Naseeruddin Shah on NEET Protest: बॉलीवुड के वरिष्ठ अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने NEET-UG 2026 पेपर लीक विवाद और देशभर में चल रहे छात्र आंदोलन पर केंद्र सरकार की कार्यशैली की तीखी आलोचना की है। एक हालिया इंटरव्यू में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, शिक्षा व्यवस्था, दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और छात्रों के विरोध प्रदर्शन को लेकर कई विवादित बयान दिए। साथ ही उन्होंने प्रदर्शन कर रहे छात्रों का खुलकर समर्थन भी किया। छात्रों के आंदोलन पर क्या बोले नसीरुद्दीन शाह? नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि NEET-UG 2026 पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्र अपने भविष्य के लिए लड़ रहे हैं और उनकी मांगें पूरी तरह जायज हैं। उनके अनुसार यह आंदोलन किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और न्याय की मांग को लेकर है। उन्होंने कहा कि देश के युवाओं का गुस्सा वास्तविक है और सरकार को उनकी बात गंभीरता से सुननी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी पर साधा निशाना इंटरव्यू के दौरान नसीरुद्दीन शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री के बयानों को गंभीरता से नहीं लेते क्योंकि उनके मुताबिक शिक्षा और छात्रों की समस्याओं को लेकर सरकार का रवैया संवेदनशील नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर जवाबदेही से बचती है और छात्रों की चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। शिक्षा व्यवस्था पर जताई चिंता अभिनेता ने कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है। उनका दावा है कि छात्रों को बेहतर और वैज्ञानिक सोच पर आधारित शिक्षा मिलनी चाहिए ताकि भविष्य में वे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार देश के भविष्य के लिए बेहद जरूरी है। दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर भी उठाए सवाल नसीरुद्दीन शाह ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई की आलोचना की। उनका कहना था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ बल प्रयोग उचित नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों को अपनी बात रखने का अधिकार मिलना चाहिए और उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर क्या कहा? शाह ने प्रदर्शनकारी छात्रों द्वारा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि यदि छात्र जवाबदेही की मांग कर रहे हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। उनके अनुसार सरकार को आंदोलन को नजरअंदाज करने के बजाय संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। विवाद बढ़ने की संभावना नसीरुद्दीन शाह के इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज होने की संभावना है। जहां एक ओर उनके समर्थक इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बता रहे हैं, वहीं विरोधी इसे राजनीतिक टिप्पणी मानकर आलोचना कर रहे हैं। आने वाले दिनों में इस बयान पर विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ सकती हैं।
संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन केंद्र सरकार राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में बड़ा बदलाव करने जा रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सोमवार को 'राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026' संसद में पेश करेंगे। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' के सम्मान को कानूनी संरक्षण देना और इसके अपमान या गायन में बाधा डालने को दंडनीय अपराध की श्रेणी में लाना है। 'वंदे मातरम्' के सम्मान को मिलेगा कानूनी संरक्षण प्रस्तावित विधेयक के अनुसार यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय गीत का अपमान करता है या इसके गायन में जानबूझकर बाधा डालता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी। सरकार का कहना है कि यह संशोधन राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रीय गीत के सम्मान को और मजबूत करने के उद्देश्य से लाया जा रहा है। 