पश्चिम एशिया

Share Market
शेयर बाजार लगातार चौथे दिन गिरावट के साथ बंद, सेंसेक्स 360 अंक टूटा; कच्चे तेल और वैश्विक तनाव से निवेशकों में चिंता

मुंबई, एजेंसियां। भारतीय शेयर बाजार गुरुवार को लगातार चौथे कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ। बीएसई सेंसेक्स 360 अंक से अधिक टूटकर 76,391.39 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 भी गिरावट के साथ 23,869.60 के स्तर पर बंद हुआ। वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेत, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर घरेलू बाजार पर साफ देखने को मिला।   बैंकिंग, आईटी और ऑटो शेयरों में बिकवाली रही हावी   कारोबार के दौरान बैंकिंग, आईटी, ऑटो, फार्मा और मेटल सेक्टर के शेयरों में दबाव बना रहा। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की सतर्क रणनीति और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण निवेशकों ने मुनाफावसूली को प्राथमिकता दी। हालांकि कुछ चुनिंदा एफएमसीजी और डिफेंस शेयरों में खरीदारी देखने को मिली, लेकिन इससे बाजार को बड़ी राहत नहीं मिल सकी।   कच्चे तेल और वैश्विक घटनाक्रम पर रहेगी बाजार की नजर   बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रेंट क्रूड की ऊंची कीमतें और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक तनाव निकट भविष्य में निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा कंपनियों के तिमाही नतीजे, विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और वैश्विक आर्थिक संकेत अगले कारोबारी सत्रों में बाजार की दिशा तय करेंगे। विश्लेषकों के अनुसार फिलहाल बाजार में उतार-चढ़ाव का दौर जारी रह सकता है और निवेशकों को सतर्क रणनीति अपनाने की सलाह दी जा रही है।

abhishek singh जुलाई 23, 2026 0
Air India
युद्ध के बीच एयर इंडिया का बड़ा ऐलान, तेल अवीव-दिल्ली उड़ानें सितंबर तक रहेंगी निलंबित

नई दिल्ली, एजेंसियां। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और लगातार बिगड़ते सुरक्षा हालात के बीच एयर इंडिया ने बड़ा फैसला लेते हुए दिल्ली-तेल अवीव (इज़राइल) मार्ग की सभी उड़ानों को सितंबर तक निलंबित करने की घोषणा की है। एयरलाइन ने कहा कि यात्रियों और चालक दल की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, इसलिए मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है।   सुरक्षा कारणों से लिया गया फैसला   एयर इंडिया के अनुसार, इज़राइल और आसपास के क्षेत्रों में जारी सैन्य संघर्ष तथा सुरक्षा जोखिमों को ध्यान में रखते हुए तेल अवीव के लिए उड़ानों का संचालन फिलहाल संभव नहीं है। एयरलाइन लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय कर रही है।   यात्रियों को दी जाएगी वैकल्पिक सुविधा   एयरलाइन ने प्रभावित यात्रियों को टिकट की बिना अतिरिक्त शुल्क पुनर्निर्धारण (Rescheduling) या पूर्ण धनवापसी (Full Refund) का विकल्प देने की बात कही है। यात्रियों को अपनी उड़ान की स्थिति जानने के लिए एयर इंडिया की आधिकारिक वेबसाइट और ग्राहक सेवा से संपर्क करने की सलाह दी गई है।   भारतीय यात्रियों की बढ़ी चिंता   इस फैसले के बाद भारत और इज़राइल के बीच यात्रा करने वाले यात्रियों, छात्रों, व्यवसायियों और अन्य भारतीय नागरिकों की चिंता बढ़ गई है। कई लोगों की यात्रा योजनाएं प्रभावित हुई हैं, जबकि कुछ यात्रियों को वैकल्पिक मार्गों से यात्रा करनी पड़ सकती है।   स्थिति सामान्य होने पर होगा पुनर्मूल्यांकन   एयर इंडिया ने स्पष्ट किया है कि यह निर्णय अस्थायी है और क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति की लगातार समीक्षा की जा रही है। जैसे ही हालात सामान्य और सुरक्षित होंगे, तेल अवीव मार्ग पर उड़ानों को दोबारा शुरू करने पर विचार किया जाएगा।

abhishek singh जुलाई 23, 2026 0
Share Market
लाल निशान पर बंद हुआ शेयर बाजार, सेंसेक्स 561 अंक टूटा, निफ्टी 24,052 पर बंद

मुंबई, एजेंसियां। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। तीन कारोबारी सत्रों की तेजी के बाद घरेलू बाजार गिरावट के साथ बंद हुए। बीएसई सेंसेक्स 561.46 अंक यानी 0.72 फीसदी टूटकर 77,054.94 पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 158.95 अंक यानी 0.66 फीसदी की गिरावट के साथ 24,052.05 के स्तर पर आ गया। कारोबार के दौरान सेंसेक्स 614.92 अंक तक फिसलकर 77,001.48 के निचले स्तर पर पहुंच गया।   वित्तीय, ऑटो और आईटी शेयरों में बिकवाली दिनभर के कारोबार में वित्तीय, ऑटो, रियल एस्टेट और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेक्टर के शेयरों पर सबसे अधिक दबाव रहा। सेंसेक्स में शामिल एचसीएल टेक के शेयर 4.42 फीसदी तक टूटे। इसके अलावा बजाज फिनसर्व, इंटरग्लोब एविएशन, भारतीय स्टेट बैंक, महिंद्रा एंड महिंद्रा तथा लार्सन एंड टुब्रो के शेयरों में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। दूसरी ओर भारती एयरटेल, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), सन फार्मा, टाटा स्टील, अडानी पोर्ट्स और इटरनल के शेयर बढ़त के साथ बंद हुए। सुरक्षित माने जाने वाले हेल्थकेयर, फार्मा, एफएमसीजी और चुनिंदा मेटल शेयरों में खरीदारी देखने को मिली।   कच्चा तेल महंगा, रुपया कमजोर वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 4.26 फीसदी बढ़कर 86.85 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई। वहीं, डॉलर के मुकाबले रुपया 54 पैसे टूटकर 96.22 (अस्थायी) के स्तर पर बंद हुआ। जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के शोध प्रमुख विनोद नायर के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव से ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने और आयात लागत बढ़ने की आशंका ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। इसके साथ ही जून में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित महंगाई बढ़कर 9.87 फीसदी होने से भी बाजार का निवेशक भाव कमजोर रहा। विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने सोमवार को 3,062.27 करोड़ रुपये की बिकवाली की, जिससे बाजार पर अतिरिक्त दबाव बना रहा।

abhishek singh जुलाई 14, 2026 0
Russia Crude Oil
भारत के लिए सस्ता हुआ रूसी तेल, टैंकर किराए में बड़ी गिरावट; कच्चे तेल के आयात पर बढ़ेगी बचत

नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत के लिए राहत भरी खबर है। रूस से कच्चा तेल लाने वाले टैंकरों का किराया हाल के हफ्तों में काफी कम हो गया है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों की आयात लागत घटने लगी है। शिपिंग दरों में इस गिरावट का सीधा फायदा भारत को सस्ते रूसी कच्चे तेल के रूप में मिल रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव इस राहत को लंबे समय तक बनाए रखने में चुनौती बन सकता है।   क्यों घटा टैंकरों का किराया?   जानकारों के अनुसार, वैश्विक शिपिंग बाजार में टैंकरों की उपलब्धता बढ़ने और माल ढुलाई की मांग में नरमी आने से समुद्री परिवहन लागत कम हुई है। इसका असर रूस से भारत आने वाले तेल टैंकरों पर भी पड़ा है। कम फ्रेट चार्ज के कारण भारतीय कंपनियों को पहले की तुलना में कम लागत पर रूसी कच्चा तेल मिल रहा है, जिससे रिफाइनरियों के मार्जिन में सुधार की उम्मीद है।   भारत को मिलेगा आर्थिक फायदा   भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और रूस उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। टैंकर किराया कम होने से तेल आयात का कुल खर्च घटेगा, जिससे रिफाइनरियों की लागत कम होगी। यदि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रहती हैं, तो इसका सकारात्मक असर ईंधन कंपनियों की लागत और ऊर्जा क्षेत्र पर भी पड़ सकता है।   होर्मुज तनाव बना सबसे बड़ा जोखिम   विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति पर लगातार नजर रखना जरूरी होगा। यदि इस मार्ग पर आवाजाही प्रभावित होती है, तो शिपिंग लागत दोबारा बढ़ सकती है और भारत को मिल रही मौजूदा राहत सीमित हो सकती है। ऐसे में ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों पर भी भारत का फोकस बना रहेगा।

abhishek singh जुलाई 12, 2026 0
US-Iran War
होर्मुज जलडमरूमध्य बंद, अमेरिका का बड़ा पलटवार; ईरान के 140 सैन्य ठिकानों पर हमले, खाड़ी में बढ़ा युद्ध का खतरा

