नई दिल्ली, एजेंसियां। जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार ने 12 अगस्त 2026 को दिल्ली में पार्टी के सांसदों के साथ बैठक की। बैठक में बिहार के विकास, जनहित से जुड़े मुद्दों और मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई। नीतीश कुमार ने सांसदों से बिहार से जुड़े विषयों को संसद के दोनों सदनों में प्रभावी तरीके से उठाने को कहा।
बैठक में बिहार के विकास से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। नीतीश कुमार ने सांसदों को राज्य की जरूरतों और जनता से जुड़े विषयों को केंद्र के सामने प्रभावी ढंग से रखने की जिम्मेदारी दी।
JDU की ओर से सांसदों को यह संदेश दिया गया कि संसद में बिहार के हितों से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता दी जाए और राज्य के विकास के लिए केंद्र से संबंधित मांगों को मजबूती से उठाया जाए।
बैठक में समसामयिक राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा हुई। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब संसद का मानसून सत्र अंतिम दौर में था और विभिन्न मुद्दों पर सरकार तथा विपक्ष के बीच तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिला।
नीतीश कुमार की दिल्ली में JDU सांसदों के साथ यह बैठक पार्टी के संसदीय रुख को लेकर भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, बैठक में बिहार को केंद्रित रखते हुए आगे की रणनीति पर विचार किया गया।
नीतीश कुमार अप्रैल 2026 में बिहार से निर्विरोध राज्यसभा के लिए चुने गए थे और 10 अप्रैल को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली थी। इसके बाद दिल्ली में उनकी राजनीतिक सक्रियता बढ़ी है। JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वह पार्टी के सांसदों के साथ समन्वय बनाकर बिहार से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने पर जोर दे रहे हैं।
बैठक का मुख्य संदेश यही रहा कि JDU के सांसद संसद में बिहार के विकास और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाएं। इससे यह भी संकेत मिलता है कि पार्टी केंद्र और राज्य से जुड़े विकासात्मक मुद्दों को संसद के आगामी कामकाज में प्रमुखता देने की तैयारी में है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
सहरसा, एजेंसियां। बिहार के सहरसा जिले में विद्यालय की बदहाल व्यवस्था का मामला सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने कार्रवाई की है। पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाने के मामले में दो शिक्षकों को निलंबित कर दिया गया है। मामला सामने आने के बाद विभाग ने स्कूल की स्थिति और शिक्षकों की कार्यप्रणाली की जांच कराई। पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ रहे थे बच्चे जानकारी के मुताबिक, विद्यालय में बच्चों को कक्षा के अंदर पढ़ाने के बजाय पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाया जा रहा था। इस स्थिति का वीडियो या तस्वीर सामने आने के बाद मामला चर्चा में आया। घटना को लेकर शिक्षा विभाग ने इसे विद्यालय संचालन में लापरवाही माना और संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी। जांच के बाद दो शिक्षकों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई। शिक्षा विभाग ने लिया संज्ञान मामला सामने आने के बाद विभागीय अधिकारियों ने विद्यालय की स्थिति का जायजा लिया। शिक्षकों से भी इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया। इसके बाद प्रथम दृष्टया लापरवाही पाए जाने पर दोनों शिक्षकों को निलंबित किया गया। विभाग की कार्रवाई का उद्देश्य स्कूलों में बच्चों के लिए उचित शैक्षणिक वातावरण और नियमित कक्षाएं सुनिश्चित करना बताया जा रहा है। स्कूल की व्यवस्था पर भी उठे सवाल इस घटना ने सरकारी स्कूलों में आधारभूत सुविधाओं और विद्यालय प्रबंधन को लेकर सवाल खड़े किए हैं। यदि भवन उपलब्ध होने के बावजूद बच्चों को