20 जुलाई से शुरू हुआ मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलने वाले मानसून सत्र से पहले रविवार को सर्वदलीय बैठक आयोजित की गई। बैठक के दौरान कई राष्ट्रीय और राजनीतिक मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। इन मुद्दों पर विपक्ष ने सरकार को घेरा सर्वदलीय बैठक में विपक्ष ने कई अहम विषय उठाए, जिनमें शामिल हैं– अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे में कथित अनियमितता सोनम वांगचुक का अनशन विदेश नीति NEET पेपर लीक मामला अन्य समसामयिक राष्ट्रीय मुद्दे समाजवादी पार्टी ने संकेत दिया है कि वह राम मंदिर चढ़ावा मामले को संसद में प्रमुखता से उठाएगी। टीएमसी और शिवसेना के बागी सांसदों पर विवाद बैठक के दौरान विपक्ष ने तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (UBT) के बागी सांसदों को बैठक में बुलाने का विरोध किया। विपक्षी दलों ने कुछ समय के लिए वॉकआउट भी किया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इसे सरकार का "तानाशाही फैसला" बताया, जबकि शिवसेना (UBT) के नेता अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष के अंतिम निर्णय से पहले नए गुट को मान्यता दिए जाने पर सवाल उठाए। सरकार इन प्रमुख विधेयकों को भी करेगी पेश 1. राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 'वंदे मातरम्' के अपमान या गायन में बाधा डालने पर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान। राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून को और सख्त बनाने की पहल। 2. जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 जन्म और मृत्यु के पंजीकरण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाना। विलंब से पंजीकरण कराने पर नियमों को और सख्त किया जाएगा। 3. आयकर (संशोधन) विधेयक, 2026 सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों को दी गई कर छूट को स्थायी कानूनी स्वरूप देना। विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम। बैठक में कई वरिष्ठ नेता रहे मौजूद सर्वदलीय बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू, कांग्रेस नेता जयराम रमेश, प्रमोद तिवारी, कोडिकुनिल सुरेश, समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव समेत विभिन्न दलों के वरिष्ठ नेता शामिल हुए। मानसून सत्र के पहले ही दिन सरकार और विपक्ष के बीच कई अहम मुद्दों पर टकराव के संकेत मिल रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में संसद में तीखी बहस और राजनीतिक गर्मी बढ़ने की संभावना है।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी के आमतला स्थित निर्वाचन क्षेत्र कार्यालय पर चल रही ध्वस्तीकरण कार्रवाई पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने जुलाई के अंत तक परिसर में किसी भी तरह की तोड़फोड़ या बदलाव पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है। रविवार को हुई विशेष सुनवाई मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस राजा बसु चौधरी की एकल पीठ ने रविवार को विशेष अदालत लगाकर सुनवाई की। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि विवादित इमारत से जुड़े सभी जरूरी दस्तावेज अगली सुनवाई में पेश किए जाएं। 'लीप्स एंड बाउंड्स' कंपनी ने दी थी चुनौती ध्वस्तीकरण कार्रवाई को 'लीप्स एंड बाउंड्स' कंपनी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान बताया गया कि विवादित भवन इसी कंपनी के स्वामित्व में है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) के पूर्व दावों के अनुसार, अभिषेक बनर्जी इस कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) रहे हैं। नियमित पीठ करेगी विस्तृत सुनवाई हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि फिलहाल जुलाई के अंत तक यथास्थिति बनी रहेगी। इसके बाद मामले की विस्तृत सुनवाई नियमित पीठ के समक्ष होगी, जहां दोनों पक्षों की दलीलों पर विस्तार से विचार किया जाएगा। प्रशासन ने क्यों शुरू की थी कार्रवाई? दक्षिण 24 परगना जिला प्रशासन ने शनिवार को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में इमारत को तोड़ने की कार्रवाई शुरू की थी। प्रशासन का दावा है कि भवन बिना स्वीकृत नक्शे के बनाया गया था और निर्माण में भवन नियमों का उल्लंघन हुआ था, इसलिए कार्रवाई की गई। अभिषेक बनर्जी ने आरोपों को बताया गलत अभिषेक बनर्जी ने प्रशासन के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह उनका आधिकारिक निर्वाचन क्षेत्र कार्यालय है। उनका दावा है कि भवन वैध रूप से खरीदी गई जमीन पर बनाया गया है और निर्माण के लिए सभी आवश्यक प्रशासनिक मंजूरियां ली गई थीं। अब अगली सुनवाई पर टिकी नजर हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल ध्वस्तीकरण की कार्रवाई रुक गई है। अब इस राजनीतिक और कानूनी विवाद पर अंतिम तस्वीर जुलाई के अंत में होने वाली अगली सुनवाई के बाद ही साफ हो सकेगी।