तेहरान, एजेंसियां। पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। ईरान द्वारा दुनिया के सबसे अहम तेल मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा के बाद अमेरिका ने बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई करते हुए ईरान के 140 सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए। अमेरिकी कार्रवाई में मिसाइल लॉन्च साइट, ड्रोन बेस, रडार सिस्टम, कमांड सेंटर और नौसैनिक ठिकानों को निशाना बनाया गया।   होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से बढ़ी वैश्विक चिंता   ईरान ने आरोप लगाया कि अमेरिकी हस्तक्षेप और विदेशी जहाजों की गतिविधियों के कारण उसने सुरक्षा कारणों से होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किया है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के करीब 20% कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में LNG की आपूर्ति का प्रमुख रास्ता है। इसके बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।   अमेरिका का जवाबी हमला, 140 ठिकाने बने निशाना   अमेरिकी सेना ने ईरान के खिलाफ तीन दिनों तक चले अभियान में करीब 140 सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाया। हमलों में वायु रक्षा प्रणाली, मिसाइल और ड्रोन लॉन्चर, तटीय रडार, कमांड एवं कंट्रोल नेटवर्क और कई सैन्य ठिकानों को नष्ट करने का दावा किया गया है। अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और ईरान के हमलों का जवाब देने के लिए की गई।   ईरान का पलटवार, खाड़ी देशों में बढ़ा तनाव   अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने कतर, कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों की ओर मिसाइल और ड्रोन दागे। कई जगह धमाकों की खबरें सामने आईं और क्षेत्र में एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय कर दिए गए। इस घटनाक्रम के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में युद्ध का खतरा और गहरा गया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान निकालने की अपील कर रहा है।

abhishek singh जुलाई 12, 2026 0
Iranian officials discuss nuclear policy as Tehran links IAEA inspections to a final agreement with the United States.
ईरान ने परमाणु निरीक्षण पर रखी बड़ी शर्त, बोला- अंतिम समझौते से पहले नहीं मिलेगी पहुंच

  तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच जारी परमाणु वार्ता के बीच ईरान ने अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण को लेकर नया रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि उसके परमाणु ठिकानों तक पहुंच केवल अंतिम समझौते के बाद ही दी जाएगी। तेहरान ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक अमेरिका प्रतिबंधों और दंडात्मक उपायों को हटाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक किसी भी प्रकार के निरीक्षण की अनुमति नहीं दी जाएगी। IAEA प्रमुख की मांग को किया खारिज ईरान के उप विदेश मंत्री Kazem Gharibabadi ने बुधवार को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी International Atomic Energy Agency के महानिदेशक Rafael Grossi की उस टिप्पणी को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने ईरान के परमाणु स्थलों के निरीक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया था। गरीबाबादी ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में परमाणु प्रतिष्ठानों या वहां मौजूद परमाणु सामग्री तक किसी भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी की पहुंच देने की कोई योजना नहीं है। स्विट्जरलैंड में नहीं हुई मुलाकात सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में ईरानी उप विदेश मंत्री ने दावा किया कि ग्रोसी के अनुरोध के बावजूद स्विट्जरलैंड में उनकी कोई बैठक नहीं हुई। उन्होंने कहा कि जिन परमाणु ठिकानों पर हाल के महीनों में हमले हुए हैं, वहां निरीक्षण की अनुमति देने का सवाल अभी विचाराधीन भी नहीं है। इन मुद्दों पर फैसला केवल अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक और अंतिम समझौते के तहत ही लिया जाएगा। प्रतिबंध हटाने को बनाया शर्त गरीबाबादी ने कहा कि निरीक्षण व्यवस्था पर सहमति तभी बन सकती है, जब दूसरी ओर से सभी आर्थिक प्रतिबंधों और अन्य दंडात्मक उपायों को समाप्त करने के लिए व्यावहारिक और भरोसेमंद कदम उठाए जाएं। उन्होंने संकेत दिया कि ईरान किसी भी ऐसे समझौते को स्वीकार नहीं करेगा, जिसमें केवल निगरानी और निरीक्षण की शर्तें हों, लेकिन प्रतिबंधों में राहत का स्पष्ट प्रावधान न हो। परमाणु डील पर बढ़ सकता है गतिरोध विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की इस नई शर्त से परमाणु वार्ता और जटिल हो सकती है। अमेरिका लंबे समय से इस बात पर जोर देता रहा है कि किसी भी समझौते में स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था अनिवार्य होगी, ताकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी सुनिश्चित की जा सके। दूसरी ओर, तेहरान का कहना है कि निरीक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया को प्रतिबंधों में राहत से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 'मीडिया दबाव से नहीं बदलेगा ईरान का रुख' ईरानी उप विदेश मंत्री ने अपने बयान में पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि मीडिया के जरिए दबाव बनाने या राजनीतिक माहौल तैयार करने की कोशिशों से ईरान अपनी नीति नहीं बदलेगा। उन्होंने कहा, "मीडिया के शोर-शराबे और दबाव की राजनीति के जरिए इन मुद्दों को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। किसी भी निर्णय का आधार केवल अंतिम समझौता और पारस्परिक प्रतिबद्धताओं का पालन होगा।" अंतिम समझौते पर टिकी निगाहें अमेरिका और ईरान के बीच जारी वार्ता का उद्देश्य परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े विवादों का स्थायी समाधान तलाशना है। निरीक्षण व्यवस्था को लेकर सामने आए नए मतभेदों ने यह संकेत दिया है कि दोनों पक्षों के बीच अभी भी कई अहम मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु निरीक्षण और प्रतिबंधों में राहत का मुद्दा आने वाले दौर की वार्ताओं में सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।  

Deepshikha जून 25, 2026 0
Iranian President Masoud Pezeshkian invites PM Narendra Modi to attend Ayatollah Ali Khamenei’s state funeral ceremonies.
खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होंगे पीएम मोदी? ईरान के राष्ट्रपति ने भेजा विशेष निमंत्रण