खुले में पढ़ाया जा रहा था, तो इसकी वजह और जिम्मेदारी तय करने की मांग भी उठ रही है। शिक्षा विभाग की ओर से अब स्कूल की अन्य व्यवस्थाओं की भी जांच किए जाने की संभावना है, ताकि ऐसी स्थिति दोबारा सामने न आए। शिक्षकों पर कार्रवाई के बाद बढ़ी जवाबदेही दो शिक्षकों के निलंबन से यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि विद्यालय संचालन में लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। हालांकि, निलंबन का अंतिम आधार और स्कूल में बच्चों को पेड़ के नीचे पढ़ाने की वास्तविक वजह विभागीय जांच की पूरी रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
गोपालगंज, एजेंसियां। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बुधवार, 12 अगस्त को गोपालगंज जिले के थावे प्रखंड स्थित चनावे गांव में प्रस्तावित मां थावे मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के लिए चिह्नित जमीन का निरीक्षण किया। मुख्यमंत्री ने परियोजना से जुड़ी तैयारियों की जानकारी ली और अधिकारियों को निर्माण से पहले की सभी जरूरी प्रक्रियाएं तेजी से पूरी करने के निर्देश दिए। 25 एकड़ 20 डिसमिल जमीन का लिया जायजा निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को 25 एकड़ 20 डिसमिल भूमि पर प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल की योजना के बारे में जानकारी दी। साइट मैप के जरिए जमीन की उपलब्धता, पहुंच मार्ग, आधारभूत सुविधाओं और भूमि की मौजूदा स्थिति समेत परियोजना से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी मुख्यमंत्री को दी गई। सम्राट चौधरी ने अधिकारियों से परियोजना की प्रगति और निर्माण से पहले पूरी की जाने वाली प्रक्रियाओं के बारे में भी जानकारी ली। निर्माण प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश मुख्यमंत्री ने संबंधित अधिकारियों को सभी आवश्यक औपचारिकताएं जल्द पूरी करने और परियोजना को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने का निर्देश दिया। सरकार का उद्देश्य मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के निर्माण कार्य को निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद तेजी से आगे बढ़ाना है। गोपालगंज और आसपास के जिलों को मिलेगा लाभ मुख्यमंत्री ने कहा कि मां थावे मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल बनने से गोपालगंज और आसपास के क्षेत्रों के लोगों को बेहतर एवं आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो सकेंगी। गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों को दूसरे जिलों या बड़े शहरों की ओर जाने की जरूरत कम होगी। यह परियोजना क्षेत्र में स्वास्थ्य क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। मेडिकल कॉलेज शुरू होने के बाद चिकित्सा शिक्षा के साथ-साथ विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की भी उम्मीद है। थावे मंदिर में मुख्यमंत्री ने की पूजा-अर्चना गोपालगंज दौरे के दौरान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने प्रसिद्ध थावे मंदिर में भी पूजा-अर्चना की। उन्होंने बिहार की सुख-शांति, समृद्धि और विकास के लिए मां थावे से प्रार्थना की।
पटना: बिहार में लंबे समय से बंद पड़ी चीनी मिलों को दोबारा चालू कराने की दिशा में सरकार ने कदम तेज कर दिए हैं। सरकार का मानना है कि राज्य में चीनी उद्योग को पुनर्जीवित करने की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में जमीन से जुड़े कानूनी विवाद शामिल हैं। इन्हीं विवादों के समाधान के लिए अब राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग और गन्ना उद्योग विभाग मिलकर काम करेंगे। बुधवार को राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में बंद चीनी मिलों से जुड़ी जमीन और लंबित मुकदमों की स्थिति की विस्तार से समीक्षा की गई। बैठक में गन्ना उद्योग मंत्री संजय पासवान भी मौजूद रहे। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि जमीन से जुड़े मामलों की सही जानकारी जुटाकर अदालतों में सरकार का पक्ष मजबूती से रखा जाए और लंबित मामलों के समाधान में अनावश्यक देरी न हो। जमीन विवाद खत्म करना सरकार की पहली प्राथमिकता बिहार की कई चीनी मिलें लंबे समय से बंद हैं। इनमें कई जगहों पर मिल की जमीन, मालिकाना हक, लीज और राजस्व रिकॉर्ड को लेकर कानूनी विवाद चल रहे हैं। सरकार अब इन मामलों की अलग-अलग स्तर पर समीक्षा कर रही है। अधिकारियों से यह जानकारी मांगी गई कि संबंधित मामलों में कौन-कौन से मुकदमे अदालतों में लंबित हैं, अब तक क्या कार्रवाई हुई है और सरकार की ओर से अदालत में कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए हैं। राजस्व मंत्री ने स्पष्ट किया कि जमीन की प्रकृति, स्वामित्व और राजस्व रिकॉर्ड का आपस में सही मिलान किया जाए। सरकारी जमीन से जुड़े मामलों में सरकार का पक्ष प्रभावी तरीके से रखने और रैयती जमीन से संबंधित मामलों में भी स्पष्ट दस्तावेज अदालत के सामने प्रस्तुत करने को कहा गया है। बारा चकिया की करीब 1,008 एकड़ जमीन पर नजर पूर्वी चंपारण के बारा चकिया चीनी मिल का मामला सरकार की प्राथमिकता में है। मिल से जुड़ी करीब 1,008 एकड़ जमीन और परिसंपत्तियों से संबंधित मामलों की समीक्षा की गई। इसमें बेतिया राज की जमीन भी शामिल है। यह मामला लंबे समय से कानूनी प्रक्रिया में उलझा हुआ है। सरकार अब इसकी प्रभावी पैरवी कर विवाद के जल्द समाधान की कोशिश करेगी, ताकि जमीन का भविष्य स्पष्ट होने के बाद औद्योगिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल सके। हनुमान शुगर मिल की जमीन भी कानूनी पेच में मोतिहारी स्थित मेसर्स हनुमान शुगर एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड से जुड़ी जमीन को लेकर भी विवाद है। बैठक में करीब 13 बीघा 6 कट्ठा 13 धूर फ्रीहोल्ड जमीन और 24 बीघा 15 कट्ठा 2 धूर बेतिया राज की लीजहोल्ड जमीन की स्थिति की समीक्षा की गई। सरकार का प्रयास है कि इन जमीनों से जुड़े कानूनी मामलों की स्थिति स्पष्ट कर जल्द समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जाए। सासामुसा चीनी मिल का मामला भी शामिल गोपालगंज की सासामुसा चीनी मिल भी सरकार की समीक्षा के दायरे में है। यहां करीब 44 बीघा 8 कट्ठा 7 धूर स्वामित्व वाली जमीन और 21 बीघा 19 कट्ठा 9 धूर हथुआ राज की मुकर्ररी लीज जमीन से जुड़े विवादों पर चर्चा हुई। अधिकारियों को इन मामलों की कानूनी स्थिति की समीक्षा कर जरूरी कार्रवाई तेज करने का निर्देश दिया गया है। मिलें शुरू हुईं तो किसानों को भी फायदा चीनी मिलों को दोबारा शुरू करने की योजना का असर सिर्फ उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा संबंध गन्ना किसानों की आय और स्थानीय रोजगार से भी है। सरकार गन्ने की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को आधुनिक तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने की तैयारी में है। विभाग के मुताबिक, वर्षाकाल में लगाई गई गन्ने की फसल अगले साल फरवरी तक बीज के लिए तैयार हो सकती है। इसके बाद खूंटी से रैटून फसल लेकर किसान अतिरिक्त उत्पादन और आमदनी हासिल कर सकते हैं। दो विभाग मिलकर करेंगे मॉनिटरिंग बंद चीनी मिलों को फिर से औद्योगिक गतिविधियों से जोड़ने के लिए राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग और गन्ना उद्योग विभाग के बीच समन्वय बढ़ाया जाएगा। दोनों विभागों के सचिवों को लंबित मामलों की अपडेट सूची तैयार करने और नियमित समीक्षा करने का निर्देश दिया गया है। सरकार की रणनीति साफ है—पहले जमीन से जुड़े कानूनी पेच सुलझाए जाएं, फिर बंद मिलों को दोबारा शुरू करने या संबंधित जमीन पर नए औद्योगिक प्रोजेक्ट की संभावनाओं को आगे बढ़ाया जाए। अगर यह प्रक्रिया जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो बिहार के चीनी उद्योग, गन्ना किसानों और स्थानीय रोजगार के लिए इसका बड़ा असर हो सकता है।