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन में पहुंचे आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत बताई। साथ ही, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की सराहना करते हुए उन्हें देश का शिक्षा मंत्री बनाए जाने की वकालत की। "सोनम वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में बदलाव ला सकते हैं" प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए केजरीवाल ने कहा कि सोनम वांगचुक अपने व्यक्तिगत हित के लिए नहीं, बल्कि देश के करोड़ों छात्रों और युवाओं के भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "मैं प्रधानमंत्री और देश के 140 करोड़ नागरिकों से अपील करता हूं कि सोनम वांगचुक को देश का शिक्षा मंत्री बनाया जाना चाहिए।" हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नहीं लगता कि सरकार ऐसा करेगी, क्योंकि उन्हें डर है कि वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव ला सकते हैं। पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली पर उठाए सवाल अरविंद केजरीवाल ने देश में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक के मामलों पर चिंता जताते हुए कहा कि परीक्षा प्रणाली में गंभीर खामियां हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नीट समेत कई परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं सामने आईं, लेकिन सरकार युवाओं का भरोसा बहाल करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठा सकी। उन्होंने यह भी कहा कि परीक्षा मूल्यांकन प्रणाली में भी गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आई हैं, लेकिन जिम्मेदार लोगों के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं की गई। 2011 के आंदोलन की दिलाई याद अपने संबोधन में केजरीवाल ने वर्ष 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को भी याद किया। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर आकर उन्हें वह समय याद आ गया, जब वे अन्ना हजारे के साथ इसी स्थान पर आंदोलन कर रहे थे। केजरीवाल ने कहा कि उस समय की सरकार ने जनता की आवाज को नजरअंदाज किया था, जिसका राजनीतिक परिणाम उसे कुछ वर्षों बाद भुगतना पड़ा। उन्होंने दावा किया कि यदि मौजूदा सरकार भी छात्रों और युवाओं की मांगों को अनसुना करती रही, तो वर्ष 2029 के आम चुनाव में उसे इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। सरकार से संवाद की अपील अपने भाषण के अंत में केजरीवाल ने केंद्र सरकार से छात्रों और युवाओं की चिंताओं को गंभीरता से सुनने और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर सकारात्मक संवाद करने की अपील की। उन्होंने कहा कि शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाना देश के भविष्य के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) की नियुक्ति को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी विवाद बुधवार को कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय की ओर से दायर अपील पर आज हाईकोर्ट की खंडपीठ सुनवाई करेगी। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी गुट के विधायक रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है। रीतब्रत बनर्जी की ओर से संविधान का हवाला मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान रीतब्रत बनर्जी की ओर से पेश अधिवक्ता ने न्यायमूर्ति शम्पा सरकार और न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता की खंडपीठ के सामने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि रीतब्रत बनर्जी की नेता प्रतिपक्ष के रूप में नियुक्ति संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून)के प्रावधानों के अनुरूप की गई है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सुनवाई बुधवार तक जारी रखने का निर्णय लिया। एकल पीठ ने अंतरिम राहत देने से किया था इनकार इससे पहले 18 जून को कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था। अदालत ने मुख्य मामले की अगली सुनवाई के लिए 28 जुलाई की तारीख तय की थी। शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने खंडपीठ का किया रुख एकल पीठ के फैसले के बाद टीएमसी विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने खंडपीठ में अपील दायर की। उन्होंने अपनी याचिका में दावा किया कि नेता प्रतिपक्ष पद के लिए उनके नाम की अनदेखी की गई और रीतब्रत बनर्जी की नियुक्ति कानून के अनुरूप नहीं है। उन्होंने इस नियुक्ति को पूरी तरह गैर-कानूनी बताते हुए निरस्त करने की मांग की है। आज की सुनवाई पर टिकी राजनीतिक नजरें बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को लेकर चल रहे इस विवाद पर अब सभी की नजरें कलकत्ता हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत के फैसले का असर राज्य की राजनीतिक स्थिति और विधानसभा के भीतर विपक्ष की भूमिका पर पड़ सकता है।