  तेहरान/नई दिल्ली: ईरान के सर्वोच्च नेता रहे Ayatollah Ali Khamenei के अंतिम संस्कार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैयारियां तेज हो गई हैं। इसी बीच ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi को अंतिम संस्कार कार्यक्रम में शामिल होने के लिए विशेष आमंत्रण भेजा है। भारत सरकार की ओर से अब तक इस निमंत्रण की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। 5 से 9 जुलाई तक होंगे अंतिम संस्कार से जुड़े कार्यक्रम ईरानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, खामेनेई के अंतिम संस्कार से संबंधित धार्मिक और राजकीय कार्यक्रम 5 जुलाई से 9 जुलाई तक आयोजित किए जाएंगे। कार्यक्रमों का आयोजन तेहरान, कोम और मशहद सहित कई प्रमुख शहरों में किया जाएगा। बताया जा रहा है कि 5, 6 और 7 जुलाई को तेहरान और कोम में श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित होंगी, जबकि अंतिम और सबसे बड़ा कार्यक्रम 9 जुलाई को मशहद में रखा गया है, जहां बड़ी संख्या में देशी-विदेशी प्रतिनिधियों के पहुंचने की संभावना है। तीन दशक तक ईरान की राजनीति के केंद्र में रहे खामेनेई अयातुल्ला अली खामेनेई पिछले तीन दशकों से अधिक समय तक ईरान की राजनीति और शासन व्यवस्था के सबसे प्रभावशाली नेता रहे। उनकी अगुवाई में ईरान ने कई क्षेत्रीय और वैश्विक चुनौतियों का सामना किया। रिपोर्टों के अनुसार, 28 फरवरी को ईरान पर हुए संयुक्त सैन्य हमले के दौरान उनकी मृत्यु हुई थी। इसके बाद से देश में राजनीतिक संक्रमण और नई नेतृत्व व्यवस्था को लेकर चर्चाएं जारी हैं। भारत-ईरान संबंधों पर टिकी निगाहें विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कार्यक्रम में शामिल होते हैं, तो यह भारत और ईरान के संबंधों के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत माना जाएगा। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, चाबहार बंदरगाह और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर लंबे समय से रणनीतिक सहयोग रहा है। अंतिम निर्णय भारत सरकार के आधिकारिक कार्यक्रम और कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा। अमेरिका-ईरान समझौते के बाद बदला क्षेत्रीय माहौल इस बीच, अमेरिका और ईरान के बीच हाल में हुए अंतरिम समझौते के बाद पश्चिम एशिया में तनाव कुछ कम होता दिखाई दे रहा है। समझौते के तहत दोनों पक्षों ने वार्ता जारी रखने पर सहमति जताई है। होर्मुज स्ट्रेट में फिर शुरू हुई जहाजों की आवाजाही समझौते के बाद रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण Strait of Hormuz में जहाजों की आवाजाही भी फिर से शुरू हो गई है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने ईरानी तेल पर लागू कुछ प्रतिबंधों में 60 दिनों की अस्थायी छूट देने का लाइसेंस जारी किया है। विश्लेषकों का कहना है कि इस कदम से वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिल सकती है और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिलने की संभावना है। पीएम मोदी की मौजूदगी पर बनी रहेगी नजर अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान के इस विशेष निमंत्रण को स्वीकार करते हैं या नहीं। यदि ऐसा होता है, तो यह हाल के वर्षों में भारत और ईरान के बीच सबसे महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय कूटनीतिक संपर्कों में से एक माना जाएगा।  

Deepshikha जून 25, 2026 0
US President Donald Trump speaks on Iran nuclear inspections amid ongoing US-Iran peace negotiations.
परमाणु निरीक्षण पर फिर अटका अमेरिका-ईरान समझौता, ट्रंप बोले- जांच की अनुमति नहीं मिली तो रद्द कर दूंगा बातचीत

  अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर चल रही बातचीत के बीच परमाणु निरीक्षण का मुद्दा एक बार फिर विवाद के केंद्र में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी अंतिम समझौते में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को ईरान के परमाणु ठिकानों की जांच की अनुमति देना अनिवार्य होगा। वहीं, ईरान इस तरह की व्यापक निरीक्षण व्यवस्था को स्वीकार करने से इनकार करता नजर आ रहा है। ट्रंप ने ईरान के दावों को बताया गलत पेंसिल्वेनिया में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरानी अधिकारियों के उन दावों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि तेहरान ने किसी व्यापक अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था को मंजूरी नहीं दी है। ट्रंप ने कहा कि ईरानी अधिकारी इस मुद्दे पर गलत जानकारी दे रहे हैं और उन्हें बातचीत में तय हो रही शर्तों की पूरी जानकारी है। उन्होंने कहा, “निरीक्षण व्यवस्था सौ फीसदी तय है। अगर ऐसा नहीं होता तो मैं अभी बातचीत और बैठकों को रद्द कर देता।” IAEA को मिलेगी परमाणु ठिकानों तक पहुंच अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि भविष्य में IAEA के निरीक्षकों को ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों तक पहुंच मिलेगी और वे मौके पर जाकर जांच कर सकेंगे। ट्रंप के अनुसार, किसी भी समझौते की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र और अंतरराष्ट्रीय निगरानी व्यवस्था जरूरी है। उन्होंने कहा कि उचित समय आने पर निरीक्षक जमीन पर मौजूद होंगे और समझौते के अनुपालन की पुष्टि करेंगे। निरीक्षण व्यवस्था पर दोनों देशों में मतभेद परमाणु निगरानी को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। अमेरिका का मानना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर किसी भी समझौते में स्वतंत्र जांच और सत्यापन की व्यवस्था जरूरी है। वहीं, ईरान कई बार यह कह चुका है कि उसकी परमाणु गतिविधियां शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हैं और अत्यधिक अंतरराष्ट्रीय निगरानी उसकी संप्रभुता के खिलाफ हो सकती है। ईरान ने ट्रंप और जेडी वेंस के दावों को नकारा ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अमेरिकी दावों को खारिज करते हुए कहा कि परमाणु स्थलों की जांच को लेकर कोई अंतिम समयसीमा तय नहीं हुई है। उन्होंने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान का भी खंडन किया, जिसमें कहा गया था कि ईरान स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए तैयार हो गया है। बघाई ने कहा कि इस विषय पर अभी कई मुद्दों पर चर्चा बाकी है। परमाणु समझौतों में हमेशा अहम रहा है सत्यापन विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान से जुड़े सभी प्रमुख परमाणु समझौतों में निगरानी और सत्यापन सबसे महत्वपूर्ण तत्व रहे हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देश चाहते हैं कि यह सुनिश्चित किया जाए कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण और नागरिक उद्देश्यों तक सीमित रहे। दूसरी ओर, ईरान का तर्क रहा है कि सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर उसकी चिंताओं को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। 60 दिनों की समयसीमा में आगे बढ़ रही बातचीत अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए समझौते के तहत कई मुद्दों पर चरणबद्ध बातचीत जारी है। दोनों पक्षों ने 60 दिनों के भीतर व्यापक सहमति बनाने की दिशा में काम करने पर सहमति जताई है। स्विट्जरलैंड में हाल में हुई वार्ता में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी अधिकारियों के बीच परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, क्षेत्रीय सुरक्षा, पुनर्निर्माण और होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य हो रही गतिविधियां वार्ता के बाद अमेरिकी प्रशासन ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल परिवहन में तेजी आई है और समुद्री गतिविधियां सामान्य होने लगी हैं। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठनों के अनुसार, क्षेत्र में फंसे हजारों नाविकों और जहाज कर्मियों को सुरक्षित निकालने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। अंतिम समझौते में निरीक्षण बन सकता है सबसे बड़ा मुद्दा विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच व्यापक शांति समझौते की राह में परमाणु निरीक्षण सबसे संवेदनशील और निर्णायक मुद्दा बन सकता है। ट्रंप के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन किसी भी अंतिम समझौते में निरीक्षण और सत्यापन तंत्र से समझौता करने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तेहरान अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था को लेकर कितना लचीला रुख अपनाता है और क्या दोनों देश किसी साझा समाधान तक पहुंच पाते हैं।  

Deepshikha जून 24, 2026 0
US President Donald Trump speaks to reporters, warning Iran to comply with the interim agreement signed with Washington.
अगर ईरान समझौते से मुकरा, तो जो करना पड़ेगा वो करूंगा; ट्रंप की खुली चेतावनी

  वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि तेहरान अमेरिका के साथ हुए अंतरिम समझौते का पालन नहीं करता है, तो वाशिंगटन सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर ईरान का रवैया ठीक नहीं रहा, तो वह वही करेंगे जो आवश्यक होगा। पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, "अगर ईरान अपने समझौते पर खरा नहीं उतरता या उसका व्यवहार सही नहीं रहता है, तो मुझे जो करना पड़ेगा, मैं वह करूंगा।" उनके इस बयान को ईरान के लिए सीधी चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिका-ईरान अंतरिम समझौते के बाद ट्रंप का सख्त संदेश गौरतलब है कि पिछले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian के बीच एक अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब कुछ महीने पहले अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई तथा उसके जवाब में ईरान के हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध की स्थिति में पहुंचा दिया था। समझौते के बावजूद ट्रंप का यह बयान संकेत देता है कि वाशिंगटन ईरान के हर कदम पर कड़ी निगरानी रखेगा और किसी भी उल्लंघन पर कठोर प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार है। अमेरिकी किसानों को मिलेगा फायदा ट्रंप ने कहा कि ईरान की जो धनराशि पहले से रोकी गई थी, उसका इस्तेमाल केवल अमेरिका से खाद्य उत्पाद खरीदने के लिए किया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि इस व्यवस्था से अमेरिकी किसानों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा। ट्रंप ने कहा, "वह सारा पैसा भोजन की खरीद के रूप में वापस अमेरिका आ रहा है। ईरान की आबादी 9.1 करोड़ है और वे अपने लोगों का पेट भरने में सक्षम नहीं हैं। इसलिए जो पैसा जारी किया जा रहा है, वह सीधे हमारे किसानों के पास जाएगा।" युद्ध के बाद गहरा मानवीय और आर्थिक संकट ईरान, इजरायल और लेबनान में जारी संघर्ष ने पश्चिम एशिया में भारी मानवीय संकट पैदा कर दिया है। युद्ध और सैन्य कार्रवाइयों के कारण हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जबकि लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। इस संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं ने दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। समझौते के भविष्य पर टिकी दुनिया की नजर विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान अंतरिम समझौते की सफलता काफी हद तक दोनों देशों की प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगी। यदि समझौते की शर्तों का पालन नहीं हुआ, तो पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ने की आशंका है।  

