राजनीति

FCRA बिल पर मायावती का हमला, विपक्ष पर लगाए गंभीर आरोप

FCRA बिल पर मायावती का वार, बोलीं- Gen Z वोट के लिए मुद्दे भूल रहा विपक्ष

ranjan kumar tiwari अगस्त 13, 2026 0
FCRA संशोधन बिल को लेकर मायावती ने सरकार और विपक्ष पर निशाना साधा
FCRA बिल पर मायावती ने सरकार और विपक्ष को घेरा

लखनऊ, एजेंसियां। बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती ने FCRA संशोधन बिल को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष दोनों पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विधेयक को जल्दबाजी में पारित कराना चाहती थी, जबकि विपक्ष ने संसद की कार्यवाही बाधित कर इस मुद्दे पर सार्थक चर्चा का रास्ता रोक दिया।

 

FCRA बिल को लेकर सरकार और विपक्ष पर सवाल

 

 

मायावती ने कहा कि सरकार FCRA संशोधन बिल को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए इसे अन्य विधेयकों की तरह जल्द पारित कराना चाहती थी। वहीं विपक्ष के विरोध के बाद विधेयक को प्रारंभिक चर्चा के बिना संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेज दिया गया।

 

उन्होंने कहा कि पूरी प्रक्रिया जल्दबाजी में हुई और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष दोनों ने इस विधेयक को राजनीतिक मुद्दा बना दिया।

 

विपक्ष पर संसद की कार्यवाही बाधित करने का आरोप

 

 

बसपा प्रमुख ने कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों पर आरोप लगाया कि वे FCRA संशोधन बिल को सीधे तौर पर अल्पसंख्यक विरोधी बताते हुए इसे वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

 

मायावती के अनुसार, विपक्ष को विधेयक पेश किए जाने के दौरान संसद की कार्यवाही चलने देनी चाहिए थी, ताकि उसकी कमियों पर सदन में चर्चा होती और देश के सामने विधेयक की पूरी जानकारी आती।

 

‘कई बिल मिनटों में पास हो गए’

 

 

मायावती ने दावा किया कि विपक्ष के लगातार हंगामे और संसद की कार्यवाही बाधित होने का फायदा सरकार को मिला। उन्होंने आरोप लगाया कि इस दौरान कई अन्य विधेयक बेहद कम समय में पारित हो गए, जिन पर विपक्ष को गंभीर चर्चा करनी चाहिए थी।

 

उन्होंने विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठाते हुए ‘आंतरिक मिलीभगत’ की आशंका भी जताई।

 

‘Gen Z के वोटों के लिए बाकी मुद्दों को नजरअंदाज कर रहा विपक्ष’

 

 

मायावती ने कहा कि विपक्ष शायद Gen Z के वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए दूसरे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और जनहित के मुद्दों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दे रहा है।

 

उन्होंने कहा कि युवाओं की समस्याएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके साथ-साथ आम जनता और देश से जुड़े अन्य मुद्दों पर भी संसद में गंभीर चर्चा होनी चाहिए।

 

राम मंदिर चढ़ावे में कथित गड़बड़ी का मुद्दा उठाने की बात

 

 

मायावती ने अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे में कथित गड़बड़ी का मुद्दा भी संसद में उठाने की बात कही। उनका आरोप है कि विपक्ष ने राजनीतिक स्वार्थ के कारण इस विषय को पीछे कर दिया, जबकि इस पर सदन में चर्चा होनी चाहिए।

 

उन्होंने जनता से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही राजनीतिक खींचतान को लेकर सतर्क रहने की अपील की। साथ ही बसपा की ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की नीति का उल्लेख करते हुए लोगों से पार्टी से जुड़ने का आह्वान किया।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Raghuvar Das
JPSC अभ्यर्थियों के आंदोलन के बीच रघुवर दास का सरकार को अल्टीमेटम, CBI जांच नहीं हुई तो भूख हड़ताल

