रूप में शुरू किया है। इसके तहत विभिन्न राज्यों में छात्र सम्मेलन, संवाद कार्यक्रम, हस्ताक्षर अभियान और जनसंपर्क अभियान आयोजित किए जाएंगे। पार्टी का लक्ष्य छात्रों और युवाओं की मांगों को व्यापक जनसमर्थन दिलाना है।   पहले भी उठा चुके हैं छात्र मुद्दे   राहुल गांधी इससे पहले भी राजस्थान के कोटा सहित कई स्थानों पर छात्रों से संवाद कर चुके हैं। उन्होंने परीक्षा में अनियमितता, पेपर लीक और रोजगार के मुद्दों को लगातार उठाया है। अब पार्टी इस अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने की मूड में है।

abhishek singh जून 28, 2026 0
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मंत्री भी, लाभार्थी भी! कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी को अपने ही मंत्रालय की योजना से मिली 99.60 लाख रुपये की सब्सिडी

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पश्चिम बंगाल में लागू होगा यूनिफॉर्म सिविल कोड? विधानसभा के मौजूदा सत्र में आ सकता है UCC विधेयक

  कोलकाता: उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद अब पश्चिम बंगाल में भी समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) लागू करने की तैयारी तेज होती दिखाई दे रही है। विधानसभा और राज्य प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार अगले सप्ताह विधानसभा के विशेष सत्र में यूसीसी से संबंधित विधेयक पेश कर सकती है। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो पश्चिम बंगाल समान नागरिक संहिता लागू करने वाला देश का चौथा भाजपा शासित राज्य बन जाएगा। सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन संबंधों जैसे मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करना है। साथ ही महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की दिशा में इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सरकार ने बताई यूसीसी की जरूरत विधानसभा और प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, सरकार का मानना है कि अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों की जगह एक समान नागरिक कानून लागू होने से न्यायिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनेगी। सरकार का दावा है कि इससे कानूनी विवादों में एकरूपता आएगी और सभी नागरिकों को समान अधिकार सुनिश्चित किए जा सकेंगे। असम मॉडल पर आगे बढ़ सकती है सरकार सूत्रों के अनुसार, पश्चिम बंगाल सरकार यूसीसी लागू करने के लिए असम मॉडल का अध्ययन कर रही है। हाल ही में असम विधानसभा ने लंबी बहस के बाद समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किया था। उस कानून में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, लिव-इन संबंधों के पंजीकरण और बहुविवाह पर रोक जैसे कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं। असम सरकार ने इसे संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों के अनुरूप बताया था और कहा था कि इसका उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और लैंगिक समानता को बढ़ावा देना है। जनजातीय समुदायों को मिल सकती है छूट सूत्रों के मुताबिक, असम की तरह पश्चिम बंगाल में भी कुछ जनजातीय समुदायों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखने पर विचार किया जा रहा है। दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र और जंगलमहल के कुछ आदिवासी समुदायों की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं।  इस संबंध में अंतिम फैसला विधेयक पेश होने के बाद ही स्पष्ट होगा। राजनीतिक मुद्दा बनने की संभावना राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम बंगाल विधानसभा में यूसीसी विधेयक पेश होता है तो यह राज्य की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है। भाजपा इसे महिलाओं के अधिकार, समान कानून और सुशासन से जोड़कर पेश कर सकती है, जबकि विपक्ष धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के आधार पर इसका विरोध कर सकता है। सरकार का कहना है कि समान नागरिक संहिता किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करने का संवैधानिक प्रयास है। वहीं विपक्षी दल पहले ही इस प्रस्तावित कानून को लेकर विरोध के संकेत दे चुके हैं। विधेयक पर रहेगी सबकी नजर अब सभी की नजर विधानसभा के आगामी विशेष सत्र पर टिकी है, जहां सरकार यूसीसी विधेयक पेश कर सकती है। विधेयक के अंतिम स्वरूप, उसमें शामिल प्रावधानों और संभावित छूटों को लेकर राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है।  

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वरिष्ठ संपादक एवं प्रतिष्ठित पत्रकार दीपेश कुमार का हृदयाघात से निधन

anjali kumari जून 24, 2026 0

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