Deepshikha जून 23, 2026 0
US Vice President JD Vance speaks after Switzerland talks, announcing Iran's willingness to allow IAEA inspectors back into nuclear facilities.
अमेरिका ने ईरानी तेल प्रतिबंधों में दी अस्थायी ढील, वेंस बोले- परमाणु निरीक्षण के लिए तैयार हुआ तेहरान

  वॉशिंगटन/बर्गेनस्टॉक: अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में हुई दो दिवसीय वार्ता के बाद पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दावा किया है कि ईरान अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को दोबारा अपने परमाणु प्रतिष्ठानों तक पहुंच देने पर सहमत हो गया है। यदि यह सहमति औपचारिक रूप लेती है, तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम की अंतरराष्ट्रीय निगरानी फिर से शुरू हो सकेगी। इसी बीच, ट्रंप प्रशासन ने ईरानी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर लगे कुछ प्रतिबंधों में 60 दिनों की अस्थायी छूट देने का फैसला किया है। इस कदम को दोनों देशों के बीच जारी वार्ता को आगे बढ़ाने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। अगस्त तक ईरानी तेल निर्यात को मिली राहत अमेरिकी वित्त मंत्रालय की ओर से जारी छूट के तहत अगस्त तक ईरानी कच्चे तेल और उससे जुड़े उत्पादों की बिक्री, परिवहन और कुछ वित्तीय गतिविधियों को सीमित अनुमति दी गई है। यह हाल के वर्षों में ईरान को दी गई सबसे बड़ी आर्थिक रियायतों में से एक मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से ईरान की अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिल सकती है, जो लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में रही है। वेंस का दावा- अमेरिकी किसानों को भी होगा फायदा जेडी वेंस ने कहा कि यदि भविष्य में ईरान की जमी हुई संपत्तियों को जारी किया जाता है, तो उसका एक हिस्सा अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद में इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा, "यदि ईरानी संपत्तियां मुक्त होती हैं, तो इससे अमेरिकी किसानों को लाभ मिलेगा और ईरानी लोगों की खाद्य जरूरतें पूरी करने में भी मदद मिलेगी।" वेंस ने यह भी संकेत दिया कि आगामी 60 दिनों के दौरान तकनीकी स्तर की वार्ताएं जारी रहेंगी, जिनका उद्देश्य एक स्थायी समझौते तक पहुंचना है। IAEA निरीक्षण को लेकर उठे सवाल वेंस के दावों पर कई विशेषज्ञों ने सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि IAEA निरीक्षण की व्यवस्था पहले से ही 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) का हिस्सा थी, जिसे 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समाप्त कर दिया था। कई विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा पहल पुराने ढांचे को ही नए स्वरूप में पुनर्जीवित करने की कोशिश है। वार्ता के दौरान दिखा तनाव स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में हुई वार्ता के दौरान कई बार तनाव की स्थिति भी बनी। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कुछ बयानों और लेबनान से जुड़े मुद्दों पर ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अस्थायी रूप से बैठक छोड़ने की चेतावनी दी थी। उपराष्ट्रपति वेंस के हस्तक्षेप के बाद दोनों पक्ष दोबारा बातचीत की मेज पर लौटे और वार्ता आगे बढ़ सकी। पाकिस्तान और कतर ने निभाई अहम भूमिका पूरी बातचीत के दौरान पाकिस्तान और कतर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। दोनों देशों ने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद बनाए रखने और संभावित समझौते की दिशा में माहौल तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इजरायल समर्थक खेमे में बढ़ी चिंता ईरानी तेल प्रतिबंधों में ढील और परमाणु निगरानी को लेकर चल रही वार्ता ने अमेरिका के इजरायल समर्थक राजनीतिक वर्ग में चिंता बढ़ा दी है। कई नेताओं का मानना है कि प्रतिबंधों में राहत से ईरान को आर्थिक मजबूती मिल सकती है, जिसका क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों पर असर पड़ सकता है। फिलहाल, अगले 60 दिन अमेरिका और ईरान के रिश्तों के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं। यदि दोनों पक्ष बातचीत को आगे बढ़ाने में सफल रहते हैं, तो पश्चिम एशिया में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक नई शुरुआत हो सकती है।  

Deepshikha जून 23, 2026 0
Smoke rises over southern Lebanon after Israeli airstrikes as Hezbollah and Israeli forces exchange attacks amid escalating regional tensions.
Israel-Hezbollah Conflict: लेबनान में इजरायली हमले तेज, 18 लोगों की मौत; ईरान-अमेरिका वार्ता टली

  बेरूत/तेल अवीव: इजराइल और हिजबुल्ला के बीच तनाव एक बार फिर हिंसक टकराव में बदल गया है। इजरायली सेना ने शुक्रवार (19 जून) को दक्षिणी लेबनान और पूर्वी बेका घाटी में हिजबुल्ला के ठिकानों पर रातभर हवाई हमले किए, जबकि जवाबी कार्रवाई में हिजबुल्ला ने इजरायली सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। संघर्ष में अब तक कम से कम 18 लोगों की मौत की खबर है, जबकि कई अन्य घायल बताए जा रहे हैं। लेबनान की सरकारी समाचार एजेंसी नेशनल न्यूज एजेंसी (NNA) के अनुसार, इजरायली हवाई हमलों में मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है, क्योंकि कई इलाकों में राहत और बचाव अभियान जारी है। वहीं, इजराइल ने कहा है कि उसकी सैन्य कार्रवाई अभी समाप्त नहीं हुई है और हिजबुल्ला के सैन्य ढांचे को निशाना बनाया जा रहा है। इजराइल के चार सैनिक भी मारे गए इजराइली सेना के मुताबिक, दक्षिणी लेबनान में जारी संघर्ष के दौरान एक लेफ्टिनेंट कर्नल समेत चार सैनिक मारे गए हैं। इसके अलावा एक विस्फोटक ड्रोन हमले में पांच सैनिक घायल हुए हैं, जिनका इलाज किया जा रहा है। बेका घाटी में भी सैन्य कार्रवाई दक्षिणी लेबनान के अलावा इजरायली सेना ने पूर्वी बेका घाटी में भी कई ठिकानों पर हमले किए। सेना का कहना है कि इन हमलों का उद्देश्य हिजबुल्ला की सैन्य क्षमताओं और बुनियादी ढांचे को कमजोर करना है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट किया है कि जब तक हिजबुल्ला से उत्पन्न खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक इजरायली सेना लेबनान में अपनी कार्रवाई जारी रखेगी। ईरान-अमेरिका वार्ता स्थगित इजराइल-हिजबुल्ला संघर्ष के बीच शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित ईरान-अमेरिका वार्ता को स्थगित कर दिया गया है। इस बैठक में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के शामिल होने की संभावना थी। क्षेत्रीय अधिकारियों के अनुसार, मध्यस्थ नई तारीख तय करने और वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के प्रयास कर रहे हैं। मौजूदा हालात ने हाल ही में हुए ईरान-अमेरिका प्रारंभिक युद्धविराम समझौते के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। युद्धविराम समझौते पर संकट हालिया समझौते में लेबनान समेत सभी मोर्चों पर तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकने और क्षेत्रीय अखंडता एवं संप्रभुता का सम्मान करने की प्रतिबद्धता जताई गई थी। लेकिन जमीनी हालात इस समझौते की भावना के विपरीत दिखाई दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान में हिंसा नहीं थमी, तो पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की कूटनीतिक कोशिशों को बड़ा झटका लग सकता है। हॉर्मुज जलमार्ग खुलने से राहत इस बीच, ईरान और अमेरिका के बीच हुए प्रारंभिक समझौते के बाद हॉर्मुज जलमार्ग अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए फिर से खुल गया है। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति को राहत मिली है। युद्ध के दौरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर बढ़े तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता पैदा हो गई थी। इजराइल-हिजबुल्ला के बीच फिर बढ़ते संघर्ष ने पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की संभावनाओं को एक बार फिर अनिश्चितता के दौर में पहुंचा दिया है।  