रांची। झारखंड में JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर चल रहा छात्र आंदोलन अब राजनीतिक रूप से भी तेज हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता रघुवर दास ने रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में आंदोलनरत अभ्यर्थियों से मुलाकात की और राज्य सरकार को एक सप्ताह का अल्टीमेटम दिया। उन्होंने कहा कि यदि सरकार एक सप्ताह के भीतर मामले की CBI जांच की सिफारिश नहीं करती है, तो वह खुद भूख हड़ताल पर बैठेंगे।   छात्रों के आंदोलन में पहुंचे रघुवर दास   रघुवर दास ने धरना स्थल पहुंचकर आंदोलन कर रहे JPSC-JSSC अभ्यर्थियों से मुलाकात की। उन्होंने छात्रों की मांगों का समर्थन करते हुए कहा कि भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।   यह आंदोलन अब 20वें दिन में प्रवेश कर चुका है। छात्र परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच और कुछ परीक्षाओं को रद्द करने समेत कई मांगों को लेकर धरने पर हैं।   एक सप्ताह का दिया अल्टीमेटम   रघुवर दास ने राज्य सरकार से कहा कि वह सात दिनों के भीतर CBI जांच की सिफारिश करे। ऐसा नहीं होने पर उन्होंने आंदोलनरत छात्रों के समर्थन में खुद भूख हड़ताल शुरू करने की चेतावनी दी है।   उन्होंने छात्र आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। रघुवर दास बाद में रांची सदर अस्पताल पहुंचे और पुलिस कार्रवाई में घायल हुए अभ्यर्थियों से मुलाकात कर उनका हाल जाना।   CBI जांच पर सरकार और छात्रों में गतिरोध   JPSC-JSSC विवाद में CBI जांच छात्रों की प्रमुख लंबित मांगों में से एक बनी हुई है। छात्र राज्य की एजेंसियों की जांच के बजाय स्वतंत्र केंद्रीय जांच की मांग कर रहे हैं।   वहीं, झारखंड सरकार का कहना है कि मामले की जांच राज्य की CID सहित संबंधित एजेंसियों के स्तर पर चल रही है। सत्तारूढ़ JMM-कांग्रेस गठबंधन के मंत्रियों ने CBI जांच की मांग को खारिज करते हुए मौजूदा जांच प्रक्रिया का बचाव किया है।   आंदोलन के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ा   JPSC-JSSC विवाद को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच भी टकराव बढ़ रहा है। भाजपा लगातार CBI जांच की मांग कर रही है, जबकि सरकार का आरोप है कि विपक्ष छात्रों के आंदोलन का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहा है।   इससे पहले विधानसभा मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ था, जिसमें लाठीचार्ज, वाटर कैनन और आंसू गैस के इस्तेमाल की रिपोर्ट सामने आई थी। इसके बाद मामला और ज्यादा राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया।

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FCRA संशोधन विधेयक को JPC भेजने पर सरकार और विपक्ष के बीच चर्चा
FCRA संशोधन विधेयक पर सरकार JPC को भेजने के लिए तैयार, संसद में गतिरोध खत्म करने की कोशिश

नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद के मानसून सत्र में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी FCRA संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच जारी गतिरोध को खत्म करने की कोशिश तेज हो गई है। सरकार विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने पर सहमत होने के संकेत दे रही है। इस कदम का उद्देश्य विपक्ष के विरोध को शांत कर विधेयक पर आगे की संसदीय प्रक्रिया शुरू करना है।   विपक्ष लगातार कर रहा था विरोध   FCRA संशोधन विधेयक को लेकर विपक्षी दलों ने सरकार पर जल्दबाजी में कानून पारित कराने का आरोप लगाया है। विपक्ष की मांग रही है कि विधेयक के प्रावधानों की विस्तृत जांच के लिए इसे संसदीय समिति के पास भेजा जाए। संसद में इस मुद्दे को लेकर लगातार हंगामा होने से कई बार कार्यवाही प्रभावित हुई। विपक्ष ने विधेयक के विभिन्न प्रावधानों पर भी सवाल उठाए हैं।   JPC में होगी विस्तृत जांच   अगर विधेयक को JPC के पास भेजा जाता है तो समिति इसके प्रावधानों की विस्तृत समीक्षा करेगी। समिति में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सांसद शामिल होंगे। JPC संबंधित पक्षों से सुझाव और जानकारी लेकर अपनी रिपोर्ट संसद को सौंप सकती है। सरकार का यह कदम संसद में जारी गतिरोध को कम करने और विधेयक पर आम सहमति बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।   FCRA में बदलाव का क्या है उद्देश्य?   FCRA के जरिए भारत में विदेशी स्रोतों से मिलने वाले चंदे और अंशदान को नियंत्रित किया जाता है। संशोधन विधेयक में विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों से जुड़े नियमों और अनुपालन व्यवस्था में बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। सरकार का तर्क है कि प्रस्तावित बदलावों से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी, जबकि विपक्ष को आशंका है कि इससे गैर-सरकारी संगठनों और अन्य संस्थाओं पर अतिरिक्त नियंत्रण बढ़ सकता है।

ranjan kumar tiwari अगस्त 12, 2026 0
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