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद तृणमूल कांग्रेस यानी TMC में मचे अभूतपूर्व आंतरिक घमासान के बीच देश के सियासी गलियारों में एक नई सुगबुगाहट तेज हो गई है। हाल ही में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी की कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी से दिल्ली में हुई मुलाकात और उसके बाद अभिषेक बनर्जी व राहुल गांधी की बैठक ने इन चर्चाओं को हवा दे दी है कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर सकती हैं? हालांकि टीएमसी और कांग्रेस दोनों ही अधिकारिक तौर पर इसे 'अफवाह' और 'निराधार' बता रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे संकट में घिरी ममता बनर्जी के लिए एक रणनीतिक कदम के रूप में देख रहे हैं। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी बनाने वाली ममता बनर्जी अगर आज दोबारा कांग्रेस का दामन थामती हैं, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। आइए विश्लेषण करते हैं कि इस संभावित कदम से ममता बनर्जी को कितना फायदा और कितना नुकसान हो सकता है: यदि फायदों की बात करें, तो ममता बनर्जी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा कवच और राजनीतिक वजूद की रक्षा को ध्यान में रखते हुए ये फैसला ले सकती हैं। इससे उन्हें बगावत और बिखराव से बचने का 'सेफ पैसेज' मिल सकता है। दरअसल, हालिया चुनावों में मिली करारी शिकस्त के बाद ममता बनर्जी की पार्टी गहरे संकट में है। टीएमसी के विधायकों और सांसदों में भारी असंतोष है। खबर है कि 20 के करीब लोकसभा सांसद और 60 से अधिक विधायक बागी रुख अपनाए हुए हैं। ऐसी स्थिति में यदि टीएमसी का कांग्रेस में विलय होता है, तो दल-बदल विरोधी कानून मतलब Anti-Defection Law के तहत बागियों के मंसूबों पर पानी फिर सकता है और ममता को अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय 'मदरशिप' मिल जाएगी। राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका टीएमसी एक क्षेत्रीय दल है, जिसकी ताकत मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल तक ही सीमित रही है। कांग्रेस के साथ आने से ममता बनर्जी और उनके उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी को सीधे राष्ट्रीय राजनीति के मुख्य मंच पर एंट्री मिल जाएगी। वह विपक्षी गठबंधन (INDIA Bloc) और संसद में कांग्रेस के बड़े चेहरे के रूप में उभर सकती हैं, जिससे उनका कद एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होगा। केंद्रीय एजेंसियों और राजनीतिक दबाव से राहत बीजेपी और एनडीए के आक्रामक रुख के सामने फिलहाल ममता बनर्जी राज्य में अकेली पड़ती दिख रही हैं। कांग्रेस जैसी पुरानी और राष्ट्रीय पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और कानूनी सेल का साथ मिलने से वह केंद्रीय जांच एजेंसियों मसलन CBI, ED और अन्य राजनीतिक हमलों का मुकाबला अधिक संस्थागत तरीके से कर पाएंगी। अब यदि इस विलय से होनेवाले नुकसान की बात करें, तो इससे बंगाल में 'दीदी' के ब्रांड और वर्चस्व का अंत होना सुनिश्चित है। इसे 'बंगाल की बेटी' की अपनी पहचान और संप्रभुता का समर्पण ही समझा जायेगा। ममता बनर्जी की पूरी राजनीति 'अस्मिता' और स्वायत्तता पर टिकी है। उन्होंने हमेशा दिल्ली के नियंत्रण के खिलाफ लड़कर अपनी छवि बनाई है। कांग्रेस में विलय का सीधा मतलब होगा कि अब बंगाल टीएमसी के फैसले कोलकाता के हरीश चटर्जी स्ट्रीट से नहीं, बल्कि दिल्ली के 24 अकबर रोड यानी कांग्रेस मुख्यालय से तय होंगे। इससे 'दीदी' का वह कड़क और स्वतंत्र नेतृत्व वाला ब्रांड कमजोर हो जाएगा, जिसने उन्हें तीन दशक तक पहचान दी। जमीनी कार्यकर्ताओं और कैडर में निराशा बंगाल में टीएमसी का काडर सालों तक कांग्रेस और वामपंथियों यानी Left दोनों के खिलाफ संघर्ष करके बड़ा हुआ है। स्थानीय स्तर पर आज भी कई जगह कांग्रेस और टीएमसी के कार्यकर्ता आमने-सामने हैं। अचानक हुए इस बदलाव से जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी भ्रम और निराशा फैल सकती है, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को जमीन मजबूत करने में मिलेगा। कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व का आंतरिक विरोध भले ही दिल्ली में सोनिया-ममता के बीच गर्मजोशी दिख रही हो, लेकिन बंगाल कांग्रेस के नेता (जैसे अधीर रंजन चौधरी और अन्य गुट) सालों तक ममता की राजनीति के पीड़ित रहे हैं। बंगाल कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा इस विलय के खिलाफ है। उनका मानना है कि टीएमसी के खिलाफ जनता के गुस्से (Anti-incumbency) का खामियाजा कांग्रेस को भी भुगतना पड़ सकता है, जिससे पार्टी को आंतरिक कलह का सामना करना पड़ेगा। क्या मजबूरी बन गई है 'घर वापसी'? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी एक 'शतरंज की माहिर खिलाड़ी' हैं और वह कभी भी आसानी से घुटने नहीं टेकतीं। लेकिन, मौजूदा वक्त में जब उनकी अपनी ही पार्टी के कई सांसद और विधायक पाला बदलने को तैयार बैठे हैं, तो कांग्रेस के साथ गठबंधन को मजबूत करना या विलय की दिशा में सोचना उनकी रणनीतिक मजबूरी हो सकता है। राजनीतिक विशेषज्ञ संजय सिंह के अनुसार: "यह कदम ममता बनर्जी के लिए अपनी राजनीतिक विरासत को पूरी तरह खत्म होने से बचाने और अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने का आखिरी दांव साबित हो सकता है।" क्या ममता बनर्जी अपनी शर्तों पर कांग्रेस के साथ आगे बढ़ेंगी या फिर यह केवल विपक्षी एकजुटता को और धार देने की एक कोशिश है? इसका फैसला आने वाले कुछ दिनों में पूरी तरह साफ हो जाएगा, लेकिन इतना तय है कि बंगाल की राजनीति अब एक नए मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है।