Deepshikha जून 20, 2026 0
Pakistan Prime Minister Shehbaz Sharif and US President Donald Trump amid discussions surrounding the US-Iran peace agreement and Islamabad's diplomatic role.
ईरान-अमेरिका समझौते का श्रेय लेने की पाकिस्तान की कोशिश पर फिरा पानी, ट्रंप के कदम से शहबाज सरकार को झटका

  इस्लामाबाद/वॉशिंगटन: पश्चिम एशिया में तनाव कम करने के उद्देश्य से अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते को लेकर पाकिस्तान की कूटनीतिक महत्वाकांक्षाओं को झटका लगा है। पाकिस्तान इस समझौते में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर वैश्विक मंच पर अपनी छवि सुधारने और खुद को शांति-स्थापक देश के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा था। अंतिम क्षणों में अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के कदम ने इस रणनीति को कमजोर कर दिया। मध्यस्थ की भूमिका में दिखना चाहता था पाकिस्तान सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद स्थापित करने और संदेशों के आदान-प्रदान में सहयोग करने का प्रयास किया था। इसके तहत दोनों देशों के प्रतिनिधियों को इस्लामाबाद में आमंत्रित करने और वार्ता के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने की भी कोशिश की गई। पाकिस्तानी नेतृत्व को उम्मीद थी कि यदि समझौते का अंतिम रूप उसकी सक्रिय भागीदारी में सामने आता है, तो इससे उसकी अंतरराष्ट्रीय साख मजबूत होगी और आतंकवाद से जुड़े आरोपों के कारण बनी उसकी नकारात्मक छवि को सुधारने में मदद मिलेगी। 'इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' से थीं बड़ी उम्मीदें अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते को 'इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' नाम दिया गया। प्रारंभिक योजना के अनुसार, समझौते पर हस्ताक्षर के लिए 19 जून को स्विट्जरलैंड में एक कार्यक्रम आयोजित होना था, जिसे पाकिस्तान अपनी कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत करना चाहता था। घटनाक्रम ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने निर्धारित कार्यक्रम से पहले ही डिजिटल माध्यम से समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। बाद में ट्रंप ने फ्रांस में इसकी घोषणा भी कर दी। इस कदम के बाद वह मंच, जिसे पाकिस्तान अपनी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना चाहता था, उसकी सक्रिय भूमिका के बिना ही अप्रासंगिक हो गया। शहबाज सरकार को नहीं मिला अपेक्षित कूटनीतिक लाभ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif ने भी बाद में समझौते से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम औपचारिकता भर रह गया और इससे पाकिस्तान को वह अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिल सकी, जिसकी उसे उम्मीद थी। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका ने समझौते के अंतिम चरण में प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में रखकर यह सुनिश्चित किया कि इसका प्रमुख श्रेय वॉशिंगटन और तेहरान के बीच प्रत्यक्ष प्रयासों को ही मिले। ट्रंप के फैसले ने बदला पूरा समीकरण डोनाल्ड ट्रंप अपने अप्रत्याशित राजनीतिक फैसलों के लिए जाने जाते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि उन्होंने अंतिम समय में समझौते पर हस्ताक्षर की प्रक्रिया बदलकर पाकिस्तान की उस रणनीति को निष्प्रभावी कर दिया, जिसके तहत इस्लामाबाद स्वयं को शांति प्रक्रिया का केंद्रीय पक्ष साबित करना चाहता था। इसके साथ ही जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप द्वारा भारतीय प्रधानमंत्री Narendra Modi की सार्वजनिक सराहना को भी पाकिस्तान में निराशा के एक अन्य कारण के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों की राय Dhananjay Tripathi का मानना है कि पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय हैसियत ऐसी नहीं है कि वह किसी बड़े वैश्विक समझौते का निर्णायक मध्यस्थ बन सके। उनके अनुसार, "पाकिस्तान ने इस प्रक्रिया में भागीदारी कर अपने कूटनीतिक अलगाव को कुछ हद तक कम करने की कोशिश की है, लेकिन वह इस समझौते का निर्माता या निर्णायक पक्ष नहीं था। ईरान और अमेरिका के बीच समझौते का अंतिम स्वरूप उसके बिना भी संभव था।" उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने अपनी भूमिका को अपेक्षा से अधिक महत्व देने की कोशिश की, लेकिन वास्तविकता यह है कि उसकी भागीदारी सीमित थी और उसे इस प्रक्रिया से कोई बड़ा रणनीतिक लाभ नहीं मिला। क्या बदलेगी पाकिस्तान की वैश्विक छवि? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया से पाकिस्तान को कुछ हद तक राजनयिक सक्रियता दिखाने का अवसर जरूर मिला है, लेकिन अमेरिका-ईरान समझौते का मुख्य श्रेय हासिल करने की उसकी कोशिश सफल नहीं रही। ऐसे में यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या इस घटनाक्रम से पाकिस्तान की वैश्विक छवि में कोई स्थायी बदलाव आएगा, या यह अवसर भी उसके लिए केवल एक सीमित कूटनीतिक उपलब्धि बनकर रह जाएगा।  

Deepshikha जून 20, 2026 0
Donald Trump and Iranian officials at Versailles Palace after signing the 14-point US-Iran agreement.
100 साल पहले जहां से अमेरिका बना महाशक्ति, उसी वर्साय में ट्रंप-ईरान डील पर उठे सवाल; क्या पश्चिम एशिया में नए समीकरण बन रहे हैं?

  फ्रांस के ऐतिहासिक वर्साय महल (Versailles Palace) में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच हुए 14 सूत्रीय समझौते ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। कई राजनीतिक विश्लेषक इस समझौते की तुलना 1919 की वर्साय संधि से कर रहे हैं, जिसे प्रथम विश्व युद्ध के बाद वैश्विक व्यवस्था को पुनर्गठित करने वाला दस्तावेज माना जाता है। इस बार बहस का केंद्र यह है कि क्या अमेरिका ने अपनी रणनीतिक बढ़त बनाए रखी है या फिर समझौते में ईरान को अपेक्षा से अधिक रियायतें दी गई हैं। 1919 की वर्साय संधि और अमेरिका का उदय प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के बाद 28 जून 1919 को फ्रांस के वर्साय महल में शांति संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। उस समय अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के प्रसिद्ध ‘14 सूत्र’ (Fourteen Points) ने युद्धोत्तर विश्व व्यवस्था की दिशा तय की थी। इतिहासकारों का मानना है कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद अमेरिका आर्थिक और वित्तीय महाशक्ति के रूप में उभरा। यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था युद्ध से कमजोर हुई, जबकि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदाता और औद्योगिक शक्ति बनकर सामने आया। वर्साय में ट्रंप-ईरान समझौता और नई राजनीतिक बहस करीब 107 वर्ष बाद एक बार फिर वर्साय महल वैश्विक राजनीति का केंद्र बना, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ 14 सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के बाद ट्रंप ने कहा कि यह समझौता आसान नहीं था और इसके लिए लंबी वार्ताएं करनी पड़ीं। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठने लगा कि क्या अमेरिका ने ईरान के साथ समझौते में अपनी पूर्व घोषित कठोर नीतियों से पीछे हटने का संकेत दिया है। बैलिस्टिक मिसाइलों पर ट्रंप के बदले सुर फ्रांस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि यदि अन्य क्षेत्रीय देशों के पास बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, तो ईरान के पास भी सीमित संख्या में ऐसी मिसाइलें होने पर उन्हें आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि बैलिस्टिक मिसाइलें और परमाणु हथियार एक जैसी चीज नहीं हैं और इस मुद्दे पर आगे भी बातचीत जारी रहेगी। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान के दौरान अमेरिका और इजराइल दोनों ने ईरानी मिसाइल कार्यक्रम को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। ईरान को मिलीं क्या बड़ी रियायतें? समझौते के सामने आए विवरणों के अनुसार: ईरान को तत्काल अपने संवर्धित यूरेनियम भंडार को सौंपने की बाध्यता नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) से जुड़े मुद्दों पर आगे की वार्ताओं का रास्ता खुला रखा गया है। अमेरिका ने ईरान की कुछ जमी हुई संपत्तियों को लेकर भी नरम रुख दिखाया है। प्रतिबंधों में संभावित राहत और पुनर्निर्माण फंड को लेकर भी चर्चाएं जारी हैं। ईरानी अधिकारियों का दावा है कि समझौते में देश के राष्ट्रीय हितों और संप्रभु अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की गई है। इजराइल में क्यों बढ़ी चिंता? इजराइल के कई राजनीतिक और रणनीतिक विश्लेषकों ने इस समझौते पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि यदि ईरान की कुछ सैन्य क्षमताएं और क्षेत्रीय प्रभाव बरकरार रहता है, तो इससे भविष्य में इजराइल की सुरक्षा चुनौतियां बढ़ सकती हैं। कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि समझौते से ईरान को आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिल सकता है, जबकि इजराइल के लिए उपलब्ध विकल्प सीमित हो सकते हैं। क्या इतिहास दोहराया जा सकता है? 1919 की वर्साय संधि को कई इतिहासकार द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले कारकों में से एक मानते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों और 1919 के यूरोप की स्थिति में सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा। फिर भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या ट्रंप-ईरान समझौता पश्चिम एशिया में स्थायी शांति स्थापित करेगा या यह केवल बड़े टकराव को कुछ समय के लिए टालने वाला समझौता साबित होगा। आगे क्या? अमेरिका और ईरान के बीच हुए इस समझौते के बाद अगले 60 दिनों की वार्ताएं निर्णायक मानी जा रही हैं। मिसाइल कार्यक्रम, परमाणु गतिविधियां, होर्मुज जलडमरूमध्य और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के रुख से यह तय होगा कि यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थिरता लाता है या नई भू-राजनीतिक चुनौतियों को जन्म देता है।    

Deepshikha जून 19, 2026 0
US President Donald Trump speaks during the G7 Summit in France while discussing the proposed Iran agreement and future military options.
G7 में ट्रंप की खुली चेतावनी: ईरान से समझौता नहीं हुआ तो फिर होगी बमबारी

  एवियन/वॉशिंगटन: फ्रांस में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि तेहरान के साथ प्रस्तावित समझौता अभी अंतिम रूप में नहीं पहुंचा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल एक मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) है और यदि उन्हें इसकी शर्तें पसंद नहीं आईं या ईरान ने अपेक्षित व्यवहार नहीं किया, तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई करने से नहीं हिचकेगा। ट्रंप ने कहा, "यह कोई अंतिम समझौता नहीं है। अगर मुझे यह पसंद नहीं आया या ईरान ने सही तरीके से व्यवहार नहीं किया, तो हम फिर से उन पर कार्रवाई करेंगे।" उन्होंने ईरान पर पिछले 47 वर्षों से क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा करने का आरोप लगाते हुए कहा कि अब उसे अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा। व्हाइट हाउस ने समझौते को बताया रणनीतिक सफलता व्हाइट हाउस की ओर से रिपब्लिकन सांसदों और ट्रंप समर्थकों को भेजे गए एक दस्तावेज में दावा किया गया है कि प्रस्तावित समझौते से अमेरिका अपने प्रमुख रणनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने में सफल रहा है। दस्तावेज के अनुसार, समझौते के प्रमुख बिंदु हैं— • ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। • होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री आवाजाही सामान्य बनी रहेगी। • पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। समझौते की गोपनीयता पर उठ रहे सवाल अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते का पूरा विवरण अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसके चलते अमेरिकी राजनीतिक हलकों में कई सवाल उठ रहे हैं। कई रिपब्लिकन नेताओं ने भी माना है कि शर्तों को गोपनीय रखने से भ्रम और अटकलें बढ़ी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समझौते का पूरा दस्तावेज सामने नहीं आता, तब तक यह स्पष्ट नहीं हो सकेगा कि दोनों देशों ने किन शर्तों पर सहमति बनाई है और उनकी वास्तविक प्रतिबद्धताएं क्या हैं। दुनिया की नजरें अमेरिका-ईरान वार्ता पर अमेरिका और ईरान के बीच जारी वार्ता पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं, क्योंकि इसका सीधा असर पश्चिम एशिया की स्थिरता, वैश्विक तेल बाजार और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर पड़ सकता है। ट्रंप के ताजा बयान से यह भी संकेत मिला है कि कूटनीतिक बातचीत के साथ-साथ सैन्य विकल्प अभी भी अमेरिकी रणनीति का हिस्सा बने हुए हैं।  

Deepshikha जून 18, 2026 0
A commercial oil tanker passes through the Strait of Hormuz amid rising tensions between the United States and Iran.
अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट का दावा- होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की पकड़ बड़ी चुनौती, परमाणु हथियार से भी ज्यादा चिंता का विषय

  वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते से पहले अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक नई रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान अब किसी भी समय दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), में समुद्री यातायात को बाधित करने की क्षमता रखता है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की यह क्षमता केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल आपूर्ति के लिए भी बड़ा जोखिम बन सकती है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों में कुछ खुफिया सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया है कि होर्मुज पर ईरान का प्रभाव अमेरिका के लिए परमाणु हथियारों से भी बड़ी रणनीतिक चुनौती बनकर उभरा है। दुनिया के 20 फीसदी तेल व्यापार का प्रमुख मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में से एक है। वैश्विक स्तर पर लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का परिवहन इसी समुद्री रास्ते से होता है। ऐसे में इस मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा का असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक महंगाई पर पड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान के पास अब भी बड़ी संख्या में मिसाइलें, ड्रोन, मिसाइल लॉन्चर और तेज गति वाली नौकाएं मौजूद हैं, जिनकी मदद से वह इस समुद्री क्षेत्र में दबाव बनाने की क्षमता रखता है। अमेरिका-ईरान समझौते पर टिकी नजरें अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने संकेत दिया है कि समझौते के प्रमुख बिंदुओं में ईरान का परमाणु हथियार नहीं रखने का वादा और होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखना शामिल है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह आने वाले दिनों में समझौते का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक कर सकते हैं। अभी तक इस समझौते के आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। विशेषज्ञों की चिंता बरकरार भले ही अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता आगे बढ़ रही हो, लेकिन ऊर्जा विशेषज्ञों और सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की रणनीतिक पकड़ भविष्य में भी वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए अनिश्चितता का बड़ा कारण बनी रह सकती है।  

Deepshikha जून 18, 2026 0
Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu addresses media amid growing opposition to the proposed US-Iran peace agreement.
ईरान को कभी परमाणु हथियार नहीं मिलेंगे: नेतन्याहू, US-ईरान समझौते पर इजराइल में बढ़ी नाराजगी