भारतीय सशस्त्र बलों की निष्पक्षता ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने भारतीय सशस्त्र बलों के राजनीतिक रूप से निष्पक्ष बने रहने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि सेना, नौसेना और वायुसेना को राजनीति से जितना दूर रखा जाएगा, देश और लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। "सेना की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता" एक कार्यक्रम के दौरान जनरल नरवणे ने कहा कि भारतीय सशस्त्र बल हमेशा से गैर-राजनीतिक रहे हैं। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान और ताकत है। उन्होंने कहा, "सशस्त्र बलों को राजनीति से जितना संभव हो, उतना दूर रखा जाना चाहिए। यही हमारे लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है।" लोकतंत्र के मजबूत स्तंभ हैं सशस्त्र बल पूर्व सेना प्रमुख ने कहा कि न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस की तरह सशस्त्र बल भी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। उनके अनुसार, सेना की पेशेवर निष्पक्षता ही भारत को दुनिया के अन्य देशों से अलग बनाती है। व्यक्ति और संस्था में अंतर समझना जरूरी जनरल नरवणे ने स्पष्ट किया कि संस्थान के रूप में सेना पूरी तरह अपोलिटिकल है। हालांकि, सेना के जवान और अधिकारी व्यक्तिगत रूप से लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि हर सैनिक को मतदान करने और अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक सोच रखने का पूरा अधिकार है। राहुल गांधी के बयान के बाद चर्चा में आए थे नरवणे गौरतलब है कि इसी वर्ष फरवरी में जनरल नरवणे अपने अप्रकाशित संस्मरण को लेकर चर्चा में आए थे। लोकसभा में राहुल गांधी ने उनके संस्मरण के कथित अंशों का उल्लेख करते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा था। इस पर संसद में काफी हंगामा हुआ था। सैन्य संस्थानों की गरिमा बनाए रखना जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि जनरल नरवणे का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में राजनीतिक विमर्श लगातार तीखा हो रहा है। ऐसे में सेना की निष्पक्षता पर उनका जोर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद हुआ हमला जर्मनी की राजधानी बर्लिन में ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी पर एक व्यक्ति ने लाल रंग का तरल पदार्थ फेंक दिया। शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह टमाटर केचप था। घटना उस समय हुई जब पहलवी प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद अपने समर्थकों का अभिवादन कर रहे थे। हमले का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। कैसे हुआ हमला? वीडियो में देखा जा सकता है कि रेजा पहलवी समर्थकों की ओर हाथ हिला रहे थे। तभी पीछे से एक व्यक्ति अचानक आया और उन पर लाल तरल फेंक दिया। लाल पदार्थ उनके कोट और गर्दन पर गिरा सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत आरोपी को पकड़ लिया पुलिस ने मौके पर ही उसे हिरासत में ले लिया हालांकि, पहलवी इस घटना में पूरी तरह सुरक्षित रहे। हमले के बाद भी नहीं रुके पहलवी हमले के बावजूद रेजा पहलवी ने संयम बनाए रखा। उन्होंने समर्थकों का अभिवादन जारी रखा और बाद में अपनी कार में बैठकर वहां से रवाना हो गए। यह घटना उनके समर्थकों और विरोधियों के बीच मौजूद गहरे राजनीतिक विभाजन को भी दर्शाती है। सीजफायर पर की थी तीखी आलोचना घटना से कुछ देर पहले पहलवी ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्धविराम की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि तेहरान के मौजूदा नेतृत्व पर भरोसा करना एक बड़ी भूल होगी और पश्चिमी देशों को ईरान के साथ केवल "यथास्थिति" बनाए रखने की नीति छोड़नी चाहिए। कौन हैं रेजा पहलवी? रेजा पहलवी, ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बेटे हैं। 1967 में उन्हें क्राउन प्रिंस घोषित किया गया था। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद उनका परिवार निर्वासन में चला गया। वे लंबे समय से ईरान की मौजूदा इस्लामिक सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं। हाल के महीनों में वे ईरान में राजनीतिक बदलाव की मांग को लेकर काफी सक्रिय रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।