  तेल अवीव: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर इजराइल में बढ़ती राजनीतिक नाराजगी के बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दो टूक कहा है कि ईरान को कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि चाहे कोई समझौता हो या न हो, इजराइल अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। नेतन्याहू ने कहा, "ईरान के पास कभी परमाणु हथियार नहीं होंगे, न आज और न कल। हमने अपने देश पर मंडरा रहे विनाश के तत्काल खतरे को टाल दिया है और इजराइल को पूर्ण विनाश से बचाया है।" विपक्ष और सहयोगियों के निशाने पर नेतन्याहू प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है, जब उन्हें विपक्ष के साथ-साथ अपनी सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार के सहयोगियों की आलोचना का भी सामना करना पड़ रहा है। इजराइल में कई राजनीतिक दलों का मानना है कि अमेरिका-ईरान समझौते से क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट का हमला इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदार Naftali Bennett ने नेतन्याहू सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार का कार्यकाल राजनीतिक विभाजन, 7 अक्टूबर के नरसंहार और अब ईरान मुद्दे पर ऐतिहासिक विफलता से चिह्नित रहा है। बेनेट ने दावा किया कि यदि वह सत्ता में होते तो कूटनीतिक और सुरक्षा मामलों में अलग रणनीति अपनाते। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ उनके संबंध केवल इजराइल के राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए जाते। ट्रंप से मतभेद की अटकलों पर दिया जवाब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के साथ मतभेद की चर्चाओं पर नेतन्याहू ने कहा कि कुछ मुद्दों पर दोनों नेताओं के विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन इजराइल के सुरक्षा हित सर्वोपरि हैं। उन्होंने कहा, "ऐसे अवसर आते हैं जब राष्ट्रपति ट्रंप और मेरे विचार पूरी तरह समान नहीं होते, लेकिन इजराइल की सुरक्षा की समझदारी से रक्षा की जानी चाहिए।" लेबनान और सीरिया में सुरक्षा क्षेत्र बनाए रखेगा इजराइल प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने दक्षिणी लेबनान से सेना हटाने की संभावना को भी खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि इजराइल ने गाजा, लेबनान और सीरिया में सुरक्षा क्षेत्र स्थापित किए हैं और जरूरत पड़ने तक वहां अपनी उपस्थिति बनाए रखेगा। नेतन्याहू ने कहा, "हमने इजराइल के चारों ओर गहरे सुरक्षा क्षेत्र बनाए हैं। हमने सीरिया में असद की सेना के हथियारों को नष्ट किया है। अपने देश की सुरक्षा के लिए हम इन क्षेत्रों में तब तक बने रहेंगे, जब तक इसकी आवश्यकता होगी।" समझौते को लेकर जारी है सियासी बहस विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिणी लेबनान और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे अमेरिका-ईरान समझौते के कार्यान्वयन में बाधा बन सकते हैं। ऐसे में इजराइल के भीतर यह बहस तेज हो गई है कि क्या यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थिरता लाएगा या नए सुरक्षा संकट पैदा करेगा।  

Deepshikha जून 17, 2026 0
World leaders react to the proposed US-Iran peace agreement and reopening of the Strait of Hormuz amid hopes of easing Middle East tensions.
अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर दुनिया ने जताई खुशी, कतर से फ्रांस तक नेताओं ने किया स्वागत

  वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते की घोषणा के बाद दुनिया भर के नेताओं ने इसका स्वागत किया है। कतर, तुर्किये, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस समेत कई देशों ने इसे पश्चिम एशिया में स्थिरता बहाल करने, होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को दोबारा खोलने और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे दबाव को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शांति समझौते के दावे और पाकिस्तान की ओर से 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर होने की घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। ईरान ने भी संकेत दिया है कि निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद समझौते पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। कतर ने कहा- स्थायी शांति की दिशा में अहम पहल Mohammed bin Abdulrahman Al Thani ने अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि यह पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे की वार्ताएं सकारात्मक और रचनात्मक माहौल में आगे बढ़ेंगी। एर्दोआन बोले- दुनिया लंबे समय से इस खबर का इंतजार कर रही थी Recep Tayyip Erdoğan ने कहा कि पूरी दुनिया लंबे समय से इस तरह की खबर का इंतजार कर रही थी। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त करेगा। एर्दोआन ने सभी पक्षों से संयम बरतने और उकसावे वाली गतिविधियों से बचने की अपील की। साथ ही उन्होंने पाकिस्तान, कतर और सऊदी अरब के कूटनीतिक प्रयासों की सराहना की। ब्रिटेन ने बताया युद्ध समाप्ति की दिशा में बड़ी उपलब्धि Keir Starmer ने इस समझौते को युद्ध समाप्त करने और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करने की दिशा में बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। स्टार्मर ने यह भी कहा कि समझौते को पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए और ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाने की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता बनी रहनी चाहिए। जर्मनी ने कहा- वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत Friedrich Merz ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि यह पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और वैश्विक अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाला कदम साबित हो सकता है। उन्होंने इसे दूरगामी प्रभाव वाला कूटनीतिक समाधान बताते हुए कहा कि इससे ऊर्जा बाजारों में स्थिरता लौट सकती है और व्यापारिक अनिश्चितताएं कम हो सकती हैं। फ्रांस ने होर्मुज जलडमरूमध्य तत्काल खोलने की मांग की Emmanuel Macron ने कहा कि समझौते का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम होर्मुज जलडमरूमध्य का तत्काल और बिना किसी शर्त के दोबारा खुलना होना चाहिए। मैक्रों ने कहा कि फ्रांस और ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात को सामान्य बनाने के प्रयासों में सहयोग देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समझौते के बाद ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों सहित क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े व्यापक मुद्दों पर भी बातचीत आगे बढ़नी चाहिए। ट्रंप ने किया समझौता पूरा होने का दावा Donald Trump ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पूरा हो चुका है और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की अनुमति दी जा रही है। ट्रंप ने कहा, "दुनिया के जहाज अब अपने इंजन शुरू करें, तेल का प्रवाह जारी रहने दें।" पाकिस्तान की मध्यस्थता की चर्चा Shehbaz Sharif ने दावा किया कि लंबी बातचीत के बाद दोनों पक्ष समझौते पर सहमत हुए हैं और 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि समझौते को अंतिम रूप देने में कतर, सऊदी अरब और तुर्किये की भूमिका अहम रही है। वैश्विक बाजार की नजरें 19 जून पर यदि प्रस्तावित समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर होते हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य दोबारा खुलता है, तो इसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति, ऊर्जा कीमतों और पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब 19 जून को होने वाली संभावित औपचारिक प्रक्रिया और उसके बाद की घटनाओं पर नजर बनाए हुए है।  

Deepshikha जून 15, 2026 0
US President Donald Trump speaks after Israeli airstrikes on Beirut, urging restraint and calling for peace efforts in the Middle East.
बेरूत पर हमले से भड़के डोनाल्ड ट्रंप, इजराइल-ईरान को दी कड़ी चेतावनी; बोले- शांति समझौते के इतने करीब आकर इसे बर्बाद न करें

  वॉशिंगटन: लेबनान की राजधानी बेरूत पर इजराइली हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने इजराइल और ईरान दोनों को चेतावनी देते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के प्रयास निर्णायक चरण में हैं और ऐसे समय में किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए कहा, “आज सुबह बेरूत पर हुआ हमला नहीं होना चाहिए था, खासकर ऐसे दिन जब हम ईरान के साथ शांति समझौते के बहुत करीब हैं।” ‘इजराइल को आत्मरक्षा का अधिकार, लेकिन जवाबी हमला बेमतलब था’ ट्रंप ने कहा कि इजराइल को अपनी सुरक्षा और खतरों से बचाव का पूरा अधिकार है, लेकिन जिस घटना के जवाब में यह हमला किया गया, उसमें कोई घायल या हताहत नहीं हुआ था। ऐसे में इस तरह की सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने कहा, “इजराइल को अपने नागरिकों की रक्षा करने का अधिकार है, लेकिन इस मामले में की गई जवाबी कार्रवाई बेमतलब थी।” ‘अब आगे कोई हमला नहीं होना चाहिए’ अमेरिकी राष्ट्रपति ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए सभी पक्षों को पीछे हटना होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न केवल इजराइल को लेबनान में आगे कोई हमला नहीं करना चाहिए, बल्कि हिज्बुल्ला और अन्य संगठनों को भी इजराइल के खिलाफ किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई से बचना चाहिए। ट्रंप ने लिखा, “हम एक ऐसे समझौते के बेहद करीब हैं, जो लेबनान समेत पूरे क्षेत्र में शांति ला सकता है। सभी पक्षों को पीछे हटना चाहिए। इजराइल को लेबनान में और हमले नहीं करने चाहिए और हिज्बुल्ला समेत किसी भी अन्य पक्ष को भी इजराइल पर हमला नहीं करना चाहिए।”  

Deepshikha जून 15, 2026 0
Israeli fighter jets and smoke rising over Beirut after airstrikes targeting Hezbollah-linked sites amid escalating Middle East tensions.
इजराइल ने बेरूत में हिज्बुल्ला के ठिकानों पर किया हमला, नेतन्याहू बोले- यह जवाबी कार्रवाई

  बेरूत: पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। इजराइल की सेना (IDF) ने रविवार को लेबनान की राजधानी बेरूत में हिज्बुल्ला से जुड़े ठिकानों पर हवाई हमले किए। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा कि यह कार्रवाई उत्तरी इजराइल पर हिज्बुल्ला के हालिया हमलों के जवाब में की गई है। इजराइली सेना के मुताबिक, हमलों का निशाना हिज्बुल्ला से संबंधित सैन्य ढांचे और रणनीतिक ठिकाने थे। इससे पहले भी इजराइल ने एक सप्ताह पूर्व बेरूत के दक्षिणी उपनगरों पर हमला किया था, जिसके बाद क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया था। हिज्बुल्ला के मिसाइल हमलों के बाद बढ़ा तनाव हिज्बुल्ला ने दो मार्च को उत्तरी इजराइल पर कई मिसाइलें दागी थीं। यह हमला अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई के दो दिन बाद हुआ था। हिज्बुल्ला ने इन हमलों को क्षेत्रीय आक्रामकता के खिलाफ जवाबी कदम बताया था। इजराइल का कहना है कि वह अपनी सुरक्षा और नागरिकों की रक्षा के लिए आवश्यक सभी कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है और सीमा पार से होने वाले हमलों का कड़ा जवाब दिया जाएगा। ईरान ने रखी नई शर्त हिज्बुल्ला के प्रमुख समर्थक ईरान ने कहा है कि अमेरिका-ईरान युद्धविराम समझौते में लेबनान में इजराइली सैन्य अभियानों को रोकना भी शामिल होना चाहिए। तेहरान का कहना है कि यदि लेबनान में हमले जारी रहते हैं, तो क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करना मुश्किल होगा। अमेरिका-ईरान युद्धविराम पर पाकिस्तान का दावा इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान पश्चिम एशिया में युद्ध समाप्त करने के लिए एक अंतिम मसौदा समझौते की शर्तों पर सहमत हो गए हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने मध्यस्थता की कोशिशों में भूमिका निभाई है और दोनों देशों के साथ आगे की प्रक्रिया पर काम कर रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को शुरू किए गए सैन्य अभियान के बाद पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ गई थी। इस संघर्ष के कारण फारस की खाड़ी से तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई। सात अप्रैल से दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम लागू है, लेकिन इजराइल-हिज्बुल्ला तनाव के चलते क्षेत्र में हालात अब भी नाजुक बने हुए हैं।  

Deepshikha जून 15, 2026 0
Military tension escalates in the Gulf region as reports emerge of US strikes and Iranian actions near the Strait of Hormuz.
अमेरिका-ईरान तनाव चरम पर: अमेरिकी हमलों के बाद तेहरान ने होर्मुज स्ट्रेट बंद करने का किया ऐलान

  वॉशिंगटन/तेहरान: पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की सख्त चेतावनी के कुछ घंटों बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई की। हमलों के बाद दक्षिणी ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में विस्फोटों की खबरें सामने आई हैं, जबकि तेहरान ने जवाबी कदम उठाते हुए होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की घोषणा कर दी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सिरिक, मिनाब, बंदर अब्बास, क़ेश्म द्वीप और गोर्गान समेत कई इलाकों में विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं। हालात की गंभीरता को देखते हुए ईरान ने कई संवेदनशील क्षेत्रों में अपने एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय कर दिए हैं और सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। ट्रंप प्रशासन की चेतावनी के बाद हुई कार्रवाई अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने पहले ही संकेत दिया था कि यदि ईरान अपने रवैये में बदलाव नहीं करता, तो उसके महत्वपूर्ण सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया जाएगा। अमेरिकी हमले उसी चेतावनी के बाद किए गए, जिससे दोनों देशों के बीच टकराव और गहरा गया है। ईरान ने बंद किया होर्मुज स्ट्रेट अमेरिकी हमलों के बाद ईरान के संयुक्त सैन्य कमान ने गुरुवार को घोषणा की कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट को तत्काल प्रभाव से बंद किया जा रहा है। सैन्य अधिकारियों ने कहा कि अब इस समुद्री मार्ग से किसी भी तेल टैंकर या व्यावसायिक जहाज को गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ईरान ने चेतावनी दी कि प्रतिबंध के बावजूद इस मार्ग का इस्तेमाल करने की कोशिश करने वाले जहाजों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। घोषणा के कुछ समय बाद ईरानी मीडिया ने दावा किया कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने का प्रयास कर रहे दो जहाजों को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने रोक दिया। अमेरिका ने किया ईरानी दावों का खंडन अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने ईरान के दावों को खारिज करते हुए कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात जारी है और अंतरराष्ट्रीय नौवहन गतिविधियों पर फिलहाल कोई व्यापक असर नहीं पड़ा है। वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है असर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट में तनाव लगातार बढ़ता है, तो इसका सीधा प्रभाव वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजारों पर पड़ सकता है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय बन गया है। फिलहाल दोनों देशों की ओर से आक्रामक बयानबाजी जारी है और क्षेत्रीय हालात पर दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।  

Deepshikha जून 11, 2026 0
Donald Trump and Benjamin Netanyahu amid reports of policy differences and intelligence concerns.
अमेरिका-इजरायल रिश्तों में बढ़ी दरार? जासूसी आशंकाओं के बीच पेंटागन अलर्ट मोड में

  अमेरिका और इजरायल के बीच दशकों पुराने रणनीतिक संबंधों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान में इजरायल की कथित खुफिया गतिविधियों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। इसी बीच पश्चिम एशिया की नीतियों और ईरान संकट को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu के बीच मतभेदों की खबरें भी सामने आई हैं। पेंटागन में बढ़ी सतर्कता रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग के भीतर इजरायल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस जोखिमों को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। बताया जा रहा है कि कुछ अमेरिकी अधिकारी विदेश यात्राओं के दौरान अस्थायी संचार उपकरणों और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल का उपयोग कर रहे हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और अमेरिकी प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी गंभीर सुरक्षा स्थिति की पुष्टि नहीं की है। खुफिया गतिविधियों को लेकर पुरानी चिंताएं फिर चर्चा में अमेरिका और इजरायल करीबी सहयोगी माने जाते हैं, लेकिन अतीत में भी दोनों देशों के बीच खुफिया गतिविधियों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सहयोगी देशों के बीच भी संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा हमेशा एक महत्वपूर्ण विषय रहती है। इसी संदर्भ में कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिकी अधिकारियों को गोपनीय चर्चाओं के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेदों की चर्चा रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि ईरान, लेबनान और व्यापक पश्चिम एशिया नीति को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू के बीच हाल के महीनों में कुछ रणनीतिक मतभेद उभरे हैं। बताया गया कि दोनों नेताओं के बीच हुई एक बातचीत के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य कार्रवाइयों को लेकर तीखी चर्चा हुई। इस संबंध में दोनों पक्षों की ओर से आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है। इजरायल ने आरोपों को किया खारिज वॉशिंगटन स्थित इजरायली अधिकारियों ने जासूसी संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इजरायल अपने सहयोगी देशों के खिलाफ ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन के कुछ अधिकारियों ने भी इन रिपोर्टों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया है और कहा है कि अमेरिका-इजरायल सुरक्षा सहयोग पहले की तरह मजबूत बना हुआ है। पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई संवेदनशीलता विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान, लेबनान और क्षेत्रीय संघर्षों से जुड़े मुद्दों ने अमेरिका और इजरायल के संबंधों को अधिक संवेदनशील बना दिया है। दोनों देशों के बीच सैन्य और खुफिया सहयोग जारी है, लेकिन क्षेत्रीय रणनीति को लेकर मतभेद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। फिलहाल, जासूसी गतिविधियों और सुरक्षा चिंताओं से जुड़े कई दावे मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। आधिकारिक स्तर पर इनकी पुष्टि सीमित है, इसलिए इन्हें सावधानी के साथ देखने की आवश्यकता है।  

Deepshikha जून 8, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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kalpana जुलाई 21, 2026 0